शनिवार, 30 मई 2026

# ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन

 


भाषा की मर्यादा का चीरहरण- संजय मेहता

भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की। परम्परागत पत्रकारिता की बात करें अथवा वर्तमान में डिजीटल मीडिया की, दोनों ही जगहों पर भाषा के सारे तटबंध तोड़े जा रहे हैं। भाषा की मर्यादा का चीरहरण हो रहा है। यह बात वरिष्ठ रंग निर्देशक संजय मेहता ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर आयोजित विमर्श में कही। श्री मेहता ने पत्रकारिता के साथ रंगमंच एवं सिनेमा को जोड़ते हुए कहा कि हम सबकी जवाबदारी समाज है और सामाजिक सरोकार ही हमें जिंदा रखेगा। पत्रकारिता की तरह रंगमंच की बड़ी जिम्मेदारी है।

इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमट कोर्ट की एडव्होकेट एवं जिला भाजपा उपाध्यक्ष सुश्री गुंजन चौकसे का कहना था कि ‘सामाजिक सरोकार से ही पत्रकारिता होती है। एक मायने में पत्रकारिता केवल छपे शब्द नहीं बल्कि अवाम की आवाज है।’ उन्होंने अदालत, मीडिया और राजनीति के संदर्भ में अनेक उदाहरण के साथ अपनी बात रखी।

इस अवसर पर प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि- समय कितना ही बदल जाए, पत्रकारिता का मूल स्वरूप हमेशा कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम से भारत के नवनिर्माण में पत्रकारिता का अहम योगदान रहा है। मिशन से व्यवसाय में पत्रकारिता का परिर्वतन आपातकाल के बाद हुआ। दुर्भाग्य से पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा देने की साजिशन माँग की जाने लगी। 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान की पत्रिका ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन किया गया।  ‘समागम’ के इस विशेष अंक में विविध विषयों का संयोजन किया गया है। लेखक कुंवर इंद्रजीत की सद्य प्रकाशित नवीन पुस्तक ‘जीवन यात्रा के सुमन’ का भी लोकार्पण किया गया। लेखक इंद्रजीत सिंह ने अपने जीवन अनुभव भी साझा किया।

गुरुवार, 28 मई 2026

#माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

 हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष

माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

प्रो. मनोज कुमार

दो सौ साल की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर का स्मरण करते हैं, उदंत मात्र्तण्ड का स्मरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से हम अभिमान से भर उठते हैं और दो सौ साल बाद की पत्रकारिता की सीरत देखते हैं तो कम से कम अभिमान तो होता ही नहीं है। दो साल में हिंदी पत्रकारिता के पास बताने के लिए बहुत कुछ था लेकिन हमने बहुत कुछ पाने के लिए उसे खो दिया। हिंदी पत्रकारिता कहाँ दो सौ साल पहले अंग्रेजों से लोहा ले रही थी और आज हम अपने ही लोगों से लोहा ले रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी की साख को बचाने के लिए पत्रकारिता संघर्ष कर रही है और यह संघर्ष अनवरत चलने वाला है। हर सत्ता के लिए पत्रकारिता खतरे की घंटी हुआ करती थी और आगे भी रहेगी। यह जानकर अच्छा लगता है कि चाहे पत्रकारिता में जितनी गिरावट आ गई हो, हर कोई अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पत्रकारिता से भयभीत रहता है। दो साल की हिंदी पत्रकारिता की यही साख है और पूँजी भी। हालाँकि इन दो सौ सालों में बहुत कुछ बदला है। पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर है और हम तकनीक की पत्रकारिता करने लग गए हैं। इस बदलाव से हिंदी पत्रकारिता का यह संक्रमण काल है। यह बात पत्रकारिता में रचे-बसे नए और पुराने दोनों पीढिय़ों को मान लेना चाहिए। वर्तमान समय में चारों तरफ इसी बात पर चर्चा हो रही है कि हिंदी पत्रकारिता एआई और चैटजीपीटी से कैसे निपटे? संकट बड़ा है तो इसका समाधान भी हमें ही तलाश करना होगा। हिंदी पत्रकारिता पर यह संकट पहली बार नहीं है और ना ही आखिरी बार है। ऐसे संकट आते-जाते रहेंगे लेकिन यह भी भरोसा है कि समय के साथ इसका समाधान भी हम सब तलाश कर ही लेंगे।

लंबे संघर्ष के बाद भारत ने स्वाधीनता हासिल किया तो इसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका थी। अनेक संकटों और झंझावतों से गुजरते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा वाली हिंदी पत्रकारिता पर अब जिम्मेदारी थी नव भारत निर्माण में चौकीदार बनने की। देश में नवाचार हो रहा था लिहाजा उस समय काल और परिस्थिति के अनुरूप बजट भी आ रहा था। पैसों की बंदरबाट की कहानी शायद उसके जन्म से है। कल भी था और आज भी है। खैर, तब हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह किया और तब भी अनेक घपले-घोटाले को बेनकाब किया। इस भूमिका के लिए हिंदी पत्रकारिता की पीठ सबने थपथपायी लेकिन भीतर से सत्ता का नाराज होना लाजिमी था। प्रतिपक्ष के लिए तब हिंदी पत्रकारिता की जवाबदारी नैतिक और राष्ट्रहित में होता था लेकिन यही प्रतिपक्ष जब सत्तासीन होता है तो पत्रकारिता उसकी बैरी हो जाती है। सत्ता के साथ पत्रकारिता का रिश्ता वैसा ही है, जैसा की नदी के दो पाट। चलेंगे साथ-साथ लेकिन मिलेेंगे कभी नहीं। खरामा-खरामा साल 47 से साल 75 तक पहुँच गए और यही वह साल था जब हिंदी पत्रकारिता का गला घोंटने की साजिश की गई। तानाशाह शासन व्यवस्था ने पत्रकारिता पर पहरे बिठा दिए। शब्द-शब्द सरकार की निगरानी में छपने लगे। तमाम बंदिशों के बाद भी पत्रकारिता कहाँ हार मानने वाली थी। तानाशाह सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया गया। विरोधस्वरूप संपादकीय पृष्ठ कोरा छोड़ दिया गया। और भी विरोध के अपने तरीके अपनाए गए। पत्रकारिता का यह स्वाभिमान आज भी शेष है। हालाँकि यह भी सच है कि इसी दौर में यह वाक्य चल पड़ा कि- तानाशाह शासन ने कहा कि घुटने के बल चलो तो लोग रेंगने लगे। सौ तो नहीं, अंशभर यह उस समय की सच्चाई है। 

असल चेहरा और पत्रकारिता की साख गिरने का समय साल 75 के बीत जाने के बाद दिखने लगा। पत्रकारिता, मीडिया का स्वरूप धारण करने लगा और मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की माँग उठने लगी। मिशन से मीडिया और मीडिया से उद्योग बन चली पत्रकारिता आहिस्ता-आहिस्ता रोजगार का चेहरा बनने लगी। एक तरफ पत्रकारिता मीडिया बन गई तो दूसरी तरफ पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए उद्योग की तरह ही मीडिया शिक्षा के संस्थान कुकुरमुत्ते की भाँति उठ खड़े हुए। हर की अपनी खासियत, हरेक के अपने दावे। पत्रकारिता को औजार बना दिया गया। मीडिया शिक्षा तब और बढऩे लगा जब पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर जाने लगी और तकनीक की पत्रकारिता होने लगी। अबके समय में आपकी दक्षता विचारों की नहीं, किसी की पीड़ा को देखकर उसे न्याय दिलाने की नहीं, तकनीक के माध्यम से क्या स्टोरी बनायी जा सकती है और इसमें कौन कितना दक्ष होगा, यह मीडिया शिक्षा तय कर रही है। अपनी 45 सालों की पत्रकारिता में मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है लेकिन मेरी बाद की पीढ़ी के लिए पत्रकारिता दिमाग का है। रही-सही कसर आज की एआई और चैटजीपीटी जैसे तकनीक ने पूरा कर दिया है। बरसों पहले मर चुकी संपादक संस्था के नए कारकून मोबाइल पर अपने डिमांड के अनुरूप स्टोरी लिखने को बोलते हैं और चट से ‘बोलो मेरे आका’ के अंदाज में वह सबकुछ दे देता है, जो आपको चाहिए। तकनीक की पत्रकारिता का यह खतरा हम सबके लिए खतरा बन चुका है। अब एक ही रास्ता है कि हम खुद को इस तकनीकी पत्रकारिता के ढाँचे में ढाल लें या इससे बाहर हो जाएँ। कोई तीन दशक पहले फोटोटाइप सेटर और इसके बाद कम्प्यूटर आया तो जो इसके हमसफर हो गए, वे तो बच गए लेकिन अनेक की पत्रकारिता आले पर रख दी गई। अब ओटले की पत्रकारिता होने लगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कभी समाज भरोसे के साथ कहता था कि-पढ़ा नहीं, फलां अखबार में छपा है और आज वही कहते हैं कि एक बार खबर को जाँच लेना। इन सबके बावजूद हमारे पुरखा बालकवि बैरागी जी कि यह पंक्ति बरबस याद आ जाती है-

 माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

मंगलवार, 26 मई 2026

 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान पत्रिका ‘समागम’ का 
जून 2026 का अंक अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.

गुरुवार, 21 मई 2026

‘जेन जी’ का नया एडीशन और ‘कॉकरोच’ का ‘हिट’


प्रो. मनोज कुमार

2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’ इस समय कितना उबल रहा है और देखिए कि कुछ घंटों में हजारों से लाखों और लगभग इस समय तक करोड़ के आसपास युवा जुड़ गए हैं। 2014 के आंदोलन और आज के कॉकरोच जनता पार्टी के बीच कोई साम्य नहीं है लेकिन जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और आज के इस सोशल मीडिया आंदोलन में एक साम्य है, वह कि युवा जब घायल होता है तो वह संसार बदल डालता है। इसे आप कॉकरोच जनता पार्टी कहें या नेपाल के ‘जेन जी’ का नया एडीशन, युवाओं का गुस्सा उफान पर है। 

कॉकरोच जनता पार्टी से जुडऩे का आह्वान भी अलग किस्म का है। यहाँ उसे सरकार बदलने या कथित बयान पर गुस्सा निकालने की कोई अपील नहीं किया गया बल्कि सीधे-सीधे उन लोगों से जुडऩे का अनुरोध किया गया जो बेरोजगार हों, आलसी हों और ज्यादतर ऑनलाइन रहते हों। यह अपील भी नाराजगी जाहिर करने का अपनी किस्म का शायद पहला हो लेकिन देखते ही देखते करोड़ों की संख्या में लोग जुडऩे लगे। सोशल मीडिया के महारथी भी इस तूफान से औचक और हैरान रह गए। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई और ‘कॉकरोच’ ने ऐसा ‘हिट’ मारा की सबके सब दुबक गए। पहले तो इस बात को समझ लें कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया एडीशन क्यों और कैसे खड़ा हुआ? कहा जाता है कि इस समूह का जन्म एक कथित टिप्पणी के विरोध से हुआ। यह भी स्पष्ट कर दें कि जिस टिप्पणी को लेकर युवा आक्रोशित हुआ है, उस टिप्पणी पर सफाई भी दी जा चुकी है। आमतौर पर देखा और समझा जा सकता है कि अनेक बार बयानों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया में ऐसे बयान को वायरल कर दिया जाता है। वायरल करने वाले का एकमात्र मकसद होता है अधिकाधिक धन अर्जन करना लेकिन दूसरी तरफ इस वायरल मैसेज से समाज में जो अराजकता उत्पन्न होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है, उसकी आहट सुनायी देने लगी है। भारत के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है, अनेक बार ऐसी स्थिति आयी है किन्तु इस बार इसे सतही तौर पर लिया जाना थोड़ा खतरनाक हो सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव जितना बड़ा है, उसका बिजनेस मॉडल कहीं उससे ज्यादा बड़ा है। इस बात को भी जेहन में रखकर सोचना होगा। 

2014 का अन्ना आंदोलन आज भी लोगों के जेहन में है और केन्द्र की सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारक इसे माना जाता है। यह आज के कॉकरोच जनता पार्टी की भाँति उदय ना होकर मुद्दा आधारित था। लोकपाल माँग के साथ अन्ना आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। 

जिस लोकपाल की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया गया था, वह पूर्ण हुआ या नहीं, यह अलग विषय है। हालाँकि इसी आंदोलन से केजरीवाल ने ‘आप’ पार्टी को जन्म दिया। लोकप्रियता का आलम यह था कि लोकसभा में जलवा दिखाने वाली भाजपा को नाक के नीचे ‘जेन जी’ वाले केजरीवाल ने सत्ता से बाहर ही रखा। यह सब सुनियोजित नहीं था, जो हो रहा था, वह अप्रत्याशित था। लोगों के बीच संदेश गया कि जेपी आंदोलन के बाद देश में फिर एक बार परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। दिल्ली की सत्ता में आप पार्टी ने कई प्रयोग किए लेकिन आखिरकार उनको भी मतदाताओं ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोकतंत्र में मतदाता भगवान होता है और वह चाहे जो निर्णय दे, वही मान्य होता है। पराजय के बाद आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है। 

यहाँ यह बता देना सामयिक होगा कि जिन लोगों को जेपी आंदोलन याद है, जिन लोगों को अन्ना आंदोलन का स्मरण है, वे याद रखें कि संभवत: देश में ऐसी ही युवा आंदोलन से असम में पहली बार प्रफुल्ल मोहंता सरकार बनी थी। इसकी उम्र भी कोई दसेक साल की रही। सवाल यह है कि युवा जोश ठंडा पड़ गया या कि मतदाता जागरूक हो गए जिन्होंने तीसरी बार मोहंता को अवसर नहीं दिया। कुछ ऐसा ही मामला बंगाल से रूखसत की गई ममता बेनर्जी को दिखता है। ऐसे ही जोश-खरोश के साथ बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को पंद्रह वर्षों तक सत्ता सौंपी थी लेकिन विकल्प मिलते ही उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वही विलाप कि चुनाव में धांधली की गई। खैर, यह सब होता है और होता रहेगा।  

अब सवाल आज की सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का है। युवा वेग उफान पर है लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि यह वेग कब तक रहेगा और किस दिशा में चलेगा? नाराजगी में बना कोई संगठन (फिलहाल कानूनी अस्तित्व नहीं) अक्सर रास्ता भटक जाता है। जिस तेजी से युवा लामबंद हो रहे हैं, वह बदलाव ला भी सकते हैं और खुद भी बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत में संभव नहीं है। युवा उम्र ही क्रांति का बीज बोती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन क्रांति के लिए मुद्दाआधारित गुस्से की जरूरत होती है और ऐसे आंदोलन जेपी और अन्ना का इस देश ने देखा है। भारत में नए किस्म के ‘जेनजी’ को फिलवक्त कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। प्रतिपक्ष की राजनीति देशहित के लिए होता है और संभव है कि आगे भी इस नए-नवेले संगठन को कोई साथ मिलेगा क्योंकि लाभ की राजनीति भला कौन छोडऩा चाहेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव संचार के किसी भी अन्य माध्यमों से ज्यादा प्रभावी और व्यापक है। घड़ी के सेकंड के काँटें के साथ सोशल मीडिया में लिखी-बोली गई बातें दुनिया भर में फैल जाती हैं और यही सबकुछ अभी हो रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी को अपना कुनबा बढ़ाने के लिए वर्षों लग जाते हैं, वहीं अल्प समय में खड़ी हुए संगठन में करोड़ लोगों का जुट जाना अस्वाभाविक है।आगे देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी रील की तरह स्क्रॉल हो जाएगी या इसका जेपी-अन्ना आंदोलन जैसा कोई प्रभाव दिखेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) तस्वीर गूगल से साभार

गुरुवार, 14 मई 2026

कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे

 













प्रो. मनोज कुमार

प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से देशवासियों से अपील किया है कि आसन्न संकट को देखते हुए ईंधन की बचत करें. साथ में कुछ और आग्रह भी. स्वाभाविक है कि पीएम की यह अपील सर्वसमाज के लिए था लेकिन मैं और हम में बँटे लोग इस अपील का मौखाल उड़ा रहे थे। सोशल मीडिया में लगातार इस पर तरह-तरह की बातें चल रही थी। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उनके ही दल के लोग उदाहरण प्रस्तुत करें लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने फौरन अपनी सुरक्षा व्यवस्था में लगी गाडिय़ों की संख्या कम कर दी। अपरोक्ष रूप से उन्होंने अपने मंत्रिमंडल एवं नव-नियुक्त निगम-मंडलों के अध्यक्षों को निर्देश था लेकिन दिल है कि मानता नहीं के तर्ज पर शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया था। ख$फा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जनप्रतिनिधियों को संदेश दे दिया है- ‘कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे’ अन्यथा उनकी सख्ती जग-जाहिर है। यह अपने आपमें हैरान में डाल देने वाला सवाल है कि जिस मोदी को आप अपना आदर्श मानते हैं, उनकी अपील का असर होता नहीं दिख रहा है. सवाल यह भी है कि क्या यह अपील उनके निजी नफा-नुकसान के लिए है अथवा आसन्न संकट से बचाने के लिए देशहित में है।

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है. यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. हम यह भी मानते हैं कि सामान्य हालत में शासकीय योजनाओं का अधिकाधिक लाभ आम लोगों को मिले किंतु संकटकालीन स्थितियों में इन पर रोक लगाया जाना देशहित में है. लाडली बहनों को दिए जाने वाली राशि फिलहाल स्थगित कर देना एक बड़ा उपाय हो सकता है। और हम यह भी जानते हैं कि हमारी मातृशक्ति हर संकट में घर-परिवार, समाज और देश को उबारने में सक्षम हैं और इस समय भी उनका साथ मिलेगा।

मोदी के विरोधी जिस स्तर पर उनका मजाक बना रहे हैं, वह स्वाभाविक है लेकिन क्या ऐसे लोगों के पास जवाब है कि जब देश संकट से गुजर रहा होगा तो वे बच जाएंगे? सुरक्षित रह पाएँगे? वे और उनका परिवार भी इसी देश के नागरिक हैं तो मोदी ना सही, प्रधानमंत्री की बात सुनिए, मानिए. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात की है कि विरोध का मंच खुला होता है। सत्ता के कार्यों की समीक्षा करना और उनकी आलोचना करना, सुधार का सुझाव देना किसी भी विपक्ष के लिए जिम्मेदारी होता है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध ही एक पक्ष है? अधिकार के साथ क्या हमें दायित्व का पालन नहीं करना चाहिए? लोकतंत्र आपको अधिकार देता है तो आपका दायित्व भी निर्धारित करता है और इसलिए आवश्यक है कि समयकाल और परिस्थितियों के अनुरूप विरोध करें या समर्थन कर देशहित में निर्णय लें। वर्तमान समय की माँग है कि हम देशहित में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें। 

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.

पीएम की अपील भी हैकि वर्कफ्रॉम होम को प्राथमिकता देंञ सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

शुक्रवार, 8 मई 2026

चिथड़े में लिपटी माँ को भी याद कर लें

 



‘मदर्स डे’ पर दिल की बात

प्रो. मनोज कुमार

अपने हाथों से दही-शक्कर खिलाकर कामयाबी की कामना करती माँ, अपने बच्चों की बलाएँ उतराती माँ और देहरी लाँघ कर जाते बच्चे को अपने आँचल में बँधा मुड़ा-तुड़ा दस का नोट देकर पूरी दुनिया खरीद लेने की ताकत देती माँ को इस बदलते समय ने बाजार बना दिया है। हमारी सनातन संस्कृति में ‘मदर्स डे’ जैसा कोई कांसेप्ट कभी था ही नहीं। शाम ढले जब थका-हारा बच्चा घर लौटता और दुलार के साथ माँ की गोदी में सिर रखकर जन्नत का अहसास करने लगता उसी समय ‘मदर्स डे’ हो जाता था। भागते-दौड़ते समय में यह पल-छीन, बाजार ने छीन लिया है। ‘मदर्स डे’ का मतलब बता दिया है कि माँ के लिए एक महँगा तोहफा खरीद कर उसे दो, सेल्फी लो और दुनिया को बता दो कि तुम अमीर नहीं, माँ गरीब हो गई है। वो दस रूपये का मुड़ा-तुड़ा नोट जो तुम्हें इस बाजार को खरीद लेने की ताकत देता था, वह पूँजी हम सबने गँवा दी है। हम सब फिर एक बार ‘मदर्स डे’ मनाने के लिए उतावले हो रहे हैं।

‘मदर्स डे’ क्या होता है, यह समझाने के लिए बाजार सज गया है। हम बाजार के बहकावे में आ गए हैं। दही-शक्कर खिलाती माँ और अपने भीतर के दर्द को समेटकर हर बार बच्चे की मुस्कराहट पर निसार होती माँ अब ‘मदर्स डे’ में सिमट गई है। आए दिन खबरें पढ़ते हैं कि एक बेटे ने माँ को इसलिए मौत के घाट उतार दिया कि उसने मोबाइल के लिए पैसे नहीं दिए या कि उसकी अनाप-शनाप जरूरतों को पूरा करने के लिए माँ की गाँठ में पैसे नहीं थे। एक पुरानी कहानी इस संदर्भ में स्मरण हो आता है कि एक बार एक बेटे ने गुस्से में कुल्हाड़ी से माँ की गर्दन उड़ा दी। कटी हुई गर्दन ने शिकायत करने के बजाय पूछा-बेटा ऐसा करते हुए तुझे चोट तो नहीं लगी। ये है हमारा ‘मदर्स डे’ और कौन सा बाजार इस ‘दिल’ को बेच पाएगा और कौन सी औलाद है जो इसे खरीद पाएगी।

हम ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं बल्कि माँ की त्याग और उत्सर्ग को याद करने के लिए कभी वीरांगना लक्ष्मीबाई का स्मरण कर लेते हैं तो कभी ‘मदर इंडिया’ देख लेते हैं। माँ बच्चे की पहली पाठशाला होती है। उसे नैतिक शिक्षा देती है और संबंधों का मूल्य समझाती है और जब वह ऐसे में खुद को विफल होता देखती है तो ‘मदर इंडिया’ हो जाती है। पुरानी बात क्या कहें, एक दशक पहले टीकमढ़ में एक सरपंच माँ ने अपने ही बेटे को गाँव निकाला दे दिया कि नियम के खिलाफ जाकर उसने शराब पीने की जुर्रत की थी। माँ का दुलार और उसकी सख्ती से मिलकर हमारे सनातनी समाज का ‘मदर्स डे’ मनता है। बाजार ने ‘मदर्स डे’ पर अपना कारोबार खड़ा कर लिया है लेकिन आज भी सैकड़ों मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार हैं जिनकेे लिए भगवान से पहले माँ है। ये परिवार एक दिन का ‘मदर्स डे’ नहीं मनाते हैं, इनके लिए हर पल छीन ‘मदर्स डे’ होता है। मैं ऐेसे कई अनुभव का साक्षी हूँ। एक बड़े उत्सव के आयोजन में एक बड़े संपादक को आमंत्रित किया और ऐनवक्त में उनकी ना हो गई। दुख हुआ और जब कारण पता चला कि माँ और पिता की तबीयत के चलते वो शामिल नहीं हो पा रहे हैं तो दुख कपूर की तरह उड़ गया। यहाँ एक बार फिर श्रवण कुमार याद आ गए। ऐसे भारतीय समाज में ‘मदर्स डे’, ‘फादर्स डे’ के बहाने बाजार की घुसपैठ आतंकित करता है। डराता है कि हमारे बच्चे कभी श्रवण कुमार को जान पाएंगे कि नहीं?

बाजार का अपना चरित्र है और उसने देखा कि भारतीय चरित्र की बुनियाद को इस नकली दिनों के बहाने और कमजोर किया जा सकता है तो उसने साल में एकाध दर्जन ऐसे दिन खड़े कर दिए। हमेशा की तरह बाजार सज गया है। जिस माँ ने कभी स्कूल की देहरी तक नहीं पहुँच पायी, उसका औलाद उसे ‘आई लव यू ममा’ का लुभावना चमकदार महँगा कार्ड भेंट कर रहा है। माँ को समझ ही नहीं आता कि ये क्या है, उसका क्या करे? उसके लिए तो उपहार उसकी औलाद है जो कुछ पल के लिए उसकी गोद में लेट जाए और वह दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे तो हर पल माँ का हो जाता है। माँ समझ ही नहीं पा रही है कि ये ‘मदर्स डे’ होता क्या है? और औलाद के लिए माँ के पास वक्त नहीं, बाजार से खरीदे गए महँगे तोहफे हैं। हम कौन से समय में किस दुनिया मेंं खड़े हैं। कवियों ने शायरों ने माँ को ऐसा महिमामंडित किया कि बाप की औकात दिखा दी गई। क्या माँ और पिता के बिना हम अपनी दुनिया की कल्पना कर सकते हैं। ऐसे में मशहूर जावेद अख़्तर एक सभा में बेबाकी से इस पर तल्ख शब्दों में ऐतराज जाहिर करते हैं तो लगता कि वे ‘मदर्स डे’ की औकात दिखा रहे हैं। बाजार को उसकी औकात बता रहे हैं।

भारत के 130 करोड़ से अधिक नागरिकों में बमुश्किल एक करोड़ भी नहीं होंगे जिसकी औलाद के पास ‘मदर्स डे’ मनाने की औकात हो। यहाँ यह भी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि अपनी आर्थिक हैसियत को दरकिनार कर वह महँगा तोहफा इसलिए खरीद रहा है कि चार लोग क्या कहेंगे? माँ के पैरों में जन्नत तलाश करने वाला बच्चा अपनी माँ से कब बड़ा हो गया? माँ की कमजोर होती आँख के लिए एक सुंदर सा चश्मा बनाने के लिए औलाद के पास पैसे नहीं है, पैसे नहीं है माँ की दवा लाने के लिए और पैसे हैं तो वक्त नहीं माँ के लिए। यह भी आज के ‘मदर्स डे’ का सबसे बड़ा सच है। बाजार ने बच्चों को निर्मम बना दिया है। 

अभी एक तस्वीर मेरी नजरों से गुजरी जिसमें एक माँ अपने बच्चे को कमर में आँचल से लपेट कर किसी धन्ना सेठ के बच्चे की शादी में लाईट लेकर चली जा रही है। डीजे में नाचते, खुशियों में रुपये लुटाते इस समाज की नजर ना तो उस माँ पर गई और ना ही उस नन्हें बच्चे पर। माँ कभी गरीब नहीं होती है, यह तस्वीर इस बात की तस्दीक करती है। माँ अमीर होती है अपने संकल्प से, अपने मातृत्व से और वो अपनी औलाद को दुनिया का सबसे कामयाब आदमी बनते देखना चाहती है, भले ही उसे आधा पेट खाना मिले। शरीर पर चिथड़े की सूरत में बदलती साड़ी सही मायने में माँ को परिभाषित करती है। बाजार जिस दिन ये तमीज हमें सिखा जाएगा फिर किसी ‘मदर्स डे’ की जरूरत नहीं होगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

# ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन

  भाषा की मर्यादा का चीरहरण- संजय मेहता भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की। परम्परागत पत्रकारिता ...