गुरुवार, 3 सितंबर 2026

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुनिया को उन्होंने उस बुरे दौर में भी जिंदा रखकर भारत की सनातनी परंपरा को आगे बढ़ाया है. समय बदला और चीजें भी बदली लेकिन गिरमिटिया शब्द एक तरह से उनके साथ चिपक गया है. कोई सौ वर्ष पहले गुलामी की प्रतीक जो कांट्रेक्ट हुआ करता था, उसे कानूनन समाप्त कर दिया गया है. गिरमिटिया के इस संसार पर केन्द्रित अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान पत्रिका का अक्टूबर 2026 का यह महत्वपूर्ण अंक है. माना जाता है कि पहले गिरमिटया महात्मा गांधी थे, सो उनके जन्मदिवस पर यह अंक गिरमिटिया गांधी को समर्पित कर रहे हैं. इस अंक को समृद्ध बनाने के लिए आपके विचार, लेख और शोध आलेख आमंत्रित हैं. 25 सितंबर, 2026 तक हमें भेजिए.

बुधवार, 2 सितंबर 2026

श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा

 जनमाष्टमी ओर शिक्षक दिवस पर विशेष

श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा

प्रो. मनोज कुमार
श्रीकृष्ण का उदात्त चरित्र को लेकर हम हमेशा से ऊर्जावान रहे हैं। जिस सहजता और सरलता से उन्होंने जीवन जीने की सीख दी है, वह अपने आप में विशिष्ट है। सतयुग से लेकर वर्तमान समय में श्रीकृष्ण हमेशा से सामयिक रहे हैं। जब हम श्रीकृष्ण के जीवन का विवेचन करते हैं तो सहज ही शिक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि का संबंध हमें भारतीय ज्ञान परंपरा से अवगत कराता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में शिक्षा केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं रही है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को ज्ञानवान बनाने के साथ-साथ विवेकशील, अनुशासित, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना भी रहा है। वर्तमान समय में हम श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए जेन अल्फा तक आ गए हैं। इस समय भी भारतीय ज्ञान परंपरा हमें इस बात का स्मरण कराती है कि श्रीकृष्ण भी अपने समय में जेन अल्फा रहे हैं लेकिन उन्हें किशोर वय संबोधन दिया गया। आधुनिक टेक्रालॉजी के दौर में यह समझना रोचक होगा कि श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा का रिश्ता कैसे सामयिक हो सकता है। और यह भी कि इस संदर्भ में हम गुरु-शिष्य परंपरा को किस तरह देखते हैं। यह संयोग है कि पहले दिन हम श्रीकृष्ण के उदात्त चरित्र का स्मरण कर रहे हैं और अगले दिन ही हम शिक्षक दिवस मनाएंगे और दोनों दिनों में श्रीकृष्ण की उपस्थिति अपरिहार्य है।
आज शिक्षा के सामने चुनौती केवल ज्ञान उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ज्ञान के असीमित प्रवाह में सही ज्ञान का चयन करने की है। श्रीकृष्ण के समय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु के पास जाना पड़ता था; आज के जेन अल्फज्ञ के समय में ज्ञान स्वयं बच्चे की स्क्रीन तक पहुँच रहा है। तब गुरु ज्ञान का प्रमुख स्रोत था, आज इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी ज्ञान के स्रोत बन चुके हैं। किंतु ज्ञान के स्रोत बदल जाने से ज्ञान की आवश्यकता, विवेक की आवश्यकता और मार्गदर्शन की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। इसी दृष्टि में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि के संबंध को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के स्वरूप में देखते हैं तो दूसरी ओर, आज की  पीढ़ी है जिसका जन्म डिजिटल तकनीक, इंटरनेट, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के वातावरण में हुआ है।
भारतीय परंपरा में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख केवल इस कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वहाँ श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा प्राप्त की, बल्कि इसलिए भी कि यह आश्रम उस शिक्षा-दृष्टि का प्रतीक है जिसमें विद्यार्थी का निर्माण बहुआयामी रूप से किया जाता था। गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी केवल विषयगत ज्ञान अर्जित नहीं करता था, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन, कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मसंयम भी सीखता था।  प्रश्न यह है कि क्या हजारों वर्ष पुरानी सांदीपनि-परंपरा और आज की डिजिटल पीढ़ी के बीच कोई सार्थक संवाद संभव है? यदि संभव है तो वह संवाद किस प्रकार का होगा?
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इस शिक्षा-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। वे एक साथ दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ, योद्धा, प्रशासक, मित्र और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान और कर्म का जो समन्वय दिखाई देता है, वह इस बात की ओर संकेत करता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य परीक्षा में सफलता प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों का विवेकपूर्ण सामना करने की क्षमता विकसित करना है। वहीं जेन अल्फा अनेक प्रकार की सूचनाओं और विकल्पों से घिरा हुआ है। उसे केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि क्या जानना है; उसे यह भी सिखाना आवश्यक है कि क्या स्वीकार करना है, क्या अस्वीकार करना है और क्यों स्वीकार या अस्वीकार करना है। चुनौती यह है कि यह पीढ़ी अपने जिज्ञासा का समाधान करने या किसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए पुस्तकालय तक जाने के बजाय कुछ सेकंड में डिजिटल माध्यमों में तलाश करने लगता है। हम मानते हंै कि सूचना का विस्फोट हो रहा है और यह लाजिमी भी है लेकिन हम यह भी मानते हैं कि परंपरा और अनुभव का कोई विकल्प नहीं। सूचना की अधिकता भी ज्ञान की गारंटी नहीं है। श्रीकृष्ण की शिक्षा और जेन अल्फा की शिक्षा के मध्य यह बड़ा अंतर दिखता है।
श्रीकृष्ण का समकालीन महत्त्व इसी बिंदु पर दिखाई देता है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व हमें यह समझने में सहायता करता है कि ज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विवेक और परिस्थिति-बोध का समावेश न हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने केवल सूचनाओं का ढेर नहीं रखा। उन्होंने उसे कर्तव्य, कर्म, आत्मबोध और निर्णय के प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। सांदीपनि की परंपरा हमें गुरु की एक ऐसी भूमिका की याद दिलाती है जिसमें गुरु विद्यार्थी के व्यक्तित्व को समझता है। वह केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि विद्यार्थी के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानता है। डिजिटल युग ने शिक्षक की भूमिका को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और मूल्य-निर्माता के रूप में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती है। शिक्षक को बच्चे को यह सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाए। यह भी सत्य है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विद्यार्थी के लिए उत्तर लिख सकती है, लेकिन शिक्षक उसे यह सिखा सकता है कि उस उत्तर की सत्यता की जाँच कैसे की जाए। इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन शिक्षक यह समझा सकता है कि जानकारी को ज्ञान और ज्ञान को विवेक में कैसे बदला जाता है। गुरु-शिष्य संबंध को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है।
आने वाला समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था का है। ऐसे में अनेक पारंपरिक रोजगार बदलेंगे और नई प्रकार की क्षमताओं की आवश्यकता होगी। लेकिन तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय गुणों का महत्त्व कम नहीं होगा। सहानुभूति, सहयोग, धैर्य, नेतृत्व, नैतिक निर्णय, रचनात्मकता और सामाजिक उत्तरदायित्व ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें मशीनें पूर्ण नहीं कर सकती हैं अपितु अनुभव ही यहाँ कारगर भूमिका निभाएगा।
डिजिटल गुरुकुल की आवश्यकता
सांदीपनि आश्रम को आधुनिक संदर्भ में देखा जाए तो आज के विद्यालय और विश्वविद्यालय एक प्रकार के डिजिटल गुरुकुल में परिवर्तित हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक शिक्षा को पुराने गुरुकुल की नकल करने के स्थान पर उसके मूल तत्वों—अनुशासन, संवाद, आत्मीयता, अनुभवात्मक शिक्षा, प्रकृति से जुड़ाव और चरित्र-निर्माण—को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाना चाहिए। ऐसी शिक्षा वास्तव में आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान-दृष्टि का समन्वय होगी।
जड़ों की और लौटता मध्यप्रदेश
कहते हैं कि नाम का प्रभाव अधिक होता है और उसी के अनुरूप भाव बनते बिगड़ते हैं। सांदीपनि संबोधन सुनते ही भला-भला सा लगता है और मोहन सरकार ने अंग्रेजी दासता से मुक्त करते हुए सीएमराइज स्कूल के स्थान पर सांदीपनि संबोधन दिया है। सीएमराइज स्कूल का संबोधन से भाव अंग्रेजियत का हो जाता है वहीं सांदीपनि हमारी परंपरा की ओर लौटने का संकेत देता है। यह नहीं, मध्यप्रदेश में श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की थी, सो सांदीपनि अपने आपमें सुंदर और सम्मानजनक भी है।
यह भी समझना होगा कि सांदीपनि की परंपरा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता है अपितु उसे जीवन के लिए तैयार करता है। सांदीपनि-परंपरा का आधुनिक पुनर्पाठ हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य अच्छे अंक नहीं, अच्छा मनुष्य बनाना है। वर्तमान समय में मन के अनुकूल परीक्षा परिणाम नहीं आने पर अनेक आत्महंता के उदाहरण देखने को मिलते हैं। यह दुर्भाग्यजनक है। शिक्षा हमें ज्ञान, विवेक और कर्म के समन्वय की प्रेरणा देते हैं और जेन अल्फा हमें यह चुनौती देती है कि इन मूल्यों को नई तकनीकी दुनिया में किस प्रकार जीवित रखा जाए। शिक्षा को तकनीक-विरोधी नहीं, बल्कि तकनीक-सचेत और मूल्य-संपन्न बनाना होगा। सांदीपनि जैसी मार्गदर्शक शिक्षा, श्रीकृष्ण जैसा विवेक और  जेन अल्फा जैसी तकनीकी जिज्ञासा। हम मानते हैं कि संतुलित समन्वय संभव हो सका, तो डिजिटल युग की शिक्षा केवल स्मार्ट नहीं होगी, बल्कि सार्थक, संवेदनशील और मानवीय भी होगी। आइए श्रीकृष्ण के साथ शिक्षकों का भी स्मरण कर लें क्योंकि एक सुशिक्षित समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित शिक्षक की आवश्यकता हमेशा रहेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबंद्ध हैं)

सोमवार, 20 जुलाई 2026

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता













लिव-इन रिलेशनशिप :

स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता 

प्रो. मनोज कुमार

लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न नहीं हो रहा है? बिलकुल इस नए किस्म के रिश्ते से कई तरह की समस्या उत्पन्न हो रही है। आए दिन अपराध के जो नए-नए मामले आ रहे हैं, वह कानूनी दृष्टि से एक बड़ी समस्या बन चुकी है तो समाज में अविश्वास का भाव उत्पन्न हो रहा है। जिस सनातनी समाज की हम कल्पना करते हैं, वहाँ वसुधैव कुंटुंबकम की बात करते हैं, वहाँ इस तरह के नए रिश्तों को कोई जगह नहीं है। अलग-अलग किस्म के सर्वे में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि अब लड़कियाँ जल्द शादी नहीं करना चाहती हैं या नहीं करना चाहती हैं। कई ऐसे सेलिब्रेटी हैं जिन्होंने पिछले दिनों भारतीय विवाह संस्था को बेकार और बेकाम साबित करने वाले बयान दिए हैं। भारतीय वैवाहिक संस्था किसी धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सुविचारित अनादिकाल से बनी हुई है। विवाह का अर्थ केवल संतान उत्पन्न करना नहीं है अपितु दो परिवार आपस में मिलते हैं और समग्र विकास, सहयोग और विश्वास का रिश्ता बनता है। यही भारतीयता का मूल आधार है लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप ने जैसे इसे ताक पर रख दिया है।   

जब हम कानून के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करते हैं तो कानून समाज में सभी के अधिकारों की बात करता है और इसे उसका दायित्व माना जा सकता है। जैसा कि लिव-इन रिलेशनशिप के लिए  व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना है। इस पर समाज में लंबे समय से विमर्श चल रहा है और बातें आगे भी होती रहेंगी। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार ने प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के अंतर्गत लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। यह कानून वर्तमान समय में सामाजिक और कानूनी दृष्टि से चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। सरकार का उद्देश्य लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। संभव है कि जल्द ही प्रस्तावित प्रावधान अमल में लाया जा सके। सरकार जो कर सकती है, वह कर रही है।  प्रस्तावित नए कानून में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि लिव-इन संबंध में रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का पंजीकरण एक निर्धारित समय सीमा, अर्थात् एक महीने के भीतर कराना अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि इससे संबंधों में पारदर्शिता आएगी तथा भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवादों को कम किया जा सकेगा। प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय में अपने लिव-इन संबंध का पंजीकरण नहीं कराता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार नियमों के उल्लंघन पर दंड और कारावास का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को कानून का पालन करने के लिए प्रेरित करना है।

सरकार की चिंता इस बात से जाहिर होती है कि इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा है। कई बार लिव-इन संबंधों में महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। संबंध टूटने की स्थिति में महिलाओं के लिए भरण-पोषण, संपत्ति और बच्चों की देखभाल से जुड़े प्रश्न उत्पन्न होते हैं। प्रस्तावित कानून इन समस्याओं के समाधान के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करने का प्रयास करता है। महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए इसके अतिरिक्त, लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को भी समान अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। सरकार का मानना है कि किसी बच्चे के अधिकार उसके माता-पिता की वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं होने चाहिए। इसलिए ऐसे बच्चों को उत्तराधिकार और अन्य कानूनी अधिकार प्रदान करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।

उपरोक्त बिंदु से सरकार की मंशा साफ है कि वह हर स्थिति में ऐसे रिश्ते में रहने वाली स्त्री को सुरक्षा दिलाना चाहती है। अब इसके बाद समाज का दायित्व होता है कि कानूनन लिव-इन रिलेशनशिप भले ही नाजायज ना हो लेकिन समाज की दृष्टि में वह जायज नहीं है। भारतीय कानून ने ही विवाह के लिए लडक़े और लडक़ी की उम्र का निर्धारण कर उसे वयस्क अथवा अवस्यक बताया है। रूढि़वादी भारतीय समाज का मानस बदलने के लिए राजा राममोहन राय ने विधवा विवाह परंपरा की शुरूआत की। जो लोग अकेले हो गए हैं, उसे सनातनी संस्कृति में नवजीवन शुरू करने का प्रावधान है फिर यह लिव-इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों में उलझने की जरूरत ही क्या है। जब लोग लिव-इन रिलेशनशिप के खतरे को समझ जाएंगे या मानने लगेंगे तो सरकार और कानून पर पडऩे वाला अतिरिक्त दबाव स्वयमेव समाप्त हो जाएगा। कथित विकासवादी सोच के लोगों के लिए लिव-इन रिलेशनशिप जरूरी हो सकता है औवे राज्य शासन के प्रस्तावित प्रावधान के खिलाफ हैं। प्रावधान पर कुछ आलोचकों का कहना है कि लिव-इन संबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है और अनिवार्य पंजीकरण से निजता के अधिकार पर प्रभाव पड़ सकता है। उनका मानना है कि राज्य को व्यक्तिगत संबंधों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वहीं कुछ लोग इसे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम मानते हैं।  कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि यदि इस कानून को संतुलित तरीके से लागू किया जाए, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए, जिन्हें लिव-इन संबंध टूटने के बाद कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं हो पाता, यह कानून सहायक सिद्ध हो सकता है। दूसरी ओर, कानून बनाते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।

कुछ सामाजिक विचारकों और पारंपरिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिलने से विवाह संस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विवाह भारतीय समाज की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है, जो केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का भी संबंध मानी जाती है। यदि बिना विवाह के साथ रहने को कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है, तो युवाओं में विवाह के प्रति प्रतिबद्धता और उसकी सामाजिक महत्ता कम हो सकती है। लिव-इन संबंध अपेक्षाकृत कम औपचारिक और आसानी से समाप्त किए जा सकने वाले संबंध माने जाते हैं। इससे दीर्घकालिक पारिवारिक स्थिरता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे विवाह, परिवार और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों के प्रति लोगों की आस्था कमजोर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं में भी परिवर्तन आ सकता है। यह एक दृष्टिकोण मात्र है। 

कई विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी संबंध की मजबूती केवल कानूनी व्यवस्था पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए विवाह संस्था पर वास्तविक प्रभाव समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा। कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रस्तावित कानून भारतीय समाज और कानूनी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। यह कानून एक ओर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार को लेकर नई बहस उत्पन्न हो गई है। समय-समय पर डॉक्टर भी सजग करते रहे हैं कि अधिक उम्र में विवाह अनेक शारीरिक समस्या का कारण बनता है, खासतौर पर माँ-बाप बनने में वहीं लिव-इन रिलेशनशिप में आप संतान उत्पत्ति के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन बच्चे के कानूनी अधिकार पर सब खामोश हैं और ऐसे में राज्य सरकार का प्रावधान अनुकूल है। भारतीय समाज में यह अंधानुकरण भविष्य के लिए खतरा साबित हो रहा है। रिश्तों में अविश्वास उत्पन्न हो गया और युवा वर्ग लिव-इन रिलेशनशिप में स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ बैठा है। (लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

दतिया उप चुनाव : सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर

 


























दतिया उप चुनाव : सिंधिया की प्रतिष्ठा दांव पर

प्रो. मनोज कुमार

सारे कैमरे और कलम नरोत्तम मिश्रा पर आकर ठहर गया है। मीडिया के लिए खबर है कि भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा को दतिया से मैदान में नहीं उतारना। मीडिया की नजर से देखने वालों के लिए यह बड़ी खबर है। चलो, मान लें कि नरोत्तम को टिकट नहीं देना या उनकी जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर है तो क्या राजेन्द्र भारती की जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर नहीं है? पार्टी की दृष्टि से देखें तो यह रूटीन है और किसे टिकट देना है, किसे प्रत्याशी बनाना है, यह पार्टी तय करती है। जैसे भाजपा ने किया, वही व्यवहार कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती के परिवार को दतिया उपचुनाव से बाहर रखकर किया। इस उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा ना ‘तुम हारे, न हम हारे’ बयान कर रहे हैं। दतिया उप चुनाव में सिंधिया की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर है। चुनाव भाजपा जीत जाती है तो सिंधिया पावरफुल हो जायेंगे और हार जाती है तो नए समीकरण बनेंगे।

दतिया मध्यप्रदेश के उन 320 सीटों में एक विधानसभा सीट है जहाँ उपचुनाव होना है। दतिया उपचुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित होने के साथ हंगामा शुरू हो गया। हंगामा भी भाजपा प्रत्याशी को लेकर है ना कि कांग्रेस को लेकर। अदालत से अयोग्य कांग्रेस के राजेन्द्र भारती के स्थान पर पूर्व विधायक को टिकट दिया जाना मीडिया की नजर में सामान्य है तो नरोत्तम मिश्रा की जगह भाजपा से अन्य को टिकट दिया जाना क्यों असमान्य है। दरअसल, भाजपा पार्टी लाईन से हटकर यह मानस बना लिया गया था कि दतिया उपचुनाव में भाजपा से नरोत्तम मिश्रा ही उम्मीदवार होंगे जबकि पार्टी की तरफ से ऐसा कोई संदेश नहीं दिया गया था। कांग्रेस के लिए मीडिया में इसलिए रार नहीं मचा कि राजेन्द्र भारती की जगह किसी को भी टिकट दें, क्या ही फर्क पडऩे वाला है? शुरूआती दौर में श्रीमती राजेन्द्र भारती को टिकट देने की सुगबुगाहट हुई थी लेकिन उनकी जगह पर पूर्व विधायक को टिकट देने को पार्टी का सामान्य फैसला मान लिया गया। 

दतिया उप चुनाव के लिए भाजपा मीडिया के केन्द्र में है। खबरें यह भी चल पड़ी कि नरोत्तम मिश्र का टिकट काट दिया गया। क्या कोई बताएगा कि भाजपा ने कब उन्हें दतिया उप चुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित किया था, जो उनकी टिकट काट कर किसी अन्य को दे दिया गया? पार्टी ने तो किसी का नाम ही ऐलान नहीं किया था, तो नाम कटने का सवाल कहाँ से आया? हाँ, इतना जरूर हुआ कि जैसा होता है, उसके आधार पर मान लिया गया था कि दतिया से नरोत्तम चुनाव में पराजित हुए थे, सो उन्हें ही मौका दिया जाएगा। भाजपा अपनी रीति-नीति के अनुरूप इस ढर्रे को बदल कर नए प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया। वैसे तो कहा जाए कि कांग्रेस ने भी राजेन्द्र भारती के परिवार का टिकट काट दिया। यहाँ भी वही बात लागू होती है कि अदालत ने राजेन्द्र भारती को अयोग्य घोषित किया और कांग्रेस को जरूरी नहीं लगा कि उनके परिजनों को चुनाव मैदान में उतारा जाना चाहिए। दरअसल, इस पूरे परिदृश्य में जो सबसे बड़ी स्थिति उत्पन्न हुई है, वह यह कि फिलहाल भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा परिवार को और कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती परिवार को चुनाव से अलग-थलग कर दिया है। यहाँ पर एक पुरानी राजनीतिक कहावत-‘ना तुम जीते, ना हम।’ 

अब थोड़े इस बात की भी चिंता कर लें। नरोत्तम का अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रभाव है और भाजपा उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती तो जीत के आसार बड़े थे। नरोत्तम उम्मीदवार बनते तो कांग्रेस के राजेन्द्र भारती पर लगे आरोप को भाजपा भुनाती और अब नरोत्तम उम्मीदवार नहीं हैं तो भी वह इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास करेगी। नरोत्तम को टिकट नहीं मिलने से उनके समर्थकों को गुस्सा होना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन जिस तरह सडक़ पर गुस्सा उतरा वह नरोत्तम के राजनीति सेहत को बिगाड़ता है। 26 साल पहले छत्तीसगढ़ में बृजमोहन समर्थकों ने ऐसे ही गुस्से का इजहार नए-नवेले छत्तीसगढ़ में किया था। तब इसका खामियाज़ा बृजमोहन अग्रवाल को भुगतना पड़ा था। एक बार यह दोहराता हुआ दिख रहा है। फिलहाल तो भाजपा संगठन ने कहा कि है नरोत्तम मिश्र की अगुवाई में दतिया उप चुनाव जीत लेेंगे। और ऐसा हो जाए तो हैरानी नहीं होगी क्योंकि कांग्रेस के पास बचाव का कोई अभेद तरीका नहीं दिखता है। पार्टी ने दतिया उप चुनाव की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी है और उनकी सहज अपेक्षा होगी कि दतिया सीट भाजपा के खाते में आए। सिंधिया पूरी ताकत लगा देेंगे और जीत भी असंभव नहीं है। कदाचित दतिया उप चुनाव भाजपा खेत रही तो सिंधिया के राजनीतिक अस्तित्व पर भी सवाल उठ सकते हैं। यहाँ भाजपा के खोने के लिए बहुत कुछ दिख रहा है और कांग्रेस के पास ऐसा कुछ नहीं है। खबरें चल रही हैं, राजनीतिक गलियारों से खबरें आ रही हैं कि यहाँ भाजपा ने कांग्रेस को वाकओवहर दिया है और ऐसा है तो भविष्य सवालों के बीच है और समय की प्रतीक्षा ही शेष है।

शनिवार, 11 जुलाई 2026

 

क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ?

चीखती, दम तोड़ती बच्ची का सवाल....

प्रो. मनोज कुमार

स्त्री शक्ति की दुहाई देते देवियों को पूजने वाले हमारे समाज की हकीकत है। राजस्थान की वह मासूम जिसने अभी चलना ही शुरू किया था। जिंदगी में वह रंग भरती, इसके पहले उसे बदरंग कर दिया गया। दरिदंगों की शिकार बच्ची मर गई। उसे मरना तो था ही। पहले ही उसकी आत्मा मर गई थी। बदन पर खुरचे गए जख्म उसे पल प्रति पल मार रहे थे। ये उसका ही साहस था कि वह दरिदों को बेनकाब करने खुद को बचा कर सडक़ पर आ गई थी। यह बच्ची दरिदंगी की शिकार का वह चेहरा है जहाँ हजारों-हजार बच्चियाँ शिकार हो रही हैं। बेमौत मर रही हैं और अपराधी बेखौफ हैं। कुछ समय पहले देश के सबसे शिक्षित राज्य कहे जाने वाले केरल से ऐसी ही खबर आयी और हाल में मध्यप्रदेश के भोपाल से खबर मिल रही है। ऐसे अपराध का सिलसिला थमा नहीं है। निर्भया को लेकर समाज ने जो सजगता दिखायी थी, तब लगा था कि समाज ऐसी दरिदंगी के खिलाफ सजग और सचेत रहेगा और शायद ऐसे लोगों में डर पैदा होगा लेकिन हालात ऐसी कोई चिंह अपने पीछे नहीं छोड़ रहा है। हालत बद से बदतर होती जा रही है। 

राजस्थान में जो कुछ हुआ, उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। 32 दानवों में से कुछ को पुलिस ने धर लिया है। सडक़ों पर उनकी पिटाई हो रही है। चिंहित लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की खबर भी है। यह एक तरीका हो सकता है लेकिन इसके खिलाफ डर पैदा करना इस समय की बड़ी जरूरत है। अपराध के आंकड़ों को देखें तो कोई राज्य कम या कोई ज्यादा होता है और इन आंकड़ों से बहुत ज्यादा फर्क पडऩे वाला नहीं है। मूल बात है उस दरिदें सोच की। समाज के प्रतिकूल व्यवहार करने के लिए कभी फिल्मों को दोष दिया जाता था और अब सोशल मीडिया को। लेकिन क्या दोष देने से मामला समाप्त हो जाता है। मान भी लें कि फिल्मों के चलते अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं तो फिल्मों को देखकर हम सीखते क्यों नहीं? हिंदी फिल्म मदर इंडिया तो आपके हमारे जेहन में है। अपराध के लिए अपने ही बेटे को मार डालने वाली माँ क्यों हमारे लिए सबक नहीं बनती है। मुझे स्मरण हो रहा है कि छतरपुर या टीकमगढ़ में एकाध दशक पहले गाँव की पंच या सरपंच रही एक स्त्री ने अपने बेटे को इसलिए गाँव निकाला कर दिया कि उसने पंचायत का नियम तोडक़र शराब पीने की जुर्रत की थी। एक उदाहरण यह भी है। एक दृष्टांत लोकमाता अहिल्या का भी मिलता है जिन्होंने अनैतिक आचरण पर बेटे को सजा दी थी। 

हमारे समाज का दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे विमर्श में इस समय दूसरे हजारों विषय हैं लेकिन नैतिक रूप से पतित होते इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है। शिक्षा से जुड़ी अमिता नीरव जैसी कुछेक लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं। बहुसंख्य वीडियो इधर से उधर करने में लगे हैं। एक किस्म का इसे भी सायबर अपराध मान सकते हैं। ये दरिदें केवल हैवान नहीं हैं बल्कि इससे आगे निकल कर ये नरभक्षी हो गए हैं। डराने वाली बात यह है कि इस अपराध में बालिक के साथ नाबालिग भी शरीक हैं। थू करते हैं, घिन आती है ऐसे लोगों पर लिखते, बोलते और सोचते हुए। निरपराध मासूम दुनिया से चली गई और हमने आज नहीं बोला तो वह दूर बैठी हमसे सवाल कर रही होगी, क्यों मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाये? क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ। मन थर्रा उठता है और तब जब हम अपने आसपास की बच्चियों को चेहरा देखते हैं। कल्पना करके सिहरन हो उठती है और मन पहले से ज्यादा डरा हुआ महसूस करते हैं।

कह सकते हैं कि सरकार को चाहिए कि वह अपराध को रोके और यह सच भी है। लेकिन हमारी जवाबदारी कौन तय करेगा? पहले हमें जिम्मेदारी उठानी होगी। कानून अपना काम करेगा और पुलिस अपना लेकिन इससे पहले सुरक्षा की जवाबदारी हमें लेना होगी। जमाने भर के नए एप आ गए हैं। तकनीक बाँह पसारे हर कुछ कर रही है तब स्कूल, कॉलेज जाती बच्चियाँ, ऑफिस जाती बहन बेटियों को सुरक्षा दी जाए। उनके भीतर कांफिडेंस क्रियेट किया जाए कि डरना नहीं है। हालाँकि निजी तौर पर मानना है कि जब स्थिति भयानक हो जाती है तब ये सारी सीख कागजी साबित हो जाती है। फिर भी कुछ तो उम्मीद रखना होगी, कुछ तो कोशिश करना होगा। कानून को भी ऐसे अपराधों के लिए नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है। मकान गिरा दिए गए, यह उचित है। इससे आगे बढक़र उनकी संपत्ति और कैश को राजसात कर उन्हें अपंग बना दिया जाए ताकि रास्ते ढूंढ कर बच ना सकें। हमारे एडव्होकेट समाज ने कई बार मिसाल पेश की है कि ऐसे मामलों की पैरवी ना कर। इस बार भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा होगी। एक बड़ा सवाल यह है कि एक रिक्शे वाले से लेकर होटल-दर-होटल बच्ची का सौदा होता रहा और किसी को खबर नहीं हुई? इसकी पड़ताल करना भी जरूरी है। इन दरिंदों के अलावा और कौन है जिनके चेहरे अभी ढके-छिपे हैं। एक और इल्तजा है कि इसे राजनीतिक चश्मे से परे देखा जाए तो मासूम को शायद शांति मिल पाए।

रविवार, 5 जुलाई 2026

तीजन, भाऊ साहब और वो समय

 

















तीजन, भाऊ साहब और वो समय

प्रो. मनोज कुमार

तीजन बाई नहीं रहीं। ख़बर दुखदायक है लेकिन होनी है। अभी वे 70 वर्ष की थीं। कुछ समय से बीमार भी थीं और इससे भी बड़ी बात यह कि वे इन दिनों लगभग गुमनाम सी भी थीं। 

मेरी पहली मुलाकात मध्यप्रदेश आदिवासी लोक कला परिषद के ऑफिस में हुई थी। तब यह ऑफिस मालवीय नगर में आज के मुकाबले विपन्न सा था लेकिन इसकी गामक भाऊ साहब से थी। भाऊ साहब बोले तो खिरवरडकर साहब। कहने को तो वो अफसर थे लेकिन सचाई यह थी कि वे चलते फिरते स्कूल थे। कम से कम मुझ जैसे के लिए। या वही समय था। तीजन बाई, तब तीजन बाई नहीं बनी थी, बावजूद इसके इनकी प्रतिभा चमकने लगी थी। कला उनकी थी और कलाकार बनाने में भाऊ साहब की भूमिका बड़ी थी। वो गुरु थे और वो तराशना जानते थे। तीजन को मंच दिया। गनियारी गांव से निकली लड़की भोपाल से दिल्ली और लोगों के दिलों में उतरती सात समंदर पार पंडवानी की नायिका बन गई।

इस पहली मुलाकात करते समय मैं और दोस्त सुनील मिश्र साथ थे। मैं उनसे एक पत्रकार बनकर सवाल कर रहा था तो सुनील एक कला समीक्षक के नाते। जब मैने तीजन से सवाल किया कि वो देहाती कपड़ों को छोड़ कर ये शहरी फैशन वाले कपड़े पहनने लगी तो उन्होंने हँस कर टाल दिया। सुनील को तब ये सवाल और ऐसे ही कुछ सवाल तल्ख लगे। हालांकि बाद में हम दोनों एक साथ तब की प्रमुख सांस्कृतिक पत्रिका सारंगा स्वर में छपे। इसके पहले धर्मयुग और बाद में सहारा, लोकमत समाचार सहित अनेक जगह तीजन पर फीचर आर्टिकल छपा।

संभवतः तीजन उन चुनिंदा कलाकारों में हैं जिन्हें तीन पद्म सम्मान मिले। उन्होंने एक तरफ पांडवानी को दुनिया के समक्ष प्रतिष्ठित किया तो वे छत्तीसगढ़ की अघोषित सांस्कृतिक राजदूत की तरह काम करती रहीं। निजी जीवन उनका सरल नहीं रहा। महाभारत का गायन वो करती रहीं और निजी जीवन में उनके लड़ाइयाँ लड़ीं। उनकी मंशा थी कि वे तीजन विद्यापीठ बन जाए। भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंधन ने अपने स्कूल में पंडवानी पढ़ाने के लिए नियुक्त किया था लेकिन वह भी औपचारिक ही रहा। तीजन की परंपरा से रितु वर्मा और शांति बाई चेलक आईं लेकिन तीजन के पासंग खड़ी नहीं हो पाई। शांति का पता नहीं, शायद रितु को भी भाऊ साहब का सानिध्य मिला। सही भी है, हर कोई तीजन नहीं हो सकता।

छत्तीसगढ़ क्या, मध्यप्रदेश क्या, वो पूरी लोक कला की राजदूत थीं। उनका जाना एक परंपरा का थम जाना है। तीजन को याद करते समय बार बार भाऊ साहब की याद भी आ जा जाती है। और एक सच यह भी है कि उनके जाने बाद संस्कृति विभाग में अफसर आए, गुरु नहीं। वैसे ही जैसे स्वामीनाथन ने ईट गारा उठाने वाली भूरी बाई के भीतर की कलाकार तलाश कर लिया था।

तीजन बाई कैसे कहें कि तुम हमारे बीच से चली गई हो।

सादर नमन


गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...