रविवार, 9 अगस्त 2009

राजधानी भोपाल के अंदाजे बयां और है....

मनोज कुमार

भोपाल एक शहर नहीं बल्कि राजधानी है और राजधानी होने का अर्थ एक आम शहर से अलग होना है। भोपाल में भी दो भोपाल बसा हुआ है। यादों और वादों का भोपाल। यादों का भोपाल अर्थात पुराना भोपाल और वादों का भोपाल अर्थात नया भोपाल जिसे हम मध्यप्रदेश की राजधानी कहते हैं। भोपाल शहर नहीं, राजधानी है और एक वीवीआयपी शहर की तरह वह पिछले तिरपन वर्षाें से जी रहा है। हालांकि इस शहर की भी समस्याएँ बिलकुल वैसी ही हैं जैसे मध्यप्रदेश के अन्य शहरों की लेकिन मुसीबतजदा इस शहर को अपने ऊपर राजधानी होने का गर्व है। यह गर्व अकारण नहीं है। यहां महामहिम राज्यपाल रहते हैं और प्रदेश के मुख्यमंत्री की सत्ता भी इसी शहर से चलती है जिसकी गूंज झाबुआ से मंडला तक गूंजती है। विधानसभा भी भोपाल में हैं तो मंत्रालय के साथ वल्लभ भवन, सतपुड़ा और विंध्याचल भी भोपाल में है। तिरपन बरस पहले का भोपाल राजा भोज की नगरी थी। कहा जाता है कि तब यह भोपाल न होकर भोजपाल हुआ करता था और इस भोपाल शहर को उस समय के नवाबों ने संजोया और संवारा। तब भोपाल राजधानी भी नहीं था। तिरपन बरस पहले जब नये मध्यप्रदेश की स्थापना हुई और राजधानी के लिये भोपाल को चुन लिया गया। राजधानी बनने के साथ भोपाल दो हिस्सो में बंट गया। अब शहर एक और नाम दो थे। पुराना भोपाल और नया भोपाल। इन बावन सालों में पुराना भोपाल तो जस का तस रहा किन्तु नया भोपाल की सूरत साल-दर-साल बदलती गयी। खूबसूरत इमारतें और फिसलन भरी चौड़ी डामर की सड़कें। पुराना भोपाल अपनी यादों के साथ सिसकता हुआ आज भी जी रहा है। यादों के इस भोपाल में तांगे और बग्घी अब थोड़े से बच गये हैं और बाकियों को धुंआ उड़ाते आटोरिक्शा न लील लिया है। भोपाल की पहचान जरी-बटुआ उद्योग अब गुमनामी के साये में हैं। पुराने भोपाल की ताजुल मस्जिद में सजदा करते हजारों लोग, नफासत के साथ बतियाते लोग और वही पुरानी तंग गलियां, पानी के लिए नलों के सामने आपस में सुबह किलकिल और सांझ को साथ बैठ एक-दूसरे का सुख-दुख बांटती औरतें ही पुराने भोपाल की पहचान रह गई हैं। भोपाल का यह वही हिस्सा है जहां कभी कारखाने से निकली जहरीली गैस ने हजारों जिंदगियों को नींद में ही इस दुनिया से रूखसत कर दिया था। जयप्रकाश नगर की सूरत बदल गई है लेकिन दर्द बार बार छलक कर बाहर आ ही जाता है। भोपाल की पहचान एक समय एशिया के सबसे बड़े ताजुल मस्जिद से थी तो ढाई सीढ़ियों की एशिया की सबसे छोटी मस्जिद भी भोपाल में है। मिंटो हाल, नया विधानसभा भवन, नेशनल लॉ यूर्निवसिटी, साइंस सेंटर और राष्ट्रीय मानव संग्रहालय भी इस शहर की पहचान हैं। इस शहर की शान कलाओं का घर भारत भवन कभी अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए वि·ा में चर्चित था तो अब कला की जगह कलह भवन के रूप में उसकी चर्चा होती है। इस शहर की पहचान कामरेड शाकिर अली खां और बरकतउल्लाह भोपाली से हे तो इसी भोपाल ने देश को शंकरदयाल शर्मा जेसे विशाल व्यक्तित्व का राष्ट्रपति भी दिया। एशिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली से है तो दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से इस शहर को एक नयी पहचान दी। अपने शेर-ए-शायरी के लिए पहचाने जाने वाले जनाब बशीर बद्र भी तो भोपाल से ही हैं। मंजर भोपाली, जावेद अख्तर के नाम के साथ भोपाल की पहचान जुड़ी है तो कमाल अमरोही और जगदीप भी इसी भोपाल से वास्ता रखते हैं तो लोक एवं आदिवासी कलाकारों को भोपाल के रास्ते नाम मिला।भोपाल ताल इस शहर की प्यास बुझाता है तो सैलानियों के लिए स्वर्ग जैसा है और इसी बड़े ताल से लगा हुआ है छोटा ताल। छोटा ताल नहीं कहलाता बल्कि तालाब कहलाता है और यह पुराने भोपाल के हिस्से में आता है। पुराने भोपाल की पहचान इतवारा, मंगलवारा, बुधवारा जैसे मोहल्ले से है तो नया भोपाल नम्बरों का शहर है। १२५०, १४६४, ७४ बंगले, सेकंड स्टॉप, दो नं, पांच नं, सवा छह, छह, साढ़े छै, सात, दस, ग्यारह और बारह नम्बरों में भोपाल बसा हुआ है। यह माना जाता है कि पुराने भोपाल के मोहल्ले के नाम उनके साप्ताहिक बाजारो के कारण पड़ा होगा तो नये भोपाल की पहचान वहां नये बने मकानों की संख्या से आशय रहा होगा। इस बारे में कोई मुकम्मिल राय नहीं है।पर्दा, जर्दा और मर्दा के लिये मशहूर भोपाल के पुराने हिस्से में अपने शहर के प्रति आपको वैसा ही लगाव दिखेगा जैसा कि किसी के लिए इंदौर तो किसी के लिए ग्वालियर तो किसी के लिए जबलपुर किन्तु नए भोपाल की यह तासीर नहीं है। नए भोपाल में बसने वाले ज्यादतर लोग नौकरीपेशा हैं ओर किसी न किसी जगह से बदली होकर आये हैं या यहां से बदली होकर जाएंगे। जब इस शहर में बसना ही नहीं हे तो मोहब्बत किससे....यकिन कीजिये आप किसी एक शहर मे रहते हैं और सड़क पर कोई बस या ट्रक किसी को कुचल डाले तो पलक झपकते ही बस या ट्रक को आग के हवाले कर दिया जाएगा लेकिन भोपाल में दुनिया की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी गैसकांड हो गया और यूनियन कार्बाइड का मुंह चिढ़ाता गेस्टहाउस आज भी साबुत खड़ा है। यह इसलिये क्योंकि जिनका यह शहर था, वे मौत से जूझ रहे थे और जो इस शहर के लिये आयतित थे, उन्हें इस बात से कोई वास्ता नहीं था। राजधानी भोपाल वीआईपी है और इस वीआईपी होने का सुख भी नये भोपाल के हिस्से में है। राज्यपाल निवास, मुख्यमंत्री निवास, विधानसभा भवन, मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय नये भोपाल के हिस्से में हैं। लाल,पीली बत्तियों से सजी गाड़ियां जब निकलती है तो आम आदमी का रास्ता खुद-ब-खुद रूक जाता है। इसको लेकर कोई शोर नहीं होता। इस नये शहर के भीतर भी दो किस्म के लोग हैं। एक अफसर तो दूसरे क्लर्क। उत्सव-समारोह में भी अफसर और क्लर्क के बीच की दूरी बनी रहती है। समारोह में दोनों को आमंत्रण है लेकिन पहले कौर पर हिस्सा अफसर का। एक शहर में कलेक्टर और कमिश्नर की जो हैसियत हो सकती है वह भोपाल में नहीं क्योंकि यहां एक नहीं, कई कलेक्टर और कमिश्नर रैंक के ऑफिसर हैं जो मंत्रालय के अपने कमरे में बैठे होते हैं। राजधानी के लोग अपनी शिकायत का पुलिंदा लेकर कलेक्टर और कमिश्नर के पास नहीं, मुख्यमंत्री और राज्यपाल के पास जाते हैं। आखिरकार ये लोग किसी मामूली शहर के बाशिंदे नहीं है बल्कि राजधानी में रहते हैं।भोपाल का उल्लेख केवल उसके राजधानी होने के कारण नहीं होता हे बल्कि इसके और भी कारण हैं। यह शहर देश के चुनिंदा महंगे शहरों में शामिल है। इस महंगाई पर भोपालवासियों को गर्व करना चाहिए या संघर्ष, यह तो वही बता पाएंगे लेकिन भोपाल में अपना काम कराने आने वाले लोग महंगाई का कुछ प्रतिशत जरूर बढ़ा जाते हैं। शायद आप समझ नहीं पाये हैं, इसे थोड़ा विस्तार दिये देते हैं। आप कहीं से साहब से काम करवाने आये हैं तो जाहिर है कि सुंदर सी एक कमीज तो पहन कर जाएंगे ओर इस एक कमीज की कीमत तय करने में आप समय तो जाया नहीं करेंगे। ऐसे में जो कीमत दुकानदार ने बतायी, आपने चुकायी। डेढ़ दो सौ रुपये कीमत की शर्ट आप तीन सौ में खरीद लेते हैं और यह बढ़ी हुई कीमत स्थानीय नागरिक से भी वसूले जाते हैं।इन बावन सालों में बहुत सारी चीजें बदली। निजाम बदलते गए, व्यवस्था बदलती गई। किसी ने इस शहर को सुव्यवस्थित करने का प्लान बनाया तो कोई पेरिस की शक्ल देने में जुट गया। बात बनी नहीं और बेजा कब्जा वाले पसरते गए और एन चुनाव के वक्त सभी को पट्टे देकर जायज बना दिया गया। यह वोट का खेल एक बार नहीं, कई बार हुआ। महानगरों की मॉल संस्कृति में भोपाल पिछड़ गया। वर्ष २००८ के छह महीने गुजर चुके हैं और इस शहर में एक बड़ा सा खूबसूरत शापिंग मॉल नहीं और न ही मल्टीप्लक्स की सुविधा। आने वाले सालों में भोपाल महानगरों का हमकदम बन सके तो शायद बन सके।राजधानी होने का सुख भोपाल ने खूब भोगा तो दुख भी इस भोपाल ने झेले हैं। झाबुआ से बस्तर तक की राजधानी कहलाने का सुख भोगने वाले भोपाल को बीसवीं सदी के समाप्त होते-होते जोर का झटका लगा। इस राजधानी के मुकाबले एक और राजधानी बन गयी वह छत्तीसगढ़ की थी। मध्यप्रदेश विभाजित हो गया और अपने ही जन्मदिन एक नवम्बर को विभाजन की पीड़ा भोगनी पड़ी। राजधानी भोपाल के आंसू जरूर टपके होंगे लेकिन खुद को जब्त करना उसने कोई चौबीस बरस पहले से ही सीख लिया था। गैसकांड में उसके अपने बिछुड़ गये थे तब भी भोपाल जरूर रोया होगा तब शायद भोपाल को लगा होगा कि उसे राजधानी नहीं शहर ही होना था।

खबर की कीमत तो तय होने दीजिये जनाब!

मनोज

किसी भी अखबार के पहले पन्ने पर लीड स्टोरी का मूल्य क्या होगा? बाॅटमस्टोरी महंगी होगी या फिर सिटी पेज की स्टोरी की कीमत अधिक होती है? 9बजे प्राइम टाइम पर प्रसारित होने वाला कौन सा समाचार किस कीमत पर बेचाजाएगा अथवा रेडियो पर प्रसारित होने वाली खबरों की भी कोई कीमत आप लगासकते हैं? प्रधानमंत्री जी का वक्तव्य महंगा होगा या बिपाषा बसु के बारेमें बतायी जा रही खबर की भी कोई कीमत हो सकती? आप सोच रहे होंगे कि यहकैसा बेहूदा सवाल है। भला खबर की भी कोई कीमत आंकी जा सकती है? मैं भीआपकी तरह ही सोचता हूं कि पत्रकारिता कभी भी व्यवसायिक नहीं हो सकती हैकिन्तु जब सब तरफ ढोल पीटा जा रहा है कि पत्रकारिता व्यवासायिक हो गई हैतब यह सवाल जरूरी हो जाता है। मुझे यह भी नहीं मालूम कि मेरी इस राय सेकितने लोग इत्त्ेाफाक रखते हैं लेकिन मेरी अपनी राय है कि पत्रकारिता नतो आजादी के पहले व्यवसायिक थी और न आज व्यवसायिक हुई है। आजादी के समयथोड़ी और आजादी के बाद बदलते दौर में समाचार पत्रों का व्यवासायीकरण तेजीसे हुआ है। तकनीक के विस्तार के साथ समाचार पत्रों की छपाई का खर्च बढ़तागया और पाठक को उपभोक्ता बनाकर उन तक पहुंचने के लिए बाजार ने समाचारपत्रों को माध्यम बनाया। कुछ ऐसी ही स्थिति तेजी से पसरते टेलीविजन औररेडियो के साथ भी हुई। कुल मिलाकर मीडिया को बाजार की वस्तु बना दी गई औरमीडिया के संसाधनों का व्यवसायीकरण हुआ और इसे बता दिया गया किपत्रकारिता व्यवसायिक हो गई।पत्रकारिता और पत्र के व्यवसायिकरण के भेद को समझना होगा क्योंकि पाठकके लिए पत्रकारिता और पत्र में कोई भेद नहीं है। समय की मांग के अनुरूपपत्रकारिता का विस्तार होता गया और बढ़ती मंहगाई के अनुरूप पत्रकारो केवेतनमान और दूसरी सुविधाओ में इजाफा हुआ। आज से दो दषक पहले मिलने वालेवेतनमान और आज मिलने वाला वेतनमान में फर्क है किन्तु पत्र को प्राप्तहोने वाले राजस्व पर नजर डालें तो दोनों के बीच जमीन आसमान का फर्क साफदिखता है। पत्र की आय बढ़ती गई क्योंकि दो दषक पहले तक जो विज्ञापन की जोकीमत थी, आज वह कम से कम चालीस गुना बढ़ गई है। पत्रों का स्वरूप बदल गयाहै। पृश्ठ संख्या में वृ़िद्व के साथ साथ रंगीन छपाई अनिवार्य हो गइ्र्रहै और इस पूरी प्रक्रिया में पत्रकारिता को कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ औरजो हो भी नहीं सकता है। पत्रकारिता का गुण-धर्म कहता है कि वह निरपेक्षऔर निस्वार्थ रूप से अपने सामाजिक और नैतिक दायित्वों का निर्वहन करेगीऔर इस बदले दौर में भी वह पूरी ईमानदारी और षिद्दत के साथ अपने काम करनेमें जुटी हुई है। आज तक किसी खबर की कीमत तय नहीं की गई और न ही विज्ञापनके रूप में उसकी बिलिंग की गई न इंच और सेंटीमीटर में नापा गया। यहां तककी तारीफ में लिखे गये लेख को इम्पेक्ट फीचर कहा गया जो भुगतान के एवजमें लिखी गई है जिसमें लेखक हमेषा से गायब रहा है।पत्रकार अरूण षौरी की रिपोर्टिंग बोफोर्स कांड की गंूज आज तक हो रही हैतो स्ंिटग आॅपरेषन से रिष्वतखोर सांसदों की कुर्सी छिन जाना भी इसीस्वतंत्र भारत की घटना है। श्रेश्ठ पत्रकारिता के लिए पी. साईंनाथ कोमेगसेसे पुरस्कार मिलना भी इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता न तोस्वतंत्रता के पूर्व व्यवसायिक थी और न आज व्यवसायिक है और इस बात की भीआषंका नहीं है कि पत्रकारिता कभी व्यवसायिक हो पाएगी। मुझे तो लगता हैकि मीडिया हाउस और पत्रकारिता को धंधा बनाने में जुटा एक बड़ा वर्गपत्रकारिता के व्यवसायिक होने का ढोल पीट रहा है। इसके पीछे की साजिष कोसमझना होगा क्योंकि पत्रकारिता को व्यवसायिक होने की बात स्थापित नहीं कीगई तो मैनेजर को संपादक कैसे बनाया जाएगा? आज जब चारों तरफ संपादक नाम कीसंस्था की समाप्ति को लेकर रोना रोया जा रहा है, तब हमें यह नहीं भूलनाचाहिए कि यही वे लोग हैं जो पत्रकारिता को व्यवसायिक बता कर, खबर कोसाबुन की टिकिया के दामों पर बेचने का भ्रम फैलाकर संपादक की जरूरत खत्मकर दी। एक बात ध्यान रखना चाहिए कि जब कोई चीज, भले ही वह पत्रकारिता हो,यदि वह व्यवसायिक होती है तो उसे अपनी क्वालिटी पर विषेष ध्यानदेना होगा। दुर्भाग्य से जो लोग पत्रकारिता को व्यवसायिक बता रहे हैं,उन्होंने पैकेजिंग तो बेहतर की है लेकिन कंटेंट पर ध्यान देना भूल गए हैंजबकि बाजार कहता है कि पैकेजिंग के साथ गुणवत्ता भी जरूरी है। ऐसे में यहमाना जा सकता है कि पत्रकारिता को व्यवसायिक बनाने की पहल जरूर तेजी सेकी जा रही है। यह जरूर माना जा सकता है कि पर्दे के पीछे से पत्रकारिताकी आड़ में बहुत सारे सौदे हो रहे हैं और इसी को आधार बनाकर पत्रकारिता कोव्यवसायिक होना मान लिया गया है। दरअसल इसे पत्रकारिता में पीतपत्रकारिता कहा जाता है। जो थोड़ा बहुत अनुभव मेरा अपना है, उसके आधार परमैं यह कह सकता हूं कि पत्रकारिता की आड़ में कथित तौर पर लेन-देन काकिस्सा पुराना है, तब क्यों पत्रकारिता के व्यवसायीकरण की बात नहीं कीगई? उसे हमेषा पीत पत्रकारिता कहा गया। साथियों को यह तो याद होगा किषषिकपूर अभिनीत फिल्म न्यू दिल्ली टाइम्स की कहानी इसी पृष्ठभूमि पर थी।पीत पत्रकारिता और व्यवसायिकरण के अंतर को भी समझना होगा।दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी के दिमाग में आरंभसे ही यह बात बिठा दी जाती है कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गई है और आपइसी नजर से पत्रकारिता करें। इसका खामियाजा यह निकल रहा है कि पत्रकारिताको नयी पीढी नौकरी मानकर करने लगी है। पत्रकारिता की षिक्षा हासिल कर रहेकुछ नये दोस्तों से इस बारे में बात की गई तो उनका मानना था कि अखबारोंअथवा टेलीविजन चैनल से जो तनख्वाह मिलती है, वह खबर के लिये मिलती है।उनसे जब इस बारे में पूछा गया कि मिसाल के तौर पर एक अखबार आपको दस हजाररूपये माहवार तनख्वाह देता है और बदले में आप दस खबर महीने में देते हैं।इस अखबार की प्रसार संख्या एक लाख प्रतियां प्रतिदिन है। इस गणित के आधारपर आपकी एक खबर की कीमत एक हजार रुपये और एक प्रति के हिसाब से दस पैसेप्रति खबर दी गई। दस पैसे की खबर और पत्रकारिता का दंभ? इस बात का जवाबमेरे नौजवान साथी के पास नहीं था। जब नये साथियों को समझाया गया कि खबरकी कोई कीमत नहीं होती है बल्कि जो दस हजार रुपये आपको दिये जाते हैं, वहआपके श्रम का होता है।नये साथियों की सोच में उनकी गलती नहीं है बल्कि इसके लिये हम सब दोषीहैं। हमने ही तय कर दिया कि पत्रकारिता व्यवयासियक हो गई है तो नयी पीढ़ीउसी हिसाब से काम करने लगी। मेरा अपना मानना है कि कदाचित पत्रकारिता मेंव्यवसायिकरण हो भी रहा है तो इसका पूरी ताकत से प्रतिकार किया जानाचाहिए। घर में आग लग जाए तो हाथ पर हाथ रखकर बैठा नहीं जा सकता है, उसीतरह पत्रकारिता जब व्यवसायिक हो रही है तो उसे बचाने की कोषिष तो की जासकती है। सिर्फ चिल्लाने और रोने से पत्रकारिता में बढ़ती व्यवसायिकतानहीें रूकेगी बल्कि इसके लिये पहल करने की जरूरत होगी और सबसे पहले हमेंइस बात को सिरे से, हर मंच से नकारना होगा कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गईहै। यह काम हमने आज और अभी से नहीं किया तो एक प्रोफेषनल कालेज से पासआउटस्टूडेंट और हमारे में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। कल और डरावना हो जाए,इसके पहले हम सबको चेतना होगा। पत्रकारिता के व्यवसायिकरण की बात माननाभी है तो थोड़ा सब्र करें दोस्त क्योंकि पहले खबर की कीमत तो तय होनेदीजिये। खबर को इंच और सेंटीमीटर में नपने तो दीजिये।

यह मीडिया की भाषा तो नहीं

हैमनोज कुमारभारत सरकार की रेलमंत्री ममता बेनर्जी ने रेल बजट पेश किया तो अखबारों ने हेडलाइन बनायी ममता ने ममता उडेला, ममता दीदी की ममता वगैरह वगैरह और इसके थोड़े अंतराल में जब केन्द्रीय वित्तमंत्री ने देश का बजट पेश किया ता फिर अखबारों ने लिखा प्रणव दा......इन सबके पहले 30 जून को जब मध्यप्रदेश के नवनियुक्त राज्यपाल ने पदभार ग्रहण किया तो अखबारों का शीर्षक था ठाकुर ने पदभार सम्हाला....यह शीर्षक बनाने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि वे क्या लिख रहे हैं, उनके दिमाग में केवल एक बात रही होगी कि लोकप्रिय शीर्षकों का गठन कैसे किया जाये। उन्हें इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि शीर्षक के गठन की एक मर्यादा होती है और उस मर्यादा की सीमारेखा को कितना लांघा जाए? ममता बेनर्जी ने बजट केन्द्रीय रेलमंत्री की हैसियत से पेश किया था और प्रणव मुखर्जी ने देश का बजट केन्द्रीय वित्त मंत्री के नाते। ऐसे में स्वाभाविक रूप से उनका मीडिया से नाता केन्द्रीय मंत्री के रूप में है न कि मीडिया से रिश्तेदारी। इसी तरह मध्यप्रदेश के राज्यपाल के पदग्रहण करने पर जो शीर्षक अखबारों ने लगाया उसमें महामहिम शब्द नदारद था। फौरीतौर पर जो शीर्षक बनाया गया या बनाया जा रहा है, उसको लेकर कोई गंभीर नहीं दिख रहा है किन्तु इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि समाचार पत्र भले ही हड़बड़ी में लिखा गया साहित्य हो लेकिन इतिहास का हिस्सा तो है ही। हम ऐसे ऐतिहासिक भूल कैसे कर सकते हैं लेकिन कर रहे हैं।मुझे याद है कि जब मैं छोटा था। छोटा यानि दूसरी या तीसरी कक्षा के आसपास। तब अखबार की कीमत पांच पैसे होती थी। सुबह सवेरे अखबार की बड़ी बेसब्री से इंतजार होता था। घर पर हिदायत थी कि अखबार के शीर्षक को हिज्जा लगाकर पढ़ो। अखबार पढ़ने से हिन्दी सुधरती है। आज जब अखबारों में भाषा का जो खिलवाड़ हो रहा है, उसे देखने के बाद मन बेचैन हो जाता है। सहज ही समझ नहीं आता कि कभी बच्चों को हिन्दी सिखाने वाले अखबार कहां गुम हो गये। मीडिया की भाषा की चिंता है और इन दिनांे मीडिया की भाषा को लेकर चिंता भी जाहिर की जा रही है। खासतौर पर हिन्दी मीडिया की भाषा को लेकर। दूसरी तरफ मीडिया में भाषा को लेकर नित नये प्रयोग हो रहे हैं। हिन्दी अंग्रेजी मिश्रित भाषा को लेकर आपत्ति की जाती रही है और बाद में चुपके से मान लिया गया कि यह हिेग्लिश है और समय की जरूरत के अनुरूप इसे मान लिया जाये। अब मीडिया में लिखने और बोलने में बेरोकटोक अंग्रेजी शब्दों का कहीं जरूरत के अनुरूप तो कहीं बेजा इस्तेमाल हो रहा है। हिन्दी का कोई उपयुक्त शब्द न सूझे तो अंग्रेजी को चिपका दो। पाठक भी इस बात को लेकर कोई आपत्ति नहीं करते हैं। उन्हें भी शायद अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी पढ़ना सुहाने लगा है। इस बात को मानने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए कि यह जो दौर है उसमें दोनों ही कमजोर हो गये हैं। लिखने वाले की हिन्दी कमजोर है और पढ़ने वाला सीखना नहीं चाहता है।अभी हाल के अखबारों मेें कुछ खबरों के शीर्षक को पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि अखबार अब खबर नहीं लिख रहे हैं बल्कि रिश्तेदारी निभा रहे हैं। केन्द्रीय रेल मंत्री दीदी का संबोधन पा रही हैं तो वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी दा बन गये हैं। लालू, मुलायम, मायावती, सोनिया आदि को सीधे नाम से बुलाने की सीख तो हमें अंग्रेजी मीडिया ने दी है। अंग्रेजी से हम इतना ही ले पाये क्योंकि बाकि लेना कठिन होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो मध्यप्रदेश के नवनियुक्त राज्यपाल के पदभार के बाद छपने वाली खबर का शीर्षक यह नहीं बनता ठाकुर ने पदभार सम्हाला। कोई बतायेगा कि ये ठाकुर कौन हैं? राज्यपाल के साथ महामहिम लिखने की परम्परा है और परम्परा लांघने वालों के लिये यह जरूरी है कि वे पद की गरिमा का ध्यान रखें। महामहिम न सही, राज्यपाल तो लिखें। एक समय हिन्दी का प्रखर समाचार पत्र नईदुनिया इस परम्परा का वाहक था जो नवदुनिया होने के साथ इस परम्परा को भूलने लगा है। नईदुनिया प्रबंधन को यह बात अखरने वाली लग सकती है तो मुझ जैसे पाठक और दुर्भाग्य से इस पेशे का एक पुराना साथी होने के नाते दुख है और यह सवाल बार बार मेरे सामने उभरता है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को कौन सी भाषा देकर जाएंगे?रोज अखबारों के शीर्षकों पर गौर करें तो समझ में नहीं आता कि क्या लिखा जा रहा है और क्या कहना चाहते हैं। मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष बनीं तो अखबारों का शीर्षक था मीराकुमार ने इतिहास बनाया। मुझ जैसे अल्पज्ञानी को यह बात समझ में नहीं आयी कि आखिर मीरा कुमार ने इतिहास किस तरह बनाया लेकिन धन्यवाद पंजाब केसरी जिसका शीर्षक था लोकसभा ने इतिहास बनाया। अर्थ खोते इन शीर्षकों के प्रति पाठक भी जागरूक नहीं रह गये हैं। पूरी खबर की भाषा पढ़ें तो लगता है कि हम अखबार पढ़ क्यों रहे हैं। एक अखबार में खबर छपी जिसमें लिखा था कि एक पत्रकार वार्ता में पत्रकारों को बताया....अब इसे क्या समझा जाए? खबर लिखने वाले की नासमझी या या खबर लिख पाने की समझ की कमी।यह भी कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि लगभग हर दिन कहीं न कहीं अखबार के मसले को लेकर चिंता करते हुए सभा संगोष्ठि का आयोजन हो रहा है। इन गोष्ठियों में एक ही सवाल होता है कि पत्रकारिता व्यवसायिक हो गई है या फिर पत्रकारिता में अच्छे लोग नहीं आ रहे हैं लेकिन कोई पत्रकारिता की भाषा, कंटेंट पर बात नहीं करता है। पत्रकार बन जाने का मतलब ही है कि आप भाषा के ज्ञाता हैं और फिर इस पर बात करने से फायदा क्या। मेरी अपनी निजी राय है कि पत्रकारिता एकमात्र ऐसा कार्य है जहां जब भी गलत लोग आएंगे, खुद ब खुद बेनकाब होकर बाहर चले जाएंगे। ऐसा हो भी रहा है। इन पर नजर रखें लेकिन समय और विचार इन पर जाया करने के बजाय पत्रकारिता अपने स्तर को कैसे बनाये रखे, इसकी चिंता जरूरी है। भाषा, कंटेंट, लेआउट आदि पर चर्चा की जानी चाहिए जो नहीं हो रहा है।

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...