शनिवार, 11 जुलाई 2026

क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ?

चीखती, दम तोड़ती बच्ची का सवाल....

प्रो. मनोज कुमार

स्त्री शक्ति की दुहाई देते देवियों को पूजने वाले हमारे समाज की हकीकत है। राजस्थान की वह मासूम जिसने अभी चलना ही शुरू किया था। जिंदगी में वह रंग भरती, इसके पहले उसे बदरंग कर दिया गया। दरिदंगों की शिकार बच्ची मर गई। उसे मरना तो था ही। पहले ही उसकी आत्मा मर गई थी। बदन पर खुरचे गए जख्म उसे पल प्रति पल मार रहे थे। ये उसका ही साहस था कि वह दरिदों को बेनकाब करने खुद को बचा कर सडक़ पर आ गई थी। यह बच्ची दरिदंगी की शिकार का वह चेहरा है जहाँ हजारों-हजार बच्चियाँ शिकार हो रही हैं। बेमौत मर रही हैं और अपराधी बेखौफ हैं। कुछ समय पहले देश के सबसे शिक्षित राज्य कहे जाने वाले केरल से ऐसी ही खबर आयी और हाल में मध्यप्रदेश के भोपाल से खबर मिल रही है। ऐसे अपराध का सिलसिला थमा नहीं है। निर्भया को लेकर समाज ने जो सजगता दिखायी थी, तब लगा था कि समाज ऐसी दरिदंगी के खिलाफ सजग और सचेत रहेगा और शायद ऐसे लोगों में डर पैदा होगा लेकिन हालात ऐसी कोई चिंह अपने पीछे नहीं छोड़ रहा है। हालत बद से बदतर होती जा रही है। 

राजस्थान में जो कुछ हुआ, उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। 32 दानवों में से कुछ को पुलिस ने धर लिया है। सडक़ों पर उनकी पिटाई हो रही है। चिंहित लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाने की खबर भी है। यह एक तरीका हो सकता है लेकिन इसके खिलाफ डर पैदा करना इस समय की बड़ी जरूरत है। अपराध के आंकड़ों को देखें तो कोई राज्य कम या कोई ज्यादा होता है और इन आंकड़ों से बहुत ज्यादा फर्क पडऩे वाला नहीं है। मूल बात है उस दरिदें सोच की। समाज के प्रतिकूल व्यवहार करने के लिए कभी फिल्मों को दोष दिया जाता था और अब सोशल मीडिया को। लेकिन क्या दोष देने से मामला समाप्त हो जाता है। मान भी लें कि फिल्मों के चलते अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं तो फिल्मों को देखकर हम सीखते क्यों नहीं? हिंदी फिल्म मदर इंडिया तो आपके हमारे जेहन में है। अपराध के लिए अपने ही बेटे को मार डालने वाली माँ क्यों हमारे लिए सबक नहीं बनती है। मुझे स्मरण हो रहा है कि छतरपुर या टीकमगढ़ में एकाध दशक पहले गाँव की पंच या सरपंच रही एक स्त्री ने अपने बेटे को इसलिए गाँव निकाला कर दिया कि उसने पंचायत का नियम तोडक़र शराब पीने की जुर्रत की थी। एक उदाहरण यह भी है। एक दृष्टांत लोकमाता अहिल्या का भी मिलता है जिन्होंने अनैतिक आचरण पर बेटे को सजा दी थी। 

हमारे समाज का दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे विमर्श में इस समय दूसरे हजारों विषय हैं लेकिन नैतिक रूप से पतित होते इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है। शिक्षा से जुड़ी अमिता नीरव जैसी कुछेक लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं। बहुसंख्य वीडियो इधर से उधर करने में लगे हैं। एक किस्म का इसे भी सायबर अपराध मान सकते हैं। ये दरिदें केवल हैवान नहीं हैं बल्कि इससे आगे निकल कर ये नरभक्षी हो गए हैं। डराने वाली बात यह है कि इस अपराध में बालिक के साथ नाबालिग भी शरीक हैं। थू करते हैं, घिन आती है ऐसे लोगों पर लिखते, बोलते और सोचते हुए। निरपराध मासूम दुनिया से चली गई और हमने आज नहीं बोला तो वह दूर बैठी हमसे सवाल कर रही होगी, क्यों मेरा दर्द महसूस नहीं कर पाये? क्या मैं तुम्हारी कुछ नहीं लगती हूँ। मन थर्रा उठता है और तब जब हम अपने आसपास की बच्चियों को चेहरा देखते हैं। कल्पना करके सिहरन हो उठती है और मन पहले से ज्यादा डरा हुआ महसूस करते हैं।

कह सकते हैं कि सरकार को चाहिए कि वह अपराध को रोके और यह सच भी है। लेकिन हमारी जवाबदारी कौन तय करेगा? पहले हमें जिम्मेदारी उठानी होगी। कानून अपना काम करेगा और पुलिस अपना लेकिन इससे पहले सुरक्षा की जवाबदारी हमें लेना होगी। जमाने भर के नए एप आ गए हैं। तकनीक बाँह पसारे हर कुछ कर रही है तब स्कूल, कॉलेज जाती बच्चियाँ, ऑफिस जाती बहन बेटियों को सुरक्षा दी जाए। उनके भीतर कांफिडेंस क्रियेट किया जाए कि डरना नहीं है। हालाँकि निजी तौर पर मानना है कि जब स्थिति भयानक हो जाती है तब ये सारी सीख कागजी साबित हो जाती है। फिर भी कुछ तो उम्मीद रखना होगी, कुछ तो कोशिश करना होगा। कानून को भी ऐसे अपराधों के लिए नए ढंग से परिभाषित करने की जरूरत है। मकान गिरा दिए गए, यह उचित है। इससे आगे बढक़र उनकी संपत्ति और कैश को राजसात कर उन्हें अपंग बना दिया जाए ताकि रास्ते ढूंढ कर बच ना सकें। हमारे एडव्होकेट समाज ने कई बार मिसाल पेश की है कि ऐसे मामलों की पैरवी ना कर। इस बार भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा होगी। एक बड़ा सवाल यह है कि एक रिक्शे वाले से लेकर होटल-दर-होटल बच्ची का सौदा होता रहा और किसी को खबर नहीं हुई? इसकी पड़ताल करना भी जरूरी है। इन दरिंदों के अलावा और कौन है जिनके चेहरे अभी ढके-छिपे हैं। एक और इल्तजा है कि इसे राजनीतिक चश्मे से परे देखा जाए तो मासूम को शायद शांति मिल पाए।

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