बुधवार, 3 मार्च 2010

खेल और मध्यप्रदेश

शिवेन्द्र के लिये हम क्यों नहीं बोलते?

-मनोज कुमार

भारतीय हॉकी टीम की कामयाबी से बौखलाये पाकिस्तान के दबाव में एक होनहार हॉकी खिलाड़ी को पहले तीन मैचों से और बाद में संशोधन कर दो मैचों के लिये निलंबित कर दिया गया। यह बेहद अफसोसजनक बात है। शिवेन्द्र का मनोबल तो गिरा ही है, साथ ही समूची भारतीय हॉकी टीम का मनोबल टूटा है। शिवेन्द्र की बात करें तो वे मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं और मध्यप्रदेश ने पिछले दिनों हॉकी को बदहाली से उबारने की सकरात्मक पहल की है, उसके बाद मध्यप्रदेश के खिलाड़ी के साथ ऐसा गैरवाजिब बर्ताव करना अफसोसजनक ही नहीं बल्कि निंदा के लायक है। बहरहाल, एक बात यह भी अफसोस करने लायक है वह यह कि मध्यप्रदेश के एक खिलाड़ी के साथ अनुचित कार्यवाही की गई लेकिन किसी ने इसके खिलाफ आवाज नहीं उठायी। पूर्व ओलिम्पियन असलम शेरखां ने जरूर इस मामले में आवाज बुलंद की लेकिन कोई और उनका साथ देने सामने नहीं आया। यह पहला या अकेला मामला नहीं है जब मध्यप्रदेश ने खामोशी ओढ़ ली है। इसके पहले भी मध्यप्रदेश अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ खामोश खड़ा रहा है। मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा दे दिया गया, मध्यप्रदेश ने खामोशी के साथ इसे मंजूर कर लिया। अब बात बुंदेलखंड राज्य बनाने की है और इस बार भी मध्यप्रदेश का विभाजन होगा तो लगता नहीं कि विरोध के लिये आवाज उठेगी। आखिरकार हम इतने सहनशील क्यों हैं? क्यों हम अपने और अपने लोगों के लिये आवाज उठाने में भावनात्मक एकता का परिचय नहीं देते हैं? शिवेन्द्र के साथ हुए अन्याय के खिलाफ पुरजोर विरोध होना चाहिए ताकि हॉकी के खिलाड़ियों को इस बात का अहसास बना रहे कि उनके साथ पूरा देश है। मामला अकेले शिवेन्द्र का नहीं है बल्कि समूचे हॉकी के भविष्य का है। जैसे तैसे हॉकी टीम में जान आयी और आते ही उसे खत्म किये जाने की साजिश शुरू हो गयी। अभी विरोध नहीं किया गया तो शायद ही हॉकी अपने पुराने सुनहरे दिनों की ओर लौट सके। क्रिकेट के लिये मामूली बातों पर हल्ला मचाने, विरोध करने और अपनी नाराजगी जताने वालों से आग्रह है कि एक बार वे अपना विरोध इस फैसले के खिलाफ भी जता दें ताकि सबको लग सके कि अभी हॉकी की चिंता करने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि वल्र्ड कप हॉकी में जब भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ चार गोल ठोंका तो पूरा देश तालियां बजा उठा। यह खुशी स्वाभाविक थी क्योंकि जिस तरह हम हॉकी की दुर्दशा देख रहे थे, उसमें ऐसी कामयाबी से हर भारतीय खुश होगा और होना चाहिए। भारतीयों, खासकर मध्यप्रदेश के लोगों के लिये यह खुशी थोड़ी ही देर की रही क्योंकि मध्यप्रदेश के प्रतिभावान खिलाड़ी शिवेन्द्र को पहले तीन मैच के लिये और बाद में दो मैच के लिये निलंबित कर दिया गया। शिवेन्द्र का निलंबन पूरी तरह से गैरवाजिब था क्योंकि फौरीतौर पर उनके निलंबन के लिये जो कारण गिनाये गये जो किसी भी हालत में जायज नहीं थे बल्कि यह कहा जाण् कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था तो ज्यादा वाजिब होगा। शिवेन्द्र के निलंबन से पूरी टीम का मनोबल ऐसा गिरा कि दूसरे दिन उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। आस्ट्रेलिया से भारत की हार खेल के कारण नहीं बल्कि तनाव के कारण माना जाना चाहिए। अगला मैच स्पेन से है और इसमें भी शिवेन्द्र बाहर रहेगा लेकिन वि·ाास किया जाना चाहिए कि अबकी भारत ऐसी गैरवाजिब कार्यवाही का जवाब देने के लिये अपनी जीत को बरकरार रखेगा। किसी समय हॉकी की नर्सरी कहे जाने वाले भोपाल में आज भले ही हॉकी खत्म हो रही है किन्तु मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान की चिंता ने हॉकी में जान फूंकने का काम किया है। हम यह नहीं कहते कि वल्र्ड कप हॉकी में भारत की जीत के पीछे मध्यप्रदेश के प्रयास रहे हैं लेकिन भारतीय हॉकी टीम का मनोबल बढ़ाने में मध्यप्रदेश की कोशिश रही है, इस बात से इंकार करना मुश्किल है। जब भारतीय हॉकी टीम के खिलाड़ियों ने पैसों के अभाव में मैदान छोड़ने का ऐलान कर दिया था तब मध्यप्रदेश ने आगे बढ़कर मदद के लिये हाथ बढ़ाया था। हॉकी खिलाड़ियों की हौसलाअफजाई करना मध्यप्रदेश की नैतिक जवाबदारी थी क्योंकि यही एक प्रदेश है जिसकी पहचान हॉकी से थी और आज भी बनी हुई है।

जन्मदिन

लोक को तंत्र से जोड़ते शिवराजसिंह चौहान-

मनोज कुमार

शिवराजसिंह चौहान लगातार अपने दूसरे कार्यकाल में भी मुख्यमंत्री के रूप में अपने आपको प्रस्तुत नहीं कर पाये। वे एक आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में अपनी राजनीति आरंभ की और और आज भी आम आदमी के प्रतिनिधि के रूप में अपनी पहचान बनाये रखे हुए हैं। उनकी कोशिश जनता को सत्ता में भागीदार बनाने की रही है और वे अपनी इस कोशिश में कामयाब होते भी दिख रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री की चौपाल बिठाकर आमआदमी को सत्ता के करीब लाने का प्रयास किया तो जनदर्शन के माध्यम से सत्ता को आम आदमी के बीच ले जाने की कोशिश की। दूसरे कार्यकाल में मध्यप्रदेश बनाओ अभियान के माध्यम से जहां एक तरफ वे स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना देख रहे हैं तो दूसरी तरफ वे आम आदमी से इस बात का आह्वान कर रहे हैं कि वे सत्ता के आश्रित रहने के बजाय सत्ता में भागीदार बनकर प्रदेश की तस्वीर और तकदीर बदल डालें। शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले २८वें मुख्यमंत्री हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के एकमात्र नेता हैं जिन्होंने मध्यप्रदेश में दूसरी दफा और राज्य के इतिहास में दूसरे नेता जिन्होंने सत्ता की कमान सम्हाली। लगातार दो बार तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसान होना सरल नहीं है तो बहुत कठिन भी नहीं लेकिन अपने कार्यकाल को अविस्मरणीय बनाना जरूर मुश्किल भरा है। यूं तो मध्यप्रदेश के हर मुख्यमंत्री ने अपनी कार्यशैली से अलग पहचान बनायी लेकिन इनमें शिवराजसिंह चौहान की पहचान इतिहास में अलग तरह से होगी। उन्होंने अपने पहले और वर्तमान कार्यकाल में लगातार लोक को तंत्र से जोड़ने की पहल की है। उनकी इस पहल का ही परिणाम रहा कि भारतीय जनता पार्टी की छवि आम आदमी की पार्टी के रूप में बनी। आजादी के बाद और नये मध्यप्रदेश के निर्माण के बाद संभवत: मध्यप्रदेश एकमात्र राज्य होगा जहां आम आदमी के लिये मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे खुल गये। प्रदेश के आदिवासी जिनके नाम पर विकास की वाहवाही तो लूट ली गयी लेकिन विकास कोसो दूर रहा था, आज वह मुख्यमंत्री के साथ बैठकर न केवल अपने दुख-सुख की बातें कर रहा है बल्कि उनके साथ भोजन भी करने का सुख पा रहा है। आदिवासी ही क्यों, हर वर्ग के लोग मुख्यमंत्री की चौपाल के बहाने मुख्यमंत्री के करीब आ गये। एक के बाद एक हर वर्ग के लिये उनके द्वारा किया मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित हो रहे मुख्यमंत्री की चौपाल लोगों के लिये यादगार बन गयी। चौपाल के जरिये मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का कई जमीनी हकीकतों से सामना हुआ। उनकी समझ में आ गया कि जनकल्याण की योजनाओं को अफसरशाही ने कागज में लपेट कर रख दिया है। अब उनका अगला पड़ाव था आम आदमी के बीच सत्ता को ले जाने का और वे इस कोशिश में भी कामयाब हुए। अफसरशाही बीते पचास सालों से जिस कार्यशैली की अभ्यस्त थी, उसे लगा कि यह भी मुख्यमंत्री की लोकलुभावन घोषणा होगी। सूरज के ढलते और अगली सुबह के होते होते बात खत्म हो जाएगी लेकिन उन्हें इस बात का कतई अहसास नहीं था कि बात निकलेगी तो दूरतलक जाएगी...। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान निकल पड़े गांव गांव, कस्बे-कस्बे। आनन-फानन में योजनाओं की समीक्षा कर डाली और कहीं गरजे-बरसे तो कहीं पीठ भी थपथपायी। अलसायी अफसरशाही दुरूस्त हो गयी और जिनको इसके बाद भी समझ नहीं आया, वे कार्यवाही के शिकार हो गये। इन कवायदों के बाद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह अपने बुने सपने स्वर्णिम मध्यप्रदेश को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया और आओ बनाये अपना मध्यप्रदेश की यात्रा पर निकल पड़े। अमरकंटक से आरंभ हुई यह यात्रा पूरे मध्यप्रदेश में चल पड़ी। मुख्यमंत्री स्वयं कहीं झाडू लगा कर तो कहीं योग की कक्षा लेकर अपने मध्यप्रदेश की भावना को बढ़ाने की कोशिश की। वे बार बार और हर बार यही बोलते रहे कि मध्यप्रदेश हमारा अपना प्रदेश है। जनता को सरकार पर आश्रित रहने के बजाय सरकार में भागीदार होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह जो बात कह रहे हैं, उनके पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों ने नहीं कही हो लेकिन वे जिस असरदार ढ़ंग से कह रहे हैं, वह उल्लेखनीय है। स्मरण रहे कि मध्यप्रदेश विभिन्न अंचलों को लेकर बनाया गया प्रदेश है। कदाचित इस बात से विमत नहीं होना चाहिए कि मध्यप्रदेश में भावनात्मक एकता का अभाव है। मालवा, विंध्य, महाकोशल, बुंदेलखंड और भोपाल की एक आवाज अब तक नहीं बन पायी है। संस्कृति और संस्कार हैं तो आंचलिक और स्वाभाविक है कि इसी संस्कृति और संस्कार को एकजाई आवाज बनाने के लिये मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपना मध्यप्रदेश की यात्रा पर निकल पड़े हैं। उनकी यह यात्रा का परिणाम तत्काल भले ही न मिले लेकिन आने वाले समय में यह असर दिखायेगी, इस बात का अहसास किया जाना चाहिए। लोकप्रियता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह को कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दिखाने का यत्न किया जाता है तो कहीं भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी उन्हें बताने से उनके समर्थक चूके नहीं लेकिन शिवराजसिंह इन सबसे परे रहकर खुद को एक किसान के बेटे के रूप में देखते रहे। उनकी कल्पना और चिंता गांव, ग्रामीण और किसान रहे हैं। वे उन्हें मुस्कराता हुआ देख स्वयं मुस्करा देते हैं। इस जन्मदिन के साथ उनके अगले अनेकानेक जन्मदिवस पर उनकी यह मुस्कान कायम रहे, यही मध्यप्रदेश की कामना है। उनके लिये शुभकामना है।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

मुद्दा

छात्रसंघ का प्रत्यक्ष चुनाव जरूरी
मनोज कुमार

छात्रसंघ चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा को रोकने के नाम पर मध्यप्रदेष में कई सालों से अप्रत्यक्ष चुनाव कराये जाने की परम्परा आरंभ हो गयी थी। इसे पूरी तरह गलत नहीं कहा जाएगा लेकिन यह कहना भी अनुचित होगा कि प्रत्यक्ष चुनाव से हिंसा को बढ़ावा मिलता है। लिंगदोह कमेटी की सिफारिषांे के मद्देनजर हाल ही में आये फैसले को लेकर अलग अलग राय जाहिर की जा रही है। जो लोग इस फैसले के खिलाफ खड़े हैं, उन्हें लगता है कि चुनाव में छात्र हिंसा बढ़ेगी लेकिन जो लोग फैसले के पक्ष में हैं, उन्हें यह बातें बेकार की लगती है। दोनों ही पक्ष अपनी अपनी जगह सही हैं लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्यक्ष चुनाव अनिवार्य है। प्रत्यक्ष चुनाव का विरोध करने वालों को यह जान लेना चाहिए कि पंचायत से लेकर लोकसभा तक के चुनाव प्रत्यक्ष होते हैं और इसमें भी हिंसा होती है तो क्या इन्हें भी स्थगित किया जाना चाहिए? षायद नहीं। तब छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष कराये जाने को लेकर विरोध उचित नहीं जान पड़ता है।
प्रदेष में छात्रसंघ बेजान से पड़े हुए हैं। इन संघों के पदाधिकारी आमतौर पर उन छात्रों को बनाया जाता है जो मेरिटोरियस हो। इन छात्रों का अकादमिक इतिहास तो बेहतर होता है किन्तु मैदानी रूप् से जूझने में ये कमजोर होते हैं और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। छात्रसंघों को राजनीति की प्राथमिक पाठषाला कहना बेहतर होगा। देष के जाने माने नेता छात्रसंघों में ही तपकर आये हैं। पंचायत अथवा नगर निगम चुनाव के मैदान में उतरने से पहले छात्रसंघ के चुनाव में इन्हें विद्यार्थियांे और कॉलेज की समस्या जानने और समझने का अवसर मिलता है। इन समस्याआंे को सुलझाने में भी अनुभव होता है और आगे चलकर सक्रिय राजनीति में आने वाले विद्यार्थी कामयाब होते हैं। आज के राजनीतिक हालात को देखकर यह कहा जाता है कि राजनीति में रखा क्या है लेकिन जो लोग राजनीति में हैं, उनसे पूछकर देखिये कि उन्हें किस किस तरह के अनुभवों से गुजरना होता है। देष की जनता को समझना, समस्याओं को समझना, उन्हें सुलझाना और जनता को षांत रखने की कला की सीख यही छात्रसंघ देते हैं।
हमारे समाज में जनआंदोलन आहिस्ता आहिस्ता समाप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब छात्रसंघ के कद्दावर नेता न केवल कॉलेज की समस्याआंें के लिये सड़कों पर उतर आते थे बल्कि कई बार जनससमयाओं को लेकर भी वे आगे रहते थे। कई सालों से यह तेवर खत्म हो गया है। इसी तरह श्रमिक आंदोलन भी लगभग गुमसुम सा है। अपने अधिकारों को लेकर सरकार और षासन से टकरा जाने की वह ताकत अब कमजोर पड़ती दिख रही है। हालात इतने खराब होते चले जा रहे हैं कि कथा-कहानियों से लेकर फिल्म और टेलीविजन से भी श्रमिक आंदोलन के मुद्दे गायब होते जा रहे हैं। फिल्म दीवार और काला पत्थर के बाद ही षायद कोई फिल्म इन सब्जेक्ट्स को लेकर बनी है। अब फिल्मों में डॉन और माफिया ने अपनी जगह बना ली है जबकि श्रमिक आंदोलन एक सामाजिक मुद्दा है जो अब पहुंच के बाहर है।
इन मुद्दों को लेकर जब नजर घूमाते हैं तो सहसा अहसास होता है कि छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष रूप् से नहीं कराये गये तो छात्रसंघ की प्रभावी ताकत का लोप हो जाएगा। किसी भी समाज से युवावर्ग की ताकत कम होना या खत्म होना, उस समाज की सक्रियता पर सवालिया निषान लगाता है। छात्रसंघ युवावर्ग की ताकत ही नहीं, बल्कि उसकी सोच और उसके सपने भी हैं जो आगे चलकर समाज को, देष को दिषा देते हैं। अब यह सोच लेना कि छात्रसंघों के प्रत्यक्ष चुनाव से हिंसा बढ़ती है, मुझे लगता है कि यह सरासर बेमानी है बिलकुल वैसे ही जैसे कि दुघर्टनाओं के कारण कोई सोचे की गाड़ी चलना बंद हो जाए। छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष होना चाहिए और जो समस्यायें दिख रही हैं, उसका उपाय ढूंढना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में कागजी नेता मिलेंगे जो जमीनी नहीं होंगे। किसी लोकतांत्रिक देष को चलाने के लिये लोकतांत्रिक प्रणाली ही कारगर होती है और इस नाते छात्रसंघ चुनाव प्रत्यक्ष ही कराये जाने चाहिए।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

बापू तेरे नाम

न बाप बड़ा न भैया…सबसे बड़ा रुपया…बापू मत रोना
मनोज कुमार
गुजरात से अभी अभी देशबन्धु के ईपेपर से ताजा खबर मिली है कि किसी समय बल्कि कुछ दिनों पहले तक शराबबंदी के लिये सराहे जाने वाले बापू की धरती पर अभी तो शराब की कुछ बूंदें गिराने की अनुमति मिल गयी है। इस अनुमति के साथ ही राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों में प्रसन्नता का माहौल है। शराब पीने की छूट देने के बाद सैलानियों का आना बढ़ गया है। जाहिर है कि राज्य सरकार का खजाना भी भरेगा लेकिन क्या किसी ने चिंता करने की कोशिश की है कि गुजरात की ख्याति गांधीजी से है और इस ख्याति को चार चांद लगाते हैं यहां की शराबबंदी। और जब वहां शराब पीने की छूट पहले चुनिंदा जगहों पर मिलेगी, फिर उसका विस्तार होगा और देखते ही देखते बापू की पुण्यभूमि भी शराब में डूब जाएगी। हालांकि मुझे नहीं मालूम की राज्य में किसी तरह की शराब पीने की कोई छूट पहले से है। जितना मैं जानता हूं और जितना जान पाया हूं तो गुजरात को लेकर एक खुशनुमा भाव मन में भर आता है। अपने तीस साल के पत्रकारीय जीवन में मैंने खबरों में पाया कि गुजरात हर आफत से खुद को बाहर निकालने की ताकत रखता है। प्राकृतिक आपदा और गुजरात का चोली-दामन का साथ है। भूकंप, बाढ़ और न जाने ऐसे कितने आपदाओं ने गुजरात को एक बार नहीं कई कई बार लगभग बर्बाद कर दिया लेकिन गुजरात टूटा नहीं, हारा नहीं और न ही भागने की कोशिश की बल्कि वह पूरी ताकत से उठा और हर बार वह फिर दौड़ पड़ा विकास के साथ। साम्प्रदायिक दंगों ने गुजरात की एक अलहदा तस्वीर पेश की। इस मामले के सच और झूठ में हम न भी पड़ें तो यह बात मानना पड़ेगी कि इस आफत से भी गुजरात टूटा नहीं। आरोपों में कितना दम है, यह तो मैं नहीं जानता और न इस विवाद को तूल देना चाहता हूं कि किसकी कितनी गलती रही लेकिन गुजरात की जमीन पर आज भी सभी सम्प्रदाय के लोग जीवनयापन कर रहे हैं। किसी एक खासवर्ग में डर होगा तो उसके कारण भी अलग अलग होंगे। अलग अलग किस्म की आपदाओं से उबर कर गुजरात कैसे खड़ा हो जाता है, यह सवाल आपको अचंभे में डाल सकता है। रेलयात्रा के दौरान और शायद गुजरात में आये भीषण भूकंप के बाद एक अगुजराती ने टिप्पणी की थी। तब उसकी इस बात को मैंने गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन बाद में जब मीमांसा किया तो लगा कि बात में दम है। इससे आगे एक पत्रकार और मीडिया अध्येता होने के नाते मामले की पड़ताल की तो पता चला कि यह साहस उस व्यक्ति की है जिसे समूची दुनिया गांधीजी कहती है। साबरमती के आश्रम में प्रतिदिन गाये जाने वाले भजन ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम…गुजरात की शक्ति है, उसका आत्मबल है और इसी आत्मबल के चलते गुजरात शराब से दूर रहा। अब जब शराब को पर्यटन से जोड़ कर देखा जा रहा है तो निश्चित रूप से इसका कारण राजस्व है और दुनिया में न तो बाप बड़ा होता है और न भइया लेकिन सबसे बड़ा होता है रुपया…। गांधीजी की आत्मा बिलख रही होगी लेकिन जब गांधीजी ने बात की थी तो वह स्वदेशी का मामला था, अब तो हम ग्लोबलाइजेशन की बातें कर रहे हैंऔर उसी में जी रहे हैं…बस अब इंतजार करना होगा कि बापू के आश्रम से कहीं ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम की आवाज आना कब बंद होती है…

रविवार, 17 जनवरी 2010

सोचो

मैं लोकतंत्र हूं...
मनोज कुमार
मैं लोकतंत्र हूं...किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं

पंच से लेकर प्रधानमंत्री तक हर कुर्सी बिकाऊ हैबोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंमहंगाई बढ़ गई है इन दिनों जनाब

अभी अभी साढ़े छह लाख में बिकी है...सरपंच की कुर्सी…।

अभी कुछ और बाकि है मोल तो लगाओ जनाब…

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंपंच की कुर्सी की कीमत

पचपन हजार लग चुकी हैदेश दांव में लगाने की

ताकत हो तोप्रधानमंत्री की कुर्सी खरीद सकते हो जनाब…

बोलो कौन सी कुर्सी खरीदोगे जनाब?

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूंप्रेमचंद का अलगू चौधरी

कहीं खो गया हैऔर बापू का ग्राम स्वराज

यहीं कहीं भटक गया हैकिसी को मिल जाएं तो जरूर बतानातब

तक मैं फिर बोली लगाता हूं जनाब…

मैं लोकतंत्र हूं...

किसम किसम की कुर्सियां बेचता हूं

(आद। भवानीप्रसाद मिश्र से क्षमायाचना के साथ)






गाफिल है पूरी दुनिया
मनोज कुमार
महात्मा गांधी का सपना था कि गांव की सत्ता ग्रामीणों के हाथों में हो. इसी सपने को आधार बनाकर स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ग्राम स्वराज की कल्पना करते हुए पंचायतीराज व्यवस्था आरंभ की थी. मध्यप्रदेश ने तब सबसे आगे आकर पंचायतीराज व्यवस्था कायम किया. चारों तरफ मध्यप्रदेश की सराहना हुई. समय के साथ पंचायती राज व्यवस्था परवान चढ़ी. पंचायतों में महिलाओं के लिये पचास प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था भी की गई. ऐसा लग रहा था मानो गांधी के ग्राम स्वराज का सपना सच हो गया है किन्तु पिछले दिनों राज्य के इंदौर से मात्र पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव रंगवासा में पंचायती राज व्यवस्था के साथ लोकतंत्र का जो मजाक उड़ाया गया, वह दहला देने वाला है.
जनसत्ता नईदिल्ली और नईदुनिया में प्रकाशित खबर के मुताबिक गांव के मंदिर के विकास के नाम पर सरपंच का पद छह लाख पचपन हजार में गांव के ही कैलाश चौधरी ने खरीद लिया और पंचों के पद इक्कीस हजार से पचपन हजार तक बेच दिये गये. इन पदों के लिये खुलेआम नीलामी की गई. रकम तय हो जाने के बाद अन्य दावेदारों ने अपने अपने नाम वापस ले लिये और कहना न होगा कि कैलाश चौधरी निर्विरोध निर्वाचित हो गये. इसके बाद उन्होंने वायदे के मुताबिक कैलाश चौधरी ने रकम मंदिर में जमा करा दी. इन खबरों में यह भी लिखा है कि इसके पहले नगर पंचायत के पार्षद पद की नीलामी भी हो चुकी है. अफसोस तो तब होता है जब विधायक जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति कहने लगे कि यह कोई मुद्दा नहीं है कि गांव में लोकतंत्र के किस तरह से विजय हुई है. किसी का नाम वापस लेने के लिये कोई जोर जबर्दस्ती नही की गई। यह टिप्पणी जनसत्ता में इसी विधानसभा क्षेत्र के विधायक सत्यनारायण पटेल का है. इस पूरी नीलामी प्रक्रिया को विकास से जोड़ कर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि विकास के लिये नीलामी जरूरी है तो अब हर पद के लिये नीलामी की व्यवस्था कर दी जानी चाहिए. क्यों आम आदमी के खून पसीने की कमाई पर चुनाव कराने की कवायद की जाये. रंगवासा ने न केवल अपने गांव पर बल्कि समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिया है.
यह खबर मामूली खबर नहीं है. इस खबर की संवेदनशीलता को समझना होगा. मुझे हैरानी इस बात पर थी कि जब इस खबर के बारे में करीब पचीस लोगों से बात की गई तो इनमें से एक भी इस खबर से वाकिफ नहीं था. ये वो लोग हैं जो किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़े हुए हैं. इसका अर्थ मैंने अपने स्तर पर यह लगा लिया कि मीडिया गाफिल है. मुझे दुख इस बात का हुआ कि क्या अखबारों में छप रही खबरों को हम इतने हल्के ढंग से लेने लगे हैं या खबरों में अब वह गंभीरता ही नहीं बची? मामला चाहे जो हो लेकिन एक बात तो साफ है कि अब हम चिंतन नहीं करते हैं, इस तरह की खबरें हमें निराश नहीं करती हैं और न ही हमें उद्वेलित. अब सब कुछ बहुत सतही ढंग से लेते हैं और ले रहे हैं. इससे भी ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि जिन लोगों के कंधे पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बचाये रखने की जवाबदारी है, वे भी खामोश हैं. सत्ताधारी दल तो कुछ कह नहीं रहा है, विपक्ष भी मौन साधे हुए है. गाफिल समाज अगर होशमंद हो जाए तो शायद कल की बात और होगी. इसी उम्मीद के साथ.

बुधवार, 13 जनवरी 2010

अच्छी खबर

यह विश्वास बना रहे
मनोज कुमार
भारतीय स्त्रियों के चरित्र पर विश्वास जताते हुए अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि भारतीय नारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। वे अपने खिलाफ बलात्कार का मामला यूंह ी दर्ज नहीं कराती हैं। अदालत ने यह टिप्पणी कर भारतीय स्त्री के गौरव को द्विगुणित किया है और कहना न होगा कि इससे भारतीय समाज का सिर गर्व से ऊंचा उठा है। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को सनातन काल से सर्वोपरि माना गया है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में तब स ेअब तक पूजा जाता रहा है। यकिनन समय के बदलाव के साथ सोच में परिवर्तन आया है और समाज स्त्रियों को नयी भूमिका में देख रहा है। कल तक घर की चहारदीवारी के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने वाली स्त्री आज आफिसों में अपने दायित्वों को निभा रही हैं। उनकी नयी जिम्मेदारियों के साथ उनके पहनावे में भी परिवर्तन आया है और महज पहनावा को ही यह मान लिया गया कि स्त्री बदल गयी है। उसके चरित्र पर अकारण लांछन लगाया जाने लगा। एक मामला पत्रकारिता की एक छात्रा के साथ पिछले दिनों सामने आया था। यह सब कुछ कुछ मानसिक रूप से बीमार लोगों की करतूतें हैं। स्त्री आज भी अपनी उसी भूमिका में है और इसका विस्तार ही माना जाना चाहिए।बाजार के नये रूप ने जरूर स्त्री को वस्तु बनाकर प्रदर्शन किया है और इसमें कुछ हद तक स्त्री भी दोषी हैं। उनके लिये पूरा आसमान खुला हुआ है और तब उन्हें किसी किस्म के समझौते की जरूरत नहीं होना चाहिए। हमारा मानना है कि यह सबकुछ अकारण नहीं है बल्कि इसके पीछे भी कोई मामला होगा। स्त्रियों के साथ ज्यादती पहले भी हो रही थी और अब भी हो रही है, इस बात से भला कौन इंकार करेगा। स्त्री को दबाने और कुचलने का सर्वाधिक पीड़ादायक यातना है तो उसके साथ बलात्कार करना। इसमें भी आरोपी बच निकलते थे लेकिन अदालत ने यह कह कर स्त्री का सम्मान बढ़ाया है कि उसने कह दिया, यह ीपर्याप्त है। हम सभी को उम्मीद करना चाहिए कि भारतीय स्त्री भी अपने पक्ष में दिये गये इस सम्मान को कायम रखने में आगे रहेगी और पापी पुरूष अब अपने दानवी रूपप र काबू पा सकेंगे। नये साल में भारतीय स्त्रियों को न केवल अदालत की बल्कि पूरे समाज की ओर से शुभकामनाएं हैं।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

मुद्दा

तो फिरोजाबाद की चूड़ियां ढूंढ़ते रह जाओगे
मनोज कुमार

आज से कोई 30-35 बरस पहले मेरी बड़ी भाभी पायल को महिलाओं के लिये बेड़ियां कहती थी। तब मुझे इस बात का अंदाज नहीं था कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर उनकी उस बात का अहसास अब होगा। आज जब महिलाओं को चूड़ियों से परे होते हुए, माथे से बिंदिया लगाने से बचते हुए और मांग में सिंदूर भरने से परहेज करते हुए देखता हुआ तो मेरी भाभी मुझे याद आ जाती हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो कल तक नारी के श्रृंगार की वस्तुएं थी, जिसमें स्त्रियां अपना सौभाग्य देखती थीं, आज उनके लिये बंधन हो गया है। उनके लुक को खराब करने लगा है। इस मुद्दे को विस्तार के साथ देखना होगा। यहां मैं जिस चूड़ी, बिंदी और सिंदूर की बात कर रहा हूं, उसका सीधा वास्ता तो स्त्रियों से है किन्तु इससे भी बड़ा वास्ता बाजार से है। फिरोजाबाद का नाम भारत के कोने कोने में जाना जाता है तो इसलिये कि वहां किसम किसम की चूड़ियां बनती हैं। षायद बिंदी और सिंदूर बनाने का काम भी होता होगा। इस बारे में मेरी जानकारी थोड़ी कम है। जब स्त्रियां श्रृंगार की इन महत्वपूर्ण वस्तुओं का त्याग करना आरंभ कर देंगी तो फिरोजाबाद के कारखाने मर जाएंगे। एक दो नहींे सैकड़ों परिवारों के समक्ष भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। भारत में जिस तरह कई प्राचीन लघु और गृह उद्योग खत्म होते रहे हैं, वैसे ही एक और लघु और गृह उद्योग खामोषी से मर जाएगा। बिलकुल उसी तरह जिस तरह पावरलूम खत्म होते जा रहे हैं, जिस तरह भोपाल का जरी उद्योग सांसें गिन रहा है। आधुनिक मषीनें कपड़े बुन रही हैं और महंगे लेदर के पर्स।क्या चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से स्त्री आजाद हो जाएगी? क्या वह श्रृंगार की इन वस्तुओं का उपयोग नहीं करेगी तो उसकी षान पर कोई फर्क पड़ जाएगा, षायद नहीं। इसे और विस्तार से देखना होगा कि किस तरह हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था को चैपट करने के लिये खेल खेला जा रहा है। भारतीय स्त्रियों के साथ ही भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं को भी भेंट चढ़ाया जा रहा है। बदलते समय के साथ स्त्री की दुनिया को विस्तार मिला है। कल तक चैके चूल्हे में सिमटी स्त्रियां आज हमकदम बन कर चल रही हैं। हालांकि मेरी मान्यता यह है कि स्त्री कभी पराधीन थी ही नहीं। भारतीय षास्त्रों का अध्ययन करेें तो सहज ही पता चल जाता है कि कोई भी घर स्त्री के बिना अधूरा है। समय की जरूरत के अनुरूप भारतीय स्त्री ने अपना चेहरा प्रस्तुत किया है। कभी वह अपने दुष्मनों का संहार करने के लिये दुर्गा बन जाती है तो कभी ममता लुटाने के लिये वह गंगा बनकर निस्वार्थ बहती रहती है। अपने घर और परिवार की उन्नति के लिये स्त्री ही लक्ष्मी का रूप् है। इसके बावजूद यह मानने में कोई गुरेज नहीं कि स्त्रियों का दमन हुआ है। उन्हें हाषिये पर रखने की कोषिष की गई है। ऐसे में स्त्री को स्वतंत्रता मिली है, मिल रही है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन क्या किसी संस्कृति और परम्परा की बलि चढ़ाकर? किसी बाजार की षर्त को मानकर? इसका जवाब षायद नहीं में होगा लेकिन यहां मौन रह कर बाजार की हर षर्त को मंजूर किया जा रहा है।कथित विकास ने हमारे सोचने की ताकत को कम कर दिया है और भीड़ में हम खोने के लिये मजबूर हो गये हैं। हम यह भी नहीं सोच पा रहे हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह रास्ता हमारे लिये ही बंद हो रहा है। चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागकर हम अपने आपको आधुनिक बन जाने का सुख तो पा रहे हैं लेकिन इन छोटी छोटी चीजों को छोड़ कर जाने कितने पेट को भूखे सोने के लिये मजबूर कर रहे हैं, इसका आपको अंदाज है? षायद नहीं। दिनोंदिन बढ़ती महंगाई के लिये क्या हमारा चरित्र जिम्मेदार नहीं है? देष की अर्थव्यवस्था को चैपट करने में हमारा योगदान नहीं है? फौरीतौर पर बात भले ही समझ न आये क्योंकि इस समय हम आधुनिकता की आंधी की गिरफ्त में हैं लेकिन इसे समझने की जरूरत होगी।मानव श्रम को हम कैसे बेकार और बेबस बना रहे हैं, इस संदर्भ में स्टेषन पर खड़े कुलियों को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। कल तक ये कुली हमारा बोझ उठाकर अपने कंधों पर रखे बोझ को कम कर लेते थे आज वे अपने ही बोझ तले दब रहे हैं। बड़ी नामी कंपनियों ने आधुनिक किस्म के सूटकेस तैयार कर दिये। अब खुद ही कुली बन जाओं और अपना सामान खुद खींचते हुए मंजिल तय कर लो। जिस स्टेषन पर कुलियों की संख्या कभी दस और बीस हुआ करती थी, वहां अब गिने चुने ही मिलेंगे क्योंकि यात्रियों की सूरत में कुलियों की तादात इतनी बढ़ गयी है कि अब वास्तविक कुलियों की जरूरत नहीं रही। कल्पना कीजिये कि आपके बोझ को कंधे पर ढोते इन कुलियों के घरों के चैके-चूल्हे जलते थे और अब इनके दिल। वक्त अभी भी है। बस समझने की जरूरत है कि चूड़ी, बिंदी और सिंदूर त्यागने से आधुनिकता नहीं आयेगी और न खुद के सूटकेस खींचने से अमीरी। सोच बदलने की जरूरत है और यह बदली हुई सोच कई परिवारों को दो वक्त का खाना दे पायेगी। संस्कृति और परम्परा की रक्षा भी हम कर पाएंगे लेकिन तभी जब हमारी सोच बदल जाए।

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