सोमवार, 19 दिसंबर 2016

पानीदार "अनुपम" के लिए भीगी आंखें


मनोज कुमार
मीठे पानी की तरह अनुपम। अपने नाम को सार्थकता प्रदान करते हुए अनुपम ने 68 वर्ष की जिंदगी में सुप्त और लुप्त होते समाज में पानी के प्रति चेतना जागृत करने की जो कोशिशें की, उन कोशिशों के बीच अनुपम मिश्र नाम का यह व्यक्तित्व हमारे साथ रहेगा, चलेगा और हमें दिशा देता रहेगा। तालाब आज भी खरे हैं उनके नाम के अनुरूप अनुपम कृति है लेकिन पानी के प्रति लोगों में जागरूकता की उनकी हर कोशिश अनुपम रही है। गीतकार भवानीप्रसाद मिश्र और सरला ने बहुत समझ कर उनका नाम अनुपम रखा होगा। यह बात भी सच है कि भवानीभाई गीतफरोश लिख कर अमर हो गए तो उनका चिराग पानीदार समाज देखने की चिंता में एक उम्र गुजार गया। यह कहना गैरवाजिब होगा कि अनुपम के बाद पानीदार समाज की चिंता करने वाले नहीं होंगे बल्कि यह कहना वाजिब होगा कि उन्होंने पानीदार समाज की चिंता करने के लिए एक बड़ी फौज तैयार कर रखी है। ये लोग समूहों में बंटे  हुए हैं। अपने अंचलों और अपने लोगों के बीच, समुदाय के बीच काम कर रहे हैं। इनकी चर्चा नहीं होती है लेकिन इनके काम इनकी आवाज और पहचान है। इनके कामों में अनुपम बसे हुए हैं। आखिर अनुपम तो अनुपम ही हैं ना।
मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि वह जिस तरह देश का ह्दय प्रदेश कहलाता है, वैसा ही उसे सपूत मिला अनुपम मिश्र के नाम का जिसने तालाबोंं और कुंओं से सूखते पानी को बचाने में न केवल लोगों को जगाया बल्कि समाज की आंखों में सूखते पानी को बचाने की कोशिश की। अनुपम का जन्म उसी वर्धा में हुआ जहां गांधी की यादें बसी हुई है और जिस शहर में गांधी की हवा, वहां अनुपम ही पैदा होते हैं, यह बात एक बार फिर साबित हो गई। सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलकर पानी के जतन के लिए जो कोशिश अनुपम ने किया, वह बेमिसाल है। ‘तालाब आज भी खरे हैं’ उनकी अनुपम कृति है और एक ऐसी रचना जो सदियों सदियों तक पानीदार समाज की धरोहर होगी। पानी बचाने और उसके जतन के लिए क्या किया जा सकता है कि चर्चा इस किताब के बिना नहीं हो पाएगी।  
  अनुपम मिश्र की छाप जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद् की है। पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यानाकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे हैं, जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली है, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवत: संभव नहीं हो पाया है। उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ रही है। इसी तरह उत्तराखण्ड और राजस्थान के लापोडिय़ा में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने अहम काम किया है।
यहां उनका लिखा स्मरण करना जरूरी हो जाता है जिसमें वे लिखते हैं कि - तालाब का लबालब भर जाना भी एक बड़ा उत्सव बन जाता। समाज के लिए इससे बड़ा और कौन सा प्रसंग होगा कि तालाब की अपरा चल निकलती है। भुज (कच्छ) के सबसे बड़े तालाब हमीरसर के घाट में बनी हाथी की एक मूर्ति अपरा चलने की सूचक है। जब जल इस मूर्ति को छू लेता तो पूरे शहर में खबर फैल जाती थी। शहर तालाब के घाटों पर आ जाता। कम पानी का इलाका इस घटना को एक त्योहार में बदल लेता। भुज के राजा घाट पर आते और पूरे शहर की उपस्थिति में तालाब की पूजा करते तथा पूरे भरे तालाब का आशीर्वाद लेकर लौटते। तालाब का पूरा भर जाना, सिर्फ एक घटना नहीं आनंद है, मंगल सूचक है, उत्सव है, महोत्सव है। वह प्रजा और राजा को घाट तक ले आता था। पानी की तस्करी? सारा इंतजाम हो जाए पर यदि पानी की तस्करी न रोकी जाए तो अच्छा खासा तालाब देखते-ही-देखते सूख जाता है। वर्षा में लबालब भरा, शरद में साफ-सुथरे नीले रंग में डूबा, शिशिर में शीतल हुआ, बसंत में झूमा और फिर ग्रीष्म में? तपता सूरज तालाब का सारा पानी खींच लेगा। शायद तालाब के प्रसंग में ही सूरज का एक विचित्र नाम ‘अंबु तस्कर’ रखा गया है। तस्कर हो सूरज जैसा और आगर यानी खजाना बिना पहरे के खुला पड़ा हो तो चोरी होने में क्या देरी? सभी को पहले से पता रहता था, फिर भी नगर भर में ढिंढोरा पिटता था। राजा की तरफ से वर्ष के अंतिम दिन, फाल्गुन कृष्ण चौदस को नगर के सबसे बड़े तालाब घड़सीसर पर ल्हास खेलने का बुलावा है। उस दिन राजा, उनका पूरा परिवार, दरबार, सेना और पूरी प्रजा कुदाल, फावड़े, तगाडिय़ाँ लेकर घड़सीसर पर जमा होती। राजा तालाब की मिट्टी काटकर पहली तगाड़ी भरता और उसे खुद उठाकर पाल पर डालता। बस गाजे- बाजे के साथ ल्हास शुरू। पूरी प्रजा का खाना-पीना दरबार की तरफ से होता। राजा और प्रजा सबके हाथ मिट्टी में सन जाते। राजा इतने तन्मय हो जाते कि उस दिन उनके कंधे से किसी का भी कंधा टकरा सकता था। जो दरबार में भी सुलभ नहीं, आज वही तालाब के दरवाजे पर मिट्टी ढो रहा है। राजा की सुरक्षा की व्यवस्था करने वाले उनके अंगरक्षक भी मिट्टी काट रहे हैं, मिट्टी डाल रहे हैं। उपेक्षा की इस आँधी में कई तालाब फिर भी खड़े हैं। देश भर में कोई आठ से दस लाख तालाब आज भी भर रहे हैं और वरुण देवता का प्रसाद सुपात्रों के साथ-साथ कुपात्रों में भी बाँट रहे हैं। उनकी मजबूत बनक इसका एक कारण है, पर एकमात्र कारण नहीं । तब तो मजबूत पत्थर के बने पुराने किले खंडहरों में नहीं बदलते। कई तरफ से टूट चुके समाज में तालाबों की स्मृति अभी भी शेष है। स्मृति की यह मजबूती पत्थर की मजबूती से ज्यादा मजबूत है।’
जल संसाधनों के संरक्षण व पर्यावरण चेतना के  योगदान के लिए अनुपम को 1996 में इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड व मध्यप्रदेश को उन्होंने अपनी कार्यस्थली बनाया। यहां उन्होंने कुओं, बावडिय़ों, तालाबों व बरसाती नदियों के संरक्षण की मुहिम को संबल प्रदान किया।  अनुपम मानते हैं कि वर्ष 2050 में जब भारत की जनसंख्या डेढ़ अरब का आंकड़ा पार चुकी होगी तो देश के सामने जल-संकट एक बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित होगा। लेकिन देश के नीति नियंता इस मुद्दे पर गंभीर नजऱ नहीं आते। उनका स्पष्ट मानना है कि पानी का कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसकी पर्याप्त उपलब्धता के लिए व्यापक स्तर पर मुहिम चलाने की आवश्यकता है। 
वे परंपरागत वर्षा जल-संरक्षण की पुरजोर वकालत करते हैं, ताकि वर्षपर्यंत पेयजल की उपलब्धता बनी रहे। वे इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, विकास एजेंसियों तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े समूहों की सक्रिय भागीदारी का आह्वान करते हैं। उनका मानना है कि स्वदेशी तकनीकों के बलबूते पर न केवल हम पेयजल जुटा सकते हैं बल्कि सिंचाई के साधन भी विकसित कर सकते हैं। वे कुओं को पेयजल व सिंचाई जल का महत्वपूर्ण स्रोत मानते हैं। इन कुओं की सफाई व पुनर्जीवन पर वह विशेष बल देते हैं। इसके साथ ही वे भूमि की जलसंग्रहण की परंपरागत तकनीक को बढ़ावा देने की बात करते हैं। वे राजनीतिक उदासीनता को दुखद बताते हुए कहते हैं कि इसके चलते देश में जल संरक्षण चेतना का समुचित विकास नहीं हो पाया।
उनकी स्पष्ट धारणा है कि जल संरक्षण प्रकृति व संस्कृति की रक्षा की अनिवार्य शर्त है। देश में भौगोलिक विषमता के चलते कुछ इलाकों में अकूत जल-संपदा विद्यमान है तो कुछ इलाकों में निपट सूखा है। इस असंतुलन को दूर करने की सख्त जरूरत है। इसमें सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति व जन समुदायों की सक्रिय भागीदारी की जरूरत है। उनके इस अभियान को सार्थक बनाने वाले तरुण भारत संघ के योगदान की दुनियाभर में चर्चा होती है जिसे इस योगदान के लिए ‘मैगसेसे पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया है।
उल्लेखनीय पहलू यह है कि अनुपम जल संरक्षण की स्वदेशी तकनीकों के पक्षधर रहे हैं। वे मानते हैं कि हमारे पुरखे सही मायनों में जल इंजीनियर थे लेकिन हम उनकी तकनीकों व अपनी विरासत का संरक्षण नहीं कर पाये। आज परंपरागत जल-स्रोत दम तोड़ रहे हैंं। आज वर्षा जल प्रबंधन-संरक्षण वक्त की दरकार है। उनकी मान्यता है कि पश्चिम जीवनशैली में पानी के दुरुपयोग के संस्कार समाहित हैं जिससे बचकर हम जल की बचत कर सकते हैं।
अनुपम पानी की तरह खरे थे। वे कहते थे कि ‘आज तो हमारी भाषा ही खारी हो चली है। जिन सरल, सजल शब्दों की धाराओं से वह मिठी बनती थी उन धाराओं को बिल्कुल नीरस, बनावटी, पर्यावरणीय, परिस्थितिक जैसे शब्दों से बाँधा जा रहा है। अपनी भाषा, अपने ही आंगन में विस्थापित हो रही है। वह अपने ही आंगन में पराई बन रही है।’ उनकी बातें बार-बार याद आती रहेंगी। यंू तो अनुपम हममें से किसी एक के लिए नहीं बल्कि हरेक के लिए एक अनुपम अनुभव की तरह हैं लेकिन मध्यप्रदेश वालों के लिए कुछ खास। हां, अनुपम की यादों को अनुपम बनाये रखने के लिए जरूरत है कि हम सब पानी के जतन के लिए उनके प्रयासों को आगे बढ़ायें और जाने की पानीदार समाज हो जाने में हमें क्या कुछ करना होगा। वे सरकारी तंत्र के साथ काम जरूर करते थे लेकिन सरकारों पर उनकी निर्भरता बिलकुल भी नहीं थी। हम भी उनसे सीख लें ताकि पानी की यह अनुपम बूंदें उनके होने का अहसास दिलाती रहे।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी



शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पूर्व विद्यार्थियों के सम्मेलन के अवसर विश्वविद्यालय के रजत जयंती पर केन्द्रित भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक जारी किया गया। गरिमामय समारोह में शोध पत्रिका ‘समागम’ का विमोचन वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र, कुलपति प्रो. बीके कुठियाला, जनसंचार विभाग के अध्यक्ष श्री संजय द्विवेदी एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) पवित्र श्रीवास्तव की उपस्थिति में हुआ। शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार हैं।  
उल्लेखनीय है कि शोध पत्रिका ‘समागम’ का दिसम्बर 2016 का अंक  माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के रजत जयंती वर्ष पर केन्द्रित है। इस अंक में विश्वविद्यालय के आरंभ से अब तक के सफर का रोचक संकलन किया गया है। कुलपति प्रो. बी.के. कुठियाला से बातचीत के साथ वरिष्ठ पत्रकार श्री कमल दीक्षित ने विश्वविद्यालय के आरंभ की पूरी कहानी का ब्यौरावार विवरण लिखा है। प्रो. श्रीकांत सिंह, श्री संजय दीक्षित, डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, डॉ. अविनाश वाजपेई, डॉ. संजीव गुप्ता, श्री अमरेन्द्र आर्य एवं श्री अशोक पांडे के लेख हैं जिसमें विश्वविद्यालय से जुड़े विविध प्रसंगों का स्मरण किया गया है। शोध पत्रिका ‘समागम’ के सम्पादक श्री मनोज कुमार ने ‘हस्तक्षेप’ कॉलम में विश्वविद्यालय की यात्रा की समीक्षा करते हुए कुछ सुझाव भी दिए हैं। शोध पत्रिका ‘समागम’ विश्वविद्यालय के पूर्व एवं वर्तमान विद्यार्थियों के साथ-साथ पत्रकारिता विश्वविद्यालय में रूचि रखने वालों के लिए दस्तावेज है। 

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

सत्य और अहिंसा का रास्ता बताने वाले गुरु घासीदासजी

-अनामिका
समाज अपने महापुरुषों का आरंभ से अनुयायी रहा है। सांसारिक जीवन जीते हुए मनुष्य को कई बार अपनी गलती का अहसास नहीं हो पाता है और वे गलत को ही सही मानते हैं। ऐसे में अपनी दिव्य दृष्टि से मानव की सोच बदलने वाला व्यक्तित्व को हमने महापुरुष कहकर बुलाया है। यह वही लोग हैं जो हमें मार्गदर्शन देते हैं। जीवन जीने का रास्ता बताते हैं और कहते हैं कि जीवन में किस तरह लोगों का उपकार किया जाए  और किस तरह इस मानव जीवन को सार्थक बनाया जाए। सभी महापुरुष सत्य और अहिंसा के रास्ते को जीवन का श्रेष्ठ रास्ता मानते हैं। इन्हीं महापुरुषों में एक हुए हैं गुरु घासीदास। छत्तीसगढ़ की धरा में अवतरित होने वाले इस महान व्यक्तित्व ने न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों का मार्गदर्शन किया अपितु पूरे संसार में गुरु घासीदास का नाम हो चला है। संत वाणी उनकी गूंज रही है। 
गुरु घासीदासजी  का जन्म 1756 ई. में छत्तीसगढ़ के रायपुर जि़ले में गिरौद नामक ग्राम में हुआ था। उनकी माता का नाम अमरौतिन तथा पिता का नाम मंहगूदास् था। युवावस्था में घासीदास का विवाह सिरपुर की सफुरा से हुआ। भंडापुरी आकर घासीदास सतनाम का उपदेश निरंतर देते थे। घासीदास की सत्य के प्रति अटूट आस्था की वजह से ही इन्होंने बचपन में कई चमत्कार दिखाए, जिसका लोगों पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव के चलते भारी संख्या में हज़ारों-लाखों लोग उनके अनुयायी हो गए। गुरु घासीदास ने समाज के लोगों को सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने न सिर्फ सत्य की आराधना कीए बल्कि समाज में नई जागृति पैदा की और अपनी तपस्या से प्राप्त ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानवता की सेवा के कार्य में किया। इसी प्रभाव के चलते लाखों लोग बाबा के अनुयायी हो गए। फिर इसी तरह छत्तीसगढ़ में ‘सतनाम पंथ’’ की स्थापना हुई। इस संप्रदाय के लोग उन्हें अवतारी पुरुष के रूप में मानते हैं। गुरु घासीदास के मुख्य रचनाओं में उनके सात वचन सतनाम पंथ के ‘‘सप्त सिद्धांत’’् के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए सतनाम पंथ का संस्थापक भी गुरु घासीदास को ही माना जाता है।
गुरु घासीदास जातियों में भेदभाव व समाज में भाईचारे के अभाव को देखकर बहुत दुखी थे। वे लगातार प्रयास करते रहे कि समाज को इससे मुक्ति दिलाई जाए। लेकिन उन्हें इसका कोई हल दिखाई नहीं देता था। वे सत्य की तलाश के लिए गिरौदपुरी के जंगल में छाता पहाड पर समाधि लगाये इस बीच गुरूघासीदास जी ने गिरौदपुरी में अपना आश्रम बनाया तथा सोनाखान के जंगलों में सत्य और ज्ञान की खोज के लिए लम्बी तपस्या भी की।
गुरु घासीदास जी ने समाज में व्याप्त जातिगत विषमताओं को नकारा। उन्होंने ब्राम्हणों के प्रभुत्व को नकारा और कई वर्णों में बांटने वाली जाति व्यवस्था का विरोध किया। उनका मानना था कि समाज में प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक रूप से समान हैसियत रखता है। गुरु घासीदास ने मूर्तियों की पूजा को वर्जित किया। वे मानते थे कि उच्च वर्ण के लोगों और मूर्ति पूजा में गहरा सम्बन्ध है।
गुरु घासीदास पशुओं से भी प्रेम करने की सीख देते थे। वे उन पर क्रूरतापूर्वक व्यवहार करने के खिलाफ थे। सतनाम पंथ के अनुसार खेती के लिए गायों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। गुरु घासीदास के संदेशों का समाज के पिछड़े समुदाय में गहरा असर पड़ा। सन् 1901 की जनगणना के अनुसार उस वक्त लगभग 4 लाख लोग सतनाम पंथ से जुड़ चुके थे और गुरू घासीदास के अनुयायी थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह पर भी गुरु घासीदास के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था। गुरु  घासीदास के संदेशों और उनकी जीवनी का प्रसार पंथी गीत व नृत्यों के जरिए भी व्यापक रूप से हुआ। यह छत्तीसगढ़ की प्रख्यात लोक विधा भी मानी जाती है।
इनके सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिसमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेधए वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना है। इनके द्वारा दिये गये उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ। सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण की आधारशिला स्थापित करने में ये सफल हुए और छत्तीसगढ़ में इनके द्वारा प्रवर्तित सतनाम पंथ के आज भी लाखों अनुयायी हैं। संत गुरु घासीदास ने समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध किया। उन्होंने समाज में व्याप्त छुआछूत की भावना के विरुद्ध ‘‘मनखे.मनखे एक समान’’ का संदेश दिया।
छत्तीसगढ़ राज्य में गुरु घासीदास की जयंती 18 दिसंबर से माह भर व्यापक उत्सव के रूप में समूचे राज्य में पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस उपलक्ष्य में गाँव-गाँव में मड़ई-मेले का आयोजन होता है। गुरु घासीदास का जीवन.दर्शन युगों तक मानवता का संदेश देता रहेगा। ये आधुनिक युग के सशक्त क्रान्तिदर्शी गुरु थे। इनका व्यक्तित्व ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जिसमें सत्य, अहिंसा, करुणा तथा जीवन का ध्येय उदात्त रुप से प्रकट है। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में ‘गुरु घासीदास सम्मान’ स्थापित किया है। गुरु घासीदास शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे अत: उनकी स्मृति में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर षहर मेंं गुरु घासीदास विष्वविद्यालय स्थापित है। राज्य सरकार ने उनके जन्मस्थली गिरौदपुरी में विशाल जैतखंभ का निर्माण कराया है जिसे देखने के लिए प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में लोग आते हैं।

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है. इन सालों में क्या कुछ घटा और किस तरह इस विश्वविद्यालय ने पत्रकारिता के बाद मीडिया शिक्षा को नया आयाम दिया, शोध की दिशा में एक दृष्टि के विकास में कितना योगदान रहा, आदि-अनादि मुद्दों को लेकर शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक दिसम्बर 2016

मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

दलित चेतना के प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव अम्बेडकर

मनोज कुमार
डॉ. अम्बेडर ने सामाजिक न्याय और सामाजिक विषमताओं के प्रति चेतना उद्वेलित कर एक दिषा देने की पहल सौ वर्ष से कुछ कम साल पहले ही कर दी थी। यह समय था जब भारत पराधीन था। वे यह मानते थे कि दलित समाज की स्वीकार्यता तब संभव होगी जब वह आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर स्वतंत्र होगा। इस सोच के साथ वे दलित समाज को सषक्त और सक्रिय बनाने में जुट गये। उनकी सक्रियता का ही परिणाम था कि भारतीय संविधान निर्मात्री सभा की प्रारूप समिति की अध्यक्षता करने का अवसर मिला और बाद में वे भारत के कानून मंत्री भी बनें। भारतीय संविधान का निर्माण करने वाले डॉ. अम्बेडकर आज न केवल दलित समाज के लिये बल्कि समूचे भारतीय समाज के प्रेरणास्रोत के रूप में याद किये जाते हैं।
डॉ. अम्बेडकर स्वयं उस वर्ग के थे, जो सामाजिक अन्याय, कुरूपताओं, विषमताओं और वंचनाओं के भुक्तभोगी थे, और इन्हीं विषमताओं ने उन्हें निरन्तर लड़ने और उन्हें दूर करने की शक्ति दी। अम्बेडकर जीवनभर सामाजिक समरसता की बात करते रहे। वे चाहते थे कि दलित वर्ग को समाज की मुख्यधारा में षामिल किया जाए और उन्हें भी वही अधिकार प्राप्त हों जो समाज की मुख्यधारा के लोगों को है। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि दलितों को समाज में समानता का अधिकार तभी मिल सकता है जब वे षिक्षित होंगे। विकास के लिये वे षिक्षा को पहली सीढ़ी मानते थे। वे अपने जीवनकाल में दलित समाज में षिक्षा के प्रसार के लिये अनेक स्तरों पर प्रयास किया। दलित समाज को जागरूक बनाने के लिये उन्होंने एक अखबार का प्रकाषन-सम्पादन भी किया। 1923 मंे ’बहिष्कृत भारत’ नाम से अखबार का प्रकाषन आरंभ किया। इस अखबार के माध्यम से अपने विचारों को आम आदमी तक पहुंचाने का प्रयास किया। डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि किताबें मनुष्य को विचारवान बनाती हैं। उन्होंने दलित समाज से अवगत कराने के लिये कुछ किताबों का लेखन भी किया जिसमें दी अनटेचेनल्स, हू आर दे, हू आर दी शुद्रा, दस स्पोक अम्बेडकर, इमेनसिपेशन आफ दी अनटेचेनल्स प्रमुख हैं।

डॉ. अम्बेडकर ने दलितों की स्थिति को सुधारने के लिये दलित स्त्रियों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना। 20 मार्च, 1927 को महद में आयी स्त्रियों को अम्बेडकर का सम्बोधन था, ”कभी मत सोचो कि तुम अछूत हो, साफ-सुथरे रहो जिस तरह के कपड़े सवर्ण स्त्रियां पहनती हैं, तुम भी पहनो। यह देखो कि वे साफ है यदि तुम्हारे पति शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। शिक्षा जितनी जरूरी पुरूषों के लिये है उतनी ही स्त्रियों के लिये भी आवश्यक है। यदि तुम लिखना-पढ़ना जान जाओ, तो बहुत उन्नति होगी। जैसी तुम होगी, वैसे ही तुम्हारे बच्चे बनेंगे। अम्बेडकर के इन प्रयासों का असर दलित समाज पर हुआ और उनमें बदलाव देखा जाने लगा। डॉ. अम्बेडकर जाति व्यवस्था के घोर विरोधी थे। जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिये उनका सुझाव था पुजारी एक जाति से नहीं होना चाहिये बल्कि इस पद को प्रजातांत्रिक बना दिया जाना चाहिये। उनका विश्वास था कि यह कदम जाति व्यवस्था को तोड़ देगा। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि जाति प्रथा को नष्ट करने का एक ही मार्ग है अन्तर्जातीय विवाह न कि सहभोज। खून का मिलना ही अपनेपन की भावना ला सकता है।

भारतीय संविधान में 15,16 और 17 अनुच्छेद में उन्होंने दलित विद्यार्थियों के लिये कई सिफारिषें की थीं। 1930 की एक समिति ’स्टारेट समिति’ में देखा जा सकता है। जहाँ सदस्य के रूप में उन्होंने सुझाव दिया था, ’दलित छात्रों के वजीफो की संख्या बढ़ाई जाये, उनके छात्रावासों की व्यवस्था की जाये, उन्हें कारखानों, रेलो की कार्यशालाओं और अन्य ट्रेनिंग के लिये वजीफे दिये जाये, विदेश में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिये वजीफा दिया जाये और सभी कार्यों की देखभाल के लिये एक अधिकारी नियुक्त किया जाये। यहीं पृष्ठभूमि आगे चल कर राज्य के सामाजिक अन्यायों को दूर करने के लिये एक हस्तक्षेप की भूमिका का आधार बने।

डॉ. अम्बेडकर ने दलित समाज के विकास के लिये जो पहल की है, आज उसका ही प्रभाव है कि केन्द्र और राज्य सरकारें दलित समाज के विकास के लिये आगे आकर कोषिषें कर रही हैं। हालांकि यह कोषिषें जरूरत के अनुरूप नहीं हैं। इसे विस्तार देने की जरूरत है। साथ ही राजनीति दलों की इस मानसिकता को भी बदलने की जरूरत है कि दलित समाज वोटबैंक है बल्कि इन्हें भी समाज की मुख्यधारा में षामिल कर संविधान के अनुरूप उन्नति का अवसर प्रदान किया जाए। दलित समाज में षिक्षा का विस्तार हो रहा है और यही षिक्षित दलित समाज स्वयं होकर अपना अधिकार लेगी, यह उम्मीद की जाना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर का सपना यही था कि दलित, दलित न रहकर मुख्यधारा में मिल हो जाएं।

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म


मनोज कुमार
समाज में जब कभी सहिष्णुता की चर्चा चलेगी तो सहिष्णुता के मुद्दे पर मीडिया का मकबूल चेहरा ही नुमाया होगा. मीडिया का जन्म सहिष्णुता की गोद में हुआ और वह सहिष्णुता की घुट्टी पीकर पला-बढ़ा. शायद यही कारण है कि जब समाज के चार स्तंभों का जिक्र होता है तो मीडिया को एक स्तंभ माना गया है. समाज को इस बात का इल्म था कि यह एक ऐसा माध्यम है जो कभी असहिष्णु हो नहीं सकता. मीडिया की सहिष्णुता का परिचय आप को हर पल मिलेगा. एक व्यवस्था का मारा हो या व्यवस्था जिसके हाथों में हो, वह सबसे पहले मीडिया के पास पहुंच कर अपनी बात रखता है. मीडिया ने अपने जन्म से कभी न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभायी लेकिन न्याय और अन्याय, सुविधा और सुरक्षा, समाज में शुचिता और देशभक्ति के लिए हमारे एक ऐसे पुल की भांति खड़ा रहा जो हमेशा से निर्विकार है, निरपेक्ष है और स्वार्थहीन. यह गुण किसी भी असहिष्णु व्यक्ति, संस्था या पेशे में नहीं होगा. इस मायने में मीडिया हर कसौटी पर खरा उतरता है और अपनी सहिष्णुता के गुण से ही अपनी पहचान बनाये रखता है.
मीडिया की सहिष्णुता के गुण को समझने के लिए थोड़े विस्तार की जरूरत होगी. पारम्परिक संचार माध्यमों से उन्नत होते हुए मीडिया आज हथेलियों पर आ चुका है. मीडिया की उन्नति समाज के किसी और पेशे के लिए ईष्या का कारण हो सकती है क्योंकि तकनीक के विकास के साथ आज तक कोई ऐसी चिकित्सा पद्धति नहीं बन सकी जो चलते-फिरते आपका दर्द दूर कर सके, कोई तकनीक नहीं कि कोई इंजीनियर हथेली पर रखे यंत्र से निर्माण कार्य को अंजाम दे सके या कोई ऐसी तकनीक पुलिस व्यवस्था के पास नहीं आ पायी है जिससे अपराध पर नियंत्रण पाया जा सके. तकनीक तो न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के पास भी नहीं है कि वह हथेली पर रखे यंत्र से अपने कार्य और निर्णय को समाज तक पहुंचा सके. केवल एकमात्र मीडिया है जो हथेली पर रखे यंत्र से समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने में कामयाब होता है. यह मीडिया की ताकत है कि वह उन सूचनाओं को नेपथ्य में ढकेल देता है जिससे समाज की शुचिता बाधित होती है. यह मीडिया ही है जो लाखों किलोमीर बसे लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है और उनके अच्छे कामों से समाज को परिचित कराता है. शासन और सरकार लाखों योजनाएं बना लें लेकिन मीडिया के बिना समाज से जुड़ जाने की कोई विधा सरकार के पास नहीं है. जनहित की सूचनाओं को लोगों तक तटस्थ भाव से पहुंचाने का काम मीडिया ही करता है. 
समाज के चौथे स्तंभ का दर्जा पाये मीडिया को अपनी जवाबदारी का अहसास है इसलिए वह पूरी सहिष्णुता के साथ अपने दायित्व की पूर्ति के लिए हमेशा तत्पर रहता है. मीडिया सहिष्णुता के कई आयाम हैं. प्राकृतिक आपदाओं के समय जब लोग डरे-सहमे अपने घरों में संशय में जी रहे होते हैं तब मीडिया अपनी जान की परवाह किए बिना तूफान हो या प्लेग, भूकंप हो जलजला, घटनास्थल पर पहुंच कर समाज को राहत देने की कोशिश करता है. अपनी जान की परवाह किए बिना, अपने परिवार से बेखबर समाज की चिंता में मीडिया उन खबरों पर हाथ डालने से भी नहीं चूकता जिनसे रसूखदारों को बेनकाब करना होता है. यह सब संभव हो पाता है कि मीडिया के सहिष्णुता के कारण. अपवाद को छोड़ दें तो मीडिया कभी अतिरेक में नहीं बहता. वह संयमित रहता है लेकिन मीडिया का रोमांच उसकी सक्रियता का सबब है. 
निरपेक्ष और नि:स्वार्थ भाव से समाज और देश के लिए जुटे रहने वाला मीडिया हमेशा सवालों से घिरा रहता है. समाज का मीडिया पर इतना अधिक विश्वास है कि वह मीडिया की मानवीय भूल के कारण भी होने वाली एक गलती को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. समाज की अपेक्षाएं इस कठिन समय में अगर किसी से शेष रह गयी है तो वह मीडिया है. उसे एक डाक्टर से इस बात की अपेक्षा नहीं है कि जो डाक्टर इस बात की शपथ लेता है कि वह नि:स्वार्थ रूप से समाज की भलाई के लिए कार्य करेगा लेकिन आए दिन आने वाली खबरें बताती है कि क्या हो रहा है. एक इंजीनियर से भी वह निराश है. अनेक दुर्घटनाओं का कारण उसके द्वारा बनायी गई घटिया पुल और पुलिया है जो अचानक टूट जाती हैं जिससे अकारण अनेक लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं. नेता और प्रशासन भी समाज के लिए बहुत उत्साह का भाव पैदा नहीं करते हैं. अक्सर वे चर्चा में इन्हें अपनी विश्वास की प्राथमिकता में नहीं रखते हैं किन्तु जब बात मीडिया की आती है तो सर्वाधिक शिकायतें मीडिया से होती है. सहिष्णु मीडिया के लिए समाज का यह भाव स्थायी पूंजी है. जब जब मीडिया की आलोचना होती है, समाज जब तब उस पर अविश्वास का भाव जताता है, वह असहिष्णु नहीं होता है और ना ही अपनी आलोचना से घबराता है. समाज की आलोचना ही मीडिया की असली ताकत है. इस आलोचना के कारण ही उसे बेहतर करने के लिए ऊर्जा मिलती है. समाज जब मीडिया पर अविश्वास जताता है तो मीडिया फोरम पर इसकी चर्चा होती है और चिंता की जाती है कि हम अपनी इस कमजोरी को कैसे दूर करें. समाज ऊपर उल्लेखित प्रोफेशन पर भी अविश्वास जताता है लेकिन ये लोग इसकी फ्रिक नहीं करते हैं और ना ही किसी फोरम में इस पर चर्चा करते दिखते हैं.
इनकी बेपरवाही का मूल कारण इनके भीतर की असहिष्णुता है और इस असहिष्णुता के मूल में है साधन जबकि मीडिया के पास सहिष्णुता इसलिए है कि उसके पास न्यूनतम साधन हैं किन्तु साध्य एक ही है देश और समाज कल्याण. इस बात का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस बात का आंकड़ा जारी करते हैं कि अपने कार्य को अंजाम देते हुए हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में मीडिया साथी मौत के घाट उतार दिए जाते हैं. यह अलग तरह का पैशन है जहां मौत डराती नहीं है बल्कि साहस जगाती है और दूसरे साथी उस काम को करने के लिए जुट जाते हैं. यह सब कुछ संभव होता है मीडिया की सहिष्णुता से. असहिष्णु होकर आप बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं. आपका लक्ष्य बदल जाता है लेकिन मीडिया के पास रिवेंज का कोई रास्ता नहीं होता है. वह गलत को गलत कहने में नहीं चूकता है तो सही की तारीफ करने में भी वह गुरेज नहीं करता है. सहिष्णुता मीडिया का गुण-धर्म है और अपने इसी गुण-धर्म की वजह से वह समाज का चौथा स्तंभ कहलाता है. आखिर में अपने अनुभव के साथ मैं यह कह सकता हूं कि इस समाज में दो तरह के सैनिक हैं एक वह जो सीमा पर खड़े होकर देश की रक्षा करता है तो दूसरा मीडिया जो समाज के बीच रहकर समाज में शुचिता बनाये रखने का कार्य करता है. दोनों सैनिकों का गुण है सहिष्णुता. 

शनिवार, 12 नवंबर 2016

इतना सन्नाटा क्यों है भाई?

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मनोज कुमार
चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है. कोई कुछ बोल ही नहीं रहा है. बयानवीर भी कहीं दुबक गए हैं. छिप गए हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सबकी ऐसी बोलती बंद की है कि किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि क्या बोलें? बात बात पर मोदी को कटघरे में खड़ा करने वाले कांग्रेस और आप के नेताओं की बोली तो खुल ही नहीं रही है, भाजपा के लोगों में भी खामोशी हैरान कर रही है. जिन लोगों को लगता है कि मोदी का कालेधन की समाप्ति के खिलाफ यह बड़ा फैसला है तो उन्हें खुलकर साथ खड़े होना चाहिए था और जिन लोगों को लगता है कि मोदी का यह फैसला देशहित में नहीं है तो उन्हें भी अपनी बात तर्क के साथ रखना चाहिए था. लेकिन कोई खुलकर नहीं बोल रहा है. इसका मतलब तो यह हुआ कि मोदी जी का फैसला देशहित में है और सत्ता पक्ष और विपक्ष, खामोशी के साथ मोदीजी के लिए खड़ा हो गया है. यदि ऐसा है तो यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत है.
हो सकता है कि सदमे से उबरने के बाद लोगों के मुंह खुले. अभी तो सदमा लगा है. चुनाव में कालेधन के उपयोग की बात अब किसी से छिपी नहीं है. राजनीतिक दलों को बेहिसाब चंदा देने वाले उद्योगपति अपने ढंग से रीति-नीति बनवाते रहे हैं. ये फैसले कई बार आम आदमी के हक के खिलाफ होता था लेकिन अब शायद ऐसा नहीं हो पायेगा. जो राजनेता बहुत छोटा सा बयान देकर या बचकर बोल रहे हैं, उनकी पेशानी पर भी बल पड़ रहा है. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि दो साल बाद होने वाले चुनाव में उनकी पार्टी को चंदा कौन देगा? वे किसके पैसों से चुनाव लड़ेंगे? उन्हें तो यह भी समझ नहीं आ रहा है कि जिन धनाड्यों के सहारे राजनेताओं का लाव-लश्कर चलता था, अब कौन इसका बोझ उठाएगा? सवालों की फेहरिस्त लम्बी है और जवाब किसी के पास नहीं है. वे गलती से भी मोदी के ताजा फैसले का विरोध करते हैं तो आम आदमी उनके खिलाफ हो जाएगा. आम आदमी को नाराज करने के बजाय थोड़ा समय गुजर जाने के बाद शायद राजनेताओं की चुप्पी टूटे.
विपक्ष ना भी बोले तो उसकी मजबूरी समझ आती है लेकिन सत्तापक्ष की खामोशी लोगों के लिए सवालिया बना हुआ है. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि उनका नेता मोदी इतना बड़ा काम कर गया लेकिन इस फैसले को सिरमाथे पर लेने के बजाय, वे खामोश हैं. चुनिंदा बयानों के अलावा मीडिया में रोज एक-दूसरे को लताड़ते, एक दूसरे को गिरयाते और उनकी कमियां निकालते नेता खामोश हैं. उनकी खामोशी बताती है कि खुद मोदी जी की पार्टी के लोग इस फैसले से नाखुश हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो ये लोग आगे बढक़र आम आदमी के बीच जाते और उन्हें समझाते कि मोदी जी के इस फैसले का समाज पर कितना व्यापक असर पडऩे वाला है. अभी जो दिख रहा है, उसमें अकेले केन्द्र सरकार ने ही मोर्चा सम्हाल रखा है. एक बड़े और देशहित फैसले के साथ ऐसा निराशाजनक बर्ताव कुछ अच्छा संदेश नहीं देता है. भाजपा के भीतर खलबली से इंकार नहीं किया जा सकता है. आगे क्या होगा और इसके परिणाम किस रूप में सामने आएंगे, अभी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन तय है कि यह खामोशी, तूफान के पहले की खामोशी है. इस समय हवा में एक ही सवाल तैर रहा है इतना सन्नाटा क्यों है भाई?
  

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...