समय का शोध और शोध का समागम


भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम वास्तव में एक पत्रिका नहीं, एक संकल्प है. संकल्प उस पत्रकारिता का जिसके लिये मेरी पहचान है. बीते पैंतीस सालों में जो कुछ सीखा, उसमें से जो कुछ अपनी बाद की पीढ़ी को दे सकूं, इसके लिये समागम को माध्यम बनाया.  मेरे संकल्प को समाज ने अपना संकल्प बनाया और साथ  चलकर मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं. इन सबके लिये आभार छोटा सा शब्द है लेकिन आभारी ही नहीं, मैं हमेशा ऋणी रहूंगा.  समागम पर साथी विद्यार्थी भाई राजीव ने एक पड़ताल की है. इस पड़ताल को समाचार4मीडिया ने सम्मानजनक स्थान देकर प्रकाशित किया है. मैं दोनों के प्रति आभारी हूं. दरअसल अपने अन्य साथियों तक राजीव के विचारों को बांटने का  मोह नहीं छोड़ पा रहा हूं तो इसे  फेसबुक और अपने ब्लॉक पर सधन्यवाद जारी कर रहा हूं
मनोज कुमार
सम्पादक समागम, भोपाल
मोबाइल 09300469918  



राजीव रंजन प्रसाद, शोध छात्र

यह समय सूचनाक्रान्त है। सूचनाओं का आधिक्य और उससे निर्मित दबाव परोक्ष है, किन्तु इससे उत्पन्न कठिनाइयाँ अथवा मुश्किलें प्रत्यक्ष हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक गतिकी जिसमें सूचनाओं की आमद अथवा आवाजाही हाल के दिनों में बढ़ी है, में अच्छी सामग्री का मूल्य तो है;  संकट सिर्फ खोज का है। नई पीढ़ी जो ‘गूगल सर्च ईंजन’ पर बेपरवाह ढंग से आश्रित है; ने नई चुनौतियों को सिरजा है। यह सचाई है कि वास्तविक विषय का ज्ञान और असली मुद्दों की पहचान इस पीढ़ी में शामिल अधिसंख्य लोगों को नहीं है। वे इंटरनेट से प्राप्त सामग्री का प्रयोग तो करते हैं, लेकिन उसकी गुणवत्ता या अन्तर्वस्तु विश्लेषण को लेकर गम्भीर या आश्वस्त नहीं दिखाई देते है।

समय के इस विपरीत धारा या शैक्षणिक प्रवाह में ‘समागम’ जैसी द्विभाषी शोध पत्रिका का सम्पादन/प्रकाशन चुनौतीपूर्ण कार्य है। वह भी वैसे समय में जब देश में मीडिया और सिनेमाई प्रशिक्षण संस्थानों की बाढ़-सी आई हुई है; यह शोध-पत्रिका एक मुकम्मल दस्तावेज के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में सफल है। अपने सीमित संसाधनों के बल पर किसी पत्रिका का सम्पादन एक प्रकार से टेढ़ी खीर है। किसी शोध-पत्रिका के लिए तो यह और भी मुश्किल भरा क्षण है। बावजूद इसके समसामयिक मुद्दों, पत्रकारिता के ज्वलंत प्रश्नों तथा अन्तरराष्ट्रीय संचार नेटवर्कों की विवेकसम्मत पड़ताल करने में ‘समागम’ पत्रिका का स्थान अन्यतम है। इस शोध-पत्रिका के सम्पादक मनोज कुमार, के लिए इस दायित्व का निर्वहन आसान कभी नहीं रहा है। लेकिन उनके लिए बीच में रूक जाने या थम जाने का कोई अर्थ नहीं है। जब मंजिल या ध्येय बड़ा हो, तो राह के पत्थर रोड़े नहीं अटकाते; शायद ऐसा ही कुछ आत्मिक-दर्शन खुद में समोये हुए दिखते हैं, मनोज कुमार।

जनसंचार और पत्रकारिता की जनसमाज में लोकप्रियता और प्रभाव बहुत है लेकिन प्रशिक्षण का स्तर उम्दा न होकर निम्नस्तरीय होना; चिन्ता का सबसे बड़ा पहलू है। प्रायः कहा जाता है कि वस्तुनिष्ठ, सारगर्भित और निष्पक्ष सामग्री को विशेष महŸव प्रदान करना किसी भी शोध-पत्रिका के चयन का प्राथमिक मानदण्ड होना चाहिए। लेकिन, आज उच्च शिक्षा का जो हाल-ए-दस्तूर है; उसमें इस मानदण्ड को ही सबसे पहले खारिज होते हुए देखा जा सकता है। शोध या अनुसन्धान कार्य आज सिर्फ उपाधि प्राप्त करने का जरिया मात्र बनकर रह गया है। शोध-कार्य के महत्त्व को लक्ष्य कर बने नियमावली में गुणवत्ता सम्बन्धी मानक कई हैं, लेकिन मनके कितने हैं; यह अलग से शोध का विषय है। अतः शोध-पत्र लिखे ही दोयम दर्जें के जा रहे हों, तो कोई भी गुणी या धैर्यवान सम्पादक भविष्य में बेहतर या उत्कृष्ट शोध-लेख लिखे जाने की संभावना मात्र ही जता सकता है; कोई बहुत बड़ी तब्दीली या फेरबदल कर पाना उसके या उसकी पत्रिका के लिए हरगिज संभव नहीं है। ‘समागम’ पिछले 13 वर्षों से नियमित प्रकाशित है। हाल के दिनों में यह मीडिया और सिनेमा को पूर्णतः समर्पित हो चुकी द्विभाषी शोध-पत्रिका है जिसकी हस्तक्षेपकारी भूमिका आज की तारीख में उल्लेखनीय और बहसतलब है।

द्विभाषी होने के कारण इस शोध-पत्रिका का शैक्षणिक योगदान व्यापक और चतुर्दिक है; यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। समय का सही नब्ज़ पकड़ने और मीडिया(विशेषतया भाषायी मीडिया) पर वैश्विक प्रभाव का सम्यक् आकलन-मूल्यांकन करने में यह पत्रिका निश्चित रूप से अग्रणी है। इसी वर्ष के जनवरी अंक में ‘हिन्दी हैं हम हिन्दोस्तां हमारा’ शीर्षक से आवरण कथा दी गई है जिसमें सुयोग्य पत्रकार प्रियदर्शन ने वैश्विक माहौल में हिन्दी के सामने उपजे संकटों और संभावनाओं को लक्ष्य किया है। इसी तरह ‘समागम’ का ताजा फरवरी अंक बेहतरीन कलेवर के साथ ‘सिनेमा के सौ बरस’ विषय पर आधृत है जिसमें भारतीय सिनेमा के पितामह या कहें स्वप्नद्रष्टा चितेरा दादा साहेब फाल्के की आत्मकथा ‘मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी’ शीर्षक से प्रस्तुत है जो अपनेआप में बेजोड़ और पठनीय है।

सिनेमा जैसे सूक्ष्म कला-रूप विषय के विशेषज्ञ एवं समीक्षक सुनील मिश्र ने समागम पत्रिका के इस ‘सिनेमा अंक’ का सम्पादन बतौर अतिथि सम्पादक किया है। हाल के दिनों में देखा जाए, तो ‘भारतीय सिनेमा के सौ बरस’ की धूम पूरे देश में जबर्दस्त रही है। बाज़ार में सिनेमा को समर्पित विशेषाशांकों की बाढ़-सी आई हुई है। लेकिन, यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सिनेमा सम्बन्धी ‘लेखन’, ‘चर्चा’, ‘गोष्ठी’ इत्यादि में जो उथलापन और सतहीपन जिस ढंग से उभरकर सामने आया है; उस बारे में सुनील मिश्र ने खरी किन्तु मार्के की बात कही है, ‘‘तीस सालों में जो आधुनिक स्वरूप या पहचान स्थापित हुई है, वह उस काल की पहचान से रहित है जिसकी बहुमूल्यता को लगभग नज़रअंदाज कर दिया गया है और उसकी चर्चा इतिहास की चर्चा के अवसर पर ही संभव हो पाती है, अन्यथा इतिहास का हश्र विस्मृति से जुड़ा है ही। अभी एक चैनल पर सिनेमा की शताब्दी की आड़ में काॅमेडी के सफर जैसी एक फूहड़ धारावाहिक माला भी शुरू की गयी है। सतही दौर भी जगह-जगह सिनेमा के सौ साल पर कुछ-कुछ हुआ करता है। हमारा गला तर नहीं हो सका है, शायद हमें प्यास भी नहीं है।’’

बहरहाल, उपर्युक्त दोनों अंकों का सम्पादन-संयोजन जिस सम्पादकीय कुशलता के साथ हुआ है; वह इस शोध-पत्रिका के लिए शुभ-संकेत है। इस पत्रिका का ‘शोध-खण्ड’ सबसे मूल्यवान थाती है जो उत्तरोत्तर समृद्ध होता दिखाई दे रहा है। कहना न होगा कि किसी भी पत्रिका के साथ पाठक का लगाव जीवंत और अतुलनीय होता है। ‘समागम’ पत्रिका के लिए पाठक का स्थान क्या कुछ है; यह थाह इस पत्रिका के सम्पादक मनोज कुमार के इन शब्दों में स्फूर्त ढंग से अभिव्यक्त है-‘‘समागम को पूरे भारत वर्ष से स्नेह और प्रोत्साहन मिल रहा है जो हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। हमें प्रसन्नता तब होती है जब समागम में छूट गयी गलतियों की ओर हमारे शुभचिन्तक चिन्ता के साथ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। हम उन्हें आश्वस्त करते हैं कि गलतियों के सुधारने की हरसम्भव कोशिश होगी।’’(जनवरी, 2013)

ऐसी उच्च भावभूमि वाली पत्रिका को पाठकों द्वारा सराहा जाना स्वाभाविक है। कतिपय गलतियों को लेकर आलोचना होना भी जरूरी है। ये प्रगतिशीलता के महत्त्वपूर्ण आयाम या कि कसौटियाँ हैं जिनसे टकराकर ही कोई पत्रिका अपने सहृदय पाठकों तक अपनी पहुँच और प्रभाव बनाये रख सकती है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि शोध-पत्रिका ‘समागम’ सर्वप्रथम अपने कलेवर और आवरण से पाठकों को आकर्षित(लुभाती नहीं) करती है। कला-सौन्दर्य की बारीक एवं सूक्ष्म समझ पैनी है, तो रंग-बोध में इस पत्रिका का पाठकों से एक अलहदा किन्तु गहरा रागात्मक सम्बन्ध है। हजारों पत्र-पत्रिकाओं की लम्बी फेहरिस्त में ‘समागम’ जैसी शोध-पत्रिका अपना स्थान और महत्त्व बनाये रखे; यह अपेक्षा और उम्मीद इस पत्रिका से जुड़ाव का आत्मिक सम्बोधन है, तो इसके महत्त्व का रेखांकन भी।
लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिंदी विभाग का शोध-छात्र

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण

मीडिया का बाजारवाद

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का अंक रेडियो पर