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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

ये तेरा घर…ये मेरा घर…

मनोज कुमारहम बचपन में एक खेल खेला करते थे। कोई हमसे आगे न निकल जाये, इसके लिये हम कहते थे कि तु जितना बलवान है, मैं उससे दस गुना ज्यादा बलवान हूं। साथी संगी कहते कि हम तेरे से दस गुना ज्यादा बलवान हैं तो मैं कहता कि पहले ही कह दिया कि तुमसे दस गुना ज्यादा यानि जितना कहोगे उससे हमेशा यह ज्यादा ही रहेगा। बचपन के इस खेल को आज भोपाल में दुहराते हुए देखने का मौका मिला है। हमारा खेल बचपन का था जिसमें कोई स्वार्थ नहीं था लेकिन भोपाल में इन दिनों जो खेल खेला जा रहा है, वह अपने अपने स्वार्थाें के लिये है। दामुल वाले प्रकाश झा भोपाल में पहली दफा राजनीति की शूटिंग करने आये थे और इसके बाद आरक्षण बना डाला। राजनीति से आरक्षण बनाते समय तक न तो उन्हें भोपाल अपना लगा था और न ही उन्होंने कभी भोपाल को अपना घर कहने की बात की थी। इस बार जब अपनी वो एक नयी फिल्म की शूटिंग के लिये आये हैं और कुछ विवाद सामने आया तो उन्होंने कह दिया कि अब से भोपाल मेरा पहला घर। झा की तर्ज पर साथी कलाकारों ने भी भोपाल को अपना कह दिया। एकाध ने तो भोपाल से पुराना रिश्ता ही ढूंढ़ निकाला।

बचपन की यादें ताजा हो गर्इं। प्रकाश झा ने भोपाल को अपना घर क्या कह दिया, बयानों की बरसात लग गयी। अच्छा लगता है जब मेरे भोपाल को ये लोग अपना भोपाल कहते हैं। मुझे इस बात से ऐतराज नहीं है कि प्रकाश झा हों या कोई और जो भोपाल को अपना कहे। मुझे दर्द इस बात का है कि तीन-चार बरस पहले यहां फिल्म की शूटिंग करने आये तो उन्हें अपने भोपाली होने का अहसास हो गया। इसके पहले इतने बरसों तक वे कहां थे, भोपाल तो तब भी था। उसी शान और ठाठ के साथ। प्रकाश झा के आ जाने से भोपाल के तेवर और तासीर में बदलाव नहीं आया है और न किसी एक प्रकाश झा के आने से बदलेगा। प्रकाश झा के लिये आज भोपाल उनका पहला घर है, पूरा प्रदेश उनका नहीं है, यह बात भी उन्होंने साफ कर दी है। मेरे प्रदेश के भोले-भाले कलाकारों को शूटिंग के लिये बुलाना और उन्हें बैरंग लौटा देना हमारे प्रदेश की रवायत नहीं है। वो तो भला हो सह्दयी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का जिन्होंने कलाकारों का दर्द सुना और उन्हें सम्मान भोजन कराया। प्रकाश झा अपना मानते हो तो अपनों की तरह बर्ताव करना भी सीखो। सिर्फ यह कह देना ही पर्याप्त नहीं होगा कि अब भोपाल मेरा पहला घर है। भोपाल में फिल्म बनाओ, भोपालियों को रोजगार दो और खुद भी मालामाल हो जाओ, कोई ऐतराज नहीं करेगा लेकिन सिर्फ काम के लिये किसी को अपना बना लेने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। इससे उबर जाएंगे तो फिल्म से बड़ा केनवास जिंदगी का है। इसमें रंग भरने की जरूरत है। खुशी की, प्यार की और अपनेपन की।

विभाजन का दर्द और उसकी पीड़ा प्रकाश झा नहीं समझते होंगे लेकिन मैं महसूस करता हूं। कभी मेरा मध्यप्रदेश विशाल हिन्दी प्रदेश हुआ करता था। राजनीति बिसात में मात खाने के बाद मेरे प्रदेश के दो खाने हो गये। एक राज्य रह गया मध्यप्रदेश और दूसरे को नाम मिला छत्तीसगढ़। मैं छत्तीसगढ़ में पैदा हुआ हूं और लोगों की सलाह थी कि राज्य के विभाजन के बाद मुझे छत्तीसगढ़ चले जाना चाहिए। ये सलाहकार उन्हीं प्रकाश झा जैसे लोगों में से हैं जो अवसर की तलाश में रहते हैं। खैर, इन सलाहकारों को मेरा धन्यवाद लेकिन मैं भौगोलिक विभाजन को विभाजन नहीं मानता। मेरी जन्म भूमि छत्तीसगढ़ है। मैं उन्हें बारंबार प्रणाम करता हूं किन्तु विभाजन के पहले से मैं मध्यप्रदेश में हूं और कर्मभूमि मेरी मध्यप्रदेश है। मैं दोनों प्रदेश का बेटा हूं। दोनों ने मुझे नाम दिया, सम्मान दिया और समाज में स्थान। मेरे लिये छत्तीसगढ़ भी उतना ही अर्थवान है जितना कि मध्यप्रदेश। विभाजन के बाद मैं यह नहीं कहता कि मध्यप्रदेश अब मेरा पहला घर है बल्कि कहता हूं कि दोनों राज्य मेरे अपने हैं। मेरा तो मानना है कि मैं भारतीय हूं और भारत जन्मभूमि का हर स्थान मेरे लिये वही मायने रखता है जो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़। कहीं मुझ कर्म करने का अवसर मिले तो उसे अपना पहला घर कहने की भूल नहीं करता। प्रकाश झा बड़े फिल्मकार हैं। बड़ी सोच के साथ फिल्म बनाते हैं तो उन्हें कहना चाहिए कि मध्यप्रदेश उनके पसंदीदा राज्यों में एक है। पूरा हिन्दुस्तान उनका घर है। विशाल भारतभूमि पर किसी एक व्यक्ति का हक नहीं, बल्कि सभी भारतीयों का है। अलग अलग स्वार्थाें से पहले ही भारत के राज्यों में विभाजन रेखा खींच रही है और इस रेखा को बढ़ाने के बजाय समेटे जाने की जरूरत है। ये मेरा घर, ये तेरा घर कहने की मानसिकता से उबरना होगा तब ही हम विभाजन की दरार को पाट सकते हैं।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

Aaj-Kal

यह थप्पड़ लोकतंत्र पर है, पवार पर नहीं

मनोज कुमार

महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान एक नौजवान ने देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ जड़ दिया। कृषिमंत्री को लगा यह थप्पड़ दरअसल किसी मंत्री का मामला नहीं है बल्कि समूचे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर थप्पड़ पड़ने का मामला है। देश में फैल रहे अराजकता की यह गूंज है और इस गूंज के लिये कहीं न कही अण्णा हजारे जवाबदार हैं। अण्णा हजारे ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगु फूंका तो एकबारगी पूरा देश उनके साथ हो लिया था। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि समूचा देश भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुका है किन्तु चार दिन पहले अण्णा ने जब हिटलरी अंदाज में शराब पीने वालों को पेड़ से बांधकर पीटने की बात कही तो लोगों को इस तथाकथित गांधी से हिटलर की बदबू आने लगी। उनकी बातों ने देश में अराजकता का माहौल बना दिया है। और ताजा मामला इसी की बानगी है। उनके ताजा बयान को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि बस एक ही थप्पड़, उनकी सोच को सार्वजनिक करता है।

याद रखा जाना चाहिए कि जो लोग अण्णा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हैं उनमें अधिकांश युवा वर्ग हैं और किसी भी सार्वजनिक मंच पर खड़े व्यक्ति की यह जवाबदारी हो जाती है कि इस युवाशक्ति को सकरात्मक दिशा में ले जाएं। यह उस व्यक्ति की जवाबदारी है कि वह युवाशक्ति को कैसे संयमित रखे लेकिन अण्णा अपनी जवाबदारी से चूक गए हैं। यह ठीक है कि रालेगांव में अण्णा शराब का सेवन करने वालों को पेड़ से बांध कर पीटते हों या टेलीविजन के पर्दे पर केवल धार्मिक फिल्मों का प्रसारण होता हो किन्तु यह जरूरी नहीं है कि पूरे देश में यह व्यवस्था लागू हो। अण्णा एक साथ पूरे तंत्र को, पूरी व्यवस्था को बदलने की कोशिश में लग गये और वे यहीं से चूक गए। वे आहिस्ता आहिस्ता चलते तो शायद जिन लोगों ने अण्णा में गांधी का अक्स देखा था, उनके वे आदर्श बन गये होते लेकिन अब अण्णा एक आदर्शवादी गांधी बन पाएंगे, इस बात पर लम्बी बहस की शुरूआत हो चुकी है।

अण्णा की बातों ने देश की युवाशक्ति को दिग्भ्रमित कर दिया है और जिन समस्याओं का समाधान युवा स्वयं की कोशिशों से कर सकते थे, अब वे हिंसक हो गए हैं। देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ मारने वाले युवक को कानून के तहत सजा हो सकती है किन्तु यह अराजक ध्वनि पूरे देश में, गांव गांव में गूंज रही है और जिसका परिणाम पल प्रति पल हर जगह होने से इंकार करना मुश्किल है।

कानून के लिये यह अराजकता एक और बड़ी समस्या के रूप में सामने आएगा। जिस भ्रष्टाचार को लेकर देश उबल रहा है, अब उसके सामने एक नये किस्म की चुनौती आ खड़ी हुई है। जो युवा देश के कृषिमंत्री को थप्पड़ मारने की हिमाकत कर सकता है, वह कल अपने बुर्जुगों के साथ गुस्से में क्या नहीं करेगा, इसकी कल्पना करना भी बेमानी है।

दुनिया में हम लोकतंत्र के सबसे बड़े माने जाते हैं। वि·ा के कई देश हमारी नीतियों को सराह रहा है और उस पर चलने की बात कर रहा है। वै·िाकरण के इस दौर में मूल्य बदल रहे हैं। महंगाई को लेकर हमारा जो गुस्सा है वह पूरी तरह सकारण नहीं है। हमारे नेताओं ने, तंत्र इस बात को समझाने में विफल रहा कि महंगाई के कारण क्या हैं। दरअसल वोट की राजनीति में हम सस्ती लोकप्रियता के दौर में विकास को दरकिनार करते आये हैं और जो महंगाई हमें दो दशक पहले झेल लेना चाहिए थी, आज हम झेलने के लिये मजबूर हैं। सब्सिडी ने हमारी आदतें खराब कर दी हैं। हमें हर चीज सस्ते में चाहिए, रियायतें चाहिए और जब अधिकारों की बात आती है तो हम हड़ताल पर उतर आते हैं। दो दशकों में महंगाई बढ़ी है, इस बात से इंकार नहीं लेकिन इसकी तुलना में वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, मजदूरी में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या इस पर ध्यान नहीं देंगे। अभी हाल ही में लागू छठें वेतनमान ने राहत का पिटारा खोल दिया है।

कुछ लोग ऊपर कही गयी मेरी बातों से असहमत हो सकते हैं लेकिन क्या कभी उन्होंने इस बात की जांच की कि उनके घर में राशन पर कितना खर्च होता है और मोबाइल पर बात करने में कितना? शायद नहीं। लगभग पचास लोगों से बात करने पर पता चला कि उनके परिवार में पांच लोग हैं और उनके घर पर राशन प्रतिमाह अढ़ाई से तीन हजार रुपये का आता है और मोबाइल का बिल तो उसकी कीमत है लगभग आठ से दस हजार रुपये। एक परिवार में प्रति व्यक्ति औसतन दो मोबाइल सेट हैं और एक का बिल लगभग ८ सौ से एक हजार रुपये आता है। क्या आपने कभी मोबाइल शुल्क में रियायत की मांग की तो उनके पास कुतर्क था कि कंपनिया स्वयं होकर रियायत दे देती हैं। अब इन महानुभावों को कौन समझाए कि जब देश में लगातार हर चीजों की कीमतों में वृद्धि हो रही है तब मोबाइल की दरें क्यों कम हो रही हैं?

अब मेरा सवाल अण्णा और उनकी टीम से है कि क्या उन्होंने इस बात पर कभी कोई जनजागरण का प्रयास किया? अण्णा एक सवाल मेरा यह भी है कि वे अपनी टीम के सदस्यों से इस बात का शपथ पत्र लें कि उनकी टीम के साथियों ने कभी शराब नहीं पी और यदि पी है तो वे कभी नहीं पियेंगे और इसके बाद भी पी तो अण्णा उन्हें सरेराह पेड़ से बांधकर कोड़े लगाएंगे। यह बातें सहज नहीं है और आसान भी नहीं। गांधीजी ने कभी कलफ किया हुआ चमकता हुआ कुर्ता और धोती नहीं पहनी, उन्होंने अपने हर उस ऐब को समाज के सामने खुलकर बयान किया और बताया कि उन्होंने उससे क्या सीखा। दरअसल गांधी के रास्ते पर चल कर सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाना है तो पहले युवाशक्ति को संयमी बनायें, उन्हें अहिंसक बनायें।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

vivad

स्त्री के लिये कानून नहीं, मन साफ करें

-मनोज कुमार

केन्द्र सरकार के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार की खबरें अभी धुंधली भी नहीं हुई थी कि एक और महाशय ने महिलाओं के प्रति अभद्र बयान दे डाला। हालांकि दो दिन बाद उन्होंने अपने बयान के लिये सफाई दी और माफी भी मांग ली। क्या इन महाशय के माफी मांग लेेने से समूची महिला समाज आहत हुई हैं, उनके जख्म पर मरहम लग जाएगा? मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा हो पायेगा। इस पूरे मामले से एक बात यह जरूर साफ हो गई है कि स्त्री की स्वाधीनता के लिये हम चाहे जितना कानून बनाये, बंदिशें लगायें, इसके पहले हमारा मन साफ करना होगा। मन के भीतर जो रचा बसा है, वह दूर नहीं हो सका तो कानून केवल कागज में कैद हो कर रह जाएंगे। स्त्री के सम्मान के खिलाफ यह पहली बार नहीं बोला गया है। बार बार और हर बार किसी न किसी बहाने स्त्री को टारगेट पर रखा जाता है। यदि स्त्री चरित्रहीन है तो उसे ऐसा बनाने वाले तो हमारा पुरूष समाज ही है जो अपनी स्वार्थ की पूर्ति के लिये भेड़िये की तरह तरह तरह की साजिश करता रहता है।

राजनीति के मंचों पर पचास फीसदी आरक्षण देने से उनके अधिकारों की रक्षा तो हो जाएगी किन्तु जब स्त्री ही सुरक्षित नहीं रहेगी तो उनकी रक्षा कोैन करेगा। पेट के लिये अनाज की जरूरत होती है न कि अनाज के लिये पेट की जरूरत। कानून स्त्री की रक्षा करने के लिये बनता है और जब स्त्री ही नहीं बचेगी तो कानून किसके काम आएगा। उच्च पदों पर आसीन लोगों को बोलने से पहले अपने आप में मंथन करना होगा कि उनके बोलने का अभिप्राय क्या है और इसका असर पूरे समाज पर क्या होगा। चरित्र और नैतिकता की बातें करने वाले लोग जब अपनी सीमा लांघ जाते हैं तो इस तरह की समस्या उठ खड़ी होती है। यह बात भी तय है कि थोड़ा समय गुजर जाने के बाद लोग भूल जाएंगे किन्तु क्या इतिहास इस बात को विस्मृत कर पाएगा? क्या ऐसे बयान देेने वाले अपने आपको माफ कर पाएंगे? उन्हें तो न बोलने का मलाल है और न माफी मांगने पर शर्म।

इस पूरे संदर्भ में लगभग अनुचित किस्म की ही सही, शिकायत है कि मीडिया में ऐसे लोगों को स्थान नहंीं दिया जाना चाहिए। यह बात सही है कि मीडिया में ऐसे लोगों की करतूतांे को स्थान नहीं दिया गया तो लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठने वाले महानुभाव अपनी ही जननी अर्थात किसी भी स्त्री के बारे में कितने उम्दा खयाल रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे बेहूदे बयान को उसकी हैसियत के अनुरूप् स्थान दिया जाना चाहिए। बल्कि इससे एक कदम आगे यह कि आने वाले दिनों में मीडिया में ऐसे लोगों को ब्लेकलिस्ट कर दिया जाना चाहिए और उनके नाम को, काम को कहीं भी स्थान नहीं दिया जाए। इस बात से किसी को इंकार नहीं होगा कि मीडिया अगर इन्हें स्थान न दे ंतो शायद कोई इन्हें जानें तक नहीं इसलिये ऐसे लोगों के खिलाफ मीडिया का रूख कठोर होना चाहिए।

रविवार, 25 जुलाई 2010

media

पत्रकारिता से पवित्र पेशा और कोई नहीं
मनोज कुमार
इन दिनों पत्रकारिता को लेकर काफी बहस हो रही है। बहस यदि पत्रकारिता के कार्य और व्यवहार की आलोचना को लेकर होती तो ठीक है बल्कि उसकी सीमा को लेकर हो रही है। वे लोग पत्रकारिता की सीमारेखा की बातंे कर रहे हैं जिन्होंने हर हमेशा अपनी सीमाएं लांघी हैं। इन दिनों पत्रकारिता की आलोचना शब्दों से नहीं, बल्कि उन पर हमला कर हो रही है जिसकी किसी भी स्थिति में निंदा होनी चाहिए। मेरा अपना मानना है कि पत्रकारिता संसार का सबसे पवित्र पेशा है और वह हमेशा से अपनी जवाबदारी निभाता आया है। मुझे व्यक्तिगत रूप् से दुख है कि हमारे लोग ही एक आवाज में अपने बारे में बात नहीं कर पा रहे हैं। ग्वालियर से साथी पंकज की बातों से मैं सहमत हूं। पंकज के लिखे के बहाने एक टिप्पणी में मैं कुछ अनुभवों को सुनाना चाहूंगा कि जो लोग अखबारों से शीर्ष पर पहुंच गये और आज उसी के बूते शीर्ष पर खड़े हैं किन्तु लगभग नफरत की दृष्टि भी बनाये हुए हैं। करेगा। पंकज बहुत सुंदर लिखा है। बधाई।

मैं अपनी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों से इसे संसार का सबसे पवित्र पेशा मानकर चला हूं। पत्रकारिता की आलोचना आज और अभी नहीं हो रही है बल्कि यह पुरानी परम्परा है। साहित्य और आलोचना का जिस तरह का साथ है लगभग पत्रकारिता में भी वही परम्परा है किन्तु इन दिनों आलोचना के नाम पर हमले हो रहे हैं। शाब्दिक और शारीरिक। संभवतः पत्रकारिता ही एकमात्र ऐसा प्रोफेशन है जिसकी आलोचना करने की आजादी सर्वाधिक है। पत्रकारिता इन आलोचना को आत्मसात करता है। मीमांसा करता है और अपने आपको सुधरने का मौका देता है। अपनी गलती मानने में भी पत्रकारिता ने कभी गुरेज नहीं किया तो समाज के कोढ़ को सामने लाने में भी वह सबसे आगे रहा। शायद यही कारण है कि समाज हर पेशे की गलती को व्यवसायिक होने का लिबास पहना कर मुक्त कर देता है किन्तु पत्रकारिता को वह नहीं बख्शता है बल्कि वह गहरे से अपने विरोध दर्ज कराता है। समाज से यहां आशय उस आम आदमी से है जिसकी आशा और निराशा अखबारों से जुड़ी होती है। उसके लिये न्याय का मंच, बहरे कानों तक बात पहुंचाने का माध्यम अखबार ही हैं। ऐेसे में वह चाहता है कि पत्रकारिता और मजबूत हो।

रही बात फिल्म लम्हा में ऐश्वर्या के नाम का इस्तेमाल करने और अमिताभ के नााराज होने की तो यह उनका व्यवसायिक मामला है और इससे फिल्म को लोकप्रियता मिलती है और अमिताभ इतने नासमझ नहीं हैं िकवे ऐसे डायलाग पर ऐतराज करें वह भी तब जब ऐश्वर्या के बहाने मीडिया पर वार किया जा रहा है। एक तीर से दो निशाने लगा है एक तरफ ऐश्वर्या की लोकप्रियता दिखायी गयी है तो दूसरी तरफ मीडिया को ऐश्वर्या के करीब लाकर खड़ा कर दिया गया है। यह एक सुनियोजित ढंंग से मीडिया को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश है। मुझे तो इस बात की खुशी है कि अनुपम खेर जैसा सकरात्मक सोच का अभिनेता ऐसे छोटे डायलाग से अमिताभ से डर रहा है। साथी पंकज क ेलेख के प्रतिक्रियास्वरूप् किसी सज्जन ने रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दिया है। यह ठीक उदाहरण है और मेरी समझाइश है कि अनुपम खेर रामकृष्ण परमहंस के उदाहरण से कुछ सीख लें, फिर फिल्मों के जरिये आम आदमी को सिखाने और समझाने की कोशिश करें क्योंकि एक डरा हुआ व्यक्ति आम आदमी के डर को भला कैसे और किस तरह दूर करेंगे।

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जननी हमें माफ कर देना

मनोज कुमार

भारतीय संस्कृति में स्त्री की तुलना आदिकाल से देवीस्वरूपा के रूप् में की जाती रही है किन्तु सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद केन्द्र सरकार का एक नया चेहरा सामने आया है जिसमें उनका रवैया स्त्री के प्रति नकरात्मक ही नहीं, अपमानजनक है। यहां मैं उन शब्दों का उपयोग करने से परहेज करता हूं जो श्रेणी स्त्री के लिये केन्द्र सरकार ने तय की है। यह इसलिये नहीं कि इससे किसी का बचाव होता है बल्कि मैं यह मानकर चलता हूं कि बार बार इन स्तरहीन शब्दों के उपयोग से स्त्री की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाने में मैं भी कहीं न कहीं शामिल हो जाऊंगा और मैं इस पाप से स्वयं को मुक्त रखना चाहता हूं। केन्द्र सरकार के इस रवैये से केवल स्त्री जाति की ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय समाज का अपमान हुआ है।
एक स्त्री मां होती है, बहन होती है, भाभी होती है, मांसी होती है और उसके रिश्ते नाना प्रकार के होते हैं जिसमें वह गंुथकर एक परिवार को आकार देती है। स्त्री गृहणी है तो उसका दायित्व और बढ़ जाता है। उसे पूरे परिवार को सम्हाल कर रखने की जवाबदारी होती है। कहना न होगा कि हर स्त्री यह जवाबदारी दबाव में नहीं बल्कि स्वयं के मन से लेती हैं। स्त्री को परिवार की प्रथम पाठशाला कहा गया है। आप और हम जब कल बच्चे थे तो मां रूपी स्त्री ने हमारे भीतर संस्कार डाले, जीवन का पाठ पढ़ाया, नैतिक और अनैतिक की समझ पैदा की और आज उसी स्त्री को हम ऐसे शब्द दे रहे हैं। मां रूपी इसी स्त्री ने हमें धन कमाने के गुण दिये, साहस दिया और वह समझ जिसमें किसी का नुकसान न हो और वही स्त्री आज हमारे लिये दया की पात्र बन गयी है, यह बात शायद किसी के समझ में न आये।
एक स्त्री जो रिश्ते में हमारी बहन होती है और हम भाई होने के नाते उसकी अस्मत की रक्षा की जवाबदारी लेते हैं। हर रक्षाबंधन पर वह हमारी कलाई पर राखी बांध कर हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है, आज उसी स्त्री के लिये हमारे मन में यह कलुषित विचार कैसे आ सकते हैं। जिसकी जवाबदारी हमने ले रखी है, उससे हम कैसे फिर सकते हैं। मुझे लगता है िकइस बार रक्षाबंधन में हर बहन की आंखों में सवाल होगा कि क्या अब भी तुम मेरी रक्षा का वचन देते हो? हर भाई कहेगा हां लेकिन उसका मन आत्मग्लानि से भरा होगा।
एक स्त्री जिसे हम भाभी का संबोधन देते हैं, मां की अनुपस्थिति में वह मां की भूमिका में रहती है। क्या इन्हें हम ऐसा कुछ कहेंगे जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे? क्या उस स्त्री को हम ऐसा कुछ कह पाएंगे जिसे हम मांसी कहते हैं अर्थात मां जैसी को? क्या हम उन सारे रिश्तों को कभी ऐसा कहने की सोच भी सकते हैं जिनके कहने पर हम हमारी नजरों में छोटा हो जाते हैं।
आखिर में। क्या हम उस स्त्री को कुछ ऐसा अप्रतिष्ठाजनक कह पाएंगे जिसे हमारी संस्कृति, हमारे वेद अर्धाग्नि कहते हैं। अर्धाग्नि का अर्थ पुरूष का आधा हिस्सा। सात फेरों में हम समाज के सामने वचन देते हैं कि एक-दूसरे के सुख और दुख में सहभागी होंगे, क्या उन्हें हम ऐसे हिकारत भरे शब्दों से नवाज सकते हैं? नहीं, कभी नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगाकर स्त्री के आत्मसम्मान और उसकी अस्मिता को सम्मान देते हुए जो भूमिका अदा की है, उससे अदालत के प्रति समाज के मन में सम्मान का भाव बढ़ा है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी कोर्ट इसी तरह चिंता कर गलत कामों को निरूत्साहित करता रहेगा। फिलहाल, जो स्थितियां हैं, उसमें मैं और हम जननी से उनकी प्रतिष्ठा पर आयी आंच के लिये माफी मांगते हैं।

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

media

उदासीन पाठक और मीडिया की चिंता

मनोज कुमार

आगे पाठ पीछे सपाट की बात हमें स्कूली दिनों में मास्टरजी कहा करते थे और घर पर पिता लेकिन यह बात मीडिया में भी लागू होगी, यह अब देखने को मिल रहा है। अयोध्या मामले की यह घटना बीस बरस पहले इतिहास के लिये जितनी महत्वपूर्ण थी, उतनी मीडिया के लिये और आज बीस बरस बाद भी यह घटना उतना ही अर्थ रखती है। मुझे पूरी तरह जानकारी तो नहीं है कि देश के किन और अखबारों ने इस खबर को कितना महत्व दिया किन्तु भोपाल से प्रकाशित होने वाले अखबारों में संभवतः भास्कर ने ही इसे प्रमुखता दी। अयोध्या पर इस रिपोर्ट के दो पक्ष हंैं पहला यह कि बीस बरस बाद इस घाव को कुरेदने की जरूरत क्यों पड़ी और दूसरा यह कि क्या हम इतिहास से सबक लेेने के लिये इन घटनाओं को याद नहीं करना चाहेंगे? मुझे लगता है कि दूसरी बात में ज्यादा दम है। इस बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं।

बीस बरस पहले जिन दिग्गजों के कहे जाने पर पूरा देश आंदोलित हो उठा था, बीस बरस बाद वही देश शांत है। इन बीस बरसों में काफी कुछ बदल गया है। जीवनशैली बदली है, राजनीति के अर्थ बदले हैं, मीडिया का चेहरा बदला है और आम आदमी के सोच में भी बदलाव दिखता है। पाठक और दर्शक पहले की तरह अब उत्साही नहीं हैं। वे हर घटना को महज राजनीति से रंगे दिखते हैं। बीस बरस पहले मंदिर के मुद्दे पर लोगों में जो भाव था, वह बरस दर बरस ठंडा पड़ता गया। वादों और बातों ने जैसे लोगों के विश्वास को तोड़ दिया था और यही वजह है कि बीस बरस बाद जब दिग्गज वापस अयोध्या में एकत्र हुए तो मामला किसी आग के राख में तब्दील हो जाने जैसा था। भास्कर की इस रिपोर्ट में कई बातों का खुलासा किया गया है किन्तु उन तथ्यों को शामिल नहीं किया गया जिसके कारण बीस बरस बाद खामोशी बनी रही। आम आदमी के मन को नहीं टटोला गया और न ही उन मनोवैज्ञानिकों से बात की गयी कि एक मामला अब अपने समय के साथ कब तक और कैसे गर्म रहता है और यह नहीं रहता तो उसके क्या कारण हैं। जो लोग कल तक आध्यात्मिक नेता के रूप् में आम आदमी के बीच स्थापित थे, आज उनकी छवि ठेठ राजसत्ता वाले नेता की बन गये है। इन लोगों को भी सामने लाना चाहिए था, तब शायद बात बनती। लेआउट के लिहाज से पन्ना खूबसूरत है किन्तु यह जान लेना जरूरी है कि अखबार प्रोडक्ट नहीं है और केवल खूबसूरत पैंकिंग से काम नहीं चलने वाला।

एक बच्चा जब स्कूल से किसी स्पर्धा में जीत कर आता है अथवा किसी विषय में अच्छे अंक पाता है तो वह चाहता है कि उसके पालक उसकी तारीफ करें। बच्चे की तारीफ की लालसा उचित है और लगभग यही मामला हम लोगों के साथ हैं। हम तारीफ नहीं चाहते बल्कि हम समालोचना के आकांक्षी हैं। हम जो लिख रहे हैं, वह अंतिम सत्य नहीं है किन्तु संशोधन, सुधार और बेहतर करने की गुंजाइश बहुत बनी रहती है। पाठकों की प्रतिक्रिया का खत्म हो जाने का अर्थ मीडिया के प्रभाव का आहिस्ता आहिस्ता खत्म हो जाना जैसा प्रतीत होता है। जब तक प्रभाव पता नहीं चलेगा, प्रभावी कैसे होगा। वह किसी भी क्षेत्र का मामला हो। विचारधारा तो जैसे युवापीढ़ी से गायब होती जा रही है। विचारधारा का अभाव ही प्रतिक्रिया से रोकता है। पूरे पन्ने की रिपोर्ट पर चर्चा नहीं होना, विस्मय नहीं, डर पैदा करता है। ऐसा डर जो भविष्य को आतंकित करता है कि आखिर हमारे लिखने का अर्थ क्या है। यह डर विजय और उन जैसे पत्रकारों को है जो वाजिब है। विजय ने बातों ही बातों में मुझसे कहा कि आप इस पर भले ही आलोचना लिखें, इसका यह अर्थ नहीं है कि वे अपनी तारीफ चाहते हैं, शायद उनकी मंशा मुद्दे की सामयिकता को जान लेने की है। पाठकों की यह चुप्पी क्यों, इस पर भी चिंतन की जरूरत है।

प्रतिक्रिया जाहिर करने वालों में युवा वर्ग हमेशा से आगे रहा है और इस समय युवावर्ग अपने आपमें गुम हो गया है। युवाओं में प्रगतिशील, वामपंथी, समाजवादी, आदि अनादि विचारों को लेकर जो बहस होती थी, वह लगभग खत्म हो गयी है। बाजारवाद ने उन्हें भ्रमित कर दिया है। चैबीसों घंटे कानों में इयरफोन लगाये वह गाना सुनने में मस्त है। एफएम ने उसे बता दिया है कि जीना है तो गाने सुनो, बेहद कमजोर और स्तरहीन संवाद कहो। समस्याएं कभी खत्म नहीं होने वाली किन्तु तुम गाना नहीं सुनोगे तो जीवन क ेमजे से मरहूम हो जाओेगे। कानों में दिन भर बजते रोमांटिक गानों ने युवाओं को मदमस्त कर दिया है। उन्हें न तो बीते कल की खबर है और न आने वाले दिनों की। एक साजिश युवाओं के साथ की जा रही है और इस साजिश में जाने-अनजाने में सब लोग शामिल हो गये हैं। बात विजय के एक रिपोर्ट की नहीं है, बात किसी एक अखबार की नहीं है बल्कि बात समूची पत्रकारिता की हो रही है जो इस समय आत्ममुग्ध है िकवह कितना अच्छा लिख रहा है किन्तु अब समय आ गया है िकवह चिंता करे कि उसके लिखे पर कोई अपनी प्रतिक्रिया जाहिर न करे तो इसे लिखे का, छपे का क्या अर्थ होगा। चिंतन का समय है, हम सबको इस पर विचार करना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं। भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम के संपादक हैं।)

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