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आपदा में अवसर के खिलाफ संकट में समाधान की जरूरत

मनोज कुमार      आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है. स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है. बार बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है. आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है. खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है. अस्पताल मनमाना फीस वसूल रहे हैं. जान बचाने के लिए लोग अपने घर और सम्पत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं. हालात बद से बदतर हुआ जा रहा है. शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गई लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा. कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है. यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार      तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.      भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ,

मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक साथी

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मनोज कुमार मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई. वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं. वही श्रमिक साथी जिनके पास जीवन जीने लायक मजदूरी से मिला मेहताना होता है. घर पर कोई पक्की छत नहीं. धरती को बिछा लेते हैं और आसमां को ओढ़ लेते हैं. इनकी उम्मीदें भी कभी हिल्लोरे नहीं मारती है. मोटरकार से लेकर जहाज तक खड़ा कर देते हैं लेकिन इसमें सवार होने की इच्छा कभी नहीं होती है. ये श्रमिक रचनाकार हैं और इनसे समाज की धडक़न है. इन्हें अपना अधिकार भी पता है और दायित्व भी. अधिकार के लिए कभी अड़े नहीं लेकिन दायित्व से पीछे हटे नहीं. आज की तारीख से पहले अखबार में खबर छपी कि देश के प्लांट मे ऑक्सीजन निर्माण में जुटे श्रमिकों ने अपने खाना इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें पहले काम पूरा करना है. यह जज्बा श्रमिकों में ही हो सकता है. श्रमिक श्रेष्ठ हैं तो इसलिए नहीं कि वे श्रमिक हैं बल्कि एक तरह से वे रचियता हैं. मांगना इनकी आदत में नहीं है. देना इनकी फितरत में शामिल है. आत्मस्वाभिमान से जीने वाले श्रमिक साथी अपना भोजन छोडक़र एक संदेश दिया है कि आओ, पहले जान बचायें. एक-एक जान की कीमत श्रमिक साथियों को पता ह

‘सु’ अपने साथ ले गए और ‘नील’ हम हो गए

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मनोज कुमार रात हो रही थी और लगभग थक सा गया था लेकिन मन बार बार सोशल मीडिया पर अटका हुआ था. एक बार फिर हिम्मत कर फेसबुक ओपन किया तो पहली खबर सुनील के नहीं रहने की मिली. दयाशंकर मिश्र ने यह सूचना पोस्ट की थी. सहसा यकिन नहीं हुआ लेकिन दयाशंकर के पोस्ट पर अविश्वास करने का भी कोई कारण नहीं था. वे एक जिम्मेदार लेखक-पत्रकार हैं अत: मन मारकर खबर पर यकीन करना पड़ा. इसके बाद तो कई लोगों ने यह सूचना शेयर किया. इस खबर को पढक़र कर सुनील पर गुस्सा आया. कुछ पलों में उसने पराया कर दिया. हम लोगों के बीच में कोई व्यवसायिक रिश्ता नहीं था. लेकिन जो था, वह हम दोनों ही जानते थे. पांचेक साल पहले जब मेरे दिल की चीर-फाड़ की नौबत आयी थी तो सबसे पहले चिंता करने वालों में सुनील था. इसके बाद पिछले लॉकडाउन से लेकर अब तक अपनी बीमारी से दो-चार हो रहा हूं. इस बीच एक बार सुनील से मुलाकात हुई. वही चाय पीकर जाना लेकिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक जो चाय का हाल है, सो चाय समय पर नहीं आयी. अगली बार साथ चाय पियेंगे के वायदे के साथ मैं चला आया. शारीरिक रूप से अपेक्षाकृत कमजोर होने के बाद बहुत देर तक बैठा नहीं जा रहा था. हां, इस ब

यह समय परखने का नहीं, साथ चलने का है

मनोज कुमार           कोरोना महामारी को लेकर आज जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी के भी अनुमान को झुठला रही है. एक साल पहले कोरोना ने जो तांडव किया था, उससे हम सहम गए थे लेकिन बीच के कुछ समय कोरोना का प्रकोप कम रहने के बाद हम सब लगभग बेफिक्र हो गए. इसके बाद ‘मंगल टीका’ आने के बाद तो जैसे हम लापरवाह हो गए. हमने मान लिया कि टीका लग जाने के बाद हमें संजीवनी मिल गई है और अब कोरोना हम पर बेअसर होगा. पहले टीका लगवाने में आना-कानी और बाद में  टीका लग जाने के बाद मनमानी. यह इस समय का कड़ुवा सच है. सच तो यह भी है कि यह समय किसी को परखने का नहीं है बल्कि एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने का है. लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे हैं. हम व्याकुल हैं, परेशान हैं और हम उस पूरी व्यवस्था को परखने में लगे हुए हैं जिसके हम भी हिस्सेदार हैं. यह मान लेना चाहिए. सोशल मीडिया में व्यवस्था को कोसने का जो स्वांग हम रच रहे हैं, हकीकत में हम खुद को धोखा दे रहे हैं. हम यह जानते हैं कि जिस आक्रामक ढंग से कोरोना का आक्रमण हुआ है, उससे निपटने में सारी मशीनरी फेल हो जाती है. फिर हमें भी इसकी कमान दे दी जाए तो हम भी उसी फेलुअर
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                                                                                            शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक राष्ट्र-कवि पंडित                                                                                                      माखनलाल   चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ के                                                                                                 शताब्दी वर्ष पर

दादा का ‘पुष्प’ और देश की ‘अभिलाषा’

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मनोज कुमार भारत की आजादी के 75वें वर्ष का अमृत-महोत्सव आरंभ हो चुका है। एक वर्ष पश्चात जब हम आजादी का अमृत-पान कर रहे होंगे तब इस पूरी अवधि में स्वाधीनता संग्राम के उन नायकों को तलाश करना आवश्यक हो जाता है। यह संयोग है कि सम्पूर्ण स्वाधीनता संग्राम में अपनी कलम से अलग जगाने वाले पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ अपने रचे जाने का शताब्दी वर्ष मना रही है। एक वर्ष बाद इस कविता के गौरवशाली सौ वर्ष पूर्ण हो जाएंगे। हिन्दी साहित्य के पन्नों में अनेक कविताएं ऐसी हैं जिन्हें आप कालजयी रचना की श्रेणी में रखते हैं लेकिन पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ उन सबसे इतर है। यह इसलिए कि पहला तो इस कविता की रचना सामान्य परिस्थितियों में कवि की भावनाओं का लेखन ना होकर जेल की काल-कोठरी में हुआ था। दादा माखनलाल जी को यह काल-कोठरी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने की सजा के तौर पर मिली थी। आजादी के दीवानों को भला कौन कैद रख सकता है, इस बात की गवाही उनकी कविता ‘पुष्प की अभिलाषा’ की अभिलाषा देती है। शरीर से वे जरूर अंग्रेजों के बंधक थे लेकिन मन में देश-प्रेम के भा