शनिवार, 30 अक्तूबर 2021

मैं और मेरे से मुक्त, हमारा मध्यप्रदेश

 मध्यप्रदेश स्थापना दिवस पर विशेष

मनोज कुमार
एक बार फिर खुशियों ने दस्तक दी है. कामयाबी से भरे जश्र के साथ मध्यप्रदेश अपना स्थापना दिवस मनाने जा रहा है. मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस कई मायनों में इसलिए भी अर्थ पूर्ण हो जाता है कि अपने जन्म के साथ विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए कामयाबी के पथ पर आगे बढ़ता रहा है. आज ही के दिन 1 नवम्बर, 1956 को जब मध्यप्रदेश ने आकार लिया था तब स्वयं को स्थापित करने की एक बड़ी चुनौती उसके समक्ष थी. भौगोलिक रूप से छिन्न-भिन्न अवस्था में मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ था लेकिन पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ऐसे शिल्पकार बने जिन्होंने ना केवल मध्यप्रदेश को दिशा दी बल्कि देश के विकसित प्रदेशों के समकक्ष खड़ा हो गया. एक बडौल प्रदेश से देश के ह्दय प्रदेश बन जाने वाला मध्यप्रदेश की यात्रा कभी कंटक भरी रही तो कभी दूसरों के लिए रोल मॉडल के तौर पर अपनी आमद दी है. आज सचमुच में खुशियों का दिन है क्योंकि हम सब की सरजमीं जिसकी वजह से हमारी पहचान है, उसका जन्म दिन मना रहे हैं.
मध्यप्रदेश को शांति का टापू कहा जाता है और यह सच भी है. आप देश के अपराध के रिकार्ड चेक करेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि आप सुरक्षित हैं. दरअसल इस प्रदेश की तासीर में ही सद्भाव कूट-कूट कर भरा है. मध्यप्रदेश को जांचना हो तो आपको दो खंडों में जांचना होगा. पहला अविभाजित मध्यप्रदेश और दूसरा विभाजित मध्यप्रदेश. 1956 से 2000 तक मध्यप्रदेश झाबुआ से बस्तर तक फैला हुआ था. देश के विशाल भू-भाग वाले प्रदेश की पहचान थी. तब मध्यप्रदेश का आर्थिक और राजनीतिक ढांचा एक अलग किस्म का था. मध्यप्रदेश का दूसरा खंड 2000 से 2021 का है जिसमेें वह अब झाबुआ से लेकर मंडला तक है. दो दशक पहले विभाजन के बाद भी दोनों राज्यों के बीच सामंजस्य बना रहा क्योंकि सच तो यह है कि भौगोलिक रूप से दो राज्य हो गए हैं लेकिन दिल से आज भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. छत्तीसगढ़ के अलग हो जाने के बाद मध्यप्रदेश का भौगोलिक क्षेत्रफल कम जरूर हुआ है लेकिन आज भी वह एक बड़े भू-भाग वाले प्रदेश के रूप में अपनी पहचान रखता है. छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य बनाये जाने के निर्णय पर मध्यप्रदेश ने कोई आपत्ति नहीं ली और छत्तीसगढ़ भी करीब साढ़े तीन दशक से पृथक राज्य बनाये जाने की मांग को शांतिपूर्ण ढंग से करता रहा. यह दोनों राज्यों की जमीन में जो शांति और सद्भाव का बीज है, वह उनके जन्म केे साथ रोपित है.
साल 2000 से जब हम मध्यप्रदेश में विकास की रफ्तार का लेखा-जोखा देखते हैं तो हम निराश नहीं होते हैं. कहा जाता था कि छत्तीसगढ़ अलग होने से मध्यप्रदेश को एक बड़े राजस्व का नुकसान होगा. यह बात ठीक हो सकती है तो यह बात भी है कि उस राजस्व का एक बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ के विकास पर भी खर्च करना होता था. खैर, शिवराजसिंह चौहान मध्यप्रदेश के ऐसे शिल्पकार के रूप में अपनी पहचान विकसित की है कि इतिहास उनके बिना अधूरा रहेगा. वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश में पहली दफा भाजपा सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आयी और 2005 से लेकर लगातार मध्यप्रदेश की सत्ता के सिरमौर रहे शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश को एक नई ऊंचाई दी. शिवराजसिंह सरकार के एजेंडे में किसान, आदिवासी, महिला और बुर्जुग सबसे पहले रहे हैं. तकरीबन 18 महीने की बीच में आयी कांग्रेस की सरकार से लोगों की उम्मीद टूट गई. 2018 के चुनाव में फकत सूत भर से भाजपा को पराजय का दंश झेलना पड़ा था लेकिन कांगे्रस सत्ता सम्हाल नहीं पायी. चौथी दफा शिवराजसिंह पुन: सत्ता में आये तो उनके समक्ष केवल चुनौती ही थी. सौ साल बाद पूरी दुनिया में कयामत बनकर टूटा कोरोना ने मध्यप्रदेश को भी सांसत में डाल दिया था. दवा-इलाज के साथ आर्थिक संकटों से जूझते मध्यप्रदेश को इस बात की आश्वति थी कि शिवराजसिंह चौहान सब सम्हाल लेंगे. अक्सर ऐसे संकट के दौर में शिवराजङ्क्षसंह गांधी के रास्ते पर चल पड़ते हैं. अपनी ही सरकार में वे सत्याग्रह करते हैं. यह पूरे देश के लिए एक नया अनुभव होता है. हालांकि इसके  माध्यम से वे जनता को संदेश देते हैं और उन्हें विश्वास में लेते हैं. पहला उनका सत्याग्रह मंदसौर में किसानों पर हुई गोलीबारी के लिए था तो दूसरी बार कोरोना के खिलाफ लोगों में आत्मविश्वास जगाने के लिए. दोनों ही दफा उनकी स्वयं की सरकार थी और वे स्वयं मुखिया. कहना ना होगा कि इसके परिणाम सुखद आये.
मध्यप्रदेश विभिन्न भाषा-भाषी और बहुविध संस्कृति का प्रदेश है. इसे देश का ह्दय प्रदेश के साथ लघु भारत भी कहा जाता है. मध्यप्रदेश की खासियत रही है कि यहां जो आता है, यहीं का होकर रह जाता है. कोई कट्टरता नहीं, कोई विद्वेश नहीं. मध्यप्रदेश से एक संदेश जाता है कि हम सब भारत के नागरिक हैं. अन्य प्रदेशों में मेरा और मैं का बोलबाला होता है जबकि मध्यप्रदेश हम की भावना के साथ सबको गले लगाकर चलता है. रोजगार से लेकर कारोबार तक और रोटी-बेटी के रिश्ते की जो गमक मध्यप्रदेश में सुनायी देती है, वह अपने आपमें बिलकुल अकेला है. मध्यप्रदेश इसलिए गौरव प्रदेश भी है. ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में संकट नहीं है. संकट है तो उसका समाधान भी हो जाता है. यह एक बड़ी चुनौती है कि सबको साधकर रखना लेकिन मध्यप्रदेश की तासीर में ही है कि मोहब्बत बांटते चलो. मध्यप्रदेश की सरजमीं से ऐसे सितारे हुए हैं जिन्होंने देश और पूरी दुनिया में अपना नाम किया है. एक नाम लता मंगेशकर का लिया जा सकता है. ऐसे हजारों नाम होंगे जिस पर मध्यप्रदेश को गर्व है. एक टीस, एक पीड़ा जरूर होती है जब कामयाब हो जाने के बाद मध्यप्रदेश को लोग भूल जाते हैं. लेकिन एक मां का दिल जितना बड़ा होता है, वैसा हीे मध्यप्रदेश का है. वह बेहद सहजता से माफ कर देता है और कोई शिकायत नहीं करता. देश और दुनिया के जिस कोने में मध्यप्रदेश से निकलकर कामयाबी के शिखर पर बैठे लोगों से इल्तजा है कि एक बार अपनी जमीं की, अपने मध्यप्रदेश की चिंता कर लें. मध्यप्रदेश तो अपने आप में खुश है. खुश क्यों ना हो क्योंकि उसकी किसी से तुलना नहीं है क्योंकि ये मध्यप्रदेश मैं और मेरा नहीं, हमारा मध्यप्रदेश है. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शोध पत्रिका ‘समागम’, भोपाल के संपादक हैं) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कोरोना : डरने, डराने का नहीं, सम्हलने का वक्त है

 मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...