शनिवार, 18 नवंबर 2017

कवि मुक्तिबोध की जन्मशती


-मनोज कुमार
साहित्य समाज में किसी कवि की जन्मशती मनाया जाना अपने आपमें महत्वपूर्ण है और जब बात मुक्तिबोध की हो तो वह और भी जरूरी हो जाता है। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध स्वातंत्रोत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे कवि हुए हैं जिनकी उम्र बहुत छोटी रही लेकिन उनकी कविता सदियों के लिए अमर हो गई। मध्यप्रदेश में जन्मे और छत्तीसगढ़ के होकर रह जाने वाले मुक्तिबोध की पहचान राजनांदगांव से है। हालांकि मुक्तिबोध किसी एक शहर या प्रदेश के नहीं बल्कि समूची दुनिया के कवि हैं और उनकी समय से बात करती कविताओं का यह शताब्दि वर्ष है।
गजानन माधव ‘‘मुक्तिबोध’’ (13 नवंबर 1917 -11 सितंबर 1964) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे।  वर्ष 2017 हिन्दी के अपने समय के जुझारू कवि मुक्तिबोध का जन्मषती वर्ष है। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन संघर्षॉं तथा विरोधो से भरा रहा। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका असर उनकी कवितायों में दिखाई देती है। पहली बार उनकी कवियाएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसपक्त’ में छपी। कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि पर भी लिखा है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। उनकी विशेषताएँ अगली पढ़ी को रचनात्मक देती रही है। मुक्तिबोध नई कविता के मुख्या कवि हैं। उनकी संवेदना तथा ज्ञान का दायरा व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प की वजह से उनकी सहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ती की जिंदगी की विडंबनाओ तथा विद्रूपताओ का चित्रण उनके सहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के सहित्य की एक बड़ी विशेषता आत्मालोचन की प्रवृत्ति है।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार ‘‘तार सप्तक’’ के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया। मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ‘‘एक साहित्यिक की डायरी’’ प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। ज्ञानपीठ ने ही ‘‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’’ प्रकाशित किया था। इसी वर्ष नवंबर 1964 में नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन ने मुक्तिबोध द्वारा 1963 में ही तैयार कर दिये गये निबंधों के संकलन नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध को प्रकाशित किया था। परवर्ती वर्षो में भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्तिबोध के अन्य संकलन काठ का सपना, तथा विपात्र (लघु उपन्यास) प्रकाशित हुए। पहले कविता संकलन के 15 वर्ष बाद, 1980 में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन भूरी भूर खाक धूल प्रकाशित हुआ और 1985 में राजकमल से पेपरबैक में छह खंडों में ‘मुक्तिबोध रचनावली’ प्रकाशित हुई, वह हिंदी के इधर के लेखकों की सबसे तेजी से बिकने वाली रचनावली मानी जाती है। इसके बाद मुक्तिबोध पर शोध और किताबों की भी झड़ी लग गयी। 1975 में प्रकाशित अशोक चक्रधर का शोध ग्रंथ ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया’ इन पुस्तकों में प्रमुख था। कविता के साथ-साथ, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्ध करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अन्यतम है। 
वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बताते हैं कि वह सत्रह साल की उम्र में मुक्तिबोध से मिले थे। जब वह 24 वर्ष के हुए, तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई। परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय। मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया। जब व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं, तब उन्होंने अंत:करण का प्रश्न उठाया। पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है। कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं। मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं, आत्मसंघर्ष, अंत:करण और आत्माभियोग। मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं। वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं। उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था, वह 2014-15 में साकार हो गई। ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए। ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गांधी और अनाम पागल। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गांधी का चरित्र है। उनमें गांधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ। अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था। 56 युवा आए थे। किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का। मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था, उसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया। वह कभी उस आघात से उबर न सके।
वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव का मानना है कि जिस खतरनाक आगत से मुक्तिबोध रूबरू थे, वह आज हमारे सामने है। इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई। नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब खतरा बढ़ गया है। मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की पद्धति की आलोचना की। उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है, जहां कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी। मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नजरअंदाज करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

सालगिरह का उल्लास

1 नवम्बर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस विशेष 

मनोज कुमार
एक और साल जश्र का, उत्साह का, विकास का और सद्भाव का. यह बहुत कम दफे ही होता है कि एक ही तारीख पर दो लोग सेलिब्रेशन कर रहे हों लेकिन ऐसा होता आ रहा है और एक-दो नहीं बल्कि 17 सालों से जो अनवरत चलता रहेगा. 17 साल पहले एक नवम्बर को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई थी. 61 साल पहले यह वही तारीख है जिस दिन नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. छत्तीसगढ़ अलग हो जाने से मध्यप्रदेश एक बार फिर से नए मध्यप्रदेश बन चुका है क्योंकि भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश का पुर्नसंयोजन किया गया. जो प्रदेश कभी एक हुआ करते थे, आज भौगोलिक रूप से अलग होकर भी एक हैं दिल से. 17 सालों में दोनों राज्यों के मध्य सौहाद्र्रता बनी हुई है और आपस में कभी कोई गर्माहट की नौबत नहीं आयी. शायद यही कारण है कि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमनसिंह की सरकार डेढ़ दशक के स्थायित्व वाली सरकार बन गई है. सीमित संसाधन, चुनौतियां अपार और संभावनाओं का द्वार खोलते मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़.
मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश कहलाता है. अपने निर्माण के साथ ही समूचे भारत वर्ष के भाषा-भाषायी, संस्कृति और विभिन्न धर्मों के लोग यहां रहने आए. लघु भारत के रूप में मध्यप्रदेश ने सद्भाव के रूप में अपनी अलग छाप छोड़ी. कई बार विपरीत स्थितियां निर्मित हुई लेकिन मध्यप्रदेश ने संयम नहीं खोया और हर मुश्किल की घड़ी में अपने आपको साबित कर दिखाया. 2003 में मध्यप्रदेश में सबसे बड़ा राजनीतिक फेरबदल होता है. इस बार भारतीय जनता पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में आती है. हालांकि इसके पहले भी गैर-कांग्रेसी दल सत्ता में आते रहे हैं लेकिन उनका कार्यकाल यादगार नहीं रहा. भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से आयी तो एक बार फिर आशंका थी कि यह सरकार प्रदेश को स्थायित्व नहीं दे पाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शुरू के दो साल में दो मुख्यमंत्री क्रमश: उमा भारती और बाबूलाल गौर बनें लेकिन तीसरे साल मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता की कमान सम्हाल तो वे इतिहास लिख गए. एक दो नहीं बल्कि लगातार 12 वर्षों से मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में भाजपा की सरकार को स्थायी बनाया है बल्कि मध्यप्रदेश को विकास की ऊंचाईयों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.
इन 17 सालों में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह भाजपा के भीतर सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हुए हैं तो छत्तीसगढ़ ने विकास की जो इबारत लिखी है, वह बार बार कहने के लिए विवश करता है सबले बढिय़ा, छत्तीसगढिय़ा. सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण होता है और तीन साल बाद पहला विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में होता है. इस चुनाव में मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता है. छत्तीसगढ़ में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है और सरल, सहज और ठेठ छत्तीसगढिय़ा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर दी जाती है. दूरदृष्टि, पक्का इरादा लेकर राज्य को संवारने में डॉ. रमनसिंह जुट जाते हैं. वे राजनीति में आने के पहले आयुर्वेद के डॉक्टर थे और तब के कवर्धा (आज का कबीरधाम) के लोगों का मुफ्त में इलाज किया करते थे. उनके मन में लोगों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव आरंभ से था. सो इसी भाव से वे राज्य की तकदीर संवारने में जुट गए और आज छत्तीसगढ़ देश ही नहीं, विदेशों में अलग से चिंहित है. डॉ. रमनसिंह और शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में दोनों राज्यों में 2003, 2008 और 2013 का चुनाव पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा जीत लेती है. 2018 में भी दोनों के नेतृत्व में चुनाव लड़े जाने की पूर्ण संभावना है और इस बात के आसार बड़े हैं कि एक बार फिर सत्ता में भाजपा की वापसी हो सकती है. भाजपा की वापसी एक राजनीतिक दल के रूप में तो होगी ही, अपितु उनके मुख्यमंत्रियों के अथक परिश्रम से प्रदेश की बदलती तस्वीर इस जीत का एक बड़ा कारण होगी.
आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां की नक्सल समस्या है. इसके साथ ही अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन छत्तीसगढ़ को आगे बढऩे नहीं दे रहा था. अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले छत्तीसगढ़ के विकास के लिए कोई ऐसा रोडमेप तैयार नहीं किया गया था जिससे यहां का विकास हो सके. राज्य का दर्जा मिलने के बाद सत्तासीन पहली कांग्रेस सरकार का फोकस भी शहरों की तरफ था और इस एजेंडे से आम आदमी निराश हो चला था. इस निराशा का ही परिणाम था जनमत ने भाजपा को अपने नेतृत्व के लिए चुना. और भाजपा ने डाक्टर साहब कहे जाने वाले सादगी पसंद, दूरदृष्टा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सौंप दी. आरंभिक दिन कुछ उथल-पुथल के थे लेकिन जिस तरह जहाज उडऩे से पहले कुछ दूर तक रेंगता है और फिर आसमान छूने लगता है, ठीक वैसा ही रमनसिंह ने अपने कार्यक्रमों को, एजेंडे को आगे बढ़ाया. आज छत्तीसगढ़ राज्य के चारों तरफ खुशियां हैं, विकास है और उम्मीदें ठाठें मार रही हैं. छत्तीसगढ़ का यह विकास किसी और के लिए तकलीफ का कारण हो सकता है कि तमाम किस्म की चुनौतियों से निपटते हुए विकास के रास्ते पर सबसे आगे और सबसे अलग छत्तीसगढ़ दिख रहा है.
छत्तीसगढ़ के विकास को मापना हो तो उन तथ्यों और आंकड़ों का मिलान करना होगा जो सच की तस्वीर पेश करते हैं जैसे कि 2003 में राज्य का बजट लगभग 7 हजार करोड़ था जो अब 78 हजार करोड़ से अधिक है तो राज्य में प्रति व्यक्ति आय 10 हजार से बढक़र 82 हजार हो गई है. बिजली उत्पादन में छत्तीसगढ़ कभी पीछे नहीं रहा लेकिन सुनियोजित प्रयासों ने राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 4,732 मेगावॉट से बढ़ाकर 22,764 मेगावाट करने में सफलता पायी है। रमनसिंह सरकार राज्य के लोगों के सेहत के लिए भी फ्रिकमंद है. यही कारण है कि शिशु मृत्युदर 63 से घटकर 46 प्रति एक हजार दर्ज की गई है तो मातृ मृत्यु दर प्रति लाख 365 से घटकर 221 पर ठहर गई है. कुपोषण 52 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो गई है जिसमें और कमी के प्रयास निरंतर जारी है. महिलाओं और बच्चों के लिए अनेक किस्म की विशेष योजनाएं बनायी गई है जिसमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना का सक्रियता से पालन किया जा रहा है. कल तक धुंये वाले चूल्हे में रसोई का काम करने वाली महिलाओं में कुछ बीमारियां होती थी, आज उन्हें गैस चूल्हा मिल जाने से राहत मिली है. इसी तरह बाल ह्दयरोग से बच्चों को मुक्ति दिलाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राज्य के पीडीएस सिस्टम की देश भर में प्रशंसा हुई है और लोगों को सहज रूप से खाद्यान्न मिलना संभव हुआ है. एक रुपये किलो चावल और दूसरी रोजमर्रा जरूरतों की चीजें मिल जाने से छत्तीसगढ़ राज्य पलायन से मुक्त हुआ है. 
छत्तीसगढ़ के विकास मेें सबसे अहम योगदान रमन सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किया गया कार्य है. शहरों से लेकर अंतिम पंक्ति पर बैठे परिवार का बच्चा-बच्चा स्कूल जाए, इसके लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं. खासतौर पर बालिका शिक्षा के लिए जो कार्य छत्तीसगढ़ में हुए हैं, वह दूसरे राज्यों के लिए आदर्श के रूप में उपस्थित हैं. गणवेश, किताबें, फीस और स्कूल आने-जाने के लिए नि:शुल्क सायकल आदि ने बच्चों को स्कूल जाने के लिए आकर्षित किया है क्योंकि असुविधाओं और आर्थिक परेशानियों के चलते प्राथमिक स्कूल से आगे पढ़ नहीं पाते थे. सबसे बड़ा काम नक्सली क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए सरकार ने किया है. छू लो आसमां जैसी योजनाओं के तहत उनके लिए पृथक से स्कूल आश्रम शालाएं, कोचिंग और अन्य व्यवस्था की गई जिसका परिणाम यह निकला कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे साल-दर-साल हैरत में डाल देने वाली कामयाबी प्राप्त कर रहे हैं. पीईटी, पीएमटी, ट्रीपल टीआई के अलावा स्वरोजगार में भी इनकी कामयाबी छत्तीसगढ़ को उपलब्धियों से भर देती है. प्रतिभाओं को निखारने और उन्हें मंच देने का काम सरकार ने किया और सरकार के प्रयासों को छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं ने किया. 
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के हितार्थ ऐसी योजनाएं आरंभ की जिससे न केवल आम आदमी का भला हुआ बल्कि पूरे देश में मध्यप्रदेश का डंका बजा. मध्यप्रदेश की अनेक योजनाओं को देश के भाजपा और गैर-भाजपाशासित प्रदेशों ने लागू किया. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की चिंता आरंभ से बेटियों के प्रति रही है. उनके जन्म से लेकर ब्याह तक की व्यवस्था उन्होंने सरकार के जिम्मे ले ली. लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर कन्यादान योजना ने जैसे महिला सशक्तिकरण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है. राजनीति में भी महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला प्रदेश है. रोजगार के लिए भी उनके लिए व्यापक इंतजाम किया गया है. जो कसर रह गई थी उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आरंभ की गई योजना यथा उज्जवला योजना को लागू कर महिलाओं को धुंआ-धुंआ होती जिंदगी से निजात दिलाने का सार्थक प्रयास हुआ है. शिवराजसिंह की योजनाओं से स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रभावित हैं. इसलिए बेटी बचाओ योजना में, बेटी पढ़ाओ जोडक़र उसे देशव्यापी बना कर शिवराजसिंह का समर्थन करते हैं. किसानों को लेकर मुख्यमंत्री चौहान की चिंता सबसे आगे रही है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का शुभारंभ करने स्वयं नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के शेरपुर पहुंचते हैं. यह शिवराजसिंह की चिंता का ही सबब है कि मध्यप्रदेश लगातार पांच वर्षों तक कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त करता रहा है. बुर्जुर्गों के लिए मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना तो पूरे भारतीय समाज के लिए आदर्श योजना साबित हुई है. सरकार की योजना और कार्यक्रम समयबद्ध परिणाममूलक बने, इसके लिए दुनिया में पहली बार लोक सेवा गारंटी कानून लाया गया. यह पहली बार हो रहा है कि आम आदमी को समयबद्ध सेवा नहीं मिलने पर लोकसेवकों को दंड देने का प्रावधान किया गया है. 
इस तरह 17 सालों में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ ने विकास के नित नए आयाम छुए हैं. मुख्यमंत्री रमनसिंह को चाउर वाले बाबा कहा गया तो शिवराजसिंह चौहान बच्चों के मामा कहलाए. दोनों ही कामयाब मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. ऐसा भी नहीं है कि सबकुछ बेहतर हुआ, कुछ कमियां भी रह गई. इसके भी कई कारण हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के समक्ष नक्सलियों की चुनौती है तो मध्यप्रदेश में सिमी का खौफ. चुनौतियों और संभावनाओं के बीच इन 17 सालों ने दोनों राज्यों को बेहतर से बेहतर बनते देखा है. उम्मीद की जाना चाहिए कि सालगिरह के यह उल्लास सालों-साल बना रहे.

सोमवार, 25 सितंबर 2017

बुद्ध चुनें या युद्ध?


-मनोज कुमार
     एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ जाता है जो साल बीतते बीतते फिर एक बड़े आकार में हमारे सामने खड़ी हो जाती है. सवाल यह है कि हमें बार बार युद्व को चुनना है या बुद्ध को? हां, यह जरूर है कि बुद्ध को चुनने से पहले युद्ध के कारणों को तलाश करना पड़ेगा. 
महात्मा कहते थे कि पाप से नफरत करो, पापी से नहीं लेकिन हमारी नजर में पाप दूजे स्थान पर है और पापी पहले. यही एक गलती बार बार हमें बुद्ध से दूर और युद्ध के करीब ले आती है. बुराई क्या है? क्या रावण बुराई है या बुराई का प्रतीक है? हम हर वर्ष प्रतीकों को मारते हैं. भारतीय उत्सवी समाज है. वह हर अवसर को उत्सव के अनुरूप बना लेता है. दशहरा का पर्व भी इसी बात का द्योतक है. वर्तमान समाज में हमें रावण जैसा ज्ञानी तो नहीं मिल रहा है लेकिन बुराई का प्रतीक रावण हरेक कदम पर बिठा दिया गया है. एक चपरासी के घर से अवैध कमाई का लाखों रुपया, जमीन-जायदाद और जाने क्या-क्या मिलता है तो हम उसकी कमाई की ओर देखते हैं. विधिसम्मत उसे सजा दिलाने की कार्यवाही करते हैं लेकिन कभी हमने इस बात की कोशिश नहीं की कि आखिर उसने इस बुराई के रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? आर्थिक कमजोरी उसके भीतर के बुद्ध को हरा देती है और वह युद्ध के भाव से गलत रास्ते पर चल पड़ता है. जब हम इस बुराई की जड़ की तरफ जाने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि पहले पहल जब उसने 10 या 5 हजार रुपये गलत ढंग से हासिल किए होंगे तो उसके हाथ भले ही ना कांपें हों, मन जरूर कांपा होगा. भयभीत हुआ होगा. उसे एक बार तो लगा होगा कि वह गलत कर रहा है. लेकिन जब यह प्रक्रिया एक से अधिक बार होने लगी तो वह निश्चित हो गया कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. चंचल लक्ष्मी उस बिगड़ते व्यक्ति के चेहरे पर चमक ला देता है. उसके ऊपर के अफसरान को भी इस बात की खबर होगी लेकिन उन्होंने भी रोकने और टोकने की हिम्मत नहीं की. करते भी कैसे? उन्हीं को देखकर उसके भीतर लोभ जागा. उसके भीतर का बुद्ध विलुप्त होता गया और वह युद्ध के भाव से जीवन को जीने लगा. यह वही जगह है जहां से हम बुराई की जड़ को ढूंढ सकते हैं. उस बिगड़ते गरीब आदमी को समझने की कोशिश कर सकते हैं कि आखिर उसने गांधी का रास्ता क्यों छोड़ा? वह रावणरूपी बुराई का प्रतीक क्यों बन गया? वह लंकेश की तरह ज्ञानी तो हो नहीं सकता था. 
    जिस दिन हम इस बुराई की जड़ पर चोट करेंगे, यकीन रखिए कि हमें हर साल रावण के वध के लिए हथियार नहीं उठाना पड़ेगा. और वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम अच्छाई का पर्व मनाएंगे. एक ऐसा पर्व जिसमें किसी की पराजय नहीं होगी बल्कि चौतरफा जय और जय होगी. इसे करने के लिए अपने भीतर गांधी और बुद्ध को जिंदा करना होगा. कबीर और तुलसी को समझ कर अपने जीवन में उतारना होगा. भौतिक सुविधाओं के फेर में अ से लेकर ज्ञ तक सभी बौरा गए हैं. कनक और कनक में भेद करना भूल गए हैं. एक कनक जो देह की सुंदरता को बढ़ाता है तो दूसरा कनक जीवन की सांस को रोक देता है. सही मायने में दोनों कनक एक से हो गए हैं जिसमें शारीरिक तौर पर व्यक्ति भले ही जीवित हो लेकिन उसकी आत्मा को यह कनक मार देता है. हमें इस बार तय करना होगा कि हम युद्ध के रास्ते पर चलेंगे या बुद्ध के रास्ते पर? हमें रावण बनना है या ज्ञानी लंकेश से कुछ सीखना चाहेंगे? हम गांधी और कबीर बनकर एक नए समाज का निर्माण करेंगे या जीवन भर युद्ध के रास्ते पर चलते रहेंगे? 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है


मनोज कुमार

     इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा है, वह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी है? सम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु। 

   भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।

   आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था। 
     स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये। प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर ‘स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।

  स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।

  कुछ भी कहिए, यह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा है, उसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है। 

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

अंग्रेजी के मोहपाश से आखिर कब मुक्त होंगे?


-अनामिका
एक के बाद एक वर्ष गुजरते जा रहे हैं और देखते ही देखते लगभग 70 वर्ष गुजर गए लेकिन भारतीय समाज अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाया है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता दिलाने की जितनी पुरजोर कोशिश की जा रही है, अंग्रेजी का वर्चस्व उतना ही बढ़ रहा है। कभी अंग्रेजों पर फ्रेंच ने राज किया था और अंग्रेजी भाषा को दरकिनार कर दिया था लेकिन फ्रेंच शासन से मुक्त होने के बाद अंग्रेजी को पूरी ताकत के साथ वापस उसका सम्मान दिलाया गया। किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि जिन अंग्रेजों के हम अनुगामी बने हुए हैं, उनसे यह नहीं सीख पाये कि कैसे हम अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका सम्मानजनक स्थान दिलायें। यह तथ्य सर्वविदित है कि हिन्दी दुनिया में सर्वाधिक बोली जाती है, पढ़ाई जा रही है लेकिन भारत में अंग्रेजी का वर्चस्व इन उपलब्धियों पर पानी फेर देता है। इस बार 14 सितम्बर को फिर एक दिन, एक सप्ताह तथा एक माह का हिन्दी के नाम होगा और इसके बाद हम वापस अंग्रेजी की कक्षा में चले जाएंगे।
हिन्दी भाषा को हमारी सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक चेतना, हमारी भारतीयता, हमारी सभ्यता, हमारा साहित्य, हमारी कलाएं, सभी मिलकर समृद्ध और बहुआयामी बनाती हैं। आधुनिक होती मानव सभ्यता की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जिस तकनीक का, जिस शब्द भंडार का, जिस गहन अनुसंधान करने वाली बहुआयामी जीवंत, सर्वमान्य सभी माध्यमों में सहज ढंग से स्वयं को ढालने वाली वैज्ञानिक, संवेदनशील और सशक्त भाषा की आज हमें जरूरत है, वह हिन्दी के अलावा और कौन सी भाषा हो सकती है? हिन्दी की सहज सम्प्रेषणीयता, विविधता और सार्वभौमिकता को लेकर कोई संदेह या सवाल पैदा हो सकता है? ज्ञान की तमाम धाराएं, उप-धाराएं, अंतर्धाराएं, तकनीक तथा अन्य अनुशासनों की आवश्यकताओं को पूरा करने की आत्माशक्ति और विराटता हिन्दी के अलावा और किस भाषा में हम पाते हैं? हिन्दी का वैश्विक स्वरूप जिस तेजी के साथ उभरा है, स्थापित हुआ है, उसमें बाजार की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। भू-मंडलीकरण ने भी हिन्दी को प्रसारित तथा प्रचारित किया है। 
हिन्दी जब आज दुनिया में अपना डंका बजा रही है तो फिर उसके अपने ही घर में उसका अपमान क्यों? हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाएं हमारी अस्मिता हैं तथा अंग्रेजी हमारी कुंठा, लेकिन त्रासदी यह है कि हम कुंठा-जीवी हो गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्र के समुचित विकास के लिए हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को प्रभावशाली बनाया जाए। सरकारी कामकाज में इनका प्रयोग करके, इन्हें नौकरी का माध्यम बनाकर प्रभावशाली बनाया जा सकता है, लेकिन अब तक यह काम दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में संभव नहीं हो पाया है। हर तरह के संवैधानिक उपबंधों, नियमों और विनियमों के क्रियाशील होने के बावजूद हम हिन्दी को उसका अधिकार दिला पाने में नाकाम रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद तक भी हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाएं निर्वासन भोगने के लिए विवश हैं। 
फ्रांस और इंग्लैंड के बीच चले सौ वर्षों के लम्बे युद्ध के दौरान अंग्रेजों में फ्रेंच भाषा के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। 14वीं शताब्दी (1362) में पार्लियामेंट में ‘स्टेच्यूट ऑफ प्लीडिग’ अधिनियम अंग्रेजी के पक्ष में पारित हुआ।  भाषाई अस्मिता की रक्षा का जो काम अंग्रेजों ने 14वीं शताब्दी में अंग्रेजी के परिप्रेक्ष्य में कर दिखाया, हमें यह काम आज हिन्दी में करना होगा। राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य को करने के लिए हमारे पास संबल के रूप में संवैधानिक उपबंध हैं। ये संवैधानिक उपबंध के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक हैं। 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारत संघ की राज भाषा के रूप में स्वीकार किया गया तथा संविधान सभा के अध्यक्ष ने घोषणा की थी कि-‘राज भाषा हिन्दी देश की एकता को कश्मीर से कन्याकुमारी तक अधिक सुदृढ़ बना सकेगी। अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषा को स्थापित करने से हम निश्चित ही और भी एक-दूसरे के निकट आएंगे।’ संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार 1955 गठित राजभाषा आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए 1957 में संसदीय समिति बनायी गई। तद्नुसार निर्णय किया गया कि अंग्रेजी का प्रयोग 26 जनवरी 1965 के बाद भी जारी रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 351 में व्यवस्था है कि ‘हिन्दी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, यह दायित्व केन्द्र शासन का होगा।’
ऐसा नहीं है कि हिन्दी का साम्राज्य कुछ थोड़ा-सिमटा हुआ हो, उसका वर्चस्व ना हो और दुनिया में उसका फैलाव या विस्तार न हो। यह सोच कर हम गौरवान्वित हो उठते हैं कि हमारी फिल्मों और फिल्मी गीतों ने हिन्दी को अपार लोकप्रियता दी है। यह जानकर हम खुश हो उठते हैं कि दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई और सिखाई जाती है। यह जानकर हम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों, साहित्यकारों तथा कलाकारों ने हिन्दी को प्रतिष्ठित किया है। यह सोचकर भी हम अपनी पीठ थपथपा लेते हैं कि गाहे-बगाहे हमारे बड़े बड़े नेता विदेशी जमीन पर अपनी भाषा यानी हिन्दी में भाषण देकर इतिहास रच देते हैं। यह सोच कर भी हम गर्व महसूस कर लेेते हैं कि हिन्दी और हिन्दी की सांस्कृतिक परम्परा को विदेशी लोग सीखने की, अपनाने की कोशिश करते हैं। पर हमारी ये खुशी, ये गर्व की भावना तब चूर-चूर हो जाती है जब हम देखते हैं कि भारत के स्कूल तथा कॉलेजों में हिन्दी के प्रति न तो किसी प्रकार का सम्मान का भाव है और न ही सीखने, पढऩे और पढ़ाने की अभिरूचि। 
वास्तविकता हमेशा कड़ुवी होती है, कठोर होती है। इन सच्चाईयों से जूझना जरूरी है क्योंकि आज हम उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। चतुर-चालक विश्व बाजार हिन्दी को अपने साम्राज्य विस्तार में सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहा है इसलिए हिन्दी की जो असली पहचान है, अपनी गरिमा है, उसको आघात न पहुंचे, इसके लिए हमें चौकस रहना होगा। विदेशी बाजार हो या देशी बाजार, उन्हें हिन्दी भाषा के विकास और विस्तार से कोई बहुत वास्ता नहीं है बल्कि वे उस हिन्दी मानस के भारतीय को अपना टारगेट बनाते हैं जो उनके लिए महज उपभोक्ता की तरह है। शायद यही कारण है कि हिन्दी भाषा के लिए लगातार कोशिशों के बावजूद वह मंच नहीं मिल पाया है जिस पर हिन्दी भाषा का हक है। इसके उलट जब हम अंग्रेजी की तरफ देखते हैं तो विस्मय हो जाना सहज है जो विश्व भाषा न होते हुए भी विश्व मंच पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के सुस्थापित है। अंग्रेजी की जानकारी और शिक्षण से परहेज नहीं किया जाना चाहिए लेकिन हिन्दी को बाजार की तरह उपयोग किया जाना अनुचित है। हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए हम सबको सचेत रहना होगा। 


सोमवार, 28 अगस्त 2017

स्वरोजगार बनाम स्टार्टअप


मनोज कुमार
लम्बे सफर के बाद जब आप अपनी मंजिल तक पहुंचने वाले होते हैं तब रेल्वे स्टेशन पर सहसा आपकी नजरें कुली को ढूंढने लगती थी. कोई कुली लपक कर आता और आपके बोझ को अपने कंधों पर उठाकर रेल्वे स्टेशन से बाहर छोड़ आता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. अब आप कुली को नहीं ढूंढते हैं और रेल्वे स्टेशन पर कुली भी आपको नहीं मिलता है. समय बदल गया है. चुपके से आप यात्री के साथ साथ स्वयं भी कुली बन गए हैं, यह खबर स्वयं को नहीं हो पायी है. जब आप सफर के लिए सूटकेस खरीदने जाते हैं तो और खासियतों के साथ दुकानदार आपको बताता है कि इस सूटकेस के  पहिए घुमावदार और मजबूत है. आपको सामान ले जाने में दिक्कत नहीं होगी. तब वह आपको अपरोक्ष रूप से बता देता है कि कुली के तौर पर आप अपना भार स्वयं उठाने के लिए तैयार हैं. हमें भी लगता है कि कोई सौ-पचास रुपये बचाकर हमने बड़ा काम कर लिया है लेकिन यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके हमने एक आदमी का रोजगार छीन लिया है. हमारे बोझ को उठाकर हमें राहत देता था तो हमें मिलने वाली राहत से उसके घर का चूल्हा जलता था. हम बेखबर रहे और हमारी वजह से कई घरों के चूल्हे बुझने लगे. कुछ लोग शायद मेरी तरह संवेदनशील होते हैं तो उन्हें यह बात अखरती है तो उन्हें साजिशन समझा दिया जाता है कि हम अपना बोझ दूसरे के कंधे पर डाल कर उसका शोषण कर रहे हैं. इस शोषण जैसे शब्द से पूरी कायनात पलट जाती है. 
यह एक कुली की बात नहीं है. ऐसे करके हमने जाने कितने लोगों का, अलग अलग ट्रेंड के रोजगार को खत्म कर दिया है. हमने अपनी पारम्परिक संस्कृति को दरकिनार कर दिया है. फैशन के फेर में भी हमने सैकड़ों घरों के चूल्हे की आग को ठंडा कर दिया है. भारतीय समाज में कांच की चूडिय़ां सौभाग्य का प्रतीक हुआ करती थी. तीज-त्योहार से शादी-ब्याह तक हमारी मां-बहनें, भाभी-चाची हाथों भरकर लाल-हरी चूडिय़ां पहनती थीं. इन चूडिय़ों से उनका सौंदर्य निखर उठता था. रसोई में जब वह रोटी बेलती तो बेलन चलने के साथ आपस में टकराती चूडिय़ां उस रोटी के स्वाद को दुगुना कर देती थी. चूडिय़ों के प्रति आसक्ति इतनी कि उनकी आलमारियों में किसम किसम की चूडिय़ां होती थी. यही नहीं, चूडिय़ों के दरक जाने पर फौरन उसे बदल दिया जाता था. बड़े-बूढ़ों ने समझाया था कि दरकी चूडिय़ां सौभाग्यवती नहीं पहनती हैं. वास्तव में इसके पीछे सामाजिक विज्ञान था, मनोविज्ञान काम करता था. दस-बीस और पचास रुपयों की चूडिय़ों से भाग्य कितना संवरता है या नहीं, यह तो उन्हें भी नहीं मालूम होगा लेकिन इन चूडिय़ों की खरीददारी से चूडिय़ां बनाने वाले कारीगरों के बच्चों को दो जून की रोटी आराम से मिलती थी. फिर समय बदला. कुलियों की तरह चूडिय़ों के दिन भी लदने लगे. फैशन ने दस्तक दी और हाथ भर की चूडिय़ां महिलाओं को बंधन लगने लगा. अब कांच की जगह उसी कीमत की मेटल या कुछ ऐसी ही एक-दो पटले हाथों में डाल लिए. महीनों और बल्कि सालों ना खराब होने वाली चूडिय़ां मात्र परम्परा को पूरी करने पहनी जाने लगी. धीरे-धीरे चूडिय़ां बनाने के कारखाने बंद होने लगे. स्वरोजगार के साथ एक और कुटीर उद्योग मरने लगा. खनकती कलाईयों से रोटी में आने वाली मिठास खत्म होने लगी क्योंकि अब रोटियां बेली नहीं बल्कि बनायी जाती हैं क्योंकि घर-घर में रोटीमेकर है. 
मशीनों के हम इतने मोहताज हो गए हैं कि अब हमारी हर सांस मशीनों पर टिकी हुई है. जो मशीनें हमारी जरूरत के लिए बनी थी, वह हमारी दिनचर्या में शामिल हो गई हैं. हम निकम्मे और नकारा होते जा रहे हैं क्योंकि हमने एक-दूसरे का हाथ छोड़ दिया है. और यही कारण है कि खुद का सामान ढोकर पचीस-पचास रुपये बचाकर किसी कुली को बेरोजगार कर रहे हैं तो फैशन के नाम पर चूडिय़ों से भागकर हमने अपने ही लोगों के हाथों का रोजगार छीन लिया है. मशीनों से हमें शारीरिक श्रम से रोक दिया है और हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों के पास जा रहा है. 25-30 साल के युवाओं के गर्दन में, पीठ और कमर में दर्द की शिकायतें बेपनाह हो रही हैं. ऐसा क्यों इस पर हमने सोचा ही नहीं? भागमभाग की जिंदगी में हमारे मुंह में जिस अचार और पापड़ का स्वाद होता था, सेहत बनाती थी, वह गायब है. नकली और सेहत पर भारी पडऩे वाले मशीनों से बने महीनों पुरानी चीजें खाने के बाद बीमारी की दस्तक अस्वाभाविक नहीं है. ऐसे में जब जब स्टार्टअप  की बात होती है मुझे हिन्दी की महत्वपूर्ण कृति ‘सतह से उठता आदमी’ की याद आ जाती है. स्टार्टअप का मोटेतौर पर शायद मायना शायद ‘सतह से उठता आदमी’ हो सकता है. हमने स्टार्टअप तो ले लिया है लेकिन जमीनी सच से कब जुड़ेंगे? महात्मा गांधी कुटीर उद्योगों के पक्षधर थे क्योंकि वे जानते थे कि इससे समाज, संस्कृति के साथ सेहत भी बची रहेगी. बहुत कुछ अभी भी शेष है. योग को योगा बनाकर लौट रहे हैं तो फैशन की तरह लेकिन योग कर लें और थोड़ा दूसरों के प्रति संवेदनशील हो जाएं तो शायद मशीन और डॉक्टर से हमारा पीछा तो छूटेगा ही. चूडिय़ों की खनक और कुलियों की मुस्कराहट से अपनी नई पीढ़ी को दिखा सकेंगे.

अहा! सच में अहा

  अहा! सच में अहा देश की सुपरिचित पत्रिका ",अहा! ज़िंदगी" में छपना हमेशा से उत्साहित करता रहा है। कोई चालीस साल पहले "धर्मयु...