विश्वास दरकने का साल 2013

मनोज कुमार

      कहते हैं कि 13 का अंक बुरा होता है। मैं ज्योतिष शास्त्र पर विश्वास नहीं करता, तो अविश्वास भी नहीं है। कभी 13 के फेर में नहीं पड़ा, लेकिन आज जब मैं मीमांसा कर रहा हूं, तो लगता है कि यह साल 2013 वास्तव में बुरा ही बुरा रहा। खासतौर पर यह साल समाज का भरोसा तोडऩे वाला साल साबित हुआ। पहले अन्ना हजारे के आंदोलन का बिना मकसद पाए खत्म हो जाना, फिर आसाराम की करतूतों पर से परदा उठना और आखिरी में मीडिया को अविश्वास के घेरे में लाकर तेजपाल का एक किशोरी के साथ कथित यौन व्यवहार करना। अब ज्योतिष दावे से कह सकते हैं कि 13 का अंक वास्तव में बुरा होता है। इस समय हम सब शर्मसार हैं। हमारी यह शर्मिंदगी हमारे अपने किए पर नहीं है, बल्कि हमारे भरोसे के लगातार दरक जाने से है। बहुत ज्यादा नहीं लगभग दो साल के अंतराल में हम इस बुरे दौर से गुजर रहे हैं। यह दौर अंग्रेजों के राज से भी बद्तर है। इन दो सालों के बीच विश्वास ठांठें मारता रहा और हमें लगने लगा कि भारत में, हमारे भारतीय समाज में एक ऐसा दिन आने वाला है, एक ऐसी सुबह होने वाली है, जब हम रोज-रोज के छले जाने वाले प्रपंच से खुद को बरी पा सकेंगे। तब हममें से किसी को इस बात का यकीन ही नहीं था कि जिस भरोसे की उम्मीद कर रहे हैं, जिस सुबह की आस हमारे दिल में है, दरअसल वैसा कुछ नहीं है। बल्कि आज जितना बुरा हम देख रहे हैं या कहें कि जिस कुशासन को झेलने के हम आदी हो चुके हैं, उससे भी बुरा समय हमारे घर-आंगन के दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। हम जिस सुबह के इंतजार में हैं, वास्तव में वह सुबह नहीं,  बल्कि एक और काली रात की पटकथा लिखी जा रही है जिसे याद कर हम सिहर उठेंगे। बीते 12 महीने की एक के बाद एक, तीन कहानियों ने तो कुछ ऐसा ही बयान किया है सिहरा देने वाली घटनाएं, नैतिकता के पार जाती हदें और समाज का टूटता, दरकता विश्वास। 

हमारे बीच विश्वास कैसे दरक रहा है, इसकी बानगी देखनी है, तो बात शुरू करते हैं अन्ना हजारे के आंदोलन से। अन्ना वयोवृद्ध हैं। वे गांधीवादी नेता हैं। उनके  भीतर इस कुशासन को लेकर आग थी। वे व्यवस्था बदल देना चाहते थे। अपनी इसी सोच के साथ उन्होंने रिटायर आईपीएस किरण बेदी और आयकर विभाग में उच्च पद का अनुभव पा चुके अरविंद केजरीवाल को प्रमुख रूप से साथ लिया। और भी जवान उनके साथ थे। अलग-अलग पेशे और तासीर के लोग लेकिन सबकी मंशा थी एक स्वराज्य की। अन्ना ने अपनी उम्र की परवाह किए बिना अनशन पर बैठ गए। लम्बे समय गुजर जाने के बाद केन्द्र सरकार को सुध आई और गोलगप्पे वाले वायदे पर अन्ना का अनशन खत्म करा दिया। यह थोड़े दिनों का अनुभव रोमांचक रहा। जिन लोगों ने स्वाधीनता का संघर्ष नहीं देखा था, उनके लिए यह एक ट्रेलर था। आहिस्ता-आहिस्ता समय गुजरता गया। एक नई सुबह की आस लिए जो लोग आगे आए थे, सबके सपने अलग अलग होते गए। अन्ना की टीम बिखर गई। अन्ना किनारे कर दिए गए, तो किरण बेदी हाशिए पर चली गईं। अरविंद केजरीवाल ने जरूर मैदान थाम लिया, लेकिन उनका जनलोकपाल पीछे चला गया और वे लोकतांत्रिक रूप से जीत हासिल करने के लिए बाकायदा राजनीतिक पार्टी के रूप में दिखाई देने लगे।            
       अन्ना की टीम टूटने के साथ आम आदमी का भरोसा टूटने लगा। गांधीवादी विचारों के रूप में अन्ना उनके बीच आये थे लेकिन आंदोलन के टूट जाने से आम आदमी की आस को गहरा धक्का लगा। वे निराशा में डूब गए। आम आदमी का विश्वास टूट गया और कुशासन मुस्करा रहा था। उसे भरोसा था कि ये जो आग जली है, वह बहुत ताप देने वाली नहीं है। कुशासन का अनुभव ठीक था। हुआ भी यही। लोग वापस उसी रास्ते पर चलने लगे। उनका भरोसा टूट गया था। 
आम आदमी तो जैसे धोखा खाने के लिए ही जी रहा है। उसका भरोसा बार बार टूटता रहा है। वह छला जाता रहा है। इस बार छलिए के रूप में आसाराम का अवतरण हुआ। आध्यात्मिक संत के रूप में आसाराम पर आम आदमी की आस्था इतनी गहरी थी कि वह उसके पीछे का छिपा चेहरा देखना ही नहीं चाहता था। कदाचित उसे देखने ही नहीं दिया गया। अपने दु:ख से बेहाल आम आदमी को आसाराम अपने चुटीले अंदाज में राहत देता था। आम आदमी को आसाराम की बातों पर कितना भरोसा था, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन वह थोड़े देर के लिए अपनी पीड़ा भूल जाया करता था। आम आदमी जैसे कभी सत्ता से सवाल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है, वैसा ही उसने कभी आसाराम के ऐश्वर्य के बारे में सवाल करने की हिमाकत नहीं कर सका। उसे भगवान का डर दिखाया जाता था। आम आदमी सरकार और ईश्वर दोनों से एक बराबर डरता है। इस डर मेें सच्चाई का तो कभी पता नहीं चला, लेकिन आसाराम संत से सरोकार की दुनिया में गहरे धंसते चले गए। धन और स्त्री उनके लिए महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। जिस तरह एक वानर ने रावण की लंका में आग लगाई थी, वैसा ही साहस एक बच्ची ने कर दिखाया। उसने आसाराम की संतई की जो कलई खोली, तो आसाराम के लिए एक के बाद एक कारागार के दरवाजे खुलते गए। यह ठीक है कानून इस धूर्त और ढोंगी को सजा देगा, लेकिन उस आम आदमी के भरोसे का क्या करोगे, जिसके बूते पर वह जीता रहा है। आम आदमी के भरोसा टूटने का यह दूसरा मामला था। आम आदमी करे तो क्या करे? 
         हिन्दुस्तान में आम आदमी का एक बड़ा हथियार होता है प्रेस और मीडिया। उसे पता है कि सरकार सुने ना सुने, अदालत सुने ना सुने, प्रेस और मीडिया ऐसी जगह है जहां उसकी सुनवाई फौरन हो जाती है। उसे यह भी भरोसा है कि प्रेस और मीडिया किसी के दबाव में नहीं आता है। और बात जब तहलका की हो, तरुण तेजपाल की हो तो मामला और चोखा हो जाता है। लेकिन यह क्या? जिस तरुण तेजपाल ने समाज में शुचिता लाने के लिए जाने क्या क्या जतन किए, आज वही अपना जतन नहीं कर पाया? अपनी जवानी पर काबू नहीं रख पाया? स्वयं का आत्मनियमन और संयम खो दिया। वह भी एक ऐसी लडक़ी के लिए जो उसकी बेटी के बराबर की थी। तरुण को क्या एक पल के लिए भी नहीं लगा कि उसके इस कुकर्मी चेहरे से उसका अपना तो नुकसान होगा ही, पूरे प्रेस और मीडिया भी अविश्वास के घेरे में आ जाएगी। हैरानी की बात यह है कि तेजपाल के चेहरे पर तब तक तेज बना रहा, जब तक कि वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ गया। हालांकि प्रेस और मीडिया पर समाज का इतना भरोसा है कि वह इसे तेजपाल का व्यक्तिगत मामला समझेगी, लेकिन जो हुआ, उसने आम आदमी का विश्वास तो तोड़ ही दिया है। 

अन्ना हजारे आंदोलन, आसाराम की करतूत और कुकर्मी तेजपाल से आम आदमी का विश्वास टूटा है लेकिन समाज जानता है कि इन लोगों के बेनकाब हो जाने से ही व्यवस्था चाक-चौबंद होती है। 2013 आम आदमी के भरोसे के टूटने के साल के रूप में जरूर याद किया जाएगा लेकिन यह टूटन आम आदमी को और भी मजबूत बनाएगी, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए। यह वही भारत है, जिसने कभी आपातकाल भी देखा है। प्राकृतिक आपदाओं से तो आम आदमी का करीबी रिश्ता रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद विकास के रास्ते पर आम आदमी के विश्वास के साथ धोखा नहीं हुआ। भारत ऋषि-मुनियों का देश है, जहां सत्य और अहिंसा का सबक सिखाया जाता रहा है। भगवान श्रीराम और महात्मा गांधी अमर हैं तो इसलिए कि उन्होंने सत्य बोला और सत्य को जिया, लेकिन यह भी सच है कि इसी धरती पर रावण और गोडसे भी पैदा हुए थे। इतिहास के पन्नों में आसाराम और तेजपाल का नाम कहीं खलनायक के रूप में दर्ज हो जाएगा, लेकिन सच के लिए लडऩे वाले अन्ना हजारे हमेशा हमेशा के लिए याद किए जाते रहेंगे।

       आज आम आदमी की नियति ही बन गई है, उसे बार-बार छला जाता है। इसके बाद भी वह अपने विश्वास पर कायम रहता है, केवल इस आस में की कभी न कभी तो वह सुबह जरुर आएगी, जब उसके सामने एक नया उजास होगा। इस उजास में वह स्वयं को अपनों के करीब रहकर खुश रहेगा। अपना बनकर रहेगा, अपनापे के साथ सांस लेगा। साल तो आते ही रहते हैं। हर वर्ष एक कैलेंडर की तरह आता है और ढेर सारी यादें देकर कूड़ेदान में चला जाता है। पर इतिहास पर नजर रखने वाले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कौन सा वर्ष किनके लिए सुखद रहा और किनके लिए दु:खद? दुआ करो कि जिस तरह से हमारे सामने से 2013 गुजरा, उस तरह से 2014 न गुजरे!


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