शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

REPORTER: rone ke liye hum nahi

REPORTER: rone ke liye hum nahi

rone ke liye hum nahi

विलाप नहीं, कीमत खुद तय करें

-मनोज कुमार

एक नौजवान पत्रकार साथी ने शोषण के संदर्भ में एक अखबार कह कर जिक्र किया है और संकेत के तौर पर साथ में एक टेबुलाइड अखबार देने की बात भी कही है। समझने वाले समझ गये होंगे और जो नहीं समझ पाए होंगे, वे गुणा-भाग लगा रहे होंगे। यहां पर मेरा कहना है कि एक तरफ तो आप शोषण की कहानी साथियों को बता सुना रहे हैं और दूसरी तरफ आपके मन में डर है कि अखबार का नाम बता देने से आपका भविष्य संकट में पड़ सकता है। आप नौजवान हैं और पत्रकारिता के चंद साल ही हुए हैं। अपने आरंभिक दिनों में यह डर मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगता है। बोलते हैं तो बिंदास बोलिये वरना खामोशी ही बेहतर।

पत्रकारिता में आने वाले हर साथी से हमारा आग्रह है और उन्हें सलाह भी कि पत्रकारिता में हम तो गंवाने ही आये हैं, कमाना होता तो इतनी काबिलियत है कि कहीं बाबू बन जाते और बैठकर सरकार को गालियां देते रहते। ये हमारी फितरत में नहीं है। इस तस्वीर को बदलने के लिये ही हम आए हैं। जहां तब बात शोषण की है तो सभी को यह समझ लेना चाहिए कि यह शोषण हमारी ट्रेनिंग की पहली सीढ़ी है। जब हम खुद शोषित होते हैं तो पता चलता है कि समाज में शोषण किस स्तर पर हो रहा है। मैं शोषण की तरफदारी नहीं कर रहा हूं लेकिन यह जरूर कहता हूं कि आप काबिल हैं तो अपनी कीमत खुद तय कीजिए। आपको लगता है कि आपकी एक रिपोर्ट/लेख की कीमत पांच हजार है तो उतना मांगिये और नहीं दे तो रिपोर्ट/लेख लिखने की जरूरत ही नहीं। ऐसी बातों से कुंठित होकर आप अपना समय खराब कर रहे हैं। देश के नामचीन अखबारों में शोषण आम बात है।

लगे हाथ को आपको एक मिसाल दे जाऊं, शायद अच्छा लगे और आपके काम आए। पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात काफी अर्से से चल रही है। आप जैसे कुछ नौजवान साथियों से इस बारे में मैंने बात की। वे भी इस बात के पक्षधर थे। मैंने उनसे एक सवाल किया कि देश के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले अखबार में आप नौकरी करते हैं और महीने में आपको दस हजार की तनख्वाह दी जाती है। इसके बदले में आप माह भर में दस एक्स्कूलसिव खबरें देते हैं। यानि हर खबर की कीमत एक हजार रुपये। वे मेरी बात से सहमत हुए लेकिन पूरी तरह नहीं। वे तब भी यह मानने को तैयार नहीं कि पत्रकारिता व्यवसायिक नहीं हुई है। आखिरकार मुझे थोड़ा गुस्सा आया और सच से उन्हें वाकिफ करना पड़ा कि उस अखबार का सर्कुलेशन एक लाख हो तो आपको दस पैसे के हिसाब से भुगतान किया जाता है। दस पैसे की पत्रकारिता और बातें बड़ी बड़ी। तो आपने कहा है कि दो सौ से एक हजार रुपये तक का भुगतान किया जाता है तो यहां भी मामला एक खबर का भुगतान दस पैसे जैसा ही है। वे पाठक से अखबार की कीमत तीन रुपये और कहीं कहीं अधिक वसूलते हैं और बदले में पाठक को पूरे अखबार की खास खबर के नाम पर एकाध रुपये की खबर देते हैं। शेष खर्चा तो प्रबंधन में होता है।

दोस्त, सच यही है और इस सच से आप मुंह चुराएंगे या विलाप करेंगे तो स्थिति नहीं बदलने वाली। यदि आप इतने ही दुखी हैं तो साहसी साथियों को साथ लेकर कोई उपक्रम कीजिये और यह मेहनत अपने लिये कीजिये। मेरे लिये कहना आसान है किन्तु इसे व्यवहार में लाना कठिन। फिर आपको यह भी पता होना चाहिए कि पत्रकारिता में आने के लिये आपको किसी ने आमंत्रण नहीं दिया। स्थितियों को बदलने की आग लेकर पत्रकरिता के मैदान में आयें हैं तो चुनौती का सामना करना भी सीखें। मुझे वह दिन देखना है जब आप जैसे साथी कहीं लिखेंगे कि आपने अपनी कीमत खुद पहचान ली है। चलते चलते मैं बता दूं कि एक भड़ास जैसे एक नयी नवेली मीडिया वेबसाइट का निमंत्रण आया कि मैं उनके लिये लिखूं तो मैंने फौरन पूछ लिया कि कितने पैसे दोगे? तो उनका जवाब था कि हमारे यहां नीति नहीं है भुगतान की। जब उनके पास भुगतान की नीति नहीं है तो मैंने कहा था कि वेबसाइट लांच करो। बावजूद इसके वह वेबसाइट चल रही है और चलेगी भी। भड़ास पर लिखता हूं तो अपनी मर्जी से। स्वयं के आनंद के लिये और जब लगेगा कि यशवंत भाई से भी मेहनताना मांगा जाए तो पीछे नहीं हटूंगा।यह भी सच है कि आपको यह पता होना चाहिए कि गुंबद हमेशा से चमकदार होती है किन्तु बुनियाद का कोई नामलेवा नहीं होता है। विलाप नहीं, क्रांति कीजिए और शोषकों से लोहा लीजिए। 

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

Samagam

समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत है। मीडिया के विस्तार एवं विकास के दौर में भी जनजातीय पत्रकारिता हमेशा से अछूती रही है। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ समेत अनेक राज्य हैं जहां की आदिवासी आबादी बहुलता में है। इन राज्यों में भी कभी जनजातीय पत्रकारिता को स्थान नहीं दिया गया। समागम ने एक कोशिश की है। नामचीन पत्रकार, साहित्यकार एवं शोधार्थियों के आलेख इस अंक में शामिल किया गया है, इस उम्मीद के साथ की मीडिया में इस विषय पर चर्चा होगी। आज नहीं तो कल जनजातीय पत्रकारिता को भी ग्रामीण पत्रकारिता की तरह स्वरूप मिल सकेगा।

बुधवार, 3 नवंबर 2010

Media

जनजातीय पत्रकारिता शिक्षा की जरूरत

मनोज कुमार

हिन्दुस्तान का ह्दय प्रदेश मध्यप्रदेश की पहचान एक बड़े हिन्दी एवं आदिवासीबहुल प्रदेश की है। अलग अलग अंचलों यथा भोपाल रियासत, मालवा, विंध्य, महाकोशल, बुंदेलखंड एवं छत्तीसगढ़ को मिला कर चौवन साल पहले नये मध्यप्रदेश का गठन किया गया था। दस वर्ष पहले छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग होकर पृथक राज्य की पहचान बना ली किन्तु अपनी स्थापना के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश निरंतर अपनी पहचान के लिये संघर्षरत रहा है। उसका यह संघर्ष अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। ऐसा भी नहीं है कि इन सालों में उसने विकास नहीं किया या समय के साथ कदमताल करने में पीछे रहा किन्तु कुछ बुनियादी कमियों के चलते मध्यप्रदेश की छवि एकजाई नहीं बन पायी। मध्यप्रदेश की बात शुरू होती है तो उसकी परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को लेकर। अपने जन्मकाल से पहले ही मध्यप्रदेश की धरा हमेशा से साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में सम्पन्न रहा है। उसकी यह सम्पन्नता समय के साथ और भी बढ़ी है। इस बात का साक्षी रजतपट भी बन गया है। मुंबई के बाद अब मायानगरी बनने के लिये मध्यप्रदेश फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बनती जा रही है। राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के अनेक हिस्सों में पहले भी कई फिल्मों की शूटिंग हुई है और अब इसकी संभावना बढ़ चली है। भोपाल में फिल्म सिटी के लिये स्थान का चयन भी हो चुका है।
मध्यप्रदेश में भाषायी फिल्म निर्माण में हमेशा संकट बना रहा है और आने वाले समय में भी इसे दूर किया जाना संभव नहीं दिखता है। ऊपर जैसा कि हमने कहा कि मध्यप्रदेश का निर्माण विभिन्न अंचलों को लेकर हुआ है तो स्थानीय बोली में बनने वाली फिल्में उस खास अंचल का प्रतिनिधित्व करती हैं न कि समूचे मध्यप्रदेश का। उदाहरण के तौर पर मालवा क्षेत्र में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म मालवा का प्रतिनिधित्व करती है तो बुंदेली में बनने वाली क्षेत्रीय भाषायी फिल्म बुंदेलखंड की होगी न कि समूचे मध्यप्रदेश की। यह हाल राज्य के दूसरे अंचलों की भी है। इसे दूसरी तरह से देखें तो दस साल पहले मध्यप्रदेश से पृथक होकर छत्तीसगढ़ राज्य को अपनी पहचान के लिये इस तरह का संघर्ष नहीं करना पड़ रहा है। वहां बनने वाली फिल्में छत्तीसगढ़ी फिल्में कहलाती हैं और सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। छत्तीसगढ़ को लगातार और बड़ी संख्या में बनने वाली फिल्मों के कारण छालीवुड नाम भी दिया गया है। मध्यप्रदेश के सामने यह संकट है और बना रहेगा।

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण में आदिवासी समुदाय की हमेशा से अनदेखी की गई है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शासन स्तर पर तो कुछ फिल्मों का निर्माण किया जा रहा है किन्तु सरकारी होने के ठप्पे से वे बरी नहीं हो पायी हैं। मध्यप्रदेश ने एक कदम आगे बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय जनजाति फिल्मोत्सव का आयोजन भी कर रहा है किन्तु इस आयोजन का प्रभाव अभी देखने को नहीं मिला है। इस आयोजन से प्रभावित होकर निजी फिल्म निर्माता यदि रूचि दिखाते हैं तो मध्यप्रदेश का स्वरूप एक बड़े केनवास में देखने को मिल सकेगा। निजी फिल्म निर्माताओं की एक सबसे बड़ी बाधा यह है कि जब वे आदिवासी समुदाय पर फिल्म बनाने का काम करते हैं तो उन्हें उनके शोषण की कहानी ही मिलती है। यह सच है कि आदिवासी समाज का शोषण होता रहा है और समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाईश से भी इंकार नहीं किया जा सकता है किन्तु सिर्फ उनके शोषण को केन्द्र में रखकर फिल्म निर्माण की सोच आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा। आदिवासी समाज में आ रहे बदलाव एवं उनकी उत्कृष्ट परम्पराएं मुख्य धारा में जी रहे समाज के लिये मिसाल है। इस बात को जानना चाहिए कि आदिवासी समाज के मूल में तीन महत्वपूर्ण बातें हैं जिसमें पहला यह कि आदिवासी समाज हमेशा से वाचिक परम्परा में जीता आया है, दूसरा यह कि वह राज्याश्रित नहीं है तथा तीसरा यह कि वह अपने आपमें स्वतंत्र है इसलिये  किसी तरह की क्रांति की तरफ उसकी सोच नहीं जाती है। जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी अपनी परम्पराएं हैं, रीति-रिवाज हैं जो आधुनिक समाज को कई बार सीख देते हैं। उनकी इस खास चीजों को रेखांकित किये जाने की जरूरत है।

आदिवासी समाज और आधुनिक समाज के बीच सेतु का काम मीडिया कर सकता है। मीडिया की पहुंच व्यापक है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है किन्तु आदिवासी समाज को लेकर मीडिया को भी शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है। अभी तक मीडिया में दो तरह से आदिवासी समुदाय को प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है पहला वह जो सरकार की विभिन्न संस्थाओं द्वारा दिये गये साहित्य को आधार बनाकर खबरें, लेख व फीचर प्रकाशित किये जाते रहे हैं और दूसरा मंत्रालयों में दौड़ रही आदिवासी समाज की कल्याण व अकल्याण की खबरें। इसमें भी वास्तविकता तलाशने के स्थान पर सनसनी का भाव ज्यादा रहता है। इसे इस तरह से भी हम समझ सकते हैं कि झाबुआ का भगोरिया, बस्तर का घोंटुल या छिंदवाड़ा के पातालकोट को लेकर कई तरह की भ्रम-विभ्रम की स्थिति बनी हुयी है। कुछ कारण तो सरकार की वो बंदिशें हैं जहां सुरक्षा की दृष्टि से जारी हैं। इस पर भी ध्यान देना होगा।

आदिवासी समाज के विकास और विस्तार में मीडिया की भूमिका कारगर हो सकती है बशर्तें मीडिया का प्रशिक्षण हो। मध्यप्रदेश में देश का पहला जनजातीय वि·ाविद्यालय के आरंभ होने की कार्यवाही जारी है। वि·ाविद्यालय के पूर्ण स्वरूप आने में अभी समय है और तब तक या इसके बाद भी भोपाल स्थिति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय में जनजातीय पत्रकारिता पर पाठ्यक्रम आरंभ किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। लगभग पन्द्रह से अधिक नये विषयों का पाठ्यक्रम इस वि·ाविद्यालय ने आरंभ किय है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए किन्तु अपने ही प्रदेश में अपने ही विषय का पाठ्यक्रम का न होना, अखरने वाली बात है। कुछ माह पहले रायपुर स्थित स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय ने अखिल भारतीय स्तर पर जनजातीय पत्रकारिता पर वर्कशॉप का आयोजन कर अपनी चिंता जाहिर की थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में भोपाल के साथ रायपुर का पत्रकारिता वि·ाविद्यालय जनजातीय पत्रकारिता पाठ्यक्रम आरंभ करने की दिशा में पहल करेगा।

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

समागम का नया अंक पेडन्यूज के खिलाफ आवाज उठाने वाले अखबारों को समर्पित

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का अक्टूबर २०१० का अंक बिहार के दो प्रमुख समाचार पत्रों प्रभात खबर एवं हिन्दुस्तान को सलाम करता है जिन्होंने बातों से आगे बढ़कर व्यवहार में पेडन्यूज नहीं छापने का ऐलान किया है।

media

पत्रकारिता में हर कोई वरिष्ठ?

-मनोज कुमार

इन दिनों पत्रकारिता में वरिष्ठ शब्द का चलन तेजी से हो रहा है। सामान्य तौर पर इसके उपयोग से कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए किन्तु हम शब्दों के सौदागर हैं तो शब्दों के उपयोग और प्रयोग से सावधान रहना चाहिए। अमूनन दो पांच वर्ष काम कर चुके पत्रकार अपने नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार का उपयोग करना नहीं भूलते हैं। वरिष्ठ शब्द के उपयोग के पीछे शायद मंशा अधिक सम्मान और स्वयं को वि·ासनीय बनाने की हो सकती है किन्तु मेरी समझ में पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जहां वरिष्ठ और कनिष्ठ शब्दों का बहुत कोई अर्थ नहीं है। हमारे पेशे में महत्व है तो आपके लेखन का। रिर्पाेटिंग करते हैं तो आपकी रिपोर्ट आपकी वरिष्ठता और कनिष्ठता का पैमाना बनती है और आप सम्पादक हैं तो समूचा प्रकाशन आपका आईना होता है। कदाचित लेखक हैं तो विषयों की गंभीरता आपके वरिष्ठता का परिचायक होती है। इधर अपनी लेखनी, रिपोÍटग और सम्पादकीय कौशल से परे केवल पत्रकारिता में गुजारे गये वर्षाें के आधार पर स्वयंभू वरिष्ठ बताने की ताक में लगे हुए हैं।

वरिष्ठ क्या होता है, इसकी मीमांसा भी कर लेते हैं। मेरी राय में वरिष्ठ से आशय उस शब्द से है जो किसी भी क्षेत्र में एक समय तक काम कर लेने एवं ख्याति प्राप्त कर लेने के बाद प्राप्त होता है। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, आलोक मेहता आदि इत्यादि ऐसे नाम हैं जो स्थापित हैं और जिन्हें आप स्वयं आगे आकर वरिष्ठ कहला कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं किन्तु उन हजारों पत्रकारों को जिन्हें दो, पांच अथवा दस साल काम करते हुए हैं और वे अपने आपको वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं। वरिष्ठता वास्तव में काम किये गये वर्षाें से नहीं होती है बल्कि काम में प्राप्त ख्याति से होती है।

मेरी बातों से असहमत साथी कह सकते हैं कि किसी समाचारपत्र अथवा पत्रिका में सम्पादक पद सुशोभित करने वालों को वरिष्ठ पत्रकार नहीं माना जाना चाहिए? मैं यहां भी ना में कहूंगा। सवाल यह है कि अपने सम्पादक रहने की अवधि में उन्होंने ऐसा क्या किया कि समाचार पत्र को अलग से ख्याति मिली। यदि ऐसा है तो उन्हें स्वयं ही वरिष्ठता का दर्जा मिल जाएगा किन्तु ऐसा नहीं है तब उन्हें इस तखल्लुस का स्वयं होकर उपयोग करना होगा। यह सर्वविदित है कि किस तरह आज के दौर में जोड़-तोड़ कर सम्पादक बना जाता है। कहीं राजनीतिक सिफारिश के बूते पर तो कहीं किसी और माध्यम से। किसी सम्पादक की सफलता उसके नाम से अखबार की पहचान हो, ऐसा होना चाहिए न कि अखबार के नाम से सम्पादक की पहचान हो। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें अखबार बाद में, सम्पादक पहले होते थे।

इन दिनों एक गलत परम्परा शासकीय विभाग भी डाल रहे हैं। वे जाने-अनजाने में ऐसे अनेक पत्रकारों के नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार जोड़ देते हैं जो किसी भी कीमत पर इसके हकदार नहीं हैं। उनके पीछे उनका मकसद उनके अखबारों में अपनी खबरों के लिये पर्याप्त जगह पाना होता है। शायद शासकीय विभाग अपने मकसद में कामयाब हो भी जाते होंगे किन्तु पत्रकार साथी एक बार वरिष्ठता पदनाम में कैद हो जाता है तो वह फिर कभी नहीं उबर पाता है। इन दिनों विभिन्न वेबसाइट एवं ब्लॉग में लिखने वाले पत्रकारों को भी वरिष्ठ पत्रकार लिखा जा रहा है, जो एक हद तक तो ठीक है किन्तु इसके बाद शायद नहीं। पत्रकारों के काम का लेखा-जोखा करने के बाद ही वरिष्ठ लिखा जाना बेहतर होगा। वरिष्ठ शब्द का मायने मेरे लिये अपने काम के प्रति अधिक जिम्मेदार होना है। जिम्मेदारी ही वरिष्ठता का दूसरा रूप है। वरिष्ठता शब्द का उपयोग सोच-समझ कर किया जाना ही वरिष्ठता शब्द का सम्मान किया जाना होगा।

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

media

अब क्यों बात नहीं होती पीत पत्रकारिता की?
मनोज कुमार
लगभग एक दशक पहले पत्रकारिता का भेद हुआ करता था। एक पत्रकारिता होती थी सकरात्मक एवं दूसरा नकरात्मक जिसे हम हिन्दी में पीत पत्रकारिता और अंग्रेजी में यलो जर्नलिज्म कहा करते थे। बीते एक दशक में पत्रकारिता का यह फर्क लगभग समाप्त हो चला है। अब पीत पत्रकारिता की बात नहीं होती है। हैरत नहीं होना चाहिए कि इस एक दशक में आयी पत्रकारिता की पीढ़ी को इस पीत पत्रकारिता के बारे में कुछ पता ही नहीं हो क्योंकि जिस ढर्रे पर पत्रकारिता चल रही है और जिस स्तर पर पत्रकारिता की आलोचना हो रही है, उससे ऐसा लगने लगा है कि समूची पत्रकारिता ही पीत हो चली है। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है और हो भी नहीं सकता और होना भी नहीं चाहिए। पत्रकारिता की इस फिलासफी के बावजूद यह बात मेरे समझ से परे है कि ऐसा क्या हुआ कि पत्रकारिता से पीत शब्द गायब हो गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि समूची पत्रकारिता का शुद्विकरण हो गया हो और पूरी पत्रकारिता सकरात्मक भूमिका में उपस्थित दिखायी दे रही हो किन्तु यह भी नहीं है क्योंकि यदि ऐसा होता तो पत्रकारिता की आलोचना जिस गति से हो रही है, वह नहीं होती। इसका मतलब साफ है कि पत्रकारिता के मंच पर स्याह का रंग और गहराया है।
पत्रकारिता की इस समस्या को हल्के से नहींं लिया जाना चाहिए। स्कूल के दिनों में मास्टरजी सिखाया करते थे कि सफेद रंग का महत्व तब तक है जब तक कि काला रंग मौजूद हो और जब काला रंग गायब हो जाएगा तो सफेद महत्वहीन हो जाएगा और यही बात काले रंग के साथ भी है। उसका अस्तित्व भी सफेद पर टिका है। इस आधार पर पत्रकारिता के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि सकरात्मक पत्रकारिता को जानने और पहचानने के लिये पीत पत्रकारिता का भेद करना जरूरी है किन्तु जब समूची पत्रकारिता सकरात्मक हो जाएगी तो भेद कैसे होगा। दुर्भाग्य से इन दिनों समूची पत्रकारिता भले ही सकरात्मक न हो पायी हो किन्तु पीत जरूर हुयी है। इस स्थिति से पत्रकारिता को बचाना जरूरी होगा।

पत्रकारिता का विस्तार हुआ है और इसी के साथ विश्वसनीयता का संकट पैदा हुआ है तो सिर्फ इसलिये कि अब हम पीत पत्रकारिता की बात नहीं करते हैं। उसे नया नाम दे रहे हैं जैसे पेड न्यूज। पेडन्यूज भी तो पीत पत्रकारिता का हिस्सा है। मेरी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में बताया गया था कि पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर लिखी गयी खबर अथवा दी गयी सूचना पीत पत्रकारिता कहलाती है। समाज हित में, देशहित में इससे बचना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि लगभग तीस साल पहले की पीत पत्रकारिता उतनी भी स्याह नहीं थी जितना कि आज हम महसूस कर रहे हैं। पत्रकारिता में सकरात्मकता का स्थान समाप्त हो रहा है तो इसका कारण यह नहीं है कि अच्छे लोगों ने काम करना बंद कर दिया है बल्कि सकरात्मक पत्रकारिता के समाप्त होने का भय इसलिये ज्यादा हो रहा है कि नयी पीढ़ी को पत्रकारिता की मुफलिसी, उसकी जवाबदारी नहीं बतायी जा रही है बल्कि उसे बताया जा रहा है कि जल्द से जल्द धनवान कैसे बनें?
यह सच है कि युवा मन वह भले ही पत्रकार हो, अच्छी जिंदगी जीने की चाहत होती है और जब यह ज्ञान मिले तो इससे ज्यादा सुखकर क्या होगा? अपने काम की कीमत हर प्रोफेशनल्स को मालूम होना चाहिए लेकिन इसके पहले अपने प्रोफेशन की जवाबदारी का अहसास होना ज्यादा जरूरी है और हो यही रहा है कि उत्तरदायित्व तो हमें मालूम नहीं लेकिन अधिकार के बारे में हम सजग हो गये हैं। यह एक सच है जिसने पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता में समाहित कर दिया है। यह सब सकारण नहीं हो रहा है और न ही सुनियोजित ढंग से बल्कि यह अनजाने में और अनियोजित ढंग से। इसके लिये डिग्री कॉलेजों की तरह रोज खुल रहे वो पत्रकारिता शिक्षण संस्था भी जवाबदार हैं।


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