बुधवार, 9 नवंबर 2016

खबर की कीमत तो तय होने दीजिये जनाब!


मनोज  कुमार 
किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर लीड स्टोरी का मूल्य क्या होगा? बाॅटमस्टोरी महंगी होगी या फिर सिटी पेज की स्टोरी की कीमत अधिक होती है? 9बजे प्राइम टाइम पर प्रसारित होने वाला कौन सा समाचार किस कीमत पर बेचाजाएगा अथवा रेडियो पर प्रसारित होने वाली खबरों की भी कोई कीमत आप लगासकते हैं? प्रधानमंत्री जी का वक्तव्य महंगा होगा या बिपाषा बसु के बारेमें बतायी जा रही खबर की भी कोई कीमत हो सकती? आप सोच रहे होंगे कि यहकैसा बेहूदा सवाल है। भला खबर की भी कोई कीमत आंकी जा सकती है? मैं भीआपकी तरह ही सोचता हूं कि पत्रकारिता कभी भी व्यवसायिक नहीं हो सकती हैकिन्तु जब सब तरफ ढोल पीटा जा रहा है कि पत्रकारिता व्यवासायिक हो गई हैतब यह सवाल जरूरी हो जाता है। मुझे यह भी नहीं मालूम कि मेरी इस राय सेकितने लोग इत्त्ेाफाक रखते हैं लेकिन मेरी अपनी राय है कि पत्रकारिता न तो आजादी के पहले व्यवसायिक थी और न आज व्यवसायिक हुई है। आजादी के समय थोड़ी और आजादी के बाद बदलते दौर में समाचार पत्रों का व्यवासायीकरण तेजी से हुआ है। तकनीक के विस्तार के साथ समाचार पत्रों की छपाई का खर्च बढ़ता गया और पाठक को उपभोक्ता बनाकर उन तक पहुंचने के लिए बाजार ने समाचारपत्रों को माध्यम बनाया। कुछ ऐसी ही स्थिति तेजी से पसरते टेलीविजन औररेडियो के साथ भी हुई। कुल मिलाकर मीडिया को बाजार की वस्तु बना दी गई और मीडिया के संसाधनों का व्यवसायीकरण हुआ और इसे बता दिया गया कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गई।

पत्रकारिता और पत्र के व्यवसायिकरण के भेद को समझना होगा क्योंकि पाठकके लिए पत्रकारिता और पत्र में कोई भेद नहीं है। समय की मांग के अनुरूपपत्रकारिता का विस्तार होता गया और बढ़ती मंहगाई के अनुरूप पत्रकारो केवेतनमान और दूसरी सुविधाओ में इजाफा हुआ। आज से दो दषक पहले मिलने वालेवेतनमान और आज मिलने वाला वेतनमान में फर्क है किन्तु पत्र को प्राप्तहोने वाले राजस्व पर नजर डालें तो दोनों के बीच जमीन आसमान का फर्क साफदिखता है। पत्र की आय बढ़ती गई क्योंकि दो दषक पहले तक जो विज्ञापन की जोकीमत थी, आज वह कम से कम चालीस गुना बढ़ गई है। पत्रों का स्वरूप बदल गयाहै। पृश्ठ संख्या में वृ़िद्व के साथ साथ रंगीन छपाई अनिवार्य हो गइ्र्रहै और इस पूरी प्रक्रिया में पत्रकारिता को कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ औरजो हो भी नहीं सकता है। पत्रकारिता का गुण-धर्म कहता है कि वह निरपेक्ष और निस्वार्थ रूप से अपने सामाजिक और नैतिक दायित्वों का निर्वहन करेगी और इस बदले दौर में भी वह पूरी ईमानदारी और षिद्दत के साथ अपने काम करनेमें जुटी हुई है। आज तक किसी खबर की कीमत तय नहीं की गई और न ही विज्ञापनके रूप में उसकी बिलिंग की गई न इंच और सेंटीमीटर में नापा गया। यहां तककी तारीफ में लिखे गये लेख को इम्पेक्ट फीचर कहा गया जो भुगतान के एवज में लिखी गई है जिसमें लेखक हमेषा से गायब रहा है। पत्रकार अरूण षौरी की रिपोर्टिंग बोफोर्स कांड की गंूज आज तक हो रही हैतो स्ंिटग आॅपरेषन से रिष्वतखोर सांसदों की कुर्सी छिन जाना भी इसीस्वतंत्र भारत की घटना है। श्रेश्ठ पत्रकारिता के लिए पी. साईंनाथ कोमेगसेसे पुरस्कार मिलना भी इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता न तोस्वतंत्रता के पूर्व व्यवसायिक थी और न आज व्यवसायिक है और इस बात की भी आषंका नहीं है कि पत्रकारिता कभी व्यवसायिक हो पाएगी। 

मुझे तो लगता हैकि मीडिया हाउस और पत्रकारिता को धंधा बनाने में जुटा एक बड़ा वर्गपत्रकारिता के व्यवसायिक होने का ढोल पीट रहा है। इसके पीछे की साजिष कोसमझना होगा क्योंकि पत्रकारिता को व्यवसायिक होने की बात स्थापित नहीं कीगई तो मैनेजर को संपादक कैसे बनाया जाएगा? आज जब चारों तरफ संपादक नाम कीसंस्था की समाप्ति को लेकर रोना रोया जा रहा है, तब हमें यह नहीं भूलनाचाहिए कि यही वे लोग हैं जो पत्रकारिता को व्यवसायिक बता कर, खबर कोसाबुन की टिकिया के दामों पर बेचने का भ्रम फैलाकर संपादक की जरूरत खत्मकर दी। एक बात ध्यान रखना चाहिए कि जब कोई चीज, भले ही वह पत्रकारिता हो,यदि वह व्यवसायिक होती है तो उसे अपनी क्वालिटी पर विषेष ध्यानदेना होगा। दुर्भाग्य से जो लोग पत्रकारिता को व्यवसायिक बता रहे हैं,उन्होंने पैकेजिंग तो बेहतर की है लेकिन कंटेंट पर ध्यान देना भूल गए हैंजबकि बाजार कहता है कि पैकेजिंग के साथ गुणवत्ता भी जरूरी है। ऐसे में यहमाना जा सकता है कि पत्रकारिता को व्यवसायिक बनाने की पहल जरूर तेजी सेकी जा रही है। यह जरूर माना जा सकता है कि पर्दे के पीछे से पत्रकारिताकी आड़ में बहुत सारे सौदे हो रहे हैं और इसी को आधार बनाकर पत्रकारिता कोव्यवसायिक होना मान लिया गया है। दरअसल इसे पत्रकारिता में पीतपत्रकारिता कहा जाता है। जो थोड़ा बहुत अनुभव मेरा अपना है, उसके आधार पर मैं यह कह सकता हूं कि पत्रकारिता की आड़ में कथित तौर पर लेन-देन का किस्सा पुराना है, तब क्यों पत्रकारिता के व्यवसायीकरण की बात नहीं की गई? उसे हमेषा पीत पत्रकारिता कहा गया। साथियों को यह तो याद होगा कि शशिकपूर अभिनीत फिल्म न्यू दिल्ली टाइम्स की कहानी इसी पृष्ठभूमि पर थी।पीत पत्रकारिता और व्यवसायिकरण के अंतर को भी समझना होगा। 

दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी के दिमाग में आरंभसे ही यह बात बिठा दी जाती है कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गई है और आपइसी नजर से पत्रकारिता करें। इसका खामियाजा यह निकल रहा है कि पत्रकारिताको नयी पीढी नौकरी मानकर करने लगी है। पत्रकारिता की षिक्षा हासिल कर रहेकुछ नये दोस्तों से इस बारे में बात की गई तो उनका मानना था कि अखबारोंअथवा टेलीविजन चैनल से जो तनख्वाह मिलती है, वह खबर के लिये मिलती है।उनसे जब इस बारे में पूछा गया कि मिसाल के तौर पर एक अखबार आपको दस हजाररूपये माहवार तनख्वाह देता है और बदले में आप दस खबर महीने में देते हैं।इस अखबार की प्रसार संख्या एक लाख प्रतियां प्रतिदिन है। इस गणित के आधारपर आपकी एक खबर की कीमत एक हजार रुपये और एक प्रति के हिसाब से दस पैसेप्रति खबर दी गई। दस पैसे की खबर और पत्रकारिता का दंभ? इस बात का जवाबमेरे नौजवान साथी के पास नहीं था। जब नये साथियों को समझाया गया कि खबरकी कोई कीमत नहीं होती है बल्कि जो दस हजार रुपये आपको दिये जाते हैं, वहआपके श्रम का होता है।नये साथियों की सोच में उनकी गलती नहीं है बल्कि इसके लिये हम सब दोषीहैं। हमने ही तय कर दिया कि पत्रकारिता व्यवयासियक हो गई है तो नयी पीढ़ी उसी हिसाब से काम करने लगी। मेरा अपना मानना है कि कदाचित पत्रकारिता में व्यवसायिकरण हो भी रहा है तो इसका पूरी ताकत से प्रतिकार किया जाना चाहिए। 

घर में आग लग जाए तो हाथ पर हाथ रखकर बैठा नहीं जा सकता है, उसी तरह पत्रकारिता जब व्यवसायिक हो रही है तो उसे बचाने की कोषिष तो की जासकती है। सिर्फ चिल्लाने और रोने से पत्रकारिता में बढ़ती व्यवसायिकतानहीें रूकेगी बल्कि इसके लिये पहल करने की जरूरत होगी और सबसे पहले हमेंइस बात को सिरे से, हर मंच से नकारना होगा कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गईहै। यह काम हमने आज और अभी से नहीं किया तो एक प्रोफेषनल कालेज से पासआउटस्टूडेंट और हमारे में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। कल और डरावना हो जाए,इसके पहले हम सबको चेतना होगा। पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात माननाभी है तो थोड़ा सब्र करें दोस्त क्योंकि पहले खबर की कीमत तो तय होनेदीजिये। खबर को इंच और सेंटीमीटर में नपने तो दीजिये।

हतप्रभ कर देने वाला फैसला

प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला दूरगामी परिणाम देने वाला है. सबसे पहले तो इस फैसले से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी. उन्हें पालने के लिए जो धन गलत रास्ते से आता-जाता था, उस रास्ते को मोदी ने हमेशा हमेशा के लिए बंद कर दिया है. पाकिस्तान को ऐसा ही जवाब दिए जाने की उम्मीद थी और मोदीजी ने देश की उम्मीद को पूरा किया है.  दूसरा असर जमाखोरों और कालाधन रखने वालों पर पड़ेगा. करोड़ों बेनामी रखने वालों की रात की नींद उड गयी है.
हतप्रभ कर देने वाला यह फैसला एकाएक लिया गया और मोदीजी ने इसकी भनक मीडिया तक को नहीं लगने दी. ऐसे समय में फैसला सुनाया कि किसी के पास कोई विकल्प नहीं बचा था. एक समय कहावत सुनते थे कि सडक़ पर आ जाना. आज मोदीजी के फैसले के बरक्श देख भी लिया कि सडक़ पर आना किसे कहते हैं.
प्रधानमंत्री के इस फैसले में सबकुछ ठीक है, कहना भी अतिरेक होगा. इसमें उन सारे लोगोंं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है जो रोज कमाते और रोज खाते हैं. मजदूरी में उन्हें छुट्टे पैसे नहीं मिलते हैं और दो-तीन की मजदूरी एक साथ या फिर हफ्ते में एक बार दी जाती है. स्वाभाविक है कि मजदूरी के रूप में मिलने वाली राशि सौ रुपये या पचास में नहीं होगी और पांच सौ या हजार का कोई विकल्प दो दिनों के लिए शेष नहीं था. इसी तरह अपने बच्चों की शिक्षा, शादी और घर के आवश्यक कामों के लिए जतन से रखे गए रुपये भी आम आदमी को मुसीबत में डालने वाला साबित हुआ है. खासतौर पर गृहणियों के समक्ष बड़ा संकट है कि वे पति की जेब से निकाले गए पैसे, पीहर से मिली राशि को अपने और अपने परिवार के लिए जोड़ रखा था, उसका हिसाब कैसेे और कहां से दे. हालांकि फैसला इतना बड़ा है और असर इसका व्यापक है तो छोटे और मध्यमवर्गीय लोगों को मुश्किल होना सामान्य सी बात है. सबसे बड़ी बात यह है कि इन मुसीबत के बाद भी देश मोदीजी के साथ खड़ा दिखता है. उनका कहना है कि ये मुसीबत के दिन तो फिर भी कट जाएंगे लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य संवर जाएगा. धन का वितरण समान हो जाएगा और पारदर्शिता होगी.

शनिवार, 5 नवंबर 2016

हदों से परे होता समाज

फोटो गूगल से साभार 

मनोज कुमार 

मेरे एक बुर्जुग मार्गदर्शक मित्र हैं। वे भोपाल की तेजी से बढ़ रही एक कॉलोनी में रहते हैं। उन्होंने मुझसे शिकायत की कि उनके घर के आसपास एक प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने घर का दायरा सड़क तक बढ़ा लिया है। उनका यह बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या अवैधानिक, किसी को नहीं मालूम। बात आयी और गयी। मेरे मन के भीतर यह बात सालती रही। हालांकि इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बढ़ा हुआ दायरा वैधानिक है या वैधानिक किन्तु इस बात से फर्क जरूर पड़ता है कि इस सीमा को लांघने से एक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होती है। सीमा यानि अपनी हद लांघने से हमारे जीवन में विविध किस्म की समस्याओं का जन्म होता है। अपनी हद में नहीं रहने वाले लोग ही समाज के लिये समस्या हैं। हद लांघने की बात को जरा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे तो पूरी तस्वीर सामने आ जाएगी।

एक पिता अपने बेटे से इसलिये परेशा है कि वह उनकी अवज्ञा कर रहा है अर्थात हद लांघ रहा है। एक शिक्षक की तकलीफ यही है कि विद्यार्थी उदंड होते जा रहे हैं और गुरूजनों की अवज्ञा कर रहे हैं। यहां भी मामला हद लांघने की है। एक सास अपनी बहू की अवज्ञा से परेशान है। एक अधिकारी अपने कर्मचारी से, एक मंत्री अपने मातहतों से और भी भिन्न भिन्न लोग इस अवज्ञा वाली स्थिति से परेशान हैं। लगभग पूरे समाज में अराजकता की स्थिति बन चली है। सवाल यह है कि यह हद लांघने का साहस कैसे हो रहा है? इस पर चिंतन करने की जरूरत है। मामला बहुत पेचीदा नहीं है लेकिन हम समझना ही नहीं चाहते हैं। अवज्ञा करने की कोई नहीं सोचता है और न ही करना चाहता है किन्तु भौतिक सुख-सुविधाओं ने इसे विस्तार दे दिया है। इसे थोड़ा और विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

लगभग कई दिनों से मैं भौतिक सुख-सुविधाओं के बारे में चिंतन-मनन कर रहा हूं। सवाल अनेक हैं लेकिन जवाब कोई भी नहीं। एक बड़ी चमचमाती कार पूरे रफ्तार के साथ मेरे बगल से गुजर गयी। सड़कों पर लगभग हर रोज एक नयी कार दौड़ती नजर आएगी। इन कारों को देखकर सहसा मेरे मन में प्रश्न उठा कि कार के स्वामी का जीवन लक्ष्यविहिन होगा। लक्ष्य है भी तो अधिकाधिक सुख की प्राप्ति। यह सुख भी शाश्वत नहीं है, क्षणिक है। कार के स्वामी ने पहले तो अपना सारा श्रम और मस्तिष्क कार की रकम चुकाने में लगायी होगी। कदाचित बैंक लोन से भी खरीद लिया होगा तो अब उसे बैंक का किश्त जमा करने के लिये रोज अधिक मेहनत बल्कि अधिक चालबाजी करनी पड़ती होगी। यह भी सच है कि जिस व्यक्ति के पास ऐसी कार है, उसके आय के स्रोत से उसका परिवार वाकिफ होगा और वह यह भी जानता है कि इतनी महंगी कार उस आय के स्रोत से नहीं खरीदी जा सकती है। बात साफ है कि कार के सुख के पीछे मेहनत कम, मक्कारी ज्यादा है जिसे आज के समय में हम भ्रष्टाचार का नाम दे सकते हैं।

जब परिजन को यह पता है कि उनका घर भ्रष्टाचार से चल रहा है तो अवज्ञा की स्थिति सहज ही बन जाती है। पहले तो अनावश्यक डिमांड की जाती है। चिकचिक से बचने अथवा अपना प्रभाव दिखाने के लिये उन अनावश्यक जरूरतों को पूरा किया जाता है। यदाकदा की मांग बाद के समय में आदत में बदल जाती है और जब आदत बिगड़ जाए तो सिर्फ अवज्ञा की स्थिति बनती है। यह बात पूरे समाज में, हर वर्ग में और हर क्षेत्र में लागू होती है। हद के बाहर होने के कारण ही समाज में अनैतिकता, अनाचार और अव्यवस्था का जन्म हो रहा है। जिस दिन हम अपनी हदों में रहना सीख जाएंगे, उस दिन समस्यायें स्वयमेव समाप्त हो जाएगी। कल्पना कीजिये कि समुद्र अपना स्थान छोड़कर रहवासी इलाकों में चला आता है तो कैसी तबाही मचती है। समुद्र समाज में शुचिता बनी रहे, लोगों में भय न हो इसलिये वह अपनी हद में रहता है। हद से बाहर होते समाज में आप व्यवस्था, शुचिता, सौजन्यता या सम्मान की बात नहीं कर सकते हैं। हद से बाहर होने का एक अर्थ लालसा भी है और यह लालसा अवज्ञा का पर्याय है। अब आपको यह तय करना है कि हम सब हद में रहें, इसके लिये अपने लालच पर नियंत्रण पाने की कोशिश करना होगी।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

रमन और छत्तीसगढ़ एक-दूसरे के पर्याय बने

छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस 1 नवम्बर पर विशेष
मनोज कुमार

चित्र गूगल से साभार 
बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. 16 साल पहले आज के ही दिन 1 नवम्बर को छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र होने का अवसर मिला था. मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य विविध चुनौतियों और संभावनाओं के मध्य कुछ करगुजरने के लिए बेताब था. आरंभ के तीन वर्ष कांग्रेस के पास रहा लेकिन उसके बाद राज्य की जनता ने बागडोर भाजपा के हाथों सौंप दी. 2003, 2008 और 2013 के राज्य विधानसभा के चुनाव में बार बार, हर बार भाजपा का नारा लगता रहा और भाजपा ही सत्तासीन होती रही. सबसे खास बात यह रही कि इन सालों में लोगों ने मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह को ही पसंद किया. कभी बीमार लोगों की नब्ज पकड़ कर उनकी बीमारी दूर करने वाले डाक्टर रमनसिंह के हाथों में आज छत्तीसगढ़ की नब्ज है. वे राज्य की बीमारी को भी जानते हैं और उसमें छिपी संभावनाओं को भी और बीमारी का इलाज भी उनके पास है इसलिये छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमनसिंह एक ऐसे व्यक्ति का नाम है जो मुखिया बनकर छत्तीसगढ़ राज्य को विकास की तरफ ले जाने की दिशा में अग्रसर हैं. कभी पिछड़े राज्य के रूप में पहचाना जाने वाला छत्तीसगढ़ आज विकसित राज्यों की पंक्ति में शुमार हो चुका है तो इसके सम्मान के हकदार हैं तो डॉक्टर रमनसिंह. सन् दो हजार में जब छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य की हैसियत से भारत के नक्शे पर आया तब किसी ने यकिन नहीं किया था कि राज्य की चमक इस तरह बिखरेगी लेकिन ऐसा हुआ. आरंभ के तीन वर्ष जरूर छत्तीसगढ़ के लिये गुमनामी के रहे लेकिन बाद के वर्षों में विकास की जो गूंज हुई, उसे पूरी दुनिया देख रही है. 
डाक्टर रमनसिंह ने जब छत्तीसगढ़ राज्य की बागडोर अपने हाथों में ली, तब शायद किसी को यह विश्वास ही नहीं था कि एक ऐसा शांत व्यक्तित्व का धनी राज्य को विकास की चहुमुंखी आभा से आलोकित कर देगा. लोगों का यह सोचना अकारण नहीं था. दूसरे राजनेताओं की तरह डाक्टर रमनसिंह की खनक नहीं थी बल्कि आम आदमी के लिये तो लगभग नया चेहरा था लेकिन दुर्ग संभाग के लोगों का पुराना परिचय उनसे था. मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपना संकल्प दोहराया कि राज्य में कोई भूखा नहीं सोयेगा. अपने इस संकल्प की पूर्ति के लिये समाज के आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति तक सस्ते में अनाज पहुंचने लगा.  इसी के साथ पहुंचने लगी मुख्यमंत्री की ख्याति. आरंभिक दिनों में विपक्षियों के लिये सस्ता चावल महज शिगूफा था लेकिन आहिस्ता आहिस्ता इस संकल्प का प्रभाव सामने आने लगा और सरकार तथा आम आदमी के बीच विश्वास का रिश्ता बनता चला गया.
मुख्यमंत्री के रूप में डाक्टर रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ राज्य की नब्ज अपने हाथों में ले ली थी. बीमार और पिछड़े राज्य को उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता ठीक करना शुरू किया. अपने आठ वर्ष के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ को पिछड़े और बीमार राज्य से बाहर ला निकाला. आज छत्तीसगढ़ देश दुनिया के साथ दौडऩे के लिये तैयार है. लोकहितैषी मुख्यमंत्री के रूप में डॉक्टर रमनसिंह का जोर था वनवासी परिवारों की तरफ जिनके हिस्से में उपेक्षा और गुमनामी था. ये लोग छत्तीसगढ़ की पहचान है किन्तु स्वयं अपनी पहचान के लिये दशकों से तरसते रहे हैं. रमनसिंह ने इन्हें इनकी पहचान दिलायी और राज्य को गर्व. अलग अलग योजनाओं के माध्यम से इन्हें नये सिरे से जीने का अवसर मिला तो इनके बच्चों को ऊंची शिक्षा का. हर किस्म की परीक्षाओं में बच्चों ने ऐसी काबिलियत दिखायी कि छत्तीसगढ़ तो क्या पूरा देश अंचभित रह गया. यह सूरत बदलने की जो सर्जरी डाक्टर साहब ने वनवासी समाज के लिये की, वैसा ही कुछ कुछ समाज के किसानों, महिलाओं, मजदूरों और अन्य वर्गों के लिये किया. मुख्यमंत्री और सरकार के बीच आम आदमी की दूरी को पाट दिया गया. जनदर्शन के बहाने सरकार और मुख्यमंत्री गांव गांव जाने लगे, लोगों से बातें करते और उनकी सुनते. समस्याओंं का निपटारा स्थान पर ही कर देते और जो नहीं हो पाता। 
राज्य की दो करोड़ 55 लाख जनता अब भीख और भूख से लगभग पूरी तरह मुक्त हो चुकी है. छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली देश के लिये नजीर बन चुकी है. सर्वोच्च न्यायालय ने  एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार से यह पूछा कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा किए गए कम्प्यूटरीकरण को पूरे देश में एक मॉडल के रूप में क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए? छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दूसरे राज्यों ने भी अपने यहांं अमल में लाया है. हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर किसान को न्यूनतम ब्याज पर खेती के लिए ऋण सुविधा और उसकी मेहनत का पूरा दाम, हर घर को बिजली, हर परिवार को अनाज, हर बच्चे को स्कूल के साथ नि:शुल्क पाठयपुस्तक, हर मरीज को इलाज की अच्छी से अच्छी सुविधा देकर दशकों से उपेक्षित राज्य के नागरिकों को अपने राज्य होने का गौरव दिलाया. महिला शक्ति को एक नयी पहचान मिली और टोनही के नाम पर महिलाओं की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करने वालों को दंड देने की नीयत से कानून पारित किया गया लिहाजा राज्य में अब ऐसे मामलों में कमी देखी गयी है.
महिलाओं के प्रति रमन सरकार का रूख हमेशा से सकरात्मक रहा है और यही कारण है कि उन्हें आर्थिक रूप से संबल प्रदान करने के लिए अनेक योजनाओं का संचालन किया जा रहा है. उनके जीवन में खुशियां आए, इस बात की लगातार कोशिश हो रही है. छत्तीसगढ़ में टोनही (और स्थानों पर डायन या जादूगरनी का संबोधन) के नाम पर महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ होता था. इसके खिलाफ मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने कड़े कदम उठाते हुए देश में पहली बार टोनही के खिलाफ कानून अमल में लाने की पहल की। कानून के डर से अब महिलाओं के साथ कथित टोनही के नाम पर ना तो दुराचार होता है और न ही उनके साथ अत्याचार।
स्पष्ट नीति, साफ नीयत, संवेदनशील दृष्टिकोण और गतिशील नेतृत्व से ही किसी भी राज्य अथवा देश को विकास की राह पर कदम दर कदम कामयाबी मिलती है। मुख्यमंत्री डाक्टर रमनसिंह ने राज्य में सर्वधर्म समभााव का पूरा पूरा खयाल रखा. यही नहीं, राज्य के इतिहास पुरूषों को भी पूरा सम्मान दिया. इसकी मिसाल महान समाज सुधारक गुरू बाबा घासीदास की जन्मस्थली और तपोभूमि गिरौदपुरी में ऐतिहासिक कुतुबमीनार से भी ऊंचा जैतखाम का निर्माण कराया गया है. कुतुबमीनार से भी ऊंचा यह जैतखाम गुरू बाबा घासीदास के सत्य और अहिंसा के संदेश को दूर-दूर तक पहुंचाएगा। 
केन्द्र सरकार की विविध योजनाओं को लागू करने में भी मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने छत्तीसगढ़ को अगुवा बना दिया है। रमनसिंह की पहल का इतना असर हुआ कि स्वच्छ भारत अभियान में गांव गांव में लहर चल पड़ी। राजनांदगांव जिले छुरिया विकास खंड की एक गरीब महिला ने अपनी बकरियां बेचकर शौचालयों का निर्माण कराया। छत्तीसगढ़ की दान परम्परा की यह एक और कड़ी थीं। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान तेज गति से अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ रहा है। इसी तरह प्रधानमंत्री उज्जवला योजना को भी मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह ने जमीनी हकीकत में बदल दिया है. अब एक दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में महिलाओं की जिंदगी धुंआ धुंआ होने से बच रही है. 
प्रदेश के पूर्वोत्तर इलाके में रेल कॉरिडोर निर्माण के उनके प्रस्ताव को रेल मंत्रालय ने हाथों-हाथ लेकर अपनी हरी झंडी दे दी है। यह रेल कॉरिडोर छत्तीसगढ़ में यात्री सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ माल-परिवहन की दृष्टि से भी काफी उपयोगी होगा। छत्तीसगढ़ में उद्योग-धंधों को विस्तार मिले, इस दृष्टि से संसार भर के निवेशकों को राज्य में नये उद्योग लगाने के लिये आमंत्रित किया. निवेशकों ने छत्तीसगढ़ सरकार की कोशिशों की तारीफ की और निवेश को उत्सुक दिखे. राज्य सरकार चाहती है कि प्रदेश में नये उद्योग आयें लेकिन वे यह भी नहीं चाहती कि कोई भी निवेशक राज्य की प्राकृतिक संपदा को क्षति पहुंचाये. पर्यावरण की सुरक्षा के वादे के साथ निवेश की संभावना टटोलने वाला संभवत: छत्तीसगढ़ पहला राज्य होगा. एक स्वप्रदृष्टा मुख्यमंत्री के हाथों छत्तीसगढ़ सुघर आकार ले रहा है. 

मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस पर शोध पत्रिका ‘समागम’ का विशेष अंक


मित्रों,
आज एक नवम्बर है. हमारे अपने मध्यप्रदेश का 61वां स्थापना दिवस. आज से 60 वर्ष पूर्व 1956 को मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. तब इस प्रदेश की कोई एकजाई पहचान थी तो यह कि यह प्रदेश भौगोलिक रूप से देश का सबसे बड़ा प्रदेश है और भारत के नक्शे में ह्दयप्रदेश के रूप में चिंहित था. हमारे मध्यप्रदेश ने हौले हौले विकास के रास्ते पर कदम बढ़ाया. आज हम इस बात को गर्व से कह सकते हैं कि मध्यप्रदेश अनेक मामलों में देश के लिए नजीर बन चुका है. बस, एक दर्द है तो छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने का. मध्यप्रदेश के विभाजन का. हालांकि छत्तीसगढ़ के विकास को देखते हुए प्रसन्नता होती है. शोध पत्रिका ‘समागम’ मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के स्थापना दिवस को सेलिब्रेट कर रहा है.
शोध पत्रिका ‘समागम’ के नवीन अंक में 1956-2016 के बीच के बदलाव, चुनौतियां और सफलता को विशेषज्ञों ने अपनी अपनी दृष्टि के साथ लिखा है. अंक के पहले शोध पत्रिका ‘समागम’  के मुखपृष्ठ आपके अवलोकनार्थ एवं प्रतिक्रिया के लिए आप सबकी शुभकामनाओं और आभार के साथ.

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

अब नहीं होगी उनकी जिंदगी धुंआ-धुंआ...

अनामिका 
भिनसारे उठ जाना और स्नान-ध्यान कर परिवार के लिए रोटी पकाना पलकमती के लिए उतना कष्टसाध्य नहीं था जितना कि रोज-रोज धुंआ होती जिंदगी. चूल्हे पर भोजन पकाना उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का काम है लेकिन इस रोजमर्रा के काम में उसकी जिंदगी के एक-एक कर जिंदगी खत्म होती जा रही थी. चूल्हे से निकलता धुंआ उसके सांसों के साथ उसके जिस्म को खाया जा रहा था. मुसीबत तब और बढ़ जाती थी जब बारिश के दिनों में गीली लकडिय़ां सुलग नहीं पाती और पूरी ताकत लगाकर वह उन्हें सुलगाने की कोशिश करती. आज का दिन पलकमती के लिए किसी उत्सव से कम नहीं है. मुख्यमंत्री रमनसिंह उन्हें उज्जवला योजना के तहत गैस चूल्हा दे रहे हैं. पलकमती की पलकें चमकने लगी है तो इस कतार में और भी महिलायें हैं जिनकी जिंदगी पलकमती से अलग नहीं थी. उनके घरों में भी गैस चूल्हा आ गया है और उनकी जिंदगी धुंआ-धुंआ होने से बच जाएगी. एक-दो पांच नहीं बल्कि बड़ी संख्या में वो महिलाएं हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर थीं और जिनके लिए गैस कनेक्शन प्राप्त कर लेना सपना था. इन सभी के सपने सच करने के लिए राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री के वायदे को पूरा करने के लिए जुट गयी है. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से हजारों महिलाओं के रसोईघर उजाले से भर उठे हैं.
छत्तीसगढ़ राज्य के हजारों महिलाओं को वर्षों से चूल्हे के धुएं से पीडि़त होती आंखों को उज्ज्वला योजना से बेहद राहत मिली है। बरसात में जब लकडिय़ाँ गीली होती थी। तब तो घर परिवार के लिए महिलाओं को खाना बनाना बहुत मुश्किल होता था। चूल्हा फूंक-फूंक कर वे काफी परेशान हो जाती थी। गांव में योजना के पात्र परिवारों की महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन दिया गया है। इस योजना से एक तरफ जहाँ महिलाओं की सुविधा मिली है। वहीं दूसरी तरफ जंगल से लकडिय़ों की अवैध कटाई पर भी रोक लगेगी। केंद्र एवं राज्य सरकार ने अपनी महत्वपूर्ण योजना के जरिये ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की जिन्दगी में यह एक बेहतर तोहफा दिया। जब उज्ज्वल योजना के तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को गैस-चूल्हा और सिलेंडर प्रदान किया गया। गैस कनेक्शन मिलने के बाद अब उन्हें खाना बनाना बेहद आसान हो गया है। 
श्रीमती शांति मोहन साहू का अब अपनी सास और बेटी रिश्ता और अधिक मजबूत हो रहा है। छुरिया विकासखंड की ग्राम खुर्सीपार निवासी श्रीमती शांति साहू उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस चूल्हे से अब अपनी बेटी को उसकी मन-पसंद सब्जी और अपनी सास को उनका पसंदीदा खाना आधे घंटे में बनाकर दे देती है। इस गैस कनेक्शन के कारण अब शांति साहू की बेटी और सास जब चाहे तब गरमा-गरम खाना पका कर आसानी से खा लेते है। इससे खाना पकाने और पसंदीदा खाना पकाने में देरी के कारण परिवार में होने वाले मतभेद भी अब खत्म हो गये है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू की गई उज्ज्वला योजना ने ना केवल ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की गरीब महिलाओं को चूल्हे पर खाना बनाने की समस्याओं से मुक्ति दिलाई है। बल्कि पारिवारीक सदस्यों में आपसी प्रेम और सहयोग की भावना को भी मजबूत किया है. इसी तरह  मनरेगा श्रमिक श्रीमती लीलावती को मात्र 200 रूपये में भरा हुआ गैस सिलेण्डर चूल्हा और रेग्यूलेटर मिलने से वह खुशी एवं राहत महसूस रही है. ग्राम ओबरी निवासी  लीलावती कहती है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हम गरीब परिवार के महिलाओं को खाना बनाने के लिए गैसा सिलेण्डर और चूल्हा प्रदान कर हमारे जीवन में नई खुशियां ला दी है। पहले खाना बनाने के लिए जंगल से लकड़ी लाकर धुंऐ में परिवार के लिए भोजन बनाती थी। चूल्हे में आग सुलगाने से धुएं से पूरा रसोई घर भर जाता था भोजन बनाने में धुंऐ उनकी आंखो और मुंह में घुस जाती थी। जिससे उन्हें सांस लेने में परेशानियां का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब राज्य सरकार ने गरीब महिलाओं के पीड़ा को पहचाना और उन्हें 200 रूपये में भरा हुआ गैस सिलेण्डर चूल्हा एवं रेग्यूलेटर प्रदान कर उनकी पीड़ा को दूर किया है। 
घरेलू महिलाओं के साथ साथ उन महिलाओं को भी राहत मिली है जो आंगनवाड़ी में बच्चों के लिए भोजन बनाने का काम करती थीं. ऐसी कहानी है ग्राम छोटेकापसी के गायत्री महिला समूह की. इस समूह द्वारा आंगनबाडी केन्द्र पी.व्ही.130 को बच्चों के नाश्ता, भोजन बनाने की कठिनाईयों को देखते हुए आंगनबाड़ी गुणवत्ता उन्नयन अभियान से प्रेषित होकर आंगनबाड़ी केन्द्र के लिए एक गैस सिलेण्डर, गैस चूल्हा, बर्तन रखने के लिए रैक, सब्जी रखने के लिए रैक तथा अन्य किचन सामान दिया गया. गैस सिलेण्डर मिलने से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका को आग के धुएॅ से मुक्ति मिली है. समूह द्वारा गैस सिलेण्डर देने पर गांव के आंगनबाड़ी केन्द्रों के बच्चों के पालकों ने समूह के प्रति आभार व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि गायत्री महिला समूह गांव में कई सामाजिक काम में सक्रिय रहते है। समूह के सदस्य श्रीमती सीमा समद्दार, श्रीमती  संगीता पाल, श्रीमती लक्ष्मी राव, श्रीमती चैती नेताम, श्रीमती सावित्री यादव, श्रीमती निर्मला शील, श्रीमती रमा विश्वकर्मा, श्रीमती ज्योत्सना शील, श्रीमती संगीता घोष, श्रीमती रन्ना शील, श्रीमती सुप्रिया बाढ़ई आदि के उक्त कार्य की चर्चा क्षेत्र में आंगनबाड़ी केन्द्रों में स्वसहायता समूहों के माध्यम से प्रत्येक आंगनबाड़ी केन्द्रों में गैस कनेक्शन दिए जाने से आंगनबाड़ी केन्दोंं्र के बच्चों को समय पर गरम भोजन और रेडी टू ईट से बनाए जाने वाली व्यंजनेां को तैयार करने में सुविधा मिलेगी और स्वादिष्ट व्यंजनों से कुपोषण को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा। छत्तीसगढ़ में मातृशक्ति और शक्तिवान बनाने की दिशा में प्रधानमंत्री उज्जवला योजना कारगर पहल साबित हो रही है.

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

असत्य ही असत्य!


मनोज कुमार
इस बार जब मेरे मोहल्ले में रावण का कद नापा गया तो इस बार उसका कद कुछ फीट और बढ़ गया था। मैं पिछले कई सालों से देख रहा हूं कि मेरे मोहल्ले का रावण साल दर साल ऊंचा होता चला जा रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसा कि हमारा असत्य। हम मोबाइल के जरिये असत्य के प्रतीक हो गये हैं। हर पल झूठ, हर पल धोखा और न जाने क्या क्या। ऐसे में मेरे मोहल्ले का रावण कुछ फीट और ऊंचा हो जाए तो हमें एतराज नहीं करना चाहिए और न ही इतराना चाहिए कि हमने रावण का कद और ऊंचा का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते। कर दिया। एतराज इसलिये नहीं होना चाहिए कि असत्य के इस प्रतीक ने हमसे ऊंचा होने की हिमाकत नहीं की है और इतराना इस बात पर नहीं चाहिए कि हमने असत्य के इस प्रतीक को इतना ऊंचा कर दिया। सच तो यह है कि हमें विजयादशमी मनाने का कोई नैतिक हक है ही नहीं क्योंकि हम अपनी पीढ़ी को असत्य पर सत्य की जीत का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते।

परम्परागत विजयादषमी का पर्व मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुट गया है। हर साल हम खुद रावण बनाते हैं और उसे मारने का स्वांग भी खुद ही रच डालते हैं। परम्परा का निर्वाह करने के पीछे सत्य और असत्य की परख करना एक पैमाना हो सकता है किन्तु आज की स्थिति में क्या हम विजयादशमी मनाने की स्थिति में हैं? क्या वास्तव में हमने असत्य पर विजय पा ली है? सैंकड़ों साल पहले न जाने राम नाम के एक सात्विक ने रावण का वध किया था, सैकड़ों साल पहले न जाने एक युवा ने पिता के वचन की लाज रखने के लिये वनवास जाना मंजूर कर लिया था। रावण को मारने का हमारा साहस कब का मर चुका है और पिता के वचनों के खातिर वनवास जाने की बात कल्पना से परे है। जब भी वनवास जाने की बात होगी तो हम पिता को ही वनवास भेज देंगे। हमने इसके लिये वृद्धाश्रम बना दिया है। बात जहां तक रावण के मारने की है तो हम अपने आपको क्यों और कैसी सजा दें? आज हम अनैतिकता की पराकाष्ठा को छू रहे हैं। लोकलाज को त्याग दिया है और अराजकता के घोर अंधेरे में भटक रहे हैं। असत्य को असत्य से मारने की हरसंभव हम कोषिष कर रहे हैं। सत्य से हम दूर जा चुके हैं। जीवन की सुबह असत्य से होती है और इसी असत्य को बिछाकर सो जाते हैं।
विजयादषमी का अर्थ होता है विजय की दषमी और हम हर पल पराजित हो रहे हैं। हर कदम पर हमारी पराजय है। इस पराजय के काल में किसकी विजयादषमी और कौन मनाये विजयादशमी। विजयादशमी एक उत्सव की बेला है और यह बेला है असत्य पर सत्य की विजय की। सत्य से हम कोसों दूर हैं। सत्य का अर्थ सिर्फ असत्य बोलना और बोना है। असत्य का यह घनघोर अंधेरा, समाज के किसी कोने में नहीं है बल्कि हर कोना असत्य से काला काला हुआ जा रहा है। किसी समय अपनी मेहनत के बिना कमाने वाले धन को पाप की कमाई कहा जाता था और कोशिश होती थी कि बच्चों को इससे दूर रखा जाये। आज सारे पर्दे गिर गये हैं और बच्चों को पता है कि उसके ठाठ के रास्ते कहां से शुरू होता है। बचपन जब इस पाप की कमाई से बड़ा होता है तो सत्य कहां टिक पायेगा।



मुझे स्मरण हो आता है कि कभी अपने गांव में रामलीला किया करते थे। लगातार आठ नौ दिन की रामलीला। पूरा का पूरा आयोजन जुगाड़ से। हल्की ठंड में लोग अपने अपने घरों से बैठने की व्यवस्था कर आते। मजे लेते और अपने बच्चों को भी अगले बरस रामलीला मंे भागीदार बनने के लिये प्रोत्साहित करते। घर घर से मदद आती। इस रामलीला का मकसद हुआ करता सत्य का संदेश पहुंचाना। इसका मकसद हुआ करता था लोगों के भीतर छिपी प्रतिभा से समाज को अवगत कराना लेकिन अब रामलीला होती है तो पूरी साज-सज्जा के साथ। उस काल के राम आज हमारे बीच आ जाएं तो साज-सज्जा देखकर चौंक जाएं। यह बाजार है और बाजार की लीला से भला कौन अपरिचित है। यह रामलीला की लीला है जो संदेश देती है स्वयं के विजय हो जाने का। जो बताती है बाजार के रास्ते चलो, सत्य और असत्य के फेर में मत पड़ो। विजयादषमी का जो अर्थ बाजार सिखाता है, वही विजयादशमी है क्योंकि अब यह परम्परा का उत्सव नहीं, बदलते बाजार का फेस्टिवल है।

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