सोमवार, 19 नवंबर 2012

समागम का यह नया अंक
 मध्यप्रदेश एवं छग के सालगिरह पर केन्द्रित है। 
साथ में बेटी बचाओ अभियान पर मीडिया की भूमिका पर शोध पत्र  शामिल है।
अंक पर आपकी राय की प्रतिक्षा रहेगी 

यह सजा ठीक है



मनोज कुमार 
आजाद भारत में विकास और भ्रष्टाचार एक-दूसरे के पर्याय बनते चले जा रहे हैं. भ्रष्टाचार से निपटने के लिये कई किस्म की कोशिशें जारी हैं, यह कोशिशें कितना कामयाब होती है, यह समय बतायेगा. फिलवक्त मध्यप्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जो कदम उठाया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिये. मध्यप्रदेश में अधिकारी तो अधिकारी, बाबू भी मालामाल हैं और यह खुलासा रोज ब रोज पडऩे वाले छापों और उसमें बरामद हो रही माल असबाब से समझ आ रही है. इस फैसले के कई अर्थ हैं. बेनामी सम्पत्ति हासिल करने के लिये दोषी को तो सजा कानूनन मिलेगी लेकिन जो सम्पत्ति है, वह राज्य की है और राज्य के हित में ही उसका उपयोग होना चाहिये. राज्य सरकार ने खरगोन जिले के एक बाबू की संपत्ति पर आदिवासी बच्चों के लिये स्पोटर््स काम्पलेक्स बनाने का फैसला किया है. सरकार का यह फैसला सुकून देने वाला है. अब तक मध्यप्रदेश में इस तरह का कोई फैसला नहीं लिया गया है. सरकार के इस फैसले से न केवल समाज की सम्पत्ति का उपयोग समाज हित में होगा बल्कि जो प्राकृतिक सम्पदा इस सम्पत्ति के निर्माण में खर्च हुईहै, वह भी बेकार नहीं जाएगी. 

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ समय समय पर कार्यवाही होती रही है किन्तु हर कार्यवाही विंध्वसक रही है. बेजा कब्जा कर भवन बनाया तो उसे डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया गया. यह अनुभव राजधानी भोपाल में और इसके पहले व्यवसायिक नगरी इंदौर के साथ ही दूसरे जगहों की रही है. यह तय है कि जिस जमीन पर निर्माण हुआ, वह सरकार थी लेकिन इस पर बनायी गयी बिल्ंिडग में लोग रह रहे थे, काम धंधा कर रहे थे और ऐसे में हजारों परिवारों के सामने बेकारी और बेबसी पैदा करना न्यायसंगत नहीं जान पड़ता है. बम के धमाके से दहशत पैदा होती है और इस दहशत से आक्रोश और यही आक्रोश आने वाले दिनों में समाज के लिये मुसीबत का सबब बनता है,इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. बेहतर होता है कि ऐसे निर्माण को सरकार अपने आधिपत्य में ले और उस पर इतना जुर्माना लादे कि अवैध निर्माण करने वाले की कमर टूट जाये. वहां रहने वाले, काम धंधा करने वालों को सरकार अपने अधीन करे और उन्हें सुरक्षा का आश्वसन दे ताकि उनमें भविष्य को लेकर भय या संशय नहीं रहे. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मकान दुकान खरीदने वाले अधिकांश लोग मध्यमवर्गीय परिवार के होते हैं और अपने जीवन भर की संचित कमायी से कुछ करने की कोशिश करते हैं. उन्हें इस बात का पता ही नहीं चलता है कि जिसे वह अपना भविष्य मान रहे हैं, वह दरअसल कानूनी तौर पर गलत तरीके से बनाया गया है. भवन निर्माता ऐसे दिलासा दिलाते हैं कि उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. जब मुसीबत टूटती है तो भवन निर्माता किनारा कर लेते हैं क्योंकि उन्हें जो कमाना था, वे कमा चुके होते हैं. जिनका आशियाना उजड़ता है, उनका दर्द वो लोग ही जानते हैं.

बहरहाल, मध्यप्रदेश सरकार ने जिस तरह भ्रष्टाचारी के सम्पत्ति पर स्पोटर््स काम्पलेक्स बनाने का फैसला किया है, वह अच्छा फैसला है. यह फैसला अपवाद न बनकर नजीर बने तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी. हालांकि मध्यप्रदेश के पहले बिहार में और कुछ राज्यों में ऐेसे ही इक्का-दुक्का प्रयास जानने और सुनने को मिले थे किन्तु वहां भी ऐसे फैसलों को नजीर बनाने की कोशिश नहीं हुई. मेरा मानना है कि सरकार इस तरह सजा दे जिससे दोषी को तो सजा मिले लेकिन जिन लोगों की गलती नहीं है, उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय ना दिखे. इससे यह भी होगा कि समाज में जो तंत्र के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है, उस पर भी नियंत्रण पाया जा सकेगा और एक विश्वास का माहौल बनेगा. उम्मीद करते हैं कि अकेले मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि सभी राज्यों में भ्रष्टाचारियों की सम्पत्ति जनहित में उपयोगी हो.

सोमवार, 5 नवंबर 2012

विश्वास का संकट



-मनोज कुमार

भोपाल राजधानी तो है किन्तु महानगर नहीं बन पाया है. भोपाल के अपने ठाठ हैं और भोपाली कहलाने का गर्व भी अलग से तरह से होता है. इन दिनों भोपाल थोड़ा बहुत महानगर के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहा है. तांगों और रिक्शों की इस शहर से विदाई तो कभी की हो चुकी है. तेज रफ्तार से भागती गाडिय़ां महानगर होने का अहसास कराती हैं. मेरे भोपाल में भी मॉल संस्कृति की धमक सुनायी देने लगी है. मैं भी इस नयी संस्कृति के गवाह होने का सुख ले रहा हूं. एक बड़े भव्य मॉल में जाने का मौका मिला. सामने से उसकी चमक-दमक देखकर ही मेरे पसीने छूट गये. इस पसीने यह तो बता दिया कि मेरी लाख कोशिशों के बाद मैं अपने ठेठ देहातीपन से बाहर नहीं आ पाया हूं. खैर, मॉल के भीतर कदम रखने से पहले ही विश्वास के संकट से मेरा सामना हो गया. दरवाजे पर खड़े लोगों ने मशीन से मेरी तलाशी ले डाली, गोया मैं ग्राहक नहीं, आतंकवादी हूं,  झटपट वहां से निकला, आगे बढ़ा. विश्वास के संकट के साथ मैं हर दुकान के सामने से निकलता चला जा रहा था. डर लग रहा था कि फिर कोई रोक कर तलाशी न ले ले. हिम्मत कर मैं एकाध दुकान में गया तो पता चला कि दुकान में लगा कैमरा मेरी निगरानी कर रहा है. इस निगहबानी को देखकर एक बार फिर मैं अपने गांव पहुंच गया. गांव के बनिये की दुकान पर पहुंच कुछ अपनी सुनायी और कुछ उसकी सुनी. कुछ सौदा-सुलह किया और घर को लौट आये. कभी कोई सामान ज्यादा आ गया तो बनिया को लौटा आये और कभी ज्यादा पैसे दे आये तो वो मेरा हिसाब में बकाया लिख लिया. बरसों से बना विश्वास का रिश्ता.

इस मॉल संस्कृति में आपस में सुख-दुख सुनने सुनाने की बात तो दूर विश्वास का रिश्ते की कोई सूरत दिखायी ही नहीं देती है. दुकान में आने वाले की नीयत पर संदेह और काम करने वालों की निगहबानी. मुझे समझ में नहीं आया कि विकास का यह कैसा पैमाना है? विस्तार से विश्वास का संकट, सोचने में भी अजीब सा लगता है लेकिन आज का सच यही है कि अब गैरों पर तो क्या अपनों पर भी किसी को भरोसा नहीं रहा. तोल-मोल के जमाने में अब विश्वास भी तोल-मोल कर खरीदा और बेचा जा रहा है. इस मॉल ने हमारी संस्कृति को नष्ट कर दिया है. हमारे विश्वास की दीवार दरकने लगी है. विकास का यह चेहरा उन लोगों को भा रहा है जिन्हें खुद पर विश्वास नहीं रहा है. मां की बनायी गुझिया और पिता की डांट मेरे विश्वास होने के गवाह हंै. मुझे नहीं मालूम की मॉल में बिकने वाले पिज्जा और बर्गर में कभी मां ेि हाथों की बनी गुझिया की मिठास मिलती होगी. मुझे तो यह भी नहीं पता कि जो लोग अपनों पर विश्वास नहंीं कर रहे हैं, वे अपने ही रिश्तों में कितने ईमानदार होंगे लेकिन एक बात मुझे पता है कि इस विकास के विस्तार ने मुझे और मुझ जैसे जाने कितने लोगों को लालची और स्वार्थी बना दिया है. रिश्तों की गर्माहट मैं मॉल में बहने वाली एयरकंडीशन की ठंडी हवा में भूलता जा रहा हूं. कोयले में पकी मोटी रोटियां और उसके साथ प्याज और मिर्च का स्वाद अब मेरी जुबान को नहीं भाती हैं. अब मेरी जुबान पर बासी और लगभग बीमार कर देने वाले पिज्जा और बर्गर का स्वाद लग गया है. यह संकट स्वाद का नहीं है और न ही सेहत का. यह संकट है विश्वास का जो मैं अपनों से खोता चला जा रहा हूं और शायद स्वयं से भी विश्वास उठ जाने का समय आ गया है.

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

हर नये शब्द में दा साथ होंगे



-मनोज कुमार
राजनारायण मिश्र को आप जानते हंै? तब शायद ही कुछ लोगों का जवाब होगा हां किन्तु जब आप कहेंगे दा को जानते हैं तो शायद ना कहने वालों की संख्या गिनना मुश्किल सा हो जाए. यहां जो कुछ लिख रहा हूं, वह एक किस्म की जुर्रत कर रहा हूं. दा पर लिखने का मुझे कोई अधिकार नहीं है, यह बात मैं जानता हूं. मैं यह भी जानता हूं कि दा के बारे में मुझे कुछ भी नहीं मालूम क्योंकि जितने समय उनके आसपास रहा, सिवाय डांट डपट के कुछ नहीं मिला. उन्हें देखकर सहम जाना और कभी बच्चों की तरह उनके सामने जिद पर उतर जाने पर जो लाड़ मिला, उसे मैं कैसे भूला सकता हूं. सही मायने में यहां पर मैं दा के बारे में नहीं बल्कि दा के बहाने अपने आप पर ही कुछ लिख रहा हूं.

बात यह कोई साल बयासी-तिरासी की है. मैं नगर निगम स्कूल का पढऩे वाला छात्र 11वीं की परीक्षा पास कर देशबन्धु से जुड़ गया. ईमानदारी से तब पत्रकार क्या होता है, यह बात पूरी तरह पता नहीं थी. पढऩे का शौक था, लिख लेता था और इससे आगे हैंडराइटिंग सुंदर थी, सो देशबन्धु में प्रवेश पा गया. अनजाने में पत्रकार तो बन गया लेकिन दा जैसे पत्रकारिता के स्कूल ने मुझे सही मायने में पत्रकार बनाया. एक ऐसा पत्रकार जिसका लेखन प्रभावी हो किन्तु दंभ कहीं न दिखे. चिंतन और मनन करने वाला पत्रकार. मेरी ट्रेनिंग के पहले चरण में दा का आदेश था सम्पादक के नाम पत्र लिखो. अपनी समझ के हिसाब से पत्र लिखते, दा उसे सम्पादित करते और छोटा सा कर छाप देते. अखबार के पन्ने पर नाम छपा देख हम आसमान में उड़ते. दा की नजर मेरे काम पर लगातार बनी रही. नुक्ताचीनी के लिये नहीं बल्कि उस सीख के लिये जहां आज मैं हूं और जहां से मुझे और आगे जाना है.

एक वाकया जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा. एक कहानी लिखने की कोशिश की. कुछ पन्ने लिखकर घर पर अपनी टेबल पर छोड़ दिया कि समय मिलने पर पूरा करूंगा. इत्तेफाकन दा वहां से गुजरे, आदतन सिर पर चढ़ाया हुआ चश्मा आंखों पर लगाया. सरसरी तौर पर पढ़ कर पन्ने को फाडक़र रद्दी की टोकरी में डाल दिया. मैं अवाक देखता रहा. हिम्मत तो थी नहीं कि पूछ लूं कि आपने ऐसा क्यों किया. मन में सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे, तभी दा की आवाज गूंजी-कहानी लिखना चाहते हो, लिखो लेकिन अभी नहीं. अभी पढ़ो और खूब पढ़ो. रोज दस नये शब्द ढूंढ़ों और उसका उपयोग करो. कुछ वर्ष बाद शब्दों का भंडार हो जाएगा तब लिखो. जवाब मिल गया था. उनकी यह सीख आज भी जीवन में काम आ रही है. तहलका पत्रिका पढ़ते हुए एक जगह प्रेम-फ्रेम शब्द और दोस्त सुनील मिश्र के लेख में नीम बेहोशी शब्द पढ़ा तो मन में बिठा लिया कि कहीं न कहीं इसका उपयोग करना है. मेरे लिये जो शब्द नये होते हैं अथवा प्रचलन में कम होते हैं, उसका जब उपयोग करता हूं तो दा का स्मरण सहज हो आता है. दा आज जरूर हम सबका साथ छोड़ गये हैं किन्तु वे हमारे मन मस्तिष्क में हमेशा बने रहेंगे क्योंकि हर नये शब्द में दा साथ चलेंगे.

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

असत्य ही असत्य!


मनोज कुमार
इस बार जब मेरे मोहल्ले में रावण का कद नापा गया तो इस बार उसका कद कुछ फीट और बढ़ गया था। मैं पिछले कई सालों से देख रहा हूं कि मेरे मोहल्ले का रावण साल दर साल ऊंचा होता चला जा रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसा कि हमारा असत्य। हम मोबाइल के जरिये असत्य के प्रतीक हो गये हैं। हर पल झूठ, हर पल धोखा और न जाने क्या क्या। ऐसे में मेरे मोहल्ले का रावण कुछ फीट और ऊंचा हो जाए तो हमें एतराज नहीं करना चाहिए और न ही इतराना चाहिए कि हमने रावण का कद और ऊंचा का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते। कर दिया। एतराज इसलिये नहीं होना चाहिए कि असत्य के इस प्रतीक ने हमसे ऊंचा होने की हिमाकत नहीं की है और इतराना इस बात पर नहीं चाहिए कि हमने असत्य के इस प्रतीक को इतना ऊंचा कर दिया। सच तो यह है कि हमें विजयादशमी मनाने का कोई नैतिक हक है ही नहीं क्योंकि हम अपनी पीढ़ी को असत्य पर सत्य की जीत का पाठ तो जरूर पढ़ाते हैं लेकिन व्यवहार में सत्य को पराजित करने में कभी पीछे नहीं रहते।

परम्परागत विजयादषमी का पर्व मनाने की तैयारी में पूरा समाज जुट गया है। हर साल हम खुद रावण बनाते हैं और उसे मारने का स्वांग भी खुद ही रच डालते हैं। परम्परा का निर्वाह करने के पीछे सत्य और असत्य की परख करना एक पैमाना हो सकता है किन्तु आज की स्थिति में क्या हम विजयादशमी मनाने की स्थिति में हैं? क्या वास्तव में हमने असत्य पर विजय पा ली है? सैंकड़ों साल पहले न जाने राम नाम के एक सात्विक ने रावण का वध किया था, सैकड़ों साल पहले न जाने एक युवा ने पिता के वचन की लाज रखने के लिये वनवास जाना मंजूर कर लिया था। रावण को मारने का हमारा साहस कब का मर चुका है और पिता के वचनों के खातिर वनवास जाने की बात कल्पना से परे है। जब भी वनवास जाने की बात होगी तो हम पिता को ही वनवास भेज देंगे। हमने इसके लिये वृद्धाश्रम बना दिया है। बात जहां तक रावण के मारने की है तो हम अपने आपको क्यों और कैसी सजा दें? आज हम अनैतिकता की पराकाष्ठा को छू रहे हैं। लोकलाज को त्याग दिया है और अराजकता के घोर अंधेरे में भटक रहे हैं। असत्य को असत्य से मारने की हरसंभव हम कोषिष कर रहे हैं। सत्य से हम दूर जा चुके हैं। जीवन की सुबह असत्य से होती है और इसी असत्य को बिछाकर सो जाते हैं।
विजयादषमी का अर्थ होता है विजय की दषमी और हम हर पल पराजित हो रहे हैं। हर कदम पर हमारी पराजय है। इस पराजय के काल में किसकी विजयादषमी और कौन मनाये विजयादशमी। विजयादशमी एक उत्सव की बेला है और यह बेला है असत्य पर सत्य की विजय की। सत्य से हम कोसों दूर हैं। सत्य का अर्थ सिर्फ असत्य बोलना और बोना है। असत्य का यह घनघोर अंधेरा, समाज के किसी कोने में नहीं है बल्कि हर कोना असत्य से काला काला हुआ जा रहा है। किसी समय अपनी मेहनत के बिना कमाने वाले धन को पाप की कमाई कहा जाता था और कोशिश होती थी कि बच्चों को इससे दूर रखा जाये। आज सारे पर्दे गिर गये हैं और बच्चों को पता है कि उसके ठाठ के रास्ते कहां से शुरू होता है। बचपन जब इस पाप की कमाई से बड़ा होता है तो सत्य कहां टिक पायेगा।

मुझे स्मरण हो आता है कि कभी अपने गांव में रामलीला किया करते थे। लगातार आठ नौ दिन की रामलीला। पूरा का पूरा आयोजन जुगाड़ से। हल्की ठंड में लोग अपने अपने घरों से बैठने की व्यवस्था कर आते। मजे लेते और अपने बच्चों को भी अगले बरस रामलीला मंे भागीदार बनने के लिये प्रोत्साहित करते। घर घर से मदद आती। इस रामलीला का मकसद हुआ करता सत्य का संदेश पहुंचाना। इसका मकसद हुआ करता था लोगों के भीतर छिपी प्रतिभा से समाज को अवगत कराना लेकिन अब रामलीला होती है तो पूरी साज-सज्जा के साथ। उस काल के राम आज हमारे बीच आ जाएं तो साज-सज्जा देखकर चौंक जाएं। यह बाजार है और बाजार की लीला से भला कौन अपरिचित है। यह रामलीला की लीला है जो संदेश देती है स्वयं के विजय हो जाने का। जो बताती है बाजार के रास्ते चलो, सत्य और असत्य के फेर में मत पड़ो। विजयादषमी का जो अर्थ बाजार सिखाता है, वही विजयादशमी है क्योंकि अब यह परम्परा का उत्सव नहीं, बदलते बाजार का फेस्टिवल है।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

भगवान की याद



मनोज कुमार
जब कभी हम पर मुसीबत टूटती है तो हमें सबसे पहले भगवान याद आते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान हमारी सारी पीड़ा दूर कर देंगे। भगवान के स्मरण से पीड़ा भले ही दूर न हो किन्तु पीड़ा सहने की षक्ति मिल ही जाती है। भगवान की तरह ही स्वतंत्र भारत में गांधीजी को पूछा और पूजा जा रहा है। हर किसी को गांधी का रास्ता मंजिल पा लेने का सबसे सरल रास्ता लगता है। अन्ना हजारे ने भी गांधी को सामने रखकर भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वयं को प्रस्तुत किया था। आरंभिक दिनों में देषवासियों को उनका समर्थन भी मिला लेकिन आहिस्ता आहिस्ता अन्ना का जादू खत्म होने लगा और एक समय ऐसा भी आया जब अन्ना को अपना आंदोलन खत्म करना पड़ा। अन्ना के लिये यह आसान था कि वे आंदोलन को वापस ले लें। अन्ना की टीम के लिये यह मुष्किल था कि वे आंदोलन वापस लें क्यांे कि उन्हें पता था कि जब तक वे लाठी भांजते रहेंगे, तब तक ही उनकी पूछ बनी रहेगी। षायद यही कारण है कि इनका आंदोलन तो षुरू हुआ था सत्याग्रह से और पहुंच गये कटी बिजली का तार जोड़ने, पहुंच गये मंत्री सलमान खुर्षीद के कारनामे बाहर लाने के लिये। लोकपाल की बात हाषिये पर चली गयी। अब लोकपाल नहीं, लोक हंगामा केजरीवाल टीम के लिये जरूरी हो गया है। मुद्दों के साथ साथ सिर पर पहनी टोपी का स्लोगन भी बदलता गया। पहले कहा गया कि मैं अन्ना हूं, फिर मैं केजरीवाल और अब मैं आदमी हूं कि टोपी पहने घूमा जा रहा है।

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ब्रांड थे। उम्रदराज व्यक्ति का यह साहस लोगों को लुभा रहा था लेकिन उनके हटते ही जैसे भ्रष्टाचार का आंदोलन ही हट गया। गांधीजी की टेक लेकर जो आंदोलन आगे बढ़़ रहा था, उसने बीच में ही दम तोड़ दिया। यह होना चौंकाने वाला नहीं है बल्कि यह आज नहीं होता तो कल होता। गांधीजी की टेक लेकर चल रहे इस आंदोलन में गांधीजी कहीं नहीं थे। अन्ना से लेकर केजरीवाल हमेषा से कहते चले आ रहे हैं कि वे अपनी मांग पूरी होने तक जरूरत पड़ी तो जान दे देंगे। गांधीजी को ऐसे सवालों से भी चिढ़ थी। पराधीन भारत में एक बार उनसे सवाल किया गया कि क्या अपनी मांग मनवाने के लिये वे मरना पसंद करेंगे? सवाल का जवाब देने के बजाय गांधीजी ने कहा था खराब सवाल है। अन्ना टीम की तरह गांधीजी का विष्वास भीड़ एकत्र करने में कभी नहीं रहा बल्कि वे भीड़ के साथ हो लेते थे। अपने आंदोलन के साथ गांधीजी लघु उद्योगों पर जोर देते थे, खेती पर उनका जोर था लेकिन अच्छी तकनीक जानने के बाद भी अन्ना खेतों को छोड़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। 

गांधीजी छोटे छोटे प्रयासों से अंग्रेजों को मजबूर किया करते थे लेकिन आज हम सीधे सरकार पलटने की बात करते हैं। गांधीजी का पूरा प्रयास भारत को स्वाधीन बनाने के लिये था। अन्ना ने जो आंदोलन आरंभ किया, वह समय की जरूरत है किन्तु उनका आंदोलन रातोंरात भारत बदल देने की थी जो लगभग असंभव सा था। अन्ना के अलग हो जाने के बाद केजरीवाल से किरण बेदी भी अलग हो गयी हैं। वे ठेठ राजनीतिज्ञ की तरह बर्ताव करने लगे हैं। सत्तासीन नेताओं और केजरीवाल में फकत इतना ही फर्क है कि अभी वे संसद से बाहर षोर मचा रहे हैं और षायद आने वाले दिनों में संसद के भीतर यही विरोध दर्ज करते नजर आएंगे। तस्वीर बदल पाएंगे, यह तो संभव सा दिखता नहीं है। गांधीजी के बाद जयप्रकाष नारायण, विनोबा भावे ने जो तस्वीर बदलने की लकीर खींची है, उससे पूरी तस्वीर भले ही न बदल पायी हो किन्तु आज भी लोगों के दिल में बदलाव की तमन्ना है। यही कारण है कि जयप्रकाष नारायण के बताये रास्ते पर चलने की कोषिष करते दिखते हैं। केजरीवाल यदि सच में तस्वीर बदलना चाहते हैं तो नेताओं का नहीं, आम आदमी का मन बदलने की कोषिष करें। जब तक भारतीय मन नहीं बदलेगा, ऐसे ही भ्रष्टाचार में डूबे नेता चुने जाते रहेंगे। विकल्प की तलाष में खड़ी जनता को एक रास्ता अन्ना का नजर आया था, दुर्भाग्य से वह रास्ता भी बंद होकर वहीं जा मिला है जहां से हम मुक्ति पाना चाहते हैं। केजरीवाल की लड़ाई से केजरीवाल का कद तो ऊंचा होगा लेकिन आम आदमी वहीं और वैसा ही खड़ा रहेगा जैसा कि आजादी के छह दषक गुजर जाने के बाद भी खड़ा हुआ है।    

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012


समागम का यह अंक गांधीजी के दर्शन एवं विचारो पर केन्द्रित है।
 गांधीजी सर्वकालिक रहे है, यही कारन है की उनके विरोधी भी आज उनके कायल है।
 हमारी  कोशिश है की नई पीढ़ी गाँधी को जाने और समझे। 

समागम एक पूर्णकालिक शोध पत्रिका है। संपर्क कर सकते है 
संपादक  समागम 
3, जूनियर ऍमआई जी, अंकुर कालोनी, शिवाजी नगर भोपाल 16
मोबइल 09300469918 

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...