रविवार, 17 अक्तूबर 2010

समागम का नया अंक पेडन्यूज के खिलाफ आवाज उठाने वाले अखबारों को समर्पित

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का अक्टूबर २०१० का अंक बिहार के दो प्रमुख समाचार पत्रों प्रभात खबर एवं हिन्दुस्तान को सलाम करता है जिन्होंने बातों से आगे बढ़कर व्यवहार में पेडन्यूज नहीं छापने का ऐलान किया है।

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पत्रकारिता में हर कोई वरिष्ठ?

-मनोज कुमार

इन दिनों पत्रकारिता में वरिष्ठ शब्द का चलन तेजी से हो रहा है। सामान्य तौर पर इसके उपयोग से कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए किन्तु हम शब्दों के सौदागर हैं तो शब्दों के उपयोग और प्रयोग से सावधान रहना चाहिए। अमूनन दो पांच वर्ष काम कर चुके पत्रकार अपने नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार का उपयोग करना नहीं भूलते हैं। वरिष्ठ शब्द के उपयोग के पीछे शायद मंशा अधिक सम्मान और स्वयं को वि·ासनीय बनाने की हो सकती है किन्तु मेरी समझ में पत्रकारिता एकमात्र ऐसा पेशा है जहां वरिष्ठ और कनिष्ठ शब्दों का बहुत कोई अर्थ नहीं है। हमारे पेशे में महत्व है तो आपके लेखन का। रिर्पाेटिंग करते हैं तो आपकी रिपोर्ट आपकी वरिष्ठता और कनिष्ठता का पैमाना बनती है और आप सम्पादक हैं तो समूचा प्रकाशन आपका आईना होता है। कदाचित लेखक हैं तो विषयों की गंभीरता आपके वरिष्ठता का परिचायक होती है। इधर अपनी लेखनी, रिपोÍटग और सम्पादकीय कौशल से परे केवल पत्रकारिता में गुजारे गये वर्षाें के आधार पर स्वयंभू वरिष्ठ बताने की ताक में लगे हुए हैं।

वरिष्ठ क्या होता है, इसकी मीमांसा भी कर लेते हैं। मेरी राय में वरिष्ठ से आशय उस शब्द से है जो किसी भी क्षेत्र में एक समय तक काम कर लेने एवं ख्याति प्राप्त कर लेने के बाद प्राप्त होता है। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, आलोक मेहता आदि इत्यादि ऐसे नाम हैं जो स्थापित हैं और जिन्हें आप स्वयं आगे आकर वरिष्ठ कहला कर स्वयं को गौरवांवित महसूस करते हैं किन्तु उन हजारों पत्रकारों को जिन्हें दो, पांच अथवा दस साल काम करते हुए हैं और वे अपने आपको वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूं। वरिष्ठता वास्तव में काम किये गये वर्षाें से नहीं होती है बल्कि काम में प्राप्त ख्याति से होती है।

मेरी बातों से असहमत साथी कह सकते हैं कि किसी समाचारपत्र अथवा पत्रिका में सम्पादक पद सुशोभित करने वालों को वरिष्ठ पत्रकार नहीं माना जाना चाहिए? मैं यहां भी ना में कहूंगा। सवाल यह है कि अपने सम्पादक रहने की अवधि में उन्होंने ऐसा क्या किया कि समाचार पत्र को अलग से ख्याति मिली। यदि ऐसा है तो उन्हें स्वयं ही वरिष्ठता का दर्जा मिल जाएगा किन्तु ऐसा नहीं है तब उन्हें इस तखल्लुस का स्वयं होकर उपयोग करना होगा। यह सर्वविदित है कि किस तरह आज के दौर में जोड़-तोड़ कर सम्पादक बना जाता है। कहीं राजनीतिक सिफारिश के बूते पर तो कहीं किसी और माध्यम से। किसी सम्पादक की सफलता उसके नाम से अखबार की पहचान हो, ऐसा होना चाहिए न कि अखबार के नाम से सम्पादक की पहचान हो। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें अखबार बाद में, सम्पादक पहले होते थे।

इन दिनों एक गलत परम्परा शासकीय विभाग भी डाल रहे हैं। वे जाने-अनजाने में ऐसे अनेक पत्रकारों के नाम के साथ वरिष्ठ पत्रकार जोड़ देते हैं जो किसी भी कीमत पर इसके हकदार नहीं हैं। उनके पीछे उनका मकसद उनके अखबारों में अपनी खबरों के लिये पर्याप्त जगह पाना होता है। शायद शासकीय विभाग अपने मकसद में कामयाब हो भी जाते होंगे किन्तु पत्रकार साथी एक बार वरिष्ठता पदनाम में कैद हो जाता है तो वह फिर कभी नहीं उबर पाता है। इन दिनों विभिन्न वेबसाइट एवं ब्लॉग में लिखने वाले पत्रकारों को भी वरिष्ठ पत्रकार लिखा जा रहा है, जो एक हद तक तो ठीक है किन्तु इसके बाद शायद नहीं। पत्रकारों के काम का लेखा-जोखा करने के बाद ही वरिष्ठ लिखा जाना बेहतर होगा। वरिष्ठ शब्द का मायने मेरे लिये अपने काम के प्रति अधिक जिम्मेदार होना है। जिम्मेदारी ही वरिष्ठता का दूसरा रूप है। वरिष्ठता शब्द का उपयोग सोच-समझ कर किया जाना ही वरिष्ठता शब्द का सम्मान किया जाना होगा।

खादी और गांधी पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं-रघु ठाकुर

भोपाल। ‘खादी केवल वस्त्र नहीं बल्कि वह अनेक आयामों से जुड़ा हुआ है. जैसे जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे वैसे खादी और गांधी अधिक प्रासंगिक...