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एक कोशिश का नाम है ‘समागम’

22 वर्ष पहले ‘समागम’ का प्रकाशन आरंभ किया था. तब मन में कुछ अलग करने का विचार था. पत्रिकाओं की भीड़ तब भी थी और अब भी है. ऐसे में कुछ नया क्या हो, यह दिमाग को मथ रहा था. ऐसे में खयाल आया कि क्यों ना मीडिया रिसर्च को लेकर कोई कार्य आरंभ किया जाए. अकादमिक गतिविधियों से जुडऩे के बाद मेरे विचार को विस्तार मिला. आज 22 वर्ष बाद ‘समागम’ का जो स्वरूप आप देख रहे हैं, वह अपने शुरूआती दिनों में नहीं था लेकिन कोशिश को लोगों ने हौसला दिया. एक चुनौती यह भी थी कि प्रत्येक माह नवीन सामग्री कैसे जुटायी जाएगी? लेकिन यकिन नहीं होता है कि लोगों का स्नेह और सहयोग ने इस संकट को भी दूर कर दिया. आज मोटेतौर पर देखें तो देशभर के सुप्रतिष्ठित प्राध्यापकों, मीडिया विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों की लगभग हजार लोगों का साथ है. 

‘समागम’ से रिसर्च जर्नल ‘समागम’ का सफर भी रोचक रहा है. विभिन्न विश्वविद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों से चर्चा करते हुए मेरी समझ कुछ विकसित हुई. एक ठेठ जर्नलिस्ट का संपादक बन जाना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन एक जर्नलिस्ट का रिसर्च की पत्रिका का एडीटर होना जाना चुनौतीपूर्ण था. आइएसएसएन क्या होता है? प्रीयररिव्यूड जर्नल क्या होता है? जैसे सवालों का जवाब पाकर एक गुणवत्तापूर्ण प्रकाशन की विनम्र कोशिश की है. यह मेरे लिए संतोष की बात है कि देशभर के सुविख्यात शिक्षक एवं पत्रकार मेरे अनुरोध पर तत्काल लिखकर भेजते हैं. आज जब 23वें वर्ष में प्रवेश कर रहा हूं तब पांच लोगों का स्मरण सहज हो आता है. मेेरे मार्गदर्शक बालकवि बैरागी को ‘समागम’ के प्रकाशन के एक दशक बाद डरते हुए अंक भेजा. अचानक उनका फोन आता है ‘बैरागी बोल रहा हूं. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि इतने वर्षों तक मुझे एक समृद्ध पत्रिका से वंचित रखा. अच्छा काम कर रहे हो. रूकना नहीं.’ उसके बाद गलती पर कभी डांट तो बाद में पुचकराते हुए उत्साहवर्धन करते हुए नियमित फोन और खत आना. औरंगाबाद महाराष्ट्र में मीडिया एजुकेशन के गुरु डॉ. सुधीर गव्हाणे सर का इसी तरह मार्गदर्शन मिलता रहा. प्रेमचंद पर शोध को लेकर स्थापित नाम डॉ. गोयनका जी का गलतियों पर ध्यान आकृष्ट करने के लिए फोन करना और सराहना कि अच्छा काम कर रहे हो. डॉ. सोनाली नरगुंदे लिखने का ‘समागम’ को लेकर अनुराग बना रहा. ‘समागम’ को विस्तार देने के लिए वे सतत रूप से प्रयास कर रही हैं. खामोशी के साथ मेरा हौसला बढ़ाने वाले मेरे अग्रज आदरणीय गिरिजा भइया की भूमिका मैं ही समझ सकता हूं.  एकाध ही बार कहा होगा कि दिल्ली में तुम्हारी मैगजीन की तारीफ कर रहे थे. यह मेरे लिये सम्मान से कम नहीं था. मेरे एक और अग्रज श्री जगदीश उपासने इंडिया टुडे के एडीटर रहते हुए ‘समागम’ के बारे में स्वयं लिखकर लोगों तक पहुंचाया. समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में ‘समागम’ के कंटेंट को लेकर चर्चा होती रही है. 

देश की अन्य लघु पत्रिकाओं की तरह ‘समागम’ भी आर्थिक झंझावत से गुजर रहा है. लेकिन एक संकल्प और जिद के कारण इसका प्रकाशन अब तक निर्बाध है और शायद आगे भी बना रहे. कोविड काल में भी ‘समागम’ का निरंतर प्रकाशन इस बात की आश्वस्ति है. सबसे सुखद बात यह है कि मेरे साथ अनेक नाम हैं जिनका उल्लेख करना संभव नहीं होगा लेकिन वे परछायी की तरह ‘समागम’ के साथ खड़े हैं. आगे भी यह सिलसिला बना रहे और आपका सहयोग, शुभेच्छा और स्नेह बना रहे.

मनोज कुमार    संपादक


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