बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

समागम 2017 फरवरी का अंक

शोध पत्रिका समागम अपने निरन्तर प्रकाशन के 16 साल पुरे कर चुकी है. समाज के विविध पक्षो को मीडिया और सिनेमा के जरिये देखने और समझने की कोशिश करते रहे हैं. इस क्रम में इस बार 5 राज्यो में हो रहे विधानसभा चुनावों पर केंद्रित किया है. खासतौर पर उत्तर प्रदेश में चुनाव ज़िद और ज़िरह का चुनाव है. पिता से अलग लाइन लेकर अखिलेश का चुनाव और भाजपा का अखिलेश के कामो को लेकर ज़िरह करना। पंजाब और गोवा में आम आदमी पार्टी का दम दिखाना और आखिर में मणिपुर में इरोम का भाजपा पर आरोप लगाना। इन राज्यो के चुनाव 2019 के आम चुनाव की ज़मीं भी तैयार करेंगे। 

शनिवार, 28 जनवरी 2017

नैतिक शिक्षा के पैरोकार महात्मा गांधी

गांधी पुण्यतिथि पर विशेष

मैं कभी झूठ नहीं बोलता, यह वाक्य लगभग हर आदमी कहता है लेकिन जब स्वयं की गलती मानने का वक्त होता है तो वह केवल और केवल झूठ का सहारा लेता है। यह  बनी-बनायी बात नहीं है अपितु जीवन का एक कड़ुवा सत्य है। ऐसा क्यों हुआ या हो रहा है? इसके पीछे कारण तलाश करेंगे तो हमें ज्ञात होगा कि नैतिक शिक्षा के गुम हो जाने के साथ ही समाज में संकट सर्वव्यापी हो गया है। ऐसे में हमें महात्मा गांधी का स्मरण करना सबसे जरूरी लगता है। वे भी हमारी तरह हाड़-मांस के व्यक्ति थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक गलतियां की लेकिन अपनी गलतियों को समझा और पूरे साहस के साथ समाज के समक्ष ‘सत्य के प्रयोग’ शीर्षक से रखा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन बापू और महात्मा के रूप में मौजूद हैं। उनकी आत्मकथा नैतिक शिक्षा की पाठशाला है। एक ऐसी पाठशाला जो जीवन का सीख देती है। नैतिकता के उच्च मानदंड को पूर्ण करती हुई एक मनुष्य बनने का साहस और संकल्प का भाव उत्पन्न करती है। मनुष्य में मनुष्यता का आत्मबल जगाती है। 
आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं। हमारे भीतर सहिष्णुता का जिस तेजी से हस हो रहा है और कदाचित जीवन मूल्यों से हम बेलाग हुए जा रहे हैं तो कहीं न कहीं नैतिक शिक्षा का अभाव ही है। प्राथमिक शिक्षा में नैतिक शिक्षा का पाठ इसलिए ही पढ़ाया जाता था कि बच्चे बड़े होकर जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में समझें। नैतिक शिक्षा का अर्थ बहुत सामान्य सा है। इसका अर्थ है जीवन में हम झूठ बोलने से बचें, बड़ों का निरादर ना करें, स्वयंसेवी बनें, राष्ट्र और समाज के प्रति हमारी निष्ठा हो तथा सबके प्रति मन में दया का भाव बना रहे। आज ये सारे लक्ष्ण नयी पीढ़ी में समाप्त होते दिख रहे हैं। दूसरों से अधिक मैं कैसे और कितना प्राप्त कर लूं, इसकी होड़ मची है। संयम और तृप्ति तो बस बीते जमाने की बात हो चुकी है। लालच ने अनेक विकारों को जन्म दिया है। इन विकारों के चलते ही समाज में टूटन की स्थिति बन रही है। यह सब एक स्वस्थ्य और विकसित समाज के लिए दुखदायी है। 
यह भारत वर्ष का सौभाग्य है कि जनवरी माह में हमें बड़े महामनाओं का स्मरण करने का देता है। इस महीने पत्रकारिता के एक अन्य पुरोधा माखनलाल चतुर्वेदीजी की पुण्यतिथि है, युवाओं के मार्गदर्शक स्वामी विवेकानंद जी की जयंती है। महात्मा की तरह इनकी जीवनी भी नैतिकता की पाठ पढ़ाती है। ये सारे लोग यूं ही हमारे प्रेरणास्रोत नहीं बनें बल्कि इन्होंने अपने जीवनकाल में वह सब कुछ किया जो सत्य, अहिंसा और सद्मार्ग की ओर ले जाते हैं। आज विश्वमंच पर भारत की आवाज गूंजती है तो हमारे इन पुरखों के कारण। आज हम अलग से चिंहित हैं तो इन पुरखों के उन कार्यों के कारण जिनको आज सारा संसार मान रहा है।  हम इठला सकते हैं और अभिभूत भी हो सकते हैं कि हम श्रेष्ठ हैं तो श्रेष्ठता इन्हीं महानुभावों के कर्मों से है किन्तु अब इठलाने की जगह पर आत्ममंथन करना होगा। हमें इस बात की जांच करनी होगी कि हम अपने पुरखों के कर्मों से आज शीर्ष पर हैं किन्तु क्या हमारे कर्म ऐसे हैं जो हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए गौरव का विषय बन सके? शायद ऐसा नहीं है। गौरव गाथा के रास्ते के लिए बनाये गए नींव का पत्थर अर्थात नैतिक शिक्षा को ही जीवन से निकाल बाहर किया है। जब जीवन में नैतिक व्यवहार ही नहीं होगा तो सत्य और अहिंसा एक दिवास्वप्र की तरह है। नैतिक शिक्षा ही सत्य और अहिंसा का मार्ग प्रशस्त करती है किन्तु वर्तमान समय भटकाव का है। यांत्रिक रूप से हम विकसित हो चुके हैं किन्तु व्यवहारिक रूप से, चरित्र के तौर पर हमारा पतन आरंभ हो चुका है, इस बात पर ऐतराज करने का कोई कारण शेष नहीं रहता है। ऐसा भी नहीं है कि इस बिगड़ रही स्थिति से हम बाहर नहीं आ सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है आत्मबल की। यह आत्मबल हमें महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पठन से आएगा। 
         30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनका स्मरण करते हुए हमें इस बात का संकल्प लेना चाहिए कि स्वयं के साथ बच्चों को नैतिक शिक्षा दें ताकि उनका कल सुंदर और सुनहरा बन सके। इस बात का ध्यान रखना होगा कि महापुरुषों के जन्म या पुण्यतिथि पर हम उनका स्मरण केवल इसलिए नहीं करते हैं कि तारीखें याद रह जाए बल्कि इसलिए करते हैं कि उनके बताये रास्ते का हम पुर्नपाठ करें। उन्हें आत्मसात करें और एक नई दुनिया की शुरूआत करें। एक बार फिर हमें महात्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, विवेकानंद और सुभाषचंद्र बोस को याद करते हुए उनके बताये रास्ते पर चलकर संकल्प लेना होगा। 

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

शोध पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशन के 16 साल पूरे हुए जनवरी 2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’

शोध पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशन के 16 साल पूरे हुए
भोपाल। भारतीय समाज की ताकत नैतिक शिक्षा होती थी लेकिन शैक्षिक परिसरों में बाजार के प्रवेश के बाद नैतिक शिक्षा का लोप हो चुका है। आज आवश्यक हो गया है कि हम सब मिलकर प्राथमिक स्तर पर नैतिक शिक्षा को अनिवार्य करने पर जोर दें। समाज के इस ज्वलंत विषय को लेकर भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ ने जनवरी 2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’ शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस अंक के प्रकाशन के साथ ‘समागम’ ने अपने नियमित प्रकाशन के 16 साल भी पूरे कर लिए हैं।
मीडिया, सिनेमा एवं समाज पर केन्द्रित मासिक शोध पत्रिका ‘समागम’ ने अपने प्रकाशन के सतत 16 साल जनवरी 2017 में पूरा कर लिया है। इन सालों में ‘समागम’ बुद्धिजीवियों, शिक्षकों एवं शोधार्थी विद्यार्थियों के बीच लगातार लोकप्रिय बनती रही। इन सबका लेखकीय सहयोग से स्तरीय पत्रिका के रूप में ‘समागम’ की पहचान बनी रही। ‘समागम’ का हर अंक विशेषांक के रूप में होता है। 16 सालों में विविध विषयों पर ‘समागम’ के विशेष अंकों का प्रकाशन हुआ। नवम्बर 2016 में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ विभाजन पर ‘समागम’ का विशेष अंक था तो दिसम्बर का अंक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के रजत जयंती पर था। इसके पूर्व स्वच्छ भारत अभियान को केन्द्र में रखकर ‘समागम’ के दो अंक का प्रकाशन किया गया था। ‘समागम’ का जनवरी एवं अक्टूबर अंक महात्मा गांधी पर केन्द्रित होता है। जनवरी-2017 का अंक ‘महात्मा की पाठशाला’ पर केन्द्रित है। महात्मा की पाठशाला का अर्थ समाज में नैतिक शिक्षा के विलुप्त होने को समझाने की विनम्र कोशिश है। इसके पूर्व अक्टूबर माह का अंक महात्मा गांधी की स्वच्छता दृष्टि और भारत सरकार के स्वच्छता अभियान को लेकर विशिष्ट सामग्री का प्रकाशन किया गया था। 
शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार कहते हैं कि हमें यकीं ही नहीं होता कि हमने अपने प्रकाशन के 16 साल पूरे कर लिए हैं। यह हमारे लिए एक सपने के सच होने जैसा है। बेहद सीमित साधनों में इसका प्रकाशन किया जा रहा है। वे कहते हैं कि लेखों के लेखकों की तस्वीरें प्रकाशित करने का आग्रह होता है किन्तु हम ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि तस्वीरों के स्थान लेखक की लेखनी महत्वपूर्ण होती है। सम्पादक मनोज कुमार कहते हैं कि पत्रिका की गंभीरता बनी रहे, इसकी पूरी कोशिश होती है किन्तु पूफ्र की गलतियां अखरने वाली होती हैं। कोशिश करते हैं कि ऐसा ना हो। वे  ‘समागम’ के  प्रकाशन के लिए मार्गदर्शन करने के लिए बालकवि बैरागीजी के साथ ही कुलपति कुठियाला, परमारजी, वरिष्ठ पत्रकार गिरिजाशंकरजी, जगदीश उपासनेजी एवं पत्रकारिता शिक्षा से संबद्ध सभी लोगों का आभार मानते हैं।  ‘समागम’ का अगला अंक पांच राज्यों में होने वाले चुनाव एवं चुनाव प्रक्रिया में हो रहे बदलाव पर केन्द्रित होगा।     

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

पानीदार "अनुपम" के लिए भीगी आंखें


मनोज कुमार
मीठे पानी की तरह अनुपम। अपने नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए अनुपम ने 68 वर्ष की जिंदगी में सुप्त और लुप्त होते समाज में पानी के प्रति चेतना जागृत करने की जो कोशिशें की, उन कोशिशों के बीच अनुपम मिश्र नाम का यह व्यक्तित्व हमारे साथ रहेगा, चलेगा और हमें दिशा देता रहेगा। तालाब आज भी खरे हैं उनके नाम के अनुरूप अनुपम कृति है लेकिन पानी के प्रति लोगों में जागरूकता की उनकी हर कोशिश अनुपम रही है। गीतकार भवानीप्रसाद मिश्र और सरला ने बहुत समझ कर उनका नाम अनुपम रखा होगा। यह बात भी सच है कि भवानीभाई गीतफरोश लिख कर अमर हो गए तो उनका चिराग पानीदार समाज देखने की चिंता में एक उम्र गुजार गया। यह कहना गैरवाजिब होगा कि अनुपम के बाद पानीदार समाज की चिंता करने वाले नहीं होंगे बल्कि यह कहना वाजिब होगा कि उन्होंने पानीदार समाज की चिंता करने के लिए एक बड़ी फौज तैयार कर रखी है। ये लोग समूहों में बंटे  हुए हैं। अपने अंचलों और अपने लोगों के बीच, समुदाय के बीच काम कर रहे हैं। इनकी चर्चा नहीं होती है लेकिन इनके काम इनकी आवाज और पहचान है। इनके कामों में अनुपम बसे हुए हैं। आखिर अनुपम तो अनुपम ही हैं ना।
मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि वह जिस तरह देश का ह्दय प्रदेश कहलाता है, वैसा ही उसे सपूत मिला अनुपम मिश्र के नाम का जिसने तालाबोंं और कुंओं से सूखते पानी को बचाने में न केवल लोगों को जगाया बल्कि समाज की आंखों में सूखते पानी को बचाने की कोशिश की। अनुपम का जन्म उसी वर्धा में हुआ जहां गांधी की यादें बसी हुई है और जिस शहर में गांधी की हवा, वहां अनुपम ही पैदा होते हैं, यह बात एक बार फिर साबित हो गई। सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलकर पानी के जतन के लिए जो कोशिश अनुपम ने किया, वह बेमिसाल है। ‘तालाब आज भी खरे हैं’ उनकी अनुपम कृति है और एक ऐसी रचना जो सदियों सदियों तक पानीदार समाज की धरोहर होगी। पानी बचाने और उसके जतन के लिए क्या किया जा सकता है कि चर्चा इस किताब के बिना नहीं हो पाएगी।  
  अनुपम मिश्र की छाप जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद् की है। पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यानाकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली है, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवत: संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ रही है। इसी तरह उत्तराखण्ड और राजस्थान के लापोडिय़ा में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने अहम काम किया है।
यहां उनका लिखा स्मरण करना जरूरी हो जाता है जिसमें वे लिखते हैं कि - तालाब का लबालब भर जाना भी एक बड़ा उत्सव बन जाता। समाज के लिए इससे बड़ा और कौन सा प्रसंग होगा कि तालाब की अपरा चल निकलती है। भुज (कच्छ) के सबसे बड़े तालाब हमीरसर के घाट में बनी हाथी की एक मूर्ति अपरा चलने की सूचक है। जब जल इस मूर्ति को छू लेता तो पूरे शहर में खबर फैल जाती थी। शहर तालाब के घाटों पर आ जाता। कम पानी का इलाका इस घटना को एक त्योहार में बदल लेता। भुज के राजा घाट पर आते और पूरे शहर की उपस्थिति में तालाब की पूजा करते तथा पूरे भरे तालाब का आशीर्वाद लेकर लौटते। तालाब का पूरा भर जाना, सिर्फ एक घटना नहीं आनंद है, मंगल सूचक है, उत्सव है, महोत्सव है। वह प्रजा और राजा को घाट तक ले आता था। पानी की तस्करी? सारा इंतजाम हो जाए पर यदि पानी की तस्करी न रोकी जाए तो अच्छा खासा तालाब देखते-ही-देखते सूख जाता है। वर्षा में लबालब भरा, शरद में साफ-सुथरे नीले रंग में डूबा, शिशिर में शीतल हुआ, बसंत में झूमा और फिर ग्रीष्म में? तपता सूरज तालाब का सारा पानी खींच लेगा। शायद तालाब के प्रसंग में ही सूरज का एक विचित्र नाम ‘अंबु तस्कर’ रखा गया है। तस्कर हो सूरज जैसा और आगर यानी खजाना बिना पहरे के खुला पड़ा हो तो चोरी होने में क्या देरी? सभी को पहले से पता रहता था, फिर भी नगर भर में ढिंढोरा पिटता था। राजा की तरफ से वर्ष के अंतिम दिन, फाल्गुन कृष्ण चौदस को नगर के सबसे बड़े तालाब घड़सीसर पर ल्हास खेलने का बुलावा है। उस दिन राजा, उनका पूरा परिवार, दरबार, सेना और पूरी प्रजा कुदाल, फावड़े, तगाडिय़ाँ लेकर घड़सीसर पर जमा होती। राजा तालाब की मिट्टी काटकर पहली तगाड़ी भरता और उसे खुद उठाकर पाल पर डालता। बस गाजे- बाजे के साथ ल्हास शुरू। पूरी प्रजा का खाना-पीना दरबार की तरफ से होता। राजा और प्रजा सबके हाथ मिट्टी में सन जाते। राजा इतने तन्मय हो जाते कि उस दिन उनके कंधे से किसी का भी कंधा टकरा सकता था। जो दरबार में भी सुलभ नहीं, आज वही तालाब के दरवाजे पर मिट्टी ढो रहा है। राजा की सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले उनके अंगरक्षक भी मिट्टी काट रहे हैं, मिट्टी डाल रहे हैं। उपेक्षा की इस आँधी में कई तालाब फिर भी खड़े हैं। देश भर में कोई आठ से दस लाख तालाब आज भी भर रहे हैं और वरुण देवता का प्रसाद सुपात्रों के साथ-साथ कुपात्रों में भी बाँट रहे हैं। उनकी मजबूत बनक इसका एक कारण है, पर एकमात्र कारण नहीं । तब तो मजबूत पत्थर के बने पुराने किले खंडहरों में नहीं बदलते। कई तरफ से टूट चुके समाज में तालाबों की स्मृति अभी भी शेष है। स्मृति की यह मजबूती पत्थर की मजबूती से ज्यादा मजबूत है।’
जल संसाधनों के संरक्षण व पर्यावरण चेतना के  योगदान के लिए अनुपम को 1996 में इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड व मध्यप्रदेश को उन्होंने अपनी कार्यस्थली बनाया। यहां उन्होंने कुओं, बावडिय़ों, तालाबों व बरसाती नदियों के संरक्षण की मुहिम को संबल प्रदान किया।  अनुपम मानते हैं कि वर्ष 2050 में जब भारत की जनसंख्या डेढ़ अरब का आंकड़ा पार चुकी होगी तो देश के सामने जल-संकट एक बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित होगा। लेकिन देश के नीति नियंता इस मुद्दे पर गंभीर नजऱ नहीं आते। उनका स्पष्ट मानना है कि पानी का कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसकी पर्याप्त उपलब्धता के लिए व्यापक स्तर पर मुहिम चलाने की आवश्यकता है। 
वे परंपरागत वर्षा जल-संरक्षण की पुरजोर वकालत करते हैं, ताकि वर्षपर्यंत पेयजल की उपलब्धता बनी रहे। वे इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, विकास एजेंसियों तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े समूहों की सक्रिय भागीदारी का आह्वान करते हैं। उनका मानना है कि स्वदेशी तकनीकों के बलबूते पर न केवल हम पेयजल जुटा सकते हैं बल्कि सिंचाई के साधन भी विकसित कर सकते हैं। वे कुओं को पेयजल व सिंचाई जल का महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं। इन कुओं की सफाई व पुनर्जीवन पर वह विशेष बल देते हैं। इसके साथ ही वे भूमि की जलसंग्रहण की परंपरागत तकनीक को बढ़ावा देने की बात करते हैं। वे राजनीतिक उदासीनता को दुखद बताते हुए कहते हैं कि इसके चलते देश में जल संरक्षण चेतना का समुचित विकास नहीं हो पाया।
उनकी स्पष्ट धारणा है कि जल संरक्षण प्रकृति व संस्कृति की रक्षा की अनिवार्य शर्त है। देश में भौगोलिक विषमता के चलते कुछ इलाकों में अकूत जल-संपदा विद्यमान है तो कुछ इलाकों में निपट सूखा है। इस असंतुलन को दूर करने की सख्त जरूरत है। इसमें सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति व जन समुदायों की सक्रिय भागीदारी की जरूरत है। उनके इस अभियान को सार्थक बनाने वाले तरुण भारत संघ के योगदान की दुनियाभर में चर्चा होती है जिसे इस योगदान के लिए ‘मैगसेसे पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया है।
उल्लेखनीय पहलू यह है कि अनुपम जल संरक्षण की स्वदेशी तकनीकों के पक्षधर रहे हैं। वे मानते हैं कि हमारे पुरखे सही मायनों में जल इंजीनियर थे लेकिन हम उनकी तकनीकों व अपनी विरासत का संरक्षण नहीं कर पाये। आज परंपरागत जल-स्रोत दम तोड़ रहे हैंं। आज वर्षा जल प्रबंधन-संरक्षण वक्त की दरकार है। उनकी मान्यता है कि पश्चिम जीवनशैली में पानी के दुरुपयोग के संस्कार समाहित हैं जिससे बचकर हम जल की बचत कर सकते हैं।
अनुपम पानी की तरह खरे थे। वे कहते थे कि ‘आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है। जिन सरल, सजल शब्दों की धाराओं से वह मिठी बनती थी उन धाराओं को बिल्कुल नीरस, बनावटी, पर्यावरणीय, परिस्थितिक जैसे शब्दों से बाँधा जा रहा है। अपनी भाषा, अपने ही आंगन में विस्थापित हो रही है। वह अपने ही आंगन में पराई बन रही है।’ उनकी बातें बार-बार याद आती रहेंगी। यंू तो अनुपम हममें से किसी एक के लिए नहीं बल्कि हरेक के लिए एक अनुपम अनुभव की तरह हैं लेकिन मध्यप्रदेश वालों के लिए कुछ खास। हां, अनुपम की यादों को अनुपम बनाये रखने के लिए जरूरत है कि हम सब पानी के जतन के लिए उनके प्रयासों को आगे बढ़ायें और जाने की पानीदार समाज हो जाने में हमें क्या कुछ करना होगा। वे सरकारी तंत्र के साथ काम जरूर करते थे लेकिन सरकारों पर उनकी निर्भरता बिलकुल भी नहीं थी। हम भी उनसे सीख लें ताकि पानी की यह अनुपम बूंदें उनके होने का अहसास दिलाती रहे।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी



शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पूर्व विद्यार्थियों के सम्मेलन के अवसर विश्वविद्यालय के रजत जयंती पर केन्द्रित भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी किया गया। गरिमामय समारोह में शोध पत्रिका ‘समागम’ का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, कुलपति प्रो. बीके कुठियाला, जनसंचार विभाग के अध्यक्ष श्री संजय द्विवेदी एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) पवित्र श्रीवास्तव की उपस्थिति में हुआ। शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार हैं।  
उल्लेखनीय है कि शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक  माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के रजत जयंती वर्ष पर केन्द्रित है। इस अंक में विश्वविद्यालय के आरंभ से अब तक के सफर का रोचक संकलन किया गया है। कुलपति प्रो. बी.के. कुठियाला से बातचीत के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्री कमल दीक्षित ने विश्वविद्यालय के आरंभ की पूरी कहानी का ब्यौरावार विवरण लिखा है। प्रो. श्रीकांत सिंह, श्री संजय दीक्षित, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डॉ. अविनाश वाजपेई, डॉ. संजीव गुप्ता, श्री अमरेन्द्र आर्य एवं श्री अशोक पांडे के लेख हैं जिसमें विश्वविद्यालय से जुड़े विविध प्रसंगों का स्मरण किया गया है। शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक श्री मनोज कुमार ने ‘हस्तक्षेप’ कॉलम में विश्वविद्यालय की यात्रा की समीक्षा करते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं। शोध पत्रिका ‘समागम’ विश्वविद्यालय के पूर्व एवं वर्तमान विद्यार्थियों के साथ-साथ पत्रकारिता विश्वविद्यालय में रूचि रखने वालों के लिए दस्तावेज है। 

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

सत्य और अहिंसा का रास्ता बताने वाले गुरु घासीदासजी

-अनामिका
समाज अपने महापुरुषों का आरंभ से अनुयायी रहा है। सांसारिक जीवन जीते हुए मनुष्य को कई बार अपनी गलती का अहसास नहीं हो पाता है और वे गलत को ही सही मानते हैं। ऐसे में अपनी दिव्य दृष्टि से मानव की सोच बदलने वाला व्यक्तित्व को हमने महापुरुष कहकर बुलाया है। यह वही लोग हैं जो हमें मार्गदर्शन देते हैं। जीवन जीने का रास्ता बताते हैं और कहते हैं कि जीवन में किस तरह लोगों का उपकार किया जाए  और किस तरह इस मानव जीवन को सार्थक बनाया जाए। सभी महापुरुष सत्य और अहिंसा के रास्ते को जीवन का श्रेष्ठ रास्ता मानते हैं। इन्हीं महापुरुषों में एक हुए हैं गुरु घासीदास। छत्तीसगढ़ की धरा में अवतरित होने वाले इस महान व्यक्तित्व ने न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों का मार्गदर्शन किया अपितु पूरे संसार में गुरु घासीदास का नाम हो चला है। संत वाणी उनकी गूंज रही है। 
गुरु घासीदासजी  का जन्म 1756 ई. में छत्तीसगढ़ के रायपुर जि़ले में गिरौद नामक ग्राम में हुआ था। उनकी माता का नाम अमरौतिन तथा पिता का नाम मंहगूदास् था। युवावस्था में घासीदास का विवाह सिरपुर की सफुरा से हुआ। भंडापुरी आकर घासीदास सतनाम का उपदेश निरंतर देते थे। घासीदास की सत्य के प्रति अटूट आस्था की वजह से ही इन्होंने बचपन में कई चमत्कार दिखाए, जिसका लोगों पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव के चलते भारी संख्या में हज़ारों-लाखों लोग उनके अनुयायी हो गए। गुरु घासीदास ने समाज के लोगों को सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने न सिर्फ सत्य की आराधना कीए बल्कि समाज में नई जागृति पैदा की और अपनी तपस्या से प्राप्त ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानवता की सेवा के कार्य में किया। इसी प्रभाव के चलते लाखों लोग बाबा के अनुयायी हो गए। फिर इसी तरह छत्तीसगढ़ में ‘सतनाम पंथ’’ की स्थापना हुई। इस संप्रदाय के लोग उन्हें अवतारी पुरुष के रूप में मानते हैं। गुरु घासीदास के मुख्य रचनाओं में उनके सात वचन सतनाम पंथ के ‘‘सप्त सिद्धांत’’् के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सतनाम पंथ का संस्थापक भी गुरु घासीदास को ही माना जाता है।
गुरु घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।
गुरु घासीदास जी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरु घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।
गुरु घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरतापूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरु घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरु घासीदास के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था। गुरु  घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।
इनके सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिसमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेधए वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना है। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में ये सफल हुए और छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं। संत गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना के विरुद्ध ‘‘मनखे.मनखे एक समान’’ का संदेश दिया।
छत्तीसगढ़ राज्य में गुरु घासीदास की जयंती 18 दिसंबर से माह भर व्यापक उत्सव के रूप में समूचे राज्य में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस उपलक्ष्य में गाँव-गाँव में मड़ई-मेले का आयोजन होता है। गुरु घासीदास का जीवन.दर्शन युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा। ये आधुनिक युग के सशक्त क्रान्तिदर्शी गुरु थे। इनका व्यक्तित्व ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जिसमें सत्य, अहिंसा, करुणा तथा जीवन का ध्येय उदात्त रुप से प्रकट है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ‘गुरु घासीदास सम्मान’ स्थापित किया है। गुरु घासीदास शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे अत: उनकी स्मृति में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर षहर मेंं गुरु घासीदास विष्वविद्यालय स्थापित है। राज्य सरकार ने उनके जन्मस्थली गिरौदपुरी में विशाल जैतखंभ का निर्माण कराया है जिसे देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में लोग आते हैं।

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है. इन सालों में क्या कुछ घटा और किस तरह इस विश्वविद्यालय ने पत्रकारिता के बाद मीडिया शिक्षा को नया आयाम दिया, शोध की दिशा में एक दृष्टि के विकास में कितना योगदान रहा, आदि-अनादि मुद्दों को लेकर शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक दिसम्बर 2016

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...