बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

विजय का दशहरा


मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश£ेषक
भारत वर्ष में बस्तर और कुल्लू का दशहरा पर्व संसार भर में ख्यात है. दोनों स्थानों में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की अपनी अपनी विशेषतायें हैं. इस बार बस्तर का दशहरा पर्व कुछ अलग ही मायने रखता है. बस्तर का इस वर्ष का दशहरा पर्व सही अर्थों में विजय का दशहरा पर्व कहा जा सकता है. कुछ महीने पहले ही बस्तर की हरी-भरी भूमि पर जो रक्तपात हुआ और इसके पहले जो रक्तपात होता रहा है, वह दिल दहला देने के लिये कम नहीं है. पूरा देश इस रक्तपात की घटनाओं से जख्मी है और हतप्रभ भी. ऐसी विषम स्थितियों में भी आदिवासियों द्वारा अपने परम्परागत दशहरा पर्व को उसी उत्साह से मनाये जाने को विजय का दशहरा ही कहा जा सकता है. एक मामूली बम फटने के बाद जब लोग दुबक जाते हैं, बम फटने की आवाज देर तक डराती रहती है तब बस्तर की धरती और उसके जन बार बार के रक्तपात से न सहमते हंै, न सिहरते हैं बल्कि दुगुने उत्साह के साथ स्वयं को खड़ा कर लेते हंै. बस्तर के आदिवासियों का यह उत्साह केवल उत्सव का उत्साह नहीं है बल्कि जीवन का उत्साह है जो समूचे संसार को एक नया पाठ पढ़ाता है. 

बस्तर में पिछले दशकों में निरंतर आतंक के साये में रहा है. नक्सलियों और तंत्र के साथ मुठभेड़ के बीच जो रक्तपात होता रहा है, वह जनपदीय समाज को भयभीत किये हुये है. जंगलों के बीच जी रहे आदिवासियों के मन में भी भय न हो, यह कहना मुश्किल है. सरकारें बदलती रहीं और हर सरकार ने बस्तर के आदिवासियों का लेखा भी बदलने की कोशिश की. इन कोशिशों से बस्तरिया आदिवासियों का जीवन कितना बदला या नहीं बदला, यह तो कहना मुश्किल है लेकिन उनका उल्लास से भरे आदिम मन को कोई तंत्र, कोई सरकार नहीं बदल पायी, यह दावे के साथ कहा जा सकता है. बरसों पुराने परम्परागत बस्तर दशहरे के उत्साह को देखकर कोई अंदाज नहीं लगा सकता कि इस जमीन पर कुछ महीने पहले आतंक ऐसे पसरा था, मानो समय थम गया हो. समय को उसी गति से जीने और चलने देने की जीजिविषा आदिम समाज में अपनी उत्पत्ति के समय रही होगी, वह ताप आज 21वीं सदी में भी देखने को मिल रहा है.

बस्तर दशहरा दो-एक दिन का उत्सव नहीं होता है और न ही प्रतीकात्मक रूप से रावण का पुतला जलाने की रस्मअदायगी होती  है. बस्तर दशहरा का उत्सव पूरे पचहत्तर दिन का होता है. पूरे विधान के साथ जिसमें आम आदमी से लेकर राज परिवार तक शामिल होता है. बस्तर दशहरे के लिये बनाये जाने वाले रथ के लिये आदिम समाज जुट जाता है. इस विशालकाय बस्तर रथ के निर्माण में जुटे आदिवासीजनों का उत्साह देखने योग्य होता है. बस्तर दशहरे का रथ भोपाल में बने मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय  एवं राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में भी देखने को मिल जायेगा. 75 दिनों के इस उत्सव का उल्लास और भी पहले से शुरू हो जाता है. इस उल्लास में कोई खलल डाले, यह आदिम समाज को मंजूर नहीं है. जो रक्तपात हो रहा है, बस्तर के घने जंगलों में आतंक की जो सरसराहट है और जो इस उत्सव में बाधा पैदा कर सके, वह स्थितियां भी हैं लेकिन आदिम समाज इस सबसे बेफिकर हंै. उनके लिये हर सांझ दुख बिसराने के लिये होता है और हर सुबह वह प्रकृति का स्वागत करता है, मुस्करता है. उसके पास पीछे देखने के लिये कुछ भी नहीं होता है. इस बार के दशहरे को लेकर जनपदीय समाज में भले ही आशंका रही हो लेकिन आदिम समाज हमेशा से आशा में जीता रहा है. बस्तर दशहरे की गमक और खनक इस बार भी वैसा ही है, जैसा कि परम्परागत रूप से बीते अनेक दशकों से रहा है. बस्तर का यह दशहरा सचमुच में विजय का दशहरा है जो सिखाता है कि तम से कैसे लड़ें, कैसे आतंक को आशंका से नहीं आशा से निपट लें. बस्तर का यह दशहरा पर्व समूचे संसार को आतंक के खिलाफ एक संदेश देता है आओ, हम सब मिलकर रोज पैदा हो रहे दशानन का वध करें, तम को दूर कर उजाले का दीपक जलायें.

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

मजबूरी के गांधी

 
-मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक 

महात्मा गांधी की जनस्वीकार्यता पर कभी कोई सवालिया निशान नहीं लगा. महात्मा द्वारा बताये गए  सादा जीवन, उच्च विचार लोगों को हमेशा से शालीन जीवन के लिये प्रेरित करते रहे हैं. मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहने की शिक्षा एवं अङ्क्षहसा के बल पर जीने के जो रास्ते महात्मा ने अपने जीवनकाल में बताये थे, वह हर भारतीय के लिये आजीवन आदर्श रहे हैं. भारतीय ही नहीं, दुनिया के लोगों को भी महात्मा का बताया रास्ता जीने का सबसे सहज एवं सुंदर रास्ता लगा है. इससे परे एक-डेढ़ दशक में महात्मा गांधी के प्रति राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता अचरज में डालने वाली है.
आज 2 अक्टूबर को हर वर्ष की तरह जब हम  महात्मा गांधी की जयंती का उल्लास मना रहे हैं और इस उल्लास में कैलेंडरी उत्सव से अलग होकर विभिन्न राजनीतिक दल भी महात्मा का स्मरण करेंगे. राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति यह  जो  चेतना जागृत हुई  है, उसे सकरात्मक भाव से देखें तो अच्छा लगेगा कि जिस महात्मा को अपने ही देश में पचास साल से ज्यादा समय में राजनीतिक स्वीकार्यता नहीं मिली, आज उस देश की राजनीतिक पार्टियां महात्मा के सहारे के बिना नहीं चल पा रही हैं. महात्मा की यह स्वीकार्यता सहज नहीं है. इसे अनेक दृष्टिकोण से देखना और समझना होगा. यह बात सच है कि वोट की राजनीति में रंगे राजनीतिक दलों के लिये महात्मा गांधी अचानक आदर्श बनने के पीछे  गांधी के आदर्शों की दुहाई देकर वोटबैंक को खींचने की मानसिकता ही है. भारतीय जनमानस की महात्मा में आज भी वैसी ही आस्था है, जैसा कि उनका अपने देवलोक पर. जनमानस की भावनाओं को केश कराने की जुगत  राजनीतिक दलों में महात्मा के प्रति  पहले से कही ज्यादा अनुराग बढ़ा है. 
बहुत ज्यादा छानबीन न करें तो भी 15-20 बरस से पहले सभी राजनीतिक दलों के अपने अपने आदर्श राजनेता रहे हैं. समाजवादी पार्टी लोहिया के बताये मार्ग पर चल रही है तो बहुजन समाज पार्टी के लिये डॉ. भीमराव आम्बेडकर प्रेरणास्रोत रहे हैं. कभी जनसंघ किन्तु अब भारतीय जनता पार्टी के पास डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, गोलवलकरजी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं वीर सांवरकर जैसे अनेक नेता हैं जिनके बताये रास्ते का अनुसरण ये दल करते रहे हैं. माक्र्सवादियों के भी अपने आदर्श रहे हैं. इसे आप सहज रूप में यह कह सकते हैं कि सभी दलों के पास अपने अपने ये नेता ब्रांडएम्बेसडर के रूप में मौजूद हैं जिन्हें जरूरत के अनुरूप उपयोग किया जाता रहा है. कांग्रेस के पास महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल सरीखे नेता रहे हैं. हालांकि ये नेता कांग्रेस पार्टी के नहीं बल्कि भारत वर्ष की विरासत हैं किन्तु अन्य राजनीतिक दलों ने इनसे परहेज किया है और वे अपने ही नेताओं को आदर्श मानकर राजनीति करते रहे हैं. यहां उल्लेखनीय है कि स्वाधीनता के पूर्व महात्मा गांधी से अनेक नेताओं के विचार मेल नहीं खाते थे. जिन नेताओं से गांधीजी के वैचारिक मतभेद थे, वे जगजाहिर हैं और इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं. गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं होने वाले नेताओं में डॉ. अम्बेडकर, डॉ. मुखर्जी, लोहिया और यहां तक कि कांग्रेस के प्रथम पंक्ति में गिने जाने वाले अनेक नेता भी उनके विचारों से सहमत नहीं थे. 
      अस्तु, स्वाधीन भारत में लोकतंत्र स्थापित हो गया. 1975 में देश में आपातकाल लग जाने के बाद राजनीति स्थितियां तेजी से बदली और जनता दल का उदय हुआ. सत्ता संघर्ष में जनता दल के अनेक टुकड़े हुये और सबने अपने अपने रास्ते तय कर लिये. ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया. विस्तार होता गया और नये-नये राजनीति दलों का जन्म होने लगा. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी इन्हीं में से हैं. प्रादेशिक दलों की बातें तो इनसे बिलकुल अलग है. इन सबके तब भी आदर्श अलग-अलग नेता थे लेकिन महात्मा गांधी की स्वीकार्यता वैसी नहीं थी, जैसा कि आज हम देख और समझ रहे हैं. आज हर दल के लिये महात्मा गांधी सर्वोपरि है. 
     नोट से लेकर वोट तक महात्मा गांधी की छाप अलग से देखी जा सकती है. यह बात तो तय है कि राजनीतिक दलों के लिये गांधीजी की स्वीकार्यता जरूरी नहीं बल्कि मजबूरी हैं क्योंकि एकमात्र गांधी ही ऐसे हैं जिनका ढि़ंढ़ोरा पीट कर भारतीय जनता को बहलाया जा सकता है. राजनीति दलों का गांधीजी को मानना बिलकुल वैसा ही है जैसा कि हम ईश्वर को तो खूब मानते हैं किन्तु ईश्वर का कहा नहीं मानते. राजनीतिक दल गांधीजी को तो खूब मान रहे हैं किन्तु उनका कहा कोई मानने को तैयार नहीं है. गांधीजी की राजनीतिक दलों की स्वीकार्यता तब जरूरी समझी जाती जब दागी नेताओं को चुनाव लडऩे के अयोग्य किये जाने फैसले के खिलाफ कोई पहल नहीं की जाती. हमारे लिये महात्मा जरूरी नहीं, मजबूरी हैं और इसलिये शायद आम चलन में कहा भी जाता है मजबूरी का नाम महात्मा गांधी.

सोमवार, 9 सितंबर 2013

एक जननायक बन जाने की कथा

मनोज कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया विश्लेषक 

राजनेताओं को समय-समय पर उपाधियां मिलती रही हैं. यह उपाधियां किसी संविधान के तहत नहीं बल्कि समाज की सहमति से तय होती हैं और आहिस्ता आहिस्ता चलन में आ जाती हैं. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को समाज ने कभी किसान का बेटा कहकर पुकारा तो कभी पांव पांव वाले भैया कह और इन दिनों उनके लिये नया तखल्लुस इस्तेमाल हो रहा है जननायक. किसान का बेटा होने के कारण इस तखल्लुस में आकर्षण नहीं था लेकिन पांव-पांव वाले भइया में कुछ आकर्षण दिखा. मुख्यमंत्री बनने के पहले और बाद में भी वे जनता से मिलने मोटर-कार के बजाय पैदल ही चला जाया करते थे. आम आदमी के लिये यह अलग किस्म का अनुभव था सो यह तखल्लुस लोकप्रिय हो गया. इसके बाद अचानक से उन्हें जननायक पुकारा जाने लगा. यह तखल्लुस सुनने में भला लगता था लेकिन इसके कारणों की पड़ताल किये बिना इसे समझ पाना मेरे लिये मुश्किल सा था. 

खैर, जिंदगी रफ्ता-रफ्ता गुजर रही थी. रोज की तरह किसी एक मैजिक में मैं धंसा घर वापस आ रहा था. एक पत्रकार होने के नाते आसपास क्या हो रहा है, इस पर तो नजर रहती ही है बल्कि आसपास क्या संवाद हो रहा है, यह भी जांच लेता हूं. जिस जननायक का सवाल मेेरे मन में कौंध रहा था, उसका जवाब इतनी आसानी से मिल जायेगा, यह सोचा भी नहीं था. हुआ यों कि जिस मैजिक में मैं सवार था, उस मैजिक के चालक का गलत चालान काट दिया गया था. मैजिक चालक ने न केवल पहले अपने साथ हुये गलत चालान की जांच की और तत्काल में उस चालान बनाने वाले अफसर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराकर मानहानि का मुकदमा भी ठोंक दिया.
अब मेरे चौंकने की बारी थी. एक मैजिक चालक की इतनी हिम्मत की वह पुलिस वाले से पंगा ले. मैं कुछ सोच और पूछ पाता कि उसने साथ चल रहे अपने साथी को आगे की घटना का ब्यौरा दिया. बकौल मैजिक चालक- हमारे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब गलत आरोप लगाने पर अजयसिंह पर मानहानि का मुकदमा कर सकते हंै तो हम अपने अधिकारों के लिये क्यों नहीं...? 
मैजिक चालक की इन बातों के बाद से पता चला गया कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को किसी व्यक्ति, संस्था या दल ने नहीं बल्कि समाज ने जननायक पुकारा है. जिनके कार्यों से समाज प्रेरित हो, उनकी अनुगामी बने, वह तो जननायक होगा ही. किसान का बेटा और पांव-पांव वाले भइया से ऊपर और शायद सौफीसदी सही है मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के लिये जननायक का तखल्लुस. इन्हें ही समाज कहता है मील का पत्थर. यह तो एक मामला है और न जाने कहां कहां और कितने लोगों ने मुख्यमंत्री से प्रेरणा पाकर अपनी जिंदगी को बदली होगी. समाज में बदलाव लाने वाले व्यक्ति ही सही अर्थों में जननायक होते हैं. 
लिये यह अलग किस्म का अनुभव था सो यह तखल्लुस लोकप्रिय हो गया. इसके बाद अचानक से उन्हें जननायक पुकारा जाने लगा. यह तखल्लुस सुनने में भला लगता था लेकिन इसके कारणों की पड़ताल किये बिना इसे समझ पाना मेरे लिये मुश्किल सा था. 

खैर, जिंदगी रफ्ता-रफ्ता गुजर रही थी. रोज की तरह किसी एक मैजिक में मैं धंसा घर वापस आ रहा था. एक पत्रकार होने के नाते आसपास क्या हो रहा है, इस पर तो नजर रहती ही है बल्कि आसपास क्या संवाद हो रहा है, यह भी जांच लेता हूं. जिस जननायक का सवाल मेेरे मन में कौंध रहा था, उसका जवाब इतनी आसानी से मिल जायेगा, यह सोचा भी नहीं था. हुआ यों कि जिस मैजिक में मैं सवार था, उस मैजिक के चालक का गलत चालान काट दिया गया था. मैजिक चालक ने न केवल पहले अपने साथ हुये गलत चालान की जांच की और तत्काल में उस चालान बनाने वाले अफसर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराकर मानहानि का मुकदमा भी ठोंक दिया.

अब मेरे चौंकने की बारी थी. एक मैजिक चालक की इतनी हिम्मत की वह पुलिस वाले से पंगा ले. मैं कुछ सोच और पूछ पाता कि उसने साथ चल रहे अपने साथी को आगे की घटना का ब्यौरा दिया. बकौल मैजिक चालक- हमारे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जब गलत आरोप लगाने पर अजयसिंह पर मानहानि का मुकदमा कर सकते हंै तो हम अपने अधिकारों के लिये क्यों नहीं...? 

मैजिक चालक की इन बातों के बाद से पता चला गया कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को किसी व्यक्ति, संस्था या दल ने नहीं बल्कि समाज ने जननायक पुकारा है. जिनके कार्यों से समाज प्रेरित हो, उनकी अनुगामी बने, वह तो जननायक होगा ही. किसान का बेटा और पांव-पांव वाले भइया से ऊपर और शायद सौफीसदी सही है मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के लिये जननायक का तखल्लुस. इन्हें ही समाज कहता है मील का पत्थर. यह तो एक मामला है और न जाने कहां कहां और कितने लोगों ने मुख्यमंत्री से प्रेरणा पाकर अपनी जिंदगी को बदली होगी. समाज में बदलाव लाने वाले व्यक्ति ही सही अर्थों में जननायक होते हैं. 

सोमवार, 2 सितंबर 2013

लायसेंसी पत्रकार


-मनोज कुमार

पत्रकारों को अब ट्रक ड्रायवर की तरह लायसेंस रखकर चलना होगा, यदि सरकार ने तय कर दिया कि पत्रकारों को भी डाक्टर और वकील की तरह लायसेंस लेना होगा. इस लायसेंस के लिये बकायदा परीक्षा भी पास करनी होगी. केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कह दिया है कि पत्रकारों को भी लायसेंस दिया जाना चाहिये और इसके लिये डाक्टर-इंजीनियर की तरह परीक्षा भी आयोजित होना चाहिये. इसके पहले प्रेस कांऊसिल के अध्यक्ष ने तो पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता तय करने के लिये एक कमेटी का गठन तक कर दिया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई हर दल और हर नेता देता रहा है लेकिन जब जब उनके हितों पर चोट पहुंची है तो सबसे पहले नकेल डालने की कोशिश की गई. पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी ने जो कुछ किया या कश्मीर और असम में जो कुछ हुआ, वह सब अभिव्यक्ति की आजादी में खलल डालने का उपक्रम है.

पराधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने की बात समझ में आती थी. अंग्रेजों को अपने हितों को बचाने के लिये ऐसा करना जरूरी हो सकता था किन्तु स्वाधीन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण करने का अर्थ समझ से परे है. पिछले तीन दशकों से एक शब्द मीडिया इजाद किया गया है और इस मीडिया ने पत्रकारिता को हाशिये पर डाल दिया है. समाज में जो समस्या उत्पन्न हो रही है, वह पत्रकारिता के कारण नहीं बल्कि मीडिया के कारण हो रही है. पत्रकारिता एक मिशन है और मीडिया पूरी तरह व्यवसाय. इस शब्द की उत्पत्ति के कारणों की तलाश में कुछ भी हाथ नहीं लगा. बस, जवाब मिला कि जिस तरह सम्पादक की कुर्सी पर प्रबंधक विराजमान है, उसी तरह पत्रकारिता पर मीडिया चिपक गया है. पत्रकारिता का रिश्ता दिल से है जबकि मीडिया का रिश्ता दिमाग से. दिल भावनाओं को समझता और जानता है तथा वह अपने से ऊपर उठकर जनहित और समाजहित में काम करता है जबकि दिमाग सबसे पहले नफा-नुकसान को देखता है और अपने हित के बारे में सोचता है. इस तरह मीडिया और पत्रकारिता के दायित्व, समझ और इन दोनों के बीच के अंतर को समझा जा सकता है.

जो लोग बार बार पत्रकारों की योग्यता की बात कर रहे हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि वे मीडिया के लोगों के बारे में कह रहे हैं या पत्रकारों के बारे में. तीन दशकों में कुछ इसी तरह का भ्रम फैलाकर सम्पादक की सत्ता को समाप्त कर दिया गया. प्रबंधकों को सम्पादक होना गैरजरूरी लगा और वे कुर्सी पर काबिज हो गये. अब पत्रकारों की शैक्षिक योग्यता और लायसेंस दिये जाने की बात की जा रही है और आने वाले दिनों में पत्रकार भी विलुप्त हो जाएंगे. इसी के साथ पत्रकारिता भी समाप्त हो जाएगी और रह जाएगा मीडिया. मीडिया में पत्रकार नहीं होते हैं बल्कि मीडियाकर होते हैं जो संस्था और प्रबंधकों के साथ स्वयं का लाभ देखते हैं. सन् 75 में जिस तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला गया था और इसी का परिणाम है कि मीडिया का प्रार्दुभाव हुआ. इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ अखबारों को राजस्व कमाने का अधिकाधिक अवसर देने का और रातोंरात बहुख्यक नामी-बेनामी प्रकाशन आरंभ हो गये. बाद के सालों में तो अखबार और पत्रिकाओं का ऐसा अंबार खड़ा हुआ कि हर परिवार से कथित रूप से एक पत्रकार गिना जाने लगा. इस गिरावट को रोकने के लिये तब कोई प्रयास न तो संस्थागत हुये और न ही शासकीय नियंत्रण की कोई कोशिश ही हुई परिणामस्वरूप समाज के दूसरे क्षेत्रों की तरह पत्रकारिता में भी लगातार गिरावट आती गयी. प्रतिबद्ध लोगों के स्थान पर लाभ कमाने वालों की संख्या बढ़ती गयी.

सवाल यह है कि आखिरकार सरकार पत्रकारिता के लिये शिक्षा और लायसेंस का दायरा क्यों बांध रही है? क्या सरकार को इस बात का इल्म नहीं है कि पत्रकारिता विशुद्ध रूप से अनुभव का मामला है और अनुभव डिग्री या डिप्लोमा लेने से नहीं आता और न ही लायसेंस लेकर पत्रकारिता की जा सकती है. जिन डाक्टरों और इंजीनियर से पत्रकारों की तुलना की जा रही है, वहां यह भी याद रखना चाहिये कि पत्रकार कोई पेशेवर नहीं हैं. उसके पास कभी न तो स्थायी पूंजी रही है और न वह कोई व्यापार कर सकता है. वह तो मिशनरी भाव से जीता है और दूसरों को खुश देखकर स्वयं खुश हो जाता है. उसका पहला और आखिरी लक्ष्य समाज में शुचिता कायम करना होता है लेकिन पेशेवर लायसेंसशुदा लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आजादी के पहले और बाद में भी खबर पर मर-मिटने वाला पत्रकार ही होता है.



यह सोच कर अच्छा लगता है कि आजादी के 66 बरसों में हमने कितनी तरक्की कर ली है. आजादी के पहले वे हमें कुचलने के लिये बर्नाकुलर प्रेसएक्ट लाते हैं तो स्वाधीन भारत में लायसेंसी बना दिया जाता है. लायसेंसी का अर्थ तो आप बेहतर समझते होंगे. संभव है कि सरकार अपने मकसद में कामयाब हो जाए और पत्रकारों को जरूरी शैक्षिक योग्यता हासिल करना पड़े. इसके बाद उसे लायसेंस हासिल करने के लिये फिर से परीक्षा देना हो और उसमें पास हो जाये और लायसेंसी पत्रकार के रूप में विख्यात हो जाएगा. इसके बाद की स्थिति की कल्पना कीजिये कि एक पत्रकार जो लायसेंसी है, वह भला इतनी हिम्मत कहां से लायेगा कि वह सरकार के काले कारनामों से परतें उखाड़ सके. वह कर सकता है लेकिन करेगा नहीं क्योंकि तब उसे अपने लायसेंस रद्द हो जाने की चिंता होगी और नहीं तो कम से कम लायसेंस के रिनीवल की चिंता सतायेगी. लायसेंसी पत्रकार के राज में आम आदमी की आवाज पत्रकारिता के कान बंद हो चुके होंगे. उसे सरकार के द्वारा दिखायी जा रही, सुनाई जा रही चीजें ही समझ में आएंगी क्योंकि वह पत्रकार नहीं, लायसेंसी होगा. 

रविवार, 11 अगस्त 2013

स्वाधीनता संघर्ष की महक छत्तीसगढ़ की मिट्टी में


-मनोज कुमार
हिन्दुस्तान के स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ के अतुलनीय योगदान की महक छत्तीसगढ़ की मिट्टी में आज भी रची-बसी है. 66 बरस हो गये हिन्दुस्तान को आजाद हुये और इन बरसों में छत्तीसगढ़ विकास के पथ पर दौड़ पड़ा है. इस दौड़ में वह अपने सुनहरे अतीत को हमेशा साथ लेकर चला है. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के वीर सपूतों का स्मरण समय समय पर किया जाता रहा है. यह छत्तीसगढ़ की मिट्टी का ही प्रताप है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पुण्य कदम इस धरती पर पड़े और उन्हें यहां एक और गांधी मिला जिसे दुनिया ने पंडित सुंदरलाल शर्मा के नाम से जाना. गांधीजी के अछूतोद्धार अभियान में साथ निकल पड़े पंडित सुंदरलाल शर्मा के कार्यों ने गांधीजी को मोहित कर दिया था. स्वाधीनता संग्राम के सुनहरे पन्नों पर यादों की ऐसी श्रृंखला है जिसके स्मरण मात्र से ही शरीर रोमांच से भर जाता है. शहीद वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजों को नाको चने चबवा दिये थे. जिस साहस का परिचय वीर नारायण सिंह ने दिया, वह इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज हो गया. नाकाम अंग्रेजों को वीर नारायणसिंह से दो दो हाथ करने का साहस नहीं था इसलिये उन्हें वीर नारायण को धोखे से गिरफ्त में लेकर फांसी पर लटकाया जाना ही एकमात्र श्रेयस्कर रास्ता सूझा. अंग्रेजों की यह कायराना हरकतें पूरे देश में देखने को मिल रही थी. अंग्रेजों ने झूठे मामले गढ़ कर वीर नारायणसिंह को फांसी के तख्ते पर लटका दिया। वीर नारायणसिंह शहीद होकर छत्तीसगढ़ की भूमि को गौरवांवित कर गये।

छत्तीसगढ़ की मिट्टी के जनपदीय इलाकों में ही वीरों की गाथा नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ अंचल के जंगलों से भी अंग्रेजों के खिलाफ आग जल उठी थी. घनघोर बस्तर के जंगलों से अदम्य साहसी गुंडाधूर ने वीरता का परिचय देकर अंग्रेजों के खिलाफ हल्ला बोल दिया था. गुंडाधूर अकेले नहीं था बल्कि जंगलों में रहने वाले भूमिपुत्रों की बड़ी फौज थी जिसकी अगुवाई गुंडाधूर ने की थी. गुंडाधूर उन्हीं आदिवासी नायकों में एक था जैसे देश के अन्य हिस्सों में ट्ंटया भील, खाज्या नायक आदि-इत्यादि. अंग्रेजों को चुनौती देते और घने जंगलों में गुम हो जाते इन वीरों को ढूंढना अंग्रेजों के लिये टेढ़ी खीर था. यह कम हैरतअंगेज बात नहीं है कि शिक्षा से कोसों दूर इन वीरों को भी अपने वतन की उतनी ही चिंता थी जितना कि अंग्रेज जुल्म से बाखबर जनपदीय वीरों को.  जन और जंगल अंग्रेजों के खिलाफ खड़े थे और अंग्रेज अपने आपको बेबस और मजबूर महसूस कर रहे थे. आजादी के लिये घर-घर और गांव गांव मशाल जल उठी थी. क्या पुरूष, क्या स्त्री और क्या बच्चे, सब देश के लिये कुर्बान होने घर से निकल पड़े थे. 

छत्तीसगढ़ में आजादी का अलख जगाने वालों की सूची बड़ी है। छत्तीसगढ़ में अखबारों ने भी स्वाधीनता आंदोलन को अपनी आवाज दी है। अंचल का प्रमुख समाचार पत्र अग्रदूत की पहचान ही स्वाधीनता संग्राम से रही है। अंग्रेजों को हमेशा भयाक्रांत करने वाले इस अखबार को अनेक दफा अंग्रेजी शासकों के दमन का शिकार होना पड़ा। अखबार का प्रकाशन कई बार बाधित हुआ। आर्थिक रूप से नुकसान भी समाचार पत्र को उठाना पड़ा। यहां तक कि पत्र के सम्पादकों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन इन सबके बावजूद अभिव्यक्ति का गला घोंटने में अंग्रेजी शासन नाकाम रही। लोगों को जागृत करने, आंदोलन की सूचना पहुंचाने और देश को पराधीनता की बेडियों से मुक्त करने में इस अखबार ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में कदम पीछे नहीं खींचे। इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ का योगदान अमूल्य है। स्वाधीनता संग्राम में अलख जगाने और आंदोलन को तेज करने में समूचा छत्तीसगढ़ आगे था। स्वाधीनता संग्राम में छत्तीसगढ़ का योगदान अमूल्य है, अविस्मरणीय है।

शनिवार, 10 अगस्त 2013

इनकी चुनौती नहीं, हौसला देखिये


-अनामिका
शिक्षा किसी भी हिंसा का सबसे माकूल जवाब हो सकता है और छत्तीसगढ़ राज्य ने इस बात को कई बार साबित कर दिखा चुका है। लगातार नक्सली हमले से सहमने और दहलने के बजाय दुगुनी ताकत से हिंसा का जवाब शिक्षा से देने के लिये छत्तीसगढ़ अपने-आप को प्रस्तुत करता रहा है। हाल ही में छत्तीसगढ़  के नौनिहालों ने शिक्षा के क्षेत्र में जो  ऊंचाईयां अर्जित  की है, वह छत्तीसगढ़ के साहस को दिखाता है। राज्य सरकार ने विद्यार्थियों को अवसर दिया और विद्यार्थियों ने जता दिया कि अवसर मिलते ही आसमां छू लेंगे। यही नही, हर बार और बार बार उनकी मांग होगी कि आसमां को थोड़ा और ऊंचा कर लो ताकि चुनौती का सामना करने का साहस उनमें दिख सके। सरकार ने नक्सल पीडि़त क्षेत्रों में स्कूली विद्यार्थियों के लिये योजना शुरू की छू लो आसमां और विद्यार्थियों ने आसमां छू कर ही नहीं, बल्कि उंचा उठा  कर दिखा दिया।

आमतौर पर विशम स्थितियों का अर्थ होता है निराशा में डूब छठाना और ऐसे में पीईटी, एआई पीएमटी, एआईट्रिपलई और पीपीएचटी छठैसी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो ना कोई मामूली बात नहीं है। चुनौतियां, डर और दब्बूपन इन सफल विद्यार्थियों के सामने बौने से हो जाते हैं। स्कूली शिक्षा में तो इनका कोई सानी है ही नहीं, प्रोफेशनल्स कोर्स में जो  सफलता के झंडे गाड़े हैं, वह सुविधाभोगी विद्यार्थियों के लिये सीख है कि सुविधा सफलता को कोई साधन नहीं। पीईटी, एआई पीएमटी, एआईट्रिपलई और पीपीएचटी छठैसी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो चुके हर बच्चे अपने आपमें एक मिसाल हैं। हर किसी की एक कहानी है दुख की, तनाव और डर की लेकिन इसी चुनौतियों ने उनके भीतर साहस भरा है दुनिया को जीत लेने का। एक मौका मिला और नक्सल पीडि़त बस्तर अंचल के बच्चों ने दिखा दिया अपना कमाल। 

प्रतिभा को तो बस अवसर की तलाश रहती है। जिस क्षेत्र के एक-दो बच्चे ही बमुश्किल पीईटी, एआई पीएमटी, एआईट्रिपलई और पीपीएचटी छठैसी परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो पाते थे, आज वहां के 38 बच्चों ने एक वर्श में ही इन परीक्षाओं में सफल होकर अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ का नाम रौशन कर दिया है। इसी तरह की सफलता हासिल करने वाले विद्यार्थियों की सूची पिछले शैक्षिक सत्र में भी दर्ज  थी। इस वर्श दंतेवाड़ा जिले के कारली में बालिकाओं तथा पातररास में बालकों के लिए स्थापित शैक्षिक संस्था ‘छू लो आसमान’ से मिली है। इस संस्था में अच्छी पढ़ाई के साथ बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार प्रतियागी परीक्षाओं के लिए भी तैयार किया जा  रहा है।

छू लो आसमान में रहकर 78 प्रतिशत नम्बरों से 12वीं कक्षा पास करने वाली दंतेवाड़ा के कुड़पारास की अनुसूचित छठनछठाति की प्रियंका नागेश ने पीपीटी की परीक्षा में राज्य में सातवां और महिला वर्ग में पहला स्थान प्राप्त किया है। इस मेधावी बालिका को यहां रायपुर स्थित शासकीय इंजीनियरिंग कालेज में सिविल ब्रांच में प्रवेश भी मिल गया है। प्रियंका ने दोहरी सफलता दर्ज  की है। उसका चयन एआईट्रिपलई में भी हुआ है। प्रियंका ने कहा कि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसे पढ़ाई के क्षेत्र में इस तरह दोहरी-तीहरी खुशियां मिलेगी। इसी संस्था में तैयारी कर एआईपीएमटी पास करने वाली भावना ठाकुर ने बताया कि वह कार्डियोलाजिस्ट (हृदय रोग विशेशज्ञ ) बनना चाहती है। ह्दय की बीमारियों का इलाज बहुत मंहगा होता है। इसलिए वह कार्डियोलाजिस्ट बनकर गरीब मरीछठों का नि:शुल्क इलाज करना चाहती है। भावना दंतेवाड़ा छिठले के ग्राम हाउरनार की रहने वाली है और उसने 80 प्रतिशत नम्बरों से 12 वीं की परीक्षा  पास की है। 

सुकमा छिठले के ग्राम धोबनपाल की रहने वाली श्यामा मरकाम ने कहा कि पीएमटी में पास होना और मुख्यमंत्री से मिलना उसे दोहरी खुशी दे रहा है। उसकी मां श्रीमती आयते खेती-किसानी कर घर चलाती हैं। श्यामा ने बताया कि कक्षा 11वीं और 12 वीं की पढ़ाई उसने छू लो आसमान में पूरी की है। श्यामा ने कहा कि अब वह डॉक्टर बनकर अपनी मां का सहारा बनेगी और अपने क्षेत्र में ही रहकर लोगों की सेवा करेगी। 90.8 प्रतिशत नम्बरों से 12 वीं की परीक्षा पास करने के साथ ही पीईटी, एआईट्रिपलई और पीपीटी में भी सफलता हासिल करने वाला गोपाल मजदूर पिता पदम बहादुर का प्रतिभावान बेटा है।  बचेली (दंतेवाड़ा) के गोपाल बहादुर ने ‘छू लो आसमान’ को चरितार्थ कर दिया है।  गोपाल को भी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर में सिविल ब्रांच में प्रवेश मिल गया है। गोपाल की फीस का इंतजाम भी सरकार ने कर दिया है। गोपाल के इंजीनियर बनने का सपना साकार होने जा रहा है। गोपाल का कहना है कि मौका और सुविधा मिली तो वह आईएएस की तैयारी करेगा।

इसी तरह अतुल कुमार ने भी पीपीटी,पीएमटी,पेट और पीपीएचटी एवं छात्र मांगू को भी पीईटी और पीपीटी में सफलता मिली है। वह इंजीनियर बनने के साथ ही वैज्ञानिक बनना चाहता है ताकि अपने क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार वह नई-नई खोज कर सके। मांगू सुकमा जिले के ग्राम कोकालपाल का रहने वाला है। सुकमा जिले के ही सुदूर ग्राम किस्टाराम की कुमारी रूकमणी के पिता की हत्या नक्सलियों ने 2005 में कर दी थी, तब रूकमणी महज आठ वर्श की थी और वह गांव के ही स्कूल में चौंथी कक्षा में पढ़ रही थी। बचपन में ही पिता का साया छिन जाने के कारण रूकमणी को आगे की पढ़ाई मुश्किल हो गई। रूकमणी की बड़ी बहन की तो पढ़ाई छूट ही गई, लेकिन विपरीत हालातों में रूकमणी में पढ़ाई जारी रखा। दसवीं में अच्छे अंक आने पर उसका एडमिशन दंतेवाड़ा के ’छू लो आसमान’ संस्था में हो गया। वहां मिली बेहतर शिक्षा और भयमुक्त वातावरण से रूकमणी का चयन इस वर्श ए आईट्रिपल-ई में हुआ है। रूकमणी ने बताया कि ’छू आसमान’ में प्रवेश से पहले आईआईटी और एनआईटी के बारे मे नहीं जानती थी। दसवीं में मेरे गणित में अच्छे अंक आने के कारण शिक्षकों ने मुझे गणित विशय लेने के लिए कहा। वहां उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ आईआईटी की कोचिंग भी दी, पहली ही बार में वह एआईट्रिपल-ई की परीक्षा में सफल हो गई।

राज्य सरकार की छू लो आसमां की सफलता की कहानी को आगे बढ़ाते ये बच्चे पीईटी, एआई पीएमटी, एआईट्रिपलई और पीपीएचटी छठैसी परीक्षाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं छठानते थे। किसी का सपना डाक्टर बन छठाने का था तो किसी को इंछठीनियर बनना था। कोई प्रशासनिक क्षेत्र में जाना चाहता था तो कोई पढ़ाई के सपने पूरे कर लेना चाहता था। यह सच है कि इन विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा के बूते आसमां छू लिया है लेकिन सफल हो जाने के बाद भी इनके रास्ते कठिन थे। आगे की पढ़ाई की मोटी फीस इनका रास्ता रोक रही थी लेकिन राज्य शासन प्रतिभाओं को निखारने का जो  संकल्प लिया था, वह इनकी हौसलाअफजाई कर रहा था। कुछ बच्चों की फीस सरकार ने जमा कर दी है तो इनका हौसला बुलंद रहे इसके लिये प्रोत्साहन के रूप में टेबलेट के साथ अनेक तोहफे मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने भेट किया है। हौसलों की परख के लिये सरकार का यह रास्ता चुनौतियों के कांटों को सफलता के फूल में बदल रहा है।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

मीडिया का बाजारवाद

-मनोज कुमार

     मीडिया का बाजारवाद कहें अथवा बाजार का मीडिया, दोनों ही अर्थों में मीडिया और बाजार एक-दूसरे के पर्याय हैं। मीडिया का बाजार के बिना और बाजार का मीडिया के बिना गुजारा नहीं है। दरअसल, दोनों ही एक सायकल के दो पहिये के समान हैं जहां एक पहिया बाहर हुआ तो सायकल विकलांग होने के कगार पर खड़ी होगी। मीडिया का बाजारवाद बहुआयामी अर्थों वाला है। मीडिया से बाजार का संचालन होता है फिर वह मसला खबरों को बेचने और खरीदने का हो, लोगों की भावनाओं को खरीदने या बेचने का हो या समाज की जरूरत की वस्तुओं  की तरफ लोगों को आकर्षित करने का हो। 
ध्यान रहे कि यहां हम मीडिया के बाजारवाद की बात कर रहे हैं न कि पत्रकारिता की। पत्रकारिता का न तो कभी कोई बाजार रहा है और न ही उसका बाजारवाद से कभी कोई रिश्ता बन सकता है क्योंकि पत्रकारिता खरीदने अथवा बेचने की वस्तु नहीं बल्कि वह समाज को दिशा देने का कार्य करती रही है और अपने जिंदा रहने तक यह दायित्व निभाती रहेगी। पत्रकारिता का फलक इतना विस्तारित है कि उसे किसी सीमा में बांधा नहीं जा सकता है। समाज में उपजने वाली विसंगति के केन्द्र में पत्रकारिता है, लोगों की पीड़ा को आवाज देने का नाम पत्रकारिता है, जोर-जुल्म और समाज के ताने-बाने को क्षतिग्रस्त करने वालों के खिलाफ जो आवाज गूंजती है, वह पत्रकारिता है। पत्रकारिता का यह गौरवशाली स्वरूप अपने जन्मकाल से रहा है। पराधीन भारत में पत्रकारिता ने अपने दायित्वों का निर्वहन किया और आज स्वाधीन भारत में पत्रकारिता की ओज कायम है। समाज का विश्वास पत्रकारिता पर है तो इसलिये कि जब उसकी सुनवाई कहीं नहीं होती है तब पत्रकारिता उसकी आवाज बन जाती है। जिस सरकार और सरकारी दफ्तर में आम आदमी की आवाज अनसुनी कर दी जाती है, वहां पत्रकारिता आम आदमी की आवाज बन कर उसे न्याय दिलानेे के लिये तत्पर दिखायी देता है। यह पत्रकारिता की साख है और यही साख मीडिया से उसे अलग बनाता है।
लगभग तीन दशक के आसपास का समय हुआ होगा जब टेलीविजन अवतरित हुआ। पहले पहल तो इसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहकर पुकारा गया लेकिन यह नाम असरदायक नहीं  लगा और पत्रकारिता और टेलीविजन प्रसारण को मिलाकर एक नाम दिया गया मीडिया। कोई पक्के दावे के साथ नहीं कह सकता कि मीडिय नाम की यह चिडिय़ा किस देश से उडक़र भारत में आयी। मीडिया इतना सहज और सरल शब्द लगा कि यह तेजी से लोगों की जुबान पर चढ़ता गया और बिना किसी विरोध मीडिया शब्द ऐसा स्थापित हुआ कि पत्रकारिता नेपथ्य में चला गया और मीडिया का वर्चस्व स्थापित हो गया। 
मीडिया वास्तव में है क्या? मीडिया का शाब्दिक अर्थ हिन्दी में माध्यम होता है। माध्यम अर्थात किसी कार्य को अंजाम तक पहुंचाने का साधन। इस अर्थ में मीडिया का स्वरूप पत्रकारिता से कतई मेल नहीं खाता है क्योंकि पत्रकारिता, मीडिया की तरह साधन नहीं, साध्य है और साध्य एक निश्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया जाता है।
मीडिया शब्द का फौरीतौर पर देखें तो टेलीविजन प्रसारण के लिये प्रयुक्त होता है जहां समाचार है, विचार है, मनोरंजन है, बाजार है आदि-इत्यादि। हालांकि टेलीविजन की अपनी सीमा है किन्तु टेलीविजन प्रसारण जब मीडिया बन जाता है तो उसकी सारी सीमायें टूट जाती है और वह बाजार के मुंह में चला जाता है।  मीडिया इस समय बाजारवाद के शिकंजे में है। मर्यादा और सीमा बाजार के लिये कभी कोई मायने नहीं रखती हैं। शायद यही कारण है कि बाजार ने मीडिया को भी वस्तु मान लिया और खरीद-फरोख्त के स्तर पर पहुंच गया।  बाजार एक मगरमच्छ है और उसका मुंह इतना बड़ा है कि वह हर किसी को निगलने के लिये तैयार है।
पिछले दिनों कुछेक मामले समाज के सामने आये जिनमें मीडिया के खरीद-फरोख्त की सूचनायें शामिल है। मामला अदालत तक पहुंच गया और समाज के सामने सवालिया निशान छोड़ गया है। देने वाला कहता है कि मांगने वाला दोषी और मांगने वाला स्वयं को पाक-साफ बताता है। यह कोई प्रसंग नहीं है कि दोषी कौन? असल बात तो यह है कि लेन-देन की बात ही कहां से आयी? यदि मामला ऐसा है तो यह विचारणीय है कि बाजार ने कहा कि तुम बिको और दूसरे से कहा खरीदो। बाजार अपनी नीति और नियम से चल रहा था। सौदा बना नहीं और टूट गया और इस टूटन में नैतिकता को आड़े लिया गया।  बाजार इस मामले में भी जीत गया क्योंकि इस पूरे सौदे में जो दो शामिल थे, उनका जमकर प्रचार हुआ जिसे समाज बदनामी कहता है किन्तु बदनाम होकर भी नाम कमाने की प्रवृत्ति ने बाजार को विजयी बना दिया।
बाजार के पास नैतिक-अनैतिक शब्द के लिये कोई स्थान नहीं होता है। वह तो नफा और नुकसान पर टिका होता है और उसका झुकाव नफे की तरफ ही होता है क्योंकि व्यापार में नुकसान कोई नहीं उठाना चाहता। बाजार हर उस चीज को बेच देना चाहता है जो बिक रही हो। इस खरीद-बिकवाली में सामाजिक रिश्तों का ताना-बाना भले ही छिन्न-भिन्न हो जाये, इसकी परवाह बाजार नहीं करता है। इन दिनों मीडिया के बाजार में सर्वाधिक बिकने वाला मामला था बलात्कार का। देश की राजधानी नईदिल्ली में हुये वीभत्स बलात्कार के मामले के बाद तो जैसे बलात्कार की बाढ़ सी आ गयी। मीडिया रोज खोद-खोद कर मामले लाता रहा और इस बात का भी ध्यान नहीं रखा कि रोज-रोज की खबरों से किशोरवय के बच्चों के मानस पर क्या असर होगा। मीडिया की रेटिंग ने नैतिकता के सारे पैमाने को किनारे कर दिया। स्मरण रहे कि इसके पहले गड्ढे में गिरा प्रिंस भी मीडिया के लिये हॉटकेक की तरह था जिसे भुनाया गया। प्रिंस के बाद गड्ढे में गिरने वाला हर बच्चा कैमरे की कैद में था। यह और बात है कि मीडिया के प्रयासों से कितने बच्चों की जान बची या आज की तारीख में कितने बच्चों को गड्ढे में गिरने से बचाया जा सका है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। हो सकता है कि अब कोई बच्चा गड्ढे में गिर नहीं रहा हो। 
मीडिया का सूत्र वाक्य रहा है कि जो दिखता है, वह बिकता है और वह सबकुछ बेचने पर आमादा है। सामान तो वह बेचने के उपक्रम में जुटा हुआ ही है, वह इमोशन का भी व्यापार करने से चूक नहीं रहा है। मीडिया के घेरे में जब अखबार भी आ जाये तो उसका चरित्र पूरा न सही, थोड़ा तो बदल ही जाता है। कहावत है ना गिरगिट को देखकर गिरगिट रंग बदल ही लेता है, सो अखबारों के बारे में इस मुद्दे पर बहुत अलग राय नहीं बनाया जाना चाहिये। मेरी पत्रकारिता के शुरूआती दिनों में कस्बानुमा अखबार के पाठकों के बारे में हमें बताया जाता था कि हमारे अखबार के ग्राहक वो सारे लोग हैं जो मैट्रिक अथवा उसके समकक्ष है और यही कस्बाई अखबार जब राजधानी पहुंचा तो इसके मायने ही बदल गये। कल तक आम आदमी का अखबार नौकरशाहों और पूंजीपतियों का अखबार बन गया। यह दुर्भाग्यजनक ही नहीं बल्कि शर्मनाक भी कहें तो संकोच नहीं होना चाहिये।
मीडिया का बाजारवाद का फलक इतना बड़ा है कि वह किसी को नहीं बख्शता है। शर्त यही होती है कि टीआरपी बढऩे तक ही किसी विषय को वस्तु बनाया जाता है। एक टेलीविजन चैनल के हेड बताते हैं कि सुबह सुबह ही यह तय कर दिया जाता है कि आज किस खबर को खेलना है अर्थात उस दिन की सबसे ज्यादा बिकने वाली यानि टीआरपी देने वाली खबर को बार बार दिखाया जाना है। याद रहे कि एक चैनल ने चर्चित आरूषि हत्याकांड को लेकर एक स्पेशल स्टोरी प्लान किया और बता दिया कि आज यह स्पष्ट हो जाएगा कि आरूषि का हत्यारा कौन है? तकरीबन एक घंटे के इस कार्यक्रम में विज्ञापन तो बटोरा गया लेकिन दर्शकों को निराशा ही हाथ लगी। दरअसल, यह एक किस्म की सनसनी फैलाने का मामला है। लम्बे समय से लोग इंतजार में बैठे हैं कि आरूषि के हत्यारों का पता चले और ऐसे में जब एक टेलीविजन चैनल कहता है कि वह इस राज से परदा उठायेगा तो स्वाभाविक है कि दर्शकों की रूचि होगी। दर्शकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ का यह तरीका बेहद घटिया है।
मीडिया की बातें करते हैं तो यह भी साफ हो जाता है कि मीडिया में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के साथ साथ मुद्रित माध्यम भी शामिल है। बाजारवाद का शिकार मुद्रित माध्यम भी है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये कुछ खेल-तमाशे करता है, वैसे ही अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये मुद्रित माध्यम कुछ भी करगुजरने को तैयार है। 
अखबार और पत्रिकाओं की कीमत को जमीन पर लाने से लेकर अखबार, पत्रिकाओं के साथ बाल्टी, साबुन और न जाने क्या क्या उपहार देने के लिये बेताब हैं। मुद्रित माध्यम के पास कंटेंट को समृद्ध करने का कोई प्रयास नहीं दिखता है बल्कि वह शार्टकट तरीके से अपनी प्रसार संख्या को आसमानी ऊंचाई तक पहुंचाना चाहता है। यह राज-रोग किसी एक को नहीं बल्कि लगभग हर प्रकाशन संस्थान को लग चुका है। आज खबरों के नाम पर पाठकों को सूचनायें मिल रही है और जो खबरें आ रही हैं, उसमें भी संदेह की कुछ लाइनें होती हैं। यक्ष प्रश्र तो यह है कि इसमें भेद करे कौन और पहचान कर ठीक करेगा कौन।
मीडिया और पत्रकारिता के बीच एक बड़ा बुनियादी फर्क यह भी है कि एक सीमा के बाद जाकर मीडिया की समाज के प्रति संवेदना खत्म हो जाती है। वह निर्मम होकर बाजार का अनुगामी बन जाता है और बाजार के दिशा-निर्देशों का पालन करने लगता है। उसके सामने बाजार का दिया लक्ष्य और जरूरत होती है और उसी के अनुरूप काम करता है। मीडिया के ठीक उलट पत्रकारिता की प्रवृत्ति है। वह मीडिया की तरह एक सीमा के बाद संवेदनहीन नहीं होता है बल्कि पत्रकारिता की धडक़न समाज की संवेदनाओं में ही बसती है। वह करीब से और बेहद करीब से समाज की भावनाओं  और संवेदनाओं को समझ कर उसकी भावनाओं को व्यक्त करता है। वह जानता है कि किस बात और तथ्य को रखने से समाज आलोकित होगा और किन बातों से सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न हो जाएगी। पत्रकारिता मीडिया की तरह गैरजवाबदार, गैरजिम्मेदार नही हो सका है, इसलिये बाजार उसके नियंत्रण में रहा है न कि पत्रकारिता बाजार के नियंत्रण में।
मीडिया के बाजारवाद का ही परिणाम है कि पिछले एक दशक से पेडन्यूज को लेकर समाज चिंता में है। अधिकाधिक धन बटोरने की प्रवृत्ति ने भ्रामक और झूठे विषय-वस्तु को स्थापित किया और आज बात मीडिया से लेकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता को तार तार कर रहा है। पेडन्यूज के संदर्भ में इस बात को समझ लेना भी जरूरी है कि पेड न्यूज, पेडन्यूज न होकर पेड कटेंट होता है। 
कंटेंट से यहां आशय समाचार विश£ेषण एवं फीचर को लेकर है क्योंकि पेडन्यूज में वह गुंजाईश नहीं होती है जो कि कंटेंट एनालिसिस में होती है। मीडिया शब्द की तरह पेडन्यूज भी एक आसान और सरल शब्द है जिसे कहीं भी चलाया जा सकता है। पेडन्यूज के मामले में मीडिया के साथ साथ पत्रकारिता भी कटघरे में है। पेडन्यूज के मामले में मुद्रित माध्यम भी लांछित हुआ है। हालांकि पेडन्यूज की बीमारी आज की नहीं है, यह भी सच है क्योंकि किसी भी सरकार द्वारा अपनी इमेज बिल्डिंग के लिये न्यूज फीचर की सूरत में दिया जाने वाले तथ्य सौफीसद सरकारी होते हैं जिसकी पड़ताल किये बिना ज्यों का त्यों प्रकाशित कर दिया जाता है। यह भी सच है कि ऐसे न्यूज फीचर के साथ मुद्रित माध्यम इम्पेक्ट फीचर, स्पॉटलाइट जैसे उपशीर्षक का उपयोग करते हैं जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह न्यूज का हिस्सा नहीं है बल्कि प्रायोजित है। टेलीविजन के परदे पर यह अलग करना जरा मुश्किल सा काम होता है क्योंकि रोजमर्रा की खबरों के फ्रेम के आसपास विज्ञापनों का जमावड़ा होता है जिसे देखने के बाद यह कह पाना मुश्किल होता है कि परदे पर दिखाया जा रहा न्यूज प्रायोजित है अथवा विज्ञापन को न्यूज प्रायोजित कर रहा है। चुनाव ने दस्तक देना आरंभ कर दिया है और एक बार फिर पेडन्यूज का राक्षस अपना मुंह खोलेगा ताकि वह समूचे मीडिया को निगल जाये, गटक जाये क्योंकि मीडिया का बाजारवाद अपने चरम पर है।
मीडिया का बाजारवाद वास्तव में समाज के लिये घातक बनता जा रहा है। कभी दूरदर्शन से आरंभ हुआ टेलीविजन चैनलों की संख्या सौ से ऊपर जा पहुंची है और लगातार संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। अपराध और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है जिसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।  

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...