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शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

भाषाई राजदूत है मध्यप्रदेश


 प्रो. मनोज कुमार

मध्यप्रदेश के भौगोलिक गठन को लेकर निराश होता था. लगता था कि देश का ह्दयप्रदेश कहलाने वाले मध्यप्रदेश की कोई एक भाषा, एक संस्कृति नहीं है. यहाँ तक कि दो दशक पहले मध्यप्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ की भाषा छत्तीसगढ़ी है. लेकिन आज लग रहा है कि मेरा मध्यप्रदेश सचमुच में अनुपम है. अलग है और एक धडक़ते दिल की तरह वह भारत का प्रतिनिधि प्रदेश है. यहाँ भाषा और संस्कृति को लेकर कोई विवाद नहीं है. वह बाँहें पसारे खुले मन से सबका स्वागत कर रहा है. यह प्रदेश भावभूमि है. यहाँ देश के सभी प्रदेशों के भाषा-भाषी निवास करते हैं. उनकी संस्कृति और संस्कार को मध्यप्रदेश के रहने वाले स्वागत करते हैं. सच कहा जाए तो देश दिल मध्यप्रदेश भाषा और संस्कृति का राजदूत है. आज जब भाषा विवाद चरम पर है तब मध्यप्रदेश मुस्करा रहा है. शायद वह कह रहा है कि आओ, मुझसे सीखो कि भारत की बहुभाषी और संस्कृति को कैसे सम्मान दिया जाता है. पंडित नेहरू ने कभी मध्यप्रदेश को बेडौल प्रदेश कहा था लेकिन इसी बेडौल भू-भाग वाला मध्यप्रदेश भारत का आदर्श प्रदेश के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. 

मध्यप्रदेश का मुआयना करें तो आपको कई रीजन मिलेंगे. इनमें मालवा, महाकोशल, विंध्य, बुुंदेलखंड, चंबल और कभी छत्तीसगढ़ भी इसका हिस्सा हुआ करता था. अपनी स्थापना के सात दशक बाद भी कभी यहाँ भाषा विवाद सुलगा नहीं और ना ही संस्कृति को लेकर कोई विवाद हुआ. बहुभाषी साहित्य को जितना बड़ा मंच मध्यप्रदेश में मिला, वह कहीं और नहीं. भारत के इस प्रतिनिधि प्रदेश में हर प्रदेश का स्वागत है. भरोसा ना हो तो एक बार भारत भवन के आयोजन का कैलेंडर उठा कर देख लीजिए. प्रतिवर्ष देश के सभी राज्यों की कलाओं का प्रदर्शन होता है, भागीदारी होती है. विविध भाषाओं के साहित्य पर चर्चा होती है. यही नहीं, मध्यप्रदेश की साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन में हर भाषा को स्थान दिया गया है. मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद में मराठी, सिंधी, पंजाबी, भोजपुरी अकादमी है तो मध्यप्रदेश ने माँग की कि हम सिंधी की शिक्षा देंगे तो हाल ही में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में इस पाठ्यक्रम की अनुमति मिल गई और जल्द ही औपचारिक शिक्षा भी शुरू हो जाएगी. देश के ह्दयप्रदेश का ह्दय हर प्रदेश के लिए धडक़ता है और यही कारण है कि मध्यप्रदेश राजभवन में एक-एक कर विभिन्न राज्यों का स्थापना दिवस उत्सव मनाया जाता है.

भारत देश बहुभाषी संस्कृति और साहित्य का देश है. भाषा और बोली की यह खूबसूरती है कि हम सब मिलकर सतरंगी दुनिया गढ़ते हैं. गर्व के साथ मैं कह सकता हूँ कि मध्यप्रदेश भारत की इस छवि का प्रतिनिधि प्रदेश है. राजदूत है जो शांति, समन्वय और सद्भाव के संदेश को भेजता है. राज्य सरकार के अथक कोशिश से मध्यप्रदेश में लगातार फिल्मों, टीवी सीरियल्स और ओटीटी प्लेटफार्म के लिए निर्माण हो रहा है. इमदाद और मदद दोनों फिल्ममेकर्स को मिल रहा है लेकिन परदे पर कहीं एक पंक्ति नहीं दिखता ‘धन्यवाद मध्यप्रदेश’, बावजूद इसके हम उनका हमेशा से स्वागत करने तिलक रोरी लिए खड़े होते हैं. वर्तमान सरकार तो पीले चावल लेकर प्रदेश-दर-प्रदेश जा रही है कि आइए, हमारे प्रदेश में उद्योग लगाइए. मध्यप्रदेश इतना कर रहा है लेकिन सवाल है कि क्या मध्यप्रदेश जैसी सुंदर, सुखद पहल कोई और कर रहा है? क्या हम सब भारत माता के लाल नहीं हैं? इस पर विचार करना जरूरी हो जाता है.   

देश में छिड़ा भाषा विवाद नया नहीं है. समय-समय पर यह विवाद होता रहा है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि भाषा का विरोध अर्थात हिन्दी का विरोध. हर प्रदेश की एक भाषा है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है. इसी बहुभाषी संस्कृति से भारत की विश्व में अलग पहचान है. भाषा विवाद के संकट बड़े हैं. वह ना केवल राष्ट्रीय एकता और संप्रुभता को संकट में डालता है बल्कि रोजी-रोजगार पर भी असर होता है. इस विवाद में एक उपाय यह भी हो सकता है कि आक्रामक होने के बजाय भाषा प्रशिक्षण केन्द्र हर राज्य में आरंभ कर दे. जिन्हें यह भाषा नहीं आती, उन्हें सीखने और समझने का अवसर दे. इससे शायद कोई रास्ता सुंदर निकल आए. रास्ता ना सही, एक पगडंडी तो मिल ही जाएगी. वैसे भी हिन्दी की खूबसूरती देखिए जिसका आप विरोध कर रहे हैं, वही आपको एक कर रही है

सोमवार, 31 मई 2010

मुद्दा

अपनों से ही परायापन क्यों?
किसी भी व्यवसाय का नेचर होता है कि वह अपने प्रतिद्वंदी कंपनी को बाजार में पिट दे। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि बाजार में खुद को खड़ा रखने के लिये दूसरों को पीटना जरूरी है। यह स्पर्धा मीडिया में भी चल रही है। अखबारों की प्रसार संख्या और टेलीविजन की टीआरपी को लेकर हो रही इस स्पर्धा को सही कहा जा सकता है किन्तु किसी पत्रकार अथवा मीडिया कर्मी के सुख-दुख में भी इस तरह स्पर्धा को मैं कतई उचित नहीं मानता। मेरा मानना यह है कि मेरे साथी भी मेरी बातों से सहमत होंगे। भोपाल में यह स्पर्धा काफी वक्त से चल रही है। एक अखबार दूसरे अखबार से और एक चैनल दूसरे चैनल से आगे निकल जाने के लिये बेताब है। आंकड़ों का खेल जारी है और इसे गलत नहीं कहा जा सकता लेकिन जो इन दिनों क्या बल्कि एक मुद्दत से हो रहा है वह निहायत गलत है। बीती रात एक अखबार में काम करने वाले साथी को किसी अज्ञात लोगों ने लूट लिया। इस लूट की खबर सारे अखबारों में है। लूट का शिकार हुए साथी का नाम भी दिया गया है किन्तु अखबार का नाम प्रकाशन से सभी अखबारों ने परहेज किया है। यह पहली घटना नहीं है। एक पखवाड़े के भीतर यह चौथी-पांचवीं घटना है। यह सुखद है कि खबरों के प्रकाशन में कोई परहेज नहीं किया जा रहा है किन्तु सवाल यह है कि अखबार का नाम प्रकाशित करने से क्या भला हो रहा है। अखबार में काम करने वाला साथी है और उस अखबार का नाम प्रकाशित किया जा रहा है तो ऐसा नहीं है कि इस खबर से अखबार की प्रसार संख्या में कोई वृद्वि या कमी हो रही है या अनावश्यक पब्लिसिटी हो रही है और साथी किसी टेलीविजन चेनल का है तो भी इसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो हमें सिखाया जाता था कि अपनी लाईन बड़ी करने के लिये किसी की लाईन को मिटाने की जरूरत नहीं है बल्कि स्वयं अपनी लाईन बड़ी करें। मीडिया की तीन बुनियादी बातें हैं जिनमें एक समाज को शिक्षित करना भी है। जब स्वयं मीडिया अपनों के साथ ऐसा बर्ताव करेगा तो वह समाज को कैसे और किस प्रकार की शिक्षा देगा, यह आत्ममंथन का विषय है। मैं समझता हूं कि यह मुद्दा व्यक्ति विशेष, संस्था विशेष का न होकर समूचे मीडिया जगत का है और इस पर पहल करना जरूरी है। अपने अनुभव से मैं यह कह सकता हूं कि इस तरह की खबरों पर मैनेजमेंट का बहुत गंभीर हस्तक्षेप नहीं होता है। मैनेजमेंअ उन खबरों पर जरूर एक्शन लेता है जो उनके व्यवसायिक हितों को चोट पहुंचाती है। जो लोग मेरा ब्लॉग पढ़ रहे हैं, मेरा उनसे अनुरोध है कि इस दिशा में वे अपनी राय दें, हस्तक्षेप करें और हम सब एक हैं कि आवाज बुलंद करें।

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