भगवान की याद



मनोज कुमार
जब कभी हम पर मुसीबत टूटती है तो हमें सबसे पहले भगवान याद आते हैं। ऐसा लगता है कि भगवान हमारी सारी पीड़ा दूर कर देंगे। भगवान के स्मरण से पीड़ा भले ही दूर न हो किन्तु पीड़ा सहने की षक्ति मिल ही जाती है। भगवान की तरह ही स्वतंत्र भारत में गांधीजी को पूछा और पूजा जा रहा है। हर किसी को गांधी का रास्ता मंजिल पा लेने का सबसे सरल रास्ता लगता है। अन्ना हजारे ने भी गांधी को सामने रखकर भ्रष्टाचार के खिलाफ स्वयं को प्रस्तुत किया था। आरंभिक दिनों में देषवासियों को उनका समर्थन भी मिला लेकिन आहिस्ता आहिस्ता अन्ना का जादू खत्म होने लगा और एक समय ऐसा भी आया जब अन्ना को अपना आंदोलन खत्म करना पड़ा। अन्ना के लिये यह आसान था कि वे आंदोलन को वापस ले लें। अन्ना की टीम के लिये यह मुष्किल था कि वे आंदोलन वापस लें क्यांे कि उन्हें पता था कि जब तक वे लाठी भांजते रहेंगे, तब तक ही उनकी पूछ बनी रहेगी। षायद यही कारण है कि इनका आंदोलन तो षुरू हुआ था सत्याग्रह से और पहुंच गये कटी बिजली का तार जोड़ने, पहुंच गये मंत्री सलमान खुर्षीद के कारनामे बाहर लाने के लिये। लोकपाल की बात हाषिये पर चली गयी। अब लोकपाल नहीं, लोक हंगामा केजरीवाल टीम के लिये जरूरी हो गया है। मुद्दों के साथ साथ सिर पर पहनी टोपी का स्लोगन भी बदलता गया। पहले कहा गया कि मैं अन्ना हूं, फिर मैं केजरीवाल और अब मैं आदमी हूं कि टोपी पहने घूमा जा रहा है।

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ब्रांड थे। उम्रदराज व्यक्ति का यह साहस लोगों को लुभा रहा था लेकिन उनके हटते ही जैसे भ्रष्टाचार का आंदोलन ही हट गया। गांधीजी की टेक लेकर जो आंदोलन आगे बढ़़ रहा था, उसने बीच में ही दम तोड़ दिया। यह होना चौंकाने वाला नहीं है बल्कि यह आज नहीं होता तो कल होता। गांधीजी की टेक लेकर चल रहे इस आंदोलन में गांधीजी कहीं नहीं थे। अन्ना से लेकर केजरीवाल हमेषा से कहते चले आ रहे हैं कि वे अपनी मांग पूरी होने तक जरूरत पड़ी तो जान दे देंगे। गांधीजी को ऐसे सवालों से भी चिढ़ थी। पराधीन भारत में एक बार उनसे सवाल किया गया कि क्या अपनी मांग मनवाने के लिये वे मरना पसंद करेंगे? सवाल का जवाब देने के बजाय गांधीजी ने कहा था खराब सवाल है। अन्ना टीम की तरह गांधीजी का विष्वास भीड़ एकत्र करने में कभी नहीं रहा बल्कि वे भीड़ के साथ हो लेते थे। अपने आंदोलन के साथ गांधीजी लघु उद्योगों पर जोर देते थे, खेती पर उनका जोर था लेकिन अच्छी तकनीक जानने के बाद भी अन्ना खेतों को छोड़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। 

गांधीजी छोटे छोटे प्रयासों से अंग्रेजों को मजबूर किया करते थे लेकिन आज हम सीधे सरकार पलटने की बात करते हैं। गांधीजी का पूरा प्रयास भारत को स्वाधीन बनाने के लिये था। अन्ना ने जो आंदोलन आरंभ किया, वह समय की जरूरत है किन्तु उनका आंदोलन रातोंरात भारत बदल देने की थी जो लगभग असंभव सा था। अन्ना के अलग हो जाने के बाद केजरीवाल से किरण बेदी भी अलग हो गयी हैं। वे ठेठ राजनीतिज्ञ की तरह बर्ताव करने लगे हैं। सत्तासीन नेताओं और केजरीवाल में फकत इतना ही फर्क है कि अभी वे संसद से बाहर षोर मचा रहे हैं और षायद आने वाले दिनों में संसद के भीतर यही विरोध दर्ज करते नजर आएंगे। तस्वीर बदल पाएंगे, यह तो संभव सा दिखता नहीं है। गांधीजी के बाद जयप्रकाष नारायण, विनोबा भावे ने जो तस्वीर बदलने की लकीर खींची है, उससे पूरी तस्वीर भले ही न बदल पायी हो किन्तु आज भी लोगों के दिल में बदलाव की तमन्ना है। यही कारण है कि जयप्रकाष नारायण के बताये रास्ते पर चलने की कोषिष करते दिखते हैं। केजरीवाल यदि सच में तस्वीर बदलना चाहते हैं तो नेताओं का नहीं, आम आदमी का मन बदलने की कोषिष करें। जब तक भारतीय मन नहीं बदलेगा, ऐसे ही भ्रष्टाचार में डूबे नेता चुने जाते रहेंगे। विकल्प की तलाष में खड़ी जनता को एक रास्ता अन्ना का नजर आया था, दुर्भाग्य से वह रास्ता भी बंद होकर वहीं जा मिला है जहां से हम मुक्ति पाना चाहते हैं। केजरीवाल की लड़ाई से केजरीवाल का कद तो ऊंचा होगा लेकिन आम आदमी वहीं और वैसा ही खड़ा रहेगा जैसा कि आजादी के छह दषक गुजर जाने के बाद भी खड़ा हुआ है।    

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