सोमवार, 2 नवंबर 2009

मीडिया और गर्ल

मैं नहीं जानता कि बहस किस बात पर चल रही है किन्तु जिन मुद्दों पर बात चल रही है वह एतराज करने वाली है। मैं एक बेहद पारम्परिक परिवार से हूं जहां छोटी छोटी बातों पर गौर किया जाता है किन्तु मैं और मेरा परिवार लड़कियों के भविष्य के खिलाफ कतई नहीं रहा है। मेरा आग्रह हमेशा रहा है कि मर्यादित व्यवहार कर लड़की हो या लड़का, अपने काम की तरफ पहले ध्यान दे। बहरहाल, पहली बात तो यह कि लड़कियों के काम करने पर जो लोग आपत्ति दर्ज करा रहे हैं, वे डरे हुए लोग हैं। मैं एक बेटी का पिता हूं और उसकी उम्र अभी महज दस वर्ष है लेकिन उसके भविष्य के लिये मेरे पास अगले दस साल की प्लानिंग है। वह भी पायल और पायल जैसी लड़कियों की कतार में लगेगी और अपना कैरियर बनाने की कोशिश करेगी। मेरे लिये आज की पायल और कल की अपूर्वा में कोई फर्क नहीं दिखता।दूसरा एक मुद्दा कपड़े पहने जाने को लेकर है। यह भी समझ से परे है कि एक लड़की के जींस पहने जाने पर हंगामा क्यों? मेरा तो मानना है कि शरीर के बनावट और काम की जरूरत के हिसाब से कपड़े पहने जाने चाहिए। रिपोर्टिेग करते जाते समय किसी भी लड़की से अपेक्षा की जाये िकवह लहंगा-चुन्नी पहन कर काम करे तो यह बेवकूफी से कम की बात नहीं है।मैं विगत तीस वषों से प्त्रकारिता कर रहा हूं। मीडिया के स्टूडेंट को पढ़ाने जाता हूं। यंग व स्मार्ट बच्चियां जब मौजूदा स्थितियों पर सवाल करती हैं तो मन को संतोष होता है कि चलो भावी पीढ़ी कुछ नया कर दिखायेगी। ऐसे में मेरा कहना है कि जो लोग भी इस तरह की बात कर रहे हैं उन सभी, खासतौर से मीडिया में जुड़े लोगों से मेरा आग्रह है कि मानसिकता ऐसी है तो कृप्या मीडिया से दूर हो जाएं। लड़कियों को भी एक सलाह है कि वे अपने शिक्षक अथवा सीनियर्स के पैर न छुए बल्कि नमस्कार से काम चला लें। मीडिया खुलेपन के लिये है न कि मानसिक रूप् से बीमार लोगों के लिये।मनोज कुमारk.manojnews@gmail.com

बहस

यह कैसा राज्योत्सव?
मनोज कुमार
साल 1956 के एक नवम्बर को जन्मे मध्यप्रदेश की सर्जरी सन् 2000 में उसी तारीख को हुई थी। इस सर्जरी से मध्यप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अलग हो गया जिसे स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से पुकारा गया। विकास के नाम पर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा तो दे दिया गया किन्तु विकास कितना हुआ, यह बहस का विषय है। फिलहाल तो बात कर रहे हैं उस ऐतिहासिक भूल की जिसे मध्यप्रदेश पिछले 9 वर्षों से कर रहा है। एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने पर राज्योत्सव मनाया जाना तो ठीक है किन्तु मध्यप्रदेश अपने विखंडित स्वरूप् में अपनी स्थापना दिवस का जश्न मनाये, यह मामला थोड़ा अनुचित लगता है। इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए कि मध्यप्रदेश का राज्योत्सव मनाया जाना कितना उचित है।
साथियों, यदि आप मध्यप्रदेश से वास्ता रखते हैं तो और नहीं रखते हैं तो भी, इस विषय पर अपनी राय जरूर भेजें। @जीमेल.com

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

आमंत्रण

पहली खबर

पत्रकारिता की दुनिया से आपका पुराना रिश्ता रहा है. मेरा आग्रह है कि आप पत्रकारिता के आरंभिक दिनों को याद करें और उस पहली खबर को जरूर याद करें जिसे आपने किसी अखबार अथवा पत्रिका के लिये लिखा था. उस खबर को लिखने का उत्साह, जद्दोजहद और छप जाने के बाद पढ़ने का सुख आदि आदि बातों को एक बार फिर पहली खबर की तरह शब्दों में बांधने का प्रयास करें. खबर कौन सी थी उस पर भी विस्तार से बात की जाए तो मजेदारी होगी. आपके इन संस्मरणों को हम मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम में प्रकाशित करना चाहेंगे। पहली खबर के साथ अपनी एक तस्वीर हमें जरूर भेजें. डाक से भेजना चाहें तो पता है संपादक समागम ३, जू. एमआईजी, द्वितीय तल, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-462016 मो. 09300469918 E-mail: k.manojnews@gmail.com

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

मीडिया

मीडिया और पत्रकारिता के फर्क को समझिये
मनोज कुमार

पत्रकारिता और मीडिया के फर्क को भुला दिया गया है। इधर जितनी आलोचना हो रही है और भद पीट रही है वह मीडिया की है न कि पत्रकारिता की। इस आलोचना का पात्र आंषिक रूप् से पत्रकारिता हो सकती है लेकिन पूरी तरह से नहीं। जैसे एक समाचार पत्र में काम करने वाले गैर पत्रकार को भी आम आदमी पत्रकार समझ कर व्यवहार करता है ठीक उसी प्रकार मीडिया को भी पत्रकारिता मान लिया गया है जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। मीडिया पत्रकारिता का एक समग्र रूप् है जबकि पत्रकारिता अपने आप में वटवृक्ष की तरह है। पत्रकारिता से आषय खबर और उससे जुड़े विष्लेशण, चिंतन आदि इत्यादि किन्तु पत्रकारिता में मनोरंजन का कोई स्थान नहीं है वहीं मीडिया में खबर और उससे जुड़े पक्ष एक हिस्सा है तो उसका नब्बे फीसदी हिस्सा मनोरंजन और दूसरे पक्षों से संबद्व है। मीडिया और पत्रकारिता का ऐसा घालमेल किया गया है और किया जा रहा है कि दोनों का बुनियादी अंतर ही समाप्त हो गया है। पाठक और दर्षक तो पत्रकारिता अर्थात मीडिया को मानते हैं जबकि ऐसा है नहीं। यह वृत्ति अकेले पाठकोें और दर्षकों तक नहीं सिमटी है बल्कि पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी को भी नहीं मालूम की पत्रकारिता और मीडिया में फर्क क्या है। अभी हाल ही में पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर चुके मेरे एक नौजवान साथी से इस बारे में पूछा तो उसका कहना था सर, कहां आप इन चक्करों में पड़े हैं। मीडिया को ही पत्रकारिता मान लीजिये। हमें तो यही पढ़ाया और बताया गया है। अब पत्रकारिता और मीडिया के फर्क की मीमांसा कर अपना समय मत गंवाइए। मुझे उस युवा साथी की षिक्षा पर तरस आया। जो युवा पत्रकार स्वयं होकर मीडिया और पत्रकारिता के फर्क को नहीं समझना चाहता वह भला पाठकों और दर्षकों को खबर और मनोरंजन के बीच का अंतर कैसे समझा पायेगा। पत्रकारिता अब ऐसे ही साथियों के कंधे पर हैं जिनके लिये मीडिया ही पत्रकारिता है।इस पूरे कथानक में युवा साथी की गलती कम मानता हूं बल्कि इसका आरोप अपने सहित तमाम बुर्जुग पत्रकार साथियों के सिर मढ़ता हूं कि हम सबने मिलकर मीडिया षब्द की उपज की और पत्रकारिता कहना ही भूल गये। इसका परिणाम यह हुआ कि डंडा चले मीडिया के कारनामों पर और बदनाम हो पत्रकारिता। पत्रकारिता चारों दिषाआंे से वास्ता रखता है किन्तु उसका धर्म और नैतिक दायित्व यह है कि वह हर हाल में समाज में, देष में षुचिता के लिये कार्य करे न िकवह कमाई का जरिया बनाये।जो लोग पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात कहते हैं उनसे एक बार फिर मैं कहता हूं कि व्यवसायिक चरित्र पत्रकारिता का नहीं है बल्कि मीडिया का है। पत्रकारिता का इलेक्ट्राॅनिक चेहरा नहीं हो सकता है और न ही उसे कभी इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता कहा जा सकता है जबकि मीडिया की उपज ही 440 वोल्ट से होती है और वह इसी तरह का झटका भी देती है और इसलिये ही उसे इलेक्ट्रानिक मीडिया कहा गया है। मीडिया का चेहरा प्रिंट का भी है इसलिये वह प्रिंट मीडिया कहलाता है जिसके दायरे में जनसम्पर्क आता है किन्तु प्रिंट पत्रकारिता नहीं कहा जाता है क्योंकि वह तब भी पत्रकारिता ही होता है। मीडिया षुद्ध रूप् से आय की बात करता है किन्तु पत्रकारिता के पास आमदनी की कोई बात ही नहीं है। पत्रकारिता को समझना है तो माधवराव सप्रे के छत्तीसगढ़ मित्र के उस अंक को पढ़ना होगा जिसमें उन्होंने एक पत्रकार और सम्पादक की योग्यता और जरूरत का उल्लेख किया है। मोटी तनख्वाह की मांग मीडिया करती आ रही है। मैंने अपने पहले लेख में लिखा भी है कि पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो नहीं सकता क्योंकि किसी भी हालत में आप खबर की कीमत तय नहीं कर सकते लेकिन मीडिया खबर नहीं प्रोजेक्ट करता है और किसी को प्रोजेक्ट करने की कीमत तय होती है। मीडिया हमेषा व्यवसायिक बना रहेगा। अभी भी समय है कि हम पत्रकारिता और मीडिया के फर्क को समझने का प्रयास करें और पाठक व दर्षक में यह जागरूकता पैदा करने की कोषिष करें कि पत्रकारिता व मीडिया दो अलग अलग चीजें हैं।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

अपना राज्य

राज्यगीत एक अच्छी पहल
लगभग एक सप्ताह बाद मध्यप्रदेश अपनी एक और वर्षगांठ मनायेगा। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार को एक तरफ जहां लगातार पांच बार राज्योत्सव मनाने का अवसर मिला है वहीं भाजपा सरकार इस राज्योत्सव को एक नयी पहचान देने जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान की पहल पर फैसला लिया है कि राज्यगीत बनाया जाएगा। संभवतः मध्यप्रदेश पहला राज्य होगा जहां इस तरह की पहल हो रही है। अभी तक किसी राज्य का कोई राज्यगीत जैसी परम्परा रही है। भाषाई विवाद से परे इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। राज्यगीत बने, इसका सभी स्वागत करेंगे किन्तु अपेक्षा होगी कि यह गीत किसी विचारधारा अथवा पार्टी प्रेरित न होकर राज्य को प्रतिबिम्बित करने वाला हो तो सुखकर होगा। यहां स्मरण दिलाना होगा कि भोपाल के लेखक एवं प्रोफेसर पुरूषोत्तम चक्रवर्ती ने काफी पहले एक ऐसा गीत तैयार किया है जिसमें सम्पूर्ण मध्यप्रदेश की झलक देखने को मिलती है। इस गीत का प्रकाशन संभवतः राज्य शिक्षा केन्द्र ने अपने किसी प्रकाशन में किया है। राज्यगीत बनना ऐतिहासिक कदम है और इसे इसी सोच के साथ बनाया जाना चाहिए। अपेक्षा होगी कि मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश से बाहर रह रहे बुद्विजीवी भी इस दिशा में सरकार को अपनी सलाह भेजें ताकि राज्यगीत मुकम्मल चेहरा पा सके।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

ख़बर

अरे ये क्या हो गया?
रिपोर्टर
मध्यप्रदेश के प्रभावशाली आइएएस मनोज श्रीवास्तव को जब संस्कृति सचिव के पद से मुक्त किया गया तो गूंज उठी कि मुख्यमंत्री और उनके बीच थोड़ी दूरी बन गई है और जल्द ही वे आयुक्त जनसम्पर्क के पद से भी मुक्त कर दिये जाएंगे। कयासों का दौर अभी शुरू ही हुआ था कि मुख्यमंत्री ने अचानक एलान कर दिया कि प्रदेश में भूमि घोटाले की जांच आइएएस मनोज श्रीवास्तव करेंगे। इसके लिये एक सदस्यीय जांच समिति बनायी गयी जिसमें वे अकेले रहेंगेे।मुख्यमंत्री के इस फरमान से कई की जान अधर में लटक गई। कहां तो तय था कि श्रीवास्तवजी के पर कतरे जाएंगे कहां उन्हें उड़ने के लिये पूरा आसमान दे दिया गया। आइएएस आफिसरों में इसकी धमक तो हुई होगी,उससे कहीं ज्यादा मीडिया और राजनीतिक प्रेक्षकों के बीच हुई है। श्रीवास्तवजी से सद्भावना रखने वालांे को मुख्यमंत्री का यह एलान दीपावली के तोहफे की तरह है तो उनसे मनभेद रखने वालों के लिये अब समस्या खड़ी हो गई है कि वापस पटरी कैसे बिठायी जाए। यूं भी मुख्यमंत्री प्रदेश के हित में अफसरशाही मंे फेरबदल करते रहे हैं। दर्जनों आफिसर इधर से उधर कर दिये गये लेकिन किसी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा किन्तु लगभग एक सप्ताह पहले आइएएस मनोज श्रीवास्तव को संस्कृति सचिव पद से हटाया गया तो अवसाद और उत्सव का माहौल बन गया। लगभग चार वर्ष से श्री श्रीवास्तव मुख्यमंत्री के सबसे विश्वस्त अफसरों में गिने जाते हैं। मुख्यमंत्री का यह भरोसा थोड़े से अफसरों को मिलता है और उनमें ये एक हैं। यह बात एक बड़े वर्ग को रास नहीं आयी और उन्हें हटाने की जुगत की जाने लगी। लोगों की मानें तो उनकी इच्छा जनसम्पर्क को छोड़ने की है लेकिन मुख्यमंत्री ऐसा नहीं चाहते हैं। वे जानते हैं कि सरकार की नीतियांे, कार्यक्रमों और मुख्यमंत्री की छवि स्थापित करने में बतौर आयुक्त जनसम्पर्क उन्होंने बेहतर काम किया है। फिलवक्त, मुख्यमंत्री ने एक बार फिर संदेश दे दिया है कि अभी तो मनोज श्रीवास्तव का कोई विकल्प नहीं।

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

मीडिया

मीडिया खबर.कॉम ने लॉन्च किया अपना अंग्रेजी संस्करण
मीडिया खबर - भारत की पहली द्विभाषीय मीडिया वेबसाइट
मीडिया खबर.कॉम ने हिंदी के बाद अब अपना अंग्रेजी संस्करण भी लॉन्च कर दिया है. हालाँकि इसका बीटा संस्करण पहले ही लॉन्च कर दिया गया था. लेकिन विधिवत रूप से इसको आज दीपावली के दिन लॉन्च किया गया. अंग्रेजी संस्करण को मीडिया मंत्र के नाम से शुरू किया गया है. इस तरह से मीडिया खबर.कॉम देश की पहली ऐसी मीडिया वेबसाइट बन गयी है जो हिंदी और अंग्रेजी दोनों में है. अंग्रेजी साईट के लॉन्च होने से ग्लोबल स्तर पर मीडिया खबर.कॉम का दायरा और बढ़ गया है. अभी मीडिया खबर.कॉम को भारत के अलावा तक़रीबन 40से अधिक देशों में देखा जाता है.
मीडिया खबर.कॉम को जब साल 2008 में लॉन्च किया गया था, उस वक़्त हिंदी में मीडिया साईट का नितांत अभाव था. मीडिया खबर.कॉम एक बिलकुल नए कांसेप्ट के साथ आया था, जिसे लोगों ने सराहा भी. अपनी विश्वसनीयता को कायम रखते हुए मीडिया खबर.कॉम ने अपना आगे का सफ़र जारी रखा.
मीडिया खबर.कॉम के संस्थापक और संपादक पुष्कर पुष्प ने कहा कि - " साल 2008 में जब हम मीडिया खबर.कॉम को लेकर आये थे, उस समय हिंदी में मीडिया की ख़बरों को कवर करने का कोई कांसेप्ट नहीं था. मीडिया में रूची रखने वाले हिंदी के पाठकों को मजबूरन अंग्रेजी के मीडिया वेबसाईटों पर जाना पड़ता था, जहाँ हिंदी मीडिया की खबरें काफी कम रहती है. हमने पहली बार हिंदी मीडिया में रूची रखने वाले लोगों और मीडियाकर्मियों के लिए एक प्लेटफॉर्म तैयार किया.इसके पहले साल 2007 में हमने मीडिया पर केन्द्रित हिंदी की मासिक पत्रिका मीडिया मंत्र को लॉन्च किया था. वह भी अपने आप में एक नयी पहल थी. अब अपने अगले पड़ाव के रूप में हमने मीडिया खबर.कॉम का अंग्रेजी संस्करण लॉन्च किया है. अब हम विस्तार की प्रक्रिया में आ गए हैं और आगे आने वाले दिनों में कई और नयी शुरुआत करने जा रहे है. मीडिया खबर.कॉम बहुत जल्द आपको नए स्वरुप में नज़र आएगा. कई परिवर्तन भी आपको देखने को मिलेंगे. लेकिन हम जो भी काम करेंगे, उसमें अपनी पूरी विश्वसनीयता बनाये रखने की कोशिश करेंगे. विश्वसनीयता बनाये रखते हुए, अपना काम ईमानदारी से करते रहना हमारी प्राथमिकता की सूचि में सबसे ऊपर है. "
गौरतलब है की मीडिया खबर.कॉम, यंग इमेज कम्युनिकेशन की पहल है. यंग इमेज कम्युनिकेशन ही मीडिया की लोकप्रिय मासिक पत्रिक "मीडिया मंत्र" को चलाती है. मीडिया खबर.कॉम के अंग्रेजी संस्करण का वेब पता है : www.mediakhabar.com/english

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता  प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप  क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...