मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक

 

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक                                       स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी पर केन्द्रीत है.                      गांधी की बड़ी यात्रा, आंदोलन एवं मध्यप्रदेश में                                          उनका हस्तक्षेप  केन्दि्रय विषय है.

रविवार, 3 अक्तूबर 2021

महेन्द्र का 'गगन' से बुलावा

मनोज कुमार

        सुबह सुबह फोन की घंटी घनघना उठी... मन में कुछ खयाल आया... स्वाभाविक था कि यह खयाल अच्छा तो होगा नहीं... कुछ अनमने मन से फोन उठाया तो उधर से संजय द्विवेदी की आवाज आयी... लगा कि रोज राम-राम करने फोन करते हैं, सो किया होगा लेकिन यह क्या.. अगले पल उसने पूछा कि  क्या आपको पता है.. महेन्द्र गगन नहीं रहे... एकाएक मुंह से निकल गया क्या बकवास कर रहे हो... दरअसल, मन ऐसी किसी खबर के लिए तैयार ही नहीं था.. फिर खुद को सम्हालते हुए कहा कि पता करता हूं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए.. एक-दो दिन पहले ही मित्र शिवअनुराग पटेरिया के जाने की खबर से मन उबरा ही नहीं था कि यह दूसरा दुख.. भरे मन से अग्रज अरूण पटेल जी को फोन किया.. महेन्द्र भाई रिश्ते में उनके समधि थे.. उन्हें भी इस बात की कोई खबर नहीं थी.. वे चौंके और थोड़ी देर बाद उनका जवाब आया.. हां, मनोज जी, खबर सही है.. मुझे तकलीफ ना हो.. इसलिये मुझे नहीं बताया गया था...

        महेन्द्र गगन के जाने का अर्थ था समाज के एक ऐसे गगन का रिक्तता से भर जाना जो पत्रकारिता, साहित्य और सेवा से परिपूर्ण हो.. महेन्द्र भाई मुझसे उम्र में कुछेक साल बड़े थे.. लेकिन वर्षों की मुलाकात में उम्र कभी बाधा नहीं बनी.. जब भी मिले, मोहब्बत से मिले. दरअसल, उनके और मेरे बीच का रिश्ता मेरी पत्रिका ‘समागम’ बनी रही. इस दुखद हादसे के शायद एकाध पखवाड़े पहले मैं, महेन्द्र भाई और पटेल साहब कुछ घंटे साथ रहे. तय भी हुआ था कि इसी दिन दोपहर को फिर मुलाकात होगी.. मेरी व्यवस्ता और थोड़ी अलाली के चलते कल मिल लेंगे के साथ मिलने की आस अधूरी रह गयी. खैर, जो लोग महेन्द्र भाई को जानते हैं, वे लोग यह भी जानते हैं कि एक संवेदनशील आदमी का जाना क्या होता है.. उनकी पहचान पहले पहल प्रिंटरी से थी तो उनके पाक्षिक अखबार पहले पहले से भी थी. वे एक अच्छे लेखक और कवि थे... जिस कोरोना के कू्रर हाथों से महेन्द्र भाई को हमसे अलग कर दिया, उसी कोरोना से उपजी स्थितियों पर उन्होंने कविता लिखी थी...

        रायपुर से भोपाल आने के बाद जिनकी सोहबत मुझे मिली, उनमें महेन्द्र भाई एक थे. वे ऐसे व्यक्ति थे जो सामने वाले का पूरा सम्मान करते थे. वे राग-द्वेष से विलग थे. हमेशा संजीदा रहने वाले महेन्द्र भाई हमेशा हल्के से मुस्करा देते थे. कभी चिंता में डूबे उनको देखा नहीं. हमेशा अपने काम में लगे रहते थे. आखिरी दफा जब हम मिले तो कोरोना से साथियों के देहांत से दुखी थे. मुझे क्या पता था कि महेन्द्र भाई भी इसी बीमारी के शिकार हो जाएंगे. उनके देहांत के पहले पटेल साहब से बात हुई थी. उन दिनों बिस्तर और ऑक्सीजन को लेकर मारामारी चल रही थी. अचानक तबियत बिगडऩे के कारण उन्हें एडमिट करना जरूरी हो गया था. आनन-फानन में पटेल साहब अपने संबंधों और संपर्कों से उन्हें एडमिट करा सके थे. दो-एक दिन बाद जब मैंने महेन्द्र भाई की तबियत का हाल पूछा तो पटेल साहब ने कहा कि अब ठीक हैं. जल्द ही घर वापस आ जाएंगे. यह वह दौर था जब हस्पताल से किसी के घर आने की खबर बहुत बड़ी बन चली थी. पटेल साहब से यह सुनकर मन को दिलासा दिलाया कि ईश्वर का शुक्र है. ईश्वर निर्मम हो चला था. शायद उसके पास भी अच्छे कवि और लेखक की कमी हो गई होगी. सो महेन्द्र भाई को वहां रचने-गढऩे के लिए बुला लिया..

       महेन्द्र भाई के लिए जब यह लिख रहा हंू तो सहज ही स्मरण हो आता है कि आज वे होते तो वे अपना 68वां जन्मदिन आने वाले माह अक्टूबर की 4 तारीख को मना रहे होते. लेकिन नियति को यह कहां मंजूर था. 4 अक्टूबर, 1953 को उज्जैन की भाटी दम्पत्ति के घर रौशन हुए महेन्द्र ने अपने कुल का नाम इतना ऊंचा किया कि आज उनके नहीं रहने पर आंखें नम हैं. एक खालीपन सा महसूस हो रहा है और हम चाहने वालों की चलती तो कैलेंडर के पन्ने से 21 अप्रेल की उस मनहूस तारीख को हमेशा हमेशा के लिए दफा कर देते. साल तो अपनी रफ्तार से गुजर जाएगा लेकिन कैलेंडर के पन्ने पर अप्रेल माह की 21 तारीख टीस देने के लिए हर साल हमारी आंखों के सामने होगी. परिवार में उनकी जीवनसंगिनी मीना भाभी किसको अपना दर्द बताये? बिसूरती मां को ढाढस देने के लिए बेटों की भूमिका में दामाद आनंद और पलाश साये की तरह उनके साथ हैं. बेटियां यामिनी और पूर्वा हकीकत से वाकिफ हैं. खुद के साथ मां को सम्हाल कर पिता की लाडली बेटियां अचानक सयानी हो गई हैं. महेन्द्र भाई के पीछे उनके दो छोटे भाई मोहन और पुष्कर उनकी छोड़ी विरासत साहित्य, संस्कृति और प्रेम को सम्हालेंगे.

रघु ठाकुर उन्हें याद करते हुए अपनी आंखें भीगो लेते हैं तो लाजपत आहूजा उनके साथ बिताये पलों को याद करते हैं. हर गतिविधियों में साथ रहने वाले संतोष चौबे के लिए तो यह कभी ना भर पाने वाला नुकसान है तो साहित्य के साथी मुकेश वर्मा की आंखें भी सजल है. पटेल साहब के लिए यह दुख तो ऐसा है जैसे किसी ने अचानक उनकी आंखों के सामने अंधेरा कर दिया हो. यारों के यार भाई महेन्द्र की यादें ‘मिट्टी जो कम पड़ गई’ और ‘तुमने छुआ’ के पन्नों पर हमेशा हमेशा के लिए दर्ज है. यादें तो उन सम्मान पत्र पर भी हैं जो कभी उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अववदान के लिए वागीश्वरी सम्मान, राजबहादुर पाठक स्मृति सम्मान, शब्दशिल्पी सम्मान, विनय दुबे स्मृति सम्मान के साथ रामेश्वर गुरु पुरस्कार हैं. महेन्द्र भाई जैसे कोई जाता है क्या? लेकिन क्या करें. सबकुछ हमारे हिसाब से तय नहीं होता है. शायद इसी को जीवन कहते हैं.

सोमवार, 20 सितंबर 2021

 

हिन्दी को लेकर हमारी चिंता लगातार दिख रही है लेकिन ज्यादतर चिंता  मंच से है. व्यवहार में हम हिन्दी को पीछे रखते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में हिन्दी के विकल्प के तौर पर अंग्रेजी के प्रश्रों को मान्यता नहीं दी जाती. इसके उलट हिन्दी की स्वीकार्यता वैश्विक मंच पर हो चुकी है, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. कल तक श्यामपट्ट पर लिखी जाने वाली हिन्दी अब हमारी हथेलियों पर है और मोबाइल से लेकर कम्प्यूटर तक का की-बोर्ड हिन्दी से संचालित है. हिन्दी के इस नये वैश्विक स्वरूप की चर्चा करता शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक.

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया

आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश


मनोज कुमार
हिन्दुस्तान में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बज चुका था. 1857 के विद्रोह की चिंगारी हर वर्ग और हर अंचल में सुलगने लगी थी. किसी को अपनी जान की फिक्र नहीं थी और जो फिक्र थी तो अपने वतन की. अंग्रेजी शासन हर स्तर पर विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कार्यवाही कर रहा था. इतिहास के सुनहरे पन्नों पर जिन बलिदानियों के नाम अंकित हैं, उनमें राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का नाम सबसे ऊपर है. पिता-पुत्र की कविता से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह विद्रोह का गीत है. पिता-पुत्र के बलिदान के साथ पूरा देश उनकी जयकारा करने लगा और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत हो गई. आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसे वीर पुत्रों का स्मरण कर मध्यप्रदेश की माटी सदैव उनकी ऋणी रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के इस महान प्रसंग के माध्यम से नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाना है.
राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, दोनों पिता-पुत्र अच्छे कवि होने के कारण अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से जनमानस में क्रांति का संदेश दिया करते थे. जबलपुर की 52वीं पलटन को मेरठ के सिपाहियों के विद्रोह की जानकारी मिल चुकी थी. जबलपुर में भी वहां की जनता ने गोंडवाना साम्राज्य (वर्तमान का जबलपुर मण्डला) राजा शंकर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का प्रारंभ कर दिया था. कहा जाता है कि राजा शंकर शाह की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी, अंग्रेज सरकार उनको अपने पक्ष में रखने के लिए पेंशन भी दिया करती थी. राजा शंकर शाह चाहते तो क्रांतिकारियों एवं क्रांति का दमन करके अपनी पेंशन भी बढ़वा सकते थे और कुछ अन्य प्रकार के लाभ ले सकते थे.  किंतु उन्होंने अभाव में ही जीना पसंद किया. कुछ भी हो जाए, इस क्रांति का साथ देंगे, समर्पण नहीं करेंगे-संघर्ष करेंगे.
सन् 1857 में सितंबर अंग्रेजों पर आक्रमण की योजना बनी क्योंकि उस दिन अत्यधिक भीड़ भाड़ चहल-पहल रहेगी. अंग्रेज सरकार ने खुफिया रूप से अपने एक गुप्तचर को फकीर के रूप में भेजा था, जिससे राजा की योजना की जानकारी उन्हें प्राप्त हो चुकी थी. अंग्रेज सरकार की 52वीं रेजीमेंट के कमांडर क्लार्क के गुप्तचर उसको समय-समय पर सूचना देते थे. क्रांति के दिन से पहले ही 14 सितंबर, 1857 को आधी रात में क्लार्क ने राजमहल घेर लिया. राजा की तैयारी पूरी नहीं हो पाई राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह सहित तेरह अन्य लोगों को भी बंदी बना लिया गया. उन्हें जबलपुर रेलवे स्टेशन के पास अस्थाई जेल बनाकर कैद किया गया था, साथ ही पूरे महल में हथियार और क्रांति की सामग्री थी, उन्हें भी ढूंढा गया.
वह कहते हैं ना, युद्धों में कभी नहीं हारे, हम डरते हैं छल छंदों से, हर बार पराजय पायी है अपने घर के जयचंदों से. राजा के राज्य में भी एक जयचंद था. जिसका नाम गिरधारीलाल दास था. वह क्लार्क को राजा के साहित्य की कविताओं का अनुवाद करके अंग्रेजी में बताता था. कविता के आधार पर मुकदमा चलाया गया. ‘देश के इतिहास में पहली बार था, जिसमें किसी लेख, कविता या साहित्य के आधार पर मुकदमा चलाकर उसे मौत की सजा दी.’ उन्हें माफी मांगने को कहा गया, साथ ही साथ धर्म परिवर्तन करने को कहा गया और अंग्रेजों से सहयोग करने को कहा गया, प्रस्ताव को राजा ने नकार दिया. 03 दिन में मुकदमा चलाया गया, निर्णय भी हो गया. 17 सितंबर, 1857 को दोनों पिता-पुत्र को मौत की सजा सुनाते वक्त उनसे कहा था कि यदि वे माफी मांग लें तो सजा माफ कर दी जाएगी. परंतु आजादी के मस्तानों और दीवानों ने क्षमा नहीं मांगी और अपना सिर कटाना मंजूर किया.
18 सितंबर, 1857 को अपना प्रभाव बनाए रखने के लिये अंग्रेज सरकार ने राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह को जबलपुर उच्च न्यायालय के पास खुले आसमान के नीचे तोपों से बांध दिया गया. तोप से बांधते समय राजा और राजकुमार दोनों सीना तानकर निडर खड़े रहे. भारत माता के वीर सपूत ने भारत माता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी प्रजा को एक-एक छन्द सुनाने चाहा। पहला छन्द राजा शंकरशाह ने सुनाया -
मूँद मूख डण्डिन को चुगलों की चबाई खाई
खूब दौड़ दुष्टन को शत्रु संहारिका।
मार अंगरेज रेज कर देई मात चण्डी
बचे नाहिं बैरी बाल बच्चे संहारिका।
संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर
वीनती हमारी सुन अब मात पालिका।
खाई लेइ मलेच्छन को झेल नाहिं करो अब
भच्छन ततत्छन कर बैरिन कौ कालिका।।
यह पूरा होते ही दूसरा छन्द पुत्र ने और भी उच्च स्वर में सुनाया, जिससे जनता जोश से भर गई.
कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन
डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले।
सत्य के प्रकासन औ असुर बिनासन कौ
भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले।
झुण्ड-झुण्ड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि
सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले।
कहै रघुनाथ माँ फिरंगिन को काटि-काटि
किलिक-किलिक माँ कलेऊ खूब कर ले।।
अंग्रेजों का इस तरह सरेआम राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप से बांधकर मृत्युदंड देने का उद्देश्य लोगों और राजाओं में अंग्रजों का डर पैदा करना था. परन्तु अंग्रेजों के इस कदम से क्रांति और ज्यादा भडक़ गई. दूसरे ही दिन से लोगों द्वारा बड़ी संख्या में उस स्थान की पूजा की जाने लगी. 52वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और इनकी टुकड़ी पाटन की ओर कूच कर गई. विद्रोह की आग मंडला, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी और रामगढ़ तक फैल गई. जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति फैल गई. तोप से उड़ाते समय वहां उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है कि - ‘मैं अभी-अभी क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाए जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं. जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की -भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें.’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद करने वाले गोंडवाना के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. आज इन महान शहीद पिता-पुत्र का स्मरण कर एक शहर क्या पूरा देश गौरव का अनुभव करता है और यह सीख देता है कि देश से बड़ा कोई नहीं. उन्हें शत-शत प्रणाम. (photo by google)

सोमवार, 13 सितंबर 2021

श्यामपट्ट से की-बोर्ड तक हिन्दी

 मनोज कुमार

हर साल की तरह बिसूरने के लिए 14 सितम्बर का दिन फिर आ गया और यह अंक जब आपके हाथों में होगा, दिन, सप्ताह, पखवाड़ा और महीना लोप हो चुका होगा. कदाचित हिन्दी डे से हिन्दी मंथ पर बहस चल रही होगी. हिन्दी को लेकर हमारा आग्रह-अनुराग होना चाहिए और यह हो भी रहा है लेकिन हिन्दी को लेकर हमें हीनता से बाहर आना होगा. कल तक जो हिन्दी मध्यम और निम्र मध्यम वर्ग की भाषा थी, आज वह गूगल की भाषा बनकर पूरी दुनिया की जरूरत बन गई है. एक समय था जब अंग्रेजी पत्रिकाओं को हिन्दी में अनुदित होकर पाठकों के मध्य आना विवशता थी कि क्योंकि अंग्रेजी से उनका जीवन गुजरता था लेकिन रोटी हिन्दी से ही मिलती थी. टेक्रालॉजी के विस्तार के साथ हिन्दी का साम्राज्य बढ़ता चला गया. कल तक भारतीय प्रकाशक हिन्दी को मजबूरी मान रहे थे तो आज वैश्विक समाज के लिए हिन्दी जरूरी है. ऐसे में हिन्दी को लेकर विलाप करने के बजाय हमें हिन्दी के प्रभाव पर चर्चा करना चाहिए. हिन्दी कभी रूढ़िवादी नहीं रही. बल्कि वह बहते निर्मल जल की तरह अपना रास्ता बनाती गई. भाषा का यह लचीलापन हिन्दी का सबसे सबल पक्ष है. उसके समक्ष यह बंधन कभी नहीं रहा कि वह किसी एक कालखंड में बंधी रहे. हिन्दी के ज्ञाता इस बात से सहमत होंगे कि हिन्दी हर कालखंड में स्वयं को परिवर्तित और स्वयं को समृद्ध बनाती गई. घूरे से गूगल तक के अपनी यात्रा में हिन्दी ने अंग्रेजी को बार-बार आईना दिखाया है. आज जब हम हिन्दी दिवस उत्सव मना रहे हैं तब हमें हिन्दी के गौरव पक्ष को नयी पीढ़ी के समक्ष रखना होगा.

कभी-कभी तो लगता है कि एक सुनियोजित ढंग से हिन्दी को पीछे रखने की साजिश की जा रही है. हिन्दी हमारी मातृभाषा है और मां को मां कहने के लिए सिखाने की जरूरत नहीं होती है तब हिन्दी को सीखने-सिखाने के लिए हम क्यों बेताब हैं? अंग्रेजी सीखने-सिखाने के लिए हमने जोर नहीं डाला लेकिन लोग उसके सम्मोहित हैं तो ऐसा व्यवहार हिन्दी के साथ क्यों नहीं होना चाहिए? कोविड महामारी के दौर में हिन्दी की प्रतिष्ठा में और भी श्रीवृद्धि हुई है. सुदूर गांव में बैठा बच्चा जो ठेठ हिन्दी का है, उसने भी अपनी पढ़ाई पूरी की और शहर में बैठा बच्चा भी. कल्पना कीजिए कि जब शालाओं के कपाट बंद थे और लोग घरों में कैद थे, तब भी जीवन चल रहा था. यह कैसे संभव हुआ? कौन सा जादू था जो बच्चों को शिक्षित भी कर रहा था और समाज को सूचित भी. यह इसलिए संभव हुआ कि हिन्दी हठी नहीं हुई बल्कि टेक्रालॉजी की संगी बन गई. यह दीगर बात है कि तकनीकी कारणों से व्यवधान हुआ लेकिन हिन्दी जीवन को सहज बनाने में सहायक रही, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. यह हिन्दी की ताकत है कि वह निराला और पंत को साथ लेकर चलती है तो परसाईं और दुष्यंत कुमार भी साथ होते हैं.

हिन्दी राजभाषा है, उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की हिमायत हम करते रहे हैं लेकिन यह संभव नहीं होते दिख रहा है तो यह हमारे कमजोर आत्मबल का प्रतीक है. सरकार किसी की भी रही हो लेकिन सबका आग्रह हिन्दी रहा है लेकिन वह केवल भाषणों में सीमित रहा. इसके पीछे क्या कारण है, इसे तलाश किया जाना चाहिए. हमारा आग्रह हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की भाषा बने लेकिन हम स्वयं उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दे नहीं पा रहे हैं तब शिकायत कैसी? कोई भी शुभ कदम हमारे अपने द्वार से होना चाहिए तब दुनिया हल्दी-कुंकुम लिये खड़ी होगी. एक शिकायत जायज है कि हिन्दी के प्रकाशनों, खासकर दैनिक अखबारों के पन्नों पर जो बेहिसाब अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग होता है, उससे बचना चाहिए. कुछेक शब्द जो बोलचाल में हिन्दी मान लिये गए हैं, उनका उपयोग तो ठीक है लेकिन जानबूझकर अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग करना और यह कहना कि नयी पीढ़ी ऐसा ही समझती है तो आप स्वयं को धोखे में रख रहे हैं. हिन्दी, हिन्दुस्तानी भाषा है और इसकी मिठास और अपनापन भी इसी में है. यह गैरवाजिब बात होगी कि हम हिन्दी के उन कठिन शब्दों का उपयोग करें, जो आज की पीढ़ी की समझ से बाहर है. हिन्दी का गौरव हमेशा कायम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए.

बुधवार, 8 सितंबर 2021

सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल

मनोज कुमार

राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा.

वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है.  प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे. 

उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है.मध्यप्रदेश में अक्टूबर से अस्तित्व में आ रहे सीएम राइज स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होगी। इसमें पढ़ाने के प्रति उनकी रुचि, पढ़ाने का तरीका और विषय पर पकड़ देखी जाएगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो. सीएम राइज योजना के लिए चयनित स्कूलों में अक्टूबर से पढ़ाई का तरीका बदल जाएगा। जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.

स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे.

शनिवार, 4 सितंबर 2021

शिक्षा और दीक्षा

 शिक्षा और दीक्षा

मनोज कुमार 

    आज हमारे पड़ोसी शर्माजी इस बात से प्रसन्न थे कि उनका बेटा शिक्षित हो गया. शिक्षित अर्थात उसने बीई की डिग्री हासिल कर ली. बेटे के स्नातक हो जाने की खुशी उनके चेहरे पर टपक रही थी. यह अस्वाभाविक भी नहीं है. एक डिग्री हासिल करने के लिए कई किसम के जतन करने पड़ते हैं. अपनी जरूरतों और खुशी को आले में रखकर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है. और बच्चा जब सफलतापूर्वक डिग्री हासिल कर ले तो गर्व से सीना तन जाता है. उनके जाने के बाद एक पुराना सवाल भी मेरे सामने आ खड़ा हुआ कि क्या डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा है? क्या डिग्री के बूते एक ठीकठाक नौकरी हासिल कर लेना ही शिक्षा है? मन के किसी कोने से आवाज आयी ये हो सकता है लेकिन यह पूरा नहीं है. फिर मैं ये सोचने लगा कि बोलचाल में हम शिक्षा-दीक्षा की बात करते हैं तो ये शिक्षा-दीक्षा क्या है? शिक्षा के साथ दीक्षा शब्द महज औपचारिकता के लिए जुड़ा हुआ है या इसका कोई अर्थ और भी है. अब यह सवाल शर्माजी के बेटे की डिग्री से मेरे लिए बड़ा हो गया. मैं शिक्षा-दीक्षा के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए पहले स्वयं को तैयार करने लगा.

    एक पत्रकार होने के नाते क्यों पहले मन में आता है. इस क्यों को आधार बनाकर जब शिक्षा-दीक्षा का अर्थ तलाशने लगा तो पहला शिक्षा-दीक्षा का संबंध विच्छेद किया. शिक्षा अर्थात अक्षर ज्ञान. वह सबकुछ जो लिखा हो उसे हम पढ़ सकें. एक शिक्षित मनुष्य के संदर्भ में हम यही समझते हैं. शिक्षा को एक तंत्र चलाता है इसलिए शिक्षा नि:शुल्क नहीं होती है. विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हासिल करने के लिए हमें उसका मूल्य चुकाना होता है. इस मूल्य को तंत्र ने शब्द दिया शिक्षण शुल्क. यानि आप शिक्षित हो रहे हैं, डिग्री हासिल कर रहे हैं और समाज में आपकी पहचान इस डिग्री के बाद अलहदा हो जाएगी. आप डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार और शिक्षा जैसे अनेक पदों से सुशोभित होते हैं. चूंकि आपकी शिक्षा मूल्य चुकाने के एवज में हुई है तो आपकी प्राथमिकता भी होगी कि आप चुकाये गए मूल्य की वापसी चाहें तो आप अपनी डिग्री के अनुरूप नौकरी की तलाश करेंगे. एक अच्छी नौकरी की प्राप्ति आपकी डिग्री को ना केवल सार्थक करेगी बल्कि वह दूसरों को प्रेरणा देगी कि आप भी शिक्षित हों. यहां एक बात मेरे समझ में यह आयी कि शिक्षित होने का अर्थ रोजगार पाना मात्र है.

    अब दूसरा शब्द दीक्षा है. दीक्षा शब्द आपको उस काल का स्मरण कराता है जब डिग्री का कोई चलन नहीं था. शिक्षित होने की कोई शर्त या बाध्यता नहीं थी. दीक्षा के उपरांत नौकरी की कोई शर्त नहीं थी. दीक्षित करने वाले गुरु कहलाते थे. दीक्षा भी नि:शुल्क नहीं होती थी लेकिन दीक्षा का कोई बंधा हुआ शुल्क नहीं हुआ करता था. यह गुरु पर निर्भर करता था कि दीक्षित शिष्य से वह क्या मांगे अथवा नहीं मांगे या भविष्य में दीक्षित शिष्य के अपने कार्यों में निपुण होने के बाद वह पूरे जीवन में कभी भी, कुछ भी मांग सकता था. यह दीक्षा राशि से नहीं, भाव से बंधा हुआ था. दीक्षा का अर्थ विद्यार्थी को संस्कारित करना था. विद्यालय-विश्वविद्यालय के स्थान पर गुरुकुल हुआ करते थे और यहां राजा और रंक दोनों की संतान समान रूप से दीक्षित किये जाते थे. दीक्षा के उपरांत रोजगार तलाश करने के स्थान पर विद्यार्थियों को स्वरोजगार के संस्कार दिये जाते थे. जंगल से लकड़ी काटकर लाना, भोजन स्वयं पकाना, स्वच्छता रखना और ऐसे अनेक कार्य करना होता था. यह शिक्षा नहीं, संस्कार देना होता था. दीक्षा अवधि पूर्ण होने के पश्चात उनकी योग्यता के रूप में वे अपने पारम्परिक कार्य में कुशलतापूर्वक जुट जाते थे. अर्थात दीक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में संस्कार के बीज बोना, उन्हें संवेदनशील और जागरूक बनाना, संवाद की कला सीखाना और अपने गुणों के साथ विनम्रता सीखाना.

    इस तरह हम शिक्षा और दीक्षा के भेद को जान लेते हैं. यह कहा जा सकता है कि हम नए जमाने में हैं और यहां शिक्षा का ही मूल्य है. निश्चित रूप से यह सच हो सकता है लेकिन एक सच यह है कि हम शिक्षित हो रहे हंै, डिग्रीधारी बन रहे हैं लेकिन संस्कार और संवेदनशीलता विलोपित हो रही है. हम शिक्षित हैं लेकिन जागरूक नहीं. हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं लेकिन समाज के प्रति जिम्मेदार नहीं. शिक्षक हैं लेकिन शिक्षा के प्रति हमारा अनुराग नहीं, पत्रकार हैं लेकिन निर्भिक नहीं. जिस भी कार्य का आप मूल्य चुकायेंगे, वह एक उत्पाद हो जाएगा. शिक्षा आज एक उत्पाद है जो दूसरे उत्पाद से आपको जोड़ता है कि आप नौकरी प्राप्त कर लें. दीक्षा विलोपित हो चुकी है. शिक्षा और दीक्षा का जो अंर्तसंबंध था, वह भी हाशिये पर है. शायद यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का हस हो रहा है क्योंकि हम सब एक उत्पाद बन गए हैं. शिक्षा और दीक्षा के परस्पर संबंध के संदर्भ में यह बात भी आपको हैरान करेगी कि राजनीति विज्ञान का विषय है लेकिन वह भी शिक्षा का एक प्रकल्प है लेकिन राजनेता बनने के लिए शायद अब तक कोई स्कूल नहीं बन पाया है. राजनेता बनने के लिए शिक्षित नहीं, दीक्षित होना पड़ता है. यह एक अलग विषय है कि राजनेता कितना नैतिक या अनैतिक है लेकिन उसकी दीक्षा पक्की होती है और एक अल्पशिक्षित या अपढ़ भी देश सम्हालने की क्षमता रखता है क्योंकि वह दीक्षित है. विरासत में उसे राजनीति का ककहरा पढ़ाया गया है. वह हजारों-लाखों की भीड़ को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है और यह ककहरा किसी क्लास रूम में नहीं पढ़ाया जा सकता है. शिक्षक दिवस तो मनाते हैं हम लेकिन जिस दिन दीक्षा दिवस मनाएंगे, उस दिन इसकी सार्थकता सिद्ध हो पाएगी.

शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक

  शोध पत्रिका ‘समागम’ का नवीन अंक                                       स्वाधीनता संग्राम और महात्मा गांधी पर केन्द्रीत है.                 ...