छात्रसंघ का प्रत्यक्ष चुनाव जरूरी
मनोज कुमार
छात्रसंघ चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा को रोकने के नाम पर मध्यप्रदेष में कई सालों से अप्रत्यक्ष चुनाव कराये जाने की परम्परा आरंभ हो गयी थी। इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जाएगा लेकिन यह कहना भी अनुचित होगा कि प्रत्यक्ष चुनाव से हिंसा को बढ़ावा मिलता है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिषांे के मद्देनजर हाल ही में आये फैसले को लेकर अलग अलग राय जाहिर की जा रही है। जो लोग इस फैसले के खिलाफ खड़े हैं, उन्हें लगता है कि चुनाव में छात्र हिंसा बढ़ेगी लेकिन जो लोग फैसले के पक्ष में हैं, उन्हें यह बातें बेकार की लगती है। दोनों ही पक्ष अपनी अपनी जगह सही हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष चुनाव अनिवार्य है। प्रत्यक्ष चुनाव का विरोध करने वालों को यह जान लेना चाहिए कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव प्रत्यक्ष होते हैं और इसमें भी हिंसा होती है तो क्या इन्हें भी स्थगित किया जाना चाहिए? षायद नहीं। तब छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष कराये जाने को लेकर विरोध उचित नहीं जान पड़ता है।
प्रदेष में छात्रसंघ बेजान से पड़े हुए हैं। इन संघों के पदाधिकारी आमतौर पर उन छात्रों को बनाया जाता है जो मेरिटोरियस हो। इन छात्रों का अकादमिक इतिहास तो बेहतर होता है किन्तु मैदानी रूप् से जूझने में ये कमजोर होते हैं और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। छात्रसंघों को राजनीति की प्राथमिक पाठषाला कहना बेहतर होगा। देष के जाने माने नेता छात्रसंघों में ही तपकर आये हैं। पंचायत अथवा नगर निगम चुनाव के मैदान में उतरने से पहले छात्रसंघ के चुनाव में इन्हें विद्यार्थियांे और कॉलेज की समस्या जानने और समझने का अवसर मिलता है। इन समस्याआंे को सुलझाने में भी अनुभव होता है और आगे चलकर सक्रिय राजनीति में आने वाले विद्यार्थी कामयाब होते हैं। आज के राजनीतिक हालात को देखकर यह कहा जाता है कि राजनीति में रखा क्या है लेकिन जो लोग राजनीति में हैं, उनसे पूछकर देखिये कि उन्हें किस किस तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। देष की जनता को समझना, समस्याओं को समझना, उन्हें सुलझाना और जनता को षांत रखने की कला की सीख यही छात्रसंघ देते हैं।
हमारे समाज में जनआंदोलन आहिस्ता आहिस्ता समाप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब छात्रसंघ के कद्दावर नेता न केवल कॉलेज की समस्याआंें के लिये सड़कों पर उतर आते थे बल्कि कई बार जनससमयाओं को लेकर भी वे आगे रहते थे। कई सालों से यह तेवर खत्म हो गया है। इसी तरह श्रमिक आंदोलन भी लगभग गुमसुम सा है। अपने अधिकारों को लेकर सरकार और षासन से टकरा जाने की वह ताकत अब कमजोर पड़ती दिख रही है। हालात इतने खराब होते चले जा रहे हैं कि कथा-कहानियों से लेकर फिल्म और टेलीविजन से भी श्रमिक आंदोलन के मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। फिल्म दीवार और काला पत्थर के बाद ही षायद कोई फिल्म इन सब्जेक्ट्स को लेकर बनी है। अब फिल्मों में डॉन और माफिया ने अपनी जगह बना ली है जबकि श्रमिक आंदोलन एक सामाजिक मुद्दा है जो अब पहुंच के बाहर है।
इन मुद्दों को लेकर जब नजर घूमाते हैं तो सहसा अहसास होता है कि छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष रूप् से नहीं कराये गये तो छात्रसंघ की प्रभावी ताकत का लोप हो जाएगा। किसी भी समाज से युवावर्ग की ताकत कम होना या खत्म होना, उस समाज की सक्रियता पर सवालिया निषान लगाता है। छात्रसंघ युवावर्ग की ताकत ही नहीं, बल्कि उसकी सोच और उसके सपने भी हैं जो आगे चलकर समाज को, देष को दिषा देते हैं। अब यह सोच लेना कि छात्रसंघों के प्रत्यक्ष चुनाव से हिंसा बढ़ती है, मुझे लगता है कि यह सरासर बेमानी है बिलकुल वैसे ही जैसे कि दुघर्टनाओं के कारण कोई सोचे की गाड़ी चलना बंद हो जाए। छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष होना चाहिए और जो समस्यायें दिख रही हैं, उसका उपाय ढूंढना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में कागजी नेता मिलेंगे जो जमीनी नहीं होंगे। किसी लोकतांत्रिक देष को चलाने के लिये लोकतांत्रिक प्रणाली ही कारगर होती है और इस नाते छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष ही कराये जाने चाहिए।
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
मुद्दा
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
बापू तेरे नाम
न बाप बड़ा न भैया…सबसे बड़ा रुपया…बापू मत रोना
मनोज कुमार
गुजरात से अभी अभी देशबन्धु के ईपेपर से ताजा खबर मिली है कि किसी समय बल्कि कुछ दिनों पहले तक शराबबंदी के लिये सराहे जाने वाले बापू की धरती पर अभी तो शराब की कुछ बूंदें गिराने की अनुमति मिल गयी है। इस अनुमति के साथ ही राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों में प्रसन्नता का माहौल है। शराब पीने की छूट देने के बाद सैलानियों का आना बढ़ गया है। जाहिर है कि राज्य सरकार का खजाना भी भरेगा लेकिन क्या किसी ने चिंता करने की कोशिश की है कि गुजरात की ख्याति गांधीजी से है और इस ख्याति को चार चांद लगाते हैं यहां की शराबबंदी। और जब वहां शराब पीने की छूट पहले चुनिंदा जगहों पर मिलेगी, फिर उसका विस्तार होगा और देखते ही देखते बापू की पुण्यभूमि भी शराब में डूब जाएगी। हालांकि मुझे नहीं मालूम की राज्य में किसी तरह की शराब पीने की कोई छूट पहले से है। जितना मैं जानता हूं और जितना जान पाया हूं तो गुजरात को लेकर एक खुशनुमा भाव मन में भर आता है। अपने तीस साल के पत्रकारीय जीवन में मैंने खबरों में पाया कि गुजरात हर आफत से खुद को बाहर निकालने की ताकत रखता है। प्राकृतिक आपदा और गुजरात का चोली-दामन का साथ है। भूकंप, बाढ़ और न जाने ऐसे कितने आपदाओं ने गुजरात को एक बार नहीं कई कई बार लगभग बर्बाद कर दिया लेकिन गुजरात टूटा नहीं, हारा नहीं और न ही भागने की कोशिश की बल्कि वह पूरी ताकत से उठा और हर बार वह फिर दौड़ पड़ा विकास के साथ। साम्प्रदायिक दंगों ने गुजरात की एक अलहदा तस्वीर पेश की। इस मामले के सच और झूठ में हम न भी पड़ें तो यह बात मानना पड़ेगी कि इस आफत से भी गुजरात टूटा नहीं। आरोपों में कितना दम है, यह तो मैं नहीं जानता और न इस विवाद को तूल देना चाहता हूं कि किसकी कितनी गलती रही लेकिन गुजरात की जमीन पर आज भी सभी सम्प्रदाय के लोग जीवनयापन कर रहे हैं। किसी एक खासवर्ग में डर होगा तो उसके कारण भी अलग अलग होंगे। अलग अलग किस्म की आपदाओं से उबर कर गुजरात कैसे खड़ा हो जाता है, यह सवाल आपको अचंभे में डाल सकता है। रेलयात्रा के दौरान और शायद गुजरात में आये भीषण भूकंप के बाद एक अगुजराती ने टिप्पणी की थी। तब उसकी इस बात को मैंने गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन बाद में जब मीमांसा किया तो लगा कि बात में दम है। इससे आगे एक पत्रकार और मीडिया अध्येता होने के नाते मामले की पड़ताल की तो पता चला कि यह साहस उस व्यक्ति की है जिसे समूची दुनिया गांधीजी कहती है। साबरमती के आश्रम में प्रतिदिन गाये जाने वाले भजन ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम…गुजरात की शक्ति है, उसका आत्मबल है और इसी आत्मबल के चलते गुजरात शराब से दूर रहा। अब जब शराब को पर्यटन से जोड़ कर देखा जा रहा है तो निश्चित रूप से इसका कारण राजस्व है और दुनिया में न तो बाप बड़ा होता है और न भइया लेकिन सबसे बड़ा होता है रुपया…। गांधीजी की आत्मा बिलख रही होगी लेकिन जब गांधीजी ने बात की थी तो वह स्वदेशी का मामला था, अब तो हम ग्लोबलाइजेशन की बातें कर रहे हैंऔर उसी में जी रहे हैं…बस अब इंतजार करना होगा कि बापू के आश्रम से कहीं ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम की आवाज आना कब बंद होती है…
रविवार, 17 जनवरी 2010
सोचो
मैं लोकतंत्र हूं...
मनोज कुमार
मैं लोकतंत्र हूं...किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं
पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक हर कुर्सी बिकाऊ हैबोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?
किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंमहंगाई बढ़ गई है इन दिनों जनाब
अभी अभी साढ़े छह लाख में बिकी है...सरपंच की कुर्सी…।
अभी कुछ और बाकि है मोल तो लगाओ जनाब…
किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंपंच की कुर्सी की कीमत
पचपन हजार लग चुकी हैदेश दांव में लगाने की
ताकत हो तोप्रधानमंत्री की कुर्सी खरीद सकते हो जनाब…
बोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?
किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंप्रेमचंद का अलगू चौधरी
कहीं खो गया हैऔर बापू का ग्राम स्वराज
यहीं कहीं भटक गया हैकिसी को मिल जाएं तो जरूर बतानातब
तक मैं फिर बोली लगाता हूं जनाब…
मैं लोकतंत्र हूं...
किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं
(आद। भवानीप्रसाद मिश्र से क्षमायाचना के साथ)
गाफिल है पूरी दुनिया
मनोज कुमार
महात्मा गांधी का सपना था कि गांव की सत्ता ग्रामीणों के हाथों में हो. इसी सपने को आधार बनाकर स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना करते हुए पंचायतीराज व्यवस्था आरंभ की थी. मध्यप्रदेश ने तब सबसे आगे आकर पंचायतीराज व्यवस्था कायम किया. चारों तरफ मध्यप्रदेश की सराहना हुई. समय के साथ पंचायती राज व्यवस्था परवान चढ़ी. पंचायतों में महिलाओं के लिये पचास प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था भी की गई. ऐसा लग रहा था मानो गांधी के ग्राम स्वराज का सपना सच हो गया है किन्तु पिछले दिनों राज्य के इंदौर से मात्र पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव रंगवासा में पंचायती राज व्यवस्था के साथ लोकतंत्र का जो मजाक उड़ाया गया, वह दहला देने वाला है.
जनसत्ता नईदिल्ली और नईदुनिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक गांव के मंदिर के विकास के नाम पर सरपंच का पद छह लाख पचपन हजार में गांव के ही कैलाश चौधरी ने खरीद लिया और पंचों के पद इक्कीस हजार से पचपन हजार तक बेच दिये गये. इन पदों के लिये खुलेआम नीलामी की गई. रकम तय हो जाने के बाद अन्य दावेदारों ने अपने अपने नाम वापस ले लिये और कहना न होगा कि कैलाश चौधरी निर्विरोध निर्वाचित हो गये. इसके बाद उन्होंने वायदे के मुताबिक कैलाश चौधरी ने रकम मंदिर में जमा करा दी. इन खबरों में यह भी लिखा है कि इसके पहले नगर पंचायत के पार्षद पद की नीलामी भी हो चुकी है. अफसोस तो तब होता है जब विधायक जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति कहने लगे कि यह कोई मुद्दा नहीं है कि गांव में लोकतंत्र के किस तरह से विजय हुई है. किसी का नाम वापस लेने के लिये कोई जोर जबर्दस्ती नही की गई। यह टिप्पणी जनसत्ता में इसी विधानसभा क्षेत्र के विधायक सत्यनारायण पटेल का है. इस पूरी नीलामी प्रक्रिया को विकास से जोड़ कर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि विकास के लिये नीलामी जरूरी है तो अब हर पद के लिये नीलामी की व्यवस्था कर दी जानी चाहिए. क्यों आम आदमी के खून पसीने की कमाई पर चुनाव कराने की कवायद की जाये. रंगवासा ने न केवल अपने गांव पर बल्कि समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया है.
यह खबर मामूली खबर नहीं है. इस खबर की संवेदनशीलता को समझना होगा. मुझे हैरानी इस बात पर थी कि जब इस खबर के बारे में करीब पचीस लोगों से बात की गई तो इनमें से एक भी इस खबर से वाकिफ नहीं था. ये वो लोग हैं जो किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े हुए हैं. इसका अर्थ मैंने अपने स्तर पर यह लगा लिया कि मीडिया गाफिल है. मुझे दुख इस बात का हुआ कि क्या अखबारों में छप रही खबरों को हम इतने हल्के ढंग से लेने लगे हैं या खबरों में अब वह गंभीरता ही नहीं बची? मामला चाहे जो हो लेकिन एक बात तो साफ है कि अब हम चिंतन नहीं करते हैं, इस तरह की खबरें हमें निराश नहीं करती हैं और न ही हमें उद्वेलित. अब सब कुछ बहुत सतही ढंग से लेते हैं और ले रहे हैं. इससे भी ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि जिन लोगों के कंधे पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाये रखने की जवाबदारी है, वे भी खामोश हैं. सत्ताधारी दल तो कुछ कह नहीं रहा है, विपक्ष भी मौन साधे हुए है. गाफिल समाज अगर होशमंद हो जाए तो शायद कल की बात और होगी. इसी उम्मीद के साथ.
बुधवार, 13 जनवरी 2010
अच्छी खबर
मनोज कुमार
भारतीय स्त्रियों के चरित्र पर विश्वास जताते हुए अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि भारतीय नारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। वे अपने खिलाफ बलात्कार का मामला यूंह ी दर्ज नहीं कराती हैं। अदालत ने यह टिप्पणी कर भारतीय स्त्री के गौरव को द्विगुणित किया है और कहना न होगा कि इससे भारतीय समाज का सिर गर्व से ऊंचा उठा है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को सनातन काल से सर्वोपरि माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में तब स ेअब तक पूजा जाता रहा है। यकिनन समय के बदलाव के साथ सोच में परिवर्तन आया है और समाज स्त्रियों को नयी भूमिका में देख रहा है। कल तक घर की चहारदीवारी के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने वाली स्त्री आज आफिसों में अपने दायित्वों को निभा रही हैं। उनकी नयी जिम्मेदारियों के साथ उनके पहनावे में भी परिवर्तन आया है और महज पहनावा को ही यह मान लिया गया कि स्त्री बदल गयी है। उसके चरित्र पर अकारण लांछन लगाया जाने लगा। एक मामला पत्रकारिता की एक छात्रा के साथ पिछले दिनों सामने आया था। यह सब कुछ कुछ मानसिक रूप से बीमार लोगों की करतूतें हैं। स्त्री आज भी अपनी उसी भूमिका में है और इसका विस्तार ही माना जाना चाहिए।बाजार के नये रूप ने जरूर स्त्री को वस्तु बनाकर प्रदर्शन किया है और इसमें कुछ हद तक स्त्री भी दोषी हैं। उनके लिये पूरा आसमान खुला हुआ है और तब उन्हें किसी किस्म के समझौते की जरूरत नहीं होना चाहिए। हमारा मानना है कि यह सबकुछ अकारण नहीं है बल्कि इसके पीछे भी कोई मामला होगा। स्त्रियों के साथ ज्यादती पहले भी हो रही थी और अब भी हो रही है, इस बात से भला कौन इंकार करेगा। स्त्री को दबाने और कुचलने का सर्वाधिक पीड़ादायक यातना है तो उसके साथ बलात्कार करना। इसमें भी आरोपी बच निकलते थे लेकिन अदालत ने यह कह कर स्त्री का सम्मान बढ़ाया है कि उसने कह दिया, यह ीपर्याप्त है। हम सभी को उम्मीद करना चाहिए कि भारतीय स्त्री भी अपने पक्ष में दिये गये इस सम्मान को कायम रखने में आगे रहेगी और पापी पुरूष अब अपने दानवी रूपप र काबू पा सकेंगे। नये साल में भारतीय स्त्रियों को न केवल अदालत की बल्कि पूरे समाज की ओर से शुभकामनाएं हैं।
शनिवार, 2 जनवरी 2010
मुद्दा
तो फिरोजाबाद की चूड़ियां ढूंढ़ते रह जाओगे
मनोज कुमार
आज से कोई 30-35 बरस पहले मेरी बड़ी भाभी पायल को महिलाओं के लिये बेड़ियां कहती थी। तब मुझे इस बात का अंदाज नहीं था कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर उनकी उस बात का अहसास अब होगा। आज जब महिलाओं को चूड़ियों से परे होते हुए, माथे से बिंदिया लगाने से बचते हुए और मांग में सिंदूर भरने से परहेज करते हुए देखता हुआ तो मेरी भाभी मुझे याद आ जाती हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो कल तक नारी के श्रृंगार की वस्तुएं थी, जिसमें स्त्रियां अपना सौभाग्य देखती थीं, आज उनके लिये बंधन हो गया है। उनके लुक को खराब करने लगा है। इस मुद्दे को विस्तार के साथ देखना होगा। यहां मैं जिस चूड़ी, बिंदी और सिंदूर की बात कर रहा हूं, उसका सीधा वास्ता तो स्त्रियों से है किन्तु इससे भी बड़ा वास्ता बाजार से है। फिरोजाबाद का नाम भारत के कोने कोने में जाना जाता है तो इसलिये कि वहां किसम किसम की चूड़ियां बनती हैं। षायद बिंदी और सिंदूर बनाने का काम भी होता होगा। इस बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम है। जब स्त्रियां श्रृंगार की इन महत्वपूर्ण वस्तुओं का त्याग करना आरंभ कर देंगी तो फिरोजाबाद के कारखाने मर जाएंगे। एक दो नहींे सैकड़ों परिवारों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। भारत में जिस तरह कई प्राचीन लघु और गृह उद्योग खत्म होते रहे हैं, वैसे ही एक और लघु और गृह उद्योग खामोषी से मर जाएगा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह पावरलूम खत्म होते जा रहे हैं, जिस तरह भोपाल का जरी उद्योग सांसें गिन रहा है। आधुनिक मषीनें कपड़े बुन रही हैं और महंगे लेदर के पर्स।क्या चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से स्त्री आजाद हो जाएगी? क्या वह श्रृंगार की इन वस्तुओं का उपयोग नहीं करेगी तो उसकी षान पर कोई फर्क पड़ जाएगा, षायद नहीं। इसे और विस्तार से देखना होगा कि किस तरह हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को चैपट करने के लिये खेल खेला जा रहा है। भारतीय स्त्रियों के साथ ही भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं को भी भेंट चढ़ाया जा रहा है। बदलते समय के साथ स्त्री की दुनिया को विस्तार मिला है। कल तक चैके चूल्हे में सिमटी स्त्रियां आज हमकदम बन कर चल रही हैं। हालांकि मेरी मान्यता यह है कि स्त्री कभी पराधीन थी ही नहीं। भारतीय षास्त्रों का अध्ययन करेें तो सहज ही पता चल जाता है कि कोई भी घर स्त्री के बिना अधूरा है। समय की जरूरत के अनुरूप भारतीय स्त्री ने अपना चेहरा प्रस्तुत किया है। कभी वह अपने दुष्मनों का संहार करने के लिये दुर्गा बन जाती है तो कभी ममता लुटाने के लिये वह गंगा बनकर निस्वार्थ बहती रहती है। अपने घर और परिवार की उन्नति के लिये स्त्री ही लक्ष्मी का रूप् है। इसके बावजूद यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि स्त्रियों का दमन हुआ है। उन्हें हाषिये पर रखने की कोषिष की गई है। ऐसे में स्त्री को स्वतंत्रता मिली है, मिल रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन क्या किसी संस्कृति और परम्परा की बलि चढ़ाकर? किसी बाजार की षर्त को मानकर? इसका जवाब षायद नहीं में होगा लेकिन यहां मौन रह कर बाजार की हर षर्त को मंजूर किया जा रहा है।कथित विकास ने हमारे सोचने की ताकत को कम कर दिया है और भीड़ में हम खोने के लिये मजबूर हो गये हैं। हम यह भी नहीं सोच पा रहे हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह रास्ता हमारे लिये ही बंद हो रहा है। चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागकर हम अपने आपको आधुनिक बन जाने का सुख तो पा रहे हैं लेकिन इन छोटी छोटी चीजों को छोड़ कर जाने कितने पेट को भूखे सोने के लिये मजबूर कर रहे हैं, इसका आपको अंदाज है? षायद नहीं। दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के लिये क्या हमारा चरित्र जिम्मेदार नहीं है? देष की अर्थव्यवस्था को चैपट करने में हमारा योगदान नहीं है? फौरीतौर पर बात भले ही समझ न आये क्योंकि इस समय हम आधुनिकता की आंधी की गिरफ्त में हैं लेकिन इसे समझने की जरूरत होगी।मानव श्रम को हम कैसे बेकार और बेबस बना रहे हैं, इस संदर्भ में स्टेषन पर खड़े कुलियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। कल तक ये कुली हमारा बोझ उठाकर अपने कंधों पर रखे बोझ को कम कर लेते थे आज वे अपने ही बोझ तले दब रहे हैं। बड़ी नामी कंपनियों ने आधुनिक किस्म के सूटकेस तैयार कर दिये। अब खुद ही कुली बन जाओं और अपना सामान खुद खींचते हुए मंजिल तय कर लो। जिस स्टेषन पर कुलियों की संख्या कभी दस और बीस हुआ करती थी, वहां अब गिने चुने ही मिलेंगे क्योंकि यात्रियों की सूरत में कुलियों की तादात इतनी बढ़ गयी है कि अब वास्तविक कुलियों की जरूरत नहीं रही। कल्पना कीजिये कि आपके बोझ को कंधे पर ढोते इन कुलियों के घरों के चैके-चूल्हे जलते थे और अब इनके दिल। वक्त अभी भी है। बस समझने की जरूरत है कि चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से आधुनिकता नहीं आयेगी और न खुद के सूटकेस खींचने से अमीरी। सोच बदलने की जरूरत है और यह बदली हुई सोच कई परिवारों को दो वक्त का खाना दे पायेगी। संस्कृति और परम्परा की रक्षा भी हम कर पाएंगे लेकिन तभी जब हमारी सोच बदल जाए।
रविवार, 29 नवंबर 2009
गैस त्रासदी
मनोज कुमार
पच्चीस साल पहले भोपाल को मिक गैस ने लील लिया था और इसी के साथ ही भोपाल में छिपी संवेदना का ज्वार उभर कर आया था। मदद करने के लिये हजारों हाथ आगे आये थे। तब किसी ने किसी का मजहब नहीं पूछा। तब सबके सामने एक ही सवाल था कि जिंदगी कैसे बचायें? समय गुजरता गया और संवेदनाओं का ज्वार उतरता गया। संवेदनाआंे का स्वर कहीं दब गया और उस पर राजनीति करने वाले भारी पड़ने लगे। गैस पीड़ितों की सेवा के नाम पर राजनीति होने लगी। थोड़ी निर्दयता के साथ ही सही, लेकिन पिछले पन्ने पलटें तो पाएंगे कि एक समय तो गैस पीड़ितों को देखने के लिये, उन्हें सहारा देने के लिये राजनीतिक दल भी आगे थे। समय गुजरने के साथ साथ सबने हाथ पीछे कर लिये। इस बरस अचानक गैस पीड़ितों का मामला गर्मा रहा है। दर्द का दरिया फिर बहने लगा है। यह अचानक इतनी चिंता क्यों? मीडिया भी एकाएक सक्रिय हो गया है। कहने वाले कह सकते हैं कि त्रासदी की उम्र पच्चीस साल होने के कारण एक बार फिर मामले को खंगाला जा रहा है लेकिन भोपाल के बरक्श देखें तो इस बार साथ साथ नगरीय निकायों के चुनाव होने हैं और कदाचित ये लोग ही अपने पार्षद और महापौर का फैसला करेंगे। चिंता की इस वजह को सिरे से नकारा नहीं जा सकता है।अच्छा होता कि गैस पीड़ितों की चिंता 2-3 दिसम्बर को न होकर उस समय तक चले जब तक कि उनके साथ न्याय न हो जाये। उन्हें इलाज मिले और जीने का हक। केवल बातों में ही चिंता उनकी तकलीफों को कम नहीं कर पायेगी।
रविवार, 8 नवंबर 2009
media
अपनों को याद करें
हिन्दी पत्रकारिता में मध्यप्रदेश का योगदान शायद सबसे ज्यादा है। राजेन्द्र माथुर मील के पत्थर साबित हुए हैं। हाल ही में दिवंगत प्रभाष जोशी के साथ ही वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक, इंडिया टुडे के सम्पादक जगदीश उपासने, विष्णु खरे एवं अनेक नाम हैं जिन्हें मध्यप्रदेश ने कभी याद नहीं किया। राज्य शासन ने पिछले दिनों सक्रिय पहल कर इस दिशा में कुछ काम किया है किन्तु वह भी सम्मान और पुरस्कार बांटने तक। हम युवा पत्रकार साथियों ने राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की है और इसी के बैनर तले प्रयास आरंभ किया गया है कि देश भर में फैले मध्यप्रदेश के पत्रकारों की जीवनी एकत्र कर उसका दस्तावेजीकरण किया जा सके। मध्यप्रदेश से जुड़े पत्रकारों से अनुरोध है िकवे जिन्हें जानते हैं और जिनके उनसे सम्पर्क हैं, उनकी अधिकतम जानकारी हमें भिजवाने का कष्ट करें। साथ में उनकी तस्वीर भी। आपके इस सहयोग से हमारे प्रयासों को सार्थकता मिल सकेगी।htpp://mpreporete।blogspot.com मनोज कुमारसंयोजकराजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान, भोपाल
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...