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लाल सलाम नहीं, यश बॉस

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मनोज कुमार फादर्स डे और मदर्स डे मनाने वाली साल 2000 के बाद की पीढ़ी को तो पता ही नहीं होगा कि हम लोग 1 मई को मजदूर दिवस भी मनाते हैं। इसमें उनकी गलती कम है क्योंकि लगभग लगभग इस दौर में मजदूर आंदोलन हाषिये पर चला गया है। लाल सलाम की गूंज सुनाई नहीं देती है। यश बॉस अब एकमात्र नारा बन गया है। यश बॉस शब्द लालकारपेट के लोगों को सुहाता है। लाल सलाम तो उनके लिए हमेशा से पीड़ादायक रहा है। आज जब हम एक बार फिर मजदूर दिवस की औपचारिक स्मृतियों को याद करते हैं तो यह भी याद नहीं आता कि मजदूर -मालिक संघर्ष पर इन दो दषकों में कोई प्रभावी फिल्म बनी हो। यह भी याद नहीं आता कि लेखकों की बड़ी फौज आ जाने के बाद किसी लेखक की मजदूर-मालिक संघर्ष को लेकर कोई कालजयी रचना लिखी गई हो। सिनेमा के पर्दे पर मालिक-मजदूर को लेकर फिल्म का नदारद हो जाना या कथा-साहित्य में इस विषय पर लेखन का ना होना भी इस बात का पुख्ता सबूत है कि मजदूर आंदोलन लगभग समाप्ति पर है। क्योंकि समाज में जो घटता है, वही सिनेमा और साहित्य का विषय बनता है लेकिन जब समाज में ही इस विषय पर शून्यता है तो भला कैसे और कौन सी फिल्म बने या कथा-साहित्