मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से स्त्री समाज को मिलेगा अधिकार और सम्मान



















हर जनम मोहे बिटिया ही कीजो

प्रो. मनोज कुमार

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ यह मात्र श£ोक नहीं है बल्कि सनातनी परंपरा इस बात की साक्षी है कि हर युग में मातृशक्ति को पूरा सम्मान और अधिकार दिया जाता रहा है. जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, उसे बराबरी का अधिकार दिया जाता है, वह घर, समाज और राष्ट्र पुष्पित-पल्लवित होता है. भारत वर्ष में हर युग में स्त्री को अधिकार और सम्मान दिया जाता रहा है किन्तु बीते दशकों में स्त्रियों को अधिकार और सम्मान के नाम पर छलावा किया जाता रहा है. योजना बनाने की घोषणा होती रही है और इसे कभी अमलीजामा नहीं पहनाया गया. स्त्री स्वयं को ठगा सा महसूस करती रही है. हालात अब बदलने लगे हैं. डेढ़ दशक में महिला कल्याण के लिए बातों और वायदों से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर उन्हें अधिकार और सम्मान दिया जा रहा है. हालिया सत्ता में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का केन्द्र सरकार का फैसला उन्हीं में से एक है. स्त्री सशक्तिकरण को इस फैसले से वास्तविक शक्ति मिलेगी क्योंकि सत्ता में भागीदारी से ही उसकी ताकत में इजाफा होता है. महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदृष्टि की सोच का परिणाम है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि केन्द्र सरकार के इस फैसले के इतर कोई भी राजनीतिक दल जाएगा क्योंकि यह सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय का संदेश देता है. इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि इस नए कानून को सर्वसम्म्ति से पारित किये जाने की पूरी संभावना है, बावजूद इसके कि किसी भी प्रकार की और देरी दुर्भाग्यपूर्ण होगी और भारत की महिलाओं के साथ घोर अन्याय होगा। महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव स्वतंत्र भारत का यह क्रांतिकारी पहल है. इससे ना केवल महिलाओं को अधिकार प्राप्त होगा बल्कि देश की राजनीति का आचार-व्यवहार भी बदलेगा. इस पहल की सबसे बड़ी बात यह है कि समाज अब तक स्त्रियों को लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा का दर्जा देकर उन्हें महिमामंडित करता रहा है लेकिन अब वास्तव में यह स्वरूप व्यवहार में देखने को मिलेगा. यह बिल दोनों सदनों से पास होकर कानूनी रूप ले लेता है, तो यह दशकों में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव होगा, जो 2029 में देश को 273 महिला सांसद देगा. 

महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव भारत का भविष्य तय करने वाला है. प्रतिदिन महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार, उनके साथ अन्याय और आर्थिक रूप से निर्बल बनाने की जो कुचक्र जारी है, उसे तोडऩे में यह सहायक होगा. इस प्रस्ताव के पूर्व समूची राजनीति दलों में महिलाओं की सहभागिता का आंकड़ा जाँचें तो स्थिति शर्मनाक दिखती है. पुरुष प्रधान समाज की जो धारणा है, वह पुष्ट करती है. यही नहीं, महिला सहभागिता का अवसर भी तभी दिया गया जब लगा कि उनकी सहभागिता से ही उनके राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्य पूरे होंगे. पिछले डेढ़ दशक की विवेचना करें तो समाज इस बात के लिए राहत महसूस कर सकता है कि आहिस्ता-आहिस्ता स्त्रियों के पक्ष में अनेक ठोस कदम उठाये गए हैं. सबसे उल्लेखनीय पक्ष तो यही है कि मोदी सरकार का यह फैसला संप्रदाय या धर्म विशेष को लक्ष्य करके नहीं बल्कि भारतीय स्त्री समाज के पक्ष में लिया गया है. तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त किया गया तो यह भारतीय स्त्री समाज के हक में ही है. आदिवासाी, दलित और पिछड़े वर्ग की स्त्रियों को सर्वशक्तिशाली पद पर निर्विकार भाव से बिठाया गया तो यह स्त्री सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण के रूप में आप देख सकते हैं. देश की राष्ट्रपति पद पर विदुषी मूर्मु का चयन किया गया. चाहते तो किसी सामान्य वर्ग की कुलीन स्त्री को अवसर दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं कर संदेश दिया गया कि सबका साथ, सबका विकास में समाज के अंतिम छोर पर बैठे प्रतिभावान स्त्री को अवसर देना है. मोदी जी उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जो उनके शीर्ष नेतृत्व ने आरंभ किया था. स्मरण रहे कि मध्यप्रदेश के इतिहास में उमा भारती को मुख्यमंत्री निर्वाचित कर इस परंपराका श्रीगणेश किया गया. इसके पहले ऐसा साहस किसी सत्ताधारी दल ने नहीं किया. दो अन्य राज्यों में भी भाजपा ने महिला मुख्यमंत्री बनाने का कार्य किया. अन्य प्रभावशाली पदों पर महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाकर उन्हें सम्मान दिया गया और हालिया प्रस्ताव इस सोच को विस्तार देता है.

ताजा प्रस्ताव के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 2029 में लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव महिलाओं के लिए पूरे आरक्षण के साथ कराए जाते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत और जीवंत बनेगा। उनका मानना है कि महिलाएं आज कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही हैं, इसलिए विधायी संस्थाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना बेहद जरूरी है। यहाँ यह भी जान लेना उचित होगा कि महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव कैसे लागू किया जाएगा. महिला आरक्षण विधेयक जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम  संबोधित किया गया है, जिसके पारित होने से संसद में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत सुनिश्चित हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1996 में महिला आरक्षण विधेयक की जाँच करने वाली संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि ओबीसी के लिए आरक्षण की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए. ज्ञात रहे कि 19 सितंबर 2023 को मोदी सरकार ने विशेष सत्र में इस विधेयक को 128वें संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2023 के रूप में पेश किया था। अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा से पारित होने के बाद दोबारा राज्यसभा में जाएगा.

इस अधिनियम के पारित होने पश्चात लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटें 131 में से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इन 43 सीटों को सदन में महिलाओं के लिए आरक्षित कुल सीटों के एक हिस्से के रूप में गिना जाएगा. महिलाओं के लिए आरक्षित 181 सीटों में से 138 ऐसी होंगी जिन पर किसी भी जाति की महिला को उम्मीदवार बनाया जा सकेगा यानी इन सीटों पर उम्मीदवार पुरुष नहीं हो सकते. 

महिलाओंं को सत्ता में अधिकार देने के लिए वर्तमान व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के स्थान पर परिसीमन कर सीटें बढ़ायी जा रही हैं जिसमें भी सरकार की मानें तो रोटेशन पद्धति लागू होगी. वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं. नए प्रस्ताव के तहत 50 प्रतिशत वृद्धि के बाद यह संख्या बढक़र लगभग 816 हो जाएगी. इन 816 सीटों में से एक तिहाई यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. सबसे खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए अब अगली जनगणना का इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. साल 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह से इसी नए बिल और नई परिसीमन व्यवस्था के आधार पर लड़ा जाएगा.

मोदी सरकार की महिलाओं हक में लिये गए फैसले ऐतिहासिक रूप में याद किए जाएंगे. अपने डेढ़ दशक के कार्यकाल में महिलाओं की शक्ति में ही इजाफा नहीं हुआ अपितु उन्हें आर्थिक, राजनीतिक रूप से भी बराबरी का दर्जा हासिल हुआ है. कल तक जो बिटिया अपने जन्म पर निराश होकर कहती थी-‘अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो’, आज वही बिटिया अपने जन्म पर इतरा रही है और कह रही है कि ‘मोहे हर जनम बिटिया ही कीजो’. स्त्री सम्मान भारतीय समाज का शाश्वत सत्य है और घर, परिवार, समाज और राष्ट में जिन्होंने स्त्री सम्मान को दोयम दर्जा दिया, उसे भी समाज में सम्मान नहीं मिला है. स्त्री अधिकार और सम्मान का यह निर्णय किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, यह भारत वर्ष का है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 


शनिवार, 14 मार्च 2026

जिम्मेदार नागरिक बनने का वक्त

 












प्रो. मनोज कुमार

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है.  यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है. इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है. भले ही अभी हाहाकार ना मचा हो लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसा ही बन रहा है. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. यह समय नीति-नियमों और सरकार के व्यवहार की समीक्षा का नहीं है बल्कि हम सब के एक हो जाने का है. 

इस संदर्भ में मुझे अपने एक वरिष्ठ का कथन याद आता है जिसमें वे कहते हैं-सब सुविधा हो और आप कार्य का प्रदर्शन कर रहे हैं, यह बड़ी बात नहीं है बल्कि असुविधा में बेहतर कार्य का प्रदर्शन करना आपके कौशल को दिखाता है. लगभग यही स्थिति हम सबके समक्ष है.  जब तक ईंधन की आपूर्ति सामान्य थी और युद्ध जैसी कोई स्थिति निर्मित नहीं थी, तब हम राष्ट्रभक्त थे लेकिन अब जब संकट व्यक्ति नहीं, समूचे समाज पर है तो अब हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए ना केवल खुद आना ही नहीं होगा बल्कि अन्य को प्रेरित भी करना होगा ताकि जल्द ही स्थिति सामान्य हो सके. युद्ध के पहले भी हम कोविड के संकट से जूझ चुके हैं और इस बड़े संकट महामारी से खुद को निकाल पाने में कामयाब रहे. कोविड हो या युद्ध, यह संकटकालीन स्थितियां हमें राष्ट्र के प्रति निहित जिम्मेदारी को पूर्ण करने के लिए प्रेरित करती हैं. हमारी एक बड़ी कमजोरी यह है कि हम जल्दी से ना केवल पैनिक हो जाते हैं बल्कि स्टोर करने की मानसिकता के दास बन जाते हैं. कोविड के समय भी हमने ऐसा ही किया था और अनेक जरूरतमंदों को हमारी इस मानसिकता से नुकसान भी हुआ था. वर्तमान में भी यही देखने को आ रहा है लोग गैस टंकी स्टोर करने में तुल गए हैं. किसी उपभोक्ता के घर में चार और पाँच गैस सिलेंडर है तो वह सबको भरकर रख लेना चाहता है जबकि जिनके घरों में जरूरत के लायक एक सिलेंडर है, उसे पहले मिलना चाहिए. जब हम वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करते हैं तो इस पर अमल करने का वक्त आता है तो हम क्यों नहीं करते हैं? यह यक्ष प्रश्र ऐसे संकटकालीन स्थिति में हमारे समक्ष खड़ा होता है.

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है. बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है.

सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है. साथ ही जरूरत पडऩे पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है. कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है. सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है. समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलवक्त संकट बहुत भयावह नहीं है लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है. बहुत जल्द ही हम तनाव मुक्त होंगे लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है. एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

रविवार, 8 मार्च 2026

पीपी का होना, इस संस्था का होना है

 





















    बार बार फोन की तरफ ध्यान जा रहा है, लगता है कि दूसरी तरफ से आवाज आएगी... मनोज भाई, आप पहुंचे नहीं। जल्दी आइए, और हां, मैं केके को बोल देता हूं, गाड़ी भिजवा देगा। अब ये आवाज हवा में गुम हो गया है। कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और अपने जाने के पहले उन्होंने 8 मार्च को विश्व महिला दिवस पर पीआरएसआई के प्रोग्राम की रूपरेखा बना गए थे। उनके नहीं रहने के दूसरे दिन ही, यह आयोजन हुआ। हालांकि इस आयोजन में वो बात नहीं थी लेकिन उनकी प्लानिंग के हिसाब से ठीक ठाक हो गया था। इसके बाद साल दर साल 

पीआरएसआई के प्रोग्राम की आंच धीमी पड़ती गई। पिछले साल भी जनसंपर्क दिवस के साथ इसकी भी औपचारिकता पूरी कर दी गई थी, इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा।

सच तो यह है कि पीपी सरीखा कोई दूसरा हो नहीं सकता। पीआरएसआई को उनके होते हुए जो ऊंचाई मिली थी और हरेक को जोड़ कर रखते थे। उनकी अगुवाई में होने वाले आयोजन की प्रतीक्षा केवल स्टूडेंट्स को ही नहीं, पत्रकारिता जगत को भी रहती थी। विश्व महिला दिवस एवं जनसंपर्क दिवस के इतर भी कभी होली दीवाली मिलन, अन्य अवसर तलाश कर किया करते थे।

कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और हमेशा की तरह स्टूडेंट्स ने आयोजन कर पीपी का स्मरण किया। यहां भी पीआरएसआई नदारद था।किसी संस्था का आरंभ किया जाना आसान है लेकिन उसे ऊंचाई देना और उसकी निरंतरता बनाए रखने के लिए एक पीपी की जरूरत होती है। अब दूसरा पीपी कहां से लाएं? अच्छा होगा कि नया कुछ ना कर सकें तो उनकी खींची लाइन को ही कायम रख लें। पीआरएसआई सच में पीपी के लिए संस्था नहीं, सपना थी, वे इसमें सब कुछ झोंक देते थे। इस बात का साक्षी पूरा समाज है। काश, पीआरएसआई उनके बनाए रास्ते पर चल कर कुछ नया गढ़ ले, उम्मीद कम ही है।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

मध्यप्रदेश में खुलते स्त्रियों के लिए बंद कपाट

 














विश्व महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष

प्रो. मनोज कुमार 

        समाज में स्त्रियों के लिए बंद कपाट मध्यप्रदेश में खुल गए हैं. स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में बीते वर्षों में जो कोशिशें हुई हैं, वह पूरे देश के लिए रोल मॉडल साबित हो रहा है. स्त्री समाज की नींव मजबूत करने के लिए जरूरी होता है कि उन्हें शिक्षित किया जाए और आर्थिक रूप से उन्हें सशक्त बनाया जाए. महिला सशक्तीकरण, सुरक्षा, सम्मान और समग्र विकास के अद्वितीय कोशिशों ने महिला समाज को उजास से भर दिया है. शहरी इलाके होंं या गांव-पंचायत, सभी जगहों पर महिलाओं की बुलंद आवाज सुनाई देती है.  राज्य के कोने-कोने में स्व-सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को उनके हुनर के अनुरूप अवसर मिल रहा है. साथ में केन्द सरकार द्वारा महिला कल्याण के लिए चलायी जा रही योजनाओं ने महिलाओं को और भी संबल दिया है. इस बार विश्व महिला दिवस पर मध्यप्रदेश एक नया अध्याय लिखने जा रहा है. केन्द सरकार द्वारा लागू उज्ज्वला योजना, जनधन खाता, मातृत्व वंदना योजना और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे कार्यक्रमों ने करोड़ों बेटियों, बहनों के जीवन को नई दिशा दी है वहीं मध्यप्रदेश में महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हो रहे हैं। 

महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना सबसे क्रांतिकारी पहलों में से एक रही है। पहली नजर में लगता कहा जाता है कि महिला वोटबैंक को मजबूत करने के लिए रुपये बांटने वाली स्कीम चलायी जा रही है लेकिन जतीनी हकीकत जाँचने जाएं तो पता चलेगा कि इन रुपयो से महिला सशक्तिकरण के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं. करोड़ों रुपये महिलाओं के खातों में पारदर्शी डिजिटल अंतरण के माध्यम से प्रदान किए गए, जिसने मध्यप्रदेश की महिलाओं को आत्मनिर्भरता की नई दिशा दी है। इस राशि से महिलाओं ने स्व-रोजगार की शुरूआत की है. पहले इस राशि से किराये की सिलाई मशीन ली गई और बाद में अपने मुनाफा से स्वयं की सिलाई मशीन खरीद ली गई. पशु पालन से लेकर किराने की दुकान जैसे अनेक कोशिशों में महिलायें सफल हुई हेैं. इस आत्मनिर्भरता के चलते आहिस्ता-आहिस्ता महिलायें स्वयं में सक्षम होकर योजना से स्वयं ही बाहर होकर शेष जरूरतमंद महिलाओं को अवसर दे रही हैं. सरकार द्वारा जारी आंकड़ें इस बात की पुष्टि करते हैं. 

इसी तरह सात महिलाओं ने अपना समूह तैयार कर एक नए किस्म की कोशिश को अंजाम दिया है. इसे स्व-सहायता समूह कहा गया. स्व-सहायता का सामान्य रूप से अर्थ समझ सकते हैं स्वयं की सहायता करना. स्व-सहायता समूह ने सशक्तिकरण के नए आयाम छुए हैं. कल तो जिन कामों पर पुरुषों का एकाधिकार था, आज उनमें महिलाएं पारंगत हैं. बिजली ठीक करने से लेकर बैंक खाता खुलवाने और उसका परिचालन करने जैसे अनेक कार्य महिलाएं कर रही हैं. मोहन सरकार ने अनेक कार्य स्व-सहायता समूह को सौंप दिया है जो कभी पहले निजी संस्थाएं करती थीं. मोहन सरकार की इस पहल से जैसे पूरा परिदृश्य बदल रहा है. मध्यान्ह भोजन से लेकर गणवेश बनाने का कार्य बड़े पैमाने पर स्व-सहायता समूह की महिलाएं कर रही हैं. प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के माध्यम से आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई है।

जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में पीएम-जनमन तथा धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्थान अभियान के माध्यम से सैकड़ों नए आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन प्रारंभ किया गया है। इससे जनजातीय महिलाओं और बच्चों को पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ उनके गांवों तक उपलब्ध कराई गई हैं। हजारों भवनों के निर्माण और उन्नयन से आंगनवाड़ी व्यवस्था अधिक सशक्त और सुरक्षित बनी है। पोषण अभियान के अंतर्गत लाखों बच्चों के विकास की निगरानी के लिए अत्याधुनिक उपकरण प्रदान किए गए हैं। फेस-मैच आधारित सत्यापन ने हितग्राहियों को पारदर्शी और समयबद्ध लाभ दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों ने पोषण और पर्यावरण—दोनों आयामों को जोडक़र जनभागीदारी का नया मॉडल प्रस्तुत किया है।

मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है। मिशन शक्ति के अंतर्गत वन स्टॉप सेंटरों, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पिंक ड्राइविंग लाइसेंस, जेंडर चैंपियन पहल और सशक्त वाहिनी कार्यक्रमों ने महिलाओं और बालिकाओं के सशक्तीकरण को और मजबूती प्रदान की है। बीते साल मेंं 20,332 महिलाओं को त्वरित राहत और परामर्श उपलब्ध कराया। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत नवजात बालिकाओं का स्वागत, पूजा-अर्चना और व्यापक पौधारोपण ने समाज में बेटियों के सम्मान की संस्कृति को मजबूत किया है। पिंक ड्राइविंग लाइसेंस और जेंडर चैंपियंस जैसी पहलें बालिकाओं के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को नई उड़ान दे रही हैं। राज्य एवं जिला स्तर के हब फॉर एम्पावरमेंट ऑफ वुमन ने जनजागरूकता की दृष्टि से अभूतपूर्व कार्य किया है। 100 दिवसीय अभियान, घरेलू हिंसा निरोधक कार्यक्रम, बाल विवाह मुक्ति प्रतिज्ञा, क्कष्ट-क्कहृष्ठञ्ज अधिनियम जागरूकता अभियान, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण और आत्मरक्षा कार्यक्रमों ने समाज में व्यापक संवेदनशीलता विकसित की है। वर्ष साल में 1.47 लाख से अधिक गतिविधियाँ आयोजित हुईं और लाखों नागरिकों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि मध्यप्रदेश, महिला सम्मान और सुरक्षा के विषय में समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

मध्यप्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि यहां से आरंभ की गई योजनाओं को देश के अन्य प्रदेश वैसा ही अपना लेते हैं. मातृशक्ति को लेकर मध्यप्रदेश हमेशा से संवेदनशील रहा है. महिलाओं के आमूलचूल परिवर्तन की साक्षी बनता मध्यप्रदेश को दिशा देने में लोकमाता अहिल्या देवी जैसी शासक, अवंतिबाई, रानी कमलापति जैसी साहसी और सुभदा कुमारी चौहान जैसी विदुषी महिलाओं का मार्गदर्शन हेै. मध्यप्रदेश हमेशा से स्त्री शक्ति का सम्मान करता रहा है और इस विश्व महिला दिवस पर हम सब स्त्री शक्ति का नमन करते हैं, अभिनंदन करते हैं.

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

मेरी आवाज़ ही पहचान है

 












विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी 

प्रो. मनोज कुमार

    सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा है. भारत की आजादी की ख़बर हो या दैनंदिनी गतिविधियों की पुख्ता और सही जानकारी रेडियो से ही मिल पाती है. एक समय हुआ करता था जब रेडियो का मतलब आकाशवाणी हुआ करता था लेकिन अब शहरी इलाकों में एफएम और गाँव-खेड़े के लिए सामुदायिक रेडियो प्रचलन में है. रेडियो एक नए अनुभव की तरह हमारे साथ-साथ चल रहा है. किसी समय रेडियो के लिए लायसेंस लेना होता था तो आज टेक्रालॉजी ने सारे मायने बदल दिए हैं और हथेलियों पर बंद मोबाइल फोन में आप अपना पसंदीदा रेडियो प्रोग्राम, गीत-संगीत सुन सकते हैं. हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस सेलिब्रेट किया जाता है तो इसके पीछे भी ठोस कारण है और वह है कि इस दिन 13 फरवरी, 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के रेडियो लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोत्कृष्ट मंच मानता  है. पहली रेडियो सेवा 23 फरवरी 1920 को और पहली खेल रेडियो रिपोर्ट 11 अप्रैल 1921 को प्रसारित हुई थी तब से रेडियो युवा और गतिशील बना हुआ है। भारत में ऑल इंडिया रेडियो का नाम एकजाई कर आकाशवाणी कर दिया गया है.

अमीन सयानी और रेडियो सीलोन एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. दुनिया के सबसे पुराने रेडियो प्रसारकों में से एक, रेडियो सीलोन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिए. ऐसे समय में जब रेडियो एक नई चीज थी और टीवी द्वारा दक्षिण एशिया के मीडिया परिदृश्य को बदलने से दशकों पहले, रेडियो सीलोन ने आधिकारिक तौर पर 16 दिसंबर, 1925 से प्रसारण शुरू किया. यह एशिया का पहला रेडियो प्रसारक था. भारत में निजी रेडियो प्रसारण 1927 में शुरू हुआ, जबकि ऑल इंडिया रेडियो ने 1936 में परिचालन शुरू किया. नीदरलैंड 1919 में सार्वजनिक प्रसारण शुरू करने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1920 में अमेरिका ने इसका अनुसरण किया.

आमतौर पर बोलचाल में हम एक संबोधन रेडियो कह देते हैं लेकिन रेडियो और ट्रांजिस्टर में बुनियादी फर्क है. रेडियो एक स्थूल उपकरण है जबकि ट्रांजिस्टर मोबाइल की तरह चलायमान. 1947 में डब्ल्यू. शॉकली के नेतृत्व में बेल लेबोरेटरीज (यूएसए) में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने वाल्व वाले रेडियो का अंत कर दिया।. 1954 में, अमेरिकी कंपनी रीजेंसी ने पहला पूरी तरह से ट्रांजिस्टर वाला रेडियो बनाया और बेचा. हालाँकि अब इसे पीसी या स्मार्टफोन से भी सुना जा सकता है, लेकिन फर्नीचर के रूप में रेडियो का आकर्षण आज भी बरकरार है और समय के साथ इसमें ऐसी तकनीक और कार्यक्षमता जुड़ती गई है जो पहले मौजूद नहीं थी. 

रेडियो तकनीक की चर्चा करें तो अब हम विजुअल रेडियो की दुनिया में पहुँच गए हैं. कानों सुनी के साथ अब आँखों देखी रेडियो का जमाना भी आ गया है, इसे विजुअल रेडियो का नाम दिया गया है. विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है. इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं. मन की बात मूलत: रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं.

सडक़ से सरकार तक रेडियो की उपयोगिता बनी हुई है. खेत में जाता किसान, मजदूरी के लिए जाता मजदूर अपने कंधे पर ट्रांजिस्टर सेट लटका कर सुनते हुए चलता हुआ कहीं भी दिख जाता है. अब नए जमाने में कार में रेडियो ट्यून कर लेते हैं या मोबाइल पर भी ट्यून कर पसंदीदा गीत सुन सकते हैं. इस दौर में सामुदायिक रेडियो का आगमन हुआ और यह दूर-दराज इलाके जहाँ संचार की सुविधा नहीं है, उनके लिए वरदान साबित हुआ. औसतन पंद्रह किलोमीटर रेंज में प्रसारित होने वाले सामुदायिक रेडियो समुदाय विशेष के लिए होता है. खास बात यह है कि इस रेडियो का संचालन भी समुदाय विशेष के लिए किया जाता है. महात्मा गांधी से लेकर इंदिरा गांधी और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो के प्रभाव को समझा और लोगों से सीधा संवाद करने के लिए उसे चुना. ‘मन की बात’  कार्यक्रम से ना केवल आकाशवाणी को आर्थिक लाभ हुआ अपितु देश भर की छिपी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिला. कम खर्च, सीमित संसाधन लेकिन एक सौ तीस करोड़ लोगों से संवाद का यह अनूठा प्रयास प्रभावकारी हुआ है. 

मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की बात करना सुखद लगता है. जनजातीय विभाग ने आदिवासी बहुल इलाकों में रेडियो प्रसारण के जरिए जनजातीय समुदाय में जागृति लाने एवं मुख्यधारा से जोडऩे का अथक प्रयास किया. वर्ष 2010 में कम्युनिटी रेडियो स्थापना की कार्यवाही आरंभ की गई और 2012 आते-आते आठ कम्युनिटी रेडियो आदिवासी अंचलों में बजने लगे थे. नाम दिया गया ‘रेडियो वन्या’. ‘रेडियो वन्या’ के स्टेट कॉडिनेटर के नाते अनुभव का एक नया संसार रचने का अवसर मिला. ये सभी रेडियो स्टेशन आदिवासी बोलियों में प्रसारित हो रहे थे. चुनौती थी कि बोलियों में प्रामाणिकता एवं शुद्वता की थी सो आदिवासी बोलियों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर हिन्दी में मेरे बनायी गई स्क्रिप्ट को वे बोलियों में बदल देते थे. इस तरह सरकार की अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनजातीय समुदाय को मिलने लगा. इसके साथ ही तब के संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी के प्रयासों से देश का एकमात्र स्वाधीनता संग्राम पर एकाग्र कम्युनिटी रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ का प्रसारण होने लगा. इस अनुभव के साथ मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कम्युनिटी रेडियो स्थापना के लिए पहले सलाहकार के रूप में जिम्मेदारी दी गई. तत्कालीन कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश के साथ ‘रेडियो कर्मवीर’ का प्रसारण आरंभ हो गया. इस वर्ष पद्यश्री से सम्मानित डॉ. रामामूर्ति भी ‘रेडियो कर्मवीर’ की सलाह ली गई थी. इन अनुभवों को एकाग्र कर कम्युनिटी रेडियो पर हिन्दी में पहली किताब कही जा सकती है. कहा जा सकता है कि कम्युनिटी रेडियो के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की अलग ही पहचान है. आदिवासी बोलियों में रेडियो प्रसारण वाला मध्यप्रदेश संभवत: अपनी तरह का इकलौता प्रदेश है.

रेडियो का असीमित और स्थायी प्रभाव आज भी बना हुआ है या यों कह सकते हैं कि समय के साथ रेडियो की उपयोगिता में श्रीवृद्धि हुई है. रजतपट और रेडियो का चोली-दामन का साथ रहा है. अनेक नई-पुरानी फिल्मों में रेडियो को प्रभावी माध्यम के रूप में देखा और समझा गया है. हालिया फिल्म ‘मेरी सुलु’ ने जता दिया कि रेडियो जॉकी के लिए खांटी प्रोफेशनल्स होना जरूरी नहीं, बस इस मीडिया के लिए जुनून और जज्बा चाहिए. कहना पड़ेगा मन का रेडियो बजने दे जरा... (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से स्त्री समाज को मिलेगा अधिकार और सम्मान

हर जनम मोहे बिटिया ही कीजो प्रो. मनोज कुमार ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ यह मात्र श£ोक नहीं है बल्कि सनातनी परंपरा इस बात...