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मार्च 3, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्रवण कुमार किताबों में

मनोज कुमार श्रवण कुमार का नाम भारतीय समाज में अपरिचित नहीं है. जब भी माता-पिता की सेवा करने की बात आती है तो श्रवण कुमार से बड़ा कोई नायक, कोई पात्र नहीं होता है. सनातनकाल से यह नायक आधुनिक समाज में वैसा ही उपस्थित है जैसा कि उसे बताया या दिखाया गया है. समय काल में बदलाव हो रहा है और इस बदलाव में लगता है कि कहीं श्रवण कुमार असामयिक होता जा रहा है. अब वह नये जमाने की नयी पीढ़ी के लिये रोल मॉडल नहीं रह गया है. ऐसा मुझे तब पहली बार लगा जब मैं अपने एक दोस्त के घर गया था. उसका बेटा कोई 12-13 साल का होगा. गुणी है, प्रतिभावान है. वह नये जमाने का बच्चा है तो उसकी सोच भी प्रगतिशील है. वह आने वाले दिनों में अपने कैरियर को देखता है. उसे लगता है कि पिता या माता बीमार पड़ गये तो उसका समय और धन उनके इलाज में खर्च हो जाएगा. धन की उसे चिंता नहीं है. उसे पता है कि वह जितना खर्च करेगा, उसे कहीं ज्यादा कमा लेगा लेकिन उसे चिंता है कि बीमार होने वाले माता-पिता की सेवा में समय खर्च हो जाएगा तो इसकी भरपाई कहां से करेगा. यह सारी चिंता और सारे सवाल उसके मन के भीतर अभी से उमड़-घुमड़ रहे हैं. मुझे नहीं मा