प्रो. मनोज कुमार
सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी प्रतिभा से उजाला फैलाने वाले इस प्रतिभावान बच्ची का नाम है चाँदनी। अपने नाम के अनुरूप अपनी प्रतिभा की रोशनी फैलायी कि सरकार अंतिमजन के द्वार पहुँच गई।
यूँ तो ऐसी किसी प्रतिभा का खिल जाना कोई असामान्य घटना नहीं है लेकिन चाँदनी का मामला अब थोड़ा अलग है। उसकी प्रतिभा की गूँज ऐसी थी कि मोहन सरकार उनके द्वार पर पहुँच कर उसकी पीठ थपथपा कर उसे हौसला दिया और कहा कि- ‘तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यहाँ हम से मतलब डॉ. मोहन यादव नहीं, मध्यप्रदेश सरकार है। इसे राजनीतिक चश्मे से देखिए तो भी आपको एक अपनापन सा लगेगा। प्रतिभावान चाँदनी के सिर पर हाथ फेरते डॉ. मोहन यादव गए तो मुख्यमंत्री बनकर उसके घर लेकिन भाव एक पालक का दिख रहा था। परिवार के साथ बैठने वाले तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने लेकिन उसके परिवार ने उन्हें अपना कोई भाई, मामा या चाचा के रूप में देखा। ऐसे अवसर बिरले होते हैं। स्वाभाविक है कि डॉ. मोहन यादव और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के बीच एक महीन सी रेखा है जो उन्हें औरों से अलग बनाती है। अपना शुभाषीश दिया, प्रतिभावान चाँदनी से उसके भविष्य के सपने सुने और आश्वस्त किया कि वो सब कुछ किया जाएगा, जिसका उसका मन है। परिजनों से उनके बारे में पूछा और बातचीत की। हम महसूस कर सकते हैं कि उस परिवार की उस समय क्या मनोदशा रही होगी जब स्वयं सरकार उनके पास बैठी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 वर्ष के सफल कार्यकाल और उनके कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने और जोडऩे का एक सिलसिला जारी है। और ऐसा पहले भी होता रहा है। यहाँ भी यह हुआ तो कोई हैरानी नहीं लेकिन हैरानी है कि पूरे लाव-लश्कर के साथ सरकार उन्हें अपने दरबार में बुलाकर भी सम्मानित कर सकती थी, पीठ ठोंक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया, और सरकार स्वयं चाँदनी के घर पहुँच गई। तंग गलियों में सरकार का लाव-लश्कर नहीं जा सकता है इसलिए अधिकतर सरकारों ने वहाँ जाने से परहेज किया। डॉ. मोहन यादव भी ऐसा कर सकते थे लेकिन किया नहीं। सरकार को पीछे छोडक़र ई-स्कूटर खुद चलाते हुए विधायक सबनानी को पीछे बिठाकर पहुँच गए। अपने अंदाज में बात-बात पर ठहाका लगाने वाले मोहन ने पूरे परिवार को मोह लिया। सेल्फी ली और उनके हाल जानें। इसे एक राजनीतिज्ञ से जोडक़र देखने के बजाय एक सोच के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके इस नवाचार से समाज में संदेश जाता है कि एक सरकार ऐसी भी होती है, एक मुख्यमंत्री स्कूटर में बैठकर तंग गलियों में जा पहुँचता है तो उन हजारों-हजार बच्चों को तसल्ली होती है कि इस बार ना सही, अगली बार उनका मूल्यांकन करने सरकार ना सही, मुख्यमंत्री ना सही, मोहन भिया जरूर आएंगे।
स्मरण आ रहा है कि इसके पहले भी कुछ मंत्रियों ने प्रतिभावान बच्चों को और उनके परिवार को फोन लगाकर बातचीत कर उनका हौसला बढ़ाया था। शायद यह उसका विस्तार है जिसे स्वयं मुख्यमंत्री ने दिया है। यह केवल चाँदनी का हौसला बढ़ाने का मसला नहीं है बल्कि एक खामोश संदेश यह है कि जो जहाँ है, वह वहाँ जाकर ऐसी प्रतिभाओं का, उनके परिवार का हौसला बढ़ाये। यह समझना मुश्किल नहीं है कि वो परिवार, वो बच्चे अपनी मेहनत और प्रतिभा से आगे बढ़ रहे हैं और आगे भी बढ़ते रहेंगे लेकिन इस तरह की गैर-राजनीतिक नवाचार समाज में सकरात्मक भाव उत्पन्न करता है। मुख्यमंत्री के चाँदनी के घर जाने से उसके परिवार की गरीबी दूर नहीं होगी और ना ही चाँदनी के दैनंदिनी जीवन में कोई बड़ा बदलाव आएगा लेकिन जो बदलाव आएगा, वह नेपथ्य में होगा। वह बदलाव दिखेगा नहीं लेकिन मोहन भिया के आशीष से उसका मन पर्वत बन जाएगा और वह अपने मन के पर्वत की विजेता। उसके सपने को चार चाँद लग गए हैं और स्वयं का भरोसा बढ़ गया है। ध्यान आता है लेकिन पक्का-पक्का नहीं, रींवा की बेटी भी ऐसे ही अपने सपने पूरे कर जहाज उड़ाने लगी और एक दिन हमारे सामने आज की टॉपर चाँदनी कर अपने सपने को सच करती हुई आर्मी में लेफ्टिनेंट बनकर खड़ी होगी। उसके सपने, उसके हौसले से पूरे होंगे लेकिन थोड़ा-थोड़ा सा असर मोहन भिया के सिर पर हाथ रखने का होगा। सीख यही है कि हम सरकार नहीं हैं, मुख्यमंत्री नहीं हैं लेकिन समाज का वो हिस्सा हैं जो ऐसी चाँदनी की चमक को बढ़ा सकते हैं। शायद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव यही संदेश देना चाहते होंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)