मनोज कुमार रिश्तों में घुलती कड़वाहट और एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू समाज का डरावना चेहरा हम रोज़-ब-रोज़ देख रहे हैं. कहीं अपने गैर-कानूनी रिश्तेे के लिए पति को मारकर ड्रम में भर देने का मामला हो या पति के फोन पर बात करने से रोकने पर कॉफी में ज़हर देने का. इधर पति भी कम जल्लाद नहीं है और इनके किस्से तो पुराने हो चुके हैं या पत्नी को काट कर गाड़ देना या फिर टुकड़े कर फ्रिज में भर देने की वारदात हम नहीं भूले हैं. तंदूर कांड तो याद में होगा ही और आज भी ऐसी घटनाएँ लगातार जारी है. पति-पत्नी ही क्यों, किसी बेटा माँ की जान ले रहा है तो कहीं माँ बेटे की जान ले रही है. पिता असुरक्षित है तो घर के बच्चे भी डर के साये में जीवन बसर कर रहे हैं. ऐसी ख़बरें ना केवल हमें चौंकाती हैं बल्कि डराती भी हैं. सवाल यह है कि हमारा समाज इतना असहिष्णु कैसे हो गया? हिंसा की इस प्रवृत्ति ने तमाम किस्म के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है. आधुनिक जमाने के साथ चलने की हरसत ने रिश्तों को बेमानी कर दिया है. आखिऱ हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? कई बार इस बात पर भरोसा नहीं होता कि हम क्या सच...
21 मार्च विश्व कठपुलती दिवस पर विशेष मन बदलती कठपुतली को याद करने का समय प्रो. मनोज कुमार डोर में बंधी कठपुतली इशारों पर कभी नाचती, कभी गुस्सा करती और कभी खिलखिलाकर हमें सम्मोहित करती..यह यादें आज भी अनेक लोगों के जेहन में तरोताजा होंगी. कुछ यादें ऐसी होती है जो बचपन से लेकर उम्रदराज होने तक जिंदा रहती हैं और इसमें कठपुतली को दर्ज कर सकते हैं. कठपुतली उस समय हमारे साथ होती थी जब हमारे पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं होता था. जेब में इतने पैसे भी नहीं होते थे कि शहरी बाबूओं की तरह थियेटर में जाकर मजे ले सकें. तब आप और हम मां और बापू के साथ कठपुतली नाच देखने चले जाते थे. समय बदला और कल तक मनोरंजन करती कठपुतली अब जनजागरूकता का अलख जगाने निकल पड़ी. सामाजिक रूढिय़ों के खिलाफ लोगों को चेताती तो समाज को संदेश देती कि अब हमें बदलना है. बदलाव की इस बयार में कठपुतली ने समाज को तो बदला और खुद भी बदल गई. नयी पीढ़ी को कठपुतली कला के बारे में बहुत कुछ नहीं मालूम होगा क्योंकि मोबाइल फोन पर थिरकती अंगुलियां नयी पीढ़ी को कठपुतली से दूर कर दिया है. हालांकि अभी भी कठपुतली का प्रभाव है लेकिन उसकी सिसकी स...