सोमवार, 29 जून 2026

जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय
















जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय

प्रो. मनोज कुमार

मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़ेंगे लेकिन खेतों से लेकर शहरों तक की आँखें पथराई जा रही है। बादल बिना बरसे चले जा रहे हैं। यह समस्या साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। अंधाधुँध विकास के कारण हमने ही यह स्थिति उत्पन्न की है। बीते सालों के मुकाबले इस साल गर्मी का ताप अधिक रहा और आने वाले सालों की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि बीते दिनों को हम लौटा नहीं सकते लेकिन आने वाले दिनों को सुधार जरूर सकते हैं। राज्य में डॉ. मोहन सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान का आरंभ प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से शुरू किया था जो माह जून के आखिरी दिन थम गया। यह अभियान समाज को जागृत करने तथा नदियों, तालाबों, कुँओं और बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार और संरक्षण करना प्रमुख था। स्वाभाविक है कि सरकार अपना काम कर रही है लेकिन समाज की हिस्सेदारी भी जरूरी है। सरकारी आंकड़ों को मानें तो यह अभियान ने सार्थकता प्रदान की है और मान लेना चाहिए कि आंकड़े हवा में जारी नहीं किए जाते हैं। लेकिन इससे आगे की बात यह है कि सरकार के इस अभियान में जिन जलस्रोतों को पुर्नजीवन दिया गया, उसे बचाने और संवारने का समय अब आ चुका है। 

जल प्रकृति का अमूल्य उपहार है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति तथा समस्त जीव-जगत का अस्तित्व जल पर निर्भर है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। किंतु बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन तथा जल प्रदूषण के कारण आज विश्व गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और नदियाँ, तालाब तथा झीलें सूखती जा रही हैं। यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए, तो भविष्य में पीने योग्य जल की भारी कमी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व है।

इस स्थिति में हमें जल गंगा संवर्धन अभियान के आगे अब चलने की जरूरत है। यह अभियान गर्मी के मौसम में शुरू हुआ और जल स्रोतों को स्वच्छ और साफ किया गया। अब इन जल स्रोतों को लबालब करने का समय आ गया है। मानूसन अभी भले ही हमसे आँख-मिचौली कर रहा है लेकिन जब बरसेगा तो हमें लबालब कर देगा, यह उम्मीद बेमानी नहीं है। ऐसे में हम सबका दायित्व बन जाता है कि बारिश की इन बूँदों को सहेज और संवार कर रखें। जल संरक्षण के अनेक उपाय बताये जाते हैं और आप हम में से अनेक लोग करते हैं और यही जल गंगा संवर्धन अभियान को सार्थकता प्रदान करेगा। 

जल संरक्षण के लिए सरकार तो जो करती है और करेगी, हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर क्या कर सकते हैं, इस पर विचार और पहल करने की जरूरत है।  सबसे पहले वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना चाहिए। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों तथा सार्वजनिक भवनों में वर्षा के जल को एकत्र कर भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है और भविष्य के लिए जल उपलब्ध रहता है। इसी तरह वृक्षारोपण भी जल संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। पेड़ वर्षा को आकर्षित करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं। इसलिए अधिक से अधिक पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना आवश्यक है। कुछ साथी इस दिशा में सक्रियता के साथ प्रयास कर रहे हैं और बारिश के पहले ही लोगों को अपने घरों और मोहल्ले में पौधे लगाने की सलाह दे रहे हैं। वर्षाकाल में पौध रोपण करने से इसका परिणाम सुखदायक होता है और थोड़े समय में यह पौध वृक्ष का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

खेती किसानी करने वाले किसान भाईयों को भी कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कम जल में अधिक सिंचाई संभव होती है और जल की बचत होती है। किसानों को कम पानी वाली फसलों को अपनाने तथा वैज्ञानिक खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खेती के लिए पानी की जरूरत सबसे अधिक होती है और खेती ना हो पायी तो अनेक प्रकार के संकटों से समाज को जूझना पड़ सकता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि  जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए। आवश्यक है कि नल को अनावश्यक खुला न छोडऩा, रिसाव की तुरंत मरम्मत कराना, आवश्यकता के अनुसार ही जल का उपयोग करना तथा पानी की बर्बादी रोकना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। छोटी-छोटी सावधानियाँ प्रतिदिन हजारों लीटर जल बचा सकती हैं। हमें इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि हर कार्य सरकार को करना चाहिए। यह ठीक है कि संसाधन जुटाने और समाज को जागरूक करने का कार्य सरकार करती है लेकिन इसे परिणाममूलक बनाने की जवाबदारी अंतत: समाज की होती है। गंगा जल संवर्धन अभियान के माध्यम से जलस्रोतों को पुर्नजीवित करने का कार्य सरकार ने कर दिया है लेकिन इनके लंबे और सुदीर्घ जीवन के लिए जल संरक्षण का कार्य हमें करना होगा। जल संरक्षण एक सामूहिक अभियान है, जिसमें समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को जल का महत्व समझना चाहिए और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करना चाहिए। परिवार में बच्चों को बचपन से ही जल बचाने की आदत सिखानी चाहिए। तस्वीर गूगल से साभार



टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

 













टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

प्रो. मनोज कुमार

सोनम और सिया के मामले को लेकर जवान लडक़ी का पिता जो मेरा दोस्त है, चिंता में डूबा हुआ है। उसे लगता है कि उसकी बेटी के हाथ पीले करने में अब सौ अड़चनें आएगी। टूटता भरोसा और दरकते रिश्ते का यह जीवंत उदाहरण है। दोस्त की बेटी उच्च शिक्षित है, संस्कारी है और आत्मनिर्भर है लेकिन जो सोनम-सिया कांड है, वह उसके भावी जिंदगी का रोड़ा बन रही है। यह एक कड़ुआ सच है और इस सच से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं,नामुमकीन है। जिन स्थितियों, परिस्थतियों मेंं सोनम के बाद सिया प्रकरण हुआ, जो हुआ, सो वो हुआ लेकिन रिश्तों के मध्य भरोसे की एक महीन लकीर टूट गई। इन दोनों के कारण पूरे समाज में निराशा फैल गई है। लोगों को भरोसा रिश्ते से उठने लगा, जबकि सच यह है कि ये दोनों मामले एक अपराधिक मामले हैं। अदालत इसका फैसला करेंगी। साफतौर पर इसका बहुसंख्य समाज से बहुत कुछ लेना-देना नही है। समाज में बहुत किस्म के अपराध होते हैं और इसमें एक यह भी है। लेकिन एक अपराध से इतर समाज का मनोविज्ञान कुछ और ही कहता है। मीडिया रिपोटर््स की मानें तो रिश्ता करने से पहले परिवार अब जासूसों की मदद लेने लगे हैं। वे तहकीकात कर इत्मीनान कर लेना चाहते हैं। यह भारतीय संस्कारों के प्रतिकूल है लेकिन स्थितियाँ ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है।

लौटते हैं मेरे उस दोस्त की चिंता पर। मैं उसकी बातों से इत्तेफाकर रखता हूँ लेकिन निराशावादी नहीं हूँ और उसे समझाता हूँ कि मध्यप्रदेश में आठ करोड़ से अधिक की आबादी है और कोई डेढ़ करोड़ परिवार होंगे। ऐसे में एक परिवार में होने वाली दुघर्टना को नजीर मान लेना उचित नहीं है। वह इस बात से सहमत है लेकिन उसका अगला सवाल होता है कि मान लो, इसी एक परिवार और हो जाए तब? कहने को तो यह कपोल-कल्पित बातें हैं लेकिन कोई मुक्कमल जवाब मेरे पास नहीं है। इसलिए भी नहीं कि विकास की तमाम संभावनाओं के बाद भी हम रूढि़वादी संस्कृति से मुक्ति नहीं पा सके हैं। भारतीय समाज का विवाह का ताना-बाना ऐसा है जो आमतौर पर हमें उत्साह से भर देता है। लेकिन बदलती-बिगड़ती व्यवस्था के कारण विवाह संस्था पर आँच आने लगी है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों? थोड़े समय पहले सुपरिचित अभिनेत्री जया बच्चन ने अपनी नीतिन शादी नहीं करने की बात कही थी। और ऐसे ही गाहे-बगाहे शोध-सर्वेक्षणों में आ रहा है कि भविष्य में विवाह संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। हो सकता है कि ऐसा हो जाए लेकिन इसके पहले जया के बयान पर गौर करना जरूरी है। यह उनकी सोच नहीं, अनुभव हो सकता है। बरसों वैवाहिक जीवन गुजारने के बाद वे अपनी ही बच्ची को ऐसा सुझाव दें तो कहीं ना कहीं उनका अपना अनुभव सामने आता है। ईश्वर करे ऐसी सारी बातें खारिज हो जाएं लेकिन सोनम-सिया प्रकरण के चलते सोचना जरूरी हो जाता है। 

भारतीय विवाह संस्था का ताना-बाना कितना बिखरेगा, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन खरोंच अभी से आने लगी है और दिखने लगा है। लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी प्रथा इसके मूल में है। कथित आजादी की आवाज के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप भारतीय समाज के ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर रही है। अनादिकाल से भारतीय समाज में विवाह संस्था का अस्तित्व है और हर सनातनी के लिए यह एक धर्म है, नैतिक दायित्व है। ऐसे अनेक परिवार मिल जाएँगे जिनके परिजनों में पच्चीस, पचास और पचहतरवीं शादी की सालगिरह मनायी जाती है। विवाह एक सामाजिक बंधन नहीं बल्कि यह सामाजिक रिश्तों को विस्तार देने की परंपरा है। सनातन में एक ही गोत्र में शादी करना वर्जित माना गया है तो इसके पीछे भी वैज्ञानिक सोच काम करती है। जब दो अलग परिवार मिलते हैं तो समाज में एक नए समूह का उदय होता है लेकिन निकट के रिश्तों में शादी होने से संबंधों का दायरा छोटा हो जाता है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। एक पिता के नाते मेरे दोस्त की चिंता जायज हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर देखें तो इतनी चिंता की बात नहीं है। सोनम-सिया के प्रकरण को महज एक अपराधिक कृत्य ही मानें और इसका फैसला कानून समय के साथ करेगा। जो दोषी होगा, उसे सजा मिलेगी लेकिन एक ही तराजू पर रखकर तौलने से सामाजिक ताना-बाना भरभरा कर गिर जाएगा। विवाह भारतीय समाज का संस्कार है, विधान है और एक जरूरी परंपरा। इसे ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है समाज के भरोसे को टूटने से बचाना और रिश्तों को मजबूती से जोडक़र रखना। भारतीय समाज में, सनातन प्रकृति में बहुत सारी चीजें दरक रही हैं लेकिन दरकते रिश्तों को बचाना भी हमारा दायित्व है। और इन सबके लिए जरूरी है स्वयं के ऊपर विश्वास बनाये रखना।

सोमवार, 15 जून 2026

चाँदनी को आशीष और समाज को संदेश

 










प्रो. मनोज कुमार

सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी प्रतिभा से उजाला फैलाने वाले इस प्रतिभावान बच्ची का नाम है चाँदनी। अपने नाम के अनुरूप अपनी प्रतिभा की रोशनी फैलायी कि सरकार अंतिमजन के द्वार पहुँच गई।

यूँ तो ऐसी किसी प्रतिभा का खिल जाना कोई असामान्य घटना नहीं है लेकिन चाँदनी का मामला अब थोड़ा अलग है। उसकी प्रतिभा की गूँज ऐसी थी कि मोहन सरकार उनके द्वार पर पहुँच कर उसकी पीठ थपथपा कर उसे हौसला दिया और कहा कि- ‘तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यहाँ हम से मतलब डॉ. मोहन यादव नहीं, मध्यप्रदेश सरकार है। इसे राजनीतिक चश्मे से देखिए तो भी आपको एक अपनापन सा लगेगा। प्रतिभावान चाँदनी के सिर पर हाथ फेरते डॉ. मोहन यादव गए तो मुख्यमंत्री बनकर उसके घर लेकिन भाव एक पालक का दिख रहा था। परिवार के साथ बैठने वाले तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लेकिन उसके परिवार ने उन्हें अपना कोई भाई, मामा या चाचा के रूप में देखा। ऐसे अवसर बिरले होते हैं। स्वाभाविक है कि डॉ. मोहन यादव और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच एक महीन सी रेखा है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। अपना शुभाषीश दिया, प्रतिभावान चाँदनी से उसके भविष्य के सपने सुने और आश्वस्त किया कि वो सब कुछ किया जाएगा, जिसका उसका मन है। परिजनों से उनके बारे में पूछा और बातचीत की। हम महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार की उस समय क्या मनोदशा रही होगी जब स्वयं सरकार उनके पास बैठी है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 वर्ष के सफल कार्यकाल और उनके कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने और जोडऩे का एक सिलसिला जारी है। और ऐसा पहले भी होता रहा है। यहाँ भी यह हुआ तो कोई हैरानी नहीं लेकिन हैरानी है कि पूरे लाव-लश्कर के साथ सरकार उन्हें अपने दरबार में बुलाकर भी सम्मानित कर सकती थी, पीठ ठोंक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और सरकार स्वयं चाँदनी के घर पहुँच गई। तंग गलियों में सरकार का लाव-लश्कर नहीं जा सकता है इसलिए अधिकतर सरकारों ने वहाँ जाने से परहेज किया। डॉ. मोहन यादव भी ऐसा कर सकते थे लेकिन किया नहीं। सरकार को पीछे छोडक़र ई-स्कूटर खुद चलाते हुए विधायक सबनानी को पीछे बिठाकर पहुँच गए। अपने अंदाज में बात-बात पर ठहाका लगाने वाले मोहन ने पूरे परिवार को मोह लिया। सेल्फी ली और उनके हाल जानें। इसे एक राजनीतिज्ञ से जोडक़र देखने के बजाय एक सोच के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके इस नवाचार से समाज में संदेश जाता है कि एक सरकार ऐसी भी होती है, एक मुख्यमंत्री स्कूटर में बैठकर तंग गलियों में जा पहुँचता है तो उन हजारों-हजार बच्चों को तसल्ली होती है कि इस बार ना सही, अगली बार उनका मूल्यांकन करने सरकार ना सही, मुख्यमंत्री ना सही, मोहन भिया जरूर आएंगे।

स्मरण आ रहा है कि इसके पहले भी कुछ मंत्रियों ने प्रतिभावान बच्चों को और उनके परिवार को फोन लगाकर बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाया था। शायद यह उसका विस्तार है जिसे स्वयं मुख्यमंत्री ने दिया है। यह केवल चाँदनी का हौसला बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि एक खामोश संदेश यह है कि जो जहाँ है, वह वहाँ जाकर ऐसी प्रतिभाओं का, उनके परिवार का हौसला बढ़ाये। यह समझना मुश्किल नहीं है कि वो परिवार, वो बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा से आगे बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे लेकिन इस तरह की गैर-राजनीतिक नवाचार समाज में सकरात्मक भाव उत्पन्न करता है। मुख्यमंत्री के चाँदनी के घर जाने से उसके परिवार की गरीबी दूर नहीं होगी और ना ही चाँदनी के दैनंदिनी जीवन में कोई बड़ा बदलाव आएगा लेकिन जो बदलाव आएगा, वह नेपथ्य में होगा। वह बदलाव दिखेगा नहीं लेकिन मोहन भिया के आशीष से उसका मन पर्वत बन जाएगा और वह अपने मन के पर्वत की विजेता। उसके सपने को चार चाँद लग गए हैं और स्वयं का भरोसा बढ़ गया है। ध्यान आता है लेकिन पक्का-पक्का नहीं, रींवा की बेटी भी ऐसे ही अपने सपने पूरे कर जहाज उड़ाने लगी और एक दिन हमारे सामने आज की टॉपर चाँदनी कर अपने सपने को सच करती हुई आर्मी में लेफ्टिनेंट बनकर खड़ी होगी। उसके सपने, उसके हौसले से पूरे होंगे लेकिन थोड़ा-थोड़ा सा असर मोहन भिया के सिर पर हाथ रखने का होगा। सीख यही है कि हम सरकार नहीं हैं, मुख्यमंत्री नहीं हैं लेकिन समाज का वो हिस्सा हैं जो ऐसी चाँदनी की चमक को बढ़ा सकते हैं। शायद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव यही संदेश देना चाहते होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

गुरुवार, 11 जून 2026

कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता

 











प्रो. मनोज कुमार

कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता. वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है. एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने. लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है. आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं. 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था. जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे. उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है. साथ ही अन्य दलों से टूटकर भी आने वाले जनप्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपना भरोसा जताया, यह एक अलग किस्म का भारतीय राजनीति को अनुभव हुआ. इसके पहले भी दल-बदल होता रहा है लेकिन इसे दल-बदल के साथ ‘दिल’ बदल के रूप में देखा जाना चाहिए. आम आदमी पार्टी और हालिया तृणमूल कांग्रेस के सांसदों का उनके साथ चले जाना, यह परिघटना के रूप में परिभाषित होगा. हालांकि विरोधियों का कहना है कि उनका ‘डर से दिल’ बदला है. डर या विश्वास, दिल से दल बदल रहा है और 12 वर्षों में इस बदलाव को रेखांकित किया जाएगा. यह भी अजीब सा लगता है कि बार-बार कहा जा रहा है कि मोदी ने नेहरु के रिकार्ड को तोड़ दिया. अरे नहीं, भाई मोदी ने रिकार्ड बनाया है. 

भारतीय राजनीति में 12 वर्ष का समय बहुत होता है और जब चौतरफा हमले हो रहे हैं तब सत्ता में बने रहना सच में अर्थपूर्ण है. विरोध विरोधियों से हो तो सामान्य सी बात है लेकिन विरोध खुद के घर से हो तो यह चुनौती बन जाता है. विरोधियों के कुछ जायज हमले हैं तो कुछ नाजायज. कुछ हमले तो व्यक्तिगत हो रहे हैं, जिसे सही नहीं कहा जा सकता है. नीति-नियमों के आधार पर तार्किक विरोध का हर मंच पर स्वागत होता है लेकिन पूर्वाग्रहों से भरे विरोध कोई मायने नहीं रखता है. खैर, वैश्विक संकट का असर भारत में दिखने लगा. अनेक स्तरों पर भारत भी इस संकट से जूझ रहा है और इसका परिणाम यह हुआ कि 12 साल पहले किए गए वायदों को पूरा करने में खरोंच लगी. महंगाई, बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता गया. युद्ध के चलते भारत की आर्थिक हालत पर भी घाव लगा और देखते ही देखते महंंगाई का ग्राफ तेजी से बढऩे लगा. आखिरकार मोदी को आम आदमी के सामने आकर सहयोग का आह्वान करना पड़ा. कुछ बातें ऐसी थी जिसे एक आम भारतीय नहीं मानता है जैसे सोना ना खरीदने की बात लेकिन अर्थशास्त्र के जानकार बताएंगे ऐसा क्यों? हम मोटामोटी तौर पर सहज और सरल जिंदगी चाहते हैं और सरकार को अलादीन का चिराग मानकर उसे हर मुराद पूरी करने की जिद् भी कर बैठते हैं और जब जिद् पूरी नहीं होती है तब सरकार खराब हो जाती है. इस समय सरकार का मतलब समझा दिया गया है मोदी और मोदी को खराब साबित करने के लिए हर स्तर पर कोशिश जारी है.

यह भी सच है कि 12 वर्ष पहले युवाओं को जो उम्मीदों के पंख लगे थे, वह टूटकर बिखरने लगे. उम्मीद टूटी लेकिन नाउम्मीद नहीं हुए और वे अपने एक ‘वोट’ से अपने नायक मोदी को मजबूत करते रहे, यह भी एक बड़ा सच है. स्मरण कीजिए कि लोकपाल की माँग को लेकर यही नौजवान सडक़ पर उतरे तो कांग्रेस की सरकार पलट दी तो क्या यह नाराजगी मोदी को चुनौती नहीं दे सकती है? जरूर दे सकती है लेकिन तब जब युवा नाउम्मीद हो जाए. इन 12 वर्षों में ऐसे चाहे-अनचाहे बात-बयान हुआ और उनकी इमेज को सोशल मीडिया के जरिए तोडऩे की कोशिश की गई. अतिरेक में विरोधियों के साथ भी ऐसा ही हुआ और इसका दुष्परिणाम यह निकला कि सत्ता और प्रतिपक्ष में जो समन्वय होना चाहिए था, उसमें दरार पड़ गई. प्रतिपक्ष की प्रकृत्ति प्रतिरोध की रही है लेकिन विरोधी व्यवहार कई नीतिगत मुश्किलें उत्पन्न करता है और ऐसा हुआ भी.

समय एक सा नहीं रहता है और यह सबके साथ होता है, मोदी कोइ अपवाद नहीं लेकिन 12 वर्षों तक मोदी करिश्मा अपवाद है. इस अपवाद का सबसे बड़ा गुण है एक कुशल जनसंचार के रूप में स्वयं को स्थापित करना. ‘मन की बात’ के माध्यम से वे देश के करोड़ों लोगों तक पहुँच गए. माटी से खादी तक चर्चा कर हुनरमंद लोगोंं को उनके घेरे से बाहर लाकर मुख्यधारा से जोडक़र एक नया मुकाम दिया. प्रधानमंत्री मोदी तारीफ करें तो उनके हुनर को पंख लग जाना स्वाभाविक है. ‘मन की बात’ की हर ऐपिसोड में समाज के अंतिम छोर पर बैठे हुनरमंद को तलाश कर ले आते हैं. वे जनता की नब्ज भी जानते हैं और समझते हैं. और ऐसे में वे कभी खेल के मैदान में उतर जाते हैं तो कभी गाँव की चौपाल में खाट में बैठकर अपनापन का भाव जताते हैं. जैसा कि उन्होंने खुद ही अपील कर कहा कि मोदीजी नहीं, मोदी कहा जाए. वे जानते हैं कि एक ‘जी’ अपनों से पराया बना देती है. उनका यही हुनर उन्हें एक कुशल संचारक के रूप में स्थापित करता है. संचार की अवधारणा कहती है कि संदेश देने वाले की कामयाबी इस बात में नहीं है कि वह संदेश क्या देता है बल्कि कामयाबी इस बात में है कि संदेश ग्रहण करने वाला उसे कैसे ग्रहण करता है. बातें और भी बहुत सी है और यही बातें उन्हें दूसरों से जुदा करती है. एक बात स्मरण में हो आता है कि एक कामयाब व्यक्ति से पूछा गया कि आपका मुकाबला किससे है? तो उनका जवाब था-मेरा अपने आप से. मोदीजी के बारे में भी यही बात लागू होती है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

बुधवार, 3 जून 2026

# ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र

 ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक  राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र 




















भारतीय शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का क्रियान्वयन कर दिया है. शिक्षा के क्षेत्र में यह बदलाव कितना कारगर हुआ? क्या प्रभाव समाज पर पड़ा? क्या चुनौती है और इस चुनौती का समाधान क्या है? जैसे मुद्दे पर अनुसंधान की अंतरराष्ट्रीय मानक की पत्रिका ‘समागम’ का जुलाई 2026 का अंक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर एकाग्र होगा. स्कॉलर, शिक्षक एवं मीडिया के सजग लेखकों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर अनुसंधानपरक शोध लेख/आलेख आमंत्रित हैं. आपका आलेख कृतिदेव या मंगल फॉट में हो तथा शब्द सीमा 1800-2000 से अधिक ना हो. अंतिम तिथि 25 जून 2026 है. अन्य जानकारी के लिए श्री दत्ता कोल्हारे मोबा. ९८६०६ ७८४५८ पर संपर्क कर सकते हैं.

क्वान्ग्तोंग (भारत अध्ययन) विश्वविद्यालय, चीन 

से हिन्दी जर्नल के रूप में मान्यता प्राप्त हैं. 

ढ्ढस्स्हृ २२३१-०४७९ / ढ्ढद्वश्चड्डष्ह्ल स्नड्डष्ह्लशह्म् ५.०

रिसर्च पेपर भेजते समय निम्रांकित बातों का ध्यान रखें जाने का अनुरोध है-

४रिसर्च पेपर में विषय पर केन्द्रित हो लेकिन किसी समुदाय, व्यक्ति या धर्म पर अनावश्यक टिप्पणी ना किया जाए.

४रिसर्च पेपर में संदर्भ का पूर्ण रूप से उल्लेख किया जाए. यथा पुस्तक का नाम, लेखक, संपादक, प्रकाशक, प्रकाशन स्थान, संस्करण एवं प्रकाशन का वर्ष.

४स्कॉलर/प्राध्यापक का पूरा नाम, पदनाम, कॉलेज/विश्वविद्यालय, शहर और राज्य का स्पष्ट उल्लेख किया जाए.

४रिसर्च पेपर में उपयोग होने वाले शब्दों की ‘समागम’ की स्टाइल शीट है, उसी के अनुरूप शब्दों का उपयोग किया जाता है. 

रिसर्च पेपर भेजने के लिए हमारा ईमेल एड्रेस है

samagam2016@gmail.com


वेबसाईट देख सकते हैं-

htpps//samagam.co.in

शनिवार, 30 मई 2026

# ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन

 


भाषा की मर्यादा का चीरहरण- संजय मेहता

भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की। परम्परागत पत्रकारिता की बात करें अथवा वर्तमान में डिजीटल मीडिया की, दोनों ही जगहों पर भाषा के सारे तटबंध तोड़े जा रहे हैं। भाषा की मर्यादा का चीरहरण हो रहा है। यह बात वरिष्ठ रंग निर्देशक संजय मेहता ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर आयोजित विमर्श में कही। श्री मेहता ने पत्रकारिता के साथ रंगमंच एवं सिनेमा को जोड़ते हुए कहा कि हम सबकी जवाबदारी समाज है और सामाजिक सरोकार ही हमें जिंदा रखेगा। पत्रकारिता की तरह रंगमंच की बड़ी जिम्मेदारी है।

इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमट कोर्ट की एडव्होकेट एवं जिला भाजपा उपाध्यक्ष सुश्री गुंजन चौकसे का कहना था कि ‘सामाजिक सरोकार से ही पत्रकारिता होती है। एक मायने में पत्रकारिता केवल छपे शब्द नहीं बल्कि अवाम की आवाज है।’ उन्होंने अदालत, मीडिया और राजनीति के संदर्भ में अनेक उदाहरण के साथ अपनी बात रखी।

इस अवसर पर प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि- समय कितना ही बदल जाए, पत्रकारिता का मूल स्वरूप हमेशा कायम रहेगा। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम से भारत के नवनिर्माण में पत्रकारिता का अहम योगदान रहा है। मिशन से व्यवसाय में पत्रकारिता का परिर्वतन आपातकाल के बाद हुआ। दुर्भाग्य से पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा देने की साजिशन माँग की जाने लगी। 

अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान की पत्रिका ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन किया गया।  ‘समागम’ के इस विशेष अंक में विविध विषयों का संयोजन किया गया है। लेखक कुंवर इंद्रजीत की सद्य प्रकाशित नवीन पुस्तक ‘जीवन यात्रा के सुमन’ का भी लोकार्पण किया गया। लेखक इंद्रजीत सिंह ने अपने जीवन अनुभव भी साझा किया।

जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय

जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय प्रो. मनोज कुमार मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़...