रिश्तांे को ढोने से तो अच्छा ही होगा...
तलाक शब्द किसी भी भारतीय स्त्री की मन और उसकी अस्मिता को तार तार कर देता है। एक भारतीय स्त्री चाहे कितनी भी तकलीफ में क्यों न हो, वह आखिरी सूरत तक तलाक से दूर रहना चाहती है। वह अपना मान और प्रतिष्ठा एक परिवार में ही देखती है और इसके बाद उसकी चिंता के केन्द्रबिन्दु में उसके बच्चे होते हैं। वह मन से भले ही तलाक लेने की ख्वाहिश रखती हो लेकिन उसे व्यवहार रूप् में तब्दील नहीं कर पाती है। पति जितना भी निकम्मा और नालायक हो लेकिन स्त्री के लिये बच्चे उसकी पूंजी होते हैं। एक स्त्री जानती है कि तलाक के बाद यह निर्मम पुरूष किसी और स्त्री को अपने भोग के लिये ले आयेगा। आने वाली दूसरी स्त्री मन से कम, मतलब से ज्यादा आती है और उसके लिये किसी और के बच्चे को पालने की न तो कोई मंशा होती है और न लगाव। यहां तक कि जिसके साथ और जिसके लिये वह आयी है, उससे भी उसका संबंध केवल देह तक होता है और बाकि समय वह उन सुविधाओं का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहती है जिससे अब तक वह वंचित रही है। कहने का अर्थ यह कि अक्सर दूसरी शादी भावना कम, मजबूरी ज्यादा होती है और यह मजबूरी एकाएक भौतिक लाभ प्राप्ति की ओर ले जाती है। इन स्थितियांे से बचने के लिये कोई भी भारतीय स्त्री तलाक के लिये राजी नहीं होती है। स्त्रियों की दशा पर एक लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि पति की ज्यादती की शिकार केवल हाउस वाइफ ही नहीं होती है बल्कि उनकी स्थिति भी दयनीय होती है जो कामकाजी होती हैं। यहां पर आकर तलाक के लिये हालात बदल जाते हैं। कामकाजी स्त्री आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण तलाक की पहल कर पाती है जबकि घरेलू स्त्री आर्थिक असुरक्षा, पीहर की चिंता और कहीं उसकी छोटी बहनें हों तो उसके ब्याह की चिंता में वह रोज डूबती-मरती रहती है। स्थिति जब काबू से बाहर हो जाये तब उसे इस स्थिति पर पहुंचना पड़ता है जिसे तलाक कहते वर्तमान में स्त्री का चेहरा बदल रहा है। वह अब स्वतंत्र व स्वाधीन जीवन जीना चाहती है और इसके लिये उसे तलाक की जरूरत होती है।
तलाक को लेकर भारतीय मन अभी भी संकुचित दृष्टि रखता है। काननू में भी अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इसके चलते तलाक पाना आसान नहीं होता है। वास्तव में अभी जो कारण बताये गये हैं, वे तलाक की बुनियाद के पहले कारण हैं जैसा कि पत्नी-पति का आपस में नहीं निभना। सहज रूप् से दोनों को अलग होने में अनेक किस्म की दिक्कतें हैं और इन दिक्कतों से उबरने का सहज उपाय है एक दूसरे पर लांछन लगाना। कई बार इसकी हदें पार हो जाती हैं। समय के साथ अब तलाक लेने के इच्छुक दम्पत्तियों की संख्या में वृद्वि होने लगी है और जरूरी है कि तलाक की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाए। वास्तव में यह मानवाधिकार का मामला माना जाना चाहिए। हालांकि भारत इस मामले में सकरात्मक दृष्टिकोण रखता है और आखिरी तक कोशिश करता है कि दोनों के मन बदल जाएं और वे एक हो कर रहें लेकिन जब ऐसा संभव नहीं होता है तब तलाक ही एकमात्र रास्ता बच जाता है। यूं भी रिश्तों को ढोने और घुट घुट कर मरने के बजाय स्वतंत्र जीवन जीने का हक दिया जाना ही स्त्री के लिये श्रेयस्कर होगा।
रविवार, 13 जून 2010
अपनी बात
सोमवार, 7 जून 2010
भोपाल
अपनी हरियाली और झील के मशहूर भोपाल ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन इस पर्यावरण प्रेमी शहर को कोई जहरीली गैस निगल जाएगी लेकिन सच तो यही था। हुआ भी यही और यह होना कल की बात कर तरह लगती है जबकि कयामत के पच्चीस बरस गुजर चुके हैं। इन बरसों में कम से कम दो पीढ़ी जवान हो चुकी है। गंगा नदी में जाने कितना पानी बह चुका है। पच्चीस बरस में दुनिया में कितने परिवर्तन आ चुके हैं। सत्ताधीशों के नाम और चेहरे भी बदलते रहे हैं। इतने बदलाव के बाद भी कुछ नहीं बदला तो भोपाल के अवाम के चेहरे का दर्द। यह घाव इतना गहरा था कि इसे भरने में शायद और भी कई पच्चीस साल लग जाएं। जिस मां की कोख सूनी हो गयी, जिस दुल्हन ने अपना पति खो दिया, राखी के लिये भाई की कलाई ढूंढ़ती बहन का दर्द वही जान सकती है। इस दर्द की दवा किसी सरकार के पास, किसी हकीम के पास नहीं है बल्कि यह दर्द पूरे जीवन भर का है। कुछ लोग यह दर्द अपने साथ समेटे इस दुनिया से चले गये तो कुछ इस दर्द के साथ मर मर कर जी रहे हैं। यह दर्द उस बेरहम कंपनी ने दिया था जिसे यूनियन कार्बाइड के नाम से पुकारा जाता है। हजारों की संख्या में बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले हवाई जहाज से उड़ गये। परदेसी हवाई जहाज में उड़ने के साथ ही भोपाल का सुख-चैन ले उड़े। इसे वि·ा की भीषणतम त्रासदी का नाम दिया गया। दुनिया भर में इसे लेकर आवाज गूंजी। कसूरवारों के लिये सजा तो साफ थी किन्तु कानून ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है। फिर शुरू हुआ तारीख पर तारीख का सिलसिला, गवाहों और सबूतों को जुटाने की कवायद और इस पूरी कवायद में पता ही नहीं चला कि कब पच्चीस बरस गुजर गये। राहत और रकम की लड़ाई भी खूब चली। आखिरकार फैसले की घड़ी आ ही गयी। ७ जून की तारीख मुर्करर की गयी। भोपाल का दिल एक बार फिर धड़क उठा। पच्चीस बरस की यादें फिर ताजा हो गर्इं। मन में उलझन थी और चेहरे पर तनाव। आखिरकार दोषियों को क्या सजा मिलेगी, इस बात को लेकर कशमकश जारी था। उम्मीद की जा रही थी कि हजारों जान निगलने वाले परदेसियों को छुट्टे में नहीं छोड़ा जाएगा, उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाएगी लेकिन अदालत का फैसला उन्हें फिर निराशा के भंवर में छोड़ गया। अदालत ने अपने सामने रखे दस्तावेजों को आधार बनाकर दो बरस की सजा और एक एक लाख रुपये का जुर्माना ठोंक दिया। फैसले के तत्काल बाद सात लोगों को पच्चीस हजार के मुचलके पर छोड़ दिया गया। इस फैसले के खिलाफ जुटे लोग आगे अदालत में जाने की तैयारी में हैं। फिलवक्त भोपाल की अवाम अवाक है। उसे सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि फैसला ऐसा भी आएगा। वि·ाास दरकने लगा। वे जीवन के इस मोड़ पर हैं जहां उनका सबकुछ लुट गया है। सरकार से राहत राशि मिली लेकिन वो राहत कौन देगा जब थका-हारा जवान बेटा आकर आवाज लगायेगा-अम्मां खाना दे दे...पति के आने की राह तकती उस बेचारी को यह पता है कि दरवाजा उसे ही बंद करने जाना है...स्कूलों में अब शोर मचने लगा है लेकिन पच्चीस पहले जो सन्नाटा खींच गया था...उस सन्नाटे को चीरने की कोशिश तो हो नहीं सकती। मौत का शहर बने भोपाल में तब एक दूसरे के आंसू पोंछने वाले भी नहीं थे और आज इस फैसले ने एक बार फिर उसी मुकाम पर पहुंचा दिया है कि आखिर क्या करें?
रविवार, 6 जून 2010
मीडिया
मनोज कुमार
हिन्दी और अंग्रेजी की यह कशमकश चल ही रही थी कि हिन्दी को लेकर आंदोलन होने लगा। अंग्रेजी हटाओ के समर्थकोंं की इस मायने में मैं पराजय देखता हूं कि वे अंग्रेजी तो हटा नहीं पाये किन्तु हिन्दी को भी नहीं बचा पाये। पत्रकारिता का यह बदलाव का युग था। सन् 77 के आपातकाल के बाद एकाएक नवीन समाचार पत्रों के प्रकाशन संख्या में वृद्वि होने लगी जिसमें हिन्दी की संख्या अधिक थी। यह स्वाभाविक भी था क्यांेकि देश भर में हिन्दीभाषियों की संख्या अधिक थी, खासकर अविभाजित मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में। मध्यप्रदेश में तब अंग्रेजी जानने वाले राजधानी भोपाल के भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स में काम करने आये अहिन्दी भाषी लोग या वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के भिलाई इस्पात संयंत्र अथवा एसीसीएल, बाल्को आदि में काम करने वाले अहिन्दी भाषी लोगों को ही अंग्रेजी अखबार की दरकार थी। इनके लिये राजधानी दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी के अखबार जो उस समय दूसरे दिन पहुंचते थे, पर्याप्त था। हिन्दी अखबारों के प्रकाशनों की बढ़ती संख्या और अनुवाद की कमी से जूझते अखबारों के संकट को समाचार एजेंसियों ने परख लिया। संभवतः सबसे पहले यूनाइटेड न्यूज एजेंसी ने वार्ता के नाम से हिन्दी समाचार देना शुरू किया। इसके बाद प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया ने भाषा नाम से हिन्दी में समाचार देना आरंभ किया। वार्ता और भाषा के आगमन के साथ हिन्दी अखबारों में अनुवादकों को नजरअंदाज किया जाने लगा। कई अखबारों ने तत्काल अनुवादकों के पद को समाप्त कर दिया। हिन्दी के अखबारों में हिन्दी की उपेक्षा का परिणाम यह रहा कि एक समय पू्रफरीडिंग के लिये हिन्दी में एमए पास लोगों को रखा जाता था। हिन्दी अखबारों को यह पद भी भारी पड़ने लगा और उपसम्पादकों और रिपोर्टरों को कह दिया गया कि अपनी खबरों का पू्रफ वे ही पढ़ेंगे। थोड़ा बहुत विरोध होने के बाद पू्रफरीडर का पद समाप्त कर दिया गया। मेरा खयाल है कि आज के समय में हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के अलावा थोड़े से अखबारों में ही यह पद सुरक्षित है। अगर मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो पू्रफरीडर को बछावत वेतन आयोग ने श्रमजीवी पत्रकार के समकक्ष माना था। खैर, इसके बाद आज समाचार पत्रों में जो गलतियां छप रही हैं, वे हमें शर्मसार करती हैं, गर्व का भाव कहीं नहंीं है। लिखते समय वाक्य के गठन में गलती हो जाना या कई बार एक जैसे नाम में भूल की आशंका बनी रहती थी जिसे पू्रफरीडर सुधार लिया करते थे किन्तु अब हमारी गलती कौन बताये। इतना जरूर है कि अगले दिन आपकी गलती के लिये संपादक दंड देने के लिये जरूर हाजिर रहेगा। 90 में टेलीविजन संस्कृति ने तो हिन्दी समाचार पत्रों को प्रिंटमीडिया का टेलीविजन बना दिया। अब खबरों की प्रस्तुति उसी रूप में होने लगी और भाषा भी लगभग टेलीविजन की हो गई। खबर और विचार की भाषा के बीच के अंतर को भी नहीं रखा गया। वाक्य विन्यास का बिगड़ा रूप् अपने आपमें हिन्दी पाठको को डरा देने वाला है। एक बार फिर दोहराना चाहूंगा कि जिन अखबारों से बच्चे हिज्जा कर हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखते थे, आज वह अखबार गुम हो गया है। सिटी, मेट्रो, नेशनल, इंटरनेशल जैसे शब्द धड़ल्ले से हिन्दी अखबारों में उपयोग हो रहे हैं। अखबार के एकाधिक पृष्ठों के नाम अंग्रेजी में होते हैं। कहा जाने लगा कि यह हिंग्लिश का दौर है। हिंग्लिस से एक कदम और आगे जाकर एक अखबार आईनेक्स्ट के नाम पर आरंभ हुआ। इसे न तो आप हिन्दी कह सकते हैं और न इसे अंग्रेजी, हिंग्लिश का भी कोई चेहरा नजर नहीं आया। इस बहुमुखी प्रतिभा वाले समाचार पत्र से मेरा परिचय महात्मा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कराया। पत्रकारिता के छात्रों के बीच जब मैं व्याख्यान देने पहुंचा और पत्रकारिता की भाषा पर चर्चा हुई तो विद्यार्थियों ने इस अनोखे अखबार के बारे में न केवल बताया बल्कि एक प्रति भेंट भी की। वे पत्रकारिता की इस भाषा से दुखी थे। एक तरफ हिन्दी के अखबार स्वयं को हिन्दी से दूर कर रहे थे और दूसरी तरफ अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकायें हिन्दी पाठकों के बीच एक बड़ा बाजार देख रही थी। इन प्रकाशनों ने न केवल हिन्दीभाषी पाठकों में बाजार ढूंढ़ा बल्कि भाषाई पाठकों में वे बाजार की तलाश करने निकल पड़े। अंग्रेजी का इंडिया टुडे हिन्दी में प्रयोग करने वाला पहला अखबार था। आरंभिक दिनों में हिन्दी इंडिया टुडे की सामग्री अंग्रेजी से अनुवादित होती थी किन्तु आहिस्ता आहिस्ता हिन्दी का स्वतंत्र स्वरूप् ग्रहण कर लिया। मेरे लिये ही नहीं हिन्दी पत्रकारों के लिये यह गौरव की बात है कि हमारे अग्रज और रायपुर जैसे कभी एक छोटे से शहर (आज भले ही रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी हो) से निकले श्री जगदीश उपासने हिन्दी इंडिया टुडे के संपादकीय कक्ष के सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे हैं। अंग्रेजी के प्रकाशनों का हिन्दी में आरंभ होना और हिन्दी के एक पत्रकार का शीर्ष पर बैठना इस बात का संकेत है कि हिन्दी ताकतवर थी और रहेगी।हिन्दी पत्रकारिता के लिये यह सौभाग्य था कि उसे राजेन्द्र माथुर जैसे पत्रकार एवं ओजस्वी सम्पादक मिला। राजेन्द्र माथुर मूलतः अंग्रेजी के जानकार थे और वे चाहते तो उस दौर में भी बड़ी मोटी तनख्वाह पर किसी अंग्रेजी अखबार के शीर्षस्थ पर पर काबिज हो सकते थे किन्तु उन्होंने इसके उलट किया। वे हिन्दी पत्रकारिता में आये और हिन्दी में सम्पादक के होने को नया अर्थ दिया। हिन्दी पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर का नाम गर्व से लिया जाता रहेगा। हिन्दी पत्रकारिता को हताशा और कुंठा के दौर से बाहर आने की जरूरत है और अपने भीतर की ताकत को पहचानने की भी। हिन्दी पत्रकारिता में अनेक नामचीन पत्रकार और सम्पादक हुए जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवार की रही है किन्तु मेरी जानकारी में अंग्रेजी के अपवाद स्वरूप् कुछ नाम छोड़ दें तो बाकि बचे पत्रकार और सम्पादक सम्पन्न, शहरी परिवेश में पले-बढ़े और पब्लिक स्कूलांे में शिक्षित परिवारों से आये। हिन्दी पत्रकारिता और समाचार पत्रों को इस बात की मीमांसा करना चाहिए कि जब एक अंग्रेजी का अखबार हिन्दी मंे छपने के लिये मजबूर हो सकता है तो हम हिन्दी में ही अपना एकछत्र राज्य क्यों नहीं बना पाये? क्यों हम अंग्रेजी पत्रकारिता का अनुगामी बने हुए हैं? क्यों हमें अंग्रेजी पत्रकारिता श्रेष्ठ लगती है? इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिन्दी का एक बड़ा पाठक वर्ग आज भी अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी के खिलाफ हैं। कार्पोरेटस्वरूप लेकर तेजी से फैलते भास्कर पत्र समूह एवं कुछ हिन्दी के कुछ अन्य समाचार पत्र सम्मानजनक मानदेय देने लगे हैं। पेजथ्री पढ़ाने वाले हिन्दी के अखबारों में स्थानीय लेखकों को स्थान नहीं मिल पाता है और न ही उन्हें सम्मानपूर्वक मानदेय दिया जाता है। पाठक वर्ग भी इन दिनों अखबारों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। वह भी अखबारों के उपहार योजनाओं में उलझ कर रह गया है। एक समय था जब गलत खबर छपने पर पाठकों की दनादन चिठिठयां समाचार पत्रों के कार्यालयों में आ जाती थी। संपादक को गलती के लिये माफी मांगने के लिये मजबूर होना पड़ता था किन्तु इन गलतियों पर पाठक ध्यान खींचने के बजाय, उसे सुधारने के बजाय मजा लेते हैं। पाठकों की यह निराशा इस बात को साबित करती है कि उसने अखबारों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।80 के दशक में जब मैंने देशबन्धु से अपनी पत्रकारिता का श्रीगणेश किया तो हमें प्रशिक्षण के दौरान यह बात बतायी गयी थी कि हमारे अखबार का पाठक वर्ग कौन सा है और उनमें साक्षरता का प्रतिशत क्या है। यह इसलिये कि हम खबरों की, विचारों की, संयोजन करने की कला उनकी समझ के अनुरूप् कर सकें। गंभीर गहन साहित्यिक शब्दों का जाल उन्हें अखबार से दूर कर देगा। इसका यह अर्थ भी कदापि नहीं था कि आप स्तरहीन शब्दों का उपयोग करें बल्कि समझाइश यह थी कि गृह के बजाय घर लिखें और कृषक के बजाय किसान। जनसत्ता को पढ़ते हुए मैं इस बात से गर्व से भर जाता हूं कि आज भी यह अखबार हिन्दी पाठक का अखबार है। उसकी भाषा, उसकी प्रस्तुति एक आम हिन्दुस्तानी पाठक की है जो गंगा जमुनी संस्कृति में पला बढ़ा है। जिसे हिन्दी के साथ उर्दू का भी ज्ञान है और देशज बोली की सुगंध इस अखबार में छपे हर शब्द से आपको हमको मिल जाएगी। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं उस दिन की जब हिन्दी के अखबार पेजथ्री से उबरकर वापस चैपाल का अखबार बन सकेंगे। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मेे पुस्तकाकार में प्रकाशन। फिलवक्त मीडिया की मासिक पत्रिका समागम के प्रकाशक एवं संपादक )
हिंदी पत्रकरिता
हिन्दी से दूर होते हिन्दी के अखबार-१
मनोज कुमार
शीर्षक पढ़कर आप चैंक गए होंगे। चैंकिये नहीं, यह हकीकत है। मैं भी तब चैंका था जब लगभग एक दर्जन समाचार पत्रों का लगभग छह महीने तक अध्ययन करता रहा। हिन्दी अखबारों की हिन्दी का मटियामेट इन छह महीनों में नहीं हुआ बल्कि इसकी शुरूआत तो लगभग डेढ़ दशक पहले ही शुरू हो गयी थी। जिस तरह एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिये हिन्दी पाठशाला में पढ़ने वाला बच्चा हर तरह से कमजोर होता है और पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा चाहे कितना ही कमजोर क्यों न हो, वह कुशाग्र बुद्धि का ही कहलायेगा, ऐसी मान्यता है, सच्चाई नहीं। लगभग यही स्थिति हिन्दी के अखबारों का है। यह सच है कि हिन्दी के अखबारों का अपना प्रभाव है। उनकी अपनी ताकत है और यही नहीं हिन्दी के अखबार ही समाज के मार्गदर्शक भी रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम की बात करें अथवा नये भारत के गढ़ने की, हिन्दी के अखबारोें की भूमिका ही महत्वपूर्ण रही है। भारत गांवों का देश कहलाता है और हिन्दी के अखबार इनकी आवाज बने हुए हैं। बदलते समय में भी हिन्दी के अखबार प्रभावशाली बने हुए है। बाजार की सबसे बड़ी ताकत भी हिन्दी के अखबार हैं और बाजार की सबसे बड़ी कमजोरी भी हिन्दी के अखबार हैं। इन सबके बावजूद हिन्दी के अखबार कहीं न कहीं अपने आपको कमजोर महसूस करते हैं और अंग्रेजी से नकलीपन करने से बाज नहीं आते हैं। ये नकलीपन कैसा है और इसके पीछे क्या तर्क दिये जा रहे हैं, इस मानसिकता को समझना होगा। इस बात को समझने के लिये हमें अस्सी के दौर में जाना होगा। यह वह दौर था जब हिन्दी का अर्थ हिन्दी ही हुआ करता था। खबरों में अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग की मनाही थी। पढ़ने वाले भी सुधि पाठक हुआ करते थे। समय बदला और चीजें बदलने लगीं। सबसे पहले कचहरी अथवा अदालत के स्थान पर कोर्ट का उपयोग किया जाने लगा। इसके बाद जिलाध्यक्ष एवं जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर और आयुक्त के स्थान पर कमिश्नर लिखा जाने लगा। हिन्दी के पाठक इस बात को पचा नहीं पाये और विरोध होने लगा तब बताया गया कि समय बदलने के साथ साथ अब हिन्दी अंग्रेजी का मिलाप होने लगा है और वही शब्द अंग्रेजी के उपयोग में आएंगे जो बोलचाल के होंगे। तर्क यह था एक रिक्शावाला कोर्ट तो समझ जाता है किन्तु कचहरी अथवा अदालत उसके समझ से परे है। जिलाध्यक्ष शब्द को लेकर यह तर्क दिया गया कि विभिन्न राजनीतिक दलों के जिलों के अध्यक्षों को जिलाध्यक्ष कहा जाता है और जिलाधीश अथवा जिलाध्यक्ष मे भ्रम होता है इसलिये कलेक्टर लिखा जाएगा ताकि यह बात साफ रहे कि कलेक्टर अर्थात जिलाध्यक्ष है जो एक शासकीय अधिकारी है न कि किसी पार्टी का जिलाध्यक्ष। आयुक्त को कमिश्नर लिखे जाने पर कोई पक्का तर्क नहीं मिल पाया तो कहा गया कि रेलपांत का हिन्दी लौहपथ गामिनी है और सिगरेट को श्वेत धूम्रपान दंडिका कहा जाता है जो कि आम बोलचाल में लिखना संभव नहीं है। इसी के साथ शुरू हुआ हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल। इसके बाद हिन्दी अखबारों को लगने लगा कि हिन्दी पत्रकारिता में खोजी पुट नहीं है और अनुवाद की परम्परा चल पड़ी। बड़े अंंग्रेजी अखबारों से हिन्दी में खबरें अनुवाद कर प्रकाशित की जाने लगी। इसके पीछे बड़ी, गंभीर, खोजी और न जाने ऐसे कितने तर्क देकर एक बार फिर अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं का गुणगान किया जाने लगा। 90 के आते आते तो लगभग हर अखबार यह करने लगा था। खासतौर पर क्षेत्रीय हिन्दी अखबार। मुझे लगता है कि इसके पीछे यह भावना भी काम कर रही थी कि देखिये हमारे पास श्रेष्ठ अनुवादक हैं जो अंग्रेजी की खबरों का अनुवाद कर आप तक पहुंचा रहे हैं। हालांकि यह दौर अनुवाद का दौर था किन्तु इसकी विशेषता यह थी कि इसमें अंग्रेजी का शब्दानुवाद नहीं किया जाता था बल्कि भावानुवाद किया जाता था। इससे अंग्रेजी में लिखी गयी खबर की आत्मा भी नहीं मरती थी और हिन्दीभाषी पाठकों को खबर का स्वाद भी मिल जाता था। ऐसा भी नहीं है कि इसका फायदा हिन्दी के पाठकांें को नहीं हुआ। फायदा हुआ किन्तु श्रेष्ठिवर्ग साबित हुआ अंग्रेजी जानने वाले और अंग्रेजी के अखबार विद्वान। अनचाहे में हिन्दी अखबार स्वयं को दूसरे दर्जे का मानने लगे और हिन्दी में काम करने वाले पत्रकार स्वयं में हीनभावना के शिकार होने लगे। प्रबंधन भी उन पत्रकारों को विशेष तवज्जो देने लगा जो अंग्रेजी के प्रति मोह रखते थे और एक तरह से स्वयं को अंग्रेजीपरस्त बताने में माहिर थे।
मंगलवार, 1 जून 2010
media
मीडिया के विस्तार के साथ साथ आयोजकों और मीडिया के साथ तालमेल का अभाव बना हुआ है। कई बार बड़े और अच्छे आयोजनों की खबर नहीं पहुंच पाती है। आयोजक संस्थाओं को प्रोफेशनल्स की भी जरूरत है। ऐसे में मीडिया मैनेजर आयोजनों के कव्हरेज एवं प्रकाशन हेतु प्रेस रिलीज तैयार करने का काम मीडिया मैनेजर करेगी। आवश्यकता होने पर फोटोग्राफी एवं वीडियो शूटिंग भी कराया जाता है। मीडिया मैनेजर द्वारा तैयार प्रेस रिलीज स्थानीय दैनिकों के साथ प्रमुख प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनल्स, दूरदर्शन, आकाशवाणी के साथ न्यूज एजेंसी को प्रेषित किया जाता है। फिलहाल मीडिया मैनेजर का कार्यक्षेत्र भोपाल होगा। मामूली सेवाशुल्क के साथ उपरोक्त सेवाएं आपको सुलभ कराते हैं। इससे न केवल आपके विभाग का मानवश्रम बचता है और प्रोफेशनल्स की मदद भी मिलती है। इस सेवा के लिये आप चाहें तो प्रति आयोजन अथवा वार्षिक तौर पर अनुबंध किया जा सकता है। मानदेय कार्यक्रम के अनुरूप तय किया जाएगा। भोपाल में होने वाले आयोजनों के लिये मनोज कुमार से सम्पर्क किया जा सकता है। उनका मोबाइल नम्बर ०९३००४६९९१८ है। उपरोक्त जानकारी मीडिया मैनेजर की विज्ञप्ति में दी गई है।
सोमवार, 31 मई 2010
मुद्दा
अपनों से ही परायापन क्यों?
किसी भी व्यवसाय का नेचर होता है कि वह अपने प्रतिद्वंदी कंपनी को बाजार में पिट दे। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि बाजार में खुद को खड़ा रखने के लिये दूसरों को पीटना जरूरी है। यह स्पर्धा मीडिया में भी चल रही है। अखबारों की प्रसार संख्या और टेलीविजन की टीआरपी को लेकर हो रही इस स्पर्धा को सही कहा जा सकता है किन्तु किसी पत्रकार अथवा मीडिया कर्मी के सुख-दुख में भी इस तरह स्पर्धा को मैं कतई उचित नहीं मानता। मेरा मानना यह है कि मेरे साथी भी मेरी बातों से सहमत होंगे। भोपाल में यह स्पर्धा काफी वक्त से चल रही है। एक अखबार दूसरे अखबार से और एक चैनल दूसरे चैनल से आगे निकल जाने के लिये बेताब है। आंकड़ों का खेल जारी है और इसे गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन जो इन दिनों क्या बल्कि एक मुद्दत से हो रहा है वह निहायत गलत है। बीती रात एक अखबार में काम करने वाले साथी को किसी अज्ञात लोगों ने लूट लिया। इस लूट की खबर सारे अखबारों में है। लूट का शिकार हुए साथी का नाम भी दिया गया है किन्तु अखबार का नाम प्रकाशन से सभी अखबारों ने परहेज किया है। यह पहली घटना नहीं है। एक पखवाड़े के भीतर यह चौथी-पांचवीं घटना है। यह सुखद है कि खबरों के प्रकाशन में कोई परहेज नहीं किया जा रहा है किन्तु सवाल यह है कि अखबार का नाम प्रकाशित करने से क्या भला हो रहा है। अखबार में काम करने वाला साथी है और उस अखबार का नाम प्रकाशित किया जा रहा है तो ऐसा नहीं है कि इस खबर से अखबार की प्रसार संख्या में कोई वृद्वि या कमी हो रही है या अनावश्यक पब्लिसिटी हो रही है और साथी किसी टेलीविजन चेनल का है तो भी इसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो हमें सिखाया जाता था कि अपनी लाईन बड़ी करने के लिये किसी की लाईन को मिटाने की जरूरत नहीं है बल्कि स्वयं अपनी लाईन बड़ी करें। मीडिया की तीन बुनियादी बातें हैं जिनमें एक समाज को शिक्षित करना भी है। जब स्वयं मीडिया अपनों के साथ ऐसा बर्ताव करेगा तो वह समाज को कैसे और किस प्रकार की शिक्षा देगा, यह आत्ममंथन का विषय है। मैं समझता हूं कि यह मुद्दा व्यक्ति विशेष, संस्था विशेष का न होकर समूचे मीडिया जगत का है और इस पर पहल करना जरूरी है। अपने अनुभव से मैं यह कह सकता हूं कि इस तरह की खबरों पर मैनेजमेंट का बहुत गंभीर हस्तक्षेप नहीं होता है। मैनेजमेंअ उन खबरों पर जरूर एक्शन लेता है जो उनके व्यवसायिक हितों को चोट पहुंचाती है। जो लोग मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं, मेरा उनसे अनुरोध है कि इस दिशा में वे अपनी राय दें, हस्तक्षेप करें और हम सब एक हैं कि आवाज बुलंद करें।
शनिवार, 29 मई 2010
media
ये वक्त टेक्नालॉजी की पत्रकारिता का है
मनोज कुमार
एक समय था जब टेलीविजन नहीं था। इंटरनेट और सेटेलाईट चैनलों का नामोनिशाननहीं था। अखबार भी श्वेत श्याम हुआ करते थे। थोड़े से पेज जिसमें ज्यादतरअखबार आठ पन्नों का हुआ करता था। हर पेज की अपनी शान। खबरों की मारामारी।किसी संस्था या आयोजन की खबर को दो कॉलम की जगह मिल जाना बड़ी बात मानाजाता था। तस्वीरों का भी उतना जलवा नहीं था। अधिकतम तीन कॉलम की फोटो छपजाया करती थी और आठ पेज के अखबार में ऐसी बड़ी फोटो तब कुल जमा चार हुआकरती थी। एक पहले पन्ने पर, दो शहर की खबर में, एक प्रादेशिक पन्ने पर औरएक अन्तर्राष्ट्रीय समाचारों में। यह वह दौर था जब पत्रकारिता कीटेक्नालॉजी काम किया करती थी। खबरों को सूंघ कर, खोज कर निकाला जाता था।एक एक खबर का प्रभाव होता था। एक्शन और रिएक्शन होता था। लोग सुबह सवेरेअखबार की प्रतीक्षा किया करते थे लेकिन बदलते समय में सबकुछ बदल गया है।अब उस बेसब्री के साथ आम आदमी अखबार का इंतजार नहीं करता है। सुबह छह बजेअखबार आये या आठ बजे। जीवन की जरूरी चीजों में अखबार भी शामिल है इसलियेप्रतिदिन एक अखबार मंगा लिया जाता है। जिन घरों में बच्चे पढ़ रहे हैंउनके लिये कोई राष्ट्रीय दैनिक मंगा लिया जाता है वह भी अंग्रेजी का ताकिबच्चे को प्रतियोगी परीक्षा में आसानी हो सके। यह बदलाव आखिर आया क्यों?आखिर अखबारों के प्रति रूचि कम क्यों हुई? ऐसे अनेक सवाल हैं और हर सवालका जवाब बहुत ही आसान। यह बदलाव, अखबारों के प्रति पाठकों की कम होतीरूचि का एकमात्र कारण है टेक्नालॉजी की पत्रकारिता का अस्तित्व में आना।जब तक पत्रकारिता की टेक्नालॉजी काम कर रही थी, अखबारोंे की भूमिका अधिकप्रभावी थी लेकिन जब से टेक्नालॉजी की पत्रकारिता काम कर करने लगी है,अखबारों के प्रति रूचि कम होती जा रही है।त्ीन-चार दशक पहले टेलीविजन ने पांव पसारना शुरू किया था। इसके पहलेसमाचार पत्रों का एकछत्र राज्य था। पराधीन भारत में जनजागरण का कार्यसमाचार पत्रों ने किया था और जिन्होंने पूरी शिद्दत के साथ अपनी जवाबदारीनिभायी। समाचार पत्रों की ताकत इसी दौर में भारत की जनता ने महसूस किया।पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त होकर भारत एक नये देश और समाज के निर्माणमें जुट गया। इस दौर में भी समाचार पत्रों ने वही कार्य किया जो पराधीनभारत की मुक्ति के समय किया था। विकासशील भारत की संरचना और नये जमाने केहिन्दुस्तान के निर्माण में समाचार पत्रों का अविस्मरणीय योगदान रहा।स्वतंत्र भारत में समाचार पत्रों का विकास और विस्तार होने लगा लेकिन यहविकास और विस्तार अस्सी के दशक में तेजी से हुआ। इस समय तक आकाशवाणी एकविकल्प के रूप में मौजूद था किन्तु सरकारी नियंत्रण वाले इस इलेक्ट्रॉनिकप्रसार माध्यम के प्रति लोगों का बहुत विश्वास नहीं था। लोगों की दृष्टिमें यह बात पक्की हो गयी थी कि आकाशवाणी का अर्थ सरकारी भोंपू है।आकाशवाणी के बाद भारत में दूरदर्शन का आगमन हुआ। यह पत्रकारिता का नयाअनुभव था। कुछ अतिरिक्त सूचना तो मिलना आरंभ हुआ ही, अब दृश्य पत्रकारिताका श्रीगणेश भी हो चुका था। दूरदर्शन की विश्वसनीयता संदिग्ध थी।आकाशवाणी की तरह ही दूरदर्शन को भी लोग संदेह की नजरों से देखते थे औरउनका यह मानना था कि यह भी सरकारी भोंपू है और सरकार इसके माध्यम सेअपनी इमेज बिल्डिंग का काम कराती है। इसे भारत में बुद्वु बक्सा भी कहागया। हालांकि दूरदर्शन को भी कोई बहुत जगह नहीं मिली किन्तु आकाशवाणी सेज्यादा विस्तार दूरदर्शन को मिला। एक कारण तो यह था कि यह दूरदर्शन केमाध्यम से दृश्य पत्रकारिता का आरंभ हो चुका था। भारत में साक्षरता काप्रतिशत वैसे भी कम है और ऐसे में दूरदर्शन प्रभावशाली माध्यम के रूप मेंविकसित हुआ। इसके बाद दृश्य पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन आया तबजब सेटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन के चैनलों का प्रसारण आरंभ हुआ।दूरदर्शन से अधिक इन निजी टेलीविजन चैनलांे को भारत में स्थान मिला औरविश्वास भी। लोगों को यह समझ में आने लगा कि जो जहां जैसा घट रहा है, उसेटेलीविजन दिखा देते हैं। समय गुजरने के साथ साथ चैनलों की संख्या सौ केआसपास हो चली है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट भी उपजा है। इस परआगे चर्चा करेंगे। बहरहाल, समाचार पत्र, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजनचैनल्स के विस्तार के बाद पत्रकारिता का नया युग ई-जर्नलिज्म से आरंभहोता है। ई-जर्नलिज्म एक तरह से इलिट क्लास की पत्रकारिता कही जा सकती हैक्योंकि यह पूरी तरह से टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता है। इसके लिये स्वयं काकम्प्यूटर, इंटरनेट और इसके संचालन की जानकारी उपयोगकर्ता को होना चाहिए।इसका पाठक वर्ग भी बेहद सीमित है। वही लोग पाठक हैं जिन्हें ई-जर्नलिज्मके संचालन की टेक्नॉलाजी का ज्ञान है। हालांकि ई-जर्नलिज्म समाचार पत्र,दृश्य एवं श्रव्य पत्रकारिता का एकजाई चेहरा है। बावजूद इसका क्षेत्रसीमित है और आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर।इस तरह पत्रकारिता का विस्तार होता गया और विकास भी किन्तु इसी के साथसाथ विश्वसनीयता का संकट भी उपजा। एक समय था जब समाचार पत्रों कीविश्वसनीयता का कोई सानी नहीं था। अखबारों में छपी खबरें एकदम सत्य मानीजाती थी लेकिन टेलीविजन चैनलों के विस्तार के साथ समाचार पत्र और न्यूजचैनलों की खबरों में तुलना की जाने लगी। आम पाठक और दर्शक के लिये दोनोंमें कोई फर्क नहीं था किन्तु इस माध्यम के लोग इस फर्क को जानते थेकिन्तु इस मामले में वे असहाय बने रहे। समाचार पत्रों की आलोचना होनेलगी। आहिस्ता आहिस्ता समाचार पत्रों का चेहरा बदलने लगा। टेक्नालॉजी काविस्तार होने के साथ साथ अखबार रंगीन होते गये और लगभग अखबारों का स्वरूपसाइलेंट टेलीविजन का हो गया। रंगीन तस्वीरें और लोगों को भरमाने, उकसानेवाली खबरों को अधिकाधिक स्थान मिलने लगा। सामाजिक सरोकार की खबरें गुमहोने लगीं। खबरों में अतिशयता से इंकार करना मुश्किल था। कहीं तारीफ होरही थी तो कहीं लक्ष्य कर आलोचना की जाने लगी। तथ्यों को नजरअंदाज कियाजाने लगा और खबरों की गंभीरता कम होने लगी। एक प्रकार से अखबार एकप्रोडक्ट बन कर रह गये और अखबार की गंभीरता उसी तरह से कम होने लगी जिसतरह से शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव का उपयोग कर उसकी गंभीरता को कमकरने का प्रयास किया जाने लगा। मेरी राय में पत्रकारिता और शिक्षा एकदूसरे के पूरक हैं। शिक्षा जहां अक्षर ज्ञान का माध्यम है तो पत्रकारिताका दायित्व समाज को जागरूक बनाने का है। इस संदर्भ में यह उल्लेख करनाजरूरी लगता है कि जिस तरह विश्वविद्यालयों में कुलपति की गरिमा हुआ करतीथी, उस गरिमा का ह्ास हुआ है, कुछ कुछ वैसा ही अखबारों में सम्पादक कोलेकर हुआ है। शायद यही कारण है कि अखबारों की गरिमा और उसके प्रति समाजका विश्वास कुछ कम हुआ है।टेलीविजन के विस्तार और ई-जर्नलिज्म ने पत्रकारिता की टेक्नॉलाजी को गुमकर दिया है। अब सिर्फ और सिर्फ टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता कार्य कर रहीहै। खबर को सूंघने और खोजने की प्रवृति कम होती जा रही है। इंटरनेट परउपलब्ध जानकारी को ही पाठकों को परोसा जा रहा है। ऐसा भी नहीं है किसमूची पत्रकारिता ऐसी ही हो गई है लेकिन काफी हद तक बदलाव दिख रहा है।मुझे याद पड़ता है कि जब हमारे क्राइम रिपोर्टर शाम को थाने में फोन परजानकारी लेकर अपराधों की खबर बनाते थे तो लगता था कि ये लोग कोई काम नहींकर रहे हैं और पुलिस की जानकारी को ही समाचार का स्वरूप् दे रहे हैंकिन्तु बदलते समय में अब यही सब कुछ हो रहा है। सूचना के अधिकार ने भीपत्रकारिता को सहूलियत दी है। जानकारी नहीं देने, गलत जानकारी देने औरजानकारी देने में आनाकानी करने वाले अफसरों के आगे पत्रकारों को बार बारघुमने की जरूरत खत्म हो गयी है। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देनाविभाग की जवाबदारी है और इसमें गोलमाल की कोई गुंजाइश नहीं बच जाती है।एक तरह से खबरों की प्रामाणिकता तो बनती है लेकिन जो खोजी प्रवृत्ति काएक नेचर होता है, वह कहीं कमजोर हो रहा है। दरअसल जब हम खबरों को तलाशकरने जाते हैं तो कई और सूत्र और तथ्य हासिल हो जाते हैं जो नयी खबर केप्रति जिज्ञासा उत्पन्न करती थी किन्तु आइटीआई से मिली जानकारी एक खबर कोतो पुष्ट कर देती है किन्तु खबरों का विस्तार रूक जाता है।टेक्नालॉजी के इस दौर में पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों को भी अनदेखाकिया गया है। अब दुर्घटना की खबर श्वेत-श्याम नहीं हुआ करती है। मौतकितनी भी दर्दनाक हो, रंगीन ही छपती है। एक दुघर्टना में सौ पचास लोगोंकी मौत हो गयी है तो संख्या को अलग से हाईलाईट करने के लिये अलग रंग काइस्तेमाल किया जाता है। अस्सी के दशक में मैंने अपनी पत्रकारिता में अनेकघटनाओं को देखा है और समझा है। इंदिरा गांधी की हत्या, राजीव गांधी हत्याजैसी खबरों में कभी अखबार रंगीन नहीं छपे। यह एक राष्ट्रीय आपदा है औरकोई भी आपदा कभी रंगीन नहीं हो सकती है किन्तु अखबारों ने बदले समय मेंहादसे को, आपदा को भी रंगीन बना दिया है। इस बारे में हमारे दिग्गजसम्पादक पत्रकार कभी चर्चा करते नहीं दिखते हैं। उनकी चर्चा मेंपत्रकारिता की विश्वसनीयता, सम्पादक की खत्म होती सत्ता, पेड न्यूज आदिइत्यादि होती हैं। यह ठीक भी है कि जब हम नयी टेक्नालॉजी के दौर में हैंतो अखबार रंगीन ही होना चाहिए। ये जो बातें मैं कर रहा हूं, वह फिजूल कीहैं और यह पिछड़ों की तरह है। नये दौर में नये सोच वाले पत्रकार चाहिए। इससिलसिले में मुझे स्मरण हो आया कि शायद यही कारण है कि अब अखबारों कोअनुभवी पत्रकारों की नहीं बल्कि नौजवान पत्रकारों की जरूरत है जिनकी उम्रपैंतीस से पार न हो।टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता से टेलीविजन की पत्रकारिता भी अछूता नहीं है।फर्क इतना ही है कि टेलीविजन की बंदिश यह है कि उसे टेक्स्ट के साथ साथदृश्य भी दिखाना होता है और इसके लिये खोजी प्रवृत्ति का होना जरूरी है।इस प्रवृत्ति से पत्रकारिता का विकास होता रहा है किन्तु खबरों को औरअधिक विश्वसनीय बनाने के फेर में पत्रकारिता की मर्यादा भूली जाने लगीहै। पत्रकारिता की सीमा को लांघ कर निजता का उल्लंघन किये जाने का बारबार आरोप न्यूज चैनलों पर लगता रहा है। इस आरोप को पूरी तरह स्वीकार न भीकरें तो अस्वीकार करने का कोई ठोस कारण नजर नहीं आता है। शायद यही कारणहै कि टेलीविजन की पत्रकारिता बहुत जल्द अविश्वसनीय होने लगी है। साख मेंयह गिरावट एक बड़ी चिंता का कारण है और इस पर मंंथन करना जरूरी है। इस तरहयह मान लेना चाहिए कि हम टेक्नॉलाजी की पत्रकारिता कर रहे हैं और आनेवाले दिनों में यही टेक्नालॉजी पत्रकारिता ही काम करेगी।लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं
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