Bharat Bhavan

झाडू, सूपा, चलनी, कुटेला और भारत भवन
-मनोज कुमार
       झाडू, सूपा, चलनी अब हमारे घरों से बाहर हो रहा है। झाडू की जगह मोप और सूपा और चलनी की जगह मिक्सर ग्राइंडर जैसी आधुनिक मशीनें आ गयी है। कुटेला भी अब विदाई के कगार पर है। कपड़े अब कुटेला की कुटाई से बच जाएंग क्योंकि वाशिंग मशीन के भीतर वह बेहद आहिस्ता आहिस्ता घूम घूम कर सफाई करा सकेगा। आपको भी लग रहा होगा कि लिखने वाला पगला गया है। कहां से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बातें करने लगा है। भला यह भी कोई चीज है जिस पर चर्चा की जाए?
       आपकी तरह मुझे भी तकरीबन बीस बरस पहले ऐसा ही लगा था। तब जब मैं पहली दफा भारत भवन गया था। भारत भवन में एक हिस्सा इन चीजों के लिये सुरक्षित रख दिया गया है। पहली पहली दफा जब मैंने इन सामानों को देखा तो मुझे हंसी आ गयी। समझ में नहीं आया कि हमारे जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों की इन चीजों को भला यहां क्यों सजा कर रखा गया है। मैं अपनी जगह गलत नहीं था क्योंकि मैं महानगर का रहने वाला नहीं था और न ही उस रईस परिवार से मेरा कोई वास्ता था जिनकी दुनिया हर घंटे में बदल जाया करती है। मैं तो कस्बानुमा शहर रायपुर से भोपाल अपने अखबारी नौकरी के सिलसिले में भोपाल आ गया था। तब मध्यप्रदेश विभाजित नहीं था।
       मैं एक पत्रकार और लेखक होने के नाते बार बार और कई बार भारत भवन का चक्कर लगाया। मेरी जिज्ञासा थी कि रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों को इतना सहेज कर क्यों रखा गया है। किसी से पूछने का साहस भी नहीं हुआ। मेरे अपने सवाल और सवाल का जवाब ढूंढ़ने की स्वयं की चुनौती। कई बार जाने के बाद आखिरकार मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल ही गया। मैं आज से आगे चलकर देखने लगा। उस बदलती दुनिया की कल्पना करने लगा जब आहिस्ता आहिस्ता ये सारी चीजें खत्म हो जाएंगी तब बच्चों को बताने और समझाने के लिये भारत भवन का यह हिस्सा काम आएगा।
       समय ने करवट ली। इन बीस बरसों में दुनिया ही बदल गयी। उच्च मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों से झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला बाहर हो गया। उनकी जगहों पर आधुनिक मशीनों ने अपना स्थान बना लिया। जमाना बदल रहा है किन्तु आम मीडिल क्लास फेमिली आज भी झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला पर आश्रित है। वह दिन दूर नहीं जब इनके घरों से भी इन सामानों की विदाई हो ही जाएगी।
       झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की बात करते समय मुझे अपने एक भाई शेषप्रकाशजी की तीस बरस और शायद कुछ ज्यादा पुरानी बात याद आ जाती है। वे बता रहे थे कि उनकी नातिन मुंबई से रायपुर आयी थी। भाईसाहब के घर गाय पलती थी। मुंबई में जन्मी इस नन्हीं बच्ची ने न कभी गाय देखा था और न गाय का तबेला। उसके लिये यह एकदम नयी चीज थी।  उसने अपने नाना से बेसाख्ता सवाल कर डाला- वोह दिस इस काउ। हम सब उसकी अज्ञानता पर मुस्करा पड़े लेकिन आज मुंबई तो छोड़िये, भोपाल के बच्चों के लिये भी यह सब हैरत में डालने वाली चीजें हैं। यूज एंड थ्रो और पाउच संस्कृति में गाय, गांव और किसान बीती बातें बन कर रह जाएंगे।
       बहरहाल, वापस भारत भवन प्रसंग पर। अचानक आज हाथ में फैशन की एक महंगी पत्रिका आ गई। महंगे खूबसूरत कागज और वैसी ही छपाई। पत्रिका मुझ जैसे मध्यमवर्गीय पत्रकार-लेखक के लिये तो हो नहीं सकती। खैर, इस पत्रिका में वह सब उत्पाद शामिल थे जो धनाड्य परिवार उपयोग में लाते हैं किन्तु इसके
दो या शायद तीन पन्ने पर छपी एक फीचर स्टोरी मेरा ध्यान आकर्षित कर गयी। इस लेख में झाडू को लगभग दुर्लभ बताते हुए एक संग्रहालय का उल्लेख किया गया था। रूचिकर विषय था सो पढ़ लिया लेकिन इसके साथ ही मैं तकरीबन बीस बरस पहले की दुनिया में जा पहुंचा। बीस बरस पहले जो विषय मेरी जिज्ञासा का सबब था, आज वही विषय मेरे आसपास है। बदलती दुनिया के साथ झाडू, सूपा, चलनी और कुटेला की यादें लिये उस किसान की तरह वापस लौटने की कोशिश कर रहा हूं जब भारत को सोने की चिड़िया और किसानों को अन्नदाता कहा जाता था।

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