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भरोसे का वज़न करता समाज

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मनोज कुमार इन दिनों भरोसा तराजू पर है. उसका सौदा-सुलह हो रहा है. तराजू पर रखकर उसका वजन नापा जा रहा है. भरोस कम है या ज्यादा, इस पर विमर्श चल रहा है. यह सच है कि तराजू का काम है तौलना और उसके पलड़े पर जो भी रखोगे, वह तौल कर बता देगा लेकिन तराजू के पलड़े पर रखी चीज का मोल क्या होगा, यह आपको तय करना है. अब सवाल यह है कि क्या सभी चीजों को तराजू पर तौलने के लिए रखा जा सकता है? क्या भावनाओं का कोई मोल होता है? क्या आप मन की बात को तराजू पर तौल कर बता सकते हैं? शायद नहीं. इनका ना तो कोई मोल होता है और ना ही कोई तौल. तराजू पर रखने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है. भावना, विचार और इससे आगे विश्वास. यह सभी चीजें शाश्वत है. इनका कोई मोल नहीं है. कोई तोल नहीं है. इन सबका अस्तित्व है या नहीं है. यह कम या ज्यादा भी नहीं हो सकता है. भावना किसी के प्रति आपकी अच्छी या बुरी हो सकती है लेकिन कम या ज्यादा कैसे होगी? विचार आपके सकरात्मक हो सकते हैं किन्तु कम या ज्यादा वाले विचार कैसे होंगे. ऐसा ही एक शाश्चत शब्द है भरोसा. आप किसी व्यक्ति पर आपको भरोसा होगा तो पूर्ण होगा और नहीं होगा तो शून्य होगा. क