बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

मेरी आवाज़ ही पहचान है

 












विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी 

प्रो. मनोज कुमार

    सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा है. भारत की आजादी की ख़बर हो या दैनंदिनी गतिविधियों की पुख्ता और सही जानकारी रेडियो से ही मिल पाती है. एक समय हुआ करता था जब रेडियो का मतलब आकाशवाणी हुआ करता था लेकिन अब शहरी इलाकों में एफएम और गाँव-खेड़े के लिए सामुदायिक रेडियो प्रचलन में है. रेडियो एक नए अनुभव की तरह हमारे साथ-साथ चल रहा है. किसी समय रेडियो के लिए लायसेंस लेना होता था तो आज टेक्रालॉजी ने सारे मायने बदल दिए हैं और हथेलियों पर बंद मोबाइल फोन में आप अपना पसंदीदा रेडियो प्रोग्राम, गीत-संगीत सुन सकते हैं. हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस सेलिब्रेट किया जाता है तो इसके पीछे भी ठोस कारण है और वह है कि इस दिन 13 फरवरी, 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के रेडियो लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोत्कृष्ट मंच मानता  है. पहली रेडियो सेवा 23 फरवरी 1920 को और पहली खेल रेडियो रिपोर्ट 11 अप्रैल 1921 को प्रसारित हुई थी तब से रेडियो युवा और गतिशील बना हुआ है। भारत में ऑल इंडिया रेडियो का नाम एकजाई कर आकाशवाणी कर दिया गया है.

अमीन सयानी और रेडियो सीलोन एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. दुनिया के सबसे पुराने रेडियो प्रसारकों में से एक, रेडियो सीलोन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिए. ऐसे समय में जब रेडियो एक नई चीज थी और टीवी द्वारा दक्षिण एशिया के मीडिया परिदृश्य को बदलने से दशकों पहले, रेडियो सीलोन ने आधिकारिक तौर पर 16 दिसंबर, 1925 से प्रसारण शुरू किया. यह एशिया का पहला रेडियो प्रसारक था. भारत में निजी रेडियो प्रसारण 1927 में शुरू हुआ, जबकि ऑल इंडिया रेडियो ने 1936 में परिचालन शुरू किया. नीदरलैंड 1919 में सार्वजनिक प्रसारण शुरू करने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1920 में अमेरिका ने इसका अनुसरण किया.

आमतौर पर बोलचाल में हम एक संबोधन रेडियो कह देते हैं लेकिन रेडियो और ट्रांजिस्टर में बुनियादी फर्क है. रेडियो एक स्थूल उपकरण है जबकि ट्रांजिस्टर मोबाइल की तरह चलायमान. 1947 में डब्ल्यू. शॉकली के नेतृत्व में बेल लेबोरेटरीज (यूएसए) में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने वाल्व वाले रेडियो का अंत कर दिया।. 1954 में, अमेरिकी कंपनी रीजेंसी ने पहला पूरी तरह से ट्रांजिस्टर वाला रेडियो बनाया और बेचा. हालाँकि अब इसे पीसी या स्मार्टफोन से भी सुना जा सकता है, लेकिन फर्नीचर के रूप में रेडियो का आकर्षण आज भी बरकरार है और समय के साथ इसमें ऐसी तकनीक और कार्यक्षमता जुड़ती गई है जो पहले मौजूद नहीं थी. 

रेडियो तकनीक की चर्चा करें तो अब हम विजुअल रेडियो की दुनिया में पहुँच गए हैं. कानों सुनी के साथ अब आँखों देखी रेडियो का जमाना भी आ गया है, इसे विजुअल रेडियो का नाम दिया गया है. विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है. इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं. मन की बात मूलत: रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं.

सडक़ से सरकार तक रेडियो की उपयोगिता बनी हुई है. खेत में जाता किसान, मजदूरी के लिए जाता मजदूर अपने कंधे पर ट्रांजिस्टर सेट लटका कर सुनते हुए चलता हुआ कहीं भी दिख जाता है. अब नए जमाने में कार में रेडियो ट्यून कर लेते हैं या मोबाइल पर भी ट्यून कर पसंदीदा गीत सुन सकते हैं. इस दौर में सामुदायिक रेडियो का आगमन हुआ और यह दूर-दराज इलाके जहाँ संचार की सुविधा नहीं है, उनके लिए वरदान साबित हुआ. औसतन पंद्रह किलोमीटर रेंज में प्रसारित होने वाले सामुदायिक रेडियो समुदाय विशेष के लिए होता है. खास बात यह है कि इस रेडियो का संचालन भी समुदाय विशेष के लिए किया जाता है. महात्मा गांधी से लेकर इंदिरा गांधी और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो के प्रभाव को समझा और लोगों से सीधा संवाद करने के लिए उसे चुना. ‘मन की बात’  कार्यक्रम से ना केवल आकाशवाणी को आर्थिक लाभ हुआ अपितु देश भर की छिपी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिला. कम खर्च, सीमित संसाधन लेकिन एक सौ तीस करोड़ लोगों से संवाद का यह अनूठा प्रयास प्रभावकारी हुआ है. 

मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की बात करना सुखद लगता है. जनजातीय विभाग ने आदिवासी बहुल इलाकों में रेडियो प्रसारण के जरिए जनजातीय समुदाय में जागृति लाने एवं मुख्यधारा से जोडऩे का अथक प्रयास किया. वर्ष 2010 में कम्युनिटी रेडियो स्थापना की कार्यवाही आरंभ की गई और 2012 आते-आते आठ कम्युनिटी रेडियो आदिवासी अंचलों में बजने लगे थे. नाम दिया गया ‘रेडियो वन्या’. ‘रेडियो वन्या’ के स्टेट कॉडिनेटर के नाते अनुभव का एक नया संसार रचने का अवसर मिला. ये सभी रेडियो स्टेशन आदिवासी बोलियों में प्रसारित हो रहे थे. चुनौती थी कि बोलियों में प्रामाणिकता एवं शुद्वता की थी सो आदिवासी बोलियों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर हिन्दी में मेरे बनायी गई स्क्रिप्ट को वे बोलियों में बदल देते थे. इस तरह सरकार की अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनजातीय समुदाय को मिलने लगा. इसके साथ ही तब के संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी के प्रयासों से देश का एकमात्र स्वाधीनता संग्राम पर एकाग्र कम्युनिटी रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ का प्रसारण होने लगा. इस अनुभव के साथ मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कम्युनिटी रेडियो स्थापना के लिए पहले सलाहकार के रूप में जिम्मेदारी दी गई. तत्कालीन कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश के साथ ‘रेडियो कर्मवीर’ का प्रसारण आरंभ हो गया. इस वर्ष पद्यश्री से सम्मानित डॉ. रामामूर्ति भी ‘रेडियो कर्मवीर’ की सलाह ली गई थी. इन अनुभवों को एकाग्र कर कम्युनिटी रेडियो पर हिन्दी में पहली किताब कही जा सकती है. कहा जा सकता है कि कम्युनिटी रेडियो के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की अलग ही पहचान है. आदिवासी बोलियों में रेडियो प्रसारण वाला मध्यप्रदेश संभवत: अपनी तरह का इकलौता प्रदेश है.

रेडियो का असीमित और स्थायी प्रभाव आज भी बना हुआ है या यों कह सकते हैं कि समय के साथ रेडियो की उपयोगिता में श्रीवृद्धि हुई है. रजतपट और रेडियो का चोली-दामन का साथ रहा है. अनेक नई-पुरानी फिल्मों में रेडियो को प्रभावी माध्यम के रूप में देखा और समझा गया है. हालिया फिल्म ‘मेरी सुलु’ ने जता दिया कि रेडियो जॉकी के लिए खांटी प्रोफेशनल्स होना जरूरी नहीं, बस इस मीडिया के लिए जुनून और जज्बा चाहिए. कहना पड़ेगा मन का रेडियो बजने दे जरा... (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

‘ऋषि समागम व्याख्यान’-2026



दुनिया ने कहा ईश्वर ही सत्य है और गांधी ने कहा सत्य ही ईश्वर-अनुराधा शंकर सिंह

    भोपाल। यूरोप ने भारतीय मेधा का अपने फायदे के लिए लाभ लिया और जब उनकी जरूरत पूरी हो गई तो दुनिया भर से भारतीयों को भगाने के लिए साजिश रची जा रही है. कभी भारतीय उनके आँखों के तारे हुआ करते थे, आज भारतीयों को गंदा बताया जा रहा है. हम समझते रहे कि हम कम्प्यूटर इंजीनियर हैं, दरअसल हम उनके मजदूर थे. विचारक एवं सेवानिवृत्त एडीजी सुश्री अनुराधाशंकर सिंह ने रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के 25वें वर्ष के अवसर पर आयोजित ‘ऋषि समागम व्याख्यान’ को संबोधित कर रही थीं. उनका कहना था कि सारी दुनिया ने ईश्वर को सत्य माना लेकिन अकेले गांधी ने सत्य को ईश्वर कहा. गांधी हमेशा प्रासंगिक रहेंगे. उन्होंने ‘समागम’ के 25 वर्ष की यात्रा को सुखद और प्रेरणादायक बताया. 

आने वाले समय में गूगल बाबा रिपोर्टिंं भी होने लगे तो अचरज नहीं करना चाहिए -गिरिजाशंकर

वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश£ेषक श्री गिरिजाशंकर ने कहा कि- ‘हर नई चीज के साथ संभावना के दरवाजे खुलते हैं. डिजीटल एज में भी यही हो रहा है.’ उन्होंने कहा कि हालांकि सबकुछ अच्छा भी नहीं होता है, जैसे पहले आँखों देखी रिपोर्टिंग होती थी, अब कानों सुनी रिपोर्टिंग हो रही है और आने वाले समय में गूगल बाबा रिपोर्टिंं भी होने लगे तो अचरज नहीं करना चाहिए. 

सब कुछ यांत्रिक हो गया है तो परेशानी बढ़ी है-  डॉ. सुधीर सक्सेना

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सुधीर सक्सेना ने कहा कि- ‘इस कठिन समय में गांधी पर केन्द्रित अंक का प्रकाशन अपने आपमें साहस का कार्य है और ‘समागम यह कर रहा है.’ उन्होंने डिजीटल ऐरा में कम्युनिकेशन की चुनौती के बारे में कहा कि अब सब कुछ यांत्रिक हो गया है तो परेशानी बढ़ी है।

यह संघर्ष नहीं आनंद की पत्रिका-मनोज कुमार

    कार्यक्रम के आरंभ में आधार वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त रिसर्च जर्नल ‘समागम’ के संपादक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री मनोज कुमार ने कहा कि- ‘जिस दिन पत्रिका की समाज को आवश्यकता नहीं होगी, इसका प्रकाशन स्थगित कर दिया जाएगा. यह संघर्ष नहीं आनंद की पत्रिका है.’ आयोजन को परम्परागत स्वागत से दूर रखा गया और वक्ता में किसी को भी मुख्य अतिथि या कार्यक्रम अध्यक्ष बताने के स्थान पर सबको एक जैसा रखकर समाज में नवाचार आरंभ किया गया. कार्यक्रम में लेखक संजय सक्सेना की किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ का विमोचन अतिथियों ने किया. आयोजन में पीआरएसआई सहयोगी थे.

‘समागम’ सम्मान 2024-2025

    ‘समागम’ के 25वें वर्ष के अवसर पर लोकमाता अहिल्या, स्वामी विवेकानंद के नाम पर स्थापित सम्मान से शिक्षा के क्षेत्र में अहा जिंदगी एवं मधुरिमा की संपादक सुश्री रचना संमदर एवं आरती सारंग को, ज्ञान के क्षेत्र में रंग निदेशक श्री संजय मेहता एवं डॉ. मोना परसाई को, समाजसेवा के क्षेत्र में सुप्रीमकोर्ट की एडवोकेट सुश्री गुंजन चौकसे एवं भक्ति शर्मा को प्रदान किया गया. स्वामी विवेकानंद युवा प्रतिभा सम्मान भास्कर के पुस्तकालय प्रभारी श्री केशव किशोर एवं युवा फिल्ममेकर आदित्य चौरसिया को तथा अभ्युदय समागम सम्मान पीएससी टॉपर सुश्री हर्षिता दवे एवं डॉ. नरेन्द्र त्रिपाठी को प्रदान किया गया.  

कार्यक्रम का संचालन पूर्वा शर्मा त्रिवेदी ने किया एवं साहित्यकार श्री संजीव परसाई ने आभार व्यक्त किया. 

 

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

हाथ बाद में सेंक लेना भिया, इंदौर तो बचा लो



प्रो. मनोज कुमार
इंदौर इस समय दुखी है, परेशान है. अपने बच्चों और साथियों के अकाल मौत से उसके माथे पर सिकन दिख रही है. वह बेबस है. सिस्टम ने उसे कलंकित कर दिया है. साफ पीने का पानी भी उस इंदौर के लोगों को नसीब ना हो, यह देख-सुन कर लोकमाता अहिल्या भी कांप उठी होगी. कल तक इंदौर स्वच्छतम शहर होने पर इतरा रहा था. आज स्वच्छता का यही तमगा उसे शर्मसार कर रहा है. इंदौर के भगीरथपुरा में जो कुछ घटा वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं, शर्मनाक है. मानवता पर कलंक सा मामला है. भगीरथपुरा में जो कुछ और जो कुछ घट रहा है, उसने स्वच्छता के एक-एक धागे खोलकर रख दिया है. यह सबकुछ आईने की तरफ साफ है. कोई लाग-लपेट नहीं. इंदौर नागरिक बोध का शहर है. इस शहर के बाशिंदों को पता है कि स्वच्छता किसे कहते हैं और स्वच्छ कैसे रहा जाता है. देशभर के लिए आइडियल बना इंदौर एकाएक नेपथ्य में चला गया है. उसकी स्वच्छता पर सवाल उठाये जा रहे हैं. सवाल गैरवाजिब नहीं होगा लेकिन क्या आज जब भगीरथपुरा के साथ प्रदेश के अनेक जिले और कस्बा बिसूर रहे हैं. हर जगह मौत का सबब बने दूषित पानी की शिकायत मिल रही है, ऐसे में स्वच्छता का ऑपरेशन करना जरूरी लगता है? क्या यह सही समय है हाथ सेंकने का?  इसके पहले कलमवीरों, सोशल मीडिया के नायकों को इंदौर की कमजोरी नजर क्यों नहीं आयी? अचानक क्या हुआ कि इंदौर का रेशा-रेशा उधेड़ा जा रहा है. भगीरथपुरा की घटना महज घटना नहीं है बल्कि यह इंदौर सहित पूरे देश को सबक लेने का एक सबक है कि जिंदगी इतनी सस्ती नहीं होना चाहिए. सिस्टम को इतना लापरवाह और निर्दयी नहीं होना चाहिए.
खैर, इंदौर एकाध बार नहीं, 6 बार देश के स्वच्छतम शहर घोषित किया गया. थोड़ा पहले जाइए और पन्ने पलट कर देखिये, चैनलों की पुरानी पड़ गई रिकार्डिंग देखिए कि इंदौर के स्वच्छतम शहर ऐलान किए जाने के बाद इंदौर की यशोगाथा की पटकथा लिखी गई. हर कोई आगे था. इंदौर में ही सिस्टम का हिस्सा रहे एक बड़े अधिकारी ने तो इंदौर की स्वच्छता पर किताब तक लिख डाली तो कुछेेक लोगों ने पी-एचडी पर कर लिया. लिखने, बोलने और बताने में इंदौर की ऐसी कहानी सुनायी गई कि गर्व से सिर ऊँचा उठ गया था. खरामा-खरामा जिंदगी चलती रही. यही सब लोग जुट गए थे इंदौर को सातवीं दफा स्वच्छ शहर बनाने के लिए. सब आँख मींचे बैठे थे. किसी को शहर की कमियां नहीं दिख रही थी. किसी ने सिस्टम को नहीं खंगाला था. सब ठीक था, जैसे आम दिनों में होता आया है. दुर्भाग्य से दिल दहला देने वाली भगीरथपुरा की घटना सामने आयी. दूषित पानी से अकेले बीमार नहीं पड़े बल्कि जान भी जानें लगी. एक-दो मौतें होती तो बात थम जाती या थोड़े दिनों बाद शांत पड़ जाता. यहां तो कलेजे तक आ जाने वाले आंकड़ों ने दहशत में डाल दिया. इंदौर से दिल्ली तक की सत्ता हिल गई. हालाँकि थोड़े पहले ही छिंदवाड़ा में कफ सिरप से ऐसी ही दिल दहलाने वाली घटना हुई थी. अब एक और. 
ऐसे मामलों में खुद को चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का सक्रिय होना लाजिमी था. मेन स्ट्रीम का मीडिया ने अपना दायित्व ओढ़ा और सिस्टम की खामियों को बाहर लाया. पीडि़तों को हरसंभव इलाज और मदद मिले, इसके लिए सिस्टम को एक्टिव किया और इसके साथ ही ऐसे कलमवीरों की फौज खड़ी हो गई जिसने कभी स्वच्छ इंदौर को आइडिल बताया था, वह आज इंदौर को लपेट रहा है. उसे देश का सबसे गंदा शहर नजर आने लगा है. हर गली-चौराहों से गंदगी और शहर को बदसूरत बनाने वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं. ये सच है और ऐसा होना भी जरूरी है. लेकिन क्या कोई बताएगा कि बारिश के दिनों में जब इंदौर के सडक़ पानी से बेतरतीब हुआ जा रहे थे. नालियाँ बजबजा रही थीं और यातायात बेकार और बेकाम हो गया था, तब इंदौर की स्वच्छता पर किस किसने और कब सवाल उठाया था? क्यों नहीं बताया गया कि इंदौर स्वच्छ नहीं, मलिन शहर है. तब इसे बढ़ती आबादी के कारण रोजमर्रा की परेशानी बता कर छोड़ दिया गया था. एक और कारण है कि तब जनहानि नहीं हुई थी. 
बेशक इंदौर की कमियाँ गिनाइए, कोसिए, कटघरे में खड़ा कीजिये लेकिन ध्यान रखिए कि इंदौर को स्वच्छतम शहर बनाने में हम भी साथ थे. दूर-देश से कोई आता और कागज का टुकड़ा भी फेंक देता तो इंदौरी लपक कर कहते-भिया नहीं, इंदौर स्वच्छ शहर है. इसे स्वच्छ रखने में सहयोग कीजिए और खुद उस कागज को डस्टबीन के हवाले कर देते. आज क्या हो गया? मीडिया की संवेदनशीलता यहां दिखना चाहिए, यह मेरी निजी मान्यता है. कितने साथी भागीरथपुरा गए और परिवारों का हाल देखा? कितनी मानवीय संवेदना वाली खबरें की? कितने लोग उन परिवारों के दुख में शामिल हुए? कितने लोग और कोई दूषित पानी ना पिये, इसके लिए कैम्पेन चलाया? कितनों को जागरूक किया. नागरिक बोध के इस गौरवशाली इतिहास वाले शहर में हाथ सेंकने चले आए भिया, ये सब बाद में कर लेना. अभी मरहम की जरूरत है. अभी दवा और संवेदना की जरूरत है. लड़ तो हम बाद में भी लेंगे. अभी हाथ में हाथ देकर साथ चलने का वक्त है. सरकार की जिम्मेदारी सरकार पूरा करेगी लेकिन समाज की जवाबदारी तो हमी को करना होगा. बयानवीरों को ठिकाने लगाइए लेकिन भूल मत जाना कि हमारी जवाबदारी इससे आगे की और बड़ी है. सत्ता आती जाती रहती है. शहर का गौरव पर बात उठी तो हम सब को भुगतना होगा. संवेदना के रास्ते गौरव का शीश हमेशा ऊँचा रहता है और इस बात को हम सबको समझना होगा. देर-अबेर भगीरथपुरा सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों के हालात ठीक होने लगेंगे. लेकिन जोश में हमने कुछ कर दिया तो उसका खामियाजा हमें सदियों तक भुगतना होगा. भिया, हाथ बाद में सेंक लेना, पहले इंदौर को बचा लो.

 

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

@मीठी मीठी यादें बातें साथ रख लें


















 प्रियजन

गुजरते साल की हर वो

मीठी मीठी यादें बातें साथ रख लें

जो जगाती हो उम्मीद

दिलाती हो भरोसा

भूल जाएं उन यादों, बातों

और लोगों को जो देते हैं दुख 

टूटती है उम्मीद 

खुद को भी परख लेना

किसका तोड़ा है भरोसा

या पहुंचा है हमसे दुख

जीवन हो जाता है सरल

जैसे उम्मीद टिकी है दुनिया 

भरोसे से रिश्ते और 

नया साल हो

उम्मीद और भरोसे का

नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं 

प्रो. मनोज कुमार

गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

जो बचा है, उसे ही बचा लो

 जो बचा, उसे ही बचा लो

जैसे प्रेम और प्रकृति 

जैसे पेड़, पहाड़ और नदियां 

हम सब मर जाएंगे 

तब भी बचा रहेगा यह सब

इन्हें आज ना बचा पाए तो

कहां विसर्जित होंगी

तुम्हारी अस्थि

जब नहीं होगी नदियां 

कैसे जलेंगे तुम्हारे शव

जब नहीं होंगे जंगल

कैसे आनंदित होगे

जब नहीं होंगे पहाड़

जो बचा है, उसे ही बचा लो

प्रेम और प्रकृति 

प्रो. मनोज कुमार

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

‘ज्ञानपीठ’ का महाप्रयाण हो जाना

 





प्रो. मनोज कुमार

    आखिरकार ‘ज्ञानपीठ’ विनोद कुमार शुक्ल जीवन संघर्ष में पराजित होकर अलविदा कह दिया. उनका जाना नियति की स्वीकृति हो सकती है लेकिन समाज और साहित्य को यह बिलकुल भी गंवारा नहीं था. उनकी एक-एक धडक़न समाज के लिए धरोहर थी. कहते हैं सरल होना कठिन नहीं है लेकिन सरल बने रहना कठिन है. विनोदजी ने सरल बने रहना को सच कर दिखाया था. अविभाजित मध्यप्रदेश के एक कस्बानुमा शहर में पढ़ाते हुए वे रचना किया करते थे. उनके जानने वाले जानते थे कि विनोदजी किस मिट्टी के बने हुए हैं. बेहद सरल और सहज. अपनों से छोटे हों, हमउम्र हों या उम्रदराज, उनके पास जाकर किसी ने खुद को छोटा नहीं पाया. यह बहुत कम होता है कि किसी को श्रेष्ठ सम्मान से नवाजा जाए तो पूरा समाज स्वयं को सम्मानित महसूस करता है. विनोदजी को जब ‘ज्ञानपीठ’ मिलने का ऐलान हुआ तो यह भी उन अपवाद वाले पल-छीन में था. रायपुर से दिल्ली तक स्वागत और उत्साह का माहौल था. 

        ‘वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह’ अपनी इस पहली कविता संगह से वे चर्चा में आ गए. यह प्रयोगधर्मी शीर्षक को पढक़र सुनकर साहित्य प्रेमी चौंक गए थे. तब उस दौर में ऐसा प्रयोग ना के बराबर था. वे इस बात के कभी हामी नहीं रहे कि कविता को नारे की तरह गढ़ा जाए. उनकी रचनाओं में लोक की छाप दिखती है तो आधुनिक समाज में हो रहे परिवर्तन, आकांक्षाओं के साथ उनकी संवेदनशीलता झलकती है. सही मायने में देखा जाए तो उनका लेखन सुपतिेिष्ठत कवि भवानी प्रसाद मिश्र की बातों को आगे बढ़ाते हुआ दिखता है जिसमें भवानी भाई कहते हैं- जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख. 

विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के थे लेकिन उनकी कविताएं और कथा संसार सारी भौगोलिक सीमा को लांघ जाती है. ज्ञानपीठ सम्मान का ऐलान हो जाने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि ‘मेरे पास में शब्द नहीं हैं कहने के लिए, क्योंकि बहुत मीठा लगा कहूंगा, तो मैं शुगर का पेशेंट हूं. मैं इसको कैसे कह दूं कि बहुत मीठा लगा. बस अच्छा लग रहा है.’. यह सादगी उन्हें और बड़ा बनाती है. 

एक जनवरी, 1937 में विनोद कुमार शुक्ल का जन्म साहित्य से रचे-बसे शहर राजनांदगांव में हुआ. वे अध्यापक रहे और पूरा समय साहित्य को समर्पित कर दिया था.  उम्र के 88वें पड़ाव पर खड़े विनोद कुमार शुक्ल वैसे ही सहज और सरल रहे जैसा कि छत्तीसगढ़ का एक व्यक्ति होता है. वे ज्ञानपीठ सम्मान को केवल सम्मान नहीं मानते हैं बल्कि अपनी जवाबदारी के रूप में देखते थे. बकौल विनोद कुमार शुक्ल ‘मुझे लिखना बहुत था, बहुत कम लिख पाया. मैंने देखा बहुत, सुना भी मैंने बहुत, महसूस भी किया बहुत, लेकिन लिखने में थोड़ा ही लिखा. कितना कुछ लिखना बाकी है, जब सोचता हूं, तो लगता है बहुत बाकी है. इस बचे हुए को मैं लिख लेना चाहता हूं. अपने बचे होने तक मैं अपने बचे लेखक को शायद लिख नहीं पाऊंगा, तो मैं क्या करूं? मैं बड़ी दुविधा में रहता हूं. मैं अपनी जिंदगी का पीछा अपने लेखन से करना चाहता हूं. लेकिन मेरी जिंदगी कम होने के रास्ते पर तेजी से बढ़ती है और मैं लेखन को उतनी तेजी से बढ़ा नहीं पाता, तो कुछ अफसोस भी है’. ऐसे थे विनोद जी.

विनोद जी के उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर सुपरिचित फिल्मकार मणि कौल फिल्म भी बना चुके हैं. उनकी कहानियाँ ‘आदमी की औरत’ एवं ‘पेड़ पर कमरा’ पर राष्ट़ीय फिल्म इंस्टीट्यूट, पूना द्वारा अमित दत्ता के निर्देशन में निर्मित फिल्म को वेनिस अंतरराष्टीय फिल्म समारोह 2009 में ‘स्पेशल मेनशन अवार्ड’ मिला. उनके उपन्यास ‘दीवार में एक खिडक़ी रहती थी’ पर प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक मोहन महर्षि सहित अन्य रचनाओं पर निर्देशकों द्वारा नाट्य मंचन भी हो चुका है.

ज्ञानपीठ के पहले उन्हें मध्यपदेश शासन का गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, मध्यप्रदेश कला परिषद  का रज़ा पुरस्कार, मध्यपदेश शासन का शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, मोदी फाउंडेशन का  दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, भारत सरकार का साहित्य अकादमी सम्मान, उत्तरपदेश हिन्दी संस्थान का हिन्दी गौरव सम्मान, अंग्रेजी कहानी संग्रह के लिए मातृभूमि सम्मान के साथ ही साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान ‘महत्तर सदस्य’ मनोनीत किया गया था. 

विशिष्ट भाषिक बनावट, संवेदनात्मक गहराई, उत्कृष्ट सृजनशीलता से उन्होंने भारतीय भाषा साहित्य को समृद्ध किया है. इसलिए कहते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल हो जाना आसां नहीं है. तभी तो 59वें ज्ञानपीठ सम्मान के लिए चयनित हो जाने की सूचना के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि-चिंतक अशोक वाजपेयी का कहते हंै कि ‘यह सम्मान एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया है, जिसने अपनी रचनाधर्मिता को निपट साधारण और नायकत्व से निरपेक्ष व्यक्ति को समर्पित किया है’. वे समाज के नब्ज को जानते हैं और उन पर भी उनका दखल है. 

विनोद कुमार शुक्ल की कविता संगह लगभग जयहिंद वर्ष, 1971, वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह, वर्ष 1981, सब कुछ होना बचा रहेगा, वर्ष, 1992, अतिरिक्त नहीं, वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता, वर्ष 2001, आकाश धरती को खटखटाता है, वर्ष 2006, पचास कविताएँ, वर्ष 2011, कभी के बाद अभी, वर्ष 2012, कवि ने कहा -चुनी हुई कविताएँ, वर्ष 2012, प्रतिनिधि कविताएँ, वर्ष 2013 में पकाशित हुई. उपन्यास संग्रह नौकर की कमीज़, वर्ष 1979, खिलेगा तो देखेंगे, वर्ष 1996, दीवार में एक खिडक़ी रहती थी, वर्ष 1997, हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़, वर्ष 2011, यासि रासा त, वर्ष 2017, एक चुप्पी जगह, वर्ष 2018 है. कहानी संग्रह मेें पेड़ पर कमरा, वर्ष 1988, महाविद्यालय, वर्ष 1996, एक कहानी, वर्ष 2021, घोड़ा और अन्य कहानियाँ, वर्ष 2021 के साथ कहानी/कविता पर पुस्तक ‘गोदाम’, वर्ष 2020, ‘गमले में जंगल’, वर्ष 2021 हैं. विनोद कुमार शुक्ल की अनेक कृतियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है. साहित्य, संस्कृति एवं मनुष्यत्व के ‘ज्ञानपीठ’ विनोद जी के चले जाने से उनके पीछे जो रिक्तता आयी है, उसे भरा पाना लगभग कठिन सा होगा. तस्वीर इंटरनेट से साभार

 


सोमवार, 22 दिसंबर 2025

#रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 का अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र



 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र 

रिसर्च जर्नल ‘समागम’ जनवरी 2026 में अपने प्रकाशन के 25वें वर्ष पूर्ण कर लेगा. शोध और संदर्भ की इस मासिक प्रकाशन को देशभर के बुद्धिजीवियों, अध्यापकोंं, विद्यार्थियों एवं स्कॉलर का पूरा सहयोग एवं समर्थन मिलता है. आरंभ से प्रयास रहा है कि कुछ अलग करें और इस सोच के साथ हम नवाचार की ओर कदम बढ़ाते हुए रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का प्रत्येक अंक विषय-विशेष का रहा. भारतीय सिनेमा के सौ साल, गांधी की साद्र्धशती, महिला सशक्तिकरण के सौ वर्ष, रेडियो का सफर, खादी पर, विश्व हिन्दी सम्मलेन सहित अनेक विषयों पर अंक का प्रकाशन किया जाता रहा. हाल ही में दिवंगत विज्ञापन गुरु पीयूष पांडे पर रिसर्च जर्नल ‘समागम’ अंक एकाग्र प्रस्तुत किया गया. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का 25वें वर्ष का अंतिम अंक ‘गांधी का अर्थशास्त्र’ पर एकाग्र है. 

मेरी आवाज़ ही पहचान है

  विश्व रेडियो दिवस 13 फरवरी  प्रो. मनोज कुमार      सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा ह...