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कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया

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आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश मनोज कुमार हिन्दुस्तान में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बज चुका था. 1857 के विद्रोह की चिंगारी हर वर्ग और हर अंचल में सुलगने लगी थी. किसी को अपनी जान की फिक्र नहीं थी और जो फिक्र थी तो अपने वतन की. अंग्रेजी शासन हर स्तर पर विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कार्यवाही कर रहा था. इतिहास के सुनहरे पन्नों पर जिन बलिदानियों के नाम अंकित हैं, उनमें राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का नाम सबसे ऊपर है. पिता-पुत्र की कविता से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह विद्रोह का गीत है. पिता-पुत्र के बलिदान के साथ पूरा देश उनकी जयकारा करने लगा और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत हो गई. आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसे वीर पुत्रों का स्मरण कर मध्यप्रदेश की माटी सदैव उनकी ऋणी रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के इस महान प्रसंग के माध्यम से नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाना है. राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, दोनों पिता-पुत्र अच्छे कवि होने के कारण अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से जनमानस

श्यामपट्ट से की-बोर्ड तक हिन्दी

 मनोज कुमार हर साल की तरह बिसूरने के लिए 14 सितम्बर का दिन फिर आ गया और यह अंक जब आपके हाथों में होगा, दिन, सप्ताह, पखवाड़ा और महीना लोप हो चुका होगा. कदाचित हिन्दी डे से हिन्दी मंथ पर बहस चल रही होगी. हिन्दी को लेकर हमारा आग्रह-अनुराग होना चाहिए और यह हो भी रहा है लेकिन हिन्दी को लेकर हमें हीनता से बाहर आना होगा. कल तक जो हिन्दी मध्यम और निम्र मध्यम वर्ग की भाषा थी, आज वह गूगल की भाषा बनकर पूरी दुनिया की जरूरत बन गई है. एक समय था जब अंग्रेजी पत्रिकाओं को हिन्दी में अनुदित होकर पाठकों के मध्य आना विवशता थी कि क्योंकि अंग्रेजी से उनका जीवन गुजरता था लेकिन रोटी हिन्दी से ही मिलती थी. टेक्रालॉजी के विस्तार के साथ हिन्दी का साम्राज्य बढ़ता चला गया. कल तक भारतीय प्रकाशक हिन्दी को मजबूरी मान रहे थे तो आज वैश्विक समाज के लिए हिन्दी जरूरी है. ऐसे में हिन्दी को लेकर विलाप करने के बजाय हमें हिन्दी के प्रभाव पर चर्चा करना चाहिए. हिन्दी कभी रूढ़िवादी नहीं रही. बल्कि वह बहते निर्मल जल की तरह अपना रास्ता बनाती गई. भाषा का यह लचीलापन हिन्दी का सबसे सबल पक्ष है. उसके समक्ष यह बंधन कभी नहीं रहा कि वह कि

सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल

मनोज कुमार राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गु

शिक्षा और दीक्षा

 शिक्षा और दीक्षा मनोज कुमार       आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया. शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली. बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किसम के जतन करने पड़ते हैं. अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है. और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है. उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है. फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है. अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया. मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा.   

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर राष्ट्रीय वेबीनार इतिहास की पुर्नव्याख्या करने की जरूरत- डॉ. रत्नम महू (इंदौर). 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय मूल्यों की बात की गई है. इस संदर्भ में इतिहास विषय के शिक्षकों की जिम्मेदारी बढ़ गई है क्योंकि नई शिक्षा नीति में उनके प्रभावी क्रियान्वयन उन्हें करना है.  उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि के साथ इतिहास की पुर्नव्याख्या करने की जरूरत है. यह बात भारतीय इतिहास परिषद, भारत शासन के सदस्य प्रो. कुमार रत्नम ने कही. प्रो. रत्नम डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्वावधान में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इतिहास’ विषय के शिक्षकों की भूमिका पर आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो निरंतर अकादमिक चिंतन कर रहा है और एनईपी के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा निर्धारण करने में अपना योगदान दे रहा है. प्रो. रत्नम ने ब्राउस को इस बात का प्रस्ताव दिया कि भारतीय इतिहास परिषद साथ मिलकर

शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में

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  आजादी का अमृत पर्व अर्थात उन दिनों को गौरवपूर्वक याद करने का समय जिनके साहस और बलिदान से आज हम स्वतंत्र हैं लेकिन कुछ उन ऐतिहासिक घटनाओं को भी याद करना और नई पीढ़ी को बताने की जवाबदारी भी हमारी है. इतिहास के पन्नों से कुछ कहानियां शोध पत्रिका "समागम " के नए अंक में 

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी ‘शिक्षा नीति में मनोविज्ञान  के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका-प्रो. मिश्र महू (इंदौर). ‘शिक्षा नीति-2020 के पूरे प्रारूप में मनोविज्ञान विषय के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका रेखांकित की गई है. शिक्षा पद्धति, मूल्यांकन  और शिक्षा तथा विद्यार्थियों के संबंध में जो नई संकल्पना प्रस्तुत की गई है, उसे कार्य व्यवहार में लाने के लिए मनोविज्ञान शिक्षकों की अहम भूमिका है.’ यह बात महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरिश्वर मिश्र ने डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस)के शिक्षा अध्ययन शाला एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्ववाधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार में कही. प्रोफेसर मिश्र का कहना था कि शिक्षा की रूपरेखा बदल गई है. अब नए तरीके से माइंडसेट करने की जरूरत शिक्षकों, विद्यार्थियों और पालकों को करने की जरूरत है. प्रोफेसर मिश्र का सुझाव था कि मनोविज्ञान के शिक्षकों को भी इस नई संकल्पना में प्रशिक्षण की आवश्यकता है. विद्यार्थी की रचनात्मकता और उसकी रूचि के अनुरूप अब