प्रो. मनोज कुमार
सारे कैमरे और कलम नरोत्तम मिश्रा पर आकर ठहर गया है। मीडिया के लिए खबर है कि भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा को दतिया से मैदान में नहीं उतारना। मीडिया की नजर से देखने वालों के लिए यह बड़ी खबर है। चलो, मान लें कि नरोत्तम को टिकट नहीं देना या उनकी जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर है तो क्या राजेन्द्र भारती की जगह पर उनके परिवार को टिकट नहीं देना बड़ी खबर नहीं है? पार्टी की दृष्टि से देखें तो यह रूटीन है और किसे टिकट देना है, किसे प्रत्याशी बनाना है, यह पार्टी तय करती है। जैसे भाजपा ने किया, वही व्यवहार कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती के परिवार को दतिया उपचुनाव से बाहर रखकर किया। इस उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा ना ‘तुम हारे, न हम हारे’ बयान कर रहे हैं। दतिया उप चुनाव में सिंधिया की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर है। चुनाव भाजपा जीत जाती है तो सिंधिया पावरफुल हो जायेंगे और हार जाती है तो नए समीकरण बनेंगे।
दतिया मध्यप्रदेश के उन 320 सीटों में एक विधानसभा सीट है जहाँ उपचुनाव होना है। दतिया उपचुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित होने के साथ हंगामा शुरू हो गया। हंगामा भी भाजपा प्रत्याशी को लेकर है ना कि कांग्रेस को लेकर। अदालत से अयोग्य कांग्रेस के राजेन्द्र भारती के स्थान पर पूर्व विधायक को टिकट दिया जाना मीडिया की नजर में सामान्य है तो नरोत्तम मिश्रा की जगह भाजपा से अन्य को टिकट दिया जाना क्यों असमान्य है। दरअसल, भाजपा पार्टी लाईन से हटकर यह मानस बना लिया गया था कि दतिया उपचुनाव में भाजपा से नरोत्तम मिश्रा ही उम्मीदवार होंगे जबकि पार्टी की तरफ से ऐसा कोई संदेश नहीं दिया गया था। कांग्रेस के लिए मीडिया में इसलिए रार नहीं मचा कि राजेन्द्र भारती की जगह किसी को भी टिकट दें, क्या ही फर्क पडऩे वाला है? शुरूआती दौर में श्रीमती राजेन्द्र भारती को टिकट देने की सुगबुगाहट हुई थी लेकिन उनकी जगह पर पूर्व विधायक को टिकट देने को पार्टी का सामान्य फैसला मान लिया गया।
दतिया उप चुनाव के लिए भाजपा मीडिया के केन्द्र में है। खबरें यह भी चल पड़ी कि नरोत्तम मिश्र का टिकट काट दिया गया। क्या कोई बताएगा कि भाजपा ने कब उन्हें दतिया उप चुनाव के लिए प्रत्याशी घोषित किया था, जो उनकी टिकट काट कर किसी अन्य को दे दिया गया? पार्टी ने तो किसी का नाम ही ऐलान नहीं किया था, तो नाम कटने का सवाल कहाँ से आया? हाँ, इतना जरूर हुआ कि जैसा होता है, उसके आधार पर मान लिया गया था कि दतिया से नरोत्तम चुनाव में पराजित हुए थे, सो उन्हें ही मौका दिया जाएगा। भाजपा अपनी रीति-नीति के अनुरूप इस ढर्रे को बदल कर नए प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया। वैसे तो कहा जाए कि कांग्रेस ने भी राजेन्द्र भारती के परिवार का टिकट काट दिया। यहाँ भी वही बात लागू होती है कि अदालत ने राजेन्द्र भारती को अयोग्य घोषित किया और कांग्रेस को जरूरी नहीं लगा कि उनके परिजनों को चुनाव मैदान में उतारा जाना चाहिए। दरअसल, इस पूरे परिदृश्य में जो सबसे बड़ी स्थिति उत्पन्न हुई है, वह यह कि फिलहाल भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा परिवार को और कांग्रेस ने राजेन्द्र भारती परिवार को चुनाव से अलग-थलग कर दिया है। यहाँ पर एक पुरानी राजनीतिक कहावत-‘ना तुम जीते, ना हम।’
अब थोड़े इस बात की भी चिंता कर लें। नरोत्तम का अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रभाव है और भाजपा उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती तो जीत के आसार बड़े थे। नरोत्तम उम्मीदवार बनते तो कांग्रेस के राजेन्द्र भारती पर लगे आरोप को भाजपा भुनाती और अब नरोत्तम उम्मीदवार नहीं हैं तो भी वह इस मुद्दे को भुनाने का प्रयास करेगी। नरोत्तम को टिकट नहीं मिलने से उनके समर्थकों को गुस्सा होना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन जिस तरह सडक़ पर गुस्सा उतरा वह नरोत्तम के राजनीति सेहत को बिगाड़ता है। 26 साल पहले छत्तीसगढ़ में बृजमोहन समर्थकों ने ऐसे ही गुस्से का इजहार नए-नवेले छत्तीसगढ़ में किया था। तब इसका खामियाज़ा बृजमोहन अग्रवाल को भुगतना पड़ा था। एक बार यह दोहराता हुआ दिख रहा है। फिलहाल तो भाजपा संगठन ने कहा कि है नरोत्तम मिश्र की अगुवाई में दतिया उप चुनाव जीत लेेंगे। और ऐसा हो जाए तो हैरानी नहीं होगी क्योंकि कांग्रेस के पास बचाव का कोई अभेद तरीका नहीं दिखता है। पार्टी ने दतिया उप चुनाव की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी है और उनकी सहज अपेक्षा होगी कि दतिया सीट भाजपा के खाते में आए। सिंधिया पूरी ताकत लगा देेंगे और जीत भी असंभव नहीं है। कदाचित दतिया उप चुनाव भाजपा खेत रही तो सिंधिया के राजनीतिक अस्तित्व पर भी सवाल उठ सकते हैं। यहाँ भाजपा के खोने के लिए बहुत कुछ दिख रहा है और कांग्रेस के पास ऐसा कुछ नहीं है। खबरें चल रही हैं, राजनीतिक गलियारों से खबरें आ रही हैं कि यहाँ भाजपा ने कांग्रेस को वाकओवहर दिया है और ऐसा है तो भविष्य सवालों के बीच है और समय की प्रतीक्षा ही शेष है।
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