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ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा

  आजादी का अमृत महोत्सव संगोष्टी   ग्रामीण, किसान और आदिवासी समाज के उत्सर्ग का उल्लेख जरूरी- डॉ झा महू (इंदौर)। ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमृत महोत्सव के अवसर पर आजादी के नायकों का और सम्पूर्ण आजादी का स्मरण करना हम सबके लिए गौवर की बात है. हमारी आजादी क इतिहास उस आमजन, ग्रामीण और किसान के उत्सर्ग का स्मरण किए बिना पूरा नहीं हो सकता जिन्होंने देश की आजादी के लिये अपने प्राणों का न्योछावर कर दिया।’ यह बात केन्द्रीय विश्वद्यिालय साउथ बिहार में सेंटर फॉर हिस्टोरिकल एवं आर्कालॉजिकल विभाग के अध्यक्ष डॉ. सुधांशु कुमार झा ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नवीन परिप्रेक्ष्य : ग्रामीण बिहार प्रतिबिंब’ को संबोधित करते हुए कहा. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इतिहास लेखन के लिए हमें गांव की ओर जाना होगा जहां असंख्य अनाम शहीद हैं जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं. दुनिया भर में भारत का स्वाधीनता आंदोलन अतुलनीय है. उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन अहिंसक था लेकिन अंग्रेजी शासक ने अहिंसा का जवाब हिंसा से दिया.   डॉ बी आर अम्बेडकर यूर्निवसिटी ऑफ सोशल साइंस एवं हेरीटेज सो

पांच नहीं, मनुष्य अपने समाथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पेड़ लगाये- शर्मा

  विश्व पर्यावरण दिवस पर राष्ट्रीय संगोष्ठी  महू।  ‘पांच पेड़ लगाओ का संकल्प गलत है बल्कि प्रत्येक मनुष्य अपने सामथ्र्य के अनुरूप अधिकाधिक पौधा लगाये. प्रकृति ने मनुष्य को समाथ्र्य दिया है कि वह अपने कार्यों से प्रकृति का ऋण चुकाये.’ यह बात पद्यश्री से सम्मानित श्री महेश शर्मा पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आसंदी से बोल रहे थे. संगोष्ठी का विषय ‘प्री एंड पोस्ट कोविड-19 : इम्पेक्ट ऑफ एनवायरमेंटएंड बॉयोडॉयवर्सिटी’. संगोष्ठी का आयोजन डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, स्कूल ऑफ सोशल साइंस, यूजीसी स्ट्राइड प्रोजेक्ट, नेशन एकेडमी ऑफ साइंस चेप्टर, भोपाल एवं सोसायटी ऑफ लाइफ साइंसेंस के संयुक्त तत्वावधान में  किया गया था. मुख्य अतिथि श्री शर्मा ने कहा कि जो रचा गया है, वह मनुष्य के पुरुषार्थ का परिणाम है और जो खराब हो रहा है, वह उसके भीतर का लालच है. उन्होंने मनुष्य एवं पशु की खासियत को स्पष्ट करते हुए कहा कि पशु उपभोग के लिए होता है लेकिन मनुष्य परामर्थ के लिए होता है. मनुष्य समस्या पैदा करता है, पशु नहीं.  उन्होंने कहा कि आप कहीं भी पे

पूर्वाग्रह से ग्रसित इतिहास लेखन बड़ी चुनौती- प्रो. चतुर्वेदी

  ‘भारतीय इतिहास की समस्यायें : चौरी चौरा पुनरावलोकन’ महू (इंदौर). ऐतिहासिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर जिस तरह का इतिहास लेखन किया गया है, वह हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती है. इतिहास लेखन प्रामाणिक एवं पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए ताकि हम वास्तविक स्थिति को जान सकें. यह बात इतिहासकार एवं आईसीसीआर के सदस्य प्रोफेसर हिमांशु चतुर्वेदी ने कहा. प्रोफेसर चतुर्वेदी निर्माणाधीन सेंट्रल विस्टा के बारे में  बताते हैं कि 9 स्तंभों की एक गैलरी है जिसमें भारतीय इतिहास की प्रामाणिक एवं आम आदमी के समझ में आने वाली भाषा में उल्लेख किया गया है. प्रोफेसर चतुर्वेदी डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू एवं हेरिटेज सोसायटी पटना के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चौरी-चौरा कांड  ‘भारतीय इतिहास की समस्यायें : चौरी चौरा पुनरावलोकन’ पर बोल रहे थे. प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि इतिहास में यह बात स्थापित कर दी गई है कि चौरी चौरा घटना 5 फरवरी 1922 को हुई थी जबकि वास्तविकता यह है कि चौरी चौरा की घटना 4 फरवरी, 1922 को सायं 4 बजे हुई थी. उन्होंने बताया

पत्रकारिता दिवस का मान बढ़ाया भोपाल-इंदौर ने

हिन्दी पत्रकारिता दिवस    का गौरव मनोज कुमार एक पत्रकार के लिए आत्मसम्मान सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब किसी पत्रकार को अपनी यह पूंजी गंवानी पड़े या गिरवी रखना पड़े तो उसकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है. फिर आप किसी भी पत्रकार के लिए कोई दिन-दिवस मनाते रहिए, सब बेमानी है. हर साल हिन्दी पत्रकारिता दिवस 30 मई को मनाते हैं. यह हमारे स्वाभिमान का दिवस है. हिन्दी की श्रेष्ठता का दिवस. अंग्रेजों को देश निकाला देने का हिन्दी पत्रकारिता का गौरव दिवस लेकिन साल-दर-साल हिन्दी पत्रकारिता क्षरित होता रहा, इसमें भी कोई दो राय नहीं है. हालांकि भारत के एक बड़े वर्ग की आवाज आजादी से लेकर अब तक हिन्दी पत्रकारिता रही है और शायद आगे भी हिन्दी पत्रकारिता का ओज बना रहेगा. हिन्दी पत्रकारिता का वैभव अमर रहे, यह हम सबकी कोशिश होती है और होना भी चाहिए लेकिन हिन्दी के पत्रकारों की दशा दयनीय होती जा रही है. इस पर चिंता की जानी चाहिए. यह शायद पहली पहली बार हो रहा होगा जब हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर भोपाल और इंदौर के पत्रकारों ने ऐसी पहल की कि हिन्दी के पत्रकारों का आत्मसम्मान भी कायम रहा और आर

आपदा में अवसर के खिलाफ संकट में समाधान की जरूरत

मनोज कुमार      आपदा में अवसर तलाशने वालों के खिलाफ संकट में समाधान तलाशने की जरूरत है. स्वाधीनता के पहले कुछ सालों के बाद हमारे समाज को भ्रष्टाचार, घोटाले ने निगल लिया है. बार बार और हर बार हम सब इस बात को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं लेकिन यह लाइलाज बना हुआ है. आज हम जिस चौतरफा संकट से घिरे हुए हैं, उस समय यह बीमारी कोरोना से भी घातक साबित हो रही है. खबरों में प्रतिदिन यह पढऩे को मिलता है कि कोरोना से बचाव करने वाले इंजेक्शन, दवा और ऑक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है. अस्पताल मनमाना फीस वसूल रहे हैं. जान बचाने के लिए लोग अपने घर और सम्पत्ति बेचकर अस्पतालों का बिल चुका रहे हैं. हालात बद से बदतर हुआ जा रहा है. शिकायतों का अम्बार बढ़ा तो सरकार सक्रिय हुई और टेस्ट से लेकर एम्बुलेंस तक की दरें तय कर दी गई लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर इसका कोई खास असर होता हुआ नहीं दिखा. कोरोना से रोगी बच जा भी जा रहा है तो जर्जर आर्थिक हालत उसे जीने नहीं दे रही है. यह आज की वास्तविक स्थिति है लेकिन क्या इसके लिए अकेले सरकार दोषी है या हमारा भी इसमें कोई दोष है? क्यों हम इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार के साथ खड

बेमानी है प्रेस फ्रीडम की बातें

मनोज कुमार      तीन दशक पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने 3 मई को विश्व प्रेस फ्रीडम डे मनाने का ऐलान किया था. तब से लेकर आज तक हम इसे पत्थर की लकीर मानकर चल रहे हैं. इन तीन दशकों में क्या कुछ हुआ, इसकी मीमांसा हमने नहीं की. पूरी दुनिया में पत्रकार बेहाल हैं और प्रेस बंधक होता चला जा रहा है. खासतौर पर जब भारत की चर्चा करते हैं तो प्रेस फ्रीडम डे बेमानी और बेकार का ढकोसला लगता है. दशकवार जब भारत में पत्रकारिता पर नजर डालें तो स्थिति खराब नहीं बल्कि डरावना लगता है. लेकिन सलाम कीजिए हम पत्रकारों की साहस का कि इतनी बुरी स्थिति के बाद भी हम डटे हुए हैं. हम पत्रकार से मीडिया में नहीं बदल पाये इसलिए हमारे साहस को चुनौती तो मिल रही है लेकिन हमें खत्म करने की साजिश हमेशा से विफल होती रही है. इस एक दिन के उत्सवी आयोजन से केवल हम संतोष कर सकते हैं लेकिन फ्रीडम तो कब का खत्म हो चुका है बस समाज की पीड़ा खत्म करने का जज्बा ही हमें जिंदा रखे हुए है.      भारत में पत्रकारिता के पतन की शुरूआत और उसकी स्वतंत्रता खत्म करने का सिलसिला साल 1975 में ही शुरू हो गया था. आपातकाल के दरम्यान जो कुछ घटा और जो कुछ हुआ,

मनुष्यता के देवदूत हैं श्रमिक साथी

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मनोज कुमार मेहतनकश की दुनिया को सलाम करता एक मई. वह एक मई जिसे हम श्रमिक दिवस के रूप में जानते हैं. वही श्रमिक साथी जिनके पास जीवन जीने लायक मजदूरी से मिला मेहताना होता है. घर पर कोई पक्की छत नहीं. धरती को बिछा लेते हैं और आसमां को ओढ़ लेते हैं. इनकी उम्मीदें भी कभी हिल्लोरे नहीं मारती है. मोटरकार से लेकर जहाज तक खड़ा कर देते हैं लेकिन इसमें सवार होने की इच्छा कभी नहीं होती है. ये श्रमिक रचनाकार हैं और इनसे समाज की धडक़न है. इन्हें अपना अधिकार भी पता है और दायित्व भी. अधिकार के लिए कभी अड़े नहीं लेकिन दायित्व से पीछे हटे नहीं. आज की तारीख से पहले अखबार में खबर छपी कि देश के प्लांट मे ऑक्सीजन निर्माण में जुटे श्रमिकों ने अपने खाना इसलिए छोड़ दिया कि उन्हें पहले काम पूरा करना है. यह जज्बा श्रमिकों में ही हो सकता है. श्रमिक श्रेष्ठ हैं तो इसलिए नहीं कि वे श्रमिक हैं बल्कि एक तरह से वे रचियता हैं. मांगना इनकी आदत में नहीं है. देना इनकी फितरत में शामिल है. आत्मस्वाभिमान से जीने वाले श्रमिक साथी अपना भोजन छोडक़र एक संदेश दिया है कि आओ, पहले जान बचायें. एक-एक जान की कीमत श्रमिक साथियों को पता ह