शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

आत्मनिर्भर महिलाओं की नईदुनिया

अनामिका


महिलाएं आत्मनिर्भर कैसे होती हैं? इसका जीता-जागता मिसाल देखना है तो आपको छत्तीसगढ़ आना पड़ेगा. एक नगर, एक कस्बा या एक गांव में एक आत्मनिर्भर महिला की संख्या आप अंगुलियों पर नहीं गिन पाएंगे. कहीं पूरा का पूरा गांव महिलाओं के आत्मनिर्भरता की पहचान बन गया है तो कहीं समूह आत्मनिर्भर है. कुछ ऐसी जगह भी है जहां अपने हुनर के बूते छत्तीसगढ़ से पार जाकर स्वयं के जीवन को खुशहाल बना लिया है। इन सबकी दास्तां सुनने और सुनाने के लिए वक्त चाहिए. आज हम एक छोटी सी कहानी में इनकी सफलता से आपका परिचय कराते हैं। इन सफलताओं की कड़ी में पहला नाम है एक छोटे से गांव जिगयिा की कुमारी सनेश्वरी.  सनेश्वरी पहाड़ी को लाईवलीहुड कॉलेज बलरामपुर ने गारमेन्ट मेकिंग में तराश कर हुनरमंद बनाया और आज वह फ्रांनटीयर निटर प्राईवेट लिमिटेड तिरूपुर तमिलनाडु में 8500 रूपये प्रति माह वेतन के साथ आवासीय सुविधा भी मिल रही है।
बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के विकासखण्ड कुसमी के ग्राम जिगनिया की रहने वाली 20 वर्षीय कुमारी सनेश्वरी पहाड़ी कक्षा 11वीं तक पढ़ी है। पेशे से किसान पिता भगचंद गांव में रहकर खेती किसानी करते हैं और किसी तरह अपना परिवार का भरण पोषण करते हैं। सनेश्वरी के गांव में सुख-सुविधाओं का अभाव था। सपने बड़े थे और हौसले भी कम नहीं था। जरूरत थी तो एक अवसर की और सनेश्वरी को अवसर मिला लाईवलीहुड कॉलेज में। लाईवलीहुड कॉलेज में सनेश्वरी को कपड़ा कटिंग, सिलाई और गारमेन्ट मेकिंग के बारे में बारीकी से सीखा। प्रशिक्षण पूर्ण होने के उपरान्त सनेश्वरी पहाड़ी को रोजगार के रूप में फ्रांनटियर निटर प्राईवेट लिमिटेड तिरूपुुर तमिलनाडु में प्रतिमाह 8500 रूपये वेतन एवं आवासीय सुविधा मिल रही है साथ ही वह अपनी पढ़ाई को भी आगे जारी रखी हुई है। सनेश्वरी की यह कामयाबी दूसरी बच्चियों के लिए मार्गदर्शक साबित हो रही है। वे भी सनेश्वरी की तरह अपनी भविष्य बनाना चाहती हैं। ऐसे हुनर और हौसलों से भरपूर बच्चों को लाइवलीहुड कॉलेज हाथोंहाथ ले रहा है।
अब आपको उन ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की सफलता से अवगत कराते हैं जिनके लिए शहर में व्यापार करना नहीं है लेकिन इनके हौसलों के आगे चुनौती छोटी पड़ जाती है। सारी झिझक खत्म हो जाती है। इस बात का प्रमाण है कुदालगांव की सूरज महिला ग्राम संगठन।  इस संगठन से जुड़ी महिलाएं  ‘आमचो बस्तर बाजार’ का संचालन करने लगी है जो उनके आत्मविश्वास का परिचय देती हैं।  राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत सूरज महिला ग्राम संगठन बेलबेटल, लौहशिल्प, बांस शिल्प, टेराकोटा, शीशल उत्पाद, कोसा उत्पाद, बस्तर वन उत्पाद, काष्ठ शिल्प, कौडी शिल्प के साथ ही बस्तर से जुड़ी साहित्य का विक्रय कर रही हैं। आमचो बस्तर बाजार में स्थानीय लोगों के साथ ही प्रदेश के बाहर से आने वाले पर्यटक निरंतर पहुंच रहे हैं। इसके साथ ही यहां विदेशों से आने वाले पर्यटक भी पहुंचते हैं। इनके और ग्राहक के बीच भाषा एक बाधा थी लेकिन युवक रितेश ने साथ देकर इस बाधा को दूर कर दिया है।  ‘आमचो बस्तर बाजार’ में महिलाएं बांस से बने बैग, पर्स, फाईल फोल्डर, मोबाईल पर्स, डायनिंग सेट, फर्नीचर, मिट्टी के बने गुल्लक, हाथी, लैम्प, फूलदान, देव प्रतिमाएं, शीशल की बनी फल टोकरी, टेबल क्लॉथ, डॉल, डिजाईनर बैग, झूला, बॉल हैंगिंग, पेन स्टैण्ड, टी कोस्टर, कोसा की बनी साडिय़ां, शाल, सूट पीस, जैकेट, शर्ट कपड़ा, स्कार्फ, सागौन और बीजा लकडिय़ों की बनी सुंदर प्रतिमाएं, कौड़ी शिल्प आदि का विक्रय कर रही हैं। इसके साथ ही यहां आवला जूस, जामुन जूस, शहद एवं विभिन्न प्रकार के चूर्ण के साथ ही जैविक कृषि उत्पाद के तौर पर रागी, कोदो, कुटकी, कोसरा आदि लघुधान्य उत्पाद भी रखे गए हैं। यहां हाथों से घुमाकर बजाई जाने वाली बासुरी और बांस से बने बक्कल की आज कल काफी ज्यादा मांग है।
आमचो बस्तर बाजार में छत्तीसगढ़ की कला नमूदार हो रही है तो नारायणपुर नगर की महिलाएं राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन की सहायता से ईंट निर्माण गतिविधि संचालित कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। की महालक्ष्मी स्व सहायता समूह की अध्यक्ष बबीता बेसरा ने बताती हैं कि कि समूह गठित करने के पहले सभी महिलायें ईट निर्माण में मजदूरी कर परिवार के भरण-पोषण में मदद करती थी। इस दौरान राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के प्रबंधक रितेश पाटीदार ने सभी महिलाओं को समूह गठित कर बचत, साझा ऋण सहित छोटी आर्थिक गतिविधि संचालित करने की समझाईश दी जिससे इन महिलाओं में आत्मविश्वास में वृद्धि हुई। अपनी छोटी सी बचत की 10 हजार रुपये के साथ इन महिलाओं ने ईंट निर्माण करने की ठानी। वहीं समूह के सदस्यों ने अपनी ईट निर्माण के लिए 50 हजार रुपये बैंक ऋण लेने का आवेदन आजीविका मिशन परियोजना में जमा किया। इस दौरान समूह की महिलाओं ने स्वयं के पास उपलब्ध रुपयों से ईंट निर्माण प्रारंभ कर दिया। बैंक ने भी उन्हें ऋण देकर उनके काम को आगे बढ़ाने में मदद की है।  समूह अब तक 30 हजार ईट बेच चुकी है और 30 हजार ईंट उपलब्ध है। इस महिला समूह को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 20 व्यक्तिगत शौचालय निर्माण के लिए ईंट आपूर्ति का काम नगर पालिका ने सौंपा है। समूह सभी 20 शौचालय निर्माण के लिए ईंट सुलभ कराया है। समूह की अध्यक्ष बबीता बेसरा कहती है कि समूह की महिलायें नगर को स्वच्छ और साफ-सुथरा रखने के इस महती कार्य में उक्त शौचालय बनाने वाले हितग्राहियों का सहयोग कर रहे हैं। वहीं अपने ईंट निर्माण गतिविधी को भी सुचारू ढंग से संचालित कर रही हैं। इस तरह एक एक कदम चलकर छत्तीसगढ़ की महिलाएं आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ रही हैं। यह उनके आत्मविश्वास की कहानी है जो दूसरों के लिए सबक और जमाने के लिए आदर्श है।

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