हिंदी पत्रकारिता दिवस 30 मई पर विशेष
माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!
प्रो. मनोज कुमार
दो सौ साल की पत्रकारिता का स्मरण करते हुए जब हम पंडित युगल किशोर का स्मरण करते हैं, उदंत मात्र्तण्ड का स्मरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से हम अभिमान से भर उठते हैं और दो सौ साल बाद की पत्रकारिता की सीरत देखते हैं तो कम से कम अभिमान तो होता ही नहीं है। दो साल में हिंदी पत्रकारिता के पास बताने के लिए बहुत कुछ था लेकिन हमने बहुत कुछ पाने के लिए उसे खो दिया। हिंदी पत्रकारिता कहाँ दो सौ साल पहले अंग्रेजों से लोहा ले रही थी और आज हम अपने ही लोगों से लोहा ले रहे हैं। अभिव्यक्ति की आजादी की साख को बचाने के लिए पत्रकारिता संघर्ष कर रही है और यह संघर्ष अनवरत चलने वाला है। हर सत्ता के लिए पत्रकारिता खतरे की घंटी हुआ करती थी और आगे भी रहेगी। यह जानकर अच्छा लगता है कि चाहे पत्रकारिता में जितनी गिरावट आ गई हो, हर कोई अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए पत्रकारिता से भयभीत रहता है। दो साल की हिंदी पत्रकारिता की यही साख है और पूँजी भी। हालाँकि इन दो सौ सालों में बहुत कुछ बदला है। पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर है और हम तकनीक की पत्रकारिता करने लग गए हैं। इस बदलाव से हिंदी पत्रकारिता का यह संक्रमण काल है। यह बात पत्रकारिता में रचे-बसे नए और पुराने दोनों पीढिय़ों को मान लेना चाहिए। वर्तमान समय में चारों तरफ इसी बात पर चर्चा हो रही है कि हिंदी पत्रकारिता एआई और चैटजीपीटी से कैसे निपटे? संकट बड़ा है तो इसका समाधान भी हमें ही तलाश करना होगा। हिंदी पत्रकारिता पर यह संकट पहली बार नहीं है और ना ही आखिरी बार है। ऐसे संकट आते-जाते रहेंगे लेकिन यह भी भरोसा है कि समय के साथ इसका समाधान भी हम सब तलाश कर ही लेंगे।
लंबे संघर्ष के बाद भारत ने स्वाधीनता हासिल किया तो इसमें हिंदी पत्रकारिता की अहम भूमिका थी। अनेक संकटों और झंझावतों से गुजरते हुए अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा वाली हिंदी पत्रकारिता पर अब जिम्मेदारी थी नव भारत निर्माण में चौकीदार बनने की। देश में नवाचार हो रहा था लिहाजा उस समय काल और परिस्थिति के अनुरूप बजट भी आ रहा था। पैसों की बंदरबाट की कहानी शायद उसके जन्म से है। कल भी था और आज भी है। खैर, तब हिंदी पत्रकारिता ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका का निर्वाह किया और तब भी अनेक घपले-घोटाले को बेनकाब किया। इस भूमिका के लिए हिंदी पत्रकारिता की पीठ सबने थपथपायी लेकिन भीतर से सत्ता का नाराज होना लाजिमी था। प्रतिपक्ष के लिए तब हिंदी पत्रकारिता की जवाबदारी नैतिक और राष्ट्रहित में होता था लेकिन यही प्रतिपक्ष जब सत्तासीन होता है तो पत्रकारिता उसकी बैरी हो जाती है। सत्ता के साथ पत्रकारिता का रिश्ता वैसा ही है, जैसा की नदी के दो पाट। चलेंगे साथ-साथ लेकिन मिलेेंगे कभी नहीं। खरामा-खरामा साल 47 से साल 75 तक पहुँच गए और यही वह साल था जब हिंदी पत्रकारिता का गला घोंटने की साजिश की गई। तानाशाह शासन व्यवस्था ने पत्रकारिता पर पहरे बिठा दिए। शब्द-शब्द सरकार की निगरानी में छपने लगे। तमाम बंदिशों के बाद भी पत्रकारिता कहाँ हार मानने वाली थी। तानाशाह सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया गया। विरोधस्वरूप संपादकीय पृष्ठ कोरा छोड़ दिया गया। और भी विरोध के अपने तरीके अपनाए गए। पत्रकारिता का यह स्वाभिमान आज भी शेष है। हालाँकि यह भी सच है कि इसी दौर में यह वाक्य चल पड़ा कि- तानाशाह शासन ने कहा कि घुटने के बल चलो तो लोग रेंगने लगे। सौ तो नहीं, अंशभर यह उस समय की सच्चाई है।
असल चेहरा और पत्रकारिता की साख गिरने का समय साल 75 के बीत जाने के बाद दिखने लगा। पत्रकारिता, मीडिया का स्वरूप धारण करने लगा और मीडिया को उद्योग का दर्जा दिए जाने की माँग उठने लगी। मिशन से मीडिया और मीडिया से उद्योग बन चली पत्रकारिता आहिस्ता-आहिस्ता रोजगार का चेहरा बनने लगी। एक तरफ पत्रकारिता मीडिया बन गई तो दूसरी तरफ पेशेवर पत्रकार तैयार करने के लिए उद्योग की तरह ही मीडिया शिक्षा के संस्थान कुकुरमुत्ते की भाँति उठ खड़े हुए। हर की अपनी खासियत, हरेक के अपने दावे। पत्रकारिता को औजार बना दिया गया। मीडिया शिक्षा तब और बढऩे लगा जब पत्रकारिता की तकनीक हाशिये पर जाने लगी और तकनीक की पत्रकारिता होने लगी। अबके समय में आपकी दक्षता विचारों की नहीं, किसी की पीड़ा को देखकर उसे न्याय दिलाने की नहीं, तकनीक के माध्यम से क्या स्टोरी बनायी जा सकती है और इसमें कौन कितना दक्ष होगा, यह मीडिया शिक्षा तय कर रही है। अपनी 45 सालों की पत्रकारिता में मेरे गुरुजनों ने सिखाया कि पत्रकारिता दिल से होती है लेकिन मेरी बाद की पीढ़ी के लिए पत्रकारिता दिमाग का है। रही-सही कसर आज की एआई और चैटजीपीटी जैसे तकनीक ने पूरा कर दिया है। बरसों पहले मर चुकी संपादक संस्था के नए कारकून मोबाइल पर अपने डिमांड के अनुरूप स्टोरी लिखने को बोलते हैं और चट से ‘बोलो मेरे आका’ के अंदाज में वह सबकुछ दे देता है, जो आपको चाहिए। तकनीक की पत्रकारिता का यह खतरा हम सबके लिए खतरा बन चुका है। अब एक ही रास्ता है कि हम खुद को इस तकनीकी पत्रकारिता के ढाँचे में ढाल लें या इससे बाहर हो जाएँ। कोई तीन दशक पहले फोटोटाइप सेटर और इसके बाद कम्प्यूटर आया तो जो इसके हमसफर हो गए, वे तो बच गए लेकिन अनेक की पत्रकारिता आले पर रख दी गई। अब ओटले की पत्रकारिता होने लगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कभी समाज भरोसे के साथ कहता था कि-पढ़ा नहीं, फलां अखबार में छपा है और आज वही कहते हैं कि एक बार खबर को जाँच लेना। इन सबके बावजूद हमारे पुरखा बालकवि बैरागी जी कि यह पंक्ति बरबस याद आ जाती है-
माना कि अंधेरा घना है, पर एक दीया जलाना कहाँ मना है!