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‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी

 ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मनोविज्ञान शिक्षकों की भूमिका’ पर संगोष्ठी ‘शिक्षा नीति में मनोविज्ञान  के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका-प्रो. मिश्र महू (इंदौर). ‘शिक्षा नीति-2020 के पूरे प्रारूप में मनोविज्ञान विषय के शिक्षकों की प्रभावी भूमिका रेखांकित की गई है. शिक्षा पद्धति, मूल्यांकन  और शिक्षा तथा विद्यार्थियों के संबंध में जो नई संकल्पना प्रस्तुत की गई है, उसे कार्य व्यवहार में लाने के लिए मनोविज्ञान शिक्षकों की अहम भूमिका है.’ यह बात महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरिश्वर मिश्र ने डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय (ब्राउस)के शिक्षा अध्ययन शाला एवं भारतीय शिक्षण मंडल के संयुक्त तत्ववाधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार में कही. प्रोफेसर मिश्र का कहना था कि शिक्षा की रूपरेखा बदल गई है. अब नए तरीके से माइंडसेट करने की जरूरत शिक्षकों, विद्यार्थियों और पालकों को करने की जरूरत है. प्रोफेसर मिश्र का सुझाव था कि मनोविज्ञान के शिक्षकों को भी इस नई संकल्पना में प्रशिक्षण की आवश्यकता है. विद्यार्थी की रचनात्मकता और उसकी रूचि के अनुरूप अब

डिजीटल अम्ब्रेला के नीचे शासन और सरकार

 मनोज कुमार क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि पेपरलेस वर्क कर कोई विभाग कुछ महीनों में चार करोड़़ से अधिक की राशि बचा सकता है? सुनने में कुछ अतिशयोक्ति लग सकती है लेकिन यह सौफीसदी सच है कि ऐसा हुआ है. यह उपलब्धि जनसम्पर्क संचालनालय ने अपने हिस्से में ली है. हालांकि यहां स्मरण करना होगा कि खंडवा सहित कुछ जिला जनसम्पर्क कार्यालयों को पेपरलेस बना दिया गया था. तब इस पेपरलेस वर्क कल्चर से कितनी बचत हुई, इसका लेखाजोखा सामने नहीं आया था. कोरोना के कहर के बाद जनसम्पर्क संचालनालय ने सुध ली और पेपरलेस वर्क कल्चर को अमलीजामा पहनाकर खर्च में कटौती की तरफ अपना कदम बढ़ा दिया है. निश्चित रूप से इसे आप नवाचार कह सकते हैं. ऐसा भी नहीं है कि अन्य विभागों ने इस दिशा में कोई उपलब्धि हासिल नहीं की हो लेकिन उनकी ओर से ऐसे आंकड़े सार्वजनिक नहीं होने से आम आदमी को पता नहीं चल रहा है.  मध्यप्रदेश अपने नवाचार के लिए हमेशा चर्चा में रहा है लेकिन इस वक्त हम जिस नवाचार की बात कर रहे हैं, वह सुनियोजित नहीं है लेकिन अब वह दिनचर्या में शामिल हो गया है. नवाचार की यह कहानी शुरू होती है करीब दो वर्ष पहले कोरोना के ध

समाचार और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल-प्रो. सुधीर गव्हाणे

 ‘मीडिया शिक्षा के सौ वर्ष : चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर राष्ट्रीय वेबीनार महू (इंदौर). ‘समाचार विज्ञापन बनता जा रहा है और विज्ञापन अब समाचार के रूप में परिवर्तित हो रहा है. अब समाचार और विज्ञापन में भेद करना मुश्किल है.’ यह बात प्रो. सुधीर गव्हाणे ने कही. सुपरिचित मीडिया शिक्षक प्रो. गव्हाणे  ‘मीडिया शिक्षा के सौ वर्ष : चुनौतियां और संभावनाएं’ विषय पर आयोजित वेबीनार को संबोधित करते हुए कहा कि पत्रकारिता की प्रतिबद्धता लोकतंत्र एवं देश के संविधान के प्रति होना चाहिए. डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, भारतीय जनसंचार संस्थान, नईदिल्ली एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार में उन्होंने पत्रकारिता के पांच सूत्र बताये जिसमें पत्रकारिता की प्रतिबद्धता जनहित, समाज के वंचित एवं पीडि़त लोगों के लिए, सभ्य समाज के निमार्ण तथा राष्ट्रहित एवं देशहित पत्रकारिता का लक्ष्य होना चाहिए. उन्होंने पत्रकारिता को अलग अलग कालखंड में रखकर बताया कि 1920-1947 की प्रहार पत्रकारिता का दौर था तो 1947-60 प्रयोगकाल, 1970-1990 आधार खंड रहा तो 1990-2020 क

बेटी, बोझ नहीं, बेटी बरक्कत का सबब

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  मनोज कुमार मन के अंधियारे को दूर करने के लिए एक दीपक जलाना जरूरी होता है. और जब भारतीय समाज बेटी की बात करता है तो उसके मन में एक किस्म की निराशा और अवसाद होता है. बेटी यानि परिवार के लिए बोझ. यह किसी एक प्रदेश, एक शहर या एक समाज की कहानी नहीं है बल्कि घर-घर की कहानी है. किसी राज्य या शहर में ऐसी सोच रखने वालों की कमी या अधिकता हो सकती है लेकिन हैं सब इस मानसिक बीमारी से ग्रस्त. मध्यप्रदेश इससे अछूता नहीं था. असमय बच्चियों का ब्याह, स्कूल भेजने में हील-हवाला करना और उनके स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही आम थी. लेकिन साल 2007, तारीख 1 अप्रेल जैसे बेटियों के भाग्य खुलने का दिन था. इस दिन देश के ह्दयप्रदेश अर्थात मध्यप्रदेश बेटियों के भाग्य जगाने के लिए योजना आरंभ की थी-लाडली लक्ष्मी योजना. जैसा कि हमारा मन बना होता है सरकार की योजना है, कुछ नहीं होने वाला. कागज पर बना है और कागज पर ही दम तोड़ देगा. आहिस्ता आहिस्ता समय ने करवट ली और शहर से गांव तक बेटियों के हिस्से में खुशियां दस्तक देने लगी. सालों से सरकारी योजनाओं के बारे में बना भरम टूटने लगा. किसी को यकिन ही नहीं हो रहा था कि बेटी, बोझ न

मेरठ से पहले विद्रोह हरियाणा में हुआ- प्रो. पुनिया

महू (इंदौर). भारतीय स्वाधीनता संग्राम में हरियाणा का योगदान अप्रतिम रहा है. 1857 का पहला विद्रोह के लिए मेरठ का उल्लेख मिलता है जबकि मेरठ के पहले अंबाला में प्रथम विद्रोह हुआ था. इस विद्रोह में 50 अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया था. यह बात प्रो. महासिंह पुनिया, निदेशक युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय ने कही. प्रो. पुनिया आजादी के अमृत महोत्सव के तीसरे व्याख्यान में ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा के योगदान विषय पर बोल रहे थे.’ यह आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, हेरिटेज सोसायटी पटना एवं युवा एवं सांस्कृतिक प्रभाग कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय हरियाणा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि हरियाणा का गठन 1966 में हुआ है लेकिन भारतीय स्वाधीनता संग्राम के समय रियासतों में बसा हरियाणा का योगदान अमिट और अमूल्य है. उन्होंने 12 बड़ी लड़ाईयों का तथ्याों के साथ विवरण देकर बताया कि किस तरह अंग्रेजों को हरियाणा के लोगों ने परेशान कर दिया था. प्रो. पुनिया ने कहा कि इतिहास को पुन: लिखने की आवश्यकता है जिसका कार्य आरंभ कर दिया गया है.

ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा

  आजादी का अमृत महोत्सव संगोष्टी   ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा महू (इंदौर)। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमृत महोत्सव के अवसर पर आजादी के नायकों का और सम्पूर्ण आजादी का स्मरण करना हम सबके लिए गौवर की बात है. हमारी आजादी क इतिहास उस आमजन, ग्रामीण और किसान के उत्सर्ग का स्मरण किए बिना पूरा नहीं हो सकता जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपने प्राणों का न्योछावर कर दिया।’ यह बात केन्द्रीय विश्वद्यिालय साउथ बिहार में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल एवं आर्कालॉजिकल विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु कुमार झा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नवीन परिप्रेक्ष्य : ग्रामीण बिहार प्रतिबिंब’ को संबोधित करते हुए कहा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास लेखन के लिए हमें गांव की ओर जाना होगा जहां असंख्य अनाम शहीद हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं. दुनिया भर में भारत का स्वाधीनता आंदोलन अतुलनीय है. उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अहिंसक था लेकिन अंग्रेजी शासक ने अहिंसा का जवाब हिंसा से दिया.   डॉ बी आर अम्बेडकर यूर्निवसिटी ऑफ सोशल साइंस एवं हेरीटेज सो

पांच नहीं, मनुष्य अपने समाथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पेड़ लगाये- शर्मा

  विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी  महू।  ‘पांच पेड़ लगाओ का संकल्प गलत है बल्कि प्रत्येक मनुष्य अपने सामथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पौधा लगाये. प्रकृति ने मनुष्य को समाथ्र्य दिया है कि वह अपने कार्यों से प्रकृति का ऋण चुकाये.’ यह बात पद्यश्री से सम्मानित श्री महेश शर्मा पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे. संगोष्ठी का विषय ‘प्री एंड पोस्ट कोविड-19 : इम्पेक्ट ऑफ एनवायरमेंटएंड बॉयोडॉयवर्सिटी’. संगोष्ठी का आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, स्कूल ऑफ सोशल साइंस, यूजीसी स्ट्राइड प्रोजेक्ट, नेशन एकेडमी ऑफ साइंस चेप्टर, भोपाल एवं सोसायटी ऑफ लाइफ साइंसेंस के संयुक्त तत्वावधान में  किया गया था. मुख्य अतिथि श्री शर्मा ने कहा कि जो रचा गया है, वह मनुष्य के पुरुषार्थ का परिणाम है और जो खराब हो रहा है, वह उसके भीतर का लालच है. उन्होंने मनुष्य एवं पशु की खासियत को स्पष्ट करते हुए कहा कि पशु उपभोग के लिए होता है लेकिन मनुष्य परामर्थ के लिए होता है. मनुष्य समस्या पैदा करता है, पशु नहीं.  उन्होंने कहा कि आप कहीं भी पे