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                                                                                            शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक राष्ट्र-कवि पंडित                                                                                                      माखनलाल   चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के                                                                                                 शताब्दी वर्ष पर

दादा का ‘पुष्प’ और देश की ‘अभिलाषा’

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मनोज कुमार भारत की आजादी के 75वें वर्ष का अमृत-महोत्सव आरंभ हो चुका है। एक वर्ष पश्चात जब हम आजादी का अमृत-पान कर रहे होंगे तब इस पूरी अवधि में स्वाधीनता संग्राम के उन नायकों को तलाश करना आवश्यक हो जाता है। यह संयोग है कि सम्पूर्ण स्वाधीनता संग्राम में अपनी कलम से अलग जगाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ अपने रचे जाने का शताब्दी वर्ष मना रही है। एक वर्ष बाद इस कविता के गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। हिन्दी साहित्य के पन्नों में अनेक कविताएं ऐसी हैं जिन्हें आप कालजयी रचना की श्रेणी में रखते हैं लेकिन पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ उन सबसे इतर है। यह इसलिए कि पहला तो इस कविता की रचना सामान्य परिस्थितियों में कवि की भावनाओं का लेखन ना होकर जेल की काल-कोठरी में हुआ था। दादा माखनलाल जी को यह काल-कोठरी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने की सजा के तौर पर मिली थी। आजादी के दीवानों को भला कौन कैद रख सकता है, इस बात की गवाही उनकी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की अभिलाषा देती है। शरीर से वे जरूर अंग्रेजों के बंधक थे लेकिन मन में देश-प्रेम के भा
मनोज कुमार ब्रेकिंग न्यूज के दौर में हिन्दी के चलन पर ब्रेक लग गया है. आप हिन्दी के हिमायती हों और हिन्दी को प्रतिष्ठापित करने के लिए हिन्दी को अलंकृत करते रहें, उसमें विशेषण लगाकर हिन्दी को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बताने की भरसक प्रयत्न करें लेकिन सच है कि नकली अंग्रेजियत में डूबे हिन्दी समाचार चैनलों ने हिन्दी को हाशिये पर ला खड़ा किया है. हिन्दी के समाचारों में अंग्रेजी शब्दों की भरमार ने दर्शकों को भरमा कर रख दिया है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि पत्रकारिता की राह से गुजरते हुए समाचार चैनल मीडिया में बदल गए हैं. संचार या जनसंचार शब्द का उपयोग अनुचित प्रतीत होता है तो विकल्प के तौर पर अंग्रेजी का मीठा सा शब्द मीडिया तलाश लिया गया है. अब मीडिया का हिन्दी भाव क्या होता है, इस पर चर्चा कभी लेकिन जब परिचय अंग्रेजी के मीडिया शब्द से होगा तो हिन्दीकी पूछ-परख कौन करेगा. हालांकि पत्रकारिता को नेपथ्य में ले जाने में अखबार और पत्रिकाओं की भी भूमिका कमतर नहीं है. चैनलों की नकल करते हुए अखबारों ने खबरों और परिशिष्ट के शीर्षक भी अंग्रेजी शब्दों से भर दिए हैं. शहर से इन अखबारों को मोहब्बत नहीं, सिटी उन
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समागम अगस्त 2020

कभी पेट में चिकोटी तो कभी कान उमेठते मास्साब, आप हैं तभी हम हैं मनोज कुमार कहते हैं कि संकट में ही व्यक्ति की पहचान होती है और आप इस बात पर यकीन करते हैं तो आपको इस बात पर भी यकिन करना होगा कि हर बुरे समय में, हर बुरे दौर में शिक्षक ही समाज को रोशनी देने वाला होता है. भारतीय समाज में आज भी शिक्षक का अर्थ मास्साब, गुरूजी से लगाया जाता है. ये वो शिल्पकार हैं जो अगढ़ मिट्टी को आकार देते हैं. उन्हें उसका महत्व बताते हैं और छोटे-छोटे सबक से उनका जीवन संवारते हैं. मास्साब कहें, गुरूजी या कहें शिक्षक तो ये वो शिल्पकार हैं जो स्कूल में अपना कर्तव्य पूरा करते हैं. शिक्षा की सारी धुरी इन्हीं के आसपास घूमती है. शिक्षक की क्या भूमिका होती है, यह कोरोना के महासंकट के दौर में देखने को मिला. एकाध मिसाल तो इसका उल्लेख किया जाए. यहां तो असंख्य मिसाल है जिसका उल्लेख किसी छोटे से लेख में करना संभव नहीं होगा. अखबारों में छप रही खबरों से पता चलता है कि कोरोना की बीमारी की चिंता किए बिना कहीं शिक्षक मोहल्ले में कक्षा लगाकर पढ़ा रहे हैं तो कहीं रेडियो के माध्यम से बच्चों को अक्षर ज्ञान करा रहे हैं. शिक्षा से बच्चे वंचित ना रह जाए, यह शिक्षकों का मिशन है और वे इस बात से तसल्ली पा रहे हैं कि जो कुछ संभव हो रहा है, वह करने की कोशिश कर रहे हैं. आज शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ. सर्वपल्लीराधाकृष्णन का स्मरण करना हमारा दायित्व है तो जो लोग डॉ. राधाकृष्णन के रास्ते पर चलकर समाज में शिक्षा का उजियारा फैला रहे हैं, उन्हें याद करना भी जरूरी हो जाता है. मैं-आप सब कभी अपने छोटे बच्चे की तरह स्कूल जाया करते थे. आज हम किसी बच्चे के पालक हैं तब कोई हमारा पालक हुआ करते थे. तब और अब में फर्क इतना है कि मास्साब, गुरूजी के हाथों में अनुशासन का डंडा हुआ करता था और आज कानून का डंडा है जो अनुशासन पर भारी पड़ रहा है. सबक याद ना रख पाने के कारण आप और हमारे पेट में मास्साब जो चिकोटी काटते थे, उसका दर्द आज भी कहीं उठ जाता है. इस दर्द में तकलीफ नहीं, मिठास है कि मास्साब यह सजा नहीं देते तो हम सबक याद भी नहीं कर पाते. कोई डॉक्टर बन गया, कोई ऑफिसर बन गया, कोई पत्रकार लेखक बना तो किसी ने राजनीति की राह पकड़ी और कामयाब हुए तो मास्साब की वजह से. ये वो मनीषी लोग थे जिन्हें परिवार चलाने लायक तब पेटभर वेतन भी नसीब नहीं हुआ करता था. घर बदहाली में होता था लेकिन माथे पर कभी शिकन नहीं दिखी. समय के पाबंद मास्साब स्कूल में आते थे और जाने के भी पाबंद थे. समय नहीं, अपने काम के. बच्चे शिक्षित हों, होशियार बनें, भाषा की तमीज हो, आदि-इत्यादि उनकी चिंता होती थी. सबसे बड़ी चिंता बच्चों में नैतिक व्यवहार का विस्तार हो. मास्साब यह साहस इसलिए कर पाते थे कि बच्चों के माता-पिता यह मानकर चलते थे कि उनके बच्चे की कुटाई हुई है तो जरूर बच्चे ने गलती की होगी. बच्चे ने गलती से मास्साब की शिकायत की तो पिता शिकायत सुनने के बजाय उल्टे जूते से उसका समाधान करते थे. यही नहीं, पालकों को पता होता था कि मामूली तनख्वाह मेें मास्साब के परिवार का बसर नहीं होता है तो हर कोई अपने सामथ्र्य के अनुरूप साग-भागी, राशन दे आते थे. यह रिश्वत नहीं होता था बल्कि गुरु ऋण से उऋण होने का एक छोटा सी दान परम्परा थी. आज जब हम शिक्षक दिवस मनाने जा रहे हैं तो यह सबकुछ औपचारिक सा लगता है. शिक्षा और शिक्षक दोनों बदल गए हैं. हालांकि यह अधूरा सच है लेकिन सच तो है. सुरसा के मुंह की तरह निजी स्कूलों ने शिक्षा का घोर व्यवसायिकरण किया है. कोरोना काल में बच्चों से फीस लेने के लिए अदालत में मामले चल रहे हैं. यह एक जीवंत उदाहरण है. वहीं सरकारी स्कूल की हालत भी वैसी ही है लेकिन वहां कोई शोरगुल नहीं है. जो शिक्षक कोरोना में भी अपने विद्यार्थियों की चिंता में नवाचार करने में जुटे हुए हैं, उनमें ज्यादतर सरकारी स्कूल के मास्साब हैं. सर और मैडम तो ऑनलाईन क्लास में बिजी हैं. नवाचार का वक्त उनका स्कूल प्रबंधन देता ही नहीं है. इन हालात में शिक्षक दिवस महज औपचारिक लगता है. अखबारों में खबरें हैं कि सरकारी स्कूल के शिक्षकों को तीन-तीन महीने से तनख्वाह नहीं बट पायी है और हैरान परेशान शिक्षक जान देने में पर उतारू हैं. एक-दो ऐसी दुखद घटना की खबर भी पढऩे को मिली है. समाज को शिक्षा से रौशन करने वाले मास्साब के सामने आत्महत्या का विकल्प शेष हो तो शिक्षक दिवस औपचारिक सा ही हो जाता है. निजी स्कूलों में भी बहुतेरे शिक्षक ऐसे हैं जो नवाचार करना चाहते हैं और कुछेक कर भी रहे हैं लेकिन कानून का डंडा उन्हें रोकता है. स्टूडेंट को सजा नहीं दे सकते हैं क्योंकि शिकायत मिलने पर शिक्षक की नौकरी जा सकती है और कहीं तो सजा भी हो सकती है. स्कूल प्रबंधन झमेला नहीं चाहता है इसलिए वह पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर देता है और इससे आगे बढक़र वह स्टूडेंट को सेलिब्रेटी बनाने में आमादा रहता है. साल भर निजी स्कूलों में पढ़ाई से ज्यादा प्रोग्राम का आयोजन होता है. नाच-गाने से लेकर फैशन और जाने क्या-क्या. इसे स्टूडेंट की प्रतिभा संवारने की बात कही जाती है जबकि सरकारी स्कूल के मास्साब कहते हैं हम तो ठोंक-पीटकर छोड़ देते हैं, फिर वह कलेक्टर बने, या एसपी. लेकिन बनेगा जरूर. यह विश्वास मास्साब की पूंजी है. हाल में देश के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद अपने गुरु का सार्वजनिक रूप से चरणवंदन करते हुए दिखते हैं तो भरोसा हो जाता है कि अभी शिक्षा में पूरी तरह अंधियारा नहीं आया है. अभी शेष है बहुत कुछ. अभी उम्मीद बाकी है. एक राधाकृष्णन जैसी राष्ट्रपति के स्मरण में शिक्षक दिवस की परम्परा की नींव रखी गई तो एक दूसरे राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद शिक्षकों के लिए मिसाल हैं और चरितार्थ करते हैं जब कहा जाता है-‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पायं’। यह बात हम सब जानते हैं कि गोविंद से बड़े गुरु होते हैं और इस परम्परा को राष्ट्रपति महोदय निभाते हैं और लोगों को संदेश देते हैं. ये वो उदाहरण है जिससे हमारी भारतीय संस्कृति की श्रीवृद्धि होती है. हम अपने आपको दुनिया में इसलिए श्रेष्ठ नहीं कहते हैं कि हमने तरक्की कर ली बल्कि हम इसलिए श्रेष्ठ कहते हैं कि परम्परा को सहेजा है. संजोया है, उसे आगे बढ़ाया है. एक शिक्षक से ज्यादा सहिष्णु इस संसार में कोई नहीं होता है. उसका विद्यार्थी जब पाठ पढक़र श्रेष्ठ और समर्थ लोगों की पंक्ति में जब खड़ा होता है तो सबसे ज्यादा खुश, सबसे ज्यादा गौरवांवित एक शिक्षक होता है. जब राष्ट्रपति महोदय अपने शिक्षक के चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं तो शिक्षक के चेहरे पर जो सुकून और संतोष का भाव दिखता है, वही उस शिक्षक की कामयाबी है. शिक्षा का जिस तरह से निजीकरण और व्यवसायिक चरित्र सामने आ रहा है, वह दुखद है लेकिन उल्लेखित प्रसंग इस बात की आश्वस्ति हैं कि यह रोशनी मंद हो सकती है लेकिन बुझेगी नहीं, और जब समाज को जरूरत होगी तब पूरे ताब के साथ शिक्षाजगत रोशन हो जाएगा. सभी शिक्षकगणों को इस महिमा दिवस अर्थात शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं. आप हैं तो हम हैं.

संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व मनोज कुमार 15 अगस्त, 1947 से लेकर 2019 तक हम आजादी का पर्व उत्साहपूर्वक मनाते आए हैं. इन वर्षों में ऐसा भी नहीं है कि कोई संकट नहीं उपजा हो लेकिन साल 2020 में जहां इस वक्त हम खड़े हैं, वह संकट, संयम और स्वावलंबन का पर्व बन गया है. कोविड-19 ने ना केवल भारत वर्ष के समक्ष चुनौतियों और संकटों का पहाड़ खड़ा किया है बल्कि पूरी दुनिया की मानवता के समक्ष भयावह संकट के रूप में उपस्थित है. जानकारों का कहना है कि हर सौ साल में ऐसी त्रासदी दुनिया में एक बार कयामत बन कर टूटती है. भारत की आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर होगा जब हम इन चुनौतियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हैं. हालांकि बीते सालों में कई किस्म की महामारी के शिकार हमारी सोसायटी होती रही है लेकिन कोविड-19 पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. कोविड-19 का यह संकट हमारे लिए कुछ अधिक पीड़ादायक है. यह पीड़ा है उस तारीख के लिए जिस दिन हम गर्व के साथ अपना तिरंगा फहराते हैं. अपने भीतर देशभक्ति और स्वाभिमान से भर उठते हैं. यह हमारा राष्ट्रीय उत्सव होता है लेकिन इस बार हमारा राष्ट्रीय उत्सव रस्मी

कोरोना को पराजित करने एकजुटता पहली शर्त मनोज कुमार समूची दुनिया के साथ मध्यप्रदेश में कोरोना की भयावहता प्रतिदिन देखने को मिल रही है. आंकड़ों को देखकर मन कंपकंपा उठता है. यह ऐसा कठिन समय है जब हम रात में सोते समय मौत के आंकड़े और संक्रमितों की संख्या गिनकर सोते हैं और आंख खुलते ही अखबार के पन्नों पर छपे आंकड़ों को देखकर अफसोस से भर उठते हैं. सिहरा देने वाली खबरों के बीच कुछेक खबरें सुकून देने वाली भी होती हैं लेकिन कोरोना के कयामत के सामने ऐसी खबरें बौनी हो जाती है. कभी लगता है कि बीमारी ने किनारा कर लिया है लेकिन कुछ घंटे बीतते बीतते फिर आंकड़ें डराने लगते हैं. कहा जा रहा है कि सौ साल में ऐसी महामारी आती है लेकिन आजाद भारत में यह शायद पहला मौका होगा, जब उम्र के पचास पार लोग भी इससे दो चार हो रहे हैं. नई पीढ़ी के लिए तो यह एक सबक के समान है. वे अपनी आंखों से मौत का मंजर देख रहे हैं. किसी के पिता, तो किसी का पति, कोई भाई, कोई मां, कोई बहन और कोई दोस्त के अचानक कोरोना के गाल में समा जाने की खबर आती है. सोशल मीडिया पर लगभग हर रोज ऐसी कई खबरें पढऩे को मिल जाती है. साल 2020 के शुरूआत में ही कोरोना ने दस्तक दे दी थी. तब इसकी भयावहता से हम सब बेखबर थे. जैसे जैसे समय गुजरता गया. कोरोना के मौत के डैने पसरने लगा. सुरक्षा और सर्तकता के लिए तालाबंदी की नौबत आ गई. सरकार ने कोरोना के चैन को तोडऩे के लिए तीन महीने का लॉकडाउन ऐलान कर दिया. इस दौरान कोरोना का फैलाव थोड़ा धीमा रहा लेकिन लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोरोना को मौका मिल गया और तेजी से वह पसरने लगा. देखते ही देखते आंकड़ों का ग्राफ बढऩे लगा. एक बार फिर जिंदगी को बचाने के लिए कभी एकाध हफ्ते तो कभी दो दिनों का लॉकडाउन करने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा. शारीरिक दूरियां, मुंह पर मास्क और सेनीटाइजर से स्वच्छ रखने की हिदायत के साथ जनजागरूकता में सरकार जुटी हुई है. सरकार की इन कोशिशों से जिंदगी के बचाव में आंशिक कामयाबी तो मिली लेकिन जिंदगी पटरी से उतर गई. काम-धंधे चौपट हो गए. बचत के रुपये हवा में उड़ गए. भूख और बेकारी के सामने कोरोना का डर छोटा पडऩे लगा. लोग बेखौफ होकर काम की तलाश में निकल पड़े. सडक़ों पर काम की तलाश में निकलने वाले इन लोगों को भी जिंदगी का भय था लेकिन पेट की आग के सामने मौत भी छोटी लगती है. बेबसी और मजबूरी घरों से सडक़ पर ले तो आयी लेकिन कारखाने बंद, बाजार बंद तो बेकार हाथों को काम कहां से मिले? भूख और भय के बीच जिंदगी हर रोज तमाम हो रही है. आर्थिक रूप से आम आदमी से लेकर सरकार का खजाना भी सन्नाटे में हैं. अखबारों में छपने वाली खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि हालात सुधरने में जाने कितना वक्त लगे. अभी तो खैर मना रहे हैं कि किसी तरह कोरोना किनारे हो जाए. जो लोग कुंडली और भविष्यवक्ताओं पर भरोसा नहीं करते थे, अब उनकी गणना पर उन्हें भरोसा करना पड़ रहा है. यह तो नहीं कहा जा सकता कि जो कहा जा रहा है, वैसा ही होगा लेकिन डूबते तो तिनका का सहारा वाली बात को मान लें तो सितम्बर तक वैक्सीन बनने की उम्मीद है और ग्रह नक्षत्र अपनी चाल बदलेंगे तो कोरोना का कहर कमजोर पड़ेगा. यदि ऐसा होता है तो यह राहत की बात होगी. एक तरफ आम और खास सब लोग कोरोना से भयग्रस्त हैं लेकिन राजनीति के पाले में कोरोना शतरंज के मोहरे की तरह बिछाकर खेला जा रहा है. जो सरकार से बाहर हैं, वह सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. उसकी कोशिशों पर सवाल उठा रहे हैं. कौन, कहां इलाज करा रहा है? किसको क्या आर्थिक लाभ हो रहा है, जैसे सवाल लगातार उठाया जा रहा है. यह सवाल इस समय फिजूल का है क्योंकि कोरोना के लिए सब एक धान पसेरी है. कोरोना दोस्त नहीं, दुश्मन है. वह अपना देखती है और ना पराया. उसका एक लक्ष्य है मौत बनकर टूट पडऩा. जो सरकार में हैं, वह अपने तर्क के साथ जवाब दे रहे हैं. सही मायने में राजनेता आम आदमी के आईकॉन होते हैं. उनका व्यवहार आम आदमी को प्रेरित करता है लेकिन जिस तरह से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करने, मास्क नहीं लगाने की राजनेताओं की खबरें देखने और सुनने में मिल रही है, वह आम आदमी को भी लापरवाह बना रहा है. यह तो अच्छा हुआ कि समय रहते सरकार ने जुलूस, जलसे पर पाबंदी लगाकर आम आदमी को संदेश दे दिया कि कोई आम और खास नहीं. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने स्वयं कहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाल मुख्यमंत्री क्यों न हो, कार्यवाही की जाए. कोरोना जैसे संकट के समय में सबको एक साथ चलना होगा क्योंकि यह मौत की बीमारी चिंह कर नहीं आती है. आज सब एकजुट हो जाएं तो पुलिस, प्रशासन, डॉक्टर और कोरोना से जूझने के लिए लगे लोगों में भी साहस का संचार होगा. अपितु कम श्रम और कम खर्च में बेहतर व्यवस्था की जा सकेगी. ऐसे में तंत्र पर किया जाने वाला खर्च नियंत्रित होगा और लोगों के जीवन बचाने में उस बजट का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा. व्यवस्था बनाने में जुटी पुलिस और प्रशासन भी तनाव मुक्त होगा तो लोगों की शिकायतें भी कम होगी. जनप्रतिनिधि जब लोगों को सचेत करेंगे, जागरूक करेंगे तो उनकी बातों का असर दूर और देर तक होगा. लोग बेवजह सडक़ों पर नहीं आएंगे. जो लोग आवश्यक कार्यों से घर से बाहर निकल रहे हैं, वे सावधानी के साथ आएंगे. सोशल डिस्टेसिंग के साथ मास्क लगाकर स्वयं और दूसरों को बचाएंगे. यह समय साथ चलने का है, साथ देने का है और जहां तक सवाल जवाब का है तो उसके लिए उम्र होगी. कटघरे में खड़े कीजिएगा और जवाब मांग लीजिएगा लेकिन यह तब होगा जब जान हो तब जहान होगा.