रविवार, 8 मार्च 2026

पीपी का होना, इस संस्था का होना है

 





















    बार बार फोन की तरफ ध्यान जा रहा है, लगता है कि दूसरी तरफ से आवाज आएगी... मनोज भाई, आप पहुंचे नहीं। जल्दी आइए, और हां, मैं केके को बोल देता हूं, गाड़ी भिजवा देगा। अब ये आवाज हवा में गुम हो गया है। कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और अपने जाने के पहले उन्होंने 8 मार्च को विश्व महिला दिवस पर पीआरएसआई के प्रोग्राम की रूपरेखा बना गए थे। उनके नहीं रहने के दूसरे दिन ही, यह आयोजन हुआ। हालांकि इस आयोजन में वो बात नहीं थी लेकिन उनकी प्लानिंग के हिसाब से ठीक ठाक हो गया था। इसके बाद साल दर साल 

पीआरएसआई के प्रोग्राम की आंच धीमी पड़ती गई। पिछले साल भी जनसंपर्क दिवस के साथ इसकी भी औपचारिकता पूरी कर दी गई थी, इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा।

सच तो यह है कि पीपी सरीखा कोई दूसरा हो नहीं सकता। पीआरएसआई को उनके होते हुए जो ऊंचाई मिली थी और हरेक को जोड़ कर रखते थे। उनकी अगुवाई में होने वाले आयोजन की प्रतीक्षा केवल स्टूडेंट्स को ही नहीं, पत्रकारिता जगत को भी रहती थी। विश्व महिला दिवस एवं जनसंपर्क दिवस के इतर भी कभी होली दीवाली मिलन, अन्य अवसर तलाश कर किया करते थे।

कल 7 मार्च को उनकी पुण्यतिथि थी और हमेशा की तरह स्टूडेंट्स ने आयोजन कर पीपी का स्मरण किया। यहां भी पीआरएसआई नदारद था।किसी संस्था का आरंभ किया जाना आसान है लेकिन उसे ऊंचाई देना और उसकी निरंतरता बनाए रखने के लिए एक पीपी की जरूरत होती है। अब दूसरा पीपी कहां से लाएं? अच्छा होगा कि नया कुछ ना कर सकें तो उनकी खींची लाइन को ही कायम रख लें। पीआरएसआई सच में पीपी के लिए संस्था नहीं, सपना थी, वे इसमें सब कुछ झोंक देते थे। इस बात का साक्षी पूरा समाज है। काश, पीआरएसआई उनके बनाए रास्ते पर चल कर कुछ नया गढ़ ले, उम्मीद कम ही है।

पीपी का होना, इस संस्था का होना है

       बार बार फोन की तरफ ध्यान जा रहा है, लगता है कि दूसरी तरफ से आवाज आएगी... मनोज भाई, आप पहुंचे नहीं। जल्दी आइए, और हां, मैं केके को बोल...