हिन्दी को लेकर हमारी चिंता लगातार दिख रही है लेकिन ज्यादतर चिंता मंच से है. व्यवहार में हम हिन्दी को पीछे रखते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो पाठशाला से लेकर विश्वविद्यालय तक की परीक्षाओं में हिन्दी के विकल्प के तौर पर अंग्रेजी के प्रश्रों को मान्यता नहीं दी जाती. इसके उलट हिन्दी की स्वीकार्यता वैश्विक मंच पर हो चुकी है, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. कल तक श्यामपट्ट पर लिखी जाने वाली हिन्दी अब हमारी हथेलियों पर है और मोबाइल से लेकर कम्प्यूटर तक का की-बोर्ड हिन्दी से संचालित है. हिन्दी के इस नये वैश्विक स्वरूप की चर्चा करता शोध पत्रिका ‘समागम’ का नया अंक.
सोमवार, 20 सितंबर 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
जिम्मेदार नागरिक बनने का वक्त
प्रो. मनोज कुमार किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है. और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है. हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी क...
-
-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
-
समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
-
मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें