बुधवार, 17 जुलाई 2013

अनाम रिश्ते


मनोज कुमार
इस कठिन समय में समाज जिस भी संकट से गुजर रहा हो लेकिन उसने अपनी पर परा और सहयोग की भावना को विस्मृत नहीं किया है. स्थिति-परिस्थिति, चाहे जैसी हो लेकिन समाज का हर आदमी एक-दूसरे की मदद के लिये तैयार रहता है. समाज का यह जागरूकता ही भारतीय संस्कृति की संवाहक है. इस संस्कृति में जात-पात का कोई अर्थ नहीं होता है. यह सब विश£ेषण और बातें एक समय के बाद बेमानी हो जाती हैं. भारतीय समाज के सामने एक ही शब्द रह जाता है जिसे हम मानवता कहते हैं. मानवता का यह उदाहरण मैंने अपने पचास होते-होते अनेक बार देखा है. कुछ संकोच से कहूं तो कदाचित कुछ लोगों के लिये मददगार भी बना हूं लेकिन इतना बड़ा भी नहीं, उसे ताउम्र स्मरण किया जा सके. लेकिन अपने आसपास जब समाज के इस दानशीलता, सहयोग को देखता हूं तो मन सहज ही भाव से भर जाता है.

यहां एक ऐसी घटना आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूंगा जिसका मैं विगत दस वर्षों से अधिक समय से गवाह हूं. मैं इस समय भोपाल में रहता हूं. इसी भोपाल शहर में शिवाजीनगर नाम का मोहल्ला है और इस मोहल्ले के बीच में एक मध्यम दर्जे का बाजार है. अमूनन जैसा बाजार होता है, वैसा ही. रोजमर्रा के जरूरतों का सामान यहां मिल जाया करता है लिहाजा दिन के किसी एक वक्त तो यहां से गुजरना ही होता है. जिन दिनों मैं यहां आया, वह बात लगभग दसेक साल पुरानी होगी. इस बाजार के आसपास एक तिपहया गाड़ी में मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर एक युवक बैठा रहता था. आने-जाने वालों को आवाज देना और आवाज नहीं देने पर उन्हें अपशब्द कहना.

इस विक्षिप्त मन के युवक का यह व्यवहार देखकर मुझे कुछ अटपटा सा लगता लेकिन मेरे से पहले जो लोग उसे जानते हैं, उनके लिये यह एकदम सहज था. कोई उसके व्यवहार को लेकर विचलित नहीं होता था. मौसम चाहे गर्मी का हो, ठंड हो या बारिश का, वह बाजार के इर्द-गिर्द ही रहता था. शायद आहिस्ता-आहिस्ता मैं भी उस युवक की आदत का अ यस्त होता जा रहा था. अब उसका व्यवहार मुझे किसी तरह की दिक्कत नहीं देता था. कुछ और लोगों की तरह मैं ाी उसे अनदेखा कर निकल जाया करता था. एक दिन कुछ फुर्सत में था. मैं उसकी दिनचर्या को समझने की कोशिश में लगा रहा. खैर, मैं अपनी कोशिश में उसकी दिनचर्या तो नहीं समझ सका लेकिन जो देखा और जाना, उसे देखकर मैं स्वयं को कोसने लगा कि आखिर मेरे मन मेे यह सहायता का भाव क्यों नहीं आया.

बहरहाल, मैं विस्मित था. आसपास के दुकानदार समय समय पर उसके खाने का इंतजाम कर जाते थे. चाय की तलब होने पर उसे चाय दे दी जाती थी. दिनचर्या के निपटारे के लिये लोग आते और उसकी मदद कर जाते. यह सिलसिला एक बार या एक दिन का नहीं था, बल्कि सालों से चल रहा था और शायद आने वाले सालों के लिये. समय आहिस्ता आहिस्ता रेंग रहा था और इसी समय के साथ युवक की उम्र पर भी असर दिखने लगा था. वह दस बरस पहले जैसा था, दस बरस बाद भी वह वैसा ही बना रहा और वही क्यों, समाज ने भी अपना व्यवहार नहीं बदला. जो मदद उसकी दस साल पहले की जा रही थी, मदद का वह सिलसिला ज्यों का त्यों बना हुआ है. यह घटना यूं तो बहुत मायने नहीं रखती है लेकिन इसके अर्थ कई हैं. एक ऐसी अर्थवान घटना जो हमारे समय में घट रही है, एक ऐसी सी ा देने वाली घटना जो कह रही है कि जात-पात से ऊपर उठकर मानवता का पाठ पढ़ो. रिश्तों की डोर में बंधो लेकिन अनाम रिश्ते में. एक एैसा रिश्ता जो मानव के साथ मानव का ही हो. 

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...