गुरुवार, 11 जून 2026

कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता

 











प्रो. मनोज कुमार

कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है. एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने. लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है. आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं. 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था. जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे. उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है. साथ ही अन्य दलों से टूटकर भी आने वाले जनप्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपना भरोसा जताया, यह एक अलग किस्म का भारतीय राजनीति को अनुभव हुआ. इसके पहले भी दल-बदल होता रहा है लेकिन इसे दल-बदल के साथ ‘दिल’ बदल के रूप में देखा जाना चाहिए. आम आदमी पार्टी और हालिया तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का उनके साथ चले जाना, यह परिघटना के रूप में परिभाषित होगा. हालांकि विरोधियों का कहना है कि उनका ‘डर से दिल’ बदला है. डर या विश्वास, दिल से दल बदल रहा है और 12 वर्षों में इस बदलाव को रेखांकित किया जाएगा. यह भी अजीब सा लगता है कि बार-बार कहा जा रहा है कि मोदी ने नेहरु के रिकार्ड को तोड़ दिया. अरे नहीं, भाई मोदी ने रिकार्ड बनाया है. 

भारतीय राजनीति में 12 वर्ष का समय बहुत होता है और जब चौतरफा हमले हो रहे हैं तब सत्ता में बने रहना सच में अर्थपूर्ण है. विरोध विरोधियों से हो तो सामान्य सी बात है लेकिन विरोध खुद के घर से हो तो यह चुनौती बन जाता है. विरोधियों के कुछ जायज हमले हैं तो कुछ नाजायज. कुछ हमले तो व्यक्तिगत हो रहे हैं, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. नीति-नियमों के आधार पर तार्किक विरोध का हर मंच पर स्वागत होता है लेकिन पूर्वाग्रहों से भरे विरोध कोई मायने नहीं रखता है. खैर, वैश्विक संकट का असर भारत में दिखने लगा. अनेक स्तरों पर भारत भी इस संकट से जूझ रहा है और इसका परिणाम यह हुआ कि 12 साल पहले किए गए वायदों को पूरा करने में खरोंच लगी. महंगाई, बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता गया. युद्ध के चलते भारत की आर्थिक हालत पर भी घाव लगा और देखते ही देखते महंंगाई का ग्राफ तेजी से बढऩे लगा. आखिरकार मोदी को आम आदमी के सामने आकर सहयोग का आह्वान करना पड़ा. कुछ बातें ऐसी थी जिसे एक आम भारतीय नहीं मानता है जैसे सोना ना खरीदने की बात लेकिन अर्थशास्त्र के जानकार बताएंगे ऐसा क्यों? हम मोटामोटी तौर पर सहज और सरल जिंदगी चाहते हैं और सरकार को अलादीन का चिराग मानकर उसे हर मुराद पूरी करने की जिद् भी कर बैठते हैं और जब जिद् पूरी नहीं होती है तब सरकार खराब हो जाती है. इस समय सरकार का मतलब समझा दिया गया है मोदी और मोदी को खराब साबित करने के लिए हर स्तर पर कोशिश जारी है.

यह भी सच है कि 12 वर्ष पहले युवाओं को जो उम्मीदों के पंख लगे थे, वह टूटकर बिखरने लगे. उम्मीद टूटी लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए और वे अपने एक ‘वोट’ से अपने नायक मोदी को मजबूत करते रहे, यह भी एक बड़ा सच है. स्मरण कीजिए कि लोकपाल की माँग को लेकर यही नौजवान सडक़ पर उतरे तो कांग्रेस की सरकार पलट दी तो क्या यह नाराजगी मोदी को चुनौती नहीं दे सकती है? जरूर दे सकती है लेकिन तब जब युवा नाउम्मीद हो जाए. इन 12 वर्षों में ऐसे चाहे-अनचाहे बात-बयान हुआ और उनकी इमेज को सोशल मीडिया के जरिए तोडऩे की कोशिश की गई. अतिरेक में विरोधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ और इसका दुष्परिणाम यह निकला कि सत्ता और प्रतिपक्ष में जो समन्वय होना चाहिए था, उसमें दरार पड़ गई. प्रतिपक्ष की प्रकृत्ति प्रतिरोध की रही है लेकिन विरोधी व्यवहार कई नीतिगत मुश्किलें उत्पन्न करता है और ऐसा हुआ भी.

समय एक सा नहीं रहता है और यह सबके साथ होता है, मोदी कोइ अपवाद नहीं लेकिन 12 वर्षों तक मोदी करिश्मा अपवाद है. इस अपवाद का सबसे बड़ा गुण है एक कुशल जनसंचार के रूप में स्वयं को स्थापित करना. ‘मन की बात’ के माध्यम से वे देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गए. माटी से खादी तक चर्चा कर हुनरमंद लोगोंं को उनके घेरे से बाहर लाकर मुख्यधारा से जोडक़र एक नया मुकाम दिया. प्रधानमंत्री मोदी तारीफ करें तो उनके हुनर को पंख लग जाना स्वाभाविक है. ‘मन की बात’ की हर ऐपिसोड में समाज के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद को तलाश कर ले आते हैं. वे जनता की नब्ज भी जानते हैं और समझते हैं. और ऐसे में वे कभी खेल के मैदान में उतर जाते हैं तो कभी गाँव की चौपाल में खाट में बैठकर अपनापन का भाव जताते हैं. जैसा कि उन्होंने खुद ही अपील कर कहा कि मोदीजी नहीं, मोदी कहा जाए. वे जानते हैं कि एक ‘जी’ अपनों से पराया बना देती है. उनका यही हुनर उन्हें एक कुशल संचारक के रूप में स्थापित करता है. संचार की अवधारणा कहती है कि संदेश देने वाले की कामयाबी इस बात में नहीं है कि वह संदेश क्या देता है बल्कि कामयाबी इस बात में है कि संदेश ग्रहण करने वाला उसे कैसे ग्रहण करता है. बातें और भी बहुत सी है और यही बातें उन्हें दूसरों से जुदा करती है. एक बात स्मरण में हो आता है कि एक कामयाब व्यक्ति से पूछा गया कि आपका मुकाबला किससे है? तो उनका जवाब था-मेरा अपने आप से. मोदीजी के बारे में भी यही बात लागू होती है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

बुधवार, 3 जून 2026

# ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र

 ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक  राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र 




















भारतीय शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का क्रियान्वयन कर दिया है. शिक्षा के क्षेत्र में यह बदलाव कितना कारगर हुआ? क्या प्रभाव समाज पर पड़ा? क्या चुनौती है और इस चुनौती का समाधान क्या है? जैसे मुद्दे पर अनुसंधान की अंतरराष्ट्रीय मानक की पत्रिका ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र होगा. स्कॉलर, शिक्षक एवं मीडिया के सजग लेखकों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर अनुसंधानपरक शोध लेख/आलेख आमंत्रित हैं. आपका आलेख कृतिदेव या मंगल फॉट में हो तथा शब्द सीमा 1800-2000 से अधिक ना हो. अंतिम तिथि 25 जून 2026 है. अन्य जानकारी के लिए श्री दत्ता कोल्हारे मोबा. ९८६०६ ७८४५८ पर संपर्क कर सकते हैं.

क्वान्ग्तोंग (भारत अध्ययन) विश्वविद्यालय, चीन 

से हिन्दी जर्नल के रूप में मान्यता प्राप्त हैं. 

ढ्ढस्स्हृ २२३१-०४७९ / ढ्ढद्वश्चड्डष्ह्ल स्नड्डष्ह्लशह्म् ५.०

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४रिसर्च पेपर में संदर्भ का पूर्ण रूप से उल्लेख किया जाए. यथा पुस्तक का नाम, लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रकाशन स्थान, संस्करण एवं प्रकाशन का वर्ष.

४स्कॉलर/प्राध्यापक का पूरा नाम, पदनाम, कॉलेज/विश्वविद्यालय, शहर और राज्य का स्पष्ट उल्लेख किया जाए.

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शनिवार, 30 मई 2026

# ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन

 


भाषा की मर्यादा का चीरहरण- संजय मेहता

भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की। परम्परागत पत्रकारिता की बात करें अथवा वर्तमान में डिजीटल मीडिया की, दोनों ही जगहों पर भाषा के सारे तटबंध तोड़े जा रहे हैं। भाषा की मर्यादा का चीरहरण हो रहा है। यह बात वरिष्ठ रंग निर्देशक संजय मेहता ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर आयोजित विमर्श में कही। श्री मेहता ने पत्रकारिता के साथ रंगमंच एवं सिनेमा को जोड़ते हुए कहा कि हम सबकी जवाबदारी समाज है और सामाजिक सरोकार ही हमें जिंदा रखेगा। पत्रकारिता की तरह रंगमंच की बड़ी जिम्मेदारी है।

इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमट कोर्ट की एडव्होकेट एवं जिला भाजपा उपाध्यक्ष सुश्री गुंजन चौकसे का कहना था कि ‘सामाजिक सरोकार से ही पत्रकारिता होती है। एक मायने में पत्रकारिता केवल छपे शब्द नहीं बल्कि अवाम की आवाज है।’ उन्होंने अदालत, मीडिया और राजनीति के संदर्भ में अनेक उदाहरण के साथ अपनी बात रखी।

इस अवसर पर प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि- समय कितना ही बदल जाए, पत्रकारिता का मूल स्वरूप हमेशा कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम से भारत के नवनिर्माण में पत्रकारिता का अहम योगदान रहा है। मिशन से व्यवसाय में पत्रकारिता का परिर्वतन आपातकाल के बाद हुआ। दुर्भाग्य से पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा देने की साजिशन माँग की जाने लगी। 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान की पत्रिका ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन किया गया।  ‘समागम’ के इस विशेष अंक में विविध विषयों का संयोजन किया गया है। लेखक कुंवर इंद्रजीत की सद्य प्रकाशित नवीन पुस्तक ‘जीवन यात्रा के सुमन’ का भी लोकार्पण किया गया। लेखक इंद्रजीत सिंह ने अपने जीवन अनुभव भी साझा किया।

गुरुवार, 28 मई 2026

#माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

 हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष

माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

प्रो. मनोज कुमार

दो सौ साल की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर का स्मरण करते हैं, उदंत मात्र्तण्ड का स्मरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से हम अभिमान से भर उठते हैं और दो सौ साल बाद की पत्रकारिता की सीरत देखते हैं तो कम से कम अभिमान तो होता ही नहीं है। दो साल में हिंदी पत्रकारिता के पास बताने के लिए बहुत कुछ था लेकिन हमने बहुत कुछ पाने के लिए उसे खो दिया। हिंदी पत्रकारिता कहाँ दो सौ साल पहले अंग्रेजों से लोहा ले रही थी और आज हम अपने ही लोगों से लोहा ले रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी की साख को बचाने के लिए पत्रकारिता संघर्ष कर रही है और यह संघर्ष अनवरत चलने वाला है। हर सत्ता के लिए पत्रकारिता खतरे की घंटी हुआ करती थी और आगे भी रहेगी। यह जानकर अच्छा लगता है कि चाहे पत्रकारिता में जितनी गिरावट आ गई हो, हर कोई अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पत्रकारिता से भयभीत रहता है। दो साल की हिंदी पत्रकारिता की यही साख है और पूँजी भी। हालाँकि इन दो सौ सालों में बहुत कुछ बदला है। पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर है और हम तकनीक की पत्रकारिता करने लग गए हैं। इस बदलाव से हिंदी पत्रकारिता का यह संक्रमण काल है। यह बात पत्रकारिता में रचे-बसे नए और पुराने दोनों पीढिय़ों को मान लेना चाहिए। वर्तमान समय में चारों तरफ इसी बात पर चर्चा हो रही है कि हिंदी पत्रकारिता एआई और चैटजीपीटी से कैसे निपटे? संकट बड़ा है तो इसका समाधान भी हमें ही तलाश करना होगा। हिंदी पत्रकारिता पर यह संकट पहली बार नहीं है और ना ही आखिरी बार है। ऐसे संकट आते-जाते रहेंगे लेकिन यह भी भरोसा है कि समय के साथ इसका समाधान भी हम सब तलाश कर ही लेंगे।

लंबे संघर्ष के बाद भारत ने स्वाधीनता हासिल किया तो इसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका थी। अनेक संकटों और झंझावतों से गुजरते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा वाली हिंदी पत्रकारिता पर अब जिम्मेदारी थी नव भारत निर्माण में चौकीदार बनने की। देश में नवाचार हो रहा था लिहाजा उस समय काल और परिस्थिति के अनुरूप बजट भी आ रहा था। पैसों की बंदरबाट की कहानी शायद उसके जन्म से है। कल भी था और आज भी है। खैर, तब हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह किया और तब भी अनेक घपले-घोटाले को बेनकाब किया। इस भूमिका के लिए हिंदी पत्रकारिता की पीठ सबने थपथपायी लेकिन भीतर से सत्ता का नाराज होना लाजिमी था। प्रतिपक्ष के लिए तब हिंदी पत्रकारिता की जवाबदारी नैतिक और राष्ट्रहित में होता था लेकिन यही प्रतिपक्ष जब सत्तासीन होता है तो पत्रकारिता उसकी बैरी हो जाती है। सत्ता के साथ पत्रकारिता का रिश्ता वैसा ही है, जैसा की नदी के दो पाट। चलेंगे साथ-साथ लेकिन मिलेेंगे कभी नहीं। खरामा-खरामा साल 47 से साल 75 तक पहुँच गए और यही वह साल था जब हिंदी पत्रकारिता का गला घोंटने की साजिश की गई। तानाशाह शासन व्यवस्था ने पत्रकारिता पर पहरे बिठा दिए। शब्द-शब्द सरकार की निगरानी में छपने लगे। तमाम बंदिशों के बाद भी पत्रकारिता कहाँ हार मानने वाली थी। तानाशाह सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया गया। विरोधस्वरूप संपादकीय पृष्ठ कोरा छोड़ दिया गया। और भी विरोध के अपने तरीके अपनाए गए। पत्रकारिता का यह स्वाभिमान आज भी शेष है। हालाँकि यह भी सच है कि इसी दौर में यह वाक्य चल पड़ा कि- तानाशाह शासन ने कहा कि घुटने के बल चलो तो लोग रेंगने लगे। सौ तो नहीं, अंशभर यह उस समय की सच्चाई है। 

असल चेहरा और पत्रकारिता की साख गिरने का समय साल 75 के बीत जाने के बाद दिखने लगा। पत्रकारिता, मीडिया का स्वरूप धारण करने लगा और मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की माँग उठने लगी। मिशन से मीडिया और मीडिया से उद्योग बन चली पत्रकारिता आहिस्ता-आहिस्ता रोजगार का चेहरा बनने लगी। एक तरफ पत्रकारिता मीडिया बन गई तो दूसरी तरफ पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए उद्योग की तरह ही मीडिया शिक्षा के संस्थान कुकुरमुत्ते की भाँति उठ खड़े हुए। हर की अपनी खासियत, हरेक के अपने दावे। पत्रकारिता को औजार बना दिया गया। मीडिया शिक्षा तब और बढऩे लगा जब पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर जाने लगी और तकनीक की पत्रकारिता होने लगी। अबके समय में आपकी दक्षता विचारों की नहीं, किसी की पीड़ा को देखकर उसे न्याय दिलाने की नहीं, तकनीक के माध्यम से क्या स्टोरी बनायी जा सकती है और इसमें कौन कितना दक्ष होगा, यह मीडिया शिक्षा तय कर रही है। अपनी 45 सालों की पत्रकारिता में मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है लेकिन मेरी बाद की पीढ़ी के लिए पत्रकारिता दिमाग का है। रही-सही कसर आज की एआई और चैटजीपीटी जैसे तकनीक ने पूरा कर दिया है। बरसों पहले मर चुकी संपादक संस्था के नए कारकून मोबाइल पर अपने डिमांड के अनुरूप स्टोरी लिखने को बोलते हैं और चट से ‘बोलो मेरे आका’ के अंदाज में वह सबकुछ दे देता है, जो आपको चाहिए। तकनीक की पत्रकारिता का यह खतरा हम सबके लिए खतरा बन चुका है। अब एक ही रास्ता है कि हम खुद को इस तकनीकी पत्रकारिता के ढाँचे में ढाल लें या इससे बाहर हो जाएँ। कोई तीन दशक पहले फोटोटाइप सेटर और इसके बाद कम्प्यूटर आया तो जो इसके हमसफर हो गए, वे तो बच गए लेकिन अनेक की पत्रकारिता आले पर रख दी गई। अब ओटले की पत्रकारिता होने लगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कभी समाज भरोसे के साथ कहता था कि-पढ़ा नहीं, फलां अखबार में छपा है और आज वही कहते हैं कि एक बार खबर को जाँच लेना। इन सबके बावजूद हमारे पुरखा बालकवि बैरागी जी कि यह पंक्ति बरबस याद आ जाती है-

 माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!

मंगलवार, 26 मई 2026

 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान पत्रिका ‘समागम’ का 
जून 2026 का अंक अवलोकनार्थ प्रस्तुत है.

गुरुवार, 21 मई 2026

‘जेन जी’ का नया एडीशन और ‘कॉकरोच’ का ‘हिट’


प्रो. मनोज कुमार

2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’ इस समय कितना उबल रहा है और देखिए कि कुछ घंटों में हजारों से लाखों और लगभग इस समय तक करोड़ के आसपास युवा जुड़ गए हैं। 2014 के आंदोलन और आज के कॉकरोच जनता पार्टी के बीच कोई साम्य नहीं है लेकिन जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और आज के इस सोशल मीडिया आंदोलन में एक साम्य है, वह कि युवा जब घायल होता है तो वह संसार बदल डालता है। इसे आप कॉकरोच जनता पार्टी कहें या नेपाल के ‘जेन जी’ का नया एडीशन, युवाओं का गुस्सा उफान पर है। 

कॉकरोच जनता पार्टी से जुडऩे का आह्वान भी अलग किस्म का है। यहाँ उसे सरकार बदलने या कथित बयान पर गुस्सा निकालने की कोई अपील नहीं किया गया बल्कि सीधे-सीधे उन लोगों से जुडऩे का अनुरोध किया गया जो बेरोजगार हों, आलसी हों और ज्यादतर ऑनलाइन रहते हों। यह अपील भी नाराजगी जाहिर करने का अपनी किस्म का शायद पहला हो लेकिन देखते ही देखते करोड़ों की संख्या में लोग जुडऩे लगे। सोशल मीडिया के महारथी भी इस तूफान से औचक और हैरान रह गए। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई और ‘कॉकरोच’ ने ऐसा ‘हिट’ मारा की सबके सब दुबक गए। पहले तो इस बात को समझ लें कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया एडीशन क्यों और कैसे खड़ा हुआ? कहा जाता है कि इस समूह का जन्म एक कथित टिप्पणी के विरोध से हुआ। यह भी स्पष्ट कर दें कि जिस टिप्पणी को लेकर युवा आक्रोशित हुआ है, उस टिप्पणी पर सफाई भी दी जा चुकी है। आमतौर पर देखा और समझा जा सकता है कि अनेक बार बयानों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया में ऐसे बयान को वायरल कर दिया जाता है। वायरल करने वाले का एकमात्र मकसद होता है अधिकाधिक धन अर्जन करना लेकिन दूसरी तरफ इस वायरल मैसेज से समाज में जो अराजकता उत्पन्न होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है, उसकी आहट सुनायी देने लगी है। भारत के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है, अनेक बार ऐसी स्थिति आयी है किन्तु इस बार इसे सतही तौर पर लिया जाना थोड़ा खतरनाक हो सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव जितना बड़ा है, उसका बिजनेस मॉडल कहीं उससे ज्यादा बड़ा है। इस बात को भी जेहन में रखकर सोचना होगा। 

2014 का अन्ना आंदोलन आज भी लोगों के जेहन में है और केन्द्र की सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारक इसे माना जाता है। यह आज के कॉकरोच जनता पार्टी की भाँति उदय ना होकर मुद्दा आधारित था। लोकपाल माँग के साथ अन्ना आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी गई थी। 

जिस लोकपाल की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया गया था, वह पूर्ण हुआ या नहीं, यह अलग विषय है। हालाँकि इसी आंदोलन से केजरीवाल ने ‘आप’ पार्टी को जन्म दिया। लोकप्रियता का आलम यह था कि लोकसभा में जलवा दिखाने वाली भाजपा को नाक के नीचे ‘जेन जी’ वाले केजरीवाल ने सत्ता से बाहर ही रखा। यह सब सुनियोजित नहीं था, जो हो रहा था, वह अप्रत्याशित था। लोगों के बीच संदेश गया कि जेपी आंदोलन के बाद देश में फिर एक बार परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। दिल्ली की सत्ता में आप पार्टी ने कई प्रयोग किए लेकिन आखिरकार उनको भी मतदाताओं ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोकतंत्र में मतदाता भगवान होता है और वह चाहे जो निर्णय दे, वही मान्य होता है। पराजय के बाद आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है। 

यहाँ यह बता देना सामयिक होगा कि जिन लोगों को जेपी आंदोलन याद है, जिन लोगों को अन्ना आंदोलन का स्मरण है, वे याद रखें कि संभवत: देश में ऐसी ही युवा आंदोलन से असम में पहली बार प्रफुल्ल मोहंता सरकार बनी थी। इसकी उम्र भी कोई दसेक साल की रही। सवाल यह है कि युवा जोश ठंडा पड़ गया या कि मतदाता जागरूक हो गए जिन्होंने तीसरी बार मोहंता को अवसर नहीं दिया। कुछ ऐसा ही मामला बंगाल से रूखसत की गई ममता बेनर्जी को दिखता है। ऐसे ही जोश-खरोश के साथ बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को पंद्रह वर्षों तक सत्ता सौंपी थी लेकिन विकल्प मिलते ही उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वही विलाप कि चुनाव में धांधली की गई। खैर, यह सब होता है और होता रहेगा।  

अब सवाल आज की सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का है। युवा वेग उफान पर है लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि यह वेग कब तक रहेगा और किस दिशा में चलेगा? नाराजगी में बना कोई संगठन (फिलहाल कानूनी अस्तित्व नहीं) अक्सर रास्ता भटक जाता है। जिस तेजी से युवा लामबंद हो रहे हैं, वह बदलाव ला भी सकते हैं और खुद भी बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत में संभव नहीं है। युवा उम्र ही क्रांति का बीज बोती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन क्रांति के लिए मुद्दाआधारित गुस्से की जरूरत होती है और ऐसे आंदोलन जेपी और अन्ना का इस देश ने देखा है। भारत में नए किस्म के ‘जेनजी’ को फिलवक्त कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। प्रतिपक्ष की राजनीति देशहित के लिए होता है और संभव है कि आगे भी इस नए-नवेले संगठन को कोई साथ मिलेगा क्योंकि लाभ की राजनीति भला कौन छोडऩा चाहेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव संचार के किसी भी अन्य माध्यमों से ज्यादा प्रभावी और व्यापक है। घड़ी के सेकंड के काँटें के साथ सोशल मीडिया में लिखी-बोली गई बातें दुनिया भर में फैल जाती हैं और यही सबकुछ अभी हो रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी को अपना कुनबा बढ़ाने के लिए वर्षों लग जाते हैं, वहीं अल्प समय में खड़ी हुए संगठन में करोड़ लोगों का जुट जाना अस्वाभाविक है।आगे देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी रील की तरह स्क्रॉल हो जाएगी या इसका जेपी-अन्ना आंदोलन जैसा कोई प्रभाव दिखेगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) तस्वीर गूगल से साभार

कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता

  प्रो. मनोज कुमार कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े...