गुरुवार, 20 मई 2010

मीडिया में पहला काम


राजेन्द्र माथुर पर बनी पहली फिल्म का इंदौर में प्रदर्शन
अब प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, एसपी सिंह और शरद जोशी पर बनेगी फिल्में

इंदौर। हिन्दी के आज़ाद भारत के चुनिन्दा संपादकों पर अब वृतचित्रों की श्रंखला बनाई जाएगी. इस कड़ी में पहली फिल्म राजेंद्र माथुर पर बन चुकी है. इसके बाद अब प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, सुरेन्द्र प्रताप सिंह और शरद जोशी पर फ़िल्में अगले तीन साल में पूरी हो जाएँगी. वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने यह बीड़ा उठाया है। इन फिल्मों पर फिलहाल शोध कार्य शुरू हो चुका है। प्रिंट, रेडियो और टीवी-तीनो विधाओं में काम कर चुके राजेश बादल के मुताबिक राजेंद्र माथुर पर बनी फिल्म का पहला शो इंदौर में हाल ही में हुआ। इंदौर से ही राजेंद्र माथुर ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी। वे इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे थे. इंदौर में उनके नाम पर बने राजेंद्र माथुर ऑडिटोरियम में इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ. इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक और विचारक उपस्थित थे। श्री बादल के मुताबिक इस फिल्म को बनाने में तीन साल लग गए। माथुरजी का निधन १९९१ में हुआ था और उस समय टीवी ने उद्योग की शक्ल देश में नहीं ली थी. इसलिए उनके वीडियो को जुटाने में काफी समय लगा। आधे घंटे की इस फिल्म में राजेंद्र माथुर के दुर्लभ वीडियो के अलावा ऊनके रेडियो साक्षात्कारों के हिस्से और ३६ साल में लिखे उनके चुनिन्दा लेखों के हिस्से शामिल किये गए हैं। इसके अलावा राजेंद्र माथुर की पत्रकारिता को समझने वाले और उनके करीब रहे लोगों से बातचीत भी इसमें दिखाई गयी हैं। राजेश बादल के मुताबिक यह फिल्म नए पत्रकारों के लिए बेहद उपयोगी तो है ही, उन लोगों के लिए भी काम की है, जिन्होंने न तो राजेंद्र माथुर को देखा है, न उनके साथ काम किया और न उनको पढ़ा है। श्री बादल ने बताया कि इस फिल्म के शो देश भर में हिंदी मीडिया से जुड़े लोगों के लिए किये जायेंगे. मीडिया संस्थानों और कॉलेजों में भी फिल्म दिखाई जायेगी, जहाँ पत्रकारिता पढाई जाती है. राजेंद्र माथुर पहले नई दुनिया इंदौर के प्रधान संपादक और फिर राष्ट्रीय दैनिक नवभारत टाइम्स के संपादक रहे। वैसे वे अंग्रेजी के प्रोफेसर थे लेकिन हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान अदभुत है। उनके लेखन के कई संकलन प्रकाशित हो चुके है। राजेश बादल ने बताया कि इस क्रम में अन्य पत्रकारों और संपादकों पर फिल्मों कि शूटिंग भी जल्द शुरू हो जाएगी। श्री बादल ने अपील की कि जिसके पास भी सुरेन्द्र प्रताप सिंह, प्रभाष जोशी, शरद जोशी और राहुल बारपुते के फोटो, वीडियो या अन्य दस्तावेज हों कृपया उन्हें प्रदान कर सहयोग करें। श्री बादल राजेंद्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ करीब बारह साल तक साथ काम कर चुके हैं और पिछले ३४ साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। कैसा रहा राजेंद्र माथुर का जीवन :- राजेन्द्र माथुर प्रखर पत्रकार और सहज इंसान थे. १९९१ में उनके निधन के बाद हिन्दी पत्रकारिता में बड़ी रिक्तता आई है। लेकिन उनके जीवन-मूल्यों और पत्रकारिता को आदर्श मानने वालों की संख्या भी बहुत है। वे आदर्श महापुरुषों की पूजा करवाने के बजाय ऊनके गुणों और विचारों को अपनाने के पक्षधर थे। उन्होंने विदेशी आक्रमण, अकाल, भूकम्प की परिस्थितियों में भी निराशा भरी टिप्पणियाँ नहीं लिखीं। ऐसे नाजुक अवसरों पर भी समाज में आत्मवि·ाास पैदा करने का प्रयोग उन्होंने सदा किया। अगस्त १९६३ में उन्होंने लिखा था-'हमारे राष्ट्रीय जीवन में दो बुराइयाँ घर कर गई हैं जिन्होंने हमें सदियों से एक जाहिल देश बना रखा है। पहली तो अकर्मण्यता, नीतिहीनता और संकल्पहीनता को जायज ठहराने की बुराई, दूसरी पाखंड की बीमारी, वचन और कर्म के बीच गहरी दरार की बुराई।' वे सभ्यता को अक्षुण्ण रखने के लिए जंगली जिंदादिली को जरूरी मानते थे। उनके लेखन में राष्ट्रवाद कूट-कूटकर भरा है, लेकिन भाषा, धर्म, क्षेत्र के आधार वाली कट्टरता कहीं नहीं मिलती। वास्तव में माथुर साहब समाज के हर व्यक्ति की गरिमा की रक्षा के पक्षधर थे। उनके लेखन में बेहद पैनापन था, लेकिन किसी तरह का पूर्वाग्रह और दुर्भावना का अंश कभी देखने को नहीं मिला। पं. नेहरू को आदर्श मानने के साथ वे स्वयं सच्चे अर्थों में 'डेमोक्रेट' संपादक थे। राजेन्द्र माथुरजी के ६० के दशक (१९६३ से १९६९) तक के लेखों का महत्व इक्कीसवीं शताब्दी में और बढ़ गया है। उन्होंने सदा ही जिम्मेदार पत्रकारिता पर बल दिया है। यही कारण है कि ऊनके लेखन में कभी जहर की बूँद नहीं दिखाई दी। वे ऋषि की तरह समाज और राजनीति का आकलन करते रहे।

बुधवार, 19 मई 2010

छत्तीसगढ़ की परम्परा और संस्कृति की संवाहक
फिल्म मया के बरखा 21 को पर्दे पर उतरेगी

छत्तीसगढ़ के रूचिवान सिने दर्शकों के लिये के लिये 21 मई 2010 का दिन खास महत्व का होगा। इस दिन अपने लोगों की अपनी बोली में भव्य फीचर फिल्म मया के बरखा रिलीज होगी। मया के बरखा छत्तीसगढ़ की गुरतुर बोली की पहली फिल्म नहीं है लेकिन पहली नहीं होने के बाद भी यह फिल्म कई मायनों में अलग ही महत्व रखती है। इस फिल्म में मुंबई के नामचीन कलाकारों का दखल है तो हबीब तनवीर की टीम के सहज और माटी से जुड़े किरदारों का सहज अभिनय भी। अपनी माटी और अपने लोगों की इस फिल्म का नाम मया के बरखा है। यह पूरी तरह फ्यूजन नहीं है किन्तु देशज की सुगंध दूर दूर तक छत्तीसगढ़ की माटी को महकाएगी। दुर्गा मीडिया साफ्टवेयर के बेनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन आशीष श्रीवास्तव ने किया है। इस फिल्म में प्राकृतिक रूप से धनवान छत्तीसगढ़ की परम्पराएं, संस्कृति, नदियों, कल कारखानों और उन सभी दृश्यों को जीवंत करने की कोशिश की है जिसके बूते छत्तीसगढ़ पूरी दुनिया में अलग से पहचाना जाता है। छत्तीसगढ़ की माटी में अनेक प्रेम कहानियां दर्ज हैं और यह दर्ज है कि प्रेम के बैरी भी। कुछ इसी कथानक को लेकर फिल्म की पटकथा बुनी गई है। आशीष युवा निर्देशक हैं और वे नये जमाने के छत्तीसगढ़ की पसंद नापसंद को खूब समझते हैं। उनकी इस समझ का परिचय फिल्म के हर हिस्से में दर्शकों को देखने को मिलेगा। जिंदगी के सच और प्रेम के महत्व को रेखांकित करती इस फिल्म के गीतों की धूम छत्तीसगढ़ के आंचल में बसे गांव गांव में गूंज रही है। फिल्म का संगीत कर्णप्रिय है। संगीतकार मॉरीस लाजरस उभरते हुए संगीतकार हैं। छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे संस्कारों और संस्कृति के अनुरूप गीतों को संगीतबद्व किया है। वे हबीब तनवीर जैसे महान रंगकर्मी के सानिध्य में रहे इसलिये भी उनके संगीत में ठेठ देशज का अनुभव होता है। छत्तीसगढ़ी में इस फिल्म की पटकथा का रूपांतरण लेखक एवं पत्रकार मनोज कुमार ने किया है। छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे मनोज कुमार का रिश्ता छत्तीसगढ़ के साथ वैसा ही है जैसा कि एक मां और बेटेे का। भाषा, बोली, संस्कार और परम्पराओं के साथ बदलते दौर के युवाओं के मन की बात को उन्हीं की भावनाओ के अनुरूप् लिखा गया है। छत्तीसगढ़ के ही प्रतिभाशाली गीतकार गुरूीमत कांबो ने गीतों को पिरोया है और इन गीतों को नुपूर गडकरी, महुआ चटर्जी, अखिलेश तिवारी, महादेव हिरवानी एवं अमित चक्रवर्ती ने अपनी सुमधुर आवाज दी है। मया के बरखा छत्तीसगढ़ की उस परम्परा की फिल्म है जब कभी कहि देबे संदेश बनी थी। पांच-छह दशक से भी ज्यादा पुरानी इस फिल्म में भी मुंबई और स्थानीय कलाकारों की भूमिका थी। कहना न होगा कि जिस तरह से मया के बरखा को युवा दर्शकों के साथ समूचे छत्तीसगढ़ की जनता का प्यार और रिसपांस मिल रहा है, उससे यह फिल्म एक नया रिकार्ड बनायेगी।

गुरुवार, 13 मई 2010

मीडिया

अब खबर क्यों प्रभावी नहीं हैं?


-मनोज कुमार

इन दिनों अखबारों में इस बात को लेकर बड़ी बैचेनी है कि उनकी खबरों पर कोई एक्शन-रिएक्शन क्यों नहीं होता है। खबरें छप जाती हैं और उसे सरकार और शासन के स्तर पर कभी कोई नोटिस नहीं लिया जाता है। फौरीतौर पर यह महज रूटीन का मामला दिखता है किन्तु ऐसा है नहीं। आखिर जिन अखबारों ने कभी अंग्रेज शासकों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर बेबस कर दिया, आज उन्हीं अखबारों की खबरों पर कोई प्रभाव या असर क्यों नहीं होता है। बात बहुत गंभीर है और इसे पत्रकारिता की विश्वसनीयता के साथ जोड़कर देखा जाए तो इस मुद्दे को विस्तार मिल सकता है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता के क्या मायने हैं, यह पहले समझना होगा। विश्वसनीयता का सीधा अर्थ है छपी खबरों की पड़ताल करना और पीड़ित को न्याय दिलाना। यहां इस बात पर बहस हो सकती है कि पीड़ित को न्याय दिलाने से बात नहीं बनती है बल्कि दोषी पक्ष के खिलाफ भी प्रभावी कार्यवाही होना चाहिए। इस मामले में मेरी राय थोड़ी अलग है। जब पीड़ित को न्याय मिलेगा तो संबंधित पर असर न हो, यह तो संभव ही नहीं है। यूं भी हमारी मंशा पीड़ित को न्याय दिलाने की और व्यवस्था को दुरूस्त करने की है न कि किसी न्यायाधीश की तरह फैसला सुनाने की। एक बार फिर हम मुद्दे की ओर लौटते है कि आखिर खबरों पर कार्यवाही क्यों नहीं होती है। दरअसल इसके पीछे यही कारण है कि हम पत्रकार के बजाय जज की भूमिका में आ जाते हैं और जज बनना हमारा काम नहीं है। हमारा काम तो समाज और व्यवस्था के बीच सेतु का है। जो देखा, जो समझा और वस्तुस्थिति समाज के सामने रख दी लेकिन इन दिनों खबरांें में विचार भी प्रस्तुत किया जा रहा है जो खबरों के तेवर को कम ही नहीं करता बल्कि कई बार अविश्वसनीय बना देता है। दोषी पक्ष इसका लाभ लेकर पत्रकार पर यह आरोप मढ़ देता है कि खबर निरपेक्ष होकर नहीं लिखी गयी बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति को लक्ष्य रखकर खबर लिखी गयी। ऐसे में किसी खबर के इम्पेक्ट की बात करना व्यर्थ है।

मुझे यह बात भी लम्बे समय से चुभ रही है कि हम प्रतिदिन ज्यादा नहीं तो दस अलग किस्म की खबरें देते हैं जो खोजी प्रवृत्ति की होती है। इस मान से पूरे एक महीने की तुलना की जाए तो एक माह में दो सौ से ज्यादा खबरें होती हैं। अब इनमें कोई पांच दस खबरों पर कार्यवाही हो जाती है तो हम बड़े गर्व के साथ इम्पेक्ट लिखकर छापते हैं कि हमारी फलां खबर पर कार्यवाही हुई। सवाल यह है कि औसतन दो सौ खबरों में दस खबर पर कार्यवाही हुई और शेष बची खबर पर कोई एक्शन रिएक्शन नहीं हुआ तो इसे हम पत्रकारिता की सफलता मानें या अपनी विफलता। वैसे भी हम खबरों की खोज इसलिये ही करते हैं कि सरकार और शासन उन खबरों की तहकीकात करें और कार्यवाही कर व्यवस्था को सुदृढ़ करें। ऐसे में किसी खबर पर कार्यवाही से इतराना मुझे निजी तौर पर ठीक नहीं लगता है। पत्रकारिता को इस मुद्दे पर विवेचना करने की जरूरत है।

जहां तक मुझे याद है कि अस्सी के दशक में अखबार में खबर छपवाने के लिये विशेष प्रयास करना होता था और खबर छप गयी तो उसका विशेष महत्व होता था। चार लाइनों की खबरों को अखबार में किस तरह खोजबीन कर रिपोर्ट बनाना और रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद सरकार कार्यवाही के लिये मजबूर हो, इस तरह प्रस्तुत करना। छत्तीसगढ़ के पत्थलगांव क्षेत्र में टमाटर का उत्पादन इतना होता था कि खरीददार नहीं मिल पाते थे और किसान शाम होते होते दो रुपये में साठ किलो टमाटर बेचने के लिये मजबूर हो जाते थे। इस आशय की एक चार लाइन की खबर अखबार में छपी में । देशबन्धु में छपी इस खबर की पड़ताल कर रिपोर्ट प्रकाशित की गई। यह उदाहरण उस समय का है जब अर्जुनसिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह ने तत्काल कार्यवाही करते हुए वहां सॉस बनाने वाली फैक्ट्री लगाने के आदेश दिये। यह उदाहरण किसी अखबार या पत्रकार के गुणगान का नहीं है बल्कि यह बताने की कोशिश है कि सामाजिक सरोकार की खबरों पर कार्यवाही करने के लिये सरकार को किस तरह विवश होना पड़ता था। आज मामला उलटा ही है। खबरें बेहतर लिखी जा रही हैं। खोजबीन भी हो रही है, तथ्य और आंकड़ें भी प्रभावी हैं लेकिन लक्ष्य करके लिखी जाने के कारण खबरों का असर नहीं हो पा रहा है। एक व्यक्ति, एक संस्था और एक ही नेचर की खबरों के चलते पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। हमें इस बात का चिंतन करना चाहिए कि खबरों को कोई क्यों गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

मंगलवार, 11 मई 2010

ऐसे में कैसे बचेगी लाडली?
मनोज कूमार
रूढ़िवादी भारतीय समाज की पहली पसंद हमेशा से बेटा रहा है। बेटियों को दूसरे दर्जे पर रखा गया। यही नहीं, पालन पोषण में भी उनके साथ भेदभाव जगजाहिर है। बेटियों को जन्म से माने के पहले मार देने की निर्मम खबरें अब बासी हो गयी है। बेटियों के साथ इस सौतेलेपन का दुष्परिणाम यह हुआ कि आहिस्ता आहिस्ता बेटियों की तादाद घटती गयी। यह स्थिति किसी भी समाज अथवा देश के लिये ठीक नहीं कहा जा सकता और भारत के स्तर पर तो यह बेहद चिंता का विषय रहा है। इस स्थिति से उबरने के लिये सरकार और समाज लगातार सक्रिय है। पिछले एक दशक में इस दिशा में खासा प्रयास किया गया। इन प्रयासों में करोड़ों के बजट का प्रावधान किया गया नतीजतन परिणाम सौ प्रतिशत भले ही न रहा हो लेकिन एक कदम तो आगे बढ़ा गया। कहना न होगा कि इन प्रयासों का परिणाम आने वाले समय में और भी व्यापक स्तर पर देखने को मिलता किन्तु एक साजिश के साथ न केवल लाड़ली पर खतरा मंडरा रहा है, सरकारी और निजी प्रयासों पर पानी फेरा जा रहा है बल्कि समाज में अनैतिकता को खामोशी के साथ बढ़ाया जा रहा है।
टेलीविजन के पर्दे पर और समाचार पत्रों में सेक्स को लेकर अनेक किस्म के विज्ञापन दिये जा रहे हैं। हर कंपनी के अपने दावे हैं और इन दावों की सच्चाई केवल इतनी है कि इससे सेक्स सफल हो या न हो, समाज में अनैतिकता बढ़ रही है। मुझे और मेरी उम्र्र के उन तमाम लोगों को याद होगा कि सामाजिक बंधन के चलते महिलायें माहवारी के समय रसोई से दूर रहती थीं। इन दिनांे में वे अलग-थलग बैठी रहती थीं। बचपन और किशोरावस्था का मन उनके इस अकेलेपन के कारण को समझने की कोशिश में लगा रहता था। जवाब नहीं मिलता था। थोड़ा डर और थोड़े लिहाज के बाद मन में आ रहे सवालों को झटक दिया जाता था। समय बदला और इस बदले समय में सारे मायने बदल गये। अब यह सवाल पांच साल की नन्हीं उम्र के बच्चों को जिज्ञासु नहीं बनाते हैं बल्कि वे इस उम्र में इस मामले के शिक्षक बन गये हैं। उन्हें महिलाओं की निजता के बारे में पूरा ज्ञान है। यह ज्ञान उन्हें परिवार से नहीं मिला। टेलीविजन के पर्दे पर कंडेाम और गर्भनिरोधक दवाआंें के सेक्सी विज्ञापनांे ने उन्हें बता दिया है कि उनकी निजता अब निजता नहीं रही। अभी कुछ समय से बाजार में प्रीगनेंसी टेस्ट करने की एक साधारण विधि आ गयी है जिसमें किसी युवती या स्त्री को किसी से कुछ बताने अथवा किसी अस्पताल में जाने की कोई जरूरत नहीं रह गयी है। वह मनचाहे ढंग से जांच कर सकती है। इसी तरह बाजार में ऐसी गोलियां और दूसरी चीजें उपलब्ध हैं जिसके उपयोग के बाद गर्भवती होने की संभावना लगभग क्षीण हो जाती हैं। अब तक प्रीगनेंसी टेस्ट के लिये पेथोलॉजी लेब का सहारा लिया जा जाता था जिससे कई बार यह सवाल उठता था ऐसा क्यों कराया जा रहा है। और जब रिपोर्ट पॉजिटिव आ जाए तो वह स्त्री या युवती सवालों के घेरे में कैद हो जाया करती थी। पचास रूप्ये के मामूली खर्च पर स्त्री को संदेह से परे कर दिया गया है। समाज में जिस तरह वर्जनाएं टूट रही हैं, उसमें उपर लिखी गयी बातें कोई अर्थ नहीं रखती हैं लेकिन मैं इसे दूसरे रूप में ले रहा हूं और इसके खतरे को दूसरी तरह से देख रहा हूं। गोलियों के सेवन के बाद गर्भवती न होने से किसी अनचाहे बच्चे की जान जाने का खतरा तो नहीं होता है लेकिन प्रीगनेंसी टेस्ट करने वाली पचास रूप्ये की टेस्ट पट््टी का अर्थ एक अजन्मे बच्चे को गर्भ में ही मार देेने का सबसे आसान तरीका निकाल लिया गया है।
इसे थोड़ा और विस्तार से समझेंं। एक तरफ पूरी दुनिया में बेटी बचाओ अभियान चल रहा है और दूसरी तरफ इस तरह टेस्ट की सुविधाएं तो खतरे को और भी बढ़ा रही हैं क्यांेकि प्रीगनेंसी का पता चलने के बाद चरित्रहीनता के दाग से बचने के लिये गर्भ गिराने का आनन-फानन में इंतजाम कर लिया जाता है। इसमें इतना भी वक्त नहीं होता है कि वे यह जान सकें कि आने वाली जान बेटा था या बिटिया। मान लीजिये एक समय में सौ ऐसी स्त्री प्रीगनेंसी की जांच कराती हैं और मेरा मानना है कि इसमें 98 लोग वे हैं जिन्होंने विवाहत्तेर संबंध कायम कर लिये हैं और वे बेटे या बिटिया के फेर में न पड़कर समस्या मानकर मुक्ति पाना चाहती हैं। इस स्थिति में सरकार और निजी प्रयास निरर्थक साबित होते जाएंगे क्योंकि अजन्मे जान को मारने वालों को यह पता ही नहीं है िकवह लाड़ली थी या लाडला। इस पूरे मामले में दुर्भाग्य की बात है कि टेलीविजन के पर्दे पर लोकप्रिय हो चुकी अभिनेत्री इस प्रोडक्ट के प्रचार प्रसा में जुड़ी हैं। शायद उन्हें इस बात का इल्म नहीं है कि वे किस तरह के विज्ञापनों का साथ दे रही हैं। इस मुद्दे पर हैरत और तकलीफ देेने वाली बात यह है कि समाज के दूसरे लोग भी बहुत जागरूक नहीं हैं। वे इसे रोजमर्रा की चीज बता कर किनारा कर लते हैं। कुछ लोग इस मुद्दे को उतना गंभीर नहीं मानते हैं बल्कि उनका सोचना है कि जब समाज में अनैतिकता बढ़ रही है तो इस पर चर्चा करने का लाभ क्या? कुछ लोग इसे सेक्स का विषय समझकर मानसिक जुगाली करने लगते हैं।
मेरी अपनी निजी राय है कि ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ, ऐसी दवाईंया और प्रोडेक्ट के खिलाफ स्वयंसेवर संस्थाओं को, बुद्विजीवियों को और सामाजिक सरोकार से नाता रखने वालों को आगे आना चाहिए क्योंकि यह महज समाज में अनैतिकता को विस्तार नहीं दे रहे हैं बल्कि लाड़ली को बचाने के एक महायज्ञ के सफल होने के पहले उसमें व्यवधान उपस्थित करने के प्रयास में हैं। मीडिया की भूमिका इसमें कारगर हो सकती है और यह उसका दायित्व भी है िकवह ऐसे किसी भी प्रयासों के खिलाफ समाज को जागृत करे।

रविवार, 9 मई 2010

पाठ शाला


क्या जरूरी है कि हर फिल्में स्टूडेंट का शिक्षक से प्यार दिखाना?
अभी अभी पाठशाला फिल्म देख रहा था। एक सामाजिक संदेश देती इस फिल्म में बहुत कुछ अच्छा है और अच्छा नहीं है तो एक छात्रा का अपने शिक्षक के प्रति प्रेम। मुझे बहुत ज्यादा तो याद नहीं है किन्तु राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर में शिक्षिका के प्यार में छात्र पड़ जाता है। दरअसल यह प्यार नहीं बल्कि जिस्मानी लगाव था। एक खूबसूरत स्त्री के बदन के प्रति लगाव। लगभग ऐसा ही कुछ शाहरूख खान ने अपनी फिल्म में भी दिखाया था। इस फिल्म में सुष्मिता सेन शिक्षिका और विद्यार्थी स्वयं शाहरूख खान थे। अब एक बार फिल्म इसी विषय का फिल्मांकन पाठशाला में देखने को मिला है। इसमें शाहिद कपूर शिक्षक की भूमिका में है और उसके कथित प्यार में उसकी एक स्टूडेंट डूबी हुई है। सवाल यह है कि आखिर फिल्मों का यह विषय क्यों होता है। यह सच है कि हम सब प्रोफेसर मटुकनाथ को नहीं भूले होंगे लेकिन ऐसे विषयों को फिल्मा कर हम इन चीजों को और बढ़ावा देने की कोशिश कर ते हैं जिसकी मैं तो निंदा करता हूं। सूचना के लिये बता दूं कि अभी भड़ास में एक खबर चल रही है जिसमें एक गुरू की नैतिकता पर सवाल उठाये गये हैं। समाज में गुरू और शिष्य का रिश्ता पवित्रता का है। गुरू मार्गदर्शक होता है। वह भविष्य का निर्माता कहलाता है और ऐसे में इन संबंधों को फिल्म का विषय बनाना न केवल अपने आप में अनैतिक है बल्कि अनैतिकता को बढ़ावा देने की एक साजिश भी। दुर्भाग्य तो इस बात का है कि हम ऐसे मामलों का विरोध नहीं करते हैं। आइए यह एक ऐसा मसला है जिस पर हम सभी को विचार करना है और ऐसे प्रयासों को दरकिनार करना है ताकि शिक्षक की प्रतिष्ठा कायम रह सके। मेरा आग्रह है कि यदि आप मेरे मत से सहमत हैं तो विभिन्न माध्यमों से इस विषय पर जनमत बनायें। शिक्षक बचेगा तो समाज और देश बचेगा।
मनोज कुमार

शनिवार, 8 मई 2010

एक माँ के लिए


एक मां के लिये

बड़ी भली है अम्मा मेरी मुझको रोज ताजा दूध पिलाती है
कभी सांची तो कभी अमूल का पैकेट लेकर आती है
रोज रोज बढ़ते दूध के दाम भी अम्मां को नहींे डरा पाती है
लल्ला को दूध पिलाने खुद भूखी रह जाती है
बड़ी भली है अम्मा मेरी मुझको रोज ताजा दूध पिलाती है
अम्मां की नहीं थी कोई आस, चिंता थी उसके पास
उसका लल्ला कब गबरू जवान बनेगा
मिट जाएगी उसकी चिंता
घड़ी बदली, घंटा बदला बदला जीवन का रेला
बैठ रेल में लल्ला चल पड़ा अकेला
अम्मा रह गयी अकेली लल्ला की यादों में
अम्मा तक रही रहा अभी अभी लल्ला आएगा और कह जाएगा
बड़ी भली है अम्मा मेरी मुझको रोज ताजा दूध पिलाती है

मनोज कुमार

मंगलवार, 4 मई 2010

बातचीत

नौटंकी के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं- मधु अग्रवाल
थिएट्रिकल कम्पनी की डायरेक्टर मधु अग्रवाल से मनोज कुमार की बातचीत

लोक कलाओं का संसार अद्वितीय है। भारत के प्रत्येक राज्य की अपनी लोक संस्कृति और कलायें हैं। यह कला और संस्कृति किसी भी राज्य की विशिष्ठ पहचान होती है। लोक कला और संस्कृति ही सही अर्थाें में किसी राज्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। आम बोलचाल की भाषा में कहा जाए कि लोककला और संस्कृति किसी राज्य की ब्रांड एम्बेसडर होती हैं, तो कुछ अनुचित नहीं होगा। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में समय समय पर इन लोकलाओं और संस्कृतियों का संगम समागम होता रहा है। मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय के निमंत्रण पर देश के हर राज्यों की लोककला और संस्कृति का यहां समागम होता रहा है। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश की प्रतिष्ठित प्रतिनिधि लोकनाट्य का तीन दिवसीय समारोह नौटंकी का आयोजन हुआ। नौटंकी उत्तरप्रदेश की पुरातन लोकनाट्य परम्परा है। समय के साथ दूसरी लोककलाओं की तरह नौटंकी की लोकप्रियता में कमी आयी है किन्तु व्यक्तिगत प्रयासों के चलते नौटंकी का स्वरूप आज भी कायम है। उत्तरप्रदेश के नौटंकी दल के सर्वेसर्वा स्वर्गीय त्रिमोहनलाल के साथ बारह बरस की उम्र में नौटंकी को एक नयी पहचान देने वाली गुलाबबाई ने थिएट्रिकल कम्पनी की स्थापना की। नौटंकी विधा में उनके विशिष्ट योगदान के लिये पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान नईदिल्ली व उत्तरप्रदेश का, यश भारती सम्मान प्रदान किया गया। नौटंकी इस प्रथम महिला कलाकार की विरासत को उनकी बेटी मधु अग्रवाल सहेज रही हैं। नौटंकी प्रदर्शन के लिये भोपाल आयीं मधु अग्रवाल ने बातचीत में नौटंकी कला की कुछ बारकियां बतायीं तो यह भी कहा कि समय के साथ इस विधा में भी कदाचित परिवर्तन की जरूरत है। नौटंकी के वर्तमान स्वरूप एवं भविष्य पर थिएट्रिकल कम्पनी की डायरेक्टर मधु अग्रवाल से मनोज कुमार की बातचीत के मुख्य अंश –
सवाल- नौटंकी के बारे में बतायें?जवाब- नौटंकी उत्तरप्रदेश की एक लोकप्रिय एवं परम्परागत लोकनाट्य है। इस विधा में अभिनय एवं गायिकी की श्रेष्ठ प्रस्तुति देखने को मिलती है। नौटंकी के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ अलख जगाने की कोशिश होती है तो बहुत ही हल्के फुल्के ढंग से नौटंकी तिलस्म व स्वप्नलोक में दर्शकों को ले जाती है।सवाल- नौटंकी की कानपुर शैली क्या है?जवाब- उत्तरप्रदेश के अलग अलग हिस्सों में नौटंकी का अलग अलग स्वरूप देखने को मिलेगा। कानपुर के अलावा अन्य हिस्सों में नौटंकी में गायन को प्रधानता दी जाती है जबकि कानपुर शैली में अभिनय की प्रधानता है। वाद्ययंत्र वही हैं और हर स्थान पर नौटंकी की प्रस्तुति में इसका उपयोग होता है।सवाल- तीस के दशक में नौटंकी का जो स्वरूप था और आज दो हजार दस में नौटंकी के स्वरूप में क्या परिवर्तन आया है और आप इसे किस प्रकार देखती हैं?जवाब- मुझे नहीं लगता है कि कोई खास बदलाव इन सालों में हुआ है। नौटंकी की जो परम्परा चली आ रही थी, आज भी वो कायम है। नौटंकी एक लोकविधा है और लोक जमीन से जुड़ कर ही अपने अस्तित्व को बचा पाता है।सवाल- तो क्या यह मान लिया जाए कि नौटंकी का परम्परागतस्वरूप जस का तस कायम है और उसमें वही रवानगी कायम है?जवाब- हां, बिलकुल है किन्तु इसके साथ ही मैं यह भी बताना चाहूंगी कि नयी पीढ़ी के लोग इस विधा से अपने आपको जोड़ नहीं पा रहे हैं। नये कलाकारों के नहीं आने से नौटंकी के स्वरूप में थोड़ा बहुत तो फर्क आना स्वाभाविक है। एक समय था जब नौटंकी रात रात भर चलती थी लेकिन आज बदलते समय में लोगों के पास वक्त नहीं है और वक्त की कमी के कारण नौटंकी के प्रति लोगों में लगाव कम होता दिख रहा है। नौटंकी ही क्यों, हर लोककलाओं के साथ यह हो रहा है तो इस दौर में भला नौटंकी कैसे अछूती रह सकती थी।सवाल- समस्या आप जानती हैं तो इसके हल के लिये भी आपने कुछ सोचा होगा। ऐसा क्या करने जा रही हैं जिससे नौटंकी से दूर होते कलाकार और दर्शक वापस नौटंकी की ओर लौट सकें?जवाब- आपका कहना ठीक है। आज जमाना ग्लैमर का है और नौटंकी में इस बात की खास कमी है। ठेठ देसीपन से नौटंकी का भला नहीं होना है। कहीं कहीं पर नौटंकी में ग्लैमर का पुट मिलने लगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नौटंकी से दूर होते लोगों को बांधने में ग्लैमर कहीं काम आ जाए।सवाल- आपको कहीं नहीं लगता कि नौटंकी की लोकप्रियता में कमी के और भी कुछ कारण हैं?जवाब- निश्वित रूप से। फूहड आयोजनों ने नौटंकी की लोकप्रियता को, उसकी गरिमा को और उसकी प्रतिष्ठा को आंच पहुंचाया है। वे लोग नौटंकी कर रहे हैं जिन्हें इसका पूरा ज्ञान नहीं है। नौटंकी महज एक प्रदर्शनकारी कला नहीं है बल्कि इससे बढ़कर वह एक लोकसाधना है। नौटंकी मेरे लिये मां की तरह है। सवाल- गुलाबबाई ने फिल्मों में नौटंकी की प्रस्तुतियां दी। आज के संदर्भ में आप क्या महसूस करती हैं।जवाब- मेरी मां गुलाबबाई नौटंकी की पहली महिला कलाकार थीं। उन्होंने नौटंकी को एक नयी प्रतिष्ठा दिलायी। उनके काम को मैं आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं। उन्होंने फिल्म तारामती, लैला मजनूं तथा मुझे जीने दो में अभिनय किया। तब और आज में बहुत फर्क आ गया है। आज की फिल्मों में नौटंकी का गलत स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है। मैं इससे बहुत दुखी हूं।सवाल- नौटंकी के प्रति सरकारी पहल को कितना प्रभावकारी मानती हैं?जवाब- नौटंकी के प्रति उत्तरप्रदेश का रवैया पूरी तरह उदासीन है। इस परम्परागत लोकनाट्य के संरक्षण और संवर्धन के लिये सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। कलाकारों को भी किसी प्रकार का संरक्षण सरकार से नहीं मिल रहा है जिसके कारण नवोदित पीढ़ी का नौटंकी के प्रति रूझान ही नहीं बचा है। सवाल- भोपाल आकर कैसा महसूस कर रही हैं?जवाब- मध्यप्रदेश संस्कृति संचालनालय के आमंत्रण पाकर मैं बेहद खुश हूं। यहां आकर लगा कि वास्तव में लोककलाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिये सरकार न केवल चिंतित हैं बल्कि काम भी कर रही है। यहां आना मेंरे लिये सुखद रहा। अनुशासित और रूचिकर दर्शकों का साथ ने मेरे उत्साह को और भी बढ़ाया है।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...