मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो


मीडिया की जवाबदारी इससे आगे भी हो

मनोज कुमार

फूड कानून के विरोध में मध्यप्रदेश में सभी किस्म के खाद्य सामग्री के विक्रेताओं ने तीन दिन विरोधस्वरूप अपनी दुकानें बंद रखीं। इन तीन दिनों में मामूली तनातनी के अलावा कहीं से कोई बड़े हादसे की खबर नहीं आना इस बात का संकेत था कि लोग समझ रहे थे कि इस कानून का अर्थ क्या है। किस तरह मल्टीनेशनल कम्पनियों को बढ़ावा देने और बाजार उनके अनुरूप उनके हवाले करने की साजिश की जा रही है। इस तीन दिनी हड़ताल में अनेक छोटे व्यापारियों के घर में चूल्हा भी नहीं जला लेकिन वे इसके बावजूद हड़ताल से टस से मस नहीं हुए। मीडिया ने खाद्य व्यापारियों के हड़ताल में जाने से पहले और जाने के बाद तक के तीन दिनों में पूरा कव्हरेज दिया। आम आदमी को होने वाली खान-पान की दिक्कतों से लेकर छोटे व्यवसायियों के घरों में चूल्हा नहीं जलने तक की खबर दी गई। इन सबके बावजूद मीडिया इस पूरे मामले में अपनी भूमिका का निर्वहन करने के बजाय खबरें छापने और दिखाने की खानापूर्ति करती रही।

इस मसले पर यह सवाल उठता है कि मीडिया की भूमिका ऐसे जनहित के मामलों में क्या होना चाहिए? मीडिया की जवाबदारी क्या है? क्या सिर्फ हड़ताल और बंद की खबर छापना ही मीडिया की जवाबदारी है अथवा इससे आगे बढ़कर आम आदमी को हड़ताल के विषय के बारे में सचेत करने की। हड़ताल और बंद की खबर तो एक नियमित प्रक्रिया है जिसके बारे में खबर छापना और प्रसारण करना होता है। मेरा मानना है कि पहले भी और अब भी मीडिया ने अपनी भूमिका और जवाबदारी को नहीं समझा, शायद इसलिये ही उसका पूरा फोकस केवल दैनंदिनी खबरों पर ही रह गया। अधिसंख्य आबादी को यह मालूम ही नहीं होगा कि इस नये खाद्य कानून का असर क्या होने वाला है और उन व्यापारियों को भी नहीं जिनका व्यवसाय सैकड़ा में है। सर्राफा व्यापारियों की लम्बी हड़ताल के बाद अब खाद्य व्यापारियों की हड़ताल से आम आदमी के मन में यह बात बैठती है कि अपनी मांगों को पूरी करने के लिये व्यापारी अनावश्यक आम आदमी के लिये परेशानी का सबब बने हुए हैं। अच्छा होता कि खाद्य व्यापारी हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं, कौन सा नया खाद्य कानून है और इस कानून के लागू हो जाने पर व्यापारियों के साथ साथ आम आदमी पर क्या और कितना असर होगा, के बारे में समग्र स्टोरी और आलेख दी जाती जिससे लोगों को यह पता चल जाता कि हड़ताल अकारण नहीं है।

यह पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि ऐसे सामाजिक सरोकार के मुद्दे को मीडिया बेहद सतही ढंग से प्रस्तुत करता है। जनसरोकार के मामले में जब मीडिया की भूमिका की अपेक्षा की जाती है तो मीडिया की जवाबदारी बन जाती है कि वह विषय की समग्रता को समेटते हुए पूरी जानकारी का प्रकाशन/प्रसारण करे ताकि लोगों को पता चल सके कि आने वाले समय में उन पर क्या प्रभाव पड़ना है। सरकार की जवाबदारी और जिम्मेदारी के प्रति भी मीडिया सचेत करे ताकि संशय की स्थिति न बने। खाद्य काननू को लेकर यह भ्रम की स्थिति है कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने यह कानून पास किया अथवा पूर्ववर्ती सरकारों ने। एक-दूसरे पर राजनीतिक दल आरोप लगा रहे हैं कि यह उनका पास किया कानून नहीं है। मीडिया इस बात की पड़ताल कर स्थिति को स्पष्ट करे। अभी राजनीतिक दल बचने-बचाने के फिराक में है किन्तु मीडिया जब सक्रिय हो जाएगी तो आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से उबर कर राजनीतिक दलों को जनहित में सामने आना होगा। मीडिया सिर्फ दैनंदिनी खबरें प्रकाशित/प्रसारित नहीं करे बल्कि विषय के सभी आयामों को लेकर समाज को सजग बनाये।

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...