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नशे के खिलाफ आम आदमी के साथ सरकार

अनामिका

छत्तीसगढ़ में नशे के खिलाफ स्त्रियों ने हमेशा से आगे आकर मोर्चा खोला है। नब्बे के दशक में शराब के खिलाफ जो अभियान छेड़ा गया था, उसकी गूंज आज भी सुनायी दे रही है। छत्तीसगढ़ संभवत: देश का पहला राज्य है जहां शराबबंदी के लिये किये गये आंदोलन पर किसी वि·ाविद्यालय में पीएचडी की गई हो। वैसे भी नशा किसी भी किस्म का हो, वह स्वास्थ्य के साथ समाज के विकास में बाधक होता है। नशा एक सामाजिक बुराई है। नशे के खिलाफ हम महापुरूषों की जयंती अथवा पुण्यतिथि पर बात कर लेते हैं और इसके बाद भूल जाते हैं। नशे के खिलाफ एक सुनियोजित लड़ाई लड़ना वर्तमान समय की जरूरत है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो इसकी जरूरत कहीं अधिक है। एक दशक पहले बने इस राज्य में विकास की अपार संभावनाएं हैं किन्तु नशे में गुम युवा शक्ति इन संभावनाओं को धूमिल कर सकती है। नशे में युवा स्वयं को गुमराह तो करते ही हैं, उनका उपयोग समाज के विकास में हो सकता है, वह भी रूक जाता है। राज्य सरकार ने इस बात को शिद्दत से महसूस किया और समय रहते इलाज करने की भी ठानी। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने नशे के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। राज्य सरकार की इस पहल को एक जवाबदेह लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी की दृष्टि से देखना उचित होगा।

छत्तीसगढ़ आदिवासी बहुल राज्य है और यहां शराब का सेवन परम्परागत रूप से किया जाता है। समय के साथ आदिवासियों में जागरूकता आयी है और लगभग दो दशक से राज्य के अलग अलग हिस्सों में शराब के खिलाफ महिलाओं ने मोर्चा खोला है। जिन इलाकों में शराबबंदी की मांग की गयी वे धुर आदिवासी बसाहट वाले क्षेत्र रहे हैं। अनेक स्थानों पर तो एक दशक से पूरी तरह शराबबंदी लागू है। आदिवासी महिलाओं के साहस और आत्मवि·ाास ने छत्तीसगढ़ में शराबबंदी के लिये नजीर पेश किया है। रायपुर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर बसे गांव भानसोज में तो लगातार ३०४ दिनों के आंदोलन के बाद सरकार को शराब की दुकान का लायसेंस निरस्त करना पड़ा। संभवत: देश का यह पहला गांव होगा जहां शराबबंदी आंदोलन पर पंडित रविशंकर शुक्ल वि·ाविद्यालय रायपुर के विद्यार्थियों ने पीएचडी की है।

छत्तीसगढ़ में नब्बे के दशक में आरंभ हुआ शराबबंदी आंदोलन को सरकार का समर्थन आज दो हजार ग्यारह में मिल रहा है। यही नहीं, सरकार स्वयं आगे बढ़कर शराब दुकानों को लायसेंस देने से मना कर रही है। सरकारी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी में बताया गया है कि राज्य के दो हजार की आबादी वाले गांव में देसी-विदेशी शराब दुकानों के लिये लायसेंस नहीं दिये जा रहे हैं। अब तक ढाई सौ से ऊपर शराब दुकानों का लायसेंस निरस्त किया जा चुका है। राज्य सरकार ने हालांकि यह कदम प्रयोग के तौर पर उठाया है और यह सफल रहा तो आगे भी इसे विस्तार दिया जाएगा। राज्य सरकार ने अपने फैसले के बरक्स आबकारी नीति में भी परिवर्तन कर दिया है।

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार का फैसला अन्य राज्यों के लिये मिसाल बन सकता है। अब तक धारणा बनी रही है कि आबकारी से सरकार को बेहतर राजस्व की प्राप्ति होती है और वह किसी भी दशा में आय के इस भारी भरकम स्रोत में कटौती का साहस नहीं करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने इस धारणा को बदल दिया है और यह साबित कर दिया है कि सरकार में इच्छाशक्ति हो तो सबकुछ संभव है। मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह इसे जनचेतना की दिशा में उठाया गया कदम मानते हैं और कहते हैं कि इसे और भी सख्त बनाने के लिये महिलाओं को संगठित कर भारत माता वाहनियों का गठन किया जा रहा है। मुख्यमंत्री का यह भी मानना है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस व्यसन मुक्त भारत का सपना देखा था, उस सपने को सच करने की यह हमारी पहल है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने शराबबंदी के लिये जो कदम उठाये हैं, वह स्वागत योग्य तो है ही किन्तु कुछ पुरातन परम्परा पर भी नियंत्रण पाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में गुडाखू का प्रचलन लम्बे समय से किया जाता है। मोलाइसस से बने गुड़ाखू में वह सभी चीजें मिलायी जाती हैं जिससे स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है। गुड़ाखू की खपत राज्य में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में होता है। गुड़ाखू का उपयोग वयस्क से लेकर कच्ची उम्र के बच्चे तक करते हैं। पहले पहल इसे शौक के तौर पर उपयोग किया जाता है किन्तु बाद में यह आदत में परिवर्तित हो जाता है। कई बार तो यह अपने साथ घातक बीमारी को भी लेकर आता है। यह तथ्य भी साफ है कि बहुत ही मामूली कीमत पर मिलने वाला गुड़ाखू उद्योगपतियों को मालामाल बना देता है। राजस्व की प्राप्ति भी सरकारी खजाने को होती होगी लेकिन एक सामाजिक बुराई को दूर करने में सरकार को आगे आना होगा।

किसी भी किस्म का नशा तात्कालिक रूप से भले ही आनंद का अनुभव दे जाए किन्तु दीर्घकालिक परिणाम दुखद होते हैं। खासतौर पर ऐसे परिवारों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है जहां उस परिवार की आजीविका का सहारा वह व्यक्ति स्वयं हो जो नशे का शिकार बन चुका होता है। नशे की लत में कामकाज तो प्रभावित होता है और इसके परिणामस्वरूप आय पर भी असर होता है। आय घटने से परिवार को आर्थिक दिक्क्तों का सामना करना होता है बल्कि रोज रोज कलह भी होने की आशंका बनी रहती है। छत्तीसगढ़ एक विकसित राज्य है और नशा एक सामाजिक बुराई है। जिस तरह शराबबंदी के लिये सरकार ने प्रयास शुरू किया है, उसी तरह अन्य नशे पर भी शिकंजा कसे जाने से सामाजिक बुराई को दूर कर राज्य का विकास किया जा सकता है।

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