रविवार, 9 अगस्त 2015
बुधवार, 5 अगस्त 2015
राजेन्द्र माथुर की गैरहाजिरी के 25 साल
जन्मदिन 8 अगस्त पर विशेष
-मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
किसी व्यक्ति के नहीं रहने पर आमतौर पर महसूस किया जाता है कि वो होते तो यह होता, वो होते तो यह नहीं होता और यही खालीपन राजेन्द्र माथुर के जाने के बाद लग रहा है। यूं तो 8 अगस्त को राजेन्द्र माथुर का जन्मदिवस है किन्तु उनके नहीं रहने के पच्चीस बरस की रिक्तता आज भी हिन्दी पत्रकारिता में शिद्दत से महसूस की जाती है। राजेन्द्र माथुर ने हिन्दी पत्रकारिता को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया, वह हौसला फिर देखने में नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि उनके बाद हिन्दी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने में किसी ने कमी रखी लेकिन हिन्दी पत्रकारिता में एक सम्पादक की जो भूमिका उन्होंने गढ़ी, उसका सानी दूसरा कोई नहीं मिलता है। राजेन्द्र माथुर के हिस्से में यह कामयाबी इसलिए भी आती है कि वे अंग्रेजी के विद्वान थे और जिस काल-परिस्थिति में थे, आसानी से अंग्रेजी पत्रकारिता में अपना स्थान बना सकते थे लेकिन हिन्दी के प्रति उनकी समर्पण भावना ने हिन्दी पत्रकारिता को इस सदी का श्रेष्ठ सम्पादक दिया। इस दुनिया से फना हो जाने के 25 बरस बाद भी राजेन्द्र माथुर दीपक की तरह हिन्दी पत्रकारिता की हर पीढ़ी को रोशनी देने का काम कर रहे हैं।
राजेन्द्र माथुर की ख्याति हिन्दी के यशस्वी पत्रकार के रूप में रही है। शायद यही कारण है कि हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा हो और राजेन्द्र माथुर का उल्लेख न हो, यह शायद कभी नहीं होने वाला है। राजेन्द्र माथुर अपने जीवनकाल में हिन्दी पत्रकारिता के लिये जितना जरूरी थे, अब हमारे साथ नहीं रहने के बाद और भी जरूरी हो गये हैं। स्वाधीन भारत में हिन्दी पत्रकारिता के बरक्स राजेन्द्र माथुर की उपस्थिति हिन्दी की श्रेष्ठ पत्रकारिता को गौरव प्रदान करता है। पराधीन भारत में जिनके हाथों में हिन्दी पत्रकारिता की कमान थी उनमें महात्मा गांधी से लेकर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी थे। इन महामनाओं के प्रयासों के कारण ही भारत वर्ष अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो सका। इस मुक्ति में हिन्दी पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत वर्ष के स्वाधीन हो जाने के बाद एकाएक अंग्रेजी ने ऐसी धाक जमायी कि अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजियत की छाया से भारतीय समाज मुक्त नहीं हो पाया था। स्वाधीनता के बाद ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता पर संकट स्वाभाविक था किन्तु इस संकट के दौर में मध्यप्रदेश ने एक बार फिर अपनी भूमिका निभाई और मालवा अंचल से राजेन्द्र माथुर नाम के एक ऐसे नौजवान को कॉलम राइटर के रूप में स्थापित किया जिसने बाद के वर्षों में हिन्दी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी बल्कि यह कहना भी गैरवाजिब नहीं होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता भी उनसे रश्क करने लगी थी। यह गैरअस्वाभाविक भी नहीं था क्योंकि अखबारों की प्रकाशन सामग्री से लेकर प्रसार संख्या की द्ष्टि से हिन्दी के प्रकाशन लगातार विस्तार पा रहे थे। सीमित संचार सुविधायें और आवागमन की भी बहुत बड़ी सुविधा न होने के बावजूद हिन्दी प्रकाशनों की प्रसार संख्या लाखों तक पहुंच रही थी। अंग्रेजी पत्रकारिता इस हालात से रश्क भी कर रही थी और भय भी खा रही थी क्योंकि अंग्रेजी पत्रकारिता के पास एक खासवर्ग था जबकि हिन्दी के प्रकाशन आम आदमी की आवाज बन चुके थे। हिन्दी पत्रकारिता की इस कामयाबी का सेहरा किसी एक व्यक्ति के सिर बंधता है तो वह हैं राजेन्द्र माथुर।
बेशक राजेन्द्र माथुर अंग्रेजी के ज्ञाता थे, जानकार थे लेकिन उनका रिश्ता मालवा की माटी से था, मध्यप्रदेश से था और वे अवाम की जरूरत और आवाज को समझते थे लिहाजा हिन्दी पत्रकारिता के रूप और स्वरूप को आम आदमी की जरूरत के लिहाज से ढाला। उनके प्रयासों से हिन्दी पत्रकारिता ने जो ऊंचाई पायी थी, उसका उल्लेख किये बिना हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा अधूरी रह जाती है। राजेन्द्र माथुर के बाद की हिन्दी पत्रकारिता की चर्चा करते हैं तो गर्व का भाव तो कतई नहीं आता है। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर के बाद हिन्दी पत्रकारिता की श्रेष्ठता को कायम रखने में सम्पादकों का योगदान नहीं रहा लेकिन सम्पादकों ने पाठकों के भीतर अखबार के जज्बे को कायम नहीं रख पाये। उन्हें एक खबर की ताकत का अहसास कराने के बजाय प्रबंधन की लोक-लुभावन खबरों की तरफ पाठकों को धकेल दिया। अधिक लाभ कमाने की लालच ने अखबारों को प्रॉडक्ट बना दिया। सम्पादक मुंहबायें खड़े रहे, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है। हालांकि इस संकट के दौर में प्रभाष जोशी जैसे एकाध सम्पादक भी थे जिन्होंने ऐसा करने में साथ नहीं दिया और जनसत्ता जैसा अवाम का अखबार पाठकों के साथ खड़ा रहा।
ज्यादतर अखबारों बल्कि यूं कहें कि हिन्दी के प्रकाशन फैशन, सिनेमा, कुकिंग और इमेज गढऩे वाली पत्रकारिता करते रहे। इनका पाठक वर्ग भी अलग किस्म का था और इन विषयों के पत्रकार भी अलहदा। सामाजिक सरोकार की खबरें अखबारों से गायब थीं क्योंकि ये खबरें राजस्व नहीं देती हैं। इसी के साथ हिन्दी पत्रकारिता में पनपा पेडन्यूज का रोग। पत्रकारिता के स्वाभिमान को दांव पर रखकर की जाने वाली बिकी हुई पत्रकारिता। यह स्थिति समाज को झकझोरने वाली थी लेकिन जिन लोगों को राजेन्द्र माथुर का स्मरण है और जो लोग जानते हैं कि जिलेवार अखबारों के संस्करणों का आरंभ राजेन्द्र माथुर ने किया था, वे राहत महसूस कर सकते हैं कि इस बुरे समय में भी उनके द्वारा बोये गये बीज मरे नहीं बल्कि आहिस्ता आहिस्ता अपना प्रभाव बनाये रखे। अपने अस्तित्व को कायम रखा और इसे आप आंचलिक पत्रकारिता के रूप में महसूस कर सकते हैं, देख और समझ सकते हैं।
हिन्दी के स्वनाम-धन्य अखबार जब लाखों और करोड़ों पाठक होने का दावा ठोंक रहे हों। जब उनके दावे का आधार एबीसी की रिपोर्ट हो और तब उनके पास चार ऐसी खबरें भी न हो जो अखबार को अलग से प्रतिष्ठित करती दिखती हों तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण स्वाभाविक है। राजेन्द्र माथुर भविष्यवक्ता नहीं थे लेकिन समय की नब्ज पर उनकी पकड़ थी। शायद उन्होंने आज की स्थिति को कल ही समझ लिया था और जिलेवार संस्करण के प्रकाशन की योजना को मूर्तरूप दिया था। उनकी इस पहल ने हिन्दी पत्रकारिता को अकाल मौत से बचा लिया। राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिन्दी पत्रकारिता की दुर्दशा पर विलाप किया जा रहा हो या बताया जा रहा हो कि यह अखबार बदले जमाने का अखबार है किन्तु सच यही है कि जिस तरह महात्मा गांधी की पत्रकारिता क्षेत्रीय अखबारों में जीवित है उसी तरह हिन्दी पत्रकारिता को बचाने में राजेन्द्र माथुर की सोच और सपना इन्हीं क्षेत्रीय अखबारों में है।
हिन्दी पत्रकारिता को बहुत शिद्दत से सोचना होगा, उनके शीर्षस्थ सम्पादकों को सोचना होगा कि वे हिन्दी पत्रकारिता को किस दिशा में ले जा रहे हैं? पत्रकारिता के ध्वजवाहकों द्वारा तय दिशा और दृष्टि से हिन्दी पत्रकारिता भटक गई है। हां, आधुनिक टेक्रालॉजी का भरपूर उपयोग हो रहा है और सम्पादक मोहक तस्वीरों के साथ मौजूद हैं। आज के पत्रकार राजेन्द्र माथुर थोड़े ही हंै जिनकी तस्वीर भी ढूंढ़े से ना मिले। यकिन नहीं होगा, किन्तु सच यही है कि जब आप हिन्दी के यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर की तस्वीर ढूंढऩे जाएंगे तो दुर्लभ किस्म की एक ही तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩा चाहेंगे तो एक उम्र की जरूरत होगी।
मंगलवार, 28 जुलाई 2015
यूं छू लिया आसमां
-अनामिका
कहते हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती और ऐसी कोशिश करने वाले और आसमां छू लेने वालों से मुलाकात करनी है तो आपको छत्तीसगढ़ राज्य के उन गांवों में जाना होगा जिन गांवों के बारे में आज भी लोगों को ठीक से मालूम नहीं होता यदि उनके गांव की बिटिया अपने हौसलों के बूते खुद के साथ गांव का नाम रोशन नहीं किया होता। छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों और उनके सहयोग से स्वयं सहायता समूह की सफलताओं की अनेक कथाएं हैं लेकिन अब इससे आगे निकल कर उन लड़कियों ने मिसाल बनायी है जिस पर चलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी लेकिन ऐसा हुआ है। शारीरिक रूप से अक्षम मानी जाने वाली लड़कियों के लिए बैशाखी उनका सहारा नहीं रही तो लगन ने ऐसे बेटियों को देश के नक्शे पर उभरने का अवसर दिया है। महिला सहभागिता और उनके आर्थिक समृद्धि-सशक्तिकरण के लिए किये जा रहे प्रयासों की अनकथ कथाएं और महिलाओं के लिए पे्ररणा का कार्य करती हैं।
राजधानी रायपुर से महज 25-30 किलोमीटर की दूरी पर बसा है धरसींवा विकासखंड और इसी विकास खंड का एक छोटा सा गांव है गिरौद। गिरौद दूसरे गांव की तरह कभी था लेकिन आज उसकी पहचान तारामती की सफलता के कारण अलग से चिंहित है। किसी राहगीर से पूछिए कि गिरौद कहां है तो शायद वह बता नहीं पाए लेकिन तारामती वाले गिरोद का पता वह झट से बता देगा। सवाल उठता है कि तारामती है कौन? कोई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या क्या जिसके नाम से गांव की पहचान बन गयी? जीहां, तारामती इनमें से कोई नहीं है। यह नाम है उस हौसलामंद युवती का जिनके आत्मविश्वास ने उन्हें और उनके गांव को नयी पहचान दी है। विशेष नि:शक्तता से पीडि़त तारामती का परिवार पिता की आमदनी पर पल रहा था। उनके पिता की आय से तारामती की कॉलेज की पढ़ाई भी चल रही थी लेकिन एक अनहोनी हो गई। पिता की अकाल मृत्यु से संकट का पहाड़ खड़ा हो गया। तारामती के कॉलेज की पढ़ाई तो दूर, रोजमर्रा के खर्चे के लिए खींचतान मचने लगी। तारामती के मन में था कि वह अपने परिवार को आर्थिक मदद करे। इसके लिए वह डाटा एंट्री ऑपरेटर बनना चाहती थी लेकिन यह ट्रेनिंग पाना उसके लिए मुसीबत भरा था। बिना फीस चुकाये कहां और कैसे ट्रेनिंग करे? यह बात अपनी जगह ठीक थी तो यह बात भी सच है कि जहां चाह है, वहां राह है।
तारामती की हिम्मत और जज्बे के आगे सारी मुसीबतें छोटी साबित हुई हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना ने तारामती के सपने को साकार करने में मदद दी। खुद तारामती बताती हैं कि हुआ यो कि संासद महोदय ने गिरौद गांव को आदर्श ग्राम बनाने हेतु चयन किया। इसलिये हमारा गांव पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना हेतु चिन्हांकित किया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन अंतर्गत पंडित दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना की जानकारी मुझे मिली। थोड़ी कोशिश के बाद इस योजना के तहत मुझे कस्टमर केयर एक्जीक्यूटिव का 03 माह का नि:शुल्क प्रशिक्षण ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड,रायपुर से प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रशिक्षण के दौरान, प्रशिक्षण सामग्री, यूनिफार्म, बैग इत्यादि नि:शुल्क प्राप्त हुआ इसके साथ ही घर से प्रशिक्षण केन्द्र तक आने-जाने हेतु 100 रूपये प्रति दिन प्राप्त हुये।उन्हें प्रशिक्षण उपरांत ओरियन एडूयेक्ट प्राईवेट लिमिटेड, रायपुर में बैक ऑफिस एक्जीक्यूटिव का काम मिला। उन्होंने बताया कि आज वे अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने सारे काम अच्छे से कर रही हैं। उनका वेतन 6 हजार रू. प्रतिमाह है। आर्थिक रूप से सक्षम होने के कारण अब वे अपने परिवार की भी मदद कर रही हैं। वे इस योजना के लिए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और शासन को धन्यवाद देते नहीं थकती हैं।
नि:शक्ता को पीछे छोडक़र अपने पैरों पर खड़े होने वाली गिरौद की तारामती जैसी ही रोचक कहानी है कि मायासिंह सिरदार की। कोरबा जिले की 22 साल की माया के पिता पुन्नीराम सिदार घर पर ही छोटा सा किराना दुकान चलाते हैं। इसके अलावा परिवार की आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए खेतों में भी काम करते हैं। हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी वह बच्चों की उच्चशिक्षा का बोझ नहीं उठा पा रहे थे। ऐसे में माया ने 12 कक्षा के बाद पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी। तारामती की तरह माया ने भी हौसला नहीं छोड़ा और अपने सहपाठियों से उसे जानकारी मिल की मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के तहत हूनरमंद लोगों के लिए नि:शुल्क कोर्स चलाए जा रहे हैं। इसके लिए उसने अपने नजदीकी वेदान्त आई. एल. एंड एफ.एस स्किल्स स्कूल में सम्पर्क किया और हास्पिटालिटी कोर्स के लिए अपना नाम दर्ज कराया । राज्य सरकार की इस योजना में माया ने 45 दिनों के प्रशिक्षण के दौरान होटल में होने वाली सभी जरूरी बातें तथा स्वयं के व्यक्तित्व विकास के बारे में कई तरीके सीखें । जैसे-मेहमानों का स्वागत करना, उनसे बातें करना,खाना-परोसना आदि।
माया की औपचारिक शिक्षा भले ही 12वीं कक्षा तक थी लेकिन कौशल उससे कहीं आगे की। राजधानी रायपुर स्थित एक होटल में 7 हजार की नौकरी भी की लेकिन उसकी उड़ान की तो यह शुरूआत थी। माया अब नए अवसरों की तलाश में थी। जल्द ही माया को गुजरात के पोरबंदर के होटल लॉड्स ईको इन में होस्टेस के पद पर काम करने का अवसर मिल गया। आज वह हर माह 12,500 का वेतन पा रही है। अपनी खुद की कमाई से उसने आगे पढ़ाई जारी रखते हुए स्नातक की डिग्री हासिल की और अब माया एम.बी.ए. भी करना चाहती है। माया बताती है कि जिंदगी में कई बार इंसान को कुछ कड़े फैसले सिर्फ इसलिए लेने चाहिए ताकि वे अपनी जीवन शैली में एक बड़ा बदलाव ला सके। तारामती हो या माया, इनके बुलंद हौसलों ने इन्हें नयी जमीन दी है। सरकार की योजनाएं इनके लिए महज माध्यम बना है लेकिन इनके जज्बे ने इन्हें उड़ान भरने का मौका दिया है।
गुरुवार, 16 जुलाई 2015
मीडिया नहीं, उद्योग की शिक्षा
मनोज कुमार
पत्रकारिता बीते जमाने की बात हो गई है, अब दौर मीडिया है इसलिए पत्रकारों के स्थान पर मीडिया कर्मियों का निर्माण किया जा रहा है. यूं भी मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की मांग अर्से से चली आ रही है. कागज में कानूनन भले ही मीडिया को उद्योग का दर्जा नहीं दिया गया हो लेकिन व्यवहार में उसकी कार्यशैली एक उद्योग की भांति ही है. मीडिया पहले अपने लाभ को देखता है और इसे बचे शेष हिस्से में वह समाज का शुभ देखने की कोशिश करता है. इसमें मीडिया हाऊसों का दोष नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि कोई भी उद्योग शुभ की बात अपने लाभ प्राप्ति के बाद ही सोचता है और यह मीडिया उद्योग यही कर रहा है. इसी से जुड़ा प्रश्र है मीडिया शिक्षा का. मीडिया का चाल-चलन जब एक उद्योग के स्वरूप का है तो उसे काम करने वाले भी उसी नेचर के ही चाहिए होंगे, यह बात मान लेना चाहिए.
मीडिया शिक्षा संस्थानों की संख्या दिन-प्रति-दिन बढ़ रही है तो इसके पीछे क्या कारण होंगे? इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है और यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि लगभग तीन दशक पहले जब मीडिया शिक्षा नहीं थी तो पत्रकार किस दुनिया से आते थे? इन सवालों में ही जवाब छिपा हुआ है क्योंकि पत्रकार बनाया नहीं जा सकता है बल्कि वे अपने जन्म से ही पत्रकार होते थे और जो कमियां रह जाती थी, वह जमीनी अनुभव उन्हें पक्का कर देती थी. इसलिए कभी पत्रकार कर्मी जैसा शब्द चलन में नहीं आया किन्तु जब मीडिया की बात करते हैं तो इसके पीछे संस्थानों को मेहनत करनी होती है और उन्हें कॉरपोरेट कल्चर सिखाया जाता है. लिखने-पढऩे की योग्यता बहुत मायने नहीं रखती है किन्तु सलीकेदार कपड़े पहनना, अंग्रेजी में बोलना और संस्थान के प्रति स्वयं से बढक़र समर्पित होना. उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि वे कॉरपोरेट जर्नलिस्ट हैं और समाज के गरीब, पिछड़े और अत्याचार के शिकार लोगों पर तब खबर लिखी जाए, जब अखबार या टेलीविजन चैनल की लोकप्रियता में कमी आने लगे. वरना लाइफस्टाइल, खाना-खजाना, कार, मोबाइल और ऐसे मंहगे उत्पादों के बारे में ही बात करते रहना जिससे विज्ञापनों से होने वाली आय में कमी ना हो. मीडिया शिक्षा को इस तरह डिजाइन किया गया है जहां हिन्दी को सर्वोच्च स्थान देने की बात तो कही जा रही है लेकिन अंग्रेजी का पल्लू पकडऩा मजबूरी बना दी गई है.
ऐसा भी नहीं है कि मीडिया में आने वाली नई पीढ़ी के भीतर आग नहीं है या वह सामाजिक सरोकार से बाबस्ता नहीं रखती हैं किन्तु तीन वर्ष की शिक्षा के दरम्यान उनका मानस कॉरपोरेट का बना दिया जाता है. सपनों की दुनिया में उन्हें इस तरह धकेल दिया जाता है कि वे पत्रकारिता की चुनौतियों का सामना करने का साहस नहीं कर पाते हैं और सुविधाओं की मीडिया का लाल कॉरपेट उन्हें भाने लगता है. बंद शीशे वाली बड़ी गाडिय़ों में, महंगे मोबाइल सेट्स पर सोशल मीडिया से जुडक़र वे एक खासवर्ग की पसंद हो जाते हैं. विचारधारा का कोई स्थान नहीं होता है और तर्क के स्थान पर कुतर्क उनका अंतिम औजार होता है. मीडिया शिक्षा की यह कमजोरी नहीं बल्कि मीडिया उद्योग की यह नसीहत है.
एक थे प्रभाष जोशी जिन्हें शायद हमारे समय के आखिरी सम्पादक के तौर पर चिंहित किया गया है, उनके नक्शेकदम पर चलने वाले लोग थोड़े से बचे हैं तो पत्रकारिता से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दुनिया में पहला कदम रखने वाले एसपी सिंह को कौन भुला सकता है? ये दोनों महारथी पत्रकारिता के ऐसे मिसाल हैं जो आधुनिक समय में अपनी पहचान बनायी और नयी पीढ़ी के लिए सीख. प्रभाषजी के बताये रास्ते पर चलकर साल में बड़ी संख्या में पत्रकार खबरों के लिए शहीद होते हैं तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसपी सिंह के रास्ते में चलने वाले पत्रकारों की कमी नहीं. असल पत्रकारिता शिक्षा जमीनी है और मीडिया तो उद्योग की शिक्षा है जहां अंग्रेजी की प्रेतछाया हमेशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रहेगी।
सोमवार, 29 जून 2015
‘नेट न्यूट्रलिटी’ का अनसुलझा सवाल
-मनोज कुमार
संचार माध्यमों के विस्तार के साथ ही इंटरनेट ने एक ऐसी दुनिया क्रियेट की जिसके चलते विश्व-ग्राम की अवधारणा की स्थापना हुई। बहुसंख्या में आज भी लोग इंटरनेट फ्रेंडली भले ही न हुए हों लेकिन ज्यादतर काम इंटरनेट के माध्यम से होने लगा है। बाजार ने जब देखा कि इंटरनेट के बिना अब समाज का काम नहीं चलना है तो उसने अपने पंजे फैलाना आरंभ कर दिया और अपनी मनमर्जी से इंटरनेट यूजर्स के लिए दरें तय कर दी। भारत में चूंकि इस तरह का कोई कानून नहीं है लेकिन केन्द्र सरकार की सख्ती से अभी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। समाज का एक बड़ा वर्ग ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ अर्थात नेट-निरपेक्षता का पक्षधर है अत: बाजार का फिलहाल कब्जा नहीं हो पाया है लेकिन उसने अपने नथुने दिखाना शुरू कर दिया है। ं ‘नेट न्यूट्रीलिटी’ देश के बहुसंख्यक लोगों के लिए यह शब्द एकदम नया,अबूझ और कुछ विदेशी रंग लिए हुए है।यह मसला पूरी तरह से इंटरनेट की आजादी और बिना किसी भेदभाव के स्वतंत्रता पूर्वक इंटरनेट का इस्तेमाल करने देने का मामला है। सामान्य भाषा में कहें तो कोई भी दूरसंचार कम्पनी या सरकार इंटरनेट के इस्तेमाल में भेदभाव नहीं कर सकती और न ही किसी खास वेबसाइट को फायदा और न ही किसी वेबसाइट को नुकसान पहुंचाने जैसा कदम उठा सकती है। ‘नेट न्यूट्रलिटी’ शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले कोलम्बिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर टिम वू ने किया था। ‘नेट न्यूट्रलिटी’ को हम ‘नेट निरपेक्षता’, तटस्थ इंटरनेट या नेट का समान इस्तेमाल भी कह सकते हैं।
नई तकनीकी ने दूरसंचार कम्पनियों के व्यवसाय को बहुत नुकसान पहुंचाया है। मसलन एसएमएस के जरिये संदेशों का आदान-प्रदान करने की सुविधा को व्हाट्सऐप, स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे तमाम ऐप ने लगभग मुफ्त में देकर कम्पनियों की अकूत कमाई में सेंध लगा दी है। स्काइप के बाद व्हाट्सऐप और इसके जैसी कई इंटरनेट कॉलिंग सेवाओं से देश में और खासकर विदेशी फोन कॉलों पर काफी प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि लम्बी दूरी की अंतरराष्ट्रीय फोनकॉल के लिहाज से इंटरनेट के जरिए फोन करना कहीं अधिक सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि देश में एयरटेल की अगुआई में देश की तमाम दिग्गज दूरसंचार कम्पनियां खुले या छिपेतौर पर गोलबंद होकर व्हाट्सऐप,स्काइप, वाइबर, हाइक जैसे ऐप के बढ़ते उपयोग को देखते हुए अब वॉयस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल यानी वीओआईपी सेवाओं के लिए ग्राहकों से अलग से शुल्क वसूलना चाहती हैं। इसकी शुरुआत भी एयरटेल ने की और एक ही डाटा पैक से नेट सर्फ के लिए अलग शुल्क और वाइस कॉल के लिए अलग शुल्क और एयरटेल जीरो जैसी लुभावनी योजनाओं की घोषणा करके नेट निरपेक्षता पर विवाद खड़ा कर दिया। हालांकि जनता, सरकार और इस बदलाव की जद में आने वाली कम्पनियों के दबाव में फौरीतौर पर इन योजनाओं को वापस ले लिया गया लेकिन ‘नेट निरपेक्षता’ का जिन्न अभी बोतल में बंद नहीं हुआ है। इस मुद्दे से जुड़े अनेक सवाल खड़े हैं और बहस जारी है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने का अर्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करना है और इससे कई तरह की समस्याएं सामने आती है जिसमें सत्ता और प्रशासन का निरकुंश हो जाना सबसे पहले होता है. नेट निरपेक्षता को हमारे अपने मुल्क भारत के संदर्भ में देखें तो चिंता स्वाभाविक होने के साथ साथ बड़ी हो जाती है. भारत में साक्षरता का प्रतिशत वैसे भी बहुत उत्साहजनक नहीं है और इंटरनेट के उपयोग करने वालों का प्रतिशत भी बहुत संतोषजनक नहीं है. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की संख्या भी अधिक नहीं कही जा सकती है और जब इंटरनेट सेवाओं का अलग अलग प्रभार लेने की स्थिति बनेगी तो भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में गिरावट स्वाभाविक होगी। यह स्थिति भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए चिंताजनक है क्योंकि इस स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपरोक्ष रूप से कुठाराघात होगा.
देखा जाए तो जनसंचार के विविध माध्यमों की तरह इंटरनेट का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। लगभग लगभग तीन दशक पूर्व इंटरनेट का जन्म हुआ और इस तीन दशक में इंटरनेट ने पूरे विश्व में स्वयं को स्थापित कर लिया। इंटरनेट यूं तो जनसंचार का ही एक स्वरूप मान लिया गया है किन्तु वास्तविकता यह है कि इंटरनेट महज एक तकनीक है और इस तकनीक के सहारे जनसंचार को विस्तार मिला है। इंटरनेट के आ जाने के बाद सबसे ज्यादा नुकसान मुद्रित माध्यम को हुआ। भारत सहित पूरी दुनिया में समाचार पत्र और पत्रिकाएं डिजीटल की दुनिया में आ गए. भारत को छोडक़र अन्य देशों में तो कागज पर अखबारों का मुद्रण बंद हो गया है और आने वाले समय में अखबार तो बने रहेंगे लेकिन इसका स्वरूप डिजीटल होगा. रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों के लिए इंटरनेट एक बहुउपयोगी तकनीक साबित हुआ है. सूचनाओं एवं विचारों के विश्वव्यापी आदान-प्रदान के लिए सोशल मीडिया का सर्वोच्च साधन इंटरनेट बना हुआ है. इस स्थिति में नेट निरपेक्षता को समाप्त किया जाता है तो यह समूचे विश्व के लिए घाती कदम होगा.
तीस साल की अल्प अवधि में अपना साम्राज्य फैलाने वाले इंटरनेट पर बाजार की नजर पहले से थी लेकिन शायद वे थोड़ा और समय इंतजार करना चाहते थे. भारत में साजिशन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ की गई किन्तु लगातार विरोध के बाद कदम तो बाजार ने पीछे खींच लिया लेकिन अभी वापस लौटने के मूड में दिखायी नहीं देता है. वैसे इस मामले में अब तक सरकार का कहना है कि इंटरनेट तक पहुंच को लेकर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस मामले पर एक कमेटी भी बनाई है जो जल्दी ही इस मसले पर अपनी राय देगी। इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया आम जनता या नेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों ने दी है। ट्राई को इस बारे में एक लाख से ज्यादा ईमेल भेजे गए हैं। सोशल मीडिया पर भी यह विषय छाया हुआ है। अब सारा दारोमदार सरकारी रपट, ट्राई की भूमिका और इंटरनेट यूजर्स की एकता पर टिका है क्योंकि मसला लाखों-करोड़ों के मुनाफे का है।
सोमवार, 22 जून 2015
पंचायतों का अस्तित्व
मनोज कुमार
मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था में सरपंच की कुर्सी को नीलाम करने की कई खबरें पहले भी प्रकाश में आती रही हैं और इन खबरों ने पंचायतीराज व्यवस्था की कामयाबी पर सवालिया निशान लगाया है. हाल ही में आयी एक ताजा खबर ने तो पंचायतीराज व्यवस्था को ही दांव पर लगा दिया है. खबर है कि एक महिला सरपंच ने अपने पद को पॉवर ऑफ अटार्नी से दूसरे को हस्तांतरित कर दिया है. इसके पीछे महिला का तर्क है कि वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, इसलिए उसने ऐसा किया. अपने आपमें चौंकाने वाला यह मामला यूं ही दबा रहता, यदि कोई चौकस पंचायत सचिव नहीं आता तो. नए पंचायत सचिव के आने से मामले का खुलासा हुआ. खबर के बाहर आने के बाद कानून क्या करता है और सरकार क्या करेगी, यह व्यवस्था का मामला है लेकिन पंचायतों को इस तरह दांव पर लगाया जा रहा है, यह बात तो साफ हो गई है जिस पर आप गर्व तो नहीं कर सकते हैं. सरपंच का चयन दया से नहीं बल्कि मतदाताओं के निर्णय से होता है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. इस महिला सरपंच ने एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित किया है.
महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सुंदर सा सपना देखा था. तब शायद उनके मन में यह बात रही होगी कि गांव की सत्ता गांव के हाथों रहने से उसका समग्र विकास हो सकेगा लेकिन शायद उन्हें इस बात का अनुभव नहीं होगा कि एक दिन उनके सपनों को दांव पर लगाया जाएगा. बात थोड़ी जटिल है लेकिन समझ में भी ना आए, इतनी जटिल नहीं. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंचायतीराज का ऐलान किया था. इस व्यवस्था में पूरे देश को जिम्मेदारी दी गई थी, उसमें मध्यप्रदेश भी शामिल था. मध्यप्रदेश में पंचायती राज का संचालन सफलतापूर्वक हो रहा था किन्तु समय आगे बढऩे के साथ पंचायतीराज व्यवस्था और सुंदर होने के बजाय कुरूप होता गया. चुनावी व्यवस्था ने पंचायतीराज व्यवस्था को जख्मी कर दिया. पहले तो गांव, फिर मोहल्ले और बाद के दिनों में घरों में तनातनी और विवाद की स्थिति उपजने लगी. पद और सत्ता की लालसा ने पंचायतीराज को दांव पर लगा दिया. देश के और प्रदेशों में भी पंचायतीराज व्यवस्था का यही हाल होगा, कहा नहीं जा सकता किन्तु मध्यप्रदेश को लेकर अनुभव कड़ुवे रहे हैं. इस कड़़ुवे अनुभव का यह ताजा उदाहरण है.
पूर्व में भी मध्यप्रदेश के अनेक पंचायतों में सरपंच पद पर बोली लगायी जाती रही है. साधन सम्पन्न और धनिक परिवारों द्वारा अनेक प्रकार से आर्थिक मदद कर सरपंच पद पर कब्जा करने की खबरों की पुष्टि हुई है. इधर पंचायत चुनाव को प्रभावी बनाने के लिए राज्य सरकार की योजना भी पंचायतीराज व्यवस्था को क्षति पहुंचा रही है. निर्विरोध निर्वाचन के लिए ईनाम दिए जाने की सरकार की योजना के चलते वास्तविक हकदार पीछे रह जाते हैं. निर्विरोध निर्वाचन को आधार बनाकर बाहुबली सरपंच पद पर कब्जा कर लेते हैं. राजधानी भोपाल के आसपास क्षेत्रों से लेकर प्रदेश के सुदूर अंचलों में ऐेसे कई मामले प्रकाश में आते रहे हैं.
यह सब उदाहरण निराश करते हैं तो आशा की किरणें भी कम नहीं है. मध्यप्रदेश में खासतौर पर महिलाओं के जज्बे के आगे बाहुबली पानी भरते नजर आए हैं. इन महिलाओं ने कोई समझौता नहीं किया. सरकार द्वारा महिलाओं के लिए पंचायतों में आरक्षण का प्रावधान किए जाने से उनके हौसले और भी बढ़े हैं. बालाघाट की महिला सरपंच ने परवाह किए बिना गांव के बीचोंबीच बने शराब की दुकान को गांव की सीमा के बाहर कर दिया तो एक आदिवासी महिला सरपंच ने अपने बूते गांव में स्कूल में ऐसी व्यवस्था की कि वह स्वयं बच्चों के साथ पढऩे आने लगी. उसने अपने पद और मर्यादा का खयाल ही नहीं रखा अपितु दूसरे लोगों के लिए उदाहरण बन गयी. स्वच्छता, रोजगार और महिला अधिकारों के साथ बच्चों की शिक्षा, खासतौर पर बच्चियों की शिक्षा में भी महिला सरपंचों ने हौसले का परिचय दिया है. हालात यह है कि प्रदेश की कुछ पंचायतें तो ऐसी हैं जहां पूरी पंचायत पर महिलाओं का कब्जा और दबदबा है.
मध्यप्रदेश पंचायती राज के दोनों चेहरे समाज के सामने हैं. पंचायतीराज सत्ता नहीं बल्कि सहभागिता की व्यवस्था है। और इसे सत्ता समझ कर सत्ता के लाभ को पाने वालों की मंशा भी दिखती है और सहभागिता मानकर गांव के विकास के लिए प्रतिबद्ध पंचायतों की फेहरिस्त भी है. सवाल यह है कि महात्मा गांधी के सपनों के पंचायतीराज व्यवस्था को किस दिशा में आगे ले जाना है, इस पर मीमांसा करने की जरूरत होगी. राजस्थान में पंचायत चुनाव के लिए शैक्षिक योग्यता अगर शर्त है तो इस शर्त को लागू करने में दूसरे प्रदेशों को आगे आना होगा. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अशिक्षा के बहाने पंचायतें दांव पर लगती रहेंगी.
गुरुवार, 18 जून 2015
योग : भारत की आध्यात्मिक जीवन शैली
21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष
-अनामिका
योग भारत में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से संबंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्रीलंका में भी स्वीकृति पाकर योग को विद्या के रूप में नहीं अलबत्ता जीवनशैली के रूप में अपना रहे हैं। यह भारत के लिए गर्व करने की बात है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों के चलते भारती की आध्यात्मिक जीवनशैली योग को संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र की इस स्वीकृति के बाद योग पर उठने वाले कथित विवादों पर यंू ही विराम लग जाता है।
समूचे संसार ने जीवन को सुखमय बनाने के लिए अनेक उपाय कर लिए हैं। यह सारे उपाय जीवन को सुखमय तो बनाते हैं किन्तु शारीरिक श्रम के अभाव एवं मानसिक तनाव से व्यक्ति का जीवन अनन्य बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। इन संकटों से दवा क्षणिक मुक्ति का माध्यम है किन्तु योग क्रिया से मनुष्य के संकटों का स्थायी समाधान हो सकता है। भारत में आदिकाल से योग की परम्परा रही है। इसे आप भारतीय जीवनशैली की एक प्रक्रिया भी कह सकते हैं। आमतौर पर लोगों के लिए योग का अर्थ आसन और प्राणायाम होता है, जो शरीर को फिट रखने के लिए किए जाते हैं, लेकिन योग मात्र कुछ व्यायाम या चिकित्सा नहीं है. यह एकात्मता, अस्तित्व की एकता पर आधारित जीवन का एक तरीका है। योग शरीर-मन-बुद्धि का स्वयं के साथ, व्यक्ति का परिवार के साथ, परिवार का समाज के साथ, समाज का राष्ट्र के साथ और राष्ट्र का पूरी सृष्टि के साथ एकीकरण है।
योग का अर्थ युज्यते अनेन इति योग है, योग जुडऩे की एक प्रक्रिया है। योग वह दर्शन अभ्यास है, जिसके द्वारा आपको ज्ञात होता चलता है कि सब कुछ एक ही है। शरीर उस स्व का एक अस्थायी प्राकट्य है। वास्तविक आत्मा हमेशा अप्रभावित, आनंदित और अपरिवर्तनीय बनी रहती है। इसका अहसास करने के लिए, इस आनंदित आत्मा के साथ अपनी पहचान जोडऩे के लिए योग है। इसे बौद्धिक स्तर पर तो समझा जा सकता है, लेकिन इसका अनुभव करने के लिए लंबे और सतत अभ्यास की आवश्यकता होती है। योग का उल्लेख वेदों में भी किया गया है. ईश्वर के सबसे पहले प्रकट रूप हिरण्यगर्भ: ने विवस्वान को योग सिखाया और विवस्वान ने इसे मनु को सिखाया और फिर मनु से इसे कई योग्य पुरुषों और महिलाओं को सिखाया गया था। शैव परंपरा में बताया जाता है कि योग हमें भगवान शिव से मिला है। रामायण और महाभारत जैसे हमारे पुराणों में और इतिहासों में कई योगियों और योगिनियों का उल्लेख है। महर्षि पतंजलि ने अपने समय में योग के उपलब्ध ज्ञान को एकत्रित, संकलित और संपादित किया, जो उनके अपने अनुभव और योग की साधना पर आधारित है। भगवद्गीता में योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यास योग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग का व्यवहार किया है। पतंजलि योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। इन सब उद्धहरणों के बाद भी योग की परिभाषा करना कठिन काम है।
योग के शास्त्रीय स्वरूप, उसके दार्शनिक आधार, को सम्यक रूप से समझना बहुत सरल नहीं है। संसार को मिथ्या मानने वाला अद्वैतवादी भी निदिध्याह्न के नाम से उसका समर्थन करता है। अनीश्वरवादी सांख्य विद्वान भी उसका अनुमोदन करता है। बौद्ध ही नहीं, मुस्लिम सूफ़ी और ईसाई मिस्टिक भी किसी न किसी प्रकार अपने संप्रदाय की मान्यताओं और दार्शनिक सिद्धांतों के साथ उसका सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं। वैदिक संहिताओं के अंतर्गत तपस्वियों (तपस) के बारे में प्राचीन काल से वेदों में (900 से 500 बी सी ई) उल्लेख मिलता है, जब कि तापसिक साधनाओं का समावेश प्राचीन वैदिक टिप्पणियों में प्राप्त है। बुद्ध के पूर्व एवं प्राचीन ब्रह्मिनिक ग्रंथों में ध्यान के बारे मे कोई ठोस सबूत नहीं मिलता है। हालांकि उपस्थित तथ्य बताते हैं कि सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ में जिन ध्यान तकनीकों का वर्णन प्राप्त होता है, वे ध्यान की प्रथाओं और अवस्थाओं का वर्णन करते हैं जो बुद्ध से पहले अस्तित्व में थीं और साथ ही उन प्रथाओं का वर्णन करते हंै जो पहले बौद्ध धर्म के भीतर विकसित हुई।
वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है। योग स्वस्थ्य एवं तनावमुक्त जीवन के लिए बहुत ही लाभकारी है। योग न केवल हमारे दिमाग, मस्तिष्क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए योगा बहुत ही फायदेमंद है। योग के फायदे से आज सभी जानते हंै, जिस वजह से आज योग विदेशों में भी प्रसिद्ध है।
योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लाकर मोक्ष प्राप्त करने तक है। जैन धर्म, अद्वैत वेदांत के मोनिस्ट संप्रदाय और शैव सम्रदाय के अन्तर में योग का लक्ष्य मोक्ष का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक अहसास है। महाभारत में, योग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुओं में व्याप्त है। भक्ति संप्रदाय के वैष्णव धर्म में योग का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवन का सेवा करना या उनके प्रति भक्ति होना है, जहां लक्ष्य यह है की विष्णु के साथ एक शाश्वत रिश्ते का आनंद लेना।
उपरोक्त विवेचन से यह बात स्थापित होती है कि योग भारत में आदिकाल से है और यह एक जीवनशैली है। आज के समय में योग को जीवनशैली में शामिल किए जाने की अनिवार्यता है। मोदी सरकार ने यह पहल कर संदेश दिया है कि भारत की उन सभी प्राचीन एवं प्रामाणिक जीवनशैली को विश्व-समुदाय के मध्य पहुंचायेंगे जिससे भारत केवल कागज में नहीं बल्कि यर्थाथ में विश्व-गुरू बन सके। संयुक्त राष्ट्र की योग दिवस पर सहमति को इस दिशा का पहला कदम माना जाना चाहिए।
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