सोमवार, 2 अगस्त 2010

RTI Aur Hum

आरटीआई का उपयोग और आपकी छवि

-मनोज कुमार

सूचना का अधिकार कानून का यदि आप उपयोग नहीं करते हैं तो समझ लीजिये कि आप इस संसार के सबसे अच्छे लोगों में हैं और इसका उपयोग करते हैं तो आप उन लोगों के बीच खलनायक के तौर पर माने जाएंगे जिनका आपके हस्तक्षेप से कुछ नुकसान होने की आशंका है। पहले तो आपको समझाया जाएगा कि आप भले आदमी हैं। आपकी ऐसी छवि नहीं है और जब आप इन बातों में नहीं आएंगे तो वे कहेंगे आखिर आप भी वैसे ही निकले। लब्बोलुआब यह है सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने वाले किसी भी उस व्यक्ति की जो आमतौर पर किसी विवादों में नहीं पड़ता है। मुझे पता नहीं कि आपने आरटीआई अर्थात सूचना के अधिकार के तहत कोई जानकारी मांगने का कभी कोई प्रयास किया या नहीं और यदि इस कानून का उपयोग आप कर रहे हैं तो आपके अनुभव की भी मुझे कोई जानकारी नहीं। इस मामले में मैं अपना अनुभव जरूर आज आपसे बांटना चाहूंगा।

आरटीआई है क्या, यह तो अब लोगों, खासतौर पर इलिट क्लास को बताने की जरूरत नहीं है। इसका उपयोग कहां और कैसे करना, यह भी उन्हें मालूम है और यह भी कि इसके उपयोग से उनके हितों पर क्या असर पड़ सकता है। कभी इस कानून का सच जानना है तो आप सीधे न सही, उस व्यक्ति के कान में फुसफुसा दीजिये कि आप फलां जानकारी के लिये सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने जा रहे हैं। यकिन मानिये, ऐसा करने से वे आपको रोकेंगे तो बिलकुल भी नहीं लेकिन आपको नेक सलाह दी जाएगी...कहां आप झंझट में पड़ रहे हैं। आपकी छवि ऐसी नहीं है। देख लेते हैं कि रास्ता कहां से निकल सकता है। मुझे एकाधि बार ऐसे अनुभव से गुजरना पड़ा है।

मैं नहीं जानता कि ऐसे सलाह देने वाले मेरे दोस्त हैं या दुश्मन लेकिन उन्होंने मेरे अधिकार का हनन जरूर किया है अथवा कर रहे हैं, यह मेरा मानना है। जब वे कहते हैं कि आपकी छवि ऐसी नहीं है तो मुझे लगता है कि सूचना के अधिकार के तहत मैं जानकारी मांगने गया तो इलिट वर्ग में कुख्यात हो जाऊंगा। जो लोग आरटीआई का उपयोग कर रहे हैं, लगभग हर आदमी को इसी नजर से देखा जाता है। सवाल यह है कि इस कानून के उपयोग से इतना डर क्यों? क्यों कानून के उपयोग से रोका जाता है? क्या इस कानून के तहत मांगी गई जानकारी से पोल खुल जाती है? इन सभी सवालों का जवाब हां में होगा क्योंकि डर इस बात का है कि आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी उन तमाम गलत फैसलों और उन निहित स्वार्थों को सामने ले आएगी जो वे छिपाना चाहते हैं। यह भी सच है कि आरटीआई ने जानकारी छिपाने वालों की नींद उड़ा दी है। शायद यही कारण है कि आरटीआई का उपयोग करने वालों को लगभग असामाजिक तत्व मान लिया गया है। मध्यप्रदेश में नहीं किन्तु किसी अन्य राज्य में इस कानून का उपयोग करने वाले किसी एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया है। मध्यप्रदेश इस मामले में अभी भीरू है लेकिन ये भीरू कब वीरता का परिचय दे बैंठेंगे, कहा नहीं जा सकता।

सूचना के अधिकार का डर दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस अधिकार का उपयोग करने पर रोक तो नहीं है किन्तु जानकारी देने का अर्थ छिपी बातों को उजागर करना है। यह उनकी स्वेच्छारिता से नहीं, बल्कि कानून के डंडे के डर से हो रहा है। शायद यही वजह है कि पहले पहल तो हरसंभव कोशिश की जाती है कि किसी भी तरह से इस कानून का उपयोग नहीं किया जाए और किया गया तो उपयोगकर्ता को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहां तक कि उसके साथ बैठने में भी परहेज किया जा रहा है जबकि कल तक उसी के साथ बैठने में यही लोग गर्व का अनुभव करते थे। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने का नागरिक हक संविधान में है और इस बारे में हीला-हवाली करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी है। व्यावहारिक रूप् में देखा जाए तो अधिकांश मामलों में टालने का रवैया अख्तियार किया जाता है। यह भी सच है कि कानून का उपयोग करने वालों को पूरी प्रक्रिया पता नहीं होती है और इसका फायदा संबंधित लोग उठाने से नहीं चूकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सूचना के अधिकार देने में लगभग सभी लोग खुद को बचाना चाह रहे हैं अथवा जानकारी देने से बचने की कोशिश में है। इसका एक पक्ष और भी है जिस पर गौर करना, सोचना और रास्ता निकालने की कोशिश करना चाहिए। नब्बे बल्कि पिचनाबे फीसदी जानकारी छिपायी जा रही है या नहीं दी जा रही है अथवा लेटलतीफ की जा रही है तो यह तंत्र की कमजोरी है किन्तु सूचना के अधिकार के तहत जानकारी चाहने वालों के समक्ष एक बड़ी बाधा उन लोगों से भी है जो निजी हित के लिये इसका उपयोग धड़ल्ले से कर रहे हैं। यह कहना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा है कि कौन सी जानकारी सर्वजनहित के लिये है और कौन सी जानकारी व्यक्तिगत हित अथवा परेशानी खड़ी करने के लिये। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यक होने के बावजूद सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मिल पाना दुष्कर कार्य हो जाता है। सूचना के अधिकार कानून से जुड़े लोगों से बात करने पर यह जानकारी मिलती है उनकी परेशानी का कारण ज्यादतर वे लोग होते हैं जो रंजिशवश जानकारी हासिल करना चाहते हैं। जानकारी उपलब्ध कराना कानूनी दायित्व है किन्तु इस सबमें समय और अर्थ दोनों का बड़ा नुकसान होता है। ये लोग इस बात को मानते हैं कि सही और जनहित से संबंधित जानकारी मांगी जानी चाहिए किन्तु सिर्फ जानकारी के लिये जानकारी मांगने से कई तरह की उलझने पैदा हो रही हैं। पहले से सूचना के तहत जानकारी मांगने वालों की लम्बी लाइन है। जो वास्तव में जनहित में अथवा न्याय पाने की गरज से जानकारी चाहते हैं, उन्हें परेशानी हो रही है। किसी भी विभाग का प्रशासकीय अमला सीमित है और एक जानकारी देने में उस प्रशासकीय अमले का सत्तर फीसद अमला जुट जाता है। मांगी गयी जानकारियों का कहां और किस तरह उपयोग किया जाएगा अथवा किया जा रहा है, इस बारेे में कुछ बातें अस्पष्ट हैं, इस बात का भी खुलासा किया जाना चाहिए।

सूचना के अधिकार के तहत जानकारी नहीं देने के प्रयास में संबंधित लोग नहीं रहते हैं तो कुछ परेशानियां अकारण इस कानून का उपयोग करने वालों से भी हो रही है। हालांकि दूसरा पक्ष शायद बड़ा नहीं है। यदि होता तो बार बार और हर बार सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने की बात से ही अड़चनें पैदा नहीं की जाती। ऊपर जिन पांच फीसदी लोगों का उल्लेख मैंने किया है, वह गैरवाजिब नहीं है किन्तु इन पांच फीसदी लोगों की आड़ लेकर पिचानबे फीसदी लोगों को जानकारी से वंचित किया जा रहा है, यह भी सच है। मुझे लगता है कि इस कानून का उपयोग करने से यदि कोई आपको खलनायक मान कर चलता है तो चले लेकिन आप अपने अधिकार का उपयोग करना नहीं भूलें। इसके लिये यह भी जरूरी है कि आप कानून का अध्ययन कर लें और उन बारीकियों को समझ लें जिससे आपको इस कानून के उपयोग में सुविधा होगी।

jago sathiyo

हम क्यों करें मुफ्त की समाजसेवा

-मनोज कुमार

लगभग एक सप्ताह पहले दिल्ली से आरंभ हो रहे किसी बेवसाइट के संचालक का फोन आया। वे चाहते थे कि मैं उनके लिये लिखूं। साथ ही उनकी मंशा थी कि मेरे ब्लॉग पर लगे आलेख का वे उपयोग करें। पहले पहल तो मुझे उनके आग्रह पर कोई आपत्ति नहीं हुई। मैंने हामी भर दी कि जो आलेख मेरे ब्लाग पर पब्लिश हो चुके हैं, उनका आप उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने ऐसा किया भी। बेवसाइट शुरू होने के पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे कितने और कैसे लेख का उपयोग करेंगे अथवा कर रहे हैं। इस बीच मैंने फोन करने वाले सज्जन को मेल से संदेश भेजा कि आप चाहें तो केवल आपके लिये आलेख लिखूंगा किन्तु इसके बदले मानदेय की व्यवस्था जरूर चाहूंगा। मेरे इस मेल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। अलबत्ता दो दिन बाद उनका संदेश मिला जिसमें बेबसाइट के आरंभ होने की सूचना थी। वेबसाइट पर जाकर सर्च किया तो पता चला कि मेरे दो आलेख का उपयोग किया गया है। एक आलेख मेरे नाम के साथ और एक आलेख बिना नाम के दिया गया है।

बेवसाइट के आरंभ होने पर बधाई का संदेश तथा एक नया आलेख बेवसाइट के लिये प्रेषित किया। अपनी शिकायत भी मैंने संदेश में भेजा। इस बार उन महाशय का जवाब आया इस सफाई के साथ कि इस वेबसाइट का संचालन कोई समाजसेवी संस्था करती है और जो लेखकों को भुगतान नहीं करती है। महोदय साथ में लिखते हैं कि वे मुझे अंधेरे में नहीं रखना चाहते हैं इसलिये जानकारी दे रहे हैं और साथ में लेख वापस भेज रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इस सब रामकहानी का मतलब क्या? आप ठीक सोच रहे हैं। दरअसल मैं अपने साथ हुए इस वाकये के माध्यम से यह बताना चाहता हूं कि बेवसाइट बनाने के लिये, संचालन के लिये तो सबके पास धन है किन्तु लेखकों को देने के लिये उनके पास कौड़ी नहीं है। यह ठीक है कि वे समाजसेवा करें किन्तु हम पत्रकार/लेखकों से मुफ्त की सेवा की उम्मीद क्यों रखते हैं। हमारा जीवन तो लेखन से ही चलता है और हम मुफ्त के चंदन घिसते रहे तो हमारी हालत समझी जा सकती है। बेवसाइट समाजसेवा के लिये है तो विज्ञापन क्यों लिया जा रहा है, उससे होने वाली कमायी आखिर किसके जेब में जा रही है। मैं अपने उन तमाम ब्लॉगर लेखक/पत्रकार साथियों से आग्रह करता हूं कि जो लोग समाजसेवा का दंभ भर रहे हैं, उनके लिये एक लाइन न लिखें। हम मीडिया के लोग हैं और मीडिया के लिये बिना शर्त लिख रहे हैं और लिखते रहेंगे। जिन्हें समाजसेवा का शौक है, वे हमसे कोई उम्मीद न करें।

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...