शनिवार, 9 मार्च 2013

कातिल सावन और मार्च



मनोज कुमार
सावन और मार्च का महीना दोनों ही कातिल होता है. सावन नायिका के तन और मन को जलाता है तो मार्च का महीना लोगों की जेब को जला डालता है. सावन जाते जाते नायिका निढाल हो जाती है तो मार्च गुजरते ही नायक भी लगभग ठंडा सा पड़ जाता है...  इस गर्माते मार्च के महीने में जब यह गीत याद आ जाये तो ऐसा लगता है कि किसी ने जले पर नमक छिडक़ दिया है. तेरी दो टकियों की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये... यह गाना तो उन लोगों को जरूर याद होगा जो मेरी उम्र के होंगे... उनकी बात नहीं करता जिसमें नायिका मिस कॉल से पट जाने की बात कहती हो... खैर, यह बड़ा उलझाव वाला मामला है... अभी तो हम सावन की बात कर लें...अब आपके दिमाग में यह बात आयेगी कि ये आदमी बौरा गया है... अच्छा खासा बासंती मौसम है... होली आने को है... रंगों का गीत गुनगुनाने के बजाय सावन की बातें कर रहा है... आप लोग ठीक सोच रहे हैं... मेरा सावन तो कब का बीत गया... सही मायने में तो होली के लायक भी नहीं बचा... अब जो बचा है वह मार्च महीने का हिसाब किताब... इससे कोई नहीं बच पाया है... नायिका के लिये सावन लाखों का है तो नायक हों या न हो... हर आदमी के लिये मार्च का महीना लाखों का है... ओहदेदार पदों पर बैठने वाले लोग इस जुगत में लगे हैं कि बजट लेप्स न हो जाये... नौकरीपेशा इस बात से परेशान हैं कि इनकम टेक्स किस तरह बचाया जाये... जिन लोगों की छुट्टियां बच गयी हैं, वे अपनी छुट्टी बचाने की जुगत में लगे हैं... 
अलग अलग तरह से देखो तो मार्च का महीना लाखों का ही नहीं, करोड़ों का है...जब बारिश में भीगी-भीगी सी मस्त नायिका सावन को लाखों का बता रही होगी तब भी मार्च करोड़ों का ही होगा... पता नहीं तब क्यों किसी फिल्मकार को यह क्यों नहीं सूझा कि वह मार्च महीने को करोड़ों का बता कर किसी नायक को नचवा दे... चलो, कोई हीरो नहीं नाचा तो न सही... कुछ कल्पना करते हैं कि यह सावन अगस्त के महीने में आने के बजाय मार्च में आता... तब क्या होता...? यह कल्पना उसी साठ और सत्तर दशक की है... दो हजार दस के बाद की कल्पना करेंगे तो मजा किरकिरा हो जाएगा क्योंकि अब कि नायिकाओं को लाखों के सावन से मतलब नहीं, वह तो एक मिस कॉल से पटने को तैयार है... इसलिये हमें फ्लैशबैक में ही जाना होगा... नायिका गरजते-बरसते मौसम में इठलाती हुई नायक से मनुहार करती हुई गा रही है... तेरी दो टकियो की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाये... इत्ते में परेशान नायक शायद ऐसा ही गायेगा... भाड़ में गया तेरा सावन और तु...इधर लाखों का भ_ा बैठा जाये... चलो, हंसी ठ्ठा खूब हुआ. होली आने में अभी एक पखवाड़ा है.. मैं तो इस लिखे के साथ एडवांस में ही होली बोल देता हूं.. हेप्पी होली इसलिये नहीं कि अभी तो इतना दुखड़ा रोया हूं.. इसके बाद तो आप हेप्पी होंगे और मैं.. हालांकि आप बोलो ना बोलो लेकिन आप भी...

गुरुवार, 7 मार्च 2013

समय का शोध और शोध का समागम


भोपाल से प्रकाशित शोध पत्रिका समागम वास्तव में एक पत्रिका नहीं, एक संकल्प है. संकल्प उस पत्रकारिता का जिसके लिये मेरी पहचान है. बीते पैंतीस सालों में जो कुछ सीखा, उसमें से जो कुछ अपनी बाद की पीढ़ी को दे सकूं, इसके लिये समागम को माध्यम बनाया.  मेरे संकल्प को समाज ने अपना संकल्प बनाया और साथ  चलकर मेरा हौसला बढ़ा रहे हैं. इन सबके लिये आभार छोटा सा शब्द है लेकिन आभारी ही नहीं, मैं हमेशा ऋणी रहूंगा.  समागम पर साथी विद्यार्थी भाई राजीव ने एक पड़ताल की है. इस पड़ताल को समाचार4मीडिया ने सम्मानजनक स्थान देकर प्रकाशित किया है. मैं दोनों के प्रति आभारी हूं. दरअसल अपने अन्य साथियों तक राजीव के विचारों को बांटने का  मोह नहीं छोड़ पा रहा हूं तो इसे  फेसबुक और अपने ब्लॉक पर सधन्यवाद जारी कर रहा हूं
मनोज कुमार
सम्पादक समागम, भोपाल
मोबाइल 09300469918  



राजीव रंजन प्रसाद, शोध छात्र

यह समय सूचनाक्रान्त है। सूचनाओं का आधिक्य और उससे निर्मित दबाव परोक्ष है, किन्तु इससे उत्पन्न कठिनाइयाँ अथवा मुश्किलें प्रत्यक्ष हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक गतिकी जिसमें सूचनाओं की आमद अथवा आवाजाही हाल के दिनों में बढ़ी है, में अच्छी सामग्री का मूल्य तो है;  संकट सिर्फ खोज का है। नई पीढ़ी जो ‘गूगल सर्च ईंजन’ पर बेपरवाह ढंग से आश्रित है; ने नई चुनौतियों को सिरजा है। यह सचाई है कि वास्तविक विषय का ज्ञान और असली मुद्दों की पहचान इस पीढ़ी में शामिल अधिसंख्य लोगों को नहीं है। वे इंटरनेट से प्राप्त सामग्री का प्रयोग तो करते हैं, लेकिन उसकी गुणवत्ता या अन्तर्वस्तु विश्लेषण को लेकर गम्भीर या आश्वस्त नहीं दिखाई देते है।

समय के इस विपरीत धारा या शैक्षणिक प्रवाह में ‘समागम’ जैसी द्विभाषी शोध पत्रिका का सम्पादन/प्रकाशन चुनौतीपूर्ण कार्य है। वह भी वैसे समय में जब देश में मीडिया और सिनेमाई प्रशिक्षण संस्थानों की बाढ़-सी आई हुई है; यह शोध-पत्रिका एक मुकम्मल दस्तावेज के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में सफल है। अपने सीमित संसाधनों के बल पर किसी पत्रिका का सम्पादन एक प्रकार से टेढ़ी खीर है। किसी शोध-पत्रिका के लिए तो यह और भी मुश्किल भरा क्षण है। बावजूद इसके समसामयिक मुद्दों, पत्रकारिता के ज्वलंत प्रश्नों तथा अन्तरराष्ट्रीय संचार नेटवर्कों की विवेकसम्मत पड़ताल करने में ‘समागम’ पत्रिका का स्थान अन्यतम है। इस शोध-पत्रिका के सम्पादक मनोज कुमार, के लिए इस दायित्व का निर्वहन आसान कभी नहीं रहा है। लेकिन उनके लिए बीच में रूक जाने या थम जाने का कोई अर्थ नहीं है। जब मंजिल या ध्येय बड़ा हो, तो राह के पत्थर रोड़े नहीं अटकाते; शायद ऐसा ही कुछ आत्मिक-दर्शन खुद में समोये हुए दिखते हैं, मनोज कुमार।

जनसंचार और पत्रकारिता की जनसमाज में लोकप्रियता और प्रभाव बहुत है लेकिन प्रशिक्षण का स्तर उम्दा न होकर निम्नस्तरीय होना; चिन्ता का सबसे बड़ा पहलू है। प्रायः कहा जाता है कि वस्तुनिष्ठ, सारगर्भित और निष्पक्ष सामग्री को विशेष महŸव प्रदान करना किसी भी शोध-पत्रिका के चयन का प्राथमिक मानदण्ड होना चाहिए। लेकिन, आज उच्च शिक्षा का जो हाल-ए-दस्तूर है; उसमें इस मानदण्ड को ही सबसे पहले खारिज होते हुए देखा जा सकता है। शोध या अनुसन्धान कार्य आज सिर्फ उपाधि प्राप्त करने का जरिया मात्र बनकर रह गया है। शोध-कार्य के महत्त्व को लक्ष्य कर बने नियमावली में गुणवत्ता सम्बन्धी मानक कई हैं, लेकिन मनके कितने हैं; यह अलग से शोध का विषय है। अतः शोध-पत्र लिखे ही दोयम दर्जें के जा रहे हों, तो कोई भी गुणी या धैर्यवान सम्पादक भविष्य में बेहतर या उत्कृष्ट शोध-लेख लिखे जाने की संभावना मात्र ही जता सकता है; कोई बहुत बड़ी तब्दीली या फेरबदल कर पाना उसके या उसकी पत्रिका के लिए हरगिज संभव नहीं है। ‘समागम’ पिछले 13 वर्षों से नियमित प्रकाशित है। हाल के दिनों में यह मीडिया और सिनेमा को पूर्णतः समर्पित हो चुकी द्विभाषी शोध-पत्रिका है जिसकी हस्तक्षेपकारी भूमिका आज की तारीख में उल्लेखनीय और बहसतलब है।

द्विभाषी होने के कारण इस शोध-पत्रिका का शैक्षणिक योगदान व्यापक और चतुर्दिक है; यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। समय का सही नब्ज़ पकड़ने और मीडिया(विशेषतया भाषायी मीडिया) पर वैश्विक प्रभाव का सम्यक् आकलन-मूल्यांकन करने में यह पत्रिका निश्चित रूप से अग्रणी है। इसी वर्ष के जनवरी अंक में ‘हिन्दी हैं हम हिन्दोस्तां हमारा’ शीर्षक से आवरण कथा दी गई है जिसमें सुयोग्य पत्रकार प्रियदर्शन ने वैश्विक माहौल में हिन्दी के सामने उपजे संकटों और संभावनाओं को लक्ष्य किया है। इसी तरह ‘समागम’ का ताजा फरवरी अंक बेहतरीन कलेवर के साथ ‘सिनेमा के सौ बरस’ विषय पर आधृत है जिसमें भारतीय सिनेमा के पितामह या कहें स्वप्नद्रष्टा चितेरा दादा साहेब फाल्के की आत्मकथा ‘मेरी कहानी, मेरी ज़ुबानी’ शीर्षक से प्रस्तुत है जो अपनेआप में बेजोड़ और पठनीय है।

सिनेमा जैसे सूक्ष्म कला-रूप विषय के विशेषज्ञ एवं समीक्षक सुनील मिश्र ने समागम पत्रिका के इस ‘सिनेमा अंक’ का सम्पादन बतौर अतिथि सम्पादक किया है। हाल के दिनों में देखा जाए, तो ‘भारतीय सिनेमा के सौ बरस’ की धूम पूरे देश में जबर्दस्त रही है। बाज़ार में सिनेमा को समर्पित विशेषाशांकों की बाढ़-सी आई हुई है। लेकिन, यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि सिनेमा सम्बन्धी ‘लेखन’, ‘चर्चा’, ‘गोष्ठी’ इत्यादि में जो उथलापन और सतहीपन जिस ढंग से उभरकर सामने आया है; उस बारे में सुनील मिश्र ने खरी किन्तु मार्के की बात कही है, ‘‘तीस सालों में जो आधुनिक स्वरूप या पहचान स्थापित हुई है, वह उस काल की पहचान से रहित है जिसकी बहुमूल्यता को लगभग नज़रअंदाज कर दिया गया है और उसकी चर्चा इतिहास की चर्चा के अवसर पर ही संभव हो पाती है, अन्यथा इतिहास का हश्र विस्मृति से जुड़ा है ही। अभी एक चैनल पर सिनेमा की शताब्दी की आड़ में काॅमेडी के सफर जैसी एक फूहड़ धारावाहिक माला भी शुरू की गयी है। सतही दौर भी जगह-जगह सिनेमा के सौ साल पर कुछ-कुछ हुआ करता है। हमारा गला तर नहीं हो सका है, शायद हमें प्यास भी नहीं है।’’

बहरहाल, उपर्युक्त दोनों अंकों का सम्पादन-संयोजन जिस सम्पादकीय कुशलता के साथ हुआ है; वह इस शोध-पत्रिका के लिए शुभ-संकेत है। इस पत्रिका का ‘शोध-खण्ड’ सबसे मूल्यवान थाती है जो उत्तरोत्तर समृद्ध होता दिखाई दे रहा है। कहना न होगा कि किसी भी पत्रिका के साथ पाठक का लगाव जीवंत और अतुलनीय होता है। ‘समागम’ पत्रिका के लिए पाठक का स्थान क्या कुछ है; यह थाह इस पत्रिका के सम्पादक मनोज कुमार के इन शब्दों में स्फूर्त ढंग से अभिव्यक्त है-‘‘समागम को पूरे भारत वर्ष से स्नेह और प्रोत्साहन मिल रहा है जो हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। हमें प्रसन्नता तब होती है जब समागम में छूट गयी गलतियों की ओर हमारे शुभचिन्तक चिन्ता के साथ हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। हम उन्हें आश्वस्त करते हैं कि गलतियों के सुधारने की हरसम्भव कोशिश होगी।’’(जनवरी, 2013)

ऐसी उच्च भावभूमि वाली पत्रिका को पाठकों द्वारा सराहा जाना स्वाभाविक है। कतिपय गलतियों को लेकर आलोचना होना भी जरूरी है। ये प्रगतिशीलता के महत्त्वपूर्ण आयाम या कि कसौटियाँ हैं जिनसे टकराकर ही कोई पत्रिका अपने सहृदय पाठकों तक अपनी पहुँच और प्रभाव बनाये रख सकती है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि शोध-पत्रिका ‘समागम’ सर्वप्रथम अपने कलेवर और आवरण से पाठकों को आकर्षित(लुभाती नहीं) करती है। कला-सौन्दर्य की बारीक एवं सूक्ष्म समझ पैनी है, तो रंग-बोध में इस पत्रिका का पाठकों से एक अलहदा किन्तु गहरा रागात्मक सम्बन्ध है। हजारों पत्र-पत्रिकाओं की लम्बी फेहरिस्त में ‘समागम’ जैसी शोध-पत्रिका अपना स्थान और महत्त्व बनाये रखे; यह अपेक्षा और उम्मीद इस पत्रिका से जुड़ाव का आत्मिक सम्बोधन है, तो इसके महत्त्व का रेखांकन भी।
लेखक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिंदी विभाग का शोध-छात्र

रविवार, 3 मार्च 2013

श्रवण कुमार किताबों में



मनोज कुमार
श्रवण कुमार का नाम भारतीय समाज में अपरिचित नहीं है. जब भी माता-पिता की सेवा करने की बात आती है तो श्रवण कुमार से बड़ा कोई नायक, कोई पात्र नहीं होता है. सनातनकाल से यह नायक आधुनिक समाज में वैसा ही उपस्थित है जैसा कि उसे बताया या दिखाया गया है. समय काल में बदलाव हो रहा है और इस बदलाव में लगता है कि कहीं श्रवण कुमार असामयिक होता जा रहा है. अब वह नये जमाने की नयी पीढ़ी के लिये रोल मॉडल नहीं रह गया है. ऐसा मुझे तब पहली बार लगा जब मैं अपने एक दोस्त के घर गया था. उसका बेटा कोई 12-13 साल का होगा. गुणी है, प्रतिभावान है. वह नये जमाने का बच्चा है तो उसकी सोच भी प्रगतिशील है. वह आने वाले दिनों में अपने कैरियर को देखता है. उसे लगता है कि पिता या माता बीमार पड़ गये तो उसका समय और धन उनके इलाज में खर्च हो जाएगा. धन की उसे चिंता नहीं है. उसे पता है कि वह जितना खर्च करेगा, उसे कहीं ज्यादा कमा लेगा लेकिन उसे चिंता है कि बीमार होने वाले माता-पिता की सेवा में समय खर्च हो जाएगा तो इसकी भरपाई कहां से करेगा. यह सारी चिंता और सारे सवाल उसके मन के भीतर अभी से उमड़-घुमड़ रहे हैं. मुझे नहीं मालूम कि उसके पिता को अपने बच्चे के मन की बात मालूम है कि नहीं लेकिन उस दिन मेरे सामने जो घटा, उसने मुझे सोचने के लिये मजबूर कर दिया. 

हम सब बैठे थे. तभी दोस्त ने शिकायत की कि उसकी तबियत ठीक नहीं है. बीमारी कोई बड़ी नहीं थी. शायद बदलते मौसम का असर था. पिता की बात पर बेटे ने तत्काल टिप्पणी की कि पापा, इसलिये कहता हूं कि अभी से अच्छे डाक्टर से अपना इलाज करा लो ताकि जब मैं काम पर जाऊं तो मुझे आपकी तबियत के कारण परेशान न होना पड़े. बच्चे ने यह बात रूटीन में कहा था. बात कोई खास नहीं थी कि जिसे दिल से लगाया जाये लेकिन बात इतनी हल्की भी नहीं थी कि उस पर सोचा न जाये. 12-13 साल का बच्चा जिसने अभी अपनी शिक्षा भी पूरी नहीं की है, बल्कि वह अभी स्कूली शिक्षा के पार भी नहीं गया है, वह अपने आने वाले दिन को लेकर इतना सर्तक और सजग है तो यह इस बात की घंटी है कि माता-पिता को अभी से अपने भविष्य की चिंता कर लेना चाहिये. यहां तक कि बच्चे को लेकर भविष्य में जो उम्मीदें बांध रखी है, उन उम्मीदों को गठरी में बांधकर अलग से रख दिया जाना चाहिये. यह एक बच्चे की मिसाल है. एक परिवार में घटी मामूली सी घटना है लेकिन यह घटना भविष्य का संकेतक है.

किसी माता-पिता को अपने बच्चे से श्रवण कुमार बन जाने अथवा बने रहने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये. हमारे जीवन से श्रवण कुमार का ऐसे गायब हो जाना और किताब के पन्नों पर सिमट जाना पहली पहली बार होने वाला मामला नहीं है. इसके पहले भी हम अपने नायकों को जिंदगी से गायब होते देखा है. उनकी उपयोगिता और सामयिकता को खत्म होते देखा है. सत्य बोलने के लिये राजा हरिशचन्द्र भले ही हमारे नायकों में गिने जाते रहे हों लेकिन मोबाइल की दुनिया ने हमें झूठ बोलना सिखा दिया है. भगवान राम जैसा चरित्रवान पात्र हमारे बीच से ही है लेकिन अनाचार की जो कहानी रोज सुन रहे हैं, वह नायक के चरित्र से मेल नहीं खाता है. गांधीजी जीवन भर सादगी का पाठ पढ़ाते रहे और हम रोज गांधीजी का स्मरण करते हैं लेकिन सुविधाभोगी होने के मोह से बच नहीं पाये. बच्चे की सोच को दोष देना गलत होगा. उसके सामने भविष्य की चुनौतियां हैं, खुद को दौड़ में आगे निकल जाने की चिंता. ऐसे में वह श्रवण कुमार कैसे बने और क्यों बने. चिंता अब खुद मां-बाप को करनी होगी कि वह अपने बच्चों से श्रवण कुमार बनने की उम्मीद ना करें क्योंकि श्रवण कुमार अब किताबों का हिस्सा है और वहीं शायद वह ठीक भी लगेगा.  

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

भारतीय सिनेमा के सौ साल पर समागम का अंक


भारतीय सिनेमा के सौ साल पर समागम का अंक 
भारतीय सिनेमा ने अपने सौ साल पूरे कर लिये हैं. यह अवसर न केवल भारतवर्ष बल्कि समूची दुनिया के लिये अविस्मरणीय समय है. हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हम इस काल के साक्षी हैं. समागम का ताजा अंक भारतीय सिनेमा के सौ साल पर केन्द्रित है. समागम पूर्णकालिक द्विभाषी मीडिया एवं सिनेमा की शोध पत्रिका है. सन् 2012 में जब भारतीय सिनेमा ने सौ वर्ष में प्रविष्ट किया था तब समागम ने विशेष अंक का प्रकाशन किया था और अब जब भारतीय सिनेमा ने सौ वर्ष का सफर पूर्ण कर लिया है तब समागम भारतीय सिनेमा की पुरानी यादों और सिनेमा के विविध आयामों को केन्द्र में रखकर अंक का संयोजन किया है. 12 से 13 तक के एक वर्ष में समागम ने भारतीय सिनेमा के सौ साल के सफर की पड़ताल तो की थी, साथ में आंचलिक सिनेमा पर विशेष शोध सामग्री का प्रकाशन निरंतर किया है. आंचलिक जिसे आप भाषाई सिनेमा भी कहते हैं, के बिना भारतीय सिनेमा का सिंहावलोकन अधूरा ही रह जाएगा. इस विशेष अंक का सम्पादन वरिष्ठ फिल्म समीक्षक श्री सुनील मिश्र ने अतिथि सम्पादक की हैसियत से किया है. 



बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

सडक़ कहीं नहीं जाती ...



मनोज कुमार

अकबर ने बीरबल से एक बार पूछा था कि यह सडक़ कहां जाती है? हाजिर जवाब बीरबल का जवाब था-सडक़ तो कहीं नहीं जाती अलबत्ता लोग जरूर जाते-आते हैं. बचपन में पढ़ी यह कहानी का अर्थ तब मुझे शायद समझ में नहीं आया था लेकिन आज समझ में आ गया. मेरे भोपाल में दो दिन पहले एक हादसा हुआ. तकरीबन 8 बरस की एक बच्ची को किसी व्यक्ति ने बेरहमी से मार डाला. आशंका कई तरह की जतायी जा रही थी. लोग गुस्से से उबल रहे थे. जिस सडक़ से मैं रोज अपने दफ्तर आता हूं और उसी सडक़ से घर लौटता हूं. आज उसी सडक़ पर सन्नाटा था. इस सडक़ पर बच्ची नहीं थी लेकिन इस दुख का गवाह सडक़ था. अमूनन वैसे ही जैसा कि हर सडक़ हर हादसे का गवाह होता है. मन तो दुखी था ही. बेबस मैं घर लौट रहा था. आहिस्ता आहिस्ता अंधेरा घिरने लगा था. दुख पर रात का स्याह अंधेरा छाने लगा था. अगली दिन सुबह की लालिमा में बीते रात का दुख कहीं कम हो चुका था.

रोज की तरह मेरी रोजमर्रा की गाड़ी अपने रफ्तार से शुरू हो चुकी थी. रोज की तरह एक बार फिर मैं इसी सडक़ पर था. सडक़ के जिस हिस्से पर कल दुख बिसरा था, वहां पहुंच पाता इसके सौ फर्लांग पहले मुझे शहनाई की आवाज सुनाई दी. बैंडबाजा बज रहा था. एक तरफ मुस्कराते और बतियाते लोग ठीक उसी जगह पर खड़े थे जहां कल बिटिया की मौत के निशान थे. आज वहीं पर एक और बिटिया है. यह बिटिया मंदिर के दरवाजे पर मत्था टेक कर अपने सुखद भविष्य के लिये आशीष मांग रही थी. इस अवसर का भी गवाह बन चुकी थी सडक़. ऐसे हादसों और अवसरों का गवाह बनती है रोज सडक़. 

इस मंजर को देखने के बाद मुझे समझ नहीं आया कि मैं अपनी भावना कैसे व्यक्त करूं. मासूम की मौत का दुख मनाऊं या ब्याहती बिटिया की खुशी में खुद को भागीदार बनाऊं. मैं दर्शन का न तो कोई विद्यार्थी हूं और न ज्ञाता. मैं ठेठ सांसारिक आदमी हूं. दुख से दुखी होता हूं. आज इस सडक़ से मैं कुछ सीख पाया हूं. निर्लिप्तता का भाव. सडक़ किसी के दुख में दुखी नहींहोती है और न ही वह किसी को खुश देखकर खुश. वह अपनी जगह पर खड़ी है. राहगीर अपनी मंजिल तलाश लेते हैं और रौंदकर निकल जाते हैं. रौंदने वालों से भी उसे शिकायत नहीं है. वह निर्विकार भाव से अपने जन्म से वैसे ही खड़ी है जैसा कि वह अपने जन्म के समय थी. आज मुझे पता चल गया कि सडक़ कहीं नहीं जाती है, राहगीर आते और जाते हैं, बिलकुल वैसे ही जैसा कि जीवन में सुख और दुख. सडक़ कहीं नहीं जाती है.  

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण


-मनोज कुमार 
 इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण. इस बात में अब कोई दो राय नहीं है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण हो चुका है. आने वाले समय में व्यवसायिकरण का यह चेहरा और विकृत और विकराल देखने को मिले तो समाज को हैरान नहीं होना चाहिये.  माध्यम अर्थात अंग्रेजी का शब्द मीडिया. मीडिया का सामान्य सा अर्थ है मीडियम अर्थात समाज और सरकार के बीच संवाद का सेतु किन्तु संवाद का यह सेतु वह चाहे इलेक्ट्रानिक हो या मुद्रित, दोनों का चेहरा कारोबारी हो गया है. इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के पूर्व पत्रकारिता एवं माध्यम दोनों के स्वरूप एवं चरित्र पर गौर करना उचित होगा. पत्रकारिता एवं माध्यम अर्थात मीडिया दोनों की विषय-वस्तु अलग अलग है. दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति एकदम अलग हैं. व्यवसायिकरण की चर्चा के पूर्व दोनों को समझना होगा. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या मुद्रित माध्यमों का व्यवसायिकरण की बात करने के पूर्व मीडिया और पत्रकारिता के अन्र्तसंबंध एवं इन दोनों के बीच का अंतर समझना होगा. सबसे पहले मैं पत्रकारिता की प्रवृति एवं प्रकृति पर प्रकाश डालना चाहूंगा. 
सर्वप्रथम हम बात करेंंगे पत्रकारिता की. पत्रकारिता समाज का वटवृक्ष है तो मीडिया नये जमाने का संचार माध्यम. पत्रकारिता निरपेक्ष होकर, लाभ-हानि के गणित से परे रहकर, सामाजिक सरोकार की पैरोकार है. पत्रकारिता का चरित्र और कार्य व्यवहार, मीडिया से एकदम भिन्न है. पत्रकारिता दिल से होती है. समाज में जब अन्याय होता है, अराजकता की स्थिति बनती है और आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होता है तो पत्रकारिता स्वयं में आंदोलित हो उठती है. स्मरण कीजिये पराधीन भारत के उस दौर को जब गोरे शासकोंं के नाक में पत्रकारिता ने दम कर रखा था. तिलक, महात्मा गांधी से लेकर गणेशशंकर विद्यार्थी, गोखले, माधवराव सप्रे, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे दर्जनों लोगों ने अपनी लेखनी से अंग्रेज शासकों की नींद उड़ा दी थी. समय बदला, काल बदला लेकिन पत्रकारिता के तेवर नहीं बदले. देश के स्वाधीन होने के बाद भारत वर्ष के नवनिर्माण में पत्रकारिता ने अपना योगदान दिया. देश की पहली पंचवर्षीय योजनाओं के लागू होने के साथ ही भ्रष्टाचार का श्रीगणेश हुआ. पत्रकारिता अपनी ही सरकार को आईना दिखाने से नहीं चूकी. परिणाम यह हुआ कि भ्रष्टाचार तो हुआ लेकिन उसका ग्राफ रूक गया. यह मान लेना भी भूल होगी कि पत्रकारिता ने भ्रष्टाचार को, अनाचार को, अत्याचार को खत्म कर दिया है लेकिन पत्रकारिता की ही ताकत थी कि भ्रष्ट को भ्रष्टतम नहीं होने दिया. पत्रकारिता को दमन का शिकार भी होना पड़ा है. पराधीन भारत में अंग्रेज शासकों ने किया और स्वतंत्र भारत में हमारे अपनों ने ही. उन अपनों ने जिन्हें अपनी करतूतों के खुल जाने का भय था. पत्रकारिता की ही ताकत है कि 25 बरस से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अरूण शौरी द्वारा उद्घाटित किया गया बोफोर्स का मामला आज भी जीवित है. विश्व की भीषणत औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड को भला कौन भूल सकता है. एक अनाम सा साप्ताहिक अखबार ने सचेत किया था. पत्रकारिता का यह चरित्र है. पत्रकारिता के इस चरित्र के कारण ही पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ संबोधित किया गया . 
पत्रकारिता का इतिहास हमें गर्व से भर देता है. पराधीन भारत से लेकर स्वाधीन भारत की पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी पक्की है कि करीब ढाई सौ सालों के इतिहास में कोई अखबार अथवा पत्रिका गलत खबर छापने के कारण बंद नहीं हुई लेकिन पश्चिमी देशों में पत्रकारिता की जो दशा है, उसके चलते हाल ही में सौ साल से अधिक पुराने अखबार का प्रकाशन बंद कर दिया गया. भारत में पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन रूका या बंद हुआ तो सिर्फ इसलिये कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं थी. वे व्यवसायिक नहीं बन पाये. पत्रकारिता एक चुनौती है. यह चुनौती आपको कस्बाई पत्रकारिता में देखने को मिल जाएगी. जहां एक दरोगा, एक पटवारी या एक मामूली सा धनवान व्यक्ति भी अपने खिलाफ कुछ पढऩा या सुनना नहीं जानता है. ऐसे में सच का साथ देना ही पत्रकारिता है.
पत्रकारिता की अपनी भाषा होती है. उसकी अपनी शैली है. पत्रकारिता की भाषा बेलौस नहीं होती है. वह संयमित होती है और सम्मानजनक भी. पत्रकारिता किसी को बेपर्दा भी करती है तो पूरे तथ्य और प्रमाण के साथ. वह सनसनी नहीं फैलाती है. पत्रकारिता का गुण यह भी है कि वह खबर का पीछा करती है. जिसे अंग्रेजी में फालोअप कहते हैं. वह आखिरी सिरे तक पहुंच कर सच को सामने लाने की कोशिश करती है ताकि समाज में शुचिता कायम रहे. पत्रकारिता का यह गुण उसकी विश्वसनीयता को बनाये रखता है. आगे पाठ, पीछे सपाट पत्रकारिता की शैली नहीं है. 
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की बात के बरक्स मैं वापस दोहराना चाहूंगा कि इसे एक ही नाम मिला है मीडिया. मीडिया में पत्रकारिता को भी शामिल किया गया है, बावजूद इसके मीडिया और पत्रकारिता का फर्क वैसा ही दिखता है जैसा कि इलहाबाद में गंगा और जमुना के संगम का.  मीडिया का कार्य-व्यवहार दिमाग से होता है. वह पहले लाभ-हानि का गणित लगा लेता है. वह अपने लाभ को पहले रखता है, फिर वह एक निश्चित सोच के साथ अपने कार्य को पूर्ण करता है. मीडिया अर्थात टेलीविजन के पर्दे पर वही दिखाया जाता है, जो मीडिया के पक्ष में लाभकारी होता है. संचार के इस विधा में दिल का नहीं, सौफीसद दिमाग का कब्जा होता है. पत्रकारिता और मीडिया के बीच यह बुनियाद अंतर दोनों को कई अर्थों में अलग करता है. मीडिया का बहुत सीधा वास्ता सामाजिक सरोकार से नहीं होता है. वह अपने लाभ के लिये लोगों की इमेज बिल्डिंग का काम करता है. जिन खबरों या घटनाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम स्थान देता है तो इसलिये कि उसकी टीआरपी बढ़ सके. 
मीडिया की उत्पत्ति लगभग तीन दशक के आसपास की है. मीडिया शब्द आया कहां से, यह अनसुलझा सा है.  इस बारे में विद्वानों की राय भी स्पष्ट नहीं है. कुछ लोगों का मत है कि जिस तरह पत्रकारिता से सम्पादक संस्था का लोप कर दिया गया, उसी समय मीडिया शब्द को चलन में लाया गया. सम्पादक संस्था की कमान प्रबंधकों के हाथों में आ गयी और मीडिया में सम्पादक संस्था के लिये कोई स्थान रखा ही नहीं गया था. इस तरह अर्मूत रूप से मीडिया शब्द की रचना की गयी और बेहद चालाकी के साथ इसे स्थापित कर दिया गया. मीडिया तो माध्यम है ही, पत्रकारिता को भी माध्यम बना दिया गया.
उपरोक्त संदर्भ के रूप में अब यह बात हमारे सामने स्पष्ट हो जाती है कि पत्रकारिता क्या है, उसकी प्रवृति और प्रकृति क्या है तथा मीडिया की प्रवृत्ति और प्रकृति क्या है. इन दोनों के बीच का अन्र्तसंबंध भी लगभग स्पष्ट हो गया है. सवाल यह है कि क्या दोनों माध्यम व्यवसायिक हो गये हैं, तो इस सवाल का सीधा-सादा जवाब हां में है. मुद्रित माध्यम से आशय पत्रकारिता से हो सकता है और आज की तारीख में पत्रकारिता को लेकर जो संशय और सवाल उठाये जा रहे हैं, सवाल उठ रहे हैं, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की ओर संकेत करता है. कुछ आगे बढक़र कहें कि पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात को स्थापित करता है तो भी गलत नहीं होगा. पत्रकारिता के हिस्से में पेडन्यूज का जो धब्बा बार बार लगता रहा है, वह पत्रकारिता के व्यवसायिकरण का ही उदाहरण है. पेडन्यूज को लेकर चिंता चारों तरफ है तो इसलिये कि पत्रकारिता का मूल स्वरूप सामाजिक दायित्व, निरपेक्ष व्यवहार और सच का साथ देने की ताकत खत्म न हो जाये. यह बात हमें सुकून देती है कि पेडन्यूज का दाग तो लगा है लेकिन अभी रोशनी के कुछ सुराख ही बंद हुये हैं. पूरा केनवास अभी काला नहीं हुआ है. हालांकि जिस तेजी से पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो रहा है, वह भयावह है. पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले प्रकाश में आये हैं जहां पत्रकारिता के दिग्गज भ्रष्टाचारियों को बचाने में शामिल पाये गये. यह और बात है कि प्रमाण के अभाव में या प्रभाव के बूूते पर वे अपने आसान पर जमे हुये हैं. अब पत्रकारिता की भाषा भी बेलौस होती जा रही है क्योंकि वह बाजार की भाषा बोलने लगी है. मुद्रित माध्यम का व्यवासायिक होने के पीछे उसका आधुनिक भी हो जाना है. महंगी मशीनें, महंगी छपाई, कागज और उत्पादन खर्च इतना है कि वह दो-पांच रूपये की कीमत से वसूला नहीं जा सकता है. इस तरह मुद्रित माध्यम पूर्णरूप से व्यवसायिकरण की ओर कदम बढ़ चुका है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपने जन्मकाल से व्ययवसायिक रहा है. पत्रकारिता अथवा मुद्रित माध्यम के विपरीत इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का चरित्र है. दूरदर्शन का जब जन्म हुआ था, तब इसे बुद्धु बक्सा कह कर इसे समाज ने तव्वजो नहीं दी थी किन्तु आकाशीय चैनलों के आगमन के साथ इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का एकछत्र राज्य कायम हो गया. इस माध्यम ने एक वाक्य गढ़ा जो दिखता है, वो बिकता है और इसी सूत्रवाक्य के सहारे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पूरी तरह बाजार के कब्जे में आ गया. व्यवसायिकरण कुछ इस माध्यम की बुनियादी जरूरतें थी तो कुछ उसने स्वयं उत्पन्न कर लिया. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने मान लिया कि बाजार के मन के मुताबिक उसे चलना है और वह चलता गया. एक प्रिंस के गड्ढे में गिर जाने को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने इतना हाइप दिया कि लगा कि संसार में पहली दफा कोई बच्चा गड्ढे में गिरा है. इसके बाद ऐसी घटनाओं को दिखाने में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की रूचि कम होने लगी. उसे पता था कि दर्शक बहुत ज्यादा नहीं झेल पायेंगे. तथ्यपरक घटनाओं को दिखाने की कोशिश तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में होती है लेकिन अवसर पाकर इस माध्यम ने सनसनी फैलायी है. ऐसा एक बार नहीं, कई कई बार हुआ है. दिल्ली की एक शिक्षिका के मामले में तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम को अदालत का सामना भी करना पड़ा है.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की प्रवृति हमेशा से आगे पाठ, पीछे सपाट की रही है. वह खबरों के पीछे भागना नहीं जानता है अथवा नहीं चाहता है. वह हर घड़ी नयी खबर की तलाश में जुटा रहता है. खबरों को अथवा घटनाओं को बीच में छोड़ देना भी इस माध्यम की प्रवृति रही है. इस बात का एक बड़ा उदाहरण है ऑपरेशन चक्रव्यूह. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम ने उन सांसदों को बेनकाब करने का अभियान चलाया था जो कथित रूप से गैरकानूनी ढंग से धन प्राप्त करते हैं. इस ऑपरेशन में 11 सांसदों को घेरे में लिया गया था और अचानक से यह अभियान बंद कर दिया गया. इसके पीछे क्या कारण समझा या माना जाये, दर्शकों के पास जो संदेश गया, वह क्या यह नहीं था कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है और शायद इन्हीं कारणों से यह अभियान बीच में बंद कर दिया गया. करप्सन अंगेस्ट इंडिया आंदोलन में भी मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाया गया था. जी-जिंदल विवाद किस बात की तरफ संकेत करते हैं?  इस तरह यह बात साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का व्यवसायिकरण हो चुका है.
निष्र्कषत: हम यह मान लेना चाहिये कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम एवं मुद्रित माध्यम व्यवसायिकरण की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. कुछ व्यवसायिक जरूरतों के कारण और कुछ कथित रूप से उत्पन्न जरूरतों के कारण. मुद्रित माध्यम को पेडन्यूज जैसे कलंक से स्वयं को बचाना होगा. यह राहत की बात है कि व्यवसायिकरण के इस दौर में मुद्रित माध्यम ने अपनी साख बचाकर रखी है. मुद्रित माध्यम पर लोगों का विश्वास अभी भी कायम है और बार बार टेलीविजन के पर्दे पर खबरें देखने और सुनने के बाद भी वह अखबार और पत्रिकाओं के पन्ने पलटने के बाद ही राहत पाता है. (औरगाबाद में हुए एक  दिवसीय सेमिनार में दिया गया भाषण) 

शनिवार, 12 जनवरी 2013

मेरे अपने शब्द



-मनोज कुमार 
शब्दों की अपनी ताकत होती है और यही शब्द कभी फूल की तरह रिश्तों को महकाते हैं तो कभी शूल की तरह चुभते भी हैं. तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा के मारे हम लोग अपने देशज बोली-बात को भुलकर उनकी नकल करने पर उतारू हैं. इस नकलीपन से हम नकली अंग्रेजियत को तो ओढ-बिछा रहे हैं लेकिन असली दुनिया से दूर होते जाते हैं. जब कभी मैं अपने आसपास छोटे बच्चों से आप संबोधन से बात करते सुनता हूं तो मितली सी आने लगती है. बच्चों से जब तक तु-रे से बात न करो, मिठास का रिश्ता बनता ही नहीं है. जवान होती बेटी अपनी अम्मां से कभी जब लडिय़ाने पर उतर आती है तो अम्मां तु ऐसा मत कर जैसे वाक्य उसके मुंह से झरने लगते हैं. यहीं पर आकर मां-बेटी का रिश्ता दोस्ती में बदल जाता है. बेटी मां से खुल जाती है और वह दोनों एक अच्छे दोस्त बन जाते हैं. बच्चों के साथ भी यही है. स्वयं को आप का संबोधन पाकर वे खुद होकर दूरी बना लेते हैं. गांव-कस्बों में आज भी बड़ों को तुम कह कर संबोधित किया जाता है तो इसके पीछे उनका मान गंवाना नहीं है बल्कि रिश्ते की मिठास को बढ़ाना है. 

हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि हमारे पास हर रिश्तों के लिये अलग-अलग शब्द बने हुये हैं. अंग्रेजी की तरह कंगाल नहीं. अंग्रेजी में तु, आप और तुम के लिये एक ही शब्द है यू. अब इस यू को हमने बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिये गढ़ लिया आप में. ऐसे ही चाचा-चाची, मौसा-मौसी, मामा-मामी, दादा-दादी, जैसे संबोधन हमारे रिश्तों को महकाते हैं तो इन्हीं के लिये अंग्रेजी में अंकल-आंटी और इससे आगे ग्रेंड पापा और ममा हैं. यकिन कीजिये अंग्रेजी के इन शब्दों को बोलते हुए मुंह में जैसे कुनैन की गोली आ जाती है लेकिन जब चाची कहते हैं तो मन उल्हास से भर जाता है. सिस्टर बोलते समय अस्पताल का नजारा घूम जाता है लेकिन बहन या जीजी बोलते समय अपनेपन का अहसास होता है. ये देशज शब्द ही हैं जो हमारी खूबसूरत दुनिया गढ़ते हैं. शब्दों के विनाश के साथ ही हमारी सतरंगी दुनिया जैसे एक खाने में कैद हो जाएगी. जिस तरह इंटरनेट ने पूरी दुनिया के लिये विश्व ग्राम शब्द खोज निकाला है, वैसा ही हम एकजगह सिमट कर रह जाएंगे.

हम लोग एक दिन या एक त्योहार नहीं मनाते हैं. साल के तीन सौ पैंसठ दिन हमारे लिये उत्सव का होता है. बल्कि दिन के चारों पहर हमारे लिये उत्सव का होता है. भोर होते ही सूर्यदेव की अराधना, दोपहर ढलते ही अन्नपूर्णा की अराधना, सांझ ढलते ही देव आराधना और शाम होते ही चंद्रदेव का स्वागत. जिस समाज में हर पहर उत्सव का हो, जिस समाज में रिश्तों की गर्माहट के लिये शब्दों का संसार बना हो, वहां अंग्रेजी के बहुत मरे-मरे और उत्साहीन शब्दों से रिश्तों की मिठास और गर्माहट कम ही होती है. मैं तो अपने देशीपन में ही मस्त रहना चाहता हूं. अम्मां मेरे लिये सार्थक है, ममा का क्या करूंगा और धर्मपत्नी ही ठीक है वाइफ कहा तो कहीं नाइफ न बन जाये. मेरे देहातीपन को आप मंजूर कर ही लेना क्योंकि मुझे अंगरेजी नहीं आती है..  

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...