शनिवार, 29 जनवरी 2011

Mahtma Gandhi

साथियों,

आज उस महात्मा की पुण्यतिथि है जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं। महात्मा को भारतीय पत्रकारिता के एक छोटे से प्रतिनिधि की हैसियत से इस लेख के माध्यम से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात के बीच

-मनोज कुमार

महात्मा की पत्रकारिता और वर्तमान समय को लेकर विमर्श हो रहा है और यह कहा जा रहा है कि महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है। बात शायद गलत नहीं है किन्तु पूरी तरह ठीक भी नहीं। महात्मा की पत्रकारिता को एक अलग दृष्टि से देखने और समझने की जरूरत है। महात्मा की पत्रकारिता दिल्ली से देहात तक अलग अलग मायने रखती है। पत्रकारिता का जो बिगड़ा चेहरा दिख रहा है वह महानगरीय पत्रकारिता का है। वहां की पत्रकारिता का है जिन्हें एयरकंडीशन कमरों में रहने और इसी हैसियत की गाड़ियों में घूमने का शौक है। पत्रकारिता का चेहरा वहां बिगड़ा है जहां पत्रकार सत्ता में भागीदारी चाहता है और यह भागीदारी महानगर में ही संभव है। दिल्ली से देहात की पत्रकारिता के बीच फकत इसी बात का फरक है। दिल्ली की पत्रकारिता से महात्मा पत्रकार दूर हैं तो देहाती पत्रकारिता में वे आज भी मौजूद हैं।

इस अर्थ में पत्रकार महात्मा की इस दौर में अनुपस्थिति शायद ठीक ही है। पत्रकारिता का आज जो हाल है उसे देखकर पत्रकार महात्मा स्वयं को माफ नहीं कर पाते। वे पत्रकारिता को समाजसेवा का साधन मानते थे किन्तु पत्रकारिता आज स्वयं के जीवन का साध्य बन कर रह गयी है। आजादी के साढ़े छह दशक में पत्रकारिता ने अनेक बदलाव देखे हैं। इन बदलाव की पत्रकारिता गवाह रही है। विदेशी आक्रमण से लेकर देश के भीतर इमरजेंसी को पत्रकारिता ने करीब से देखा है। आज वही पत्रकारिता पेडन्यूज छापने के लिये रोज ब रोज दागदार हो रही है। ठीक ही है कि पत्रकार महात्मा गांधी इस समय हमारे साथ नहीं हैं। उनकी पत्रकारिता आज के दौर में छिन्न-भिन्न हो गयी है। सत्ता को रास्ता बताने वाले सत्ता के साथ चलने लगे हैं। आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति को उसका हक दिलाने वाली पत्रकारिता उनका हक छीनने में आगे हो गयी है।

महात्मा की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता को जांचने के पहले कुछ बुनियादी बातों की चर्चा कर लेना सामयिक होगा। पत्रकार महात्मा द्वारा पत्रकारिता के लिये बताये गये मानदंड और आज की पत्रकारिता के मानदंड में कोई साम्य नहीं है। दोनों की पत्रकारिता एक तरह से नदी के दो पाट की तरह हो गये हैं जो चलेंगे तो साथ साथ किन्तु कभी मिल नहीं पाएंगे। पत्रकारिता की बात होगी और पत्रकारिता के लिये पत्रकार महात्मा को याद किया जाएगा किन्तु जब उनके बताये रास्ते पर चलने की बात होगी तो दोनों वापस नदी के दो किनारों की तरह हो जाएंगे। यह बात तो शीशे की तरह साफ है कि आज की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता का लोप हो चुका है किन्तु क्या यह सच नहीं है कि इतना स्याह हो जाने के बाद भी पत्रकारिता की बुनियाद उन्हीं बातों पर टिकी है जो पत्रकार महात्मा बता गये थे।

पत्रकार महात्मा के साथ साथ चलते हुए इस दौर के महान पत्रकारों के बारे में बात करना लाजिमी होगा। पत्रकारिता की जो बुनियादी बातें हैं उनमें पहला है पत्रकारिता की निष्पक्षता। दूसरी बात है पत्रकारिता का तथ्यों को तटस्थ होकर पाठकों के समक्ष रखना न कि न्यायाधीश बनकर फैसला देना। तीसरी बात पत्रकारिता को व्यवसाय न बनाना। फौरीतौर पर तीनों ही बातें पत्रकारिता से खारिज कर दी गयी लगती हैं किन्तु सच यह है कि पत्रकारिता आज भी इन्हीं तीन बातों के कारण जनमानस की आवाज बनी हुई है। जीवन जीने के बुनियादी अधिकार को दिलाने में पत्रकारिता हमेशा से सक्रिय रहा है किन्तु कभी इस पर चर्चा नहीं की गई।

नीरा राडिया मामले में पत्रकारिता की जो भूमिका रही हो उसको लेकर ऐसा हंगामा हो रहा है कि मानो पत्रकारिता नेस्तनाबूद हो गई हो। पत्रकारिता पर कयामत आ गयी हो गई। जो लोग इस मामले को लेकर हंगामा कर रहे हैं वे शायद भूल गये हैं कि अरूण शौरी आज भले ही राजनेता के रूप में स्थापित हों किन्तु उन्हीं की कलम का कमाल था कि तीन दशक बाद भी बोफोर्स का मामला खत्म नहीं हुआ। मेरा सवाल है कि नीरा राडिया के साथ चलने वाले दस पांच पत्रकारों के नाम आ भी गये तो हंगामा क्यों होना चाहिए? क्यों कभी किसी ने अरूण शौरी से सवाल नहीं किया कि उन्हें राजनीति में आने की क्या जरूरत थी? अब अरूण शौरी के नक्शेकदम पर बाद की पत्रकारिता की पीढ़ी चलती है तो इसे सहज रूप में लेना चाहिए। समाज के हर वर्ग में ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपने उद्देश्य से भटकते नजर आते हैं।

दिल्ली और देहात की पत्रकारिता का फर्क वास्तव में यही तो है। दिल्ली की पत्रकारिता नदी का एक किनारा है और जो आज का सच है तो देहात की पत्रकारिता नदी का दूसरा किनारा है जो महात्मा की पत्रकारिता है। एक सच यह भी है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ लिखकर पत्रकारों का एक वर्ग वाहवाही लूटना चाहता है। मुद्दा तो यह है कि इतना हंगामा करने और लिखने के बाद कथित दोषी पत्रकारों को समाज ने बहिष्कृत क्यों नहीं किया। जिस प्रभु चावला को एक प्रबंधन ने सीधी बात कर हटा दिया तो दूसरे प्रबंधन ने सच्ची बात कहने के लिये अपने साथ ले लिया। अब इसे कौन तय करेगा कि प्रभु चावला को दोष के कारण हटाया गया या इस दोष के चलते उनकी ख्याति को भुनाने के लिये दूसरे ने अपने साथ ले लिया। दिल्ली की पत्रकारिता में सबकुछ चलता है किन्तु देहात की पत्रकारिता में इस तरह की छूट नहीं है।

पत्रकार महात्मा की उस पंक्ति को याद कर लेना सामयिक होगा जिसमें वे कहते हैं कि कम समय में सच को जांच लेना मुश्किल होता है और इसलिये अच्छा है कि ऐसा लिखा ही न जाए। इस संदर्भ में एक अनुभव स्मरण हो रहा है देहाती पत्रकारिता का जिसे हम महात्मा की पत्रकारिता कह सकते हैं बल्कि कहना चाहिए।

पत्रकारिता में अपना जीवन गुजार चुके पत्रकार ने बताया कि एक बार वे एक महिला को अपनी खबर में वेश्या लिख दिया। महिला की मौत हो चुकी थी। गुस्से में लाल-पीला होता उसका बेटा हाथ में हथियार लिये वह अखबार के दफ्तर में प्रवेश कर गया। गंदी गालियों के साथ वह उस पत्रकार को तलाश करने लगा जिसने यह खबर लिखी थी। उक्त वरिष्ठ पत्रकार का डर जाना स्वाभाविक था किन्तु अपना नाम छिपाते हुए उस युवक से आपत्ति की वजह जाननी चाही। युवक को खबर में अपनी मां को वेश्या लिखे जाने पर आपत्ति थी और उसका तर्क था कि क्या उसकी मां को किसी सरकार ने या शासन ने लायसेंस दिया था, यदि नहीं तो किस आधार पर यह लिखा गया।

युवक का गुस्सा जायज था। वरिष्ठ साथी को अपनी गलती का अहसास हुआ और आगे से दुबारा बिना जांचे कोई खबर नहीं लिखने की कसम खा ली। गांधीजी यही बात कहते थे। इस अनुभव का अर्थ यही है कि देहात की पत्रकारिता में महात्मा की पत्रकारिता आज भी मौजूद है किन्तु दिल्ली की पत्रकारिता में नहीं है। यदि ऐसा होता तो नैतिकता के नाते ही सही, आरोपों के जद में आये पत्रकार अपने वर्तमान दायित्व को स्वेच्छा से छोड़कर स्वतंत्र रूप से लेखन करते किन्तु आज के दौर की पत्रकारिता में यह कहां संभव है।

थोड़ी देर के लिये मान लिया जाए कि जिन पत्रकारों के नाम आरोपों की जद में आये हैं, उनसे पत्रकार बिरादरी ने नाता तोड़ लिया है क्या? क्या उन्हें जिन पत्रकार संगठनों की मान्यता या संबद्धता है, उनसे अलग कर दिया गया है, शायद यह भी नहीं। क्या पत्रकारों ने उनसे विमर्श बंद कर दिया है, शायद यह भी नहीं। जब स्वयं पत्रकार बिरादरी में इतना साहस नहीं है तो बेवजह अखबार के पन्ने और आम आदमी का वक्त जाया करने की जरूरत ही क्या है।

इसमें जीवन के सभी रंग समाये हुए हैं। जिसमें खुशियों की इंद्रधनुषी रंग हैं तो कुछ स्याह हिस्सा भी है। नीरा मामले में जो कुछ घटा और पत्रकार कथित आरोपों से घिरे अपने उन साथियों के बारे में लिखा है और लिख रहे हैं तो यह साहस पत्रकारिता में ही हो सकता है। किसी अन्य पेशे में यह साहस नहीं हो सकता बल्कि हरचंद कोशिश की जाती रहती है कि किस तरह साथी को बचाया जा सके। इस तरह के अनेक उदाहरण समाज के पास हैं जिन्हें पत्रकारिता ने बेनकाब किया है।

कितना भी कठिन दौर क्यों न हो, पत्रकारिता अपने बुनियादी उसूलों से मुंह नहीं मोड़ सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक वकील यह जानते हुए भी कि उसका मुवक्किल एक अपराधी है किन्तु उसे बचाने का यत्न करता है क्योंकि फीस उसने उसे बचाने की ली है। एक डाक्टर की तरह जो कितना भी निर्माेही हो किन्तु मरीज को देखना नहीं भूलता है। यहां मैं अपवादों की बात नहीं करता बल्कि उन सच्चाईयों की बात कर रहा हूं जिसे पत्रकारिता कहते हैं। आज पत्रकार महात्मा होते तो यह देखकर इत्मीनान कर लेते कि इस कठिन समय में पत्रकार अपना दायित्व निभा रहे हैं।

बुधवार, 26 जनवरी 2011

निर्गुण पद्म

-मनोज कुमार

मध्यप्रदेश के प्रहलाद टिपणिया को इस वर्ष का पद्मश्री से सम्मानित किया जाना पद्मश्री निर्गुण है, इस बात को एक बार फिर स्थापित किया है। प्रहलाद कोई राजनैतिक शख्शियत नहीं है और न ही वह कोई पहुंच रखने वाले परिवार का वारिसदार। वह एक लोक गायक है जो बीते पच्चीस बरस से कबीर के शब्दों को अपनी आवाज देकर दुनिया में उजाला फैलाने में लगा हुआ है। प्रहलाद को यह सम्मान मिलना इस बात का संदेश है कि यह सम्मान आज भी निर्गुण बना हुआ है और आगे भी निर्गुण मन को मिलता रहेगा। अखबारों में, खासकर मध्यप्रदेश के अखबारों में प्रहलाद को पद्मश्री मिलने की खबर को प्रमुखता नहीं मिली है, जो मेरे लिये दुख का कारण हो सकता है। प्रशासनिक और राजनीतिक क्षेत्रों के लोगों को यह सम्मान मिलना कोई बड़ी बात नहीं है किन्तु एक लोकगायक का यह सम्मान अर्थात पद्मश्री का सम्मान है।

मालवा की माटी का यह सपूत कबीर की तरह निर्गुण है। लोभ लालच से परे जब वह कबीर के पदों को गाता है तो सुनने वाले ठिठक जाते हैं। पच्चीस बरस से कबीर और प्रहलाद का जादू दुनिया पर चल रहा है। इस निर्गुणी गायक का सम्मान पहली दफा नहीं हुआ है बल्कि संगीत नाटक अकादमी दिल्ली और मध्यप्रदेश का सर्वाेच्च शिखर सम्मान से भी उन्हें नवाजा जा चुका है। प्रहलाद टिपणियां की आवाज का जादू मालवा के माटी में रचा बसा तो है ही वाराणसी के कबीर चौरा को भी यह आवाज गूंजती है। कबीर फांउडेशन इसका दस्तावेजीकरण कर रही है तो प्रहलाद की मीठी तान अमेरिका तक गंूजने लगी है। प्रहलाद को अपनी भारत की धरती के लोगों को रूढ़ियों के खिलाफ जगाने से फुर्सत नहीं मिली है सो वह अमेरिका नहीं गये। अमेरिकी प्रोफेसर को लगा कि ऐसे निर्गुणी के पास खुद को आना चाहिए वह तलाश करती हुई मालवा के गांव लुनियाखेड़ी पहुंच गयी। प्रोफेसर डॉ. लिंडा हैंस कबीर की वाचिक परम्परा पर शोध कर रही हैं।

प्रहलाद से अनेक बार मुलाकात हुई। भोपाल में तो अनेक बार। एक बार दिल्ली में भी उन्हें सुनने का अवसर मिला। प्रहलाद को सुनना हर बार एक नये रूप में होता है। मन भरता ही नहीं। कबीर को पढ़ा है और प्रहलाद को सुना। दोनों को मिला दो तो एक नये रूप से आपका परिचय होगा। कदाचित मुझे लगता है कि जो लोग समाज बदलने की बात मंचों पर चिल्ला चिल्ला कर कर रहे हैं, वे एक बार प्रहलाद के मुख से कबीर की वाणी सुन लें तो वे स्वयं बदल जाएंगे। प्रहलाद टिपणियां आज भी वैसा गायक है जिसकी आवाज में बनावट नहीं है। उसका ध्येय रूढ़ियों खिलाफ समाज को जगाने का है और वह इस सिलसिला को आगे बढ़ा रहा है। वह कहता है कबीर तो बेराग है, उसके शब्दों में संदेश है। वह समाज को एक नये स्वरूप में देखना चाहता है। प्रहलाद टिपणियां कहते हैं- सब काहू से लीजिए, सांचा शब्द निहार। शायद अब इसके बाद कुछ कहने, लिखने और बताने की जरूरत नहीं है।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

hamare log

जन्मदिन पर विशेष

लक्ष्मीकांतजी को जन्मदिन मुबारक

मनोज कुमार

बात लगभग डेढ़ साल पुरानी होगी। भोपाल में पत्रकारिता की कुछ किताबों
का विमोचन था। इन किताबों में मेरी भी एक किताब थी। मुख्यअतिथि के
रूप में वर्तमान में जनसम्पर्क, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा मौजूद थे। आमतौर पर जैसा होता है वही हुआ। इस मंच से भी पत्रकारिता के अवमूल्यन की बातें हो रही थी। कार्यक्रम में मौजूद अतिथिगण पत्रकारिता के अवमूल्यन को लेकर चिंता जाहिर करने के साथ ही पत्रकारों को सदाशयता की सीख देना नहीं भूले।

इन अतिथियों के बीच मुख्यअतिथि के रूप में जब लक्ष्मीकांतजी बोलने को उठे तो एकबारगी लगा कि वे भी कुछ ऐसा ही बोलेंगे। आरंभ में मेरी कोई रूचि उनको सुनने में नहीं थी किन्तु जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो उनका संबोधन चैंकाने वाला था। उन्होंने इस बात को खारिज नहीं
किया कि पत्रकारिता का अवमूल्यन हुआ है किन्तु वे इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह देहात के पत्रकार अलग अलग किस्म की समस्याओं से जूझते हुए दायित्व की पूर्ति करते हैं।
स्थानीय होने के नाते इन पत्रकारों को कभी थानेदार से तो कभी पटवारी
से तो कभी पंचायत अध्यक्ष से स्वयं को बचाना होता है। उनकी बातें सुनकर
मैं दंग था। मेरे साथ बैठे कुछ पत्रकार साथी भी इस बात से सहमत थे कि
वास्तविकता यही है।
कुछ इस तरह अपरोक्ष रूप से लक्ष्मीकांतजी को एक मंत्री के रूप में मैंने
पहिचाना। वे पत्रकारिता के लिये जितना सजग और सर्तक हैं उतना ही संस्कृति और शिक्षा के लिये भी। संस्कृति विभाग के आयोजनों में शामिल होना और गंभीरता से कार्यक्रमों को लेना उनकी प्रवृत्ति में है। उच्च शिक्षा की बेहतरी के लिये उनके प्रयास साफ दिखते हैं। शिक्षा माफिया को खत्म करने की दिशा में पिछले दिनों उठाये गये कदम उनकी सख्ती की एक मिसाल है। उनका मानना है कि शिक्षा मात्र एक साधन नहीं बल्कि साध्य है पीढ़ियों को
शिक्षित और संस्कारित करने का और वे इसमें कोई घालमेल पसंद नहीं
करते हैं।
राजनीति में आना अकस्मात नहीं है तो राजनीति में रम जाना भी अकस्मात
नहीं है। वे सीधी बात करते हैं। वे कभी यह कहने से संकोच नहीं करते
हैं कि पंडिताई उनका संस्कार और रिवाज है। उनकी दिलीइच्छा भी है कि
अवसर मिलने पर वे संस्कारपूर्ण आयोजन करेंगे। यजमान कौन मिलता है, यह समय बताएगा। वे जाबांज भी हैं। सड़क दुघर्टना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी हताश नहीं हुए बल्कि दुघर्टना को उन्होंने पराजित कर दिया। थोड़े विश्राम के बाद बिस्तर पर लेटे लेटे मंत्रालय के काम निपटाने लगे। मिलने वालों से उसी आत्मीयता से मिलते थे जैसा कि उनका रूटीन पहले था। आहिस्ता आहिस्ता सहारा लेकर चलने लगे। कार्यक्रमों में उपस्थित होने लगे। अब तो उनकी सक्रियता को देखकर कोई कह नहीं सकता कि उनके साथ कभी कोई ऐसा विकट हादसा हुआ होगा।

उम्मीद और उमंग से भरे इस राजनेता को प्रदेश के लोग लक्ष्मीकांत शर्मा
के नाम से जानते हैं। आज इस जननेता का जन्मदिन है। जन्मदिन तो इसके पहले भी उन्होंने मनाये होंगे किन्तु यह जन्मदिन उनके लिये विशेष है। हादसे को परास्त कर एक नये जीवन के आरंभ का उनका यह दिन मुबारक दिन है। ऐसे मिलनसार और मृदुभाषी राजनेता को उनके जन्मदिन पर प्रदेश की एक मुस्कान के साथ जन्मदिन की बधाई।

शनिवार, 22 जनवरी 2011

Mera Bhopal

ग्रीन नहीं, गरीब सिटी बोलिये....


मनोज कुमार
ये मेरे शहर को क्या हो गया है? विकास के नाम पर सरेआम मेरे शहर को उजाड़ा जा रहा है। जिन हजारों लोगों की रोजी प्रदूषण से शहर को बचाने के नाम पर छीन ली गयी उन भटसुअर के चालक मालिक भोपाल के पहचान थे बिलकुल वैसे ही जैसे आज काटे जा रहे हरे-भरे पेड़। हम सब खामोश हैं। मिटती हरियाली में हमें विकास दिख रहा है। किसी न किसी रूप में हम सब उन राजनेताओं और नौकरशाहों के साथ खड़े दिख रहे हैं जिनके लिये कल की मुसीबत आज विकास की बुनियाद है। कल्पना कीजिये कि शरीर को जला देने वाली गर्मी में भी भोपाल की सड़कों में ठंडक का अहसास होता था। बारिश में बचने के लिये किसी पेड़ की छांह तले आप खड़े हो जाते थे। जब ये पेड़ ही नहीं बचेंगे तो कौन आपके मन को शीतल करेगा और कौन बरसते पानी से भीगने से आपको बचाएगा। बड़ी खूबसूरत बसें शहर का सीना चीरकर बेदम गति से भाग रही हैं। भला लगता है इन बसों को देखना। इनमे सवारी करना लेकिन जब प्रदूषित हवाएं हम पर सवार हो जाएंगी। बीमारियां जब हमारे गले पड़ जाएंगी तब शायद भोपाल की याद आए। उस भोपाल की जिसे आज दुनिया ग्रीन सिटी के नाम से जानती है। संभव है कि प्रकृति की अकूत सम्पदा सहेजे इस शहर को गरीब सिटी के नाम से जाना जाएगा। कल तक लोग भोपाल में बसने के लिये बेताब थे किन्तु आने वाले कल में लोग भोपाल से भागने लगे।

मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा है कि अपनी विरासत बड़ी झील को बचाने के लिये श्रमदान करने वाले भोपाली कहां गुम हो गये हैं। अपना वजूद खो बैठी बड़ी झील एक बार फिर इतराती हुई दिख रही है तो उन हजारों लोगों की मेहनत के बदौलत जिन्हें बड़ी झील बचाने का जुनुन था। वो सारे लोग एक बार फिर सड़क पर निकल आएं तो विनाश का यह खेल बंद हो जाएगा। शहर को बचाना हमारी जवाबदारी है। हम कैसे पीछे रह सकते हैं। पेड़ होंगे तो पानी होगा और पानी होगा तो जीवन। पेड़ों के जीने का अर्थ हमारा जीवन का बचना है। इससे जुड़ा एक संकट है पेड़ काटने के बाद कांक्रीट की सड़कों का बनना। कच्ची मुरूमी, डामर की सड़कों से बहने वाला पीने धरती छाती में समा जाती थी लेकिन इन कांक्रीट की सड़कों का क्या करें जो पानी को अपनी ओर रिसने भी नहीं देती हैं। नर्म मुलायम मिट्टी गुस्से से लाल होते सूरज की तपिश को अपने में समा लेती थी। अब इसकी कोई सूरत बचती नहीं दिख हरी है।

मेरी पत्नी चिंतक नहीं है, पत्रकार भी नहीं है। उसकी दुनिया उसके चौके-चूल्हे में है। वह शौकिया चित्रकार है किन्तु उसके भीतर की स्त्री को इस बात अहसास है कि पेड़ों का कटना खुशियों का खो जाना है। घर से बाजार और मेले की तरफ जाती इस गृहणी घर से खुशी खुशी निकलती है और सड़क पर आते आते उसका चेहरा किसी कटे पेड़ की तरह हो जाता है। यह चिंता उस अकेले स्त्री की नहीं है बल्कि शायद हम सबकी है। वो मुझसे अपना दुख बांट लेती है क्योंकि वह एनजीओ नहीं चलाती है जो हल्ला बोल की स्थिति में खड़ी रह सके। वह मुझे कई बार कोसने भी लगती है। कभी कभी तो वह संतों की तरह मेरी चुप्पी पर प्रवचन देने से भी नहीं चूकती है। मेरा धर्म लिखना है और मैं अपने धर्म का पालन कर रहा हूं। मैं जगाने की कोशिश कर रहा हूं। अब देखना है कि ग्रीन सिटी भोपाल को हम लोग गरीब सिटी बन जाने से कब बचा पाते हैं।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

media

समागम अब मीडिया की शोध पत्रिका

मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का प्रकाशन अब शोध पत्रिका के

रूप में किया जाएगा। यह शोध पत्रिका द्विभाषी होगी।  मीडिया का विस्तार हो

रहा हैऔर मीडिया शोध का कैनवास भी बड़ा हुआ है किन्तु शोध पत्रिकाओं का

प्रकाशन अभी भी नगण्य है। इस कमी को पूरा करने की दृष्टि से एक विनम्र

प्रयास विगत दस वर्षाें से प्रकाशित हो रही मीडिया पर एकाग्र मासिक

पत्रिका समागम करने जा रहा है। पत्रिका का जनवरी २०११ का अंक महात्मा

गांधी की पत्रकारिता पर केन्द्रित है।

भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का सफर जनवरी

२०११ में दस वर्ष पूरे कर फरवरी दो हजार ग्यारह में पत्रिका ग्यारहवें

वर्ष में प्रवेश करेगी। अपने सफर के दस वर्ष के अनुभव को विस्तार देने

तथा मीडिया में शोध प्रकाशन की जरूरत की पूर्ति करने की दृष्टि से समागम

का प्रकाशन मीडिया की शोध पत्रिका के रूप में होगा। उन्होंने मीडिया में

शोध कर रहे साथियों से प्रकाशन सामग्री भेजने का आग्रह किया है।

विज्ञप्ति में जानकारी दी गई है कि समागम के फरवरी अंक से कुछ पन्ने

सिनेमा पर भी होंगे। सिनेमा में गंभीर लेखन को बढ़ावा दिया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश फिल्म विकास निगम ने पटककथा नामक पत्रिका का

प्रकाशन किया था। निगम के बंद हो जाने के साथ ही फिल्म मीडिया की गंभीर

पत्रिका पटकथा का प्रकाशन भी बंद हो गया। पटकथा की तर्ज पर समागम में

सिनेमा पर सामग्री दी जाएगी। समागम को शोध पत्रिका के रूप में विकसित

करने के साथ ही पत्रिका के पृष्ठों में वृद्धि करने की भी योजना है।

शोध आलेख भेजने के लिये डाक का पता है सम्पादक समागम, ३, जूनियर एमआयजी,

अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-१६ अथवा मेल कर सकते हैं -

k.manojnews@gmail.com

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

Sarokar

मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा


-मनोज कुमार
शीर्षक पढ़ कर आपको शायद अच्छा न लगे किन्तु सच यही है। जो लोग जिम्मेदार हैं और जिन लोगों से प्रेरणा पाकर समाज उनका अनुसरण करता है वही लोग इस तरह के कर्म करेंगे तो कहना ही होगा कि मत रखियों अपनी बिटिया का नाम नीरा। आइए इस बहाने ही सही एक बार नामकरण पर थोड़ी चर्चा हो ही जाए। भारतीय मानस हमेशा से चर्चित और प्रेरणा देने वालों के नाम पर अपने बच्चों का नामकरण करता आया है। भारतीय समाज में साक्षरता का प्रतिशत भले ही कम हो किन्तु समाज हमेशा से विवेकवान रहा है। जिस समय हर मंच पर नीरा राडिया और नीरा यादव की चर्चा हो रही है। अखबार के पन्नों और टेलीविजन के पर्दे पर उनकी बात कही और सुनी जा रही है तब संभव है कि कुछ माता-पिता इन नामों पर फिदा हो जाएं और जैसे होता आया है हर चर्चित नाम अपने बच्चों के कर दिये जाएं।
राम एक सर्वकालिक चरित्र हैं। चरित्रवान बच्चे की तमन्ना के साथ राम का नाम सदियों से लोग रखते आये हैं और लक्ष्मण को आज्ञाकारी भाई के रूप में देख कर उसका नाम भी स्नेहपूर्वक रखा गया है। भरत को भी समाज ने अनदेखा नहीं किया और अनेक परिवारों में ऐसे नाम रखे गये। समय समय पर इतिहास में नाम दर्ज कराने वाले व्यक्तियों के नाम भी अनेक परिवारों में दर्ज हो गये। भारतीय समाज विवेकवान है इसलिये उसे राम, लक्ष्मण, भरत, सीता, पार्वती, राधा, कृष्ण नाम रखने में कभी संकोच नहीं हुआ किन्तु उसने कभी अपने बच्चे का नाम विभीषण नहीं रखा। ऐतिहासिक तथ्य है कि अपने भाई से विद्रोह कर राम की मदद करने वाले विभीषण को लोग याद करते हैं किन्तु यह नहीं भूलते कि जो अपने परिवार का नहीं हुआ, अपने भाई का नहीं हुआ वह भला हमारा कैसे हो सकता है? ऐसे में उनका नाम किसी ने अपने बच्चे का नाम नहीं बनाया। आधुनिक समाज में भी गांधी और नेहरू के नाम पर हजारों बच्चे मिल जाएंगे, इंदिरा नाम की बच्चियों की तादात भी कम नहीं होगी लेकिन कानून की परिधि से बाहर जाकर काम करने वाले फूलनदेवी, मलखानसिंह और दाउद के नाम वाले शायद ढूंढ़ने से भी न मिले। खिलाड़ियों और फिल्मस्टार के नाम पर तो लगभग हर परिवार में एक चिराग मिल जाए।
इस सिलसिले में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के एक परिवार की घटना का उल्लेख करना सामयिक होगा। यहां एक पिता ने सानिया मिर्जा के नाम पर अपनी लाडली का नाम रख दिया। सोचा सानिया ने जैसे देश का नाम किया है वैसा ही उसकी बेटी भविष्य में करेगी लेकिन उसे निराशा अपनी बेटी से नहीं सानिया से हुई। सानिया ने पाकिस्तानी से ब्याह का ऐलान किया। सानिया के इस फैसले से दुखी पिता ने तत्काल अपनी बेटी का नाम बदल कर सोनिया कर दिया। पिता को इस बात का भय रहा होगा कि उसकी बेटी एक दिन अपने देश का नाम खराब न कर दें। इसे सहज और स्वाभाविक प्रतिक्रिया मानी जानी चाहिए और उस व्यक्ति के देशप्रेम को सलाम किया जाना चाहिए।
हमारे देश में इन दिनों नीरा नाम पर ग्रहण लगा हुआ है। नीरा राडिया का नाम खबर की सुर्खियों से धुंधला पड़ा ही नहीं था कि एक और नीरा के कारनामे सुर्खियों में आ गये। ये दूसरी हैं नीरा यादव। नीरा यादव उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यसचिव हैं और उन्हें जमीन घोटाले के मामले में चार साल की कैद सुनायी गयी है। समाज का मूलभूत नियम तो यह कहता है कि एक शक्तिशाली एक निरीह और जरूरतमंद को अपनी तरह शक्तिशाली बनाये किन्तु अनुभव ठीक इसके विपरीत है। नीरा राडिया और नीरा यादव सशक्त स्त्रियों के रूप में सामने आयी हैं किन्तु इन दोनों महिलाओं ने स्त्रियों की दशा सुधारने में कोई प्रयास नहीं किया। समय बतायेगा कि नीरा राडिया और नीरा यादव कितनी सही और गलत थीं लेकिन आज तो यह बात साफ है कि इनकी कमाई के एजेंडे में, लाभ देने वाले लोगों की सूची में पांच गरीब और असहाय महिलाएं भी होती तो समय न सही, समाज का एक वर्ग तो इन्हें माफ कर देता। इस मामले में सच तो यही है कि सशक्त और बलशाली लोगों की कौम एक अलग होती है और निशक्त: और निर्बल लोगों की एक अलग कौम। हम उम्मीद कर सकते हैं कि बार बार नीरा का नाम आ रहा है किन्तु जिस तरह समाज ने विभीषण जैसे नामों से परहेज किया वैसा ही कुछ भाव भी इन नामों के साथ होगा।

लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता

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