मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे..

समय अपनी रफ्त्तार से गुजरता चला जाता है... एक पुरानी यादें शेयर कर रहा हूँ 
मैं ककहरा सीख रहा था, वो प्रिंसीपल थे..
मनोज कुमार
       मैं उन दिनों पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. और कहना ना होगा कि रमेशजी इस स्कूल के प्रिंसीपल हो चले थे. यह बात आजकल की नहीं बल्कि 30 बरस पुरानी है. बात है साल 87 की. मई के आखिरी हफ्ते के दिन थे. मैं रायपुर से भोपाल पीटीआई एवं देशबन्धु के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे हिन्दी पत्रकारिता प्रशिक्षण कार्यशाला में हिस्सेदारी करने के लिए भोपाल आया था. यह वह समय था जब भोपाल कहने भर से यहां आने की ललक जाग उठती थी. भोपाल तब मध्यप्रदेश के साथ साथ छत्तीसगढ़ की भी राजधानी थी. आज जो भौगोलिक बंटवारा दोनों राज्यों के बीच हुआ है, तब दोनों में एका था. ऐसे में रायपुर एक कस्बे की तरह था और राजधानी हमारे लिए सपने की नगरी. खैर, रमेशजी आरंभ से मेहमाननवाज थे. सो इस पत्रकारिता प्रशिक्षण में हिस्सेदारी करने आए मुझ जैसे नये-नवेले के साथ वरिष्ठों को उन्होंने रात में भोजन पर आमंत्रित किया. रमेशजी से मेरी यह पहली मुलाकात थी. कुछ बातें हुई लेकिन ऐसी आत्मीयता नहीं बनी कि मैं उनका मुरीद हो जाऊं. मेरी पृष्ठभूमि ऐसी थी कि मालिक और मजदूर (भले ही हम स्वयं को पत्रकार या सम्पादक कहते हों) के बीच एक महीन सी रेखा खींची रहती थी. हालांकि उनके आत्मीय ना होने के बावजूद मन में कहीं उनके प्रति वैसा ही सम्मान अनजाने में उपजा था जो देशबन्धु के सम्पादक बड़े भैया ललित सुरजन के लिए या बाबूजी अर्थात मायाराम सुरजन के लिए था. कोई दो घंटे में भोज की औपचारिकता पूरी हुई. कुछ नए लोगों से मिलना-जुलना हुआ और हम सब वापस लौट चलें.
        आज 30 वर्ष बाद पीछे पलट कर देखता हूं तो हैरान हूं कि भास्कर क्या तब भी वैसा था, जैसा कि आज है? यह सवाल बेकार का नहीं है क्योंकि जिन दिनों मैंने भास्कर को देखा था तब जलवा अखबारों में नईदुनिया इंदौर और नवभारत गु्रप का मध्यप्रदेश में और देशबन्धु का छत्तीसगढ़ में हुआ करता था. भास्कर नया नहीं था लेकिन पाठकों में भास्कर का नशा नहीं चढ़ा था. इन तीस सालोंं में भास्कर ने सबको पीछे छोड़ते हुए देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार बन गया. यह कामयाबी यंू नहीं मिली. इसके पीछे मेहनत, लगन और आत्मबल का त्रिकोणीय संयोग था और यह त्रिकोणीय संयोग के धनी रमेशजी अग्रवाल थे. लगातार मेहनत और लोगों को परख लेने की उनकी क्षमता ने भास्कर को आज जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, वह सदियों तक एक मिसाल बना रहेगा. रमेशजी उन चुनिंदा लोगों में नहीं थे जो नौकरी करते हुए अखबार का संसार खड़ा किया बल्कि वे मालिक के रूप में ही भास्कर की कमान सम्हाली. अपने पिता स्वर्गीय द्वारिकाप्रसाद अग्रवाल से कड़ा अनुशासन सीखा और जीवन में उतारा. थकान तो जैसे रमेशजी की दुश्मन थी. दोनों मेें कभी बनी नहीं और इसलिए थकान ने अपना दूसरा बसेरा ढूंढ़ लिया था क्योंकि रमेशजी की मेहनत के सामने उसका टिका रहना मुश्किल सा था. यह बात रमेशजी ने अपने जीवन के आखिर वक्त तक बनाये रखा जब वे भोपाल से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद बिना आराम किए प्रवास पर हमेशा की तरह रहे.
       अनुशासन के पक्के रमेशजी ने यही मंत्र अपने बेटों को दिए. इनमें सुधीरजी ने भास्कर की कमान सम्हाली. अपने दादाजी और पिताजी से सीखा अनुशासन का पाठ और नए जमाने की तकरीर को जीवन में उतारा. वे लीक से हटकर चलने लगे. भास्कर को अखबार से अखबारी दुनिया का ब्रांड बना दिया. पिता-पुत्र की समझ और काबिलियत को पूरी दुनिया ने देखा और भास्कर अपने नाम की तरह अपनी रोशनी पूरी दुनिया में बिखेरने में कामयाब हो गया. आज किसी भी परिवार की सुबह घर में भास्कर की किरण और कागज पर उतरे शब्दों के रूप में भास्कर के साथ होती है, इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. समय की नब्ज को टटोलना ही नहीं, बल्कि अपने अनुरूप कर लेने में रमेशजी की महारथ थी. वे कोई अवसर नहीं गंवाते थे. यही कारण है कि अपने समय के पुराने सहयोगियों को वे इतना मान देते थे कि आज भी लोग उनके मुरीद हैं. सूचनाओं का संसार उनका इतना व्यापक था कि वे रहें कहीं भी लेकिन उन्हें हर बात की खबर थी कि उनके पीछे क्या हो रहा है. ऐसा नहीं है कि भास्कर की इस कामयाबी में सेंध लगाने की कोशिश नहीं हुई हो लेकिन सेंधमार हमेशा नाकामयाब रहे तो रमेशजी के चौकन्नेपन की वजह से. 
          उनमें एक और खासियत थी. वे दूसरे अखबार मालिकों की तरह लिखने में कभी रूचि नहीं दिखायी और जहां तक मुझे याद पड़ता है रमेशजी के नाम पर लिखा हुआ कभी कुछ भी नहीं छपा. वे स्वयं इस बात के हामी थे कि वे कुशल प्रबंधक हैं और लिखने के लिए कुशल लेखक हैं. वे इस बात को भी कभी मंजूर नहीं किया करते थे कि लिखे कोई और तथा छपे उनके नाम से. यह उन्हें कदापि मंजूर नहीं था. पत्रकार जगत उनकी इस साफगोई से हमेशा इत्तेफाक रखता रहा. उनकी इस परम्परा का निर्वाह उनके बेटे भी कर रहे हैं. परिवार के किसी भी सदस्य में इस बात की ललक कभी नहीं रही कि किसी का लिखा उनके नाम से छपे. यह गुण रमेश जी और भास्कर की कामयाबी का एक बड़ा सूत्र है. रमेशजी की हमेशा कोशिश होती थी कि गुणी लेखक पत्रकार भास्कर के साथ जुड़े. भौतिक सुख-सुविधाओं का भरपूर सहयोग देते थे. इस बात में वे खरे थे कि भास्कर में निकम्मे और काम से जी चुराने वालों के लिए कभी कोई जगह नहीं बनी. लेकिन कोई गुणी और कामयाब व्यक्ति भास्कर के साथ ना जुड़े तो उन्हें मलाल होता था. ऐसा यदा-कदा हुआ होगा. 
         रमेशजी के रहते और शायद आगे भी. भास्कर में आपके लिखे पर छपने में कोई दुराभाव नहीं हुआ. मेरा अपना अनुभव है. भास्कर तेजी से बढ़ रहा था. भास्कर में छपना प्रतिष्ठा की बात थी. मैं देशबन्धु से अलग होकर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहा था. लोगों से सुन रखा था कि भास्कर में छपना मुश्किल है और इसके लिए आपको जुगाड़ लगाना होता है. आरंभ से जुगाड़ शब्द से मेरा बैर रहा है. मैंने कहा देखेंगे. ठीक लगेगा तो छप जाएगा वरना रद्दी की टोकरी तो है ही. यह तब की बात है जब भास्कर में स्थानीय लेखकों को स्थान दिया जाता था. मेरा यकीन तब और पक्का हो गया जब एक बार नहीं, लगातार तीन बार मेरा लिखा भास्कर में ज्यों का त्यों छपा. मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि उस समय के संपादक और स्वयं रमेशजी मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे क्योंकि तब भी मैं पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था, जैसे की आज भी सीखने की प्रक्रिया में हूं. लेकिन इस पूरे दौर में रमेशजी एक अखबार मालिक से उठकर कामयाबी के सिम्बाल बन चुके थे. मैं भास्कर के दरवाजे पर लटके लेटरबाक्स में अपने लेख का लिफाफा छोड़ आता था और अधिकतम तीन दिनों के अंतराल में प्रकाशन होता था.
         जिस तरह रमेशजी हमेशा प्रयासरत रहते थे कि अच्छे लेखक पत्रकार भास्कर से जुड़ें, वैसी कामना मेरी भी थी कि भास्कर के साथ जुडक़र मेरा लिखा देश और दुनिया के पाठकों को पढऩे का अवसर मिले. खैर, रमेश जी के साथ कभी काम करने का अवसर नहीं मिला. भास्कर में भी मेरी एंट्री नहीं हो पायी. दोस्तों की मोहब्बत कई बार भारी पड़ जाती है. मेरे साथ भी ऐसा हुआ. एक अवसर आया जब अपरोक्ष रूप से मेरे एक अनुज के प्रयासों से सीनियर एडीटर के रूप में मेरा नाम स्वीकृत कर लिया गया. भोपाल के बाहर से भास्कर में आए एक साथी के साथ मैंने इस बात का जिक्र कर लिया था. इधर मैंने अपनी खुशी उन्हें बयां कि और उधर मैं आज तक भास्कर के फोनकॉल का इंतजार ही करता रह गया. भास्कर के साथ नहीं जुड़ पाने का अफसोस तो रहेगा और इस रंज का जिक्र करने में कोई उज्र नहीं. मैं भास्कर से जुड़ता तो मुझे भास्कर से बहुत कुछ सीखने को मिलता. रमेशजी से अनुशासन और प्रबंधन का गुण सीखता क्योंकि मेरा मानना है कि वही तैराक कामयाबी के शिखर पर पहुंचता है जिसके पास तैर कर निकल जाने के लिए मीटर नहीं, किलोमीटर का फासला तय करना होता है. सच यह भी है कि रमेशजी, भास्कर और भास्कर की नयी पीढ़ी से एकलव्य की तरह सीख रहा हूं कि कामयाबी के लिए एक ही चीज की जरूरत होती है और वह है जिद, जिद और जिद. जिद करो, दुनिया बदलो. 

गुरुवार, 22 मार्च 2018

हर परिवार में वॉटर बजट बने

हर परिवार में वॉटर बजट बने
अनामिका
हर वर्ष की तरह एक बार फिर हम जल दिवस मनाने जा रहे हैं. निश्चित रूप से ऐसे दिवस हमारे लिए प्रेरणा का काम करते हैं. जल का हमारे जीवन में बहुत महत्व है. जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और जिस तरह का संकट अब पूरी दुनिया के सामने उपस्थित हो रहा है, वह भयानक है. जल संरक्षण की दिशा में व्यापक जनजागरूकता के प्रयास किए जा रहे हैं. जल है तो कल है कि इस सोच को केवल कागज तक रखने के बजाय जीवन में उतारने का समय आ गया है. यह अच्छी बात है कि प्रतिवर्ष हम जलदिवस मनाकर जल संरक्षण की दिशा में सक्रिय हो जाते हैं लेकिन क्या एक दिन का यह उत्सव हमारे लिए प्रेरणा का काम करता है या आगे पाठ पीछे सपाट की कहावत को सच करता है? निश्चित रूप से 22 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस अर्थपूर्ण है लेकिन यह दिवस ना होकर पूरे 365 दिनों की जागरूकता का हो तो इसके सुपरिणाम हमारे सामने होंगे.
जल संरक्षण की दिशा में समाज के प्रत्येक सदस्य को जागरूक होना जरूरी है. सबसे अहम बात यह है कि हर परिवार में वॉटर बजट का प्रावधान हो. जिस तरह हम घर के खर्च को समायोजित करने के लिए बजट बनाते हैं, वैसा ही पानी के खर्च के लिए बजट का प्रावधान किया जाए. सुबह से लेकर रात तक विभिन्न क्रियाओं में खर्च होने वाले जल का हिसाब रखा जाए. इससे हम स्वयं इस बात का अंदाज लगा लेंगे कि सचमुच में हम पानी का कितना सदुपयोग कर रहे हैं और कितना दुरूपयोग कर रहे हैं. परिवार में बनने वाले जल के बजट की समीक्षा की जाए और लोगों को जागरूक करने के लिए अपने द्वारा बनाये गए जल बजट को सोशल मीडिया में शेयर किया जाए. यह लोगों के लिए नया अनुभव होगा लेकिन यह बात भी निश्चित है कि अनेक लोग आपके इस नए प्रयोग को भली-भांति समझ कर जल के दुरूपयोग को रोकने के लिए आगे आएंगे. जल संरक्षण की दिशा में जनजागृति के लिए यह एक बड़ा अभिव उपाय होगा
विश्व जल दिवस क्यों मनाया जाता है और कब से आरंभ हुआ, यह जानना नई पीढ़ी के लिए अनिवार्य है.  विश्व जल दिवस का उद्देश्य विश्व के सभी विकसित देशों में स्वच्छ एवं सुरक्षित जल की उपलब्धता सुनिश्चित करवाना है साथ ही यह जल संरक्षण के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित करता है। ब्राजील में रियो डी जेनेरियो में वर्ष 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में विश्व जल दिवस मनाने की पहल की गई तथा वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र ने अपने सामान्य सभा के द्वारा निर्णय लेकर इस दिन को वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने का निर्णय लिया इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों के बीच में जल संरक्षण का महत्व साफ पीने योग्य जल का महत्व आदि बताना था।
यूएन सदस्य राज्य और एजेंसी सहित, जल के सभी जटिल मुद्दों के पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिये स्वच्छ जल संरक्षण के प्रोत्साहन में विभिन्न एनजीओ और गैर-सरकारी संगठन भी शामिल होते हैं। इस कार्यक्रम को मनाने के दौरान, जल से संबंधित सभी मुद्दों को जनता के सामने उजागर किया जाता है जैसे किस तरह से साफ पानी लोगों की पहुँच से दूर हो रहा है आदि। यह अभियान यूएन अनुशंसा को लागू करने के साथ ही वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष यूएन एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन शामिल है। इस कार्यक्रम की शुरुआत से ही विश्व जल दिवस पर वैश्विक संदेश फैलाने के लिये थीम (विषय) का चुनाव करने के साथ ही विश्व जल दिवस को मनाने के लिये यूएन जल उत्तरदायी होता है।
पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और व्यापार सहित जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जल के महत्व की ओर लोगों की जागरुकता बढ़ाने के लिये पूरे विश्व भर में विश्व जल दिवस मनाया जाता है. इसे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम और क्रियाकलापों के आयोजनों के द्वारा मनाया जाता है जैसे दृश्य कला, जल के मंचीय और संगीतात्मक उत्सव, स्थानीय तालाब, झील, नदी और जलाशय की सैर, जल प्रबंधन और सुरक्षा के ऊपर स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिचर्चा, टीवी और रेडियो चैनल या इंटरनेट के माध्यम से संदेश फैलाना, स्वच्छ जल और संरक्षण उपाय के महत्व पर आधारित शिक्षण कार्यक्रम, प्रतियोगिता तथा ढ़ेर सारी गतिविधियाँ आयोजित की जाती है. विश्व जल दिवस उत्सव के मुख्य चिन्ह नीले रंग की जल की बूँद की आकृति को हम बचा सकें. उसे सुरक्षित कर सकें और लोगों को बता सकें कि नीला रंग आपके जीवन में क्या मायने रखता है. 

रविवार, 4 मार्च 2018

जश्र मनाइए शिवराज के जन्मदिन का


-मनोज कुमार
साल की किसी न किसी तारीख, किसी न किसी व्यक्ति के लिए खास दिन होता है. यहदिन उसके जन्म का दिन होता है और सच पूछें तो एक तरह से बीते साल की कामयाबी के आंकलन का होता है. ऐसे में जब हम व्यक्ति नहीं, मुखिया, वह भी राज्य के मुख्यमंत्री की बात करते हैं तो ऐसी तारीख, ऐसा दिन महत्वपूर्ण ही नहीं होता है बल्कि इतिहास के पन्नों की तारीख होती है. हर साल कैलेंडर के पन्ने पर 5 मार्च एक ऐसी ही तारीख है. 5 मार्च की यह तारीख बेहद खास है और खास बस इसलिए कि इस दिन कामयाब राजनीति शख्यित शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन होता है. यह दिन उनकी कामयाबी, उनके आगे और आगे बढ़ते रहने का दिन होता है क्योंकि स्वयं शिवराजसिंह चौहान, उनके परिजन और उनके शुभचिंतक चाहते हैं कि उनका यह दिन यशस्वी हो, जीवन का हर वर्ष अहम दिन हो. बहुतों के लिए यह दिन मुख्यमंत्री का जन्मदिन हो सकता है लेकिन यकिन मानिए यह सौफीसदी व्यक्तिगत रूप से शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन है. वे शिवराजसिंह जिसके तेवर और तबीयत में सत्ता का ओज नहीं है, वे शिवराज जिनके लिए 13 साल का समय मुख्यमंत्री रूप में होना एक जवाबदारी है, वे शिवराजसिंह चौहान जिसके लिए राजनीतिक, सामाजिक एवं सत्ता से जुड़ी जवाबदारी महत्वपूर्ण है तो उनके पास अपने परिवार के लिए भी समय है. परिवार के बीच का यह समय सही मायने में शिवराजसिंह चौहान के जन्मदिन सेलिब्रेट करने का समय है.
मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालते वक्त शिवराजसिंह चौहान महज 46 वर्ष के थे लेकिन आज वे 59 वर्ष के हो चले हैं. इन सालों में मुख्यमंत्री के रूप में यह 13वां अवसर होगा जब पूरा मध्यप्रदेश उनका जन्मदिन सेलिब्रेट करेगा. पहले के सालों में 5 मार्च का यह दिन उत्सव का था और कहना ना होगा कि आज भी यह दिन भी उसी तरह उत्सव और जश्र का है लेकिन शिवराजसिंह स्वयं को एक आम आदमी की श्रेणी में रखते हैं. वे अपने जन्मदिन को विशेष महत्व नहीं देते हैं और यही कारण है कि इन 13 सालों में एकाध-दो बार इन्हीं दिनों मध्यप्रदेश विपत्ति में रहा. प्राकृतिक आपदाओं से किसानों के चेहरे उदास थे तब उन्होंने जन्मदिन के उत्सव को ना केवल स्थगित किया बल्कि वे विपत्ति में फंसे लोगों को ढाढ़स बंधाने निकल पड़े. अपने जन्मदिन के उत्सव से ज्यादा चिंता उनके चेहरे की उदासी दूर करने की रही है. इस तरह कई बार वे औरों से अलग होने का परिचय देते हैं. हालांकि सार्वजनिक जीवन में हैं तो उनके अपने लोगों की चाहत होती है कि वे ऐसे अवसरों को यादगार बनायें. कई बार नहीं चाहते हुए भी अपनों के प्यार में वे औपचारिकता के लिए शरीक हो जाते हैं. जन्मदिन को जश्र बनाने का उनका अपना कोई इरादा कभी नहीं रहा, शायद इसलिए ही वे आज भी पांव-पांव वाले भइया के रूप में पहचाने जाते हैं.
मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में 13 वर्ष के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह का कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह के कार्यकाल की समीक्षा होगी, उनके तेवर और तासीर की चर्चा होगी तो इस मामले में भी अकेले खड़े दिखाई देंगे. अकेले का अर्थ तनहा नहीं बल्कि अपने कर्म और व्यवहार से पृथक दिखाई देंगे. 13 वर्षों के मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराजसिंह चौहान के भीतर का एक ग्रामीण, किसान और मध्यमवर्गीय व्यक्ति जिंदा है. एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के दुख और सुख, चुनौतियों और संघर्षों को वे अपना मानते हैं. वे अपने लोगों को, पुराने साथियों को विस्मृत नहीं करते हैं. फिर मॉडल स्कूल में पढऩे वाले साथी होंं या आज जिस मुकाम पर शिवराजसिंह हैं, उन तक पहुंचाने वाले शिक्षक. एक मुख्यमंत्री की यह सहजता ही तो उन्हें आम आदमी का प्रतिनिधि बनाती है. उन्हें मुख्यमंत्री बनाती है और बनाती नहीं है बल्कि लगातार तीन बार सत्ता की चाबी सौंप देती है भरोसे के साथ. यह सत्ता या राजनीति की जीत नहीं है बल्कि आम आदमी का एक व्यक्ति के प्रति विश्वास की जीत है. आम आदमी का ऐसा विश्वास अर्जित करना राजनीति में परिघटना के रूप में देखा जा सकेगा. 
पतली-दुबली काया के शिवराजसिंह चौहान 13 साल की लम्बी पारी के बाद भी आम आदमी के लिए खास है, यह मिराकिल है. सत्ता को आम आदमी तक ले जाने का कोई बड़ा उपक्रम किए बिना ही वे सीधे स्वयं पहुंच कर बता देते हैं, जता देते हैं कि वही शिवराज हैं, वही मुख्यमंत्री हैं और वही सरकार हैं. वही शिकायत सुनेंगे और वही निदान भी करेंगे. ‘अभी कहां आराम’ की तर्ज पर वे आगे और आगे मध्यप्रदेश को ले जाना चाहते हैं. स्वयं को आगे ले जाने की उनकी मंशा कभी नहीं रही लेकिन मध्यप्रदेश सबल बने, सक्षम बने और तंदरूस्त दिल का प्रदेश बने, यही उनकी कोशिश रही है. कुछ कह सकते हैं कि ये सब बातें हैं, बातों का क्या? लेकिन क्या इस बात से आप इंकार करेंगे कि मध्यप्रदेश के जिन रास्तों पर आप रेंगते हुए चलते थे, आज आप सपाटे से भाग रहे हैं. सफर, सफर (कष्ट) ना होकर आरामदेह बन गया है. गति से गतिमान बनता मध्यप्रदेश बदलाव को तो चिंहित कर रहा है. 
हम ऐसा भी नहीं कह रहे हैं कि सबकुछ ठीक हो गया है लेकिन बदतर से बदलने की स्थिति में तो आ गए हैं. अभी बदलने का क्रम आरंभ हुआ है. बदलाव की बयार है और बयार के बाद जब समूचे बदलाव की बारिश होगी होगी तो आप और हम भीगेंगे. 12 साल के साथ जुड़े कुछ महीने में जो तस्वीर मध्यप्रदेश की बदली है, वह सुकून देने लायक तो है ही. शिवराजसिंह का जो विरोध होता है, वह उनकी हताश नहीं करता है बल्कि ताकत देता है. उन्हें ऊर्जा देती है कि हां, अभी आगे और काम करना है.  इसके साथ ही काम करने की गति और तेज हो जाती है. वे नम्र हैं, सरल हैं और लोगों मेंं उनके अपने होने का अहसास भी है लेकिन वक्त आने पर वे कठोर भी हैं और कडक़ राजनेता भी. वह तब जब प्रदेश के विकास के साथ कोई ढिलाई हो या अनदेखी. प्रशासन को कितना ढील देना और कब उनके स्क्रू कसना, कोई शिवराजसिंह से सीखे. ऐसा करके वे नौकरशाही पर लगाम ना लगाने के आरोपों को खारिज करते हैं.
मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह के पास दूरदृष्टि और पक्का इरादा है. मध्यप्रदेश के हित में उनके कार्यकाल में बनी योजनाओं का कोई तोड़ किसी के पास नहीं रहा. योजनाएं शिवराजसिंह सरकार की लोकप्रियता की कसौटी पर कसी जा रही थीं तो दूर-दराज के लोगों की लाभ की गारंटी भी थी. यह भी सच है कि उनकी योजनाओं का लाभ सौफीसदी नहीं मिला लेकिन कोई योजना नाकामयाब होती नहीं दिखती. योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की शिकायतों पर मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह की त्योरियां चढ़ जाती हैं. प्रशासन में हलचल मच जाती है और दूर बसे सहरिया जनजाति बच्चों के साथ ही दूसरे आदिवासी, गरीब और ग्रामीणों की की थाली में दलिया परोसा जाने लगता है. 
मध्यप्रदेश की राजनीति में पक्ष-विपक्ष के नेताओं को एक-एक उपाधि से नवाजा गया लेकिन ‘पांव-पांव वाले भइया’ शिवराजसिंह मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इसकी पहचान बने हुए हैं. हां, कभी उन्हें जननायक और विकास पुरुष की भी उपाधि दी गई लेकिन सब पर भारी ‘पांव-पांव वाले भइया’ ही हैं. उपाधियों से बेखर अपने एजेंडे को लेकर आगे बढ़ते शिवराजसिंह ने महिला और बच्चो को प्राथमिकता में रखा. इन्हें उनका हक मिले और बेफिक्र हो जिंदगी जिएं, इसकी कोशिश वे करते रहे. 
बेटी बचाओ उनका ड्रीम था और वे मध्यप्रदेश को इस दाग से बरी करना चाहते थे लिंगानुपात मेें मध्यप्रदेश पिछड़ा हुआ है. इसका सकरात्मक परिणाम आप देख सकते हैं. पिछले दशक के मुकाबले इस दशक में बदलाव दिख रहा है. सत्ता में महिलाओं को पचास प्रतिशत हिस्सेदारी देकर उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया. यह भी पहली पहली बार हो रहा है कि मध्यप्रदेश के कई पंचायतों में महिलाओं का एकाधिकार है. उस दाग से भी मध्यप्रदेश का बरी किया जहां सरपंच, पंच और पार्षद पर निर्वाचन तो महिलाओं का होता था लेकिन सत्ता पति के हाथ में होती थी. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने महिलाओं के भीतर इतना आत्मविश्वास भरा कि वे स्वयं फैसला लेने लगीं और आहिस्ता आहिस्ता पुरुषों का दखल खत्म होता गया. अब महिलाएं सशक्त हैं और स्वतंत्र भी अपने और अपनों के लिए फैसला लेने के लिए.
मध्यप्रदेश बाल विवाह को लेकर भी घिरा हुआ था लेकिन बीते सालों में बाल विवाह के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज हुई है. भारतीय परिवारों में बेटी को बोझ समझा जाता था और कच्ची उम्र में उनका ब्याह कर मुक्ति पा लेने को एक रास्ता मान लिया जाता था लेकिन उनकी सोच और दृष्टि को शिवराजसिंह सरकार की महिला केन्द्रित योजनाओं ने बदला. लाडली लक्ष्मी से लेकर स्कूल चलो और मुख्यमंत्री विवाह योजना गरीब माता-पिता को इस बात की दिलासा दिलाने में कामयाब हुआ कि उन्हें बेटी के ब्याह की चिंता छोडक़र, उनकी पढ़ाई की चिंता करनी है, उनका भविष्य बनाना है. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की इस योजना में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बेटी बचाओ के साथ बेटी पढ़ाओ जोड़ देते हैं तो स्वयमेव बाल विवाह का बंधन टूटने लगता है. स्कूल को देखती बच्चियां अब अपने साइकिल से स्कूल जा रही हैं. उनकी आंखों में सपने हैं और सपनों को सच करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का साथ है. देहरी पार करने के लिए कभी घूंघट न उठाने वाली अधिसंख्य महिलाओं महिलाओं ने अब देहरी पार करना सीख लिया है. डिंडौरी की  रेखा खाद्यान्न सुरक्षा के लिए अपने अनुभवों को शेयर करने संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर पहुंचती हैं. बदलाव की यह ठंडी हवा सुखद अहसास कराती है. 
13 साल की योजनाओं को जब आप खंगालने बैठेंगे तो मध्यप्रदेश का कोई ऐसा वर्ग नहीं बचा है, जिसके लिए योजना काम नहीं कर रही हो. दुनिया में सबसे पहले मध्यप्रदेश में लोकसेवा गारंटी योजना का आरंभ हुआ. शासकीय अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर समयबद्ध काम कराने वाले प्रदेश के रूप में हमारी अलग पहचान बनी. तकरीबन 52 से अधिक सेवाओं को इस सूची में शामिल कर लिया गया है. खसरा-खतौनी से लेकर नल जल योजना का लाभ लेने वालों को अब घर बैठे लाभ मिल रहा है. तयशुदा समय में सुविधा देना सरकार ने अपनी जवाबदारी मान ली है और अधिकारियों/कर्मचारियों को काम से लगा दिया है. 
किसानों को भी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने प्राथमिकता में रखा. खेती को लाभ का धंधा बनाने के उनके सपने सच होते दिख रहे हैं. कई मौके ऐसे आए जब प्राकृतिक आपदा से अन्नदाता संकट में दिखे लेकिन हर स्तर पर शिवराजसिंह चौहान उनके साथ खड़े रहे. उनकी आंखों के आंसू को पोंछने की कोशिश की. बेटी के ब्याह में बाधा न आए तो सरकार ने किसानों के लिए खजाने का मुंह खोल दिया. बैंक ऋण भी सहजता से मिले और फसलों के नुकसान का मुआवजा भी, इस बात के लिए मुक्कमल इंतजाम सरकार ने किया. प्रक्रियागत कारणों से कुछ शिकायतें आयीं और निवारण हुआ लेकिन जिस बड़ी संख्या में लोगों को लाभ मिला, उसके बारे में विरोधी खामोश रहे.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हमेशा संयत रहे. कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो अपने काम और उसके परिणाम से. जनता से बड़ी कोई कसौटी नहीं होती है और जनता की कसौटी पर वे खरे उतरे हैं. शिवरासिंह चौहान दिल में उतरना जानते हैं. खुद के बेटे हैं और बेटियों की कमी वे महसूस करते हैं. ऐसे में वे उन बच्चियों को अपनी बेटी मान लेते हैं और ब्याह तक कराने का इंतजाम करते हैं. यह एक मनुष्य ही कर सकता है, एक शिवराजसिंह ही कर सकते हैं, एक राजनेता नहीं. इससे सत्ता में बने रहने का कोई रास्ता नहीं खुलता है बल्कि मन को सुकून देता है. तसल्ली देता है कि बेटियों का होना जीवन में कितना जरूरी है.
वे अपने बच्चों के पिता हैं, प्रदेश के मुखिया हैं, इसीलिए पितातुल्य उनकी जवाबदारी है. शिक्षा का मुकम्मल इंतजाम हो और स्कूल से कॉलेज और कॉलेज के बाद रोजगार मिले, इसके लिए स्कीलडेवलपमेंट के अनेक अवसर उत्पन्न कर रहे हैं. हाथों में डिग्री और मन में सपने लेकर बहुत सारे युवा नौकरी की तरफ भागने के बजाय खुद के काम-धाम से दुनिया गढ़ रहे हैं. उनके इन प्रयासों की गंूज मध्यप्रदेश के लोगों के बीच नहीं है बल्कि टेलीविजन के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सवाल किया जाता है कि किस राजनेता को मामा पुकारा जाता है? स्वाभाविक है कि इस महादेश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश है जहां के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को बच्चे-बच्चियां मामा पुकारती हैं.
एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश को बहुत कुछ दिया. उन्हें अपने बचपन की यादें थी कि कैसे वे मां नर्र्मदा की गोद में उतर कर अठखेलियां करते थे. आज जब वे बच्चे नहीं रहे तो उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि मां नर्मदा को पर्यावरणीय दृष्टि से स्वच्छ बनाना है तो वे 144 दिनों की नमामि नर्मदे सेवा यात्रा आरंभ कर लोगों को जागरूक बनाने निकल पड़े. यह दुनिया में पहली पहली बार हो रहा था जब किसी नदी को बचाने के लिए इतना बड़ा सार्थक उपक्रम किया जा रहा था. विश्व नेता दलाई लामा से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लगाकर सभी वर्गों का उन्हें समर्थन और सहयोग प्राप्त हुआ. नर्मदा सेवा यात्रा, नदी बचाने के लिए एक नजीर बन गया है जिसे आने वाले दिनों में और लोग आगे बढ़ाने का काम करेंगे. वैसे ही जैसे मध्यप्रदेश की अनेक योजनाओं को देश के दूसरे प्रदेश अपने अपने राज्यों में लागू कर चुके हैं. यथा बेटी बचाओ अभियान, लाडली लक्ष्मी योजना, लोक सेवा गारंटी योजना और मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन को तो गिना ही जा सकता है. मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना ने तो जैसे शिवराजसिंह पर बुजुर्गों की छाया डाल दी है आशीष वचनों का. कई कई कारणों से कभी तीर्थधाम ना जा सकने वाले वृद्धजन अपनी आखिरी इच्छा भी पूरी कर रहे हैं. यह अपने किस्म की अलग तरह की योजना थी जो सरकार की जनता के प्रति संवेदनशील जवाबदारी और चिंता का सबब बनती है.
मध्यप्रदेश को देश का दिल कहा जाता है और यह दिल सबके लिए धडक़ता है. आमतौर पर राज्य सरकार राज्य की बुनियादी जरूरतों पर स्वयं को केन्द्रित करती है लेकिन शिवराजसिंह चौहान ने इससे बाहर निकलकर जता दिया और बता दिया कि मध्यप्रदेश यूं ही देश का दिल नहीं है. सरहद पर अपना स्र्वस्व न्यौछावर करने वालों को लोग 15 अगस्त या 26 जनवरी को याद कर लेते हैं लेकिन मध्यप्रदेश संभवत: पहला राज्य है जहां शौर्य स्मारक का निर्माण कर प्रतिदिन उन्हें नमन करने, अभिवादन करने और उनकी वीरगाथा से प्रेरणा ले सकते हैं. यह काम अद्भुत, अकल्पनीय है और वंदनीय भी. ऐसे बहुत सारे काम है और बहुत सारी योजनाएं हैं जो शिवराजसिंह चौहान को अलग रूप से चिंहित करती हंै. एक एक काम और एक एक योजना उनके लिए जन्म दिन की तरह है. एक बच्ची जब स्कूल जाती हुई मुस्कराती है तो उनका जन्मदिन हो जाता है और एक बुर्जुग जब गले लगकर नर्मदा सेवा यात्रा के लिए अपना आशीष देती है तो शिवराजसिंह धन्य-धन्य हो जाते हैं. मध्यप्रदेश का मुस्कराना और आगे बढ़ते चले जाना ही शिवराजसिंह के लिए जन्मदिन का उपहार है और हम चाहते हैं कि वे यशस्वी बनें और मध्यप्रदेश मुस्कराता रहे.

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अंक रेडियो पर

भोपाल से प्रकाशित रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17वां वर्ष पूर्ण कर लिया है. 
18वें वर्ष का पहला अंक रेडियो पर केन्द्रित है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का यह अंक कैसा लगा, आपकी प्रतिक्रिया चाहेंगे. 
हमसे जुडऩे के लिए आप हमें ई-मेल samagam2016@gmail.com कर सकते हैं. 
मानक शोध पत्र/लेख आमंत्रित हैं. सम्पादक मनोज कुमार

सोमवार, 29 जनवरी 2018

ग्राम स्वराज का अर्थ आत्मबल का होना



-मनोज कुमार
महात्मा गांधी का मानना था कि अगर गांव नष्ट हो जाए, तो हिन्दुस्तान भी नष्ट हो जायेगा। दुनिया में उसका अपना मिशन ही खत्म हो जायेगा। अपना जीवन-लक्ष्य ही नहीं बचेगा। हमारे गांवों की सेवा करने से ही सच्चे स्वराज्य की स्थापना होगी। बाकी सभी कोशिशें निरर्थक सिद्ध होगी। गांव उतने ही पुराने हैं, जितना पुराना यह भारत है। शहर जैसे आज हैं, वे विदेशी आधिपत्य का फल है। जब यह विदेशी आधिपत्य मिट जायेगा, जब शहरों को गांवों के मातहत रहना पड़ेगा। आज शहर गांवों की सारी दौलत खींच लेते हैं। इससे गांवों का नाश हो रहा है। अगर हमें स्वाराज्य की रचना अहिंसा के आधार पर करनी है, तो गांवों को उनका उचित स्थान देना ही होगा। ग्राम स्वराज को लेकर उनकी चिंता रही है। 25 साल पहले हमने गांधी के सपनों को सच करते हुए पंचायती राज लागू कर दिया है लेकिन गांधी की कल्पना का ग्राम स्वराज अभी भी प्रतीक्षा में है। गांधीजी चाहते थे कि ग्राम स्वराज का अर्थ आत्मबल से परिपूर्ण होना है। स्वयं के उपभोग के लिए स्वयं का उत्पादन, शिक्षा और आर्थिक सम्पन्नता. इससे भी आगे चलकर वे ग्राम की सत्ता ग्रामीणों के हाथों सौंपे जाने के पक्ष में थे।
गांधीजी कहते थे कि जब मैं ग्राम स्वराज्य की बात करता हूं तो मेरा आशय आज के गांवों से नहीं होता। आज के गांवों में तो आलस्य और जड़ता है। फूहड़पन है। गांवों के लोगों में आज जीवन दिखाई नहीं देता। उनमें न आशा है, न उमंग। भूख धीरे-धीरे उनके प्राणों को चूस रही है। कर्ज से कमर तोड़, गर्दन तोड़ बोझ से वे दबे हैं। मैं जिस देहात की कल्पना करता हूं, वह देहात जड़ नहीं होगा। वह शुद्व चैतन्य होगा। वह गंदगी में और अंधेरे में जानवर की जिंदगी नहीं जिएगा। वहां न हैजा होगा, न प्लेगा होगा, न चेचक होगी। वहां कोई आलस्य में नहीं रह सकता। न ही कोई ऐश-आराम में रह पायेगा। सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी। मर्द और औरत दोनों आजादी से रहेंगे।
         आदर्श भारतीय गांव इस तरह बसाया और बनाया जाना चाहिए जिससे वह सदा निरोग रह सके। सभी घरों में पर्याप्त प्रकाश और हवा आ-जा सके। ये घर ऐसी ही चीजों के बने हों, जो उनकी पांच मील की सीमा के अंदर उपलब्ध हों। हर मकान के आसपास, आगे या पीछे इतना बड़ा आंगन और बाड़ी हो, जिसमें गृहस्थ अपने पशुओं को रख सकें और अपने लिए साग-भाजी लगा सकें। गांव में जरुरत के अनुसार कुएं हों, जिनसे गांव के सब आदमी पानी भर सकें। गांव की गलियां और रास्ते साफ रहें। गांव की अपनी गोचर भूमि हो। एक सहकारी गोशाला हो। सबके लिए पूजाघर या मंदिर आदि हों। ऐसी प्राथमिक और माध्यमिक शालाएं हों, जिनमें बुनियादी तालीम हों। उद्योग कौशल की शिक्षा प्रधान हो। ज्ञान की साधना भी होती रहे। गांव के अपने मामलों को निपटाने के लिए ग्राम पंचायत हो। अपनी जरुरत के लिए अनाज, दूध, साग भाजी, फल, कपास, सूत, खादी आदि खुद गांव में पैदा हो। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यही होगा कि वह अपनी जरुरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए जरुरी कपास खुद पैदा करे। गांव के ढोरों के चरने के लिए पर्याप्त जमीन हो और बच्चों तथा बड़ों के लिए खेलकूद के मैदान हों। सार्वजनिक सभा के लिए स्थान हो। हर गांव में अपनी रंगशाला, पाठशाला और सभा-भवन होने चाहिए।
गांधीजी यह भी चाहते थे कि प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में स्वावलंबी हो तभी वहां सच्चा ग्राम-स्वराज्य कायम हो सकता है। इसके लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि जमीन पर अधिकार जमींदारों का नहीं होगा, बल्कि जो उसे जोतेगा वही उसका मालिक होगा। इसके अतिरिक्त, उन्होंने ग्रामोद्योग की उन्नति के लिए कुटीर उद्योगों को बढ़ाने पर बल दिया जिसमें उनके द्वारा चरखा तथा खादी का प्रचार शामिल था। गांधी का मानना था कि चरखे के जरिये ग्रामवासी अपने खाली समय का सदुपयोग कर वस्त्र के मामले में स्वावलंबी हो सकते हैं। ग्रामोद्योगों की प्रगति के लिए ही उन्होंने मशीनों के बजाय हाथ-पैर के श्रम पर आधारित उद्योगों को बढ़ाने पर जोर दिया। गांधीजी द्वारा ग्रामों के विकास व ग्राम स्वराज्य की स्थापना के लिये प्रस्तुत कार्यक्रमों में प्रमुख थे- चरखा व करघा, ग्रामीण व कुटीर उद्योग, सहकारी खेती, ग्राम पंचायतें व सहकारी संस्थाएं, राजनीति व आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण, अस्पृश्यता निवारण, मद्य निषेध, बुनियादी शिक्षा आदि।
         गांधीजी का पूर्ण विश्वास सत्याग्रह में था। वे सत्याग्रह में जिस साहस को आवश्यक मानते थे, वह उन्हें शहरी लोगों में नहीं, बल्कि किसानों के जीवन में मूर्तिमान रूप में दिखाई पड़ता था। ‘हिंद स्वराज’ में वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं- ‘मैं आपसे यकीनन कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे। किसान किसी के तलवार-बल के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते, न किसी की तलवार से वे डरते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बना कर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मौत का डर छोड़ दिया है। बात यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।’


गांधीजी की कल्पना के ग्राम स्वराज्य में आर्थिक अवस्था ही आदर्श नहीं, अपितु सामाजिक अवस्था भी आदर्श थी, इसीलिये वे सभी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन पर जोर देते थे। अस्पृश्यता व मद्यपान जैसी सामाजिक बुराइयों के वे घोर विरोधी थे। वे इन्हें ग्रामों की प्रगति में भी बाधक मानते थे। 
           गांधी जी के ग्राम स्वराज का जो सपना आज हमें अधूरा लग रहा है, वह पूरा किया जा सकता है। गांधीजी ने ग्राम स्वराज की दिशा में जो तर्क दिए थे, उन पर अमल करने के पश्चात ही हम ग्राम स्वराज की कल्पना को साकार कर सकते हैं। गांवों का आत्मनिर्भर होना, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूक होना ग्राम स्वराज की पहली शर्त है। इस दिशा में हमें आगे बढऩा होगा क्योंकि केवल सत्ता हस्तांतरण से ग्राम स्वराज की कल्पना पूर्ण नहीं हो सकती है। गांधी के विचार और कर्म केवल हमारे हिन्दुस्तान तक नहीं है बल्कि वे पूरे संसार के लिए सामयिक बने हुए हैं। अहिंसा के बल पर दुनिया जीत लेने का जो मंत्र गांधी ने दिया था, आज जिसे पूरा संसार समझ रहा है यह विस्मयकारी है कि गांधी ने एक विषय पर, एक समस्या पर चर्चा नहीं की है बल्कि वे समग्रता की चर्चा करते रहे हैं. वर्तमान समय में हम जिन परेशानियों से जूझ रहे हैं और शांति-शुचिता का मार्ग तलाश कर रहे हैं, वह मार्ग हमें गांधी के रास्ते पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है।

सोमवार, 22 जनवरी 2018

टीआरपी की ख़बरों का मीडिया


मनोज कुमार
जब समाज की तरफ से आवाज आती है कि मीडिया से विश्वास कम हो रहा है या कि मीडिया अविश्वसनीय हो चली है तो सच मानिए ऐसा लगता कि किसी ने नश्चत चुभो दिया है. एक प्रतिबद्ध पत्रकार के नाते मीडिया की विश्वसनीयता पर ऐसे सवाल मुझ जैसे हजारों लोगों को परेशान करते होंगे, हो रहे होंगे. लेकिन सच तो यह है कि वाकई में स्थिति वही है जो आवाज हमारे कानों में गर्म शीशे की तरह उडेली जा रही है. हम खुद होकर अपने आपको अविश्वसनीय बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं. हमारी पत्रकारिता का चाल, चेहरा और चरित्र टीआरपी पर आ कर रूक गया है. हम सिर्फ और सिर्फ अधिकाधिक राजस्व पर नजरें गड़ाये बैठे हैं. शायद हम सरोकार की पत्रकारिता से पीछा छुड़ाकर सस्ती लोकप्रियता की पत्रकारिता कर रहे हैं. हमें जन से जुड़ी जनसरोकार की पत्रकारिता परेशान करती है जबकि हम उन खबरों को तवज्जो देने में आगे निकल गए हैं जो दर्शकों, पाठकों और श्रोताओं को कभी गुदगुदाती है तो कभी डराती है. कभी उनके भीतर बागी हो जाने का भाव भी भर जाती है तो कभी वह लालच में डूब जाने के लिए बेताब हो जाता है. उसे वह जिंदगी दिखाई जाती है जो सिर्फ टेलीविजन के परदे पर या सिनेमाई जिंदगी में कुछ पल के लिए हो सकती है. कृष्ण और शुक्ल पक्ष को हमने एक कर दिया है.
यह बातें बेबात नहीं है. हालिया दो खबरों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा. ऐसी दो खबरें जिसने समाज को डराया भी और उसमें डूब जाने के लिए मजबूर भी किया. ऐसा लगने लगा था कि मानो अब इसके बाद दुनिया में कुछ बचेगा ही नहीं. अखबारों ने इन खबरों को खबरों की तरह छापने का जिम्मा लिया लेकिन 24 घंटे चिल्लाने वाले टेलीविजन ने कभी डिबेट कर डाली तो कभी इस पर स्पेशल प्रोग्राम चला डाला. इन सबका का कोई परिणाम नहीं निकला क्योंकि परिणाम के लिए इन खबरों पर फोकस किया ही नहीं गया था बल्कि इन खबरों में छिपा डर, रोमांच और लालच ने टीआरपी को हाइट दी.
एक खबर थी चोटीकटवा की. अचानक से किसी महिला की कोई चोटी काट जाता है. और इसके बाद सिलसिला चल पड़ता है। एक बाद एक खबरें आती हैं कि फलां शहर या गांव में महिलाओं की चोटी किसी ने काट ली. यह चोटी कटवा कश्मीर में भी पहुंच जाता है. मामला संजीदा था. और इससे आगे वह घर-घर देखा जाने वाला और पढ़ा जाने वाला समाचार था. जब चोटीकटवा सीरिज चल रही थी तब देश में, खासकर खबरों की दुनिया में कोई दूसरी बड़ी खबर नहीं थी तो इस खबर को इतना हाइप दिया गया कि समाज के एक बड़े वर्ग की महिलाओं में डर व्याप्त हो गया. वे रात में अपने लिहाज से चोटी को बचाकर रखने लगीं. खबरों ने और टेलीविजन के स्पेशल प्रोग्राम ने बता दिया था कि कभी भी, कहीं भी आपकी चोटी कोई भी काट कर ले जा सकता था. खबरों का ऐसा मायाजाल बुना गया कि औरतें कई निरीह और निर्दोष लोगों की पिटाई करने लगीं. उनकी कोई सुनने वाला नहीं था. 
चोटी कटवा के मामले में खबर चलाने से लेकर पड़ताल करने और लगभग फैसला सुनाने के अंदाज में मीडिया सक्रिय हो गया था. पुलिस और प्रशासन कुछ करता, इसके पहले ही अफवाहों का बाजार गर्म हो गया. एक चैनल ने तो अपने क्राइम सीरिज में इस चोटीकटवा प्रकरण पर प्रोग्राम बना डाला. यही नहीं, सीरियल में काम करने वाली नकली पुलिस, नकली सीआईडी और जाने क्या क्या, सबने पड़ताल किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया कि चोटी कटवा के लिए गिरोह काम कर रहा है और जो चोटी काटी जा रही है, वह विदेशों में महंगी कीमत में बिकती है तो इसकी तस्करी की जा रही है. सबसे मजेदार तो यह था कि चैनलों पर चोटी कटवा को लेकर डिबेट हो रही थी. कई पार्टी के दबंग प्रवक्ता इस पर तर्क- कुतर्क कर रहे थे. सामाजिक क्षेत्रों में सक्र्रिय लोग भी अपनी राय देने में पीछे नहीं थे. ऐसा लग रहा था कि चोटीकटवा हमारी कोई परम्परा है और इस पर डिबेट में बैठने वाले लोग माहिर हैं. 
मीडिया ने इस मुद्दे पर समाज को धन्य कर दिया था. चोटी कटवा आने वाले दिनों में हमारे पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया जाए तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए. लेकिन इस चोटी कटवा प्रकरण में यक्ष प्रश्र यथावत है कि जब यह समस्या देशव्यापी थी तो इसका निराकरण कैसे हुआ? कौन लोग इस मामले में अपराधी की तरह चिंहित किए? लेकिन लगता है कि ऊपरी तौर पर टीआरपी बटोर कर मामला निबटा दिया गया. इस मामले में ध्यान देने योग्य बात यह थी कि इसे अंतर्राष्ट्रीय बनाने में भी मीडिया नहीं चूका. बताया गया कि किसी रसायन के कारण  ऐसा हो जाता है. हालांकि मीडिया क्या, समाज भी इस बात को भूल चुका है. 
इसके बाद एक बड़े बवंडर के रूप में ब्लूव्हेल गेम की खबरें मीडिया की टीआरपी का कारण बनी. ब्लूव्हेल गेम कहां से शुरू हुआ और कहां जाकर खत्म हो गया, किसी को खबर नहीं मिली है. पहले की तरह इस पर भी मीडिया ज्ञान बांटता रहा. सरकार से इस खेल पर पाबंदी लगाने की मांग भी मीडिया में डिबेट में भाग लेने वालों ने कर दी. ब्लूव्हेल गेम बच्चों और किशोरों से जुड़ा हुआ था, सो परिवारों का डर जाना अस्वाभाविक नहीं था. समाज के इस डर ने मीडिया की टीआरपी को हाईप दी. ब्लूव्हेल गेम में जो कहानियां गढ़ी गई, वह डरावनी थी. आप और हम भी सिहर जाते कि कैसे नन्हें बच्चे इस खेल के जाल में फंस जाते हैं और अपनी जान दे रहे हैं. भारतीय समाज के लिए यह नया और डराने वाला अनुभव था. यहां भी वही मजेदार बात की हर डिबेट में बैठने वाला ब्लूव्हेल गेम  के बारे में ऐसी बातें कर रहा था, मानो उसने अपनी जिंदगी में कई कई बार इससे जूझा हुआ हो. 
दुर्भाग्य और दुखद तो यह था कि बड़ी संख्या में बच्चों ने अपनी जान गंवाई लेकिन ब्लूव्हेल गेम  के कारण ऐसा हुआ था, इस बात को जांचना आज भी मुुश्किल है. चोटीकटवा की तरह ब्लूव्हेल गेम पर सीरियल बन गए. ये इतने डरावने ढंग से बनाये गए थे कि दर्शक के रोंगटे खड़े हो जाएं. इन सीरियल्स या खबरों का समाज पर क्या असर होता है, इससे मीडिया को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता है. टीआरपी और टीआरपी से मिलने वाले राजस्व उनका शायद आखिरी लक्ष्य होता है. 
हैरानी की बात तो यह है कि लगभग तीन महीने तक चोटीकटवा का हंगामा होने के बाद लगभग इतने समय ही ब्लूव्हेल गेम का डर समाज के भीतर बैठा रहा और दोनों मामले बिना परिणाम अचानक से समाज के बीच से गायब हो गए. अब न तो किसी की चोटी कट रही है और ना कोई बच्चा ब्लूव्हेल गेम के आखिरी पड़ाव पर पहुंच कर अपनी जान दे रहा है. क्या ऐसा संभव है? शायद नहीं. किसी कोने में संभव है कि चोटी कटवा सक्रिय हो, वह तब जब सचमुच की यह समस्या हो और इसी तरह ब्लूव्हेल गेम आज भी किसी किशोर की जान लेेने पर आमादा हो. लेकिन मीडिया के लिए टीआरपी का विषय थोड़ी है. अब तो उसके पास कई और ज्वलंत विषय हैं जिस पर उन्हें बात करनी है.
हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि गरीब से लेकर श्रेष्ठिवर्ग अपना दुखड़ा सुनाने और अपनी बात शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के लिए मीडिया के पास आता है. मीडिया ताकत नहीं है बल्कि एक पक्का जरिया है. भरोसेमंद जरिया लोगों की तकलीफ, उनकी बात सही जगह तक पहुंचाने की, उन्हें न्याय दिलाने में मदद करने की. ऐसे में उसे आत्मविवेचन करना चाहिए कि आखिर उसकी जवाबदारी क्या है? उसे अपनी विश्वसनीयता कायम रखने के लिए बेमतलब की बहस में समय जाया करना चाहिए या सरोकार की पत्रकारिता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. समाधान करना मीडिया का दायित्व नहीं है. वह सेतु है समाज और सरकार के मध्य का. वह सूचना का तंत्र है. वह जज नहीं है बल्कि न्याय के पक्ष में अनसुनी और अनचींही बातों को उन तक पहुंचा कर न्याय दिलाने में मदद करना है. मेरे लिखने का मकसद किसी को आहत करना नहीं बल्कि टेलीविजन को देखते हुए, अखबारों को पढ़ते हुए और अपनी भाषा को बिगाड़ते एफएम की आवाज को सुनते हुए मन खिन्न हो गया तो सोचा कि अपनों के साथ, अपनी बात कर लूं.

रविवार, 14 जनवरी 2018

भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी


भारतीय राजनीति के महामना अटल विहारी वाजपेयी
-अनामिका
भारतीय राजनीति में कई महामना हुए जिन्होंने भारत को नई दिशा और दृष्टि प्रदान की। आधुनिक भारत में भी महान राजनेताओं की लम्बी श्रृंखला है जिन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी बल्कि वे मील के पत्थर साबित हुए। इन महान नेताओं की चर्चा करते समय अपने समय के अटल विहारी वाजपेयी का उल्लेख सबसे पहले आता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में उन महान् नेताओं की श्रृंखलाओं में जन्मे हमारे देश के महत्वपूर्ण कर्णधार श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने भारतवर्ष के राजनैतिक इतिहास में एक नए युग का प्रारंभ कर भारत में नव-परिवर्तन की लहर प्रवाहित कर दी। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था। भारतीय राजनीति में यह तारीख अमिट है।
सच कहा जाए तो आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी का जो पूरे देश में उजास फैल रहा है, वह अटलजी के प्रयासों और उनकी प्रतिबद्धता के कारण माना जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी बचपन से ही चंचल और कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा को अपनी जीवनशैली में उतारने वाले अटल बिहारी वाजपेयी मात्र 15 वर्ष की आयु में ही संघ की शाखा में जाने लगे थे। अपने विद्यार्थी काल में भी अटलजी ने छात्र संघ में महामंत्री और उपाध्यक्ष के रूप में अपनी कार्यक्षमता का परिचय दिया था। भारतीय जनसंघ पार्टी के वरिष्ठ सदस्य डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के पश्चात अटल बिहारी वाजपेयी पार्टी निष्ठा की टीम लेकर राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़े थे। अपनी काव्यात्मक व सरल भाषण कला के जरिये मिली लोकप्रियता के सहारे लखनऊ के अतिप्रिय सांसद अटल बिहारी वाजपेयी जी 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे और एक सांसद के रूप में भारतीय राजनीति में उन्होंने अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी। लखनऊ ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता उनकी ओजस्वी भाषण शैली से प्रभावित थी।
1968 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के पश्चात भारतीय जनसंघ पार्टी ने अटल जी को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया। उनकी कार्यकुशलता के आगे सभी पार्टी कार्यकर्ताओं ने वैसी ही अभिरुचि दिखाई, जैसी वे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कार्यकाल में दिखाते थे। अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण अटलजी तीन बार भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे। यह उन्हीं के अथक परिश्रम, ओजस्वी भाषण, गंभीर लेखन और कार्यकर्ताओं से सम्पर्क आदि का नतीजा था, जो जनसंघ को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला। इसी जनसंघ पार्टी ने 1977 में जनता पार्टी और 1979 में भारतीय जनता पार्टी का रूप लिया। अटल जी तब से लगातार कई वर्ष तक लोकसभा में अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की देश के प्रति सकारात्मक सोच के कारण देश उनके प्रति नतमस्तक है। अनेक अंतर्राष्ट्रीय मामलों में भी अटलजी के सकारात्मक विचारों के कारण विश्व उनमें एक अंतर्राष्ट्रीय नेता की छवि देखने लगा था। प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन होते ही उनके सामने संकटों के बादल एक-एक करके आते चले गए। इन सभी संकटों का सामना उन्होंने जिस साहस से किया, यह अटल जी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव था। 
पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ निरन्तर बढ़ती कटुता, कश्मीर में बढ़ती आतंकवादी गतिविधियां विशेष रूप से चिन्ताजनक थी। एक ऐतिहासिक क्षण में अमन और दोस्ती का पैगाम लेकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सरहद पार पाकिस्तान गए थे। उन्होंने वहां जाकर राजनेताओं से कहा था कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। वाघा सीमा पर भारत और पाकिस्तान के नेताओं का ऐसा ऐतिहासिक मिलन हुआ, जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इस ऐतिहासिक मिलन के पश्चात् ऐसा सोचा जाने लगा था कि कश्मीर समस्या अब हल हो जाएगी लेकिन दुर्भाग्यवश खुराफाती दिमाग के मुशर्रफ और आतंकवादियों ने ऐसा नहीं होने दिया तथा देश को कारगिल युध्द का सामना करना पड़ा। देश के तमाम सैनिकों में अटल जी ने तब अदम्य उत्साह भर दिया था और सैनिकों ने भी उनके विश्वास को शौर्य और जीवट में बदल कर घुसपैठियों को देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया था। वीर जवानों का मनोबल बढ़ाते हुए अटल जी ने तब कहा था, ‘हम अपने जवानों और अफसरों पर गर्व करते हैं और सारा राष्ट्र उनके पीछे खड़ा है। कारगिल में वे एक नए इतिहास की रचना करें।’
अटल जी ने भारतीय राजनीति में सौम्यता और सद्भावना का की जो परम्परा कायम की, वह अविस्मरणीय है। राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अटल जी कवि थे, सो उनके मन में सभी के प्रति करूणा का भाव था। वे आत्मसम्मानी राजनेता हैं और उन्होंने राजनीति में ईमानदारी को सबसे ऊपर रखा। उनके सामने कई ऐसे अवसर आए, जब वे कुछ तिकड़म से सत्ता हासिल कर सकते थे लेकिन ऐसा उन्होंने कभी नहीं किया।  वे सह्दयी थे लेकिन उन लोगों के लिए जो देश के प्रति अपनी निष्ठा रखते थे लेकिन उनके लिए वे एकदम कठोर थे जिनमें देशपे्रम का भाव नहीं था। वे अपने विरोधियों को भी समूचा सम्मान देते थे। आज उम्र हो जाने के कारण वे राजनीति में सक्रिय नहीं हैं लेकिन जितने वर्ष उन्होंने विपक्ष के साथ प्रधानमंत्री के रूप में गुजारे हैं, वहां हर दिन राजनीति की एक नई इबारत लिखी है। आज उनके जन्म दिवस पर हम कामना करते हैं कि वे अपनी अस्वस्थ्यता को पराजित कर एक बार फिर सक्रिय हो जाएं और हमारा मार्गदर्शन करें। अपनी कवि वाणी से वे एक बार फिर मन की कविता का पाठ करें और हमें जीवन के सद् गुण सिखाएं।(विकल्प)

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...