बचपन बचाने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी को नोबल


-मनोज कुमार
  बचपन बचाने की जिम्मेदारी उठाने का साहस दिखाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान किया जा चुका है। कैलाश सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ किया तो उनके मन में एक टीस थी कि कैसे बचपन को बचाया जाये? कैसे बच्चों की मोहक मुस्कान उन्हें लौटायी जाये। काम कठिन है लेकिन सत्यार्थी जैसे लोगों के लिये असंभव भी नहीं और यही कारण है कि साढ़े तीन दशक से अधिक समय से वे बचपन बचाओ अभियान में जुटे हुये हैं। सत्यार्थी की चिंता केवल भारत के बचपन की नहीं है बल्कि उनकी चिंता इस दुनिया के तमाम बच्चों की है और यही कारण है कि सत्यार्थी के बताये और बनाये रास्ते पर पूरी दुनिया के लोग चल पड़े हैं। सत्यार्थी चले तो अकेेले थे लेकिन आज उनके साथ इतने लोग हैं कि गिनती कम पड़ जाये। सत्यार्थी को नोबल दिये जाने का ऐलान शायद इसलिये नहीं हुआ क्योंकि वे एक ऐसे मिशन पर हैं जो समाज को बचाने के लिये जरूरी है बल्कि लगता है कि यह नोबल उनके साहस के लिये दिया जा रहा है। 
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से चलकर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंचने वाली रेललाईन के बीच स्थित है विदिशा रेल्वे स्टेशन। विदिशा समा्रट अशोक की ससुराल है और वे पूरी दुनिया में शांति के दूत के रूप में पहिचाने गये। इसी विदिशा शहर से इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल करने वाले कुशाग्र एवं अपने मिशन के प्रति अडिग बने रहने वाले कैलाश नारायण शर्मा चाहते तो अपने साथ डिग्री लिये राजधानी दिल्ली की ट्रेन पकड़ लेते और किसी भी बड़ी कम्पनी में, बड़े ओहदे पर, मोटी तनख्वाह में मजे से जिंदगी बसर कर सकते थे लेकिन शिक्षा प्राप्त कर ऐसा करने की उनकी ख्वाहिश कभी नहीं रही। वे समाज में बेहतरी के लिये शिक्षा हासिल कर रहे थे और वे कुछ ऐसा करना चाहते थे कि समाज का विकृत चेहरा ठीक हो सके। अपने स्कूली समय से उनके मन में भीख मांगते बच्चों को लेकर टीस उठती थी। वे बच्चों का ऐसा जीवन देखकर विचलित हो उठते थे। उन्हें बार बार यह लगता था कि एक तरफ तो हम यह कहते अघाते नहीं कि बच्चे देश का भविष्य है और देश के भविष्य बच्चों के हाथों में कटोरा हो, यह उन्हें मंजूर नहीं था। वे बच्चों को सम्मान का जीवन देने का इरादा रखते थे। अपने अभियान का श्रीगणेश उन्होंने अपने शहर विदिशा से आरंभ कर दिया था। 
        कैलाश नारायण शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बने सत्यार्थी एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुये थे। चार भाईयों में सबसे छोटे और सबसे ज्यादा संवेदनशील सत्यार्थी एक आदमी की तरह जीने के बजाय वे कुछ करगुजरने के लिये प्रतिबद्व थे। गांधीजी उनकी प्रेरणा थे। वे गांधी के रास्ते पर चलकर अहिंसा के मार्ग से समस्या का हल ढूंढऩे का प्रयास करते थे। बचपन बचाओ आंदोलन आरंभ करने के पहले उन्होंने विदिशा में गांधीजी की प्रतिमा के समक्ष अछूतों से भोजन बनवाया और अपने होने का अहसास दिलाया। सत्यार्थी का बचपन बचाओ आंदोलन देश-दुनिया में नाम और धन कमाने के लिये नहीं था बल्कि यह कांटों भरा रास्ता था जिस पर चलना एक चुनौती थी। अनेक बार उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन सत्यार्थी सत्य के बूते पर हमेशा जीत हासिल करते रहे। इस दुर्गम राह पर चलने का साहस उन्हें गांधीजी से मिली। बिना डिगे, बिना हिले वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। 
अपने स्वयं के स्कूली दिनों में सत्यार्थी जब भीख मांगते बच्चों को अपने हिस्से का खाना खिला देते या उन्हें किताब-कॉपियां और दूसरी जरूरतें पूरी करते तो परिजनों से उन्हें शाबासी की जगह पर सजा मिलती। एक बार तो उन्हें काफी समय तक धूप में खड़े रहना पड़ा। यह और बात है कि बाद के दिनों में परिजनों ने भी सत्यार्थी के प्रयासों में साथ दिया। हालांकि यह सजा, सत्यार्थी के इरादों को और पक्का बनाती।  लगभग 35 वर्ष पूर्व सत्यार्थी ने बचपन बचाओ आंदोलन नामक संस्था का गठन कानूनी तौर पर किया। भारत वर्ष में बच्चों के शोषण के खिलाफ यह पहला सिविल सोसायटी अभियान था। उन्होंने बच्चों को बचाने की गुजारिश के साथ पक्के कानून की मांग करते हुये 1993 में बिहार से दिल्ली, अगले वर्ष 1994 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक की यात्रा करने के बाद 95 में कोलकाता से काठमांडू तक की यात्रा पूरी की। 2001 में सत्यार्थी ने कन्याकुमारी से कश्मीर होते हुये 20 राज्यों से गुजरते हुये 15 हजार किलोमीटर की जनयात्रा की। इसी कड़ी में 2007 में बाल व्यापार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा एक प्रमुख पड़ाव है। 
        बचपन बचाने और बच्चों को सम्मानजनक जिंदगी के लिये सत्यार्थी शिक्षा को ही एकमात्र रास्ता मानते हैं। उन्हीं के प्रयासों का सुफल बच्चों को यह मिला कि संविधान में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की पहल हुई। सत्यार्थी अपने अनुभवों से बताते हैं कि वर्तमान में अकेले भारत में 5 करोड़ बाल मजदूर हैं जिनसे 1.2 लाख करोड़ कालाधन उद्योगपति एवं दीगर लोग कमा रहे हैं। सत्यार्थी बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से न केवल बचपन बचाने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि उनके एजेंडे में बच्चों की सुरक्षा एवं पुर्नवास भी शामिल है। इन्हीं उद्देश्यों को पूरा करनेे लिये बाल मित्र ग्राम योजना भी संचालित की जा रही है। देश के 11 राज्यों के अब तक 356 गांव बाल मित्र ग्राम बन चुके हैं। बाल मित्र ग्राम उन गांवों को कहा जाता है जहां सौफीसदी बालश्रम समाप्त हो चुका हो। ऐसे गांवों में बच्चे स्कूल जा रहे हैं तथा समय समय पर पंचायत में अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त कर चुके हैं। सत्यार्थी के प्रयासों से अब तक भारत में ही 80 हजार से अधिक बच्चों को बालश्रम से मुक्ति दिलायी जा चुकी है। 
         सत्यार्थी ने अपने इस तीन दशकों के सफर में अनेक खट्टे-मीठे अनुभव हासिल किये हंै। वे इस बात से हमेशा खुश रहते हैं कि उनके इस आंदोलन को उनके अपने परिवार का सहयोग प्राप्त है। उनकी जीवनसंगिनी सुमैधा कैलाश के लिये सत्यार्थी को नोबल मिलना कोई बड़ी बात नहीं है। वे सत्यार्थी की इस बात से सहमति जताती हैं कि यह सम्मान गांधीजी को मिलता तो ज्यादा प्रसन्नता होती। नोबल ऐलान के बाद सत्यार्थी ने कहा था कि वे गांधीजी के देहावसान के बाद पैदा हुये थे और यह सम्मान के सच्चे हकदार गांधीजी थे और यह सम्मान उन्हें मिलता तो प्रसन्नता और अधिक होती। 
            श्रीमती सुमैधा कैलाश बताती हैं कि जब हमने पहली दफा एक बच्चे को बचा कर घर लाये तो उसने घर में सोने से मना कर दिया क्योंकि तब हम दोनों अखबार बिछाकर सोते थे। वे कहती हैं कि सत्यार्थी को अपने काम के दरम्यान ऐसे अनेक कड़ुवे अनुभवों से गुजरना पड़ा है लेकिन वे हिम्मती हैं। वे सकरात्मक सोच रखते हैं और अपने अभियान को सफल होते देखना चाहते हैं। वे यह भी कहती हैं कि ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनकी जिंदगी संवर गयी है और वे बेहतर जिंदगी जी रहे हैं। विदिशा के किराने की दुकान चलाने वाले बंशीलाल साहू को लगभग 35 सालों से सत्यार्थी तीन सौ रुपये देते आ रहे हैं। सत्यार्थी जब भी विदिशा आते हैं, वे साहू को तीन सौ रुपये देना नहीं भूलते। रुपये देने के साथ साहू को ताकीद यह होती है कि गरीब बच्चे को पैसा नहीं होने पर इन्हीं पैसों से चॉकलेट दे देना। सत्यार्थी सत्य के साथ सादगी से जीने की प्रेरणा गांधीजी से पाते हैं और यही कारण है कि सत्यार्थी के लिये नोबल का मिलना, उनके कार्य को और भी जिम्मेदार बनाता है। 
हम हैं हिन्दुस्तानी..
यह हम हिन्दुस्तानियों की फितरत है कि जहां भी जाते हैं अपना झंडा गाड़ देते हैं। गांधीजी के सम्मान में फिरंगियों ने कई बार अपने कानून बदले हंै, इतिहास इस बात का गवाह है तो इस समय में भी फिरंगी भारतीयों को सम्मान देने में कभी पीछे नहीं रहे। इस सिलसिले में सन् 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस वाकये का जिक्र करना जरूरी है जब कैलाश सत्यार्थी को अलग से मान दिया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा का यह मुख्य अधिवेशन बाल अधिकारों पर केन्द्रित था। नियमानुसार इस अधिवेशन को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही संबोधित करते हैं लेकिन परम्परा को तोड़ते हुये कैलाश सत्यार्थी को बोलने का अवसर दिया गया। सत्यार्थी को इन वर्षों में ब्रिटेन, जर्मनी, इटली आदि-इत्यादि देशों की संसदों की विशेष बैठकों को संबोधित करने का सम्मान मिल चुका है। 
कैलाश सत्यार्थी को मिले अब तक के सम्मान :
1. 1984 में जर्मनी का द आचेनेर इंटरनेशनल पीस अवार्ड।
2. 1985 में अमेरिका का द ट्रमपेटेर अवार्ड।
3. 1985 में अमेरिका का रॉबर्ट एफ कैनेडी ह्यूमन राईट अवार्ड।
4. 1999 में जर्मनी का फ्राइड्रीव इबर्ट स्टीफटंग अवार्ड।
5. 2002 में वैलेनबर्ग मेडल, यूर्निवसिटी ऑफ मिशिगन।
6. 2006 में अमेरिका का फ्रीडम अवार्ड।
7. 2007 में मेडल ऑफ द इटालियन सेनाटे।
8. 2008 में स्पेन का अलफांसो कोमिन इंटरनेशनल अवार्ड।
9. 2009 में अमेरिका का डेफेंडर ऑफ डेमोक्रेसी अवार्ड।
कुछ बातें मलाला के बारे में भी :
17 साल की मलाला नोबल पुरस्कार पाने वाली दुनिया की सबसे कम उम्र की हैं। पाकिस्तान की स्वात घाटी में 12 जुलाई 1997 को जन्मी मलाला बच्चियों की शिक्षा के लिये साहस दिखाने के लिये चर्चा में आयीं। 2007 में तालिबानियों ने स्वात पर कब्जा कर लिया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी तो मलाला न केवल स्वयं छिपकर स्कूल जा रही थीं बल्कि अन्य बच्चियों को भी प्रेरणा दे रही थीं। यही नहीं, उन्होंने दो साल बाद 2009 में बीबीसी के लिये ब्लॉग लिखना भी शुरू कर दिया था। इससे गुस्साये तालिबानियों ने मलाला और उसके पिता को मारने की धमकी दी थी। हौसलामंद मलाला पर तालिबानियों की धमकी बेअसर रही। गुस्साये तालिबानियों ने 9 अक्टूबर 2012 के दिन स्कूल से लौटती मलाला के सिर पर गोली मार दी। साहसी मलाला मौत से लडक़र वापस आ गयी। लंदन में इलाज चला और दुरूस्त होकर वापस पढ़ाई में जुट गयी। मलाला को उनके साहस के लिये 2014 का नोबल दिये जाने का ऐलान हुआ है और इसी के साथ वे दुनियां की सबसे कम उम्र की नोबल विजेता बन गयी हैं। 

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