रविवार, 23 सितंबर 2012
शुक्रवार, 21 सितंबर 2012
मेरे दोस्त दरख्त माफ करना...
मनोज कुमार
वे मेरे दोस्त थे. रोज सुबह घर से दफ्तर जाते समय वे मुझे हंसी के साथ विदा करते. देर षाम जब मैं घर लौट रहा होता तो लगता कि वे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं. मेरे और उनके बीच एक रिष्ता कायम हो गया था. ये ठीक है कि वे बोल नहीं सकते थे तो यह भी सच है कि मैं भी उनसे अपनी बात नही कह सकता था लेकिन बोले से अधिक प्रभावी अबोला होता था. हमारी दोस्ती को कई साल गुजर गये थे. इस बीच मैंने लगभग नौकरी का इरादा त्याग दिया था. यह वह समय था जब न तो मेरे आने का वक्त होता था और न जाने का लेकिन क्योंकर षाम को उनके पास से गुजरना मन को अच्छा लगता था. अचानक कहीं से बुलावा आया और न चाहते हुए भी मैं नौकरी का हिस्सा बन गया. इस नौकरी से मेरा मन जितना खुष नहीं था, षायद मेरे ये दोस्त खुष थे. रोज मिलने और एक दूसरे को देखकर मुस्कराने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था। यह रिष्ता अनाम थ. आज सुबह मैंने उन्हें हलो कहा था और वे मुस्करा कर मुझे रोज की तरह विदा किया. तब षायद मुझे पता नहीं था कि रोज की तरह जब मैं षाम को घर लौटूंगा तो उसी रास्ते से लेकिन मेरे दोस्त मुझसे बिछड़ गये होंगे। कोई मुस्काराता हुआ आज मेरा स्वागत नहीं करेगा। षाम का मंजर देखते ही जैसे मेरा दिल बैठने लगा। थोड़ी देर के लिये मेरे पैर थम से गये। मैं अवाक था कि ये क्या हो गया। एक हफ्ते में मेरे लिये यह दूसरा हादसा था. दोनों हादसों में कोई साम्य नहीं था लेकिन दोनों के बिछड़ जाने का गम एक जैसा था.़ मेरी भांजी को विदा कर घर लौटते मेरे अपने जीजाजी सड़क हादसे में नहीं रहे. बहुत दिनों बाद मन जार जार कर रोया. अभी हफ्ता नहीं गुजरा था कि मेरे दोस्त की मौत ने मुझे झकझोर दिया है.
ये दोस्त थे मेरे आने जाने के रास्ते मंे खड़े हरे-भरे दरख्त. इनकी षाखाओं के लहराते पत्ते जैसे बार बार मुझे गले लगाने को बेताब होते थे. मैं कभी कल्पना भी नहीं की थी कि इस तरह एक दिन कोई निर्दयी इन्हें अकाल मौत दे देगा. कभी अपनी हरियाली के लिये इतराने वाला भोपाल आहिस्ता आहिस्ता कंगाल हो रहा है. क्रांकीट की इमारतों को खड़ा करने, सड़कों की छाती को रौंदने के लिये रोज ब रोज आ रही महंगी विदेषी कारों के लिये पहले ही सालों से खड़े दरख्तों को अकाल मौत दे दी गयी है. आज एक और दरख्त ऐसा ही मारा गया. किसी आदमी की मौत का गम तो थोड़े वक्त का होता है लेकिन किसी दोस्त की मौत षायद पूरे जीवन के लिये जख्म दे जाती है. जिस जगह यह दरख्त था, वहां खून का कोई निषान नहीं था लेकिन कटे हुए डंगाल, टूटे हुए पत्ते किसी बेरहम हाथों की कहानी बयान कर रहे थे. रोज की तरह चलता हुआ मैं जब गुजरने लगा तो एकाएक सन्नाटे सा महसूस हुआ. पैरों के नीचे मेरे दोस्त पत्ते कुचल गये तो मुझे झटका सा लगा. लगा कि जैसे मैंने अपने किसी को पैर से रौंदने का पाप कर लिया है. मैं आत्मग्लानी से भर गया.
मेरी आत्मग्लानी केवल पत्ते को पैर से कुचल जाने के लिये नहीं थी. बल्कि इस बात को लेकर भी मन विषाद से भर गया कि हम कितने निरीह हो गये हैं एक जीते-जागते दरख्त को अपने स्वार्थ के लिये बेमौत मार देते हैं. यह तो ठीक है कि हमारे कर्म उस गेंद की तरह होते हैं जो पलट कर हमारे पास आती है अर्थात हम अच्छा करते हैं तो अच्छा पाते हैं. इसे किताबी बात न मानें तो यह मानना ही पड़ेगा कि ऐसे बेमौत मरने वाले दरख्त हमारे दुख का कारण हैं. जीते-जी वे हमारे मुस्काने की वजह थी. उनसे हमंे छांह, पानी और साफ हवा मिलती थी और एक मुस्कान के लिये यह सब जरूरी है. अब जब हम एक बार नहीं, बार बार दरख्त को मौत दे रहे हैं तो उस दरख्त की आह भला हमें कब तक जीने देगी? यह सवाल उन सब लोगों से है जो दरख्त को मौत दे रहे हैं या देने में साथ दे रहे हैं या उसे चुपचाप मरने के लिये मजबूर होने दे रहे हैं. उन सब में मैं भी षामिल हूं. आज इस दरख्त की मौत ने मुझे एक बार फिर उस चिपको आंदोलन की याद दिला दी जिसकी याद आज की युवा पीढी को होगी भी नहीं. हे दरख्त, तुझे न बचा सकने का जो अपराध मुझसे हुआ है, उसके लिये मैं माफी चाहूंगा....सिर्फ माफी...
रविवार, 9 सितंबर 2012
शुक्रिया, शुक्रिया हिन्दी सिनेमा
-मनोज कुमार
हर बरस की तरह जब इस बरस भी चौदह सितम्बर को राष्ट्रभाषा हिन्दी के लिये हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह और हिन्दी माह बनाने की तैयारी में जुटे हुये हैं, तब इस बार बात थोड़ा सा अलग अलग सा है। इस बार हिन्दी उत्सवी माह में हम भारतीय सिनेमा के सौ बरस पूरे कर लेने का जश्र मना रहे हैं। हिन्दी और हिन्दी सिनेमा का चोली-दामन का साथ है। राजनीतिक मंचों पर राष्ट्रभाषा हिन्दी को विस्तार देने और उसे आम आदमी की भाषा देने के लिये हल्ला बोला जाता है किन्तु सितम्बर के महीने तक ही लेकिन हिन्दी सिनेमा हिन्दी को आम आदमी की जुबान में न केवल बोलता है बल्कि उसे जीता भी है। हिन्दी सिनेमा हिन्दी ही क्यों, वह तो तमाम हिन्दुस्तानी भाषा और बोली के संरक्षण एवं संवर्धन के लिये कार्य करता रहा है।
भारतीय सिनेमा के सौ बरस की इस यात्रा में भाषा और बोली का कोई प्रतिनिधि माध्यम बना हुआ है तो वह है हिन्दी सिनेमा। हिन्दी सिनेमा ने अपने आपको हर किस्म के बंधन से मुक्त रखा हुआ है। वह मानता है कि कहानी के पात्र जिस भाषा और शैली के होंगे, उसे वह फिल्माना पड़ेगा। यही कारण है कि हिन्दी सिनेमा बार बार और हर बार भारत का प्रतिनिधित्व करता हुआ दिखता है। भारतीय सिनेमा भाषा और बोली को न केवल बचाने का काम कर रहा है बल्कि उसे विस्तार भी देने का काम कर रहा है। हम यह कहते नहीं थकते कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है लेकिन यह कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच की भाषा, बोली और संस्कृति से हम परिचित नहीं होते, यदि हिन्दी सिनेमा हमारे पास नहीं होता। आंचलिक सिनेमा की अपनी सीमायें हैं। वह किसी एक बोली अथवा भाषा में अपनी बात कह सकता है लेकिन भाषा, बोली और संस्कृति की इंद्रधनुषी तस्वीर तो हिन्दी सिनेमा के परदे पर ही आकार लेता दिखता है।
तब गुड़ खाये और गुलगुले से परहेज, यह एक और सच है हिन्दी सिनेमा का। जितनी आलोचना हिन्दी सिनेमा की होती है, संचार माध्यमों में वह शायद किसी की नहीं होती है। शायद यही आलोचना हिन्दी सिनेमा की ताकत भी है। सौ बरस के सफर में हिन्दी सिनेमा ने लोगों का न केवल भरपूर मनोरंजन किया बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृश्य को बदलने में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करायी है। आज हिन्दुस्तान तो हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान के बाहर के देशें में भी हमारे हिन्दी सिनेमा की तूती बोल रही है। हमारा गीत-संगीत, हमारे कलाकार के साथ ही समूचा हिन्दी फिल्म उद्योग हमेशा से पूरे संसार के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। इन सबके बाद हिन्दी सिनेमा की आलोचना एक बार नहीं बार बार की जाती है। मीडिया में सिनेमा की आलोचना लगभग तयशुदा है। कई दफा तो ऐसा लगता है कि आलोचना के बिना हिन्दी सिनेमा की चर्चा अधूरी रह जाती है।
हिन्दी की ऐसी दुर्दशा को देखकर इस बात पर संतोष कर लेने के लिये हमारे पास हमारा हिन्दी सिनेमा है। एक ऐसा माध्यम जो आम आदमी का है। संवाद का एक ऐसा माध्यम जो हर तबके की भाषा बोलता है। वह अंग्रेजी साहब की नकल भी उतार लेता है और झुग्गी में रहने वाले टपोरी को भी उसी मुकम्मल रूप में पेश करता है जिसे हम देखते चले आ रहे हैं। हिन्दुस्तान की जमीन पर हर सौ कोस पर भाषा और बोली बदल जाती है। यह बदलती हुई भाषा और बोली आप हिन्दी सिनेमा में ही देख सकते हैं। यह हिन्दी सिनेमा ही है जो भारत की इंद्रधनुषी जीवनशैली, परम्परा और संस्कृति को हर दिन नयी पहचान देता आया है। यह हिन्दी सिनेमा ही है जहां आप अपने आपको पा सकते हैं। अपने होने का अहसास कर सकते हैं और यह अहसास आता है अपनी बोली और भाषा को जस का तस फिल्माने से।
ऐसा भी नहीं है कि हिन्दी सिनेमा में बोली और भाषा को लेकर कभी कोई गलती नहीं हुयी हो लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह संचार के दूसरे माध्यमों की तरह भाषा से खिलवाड़ करता रहा हो। हिन्दी सिनेमा की भाषा सरल, सहज और हिन्दुस्तानी रही है। उर्दू अदब को लेकर हिन्दी सिनेमा ने काम किया है तो जहां जरूरत हुयी, वह बोलचाल की आसान भाषा से ऊपर उठकर हिन्दी के कठिन शब्दों के उपयोग से भी परहेज नहीं किया। दरअसल हिन्दी सिनेमा की यह भाषिक सजगता ही उसके अस्तित्व को बचाने में सहायक बनता रहा है। संचार माध्यमों के लगातार ढहती दीवारों का कारण भाषा के प्रति निर्मम होते जाना है।
यह सच है कि हिन्दी सिनेमा के विषय-वस्तु में गिरावट आयी है तो यह गिरावट अकेले हिन्दी सिनेमा में ही नहीं आयी है। हिन्दी सिनेमा पर लगने वाला यह आरोप मिथ्या ही नहीं, भ्रामक भी है क्योंकि हिन्दी सिनेमा अथवा किसी भी भाषा का सिनेमा अपनी तरफ से कुछ गढ़ता नहीं है बल्कि सिनेमा समाज का आईना होता है और आईना वही दिखाता है जो उसके सामने होता है। अर्थात सिनेमा समाज का दर्पण है और दर्पण समाज में घटने वाली घटनाओं और बदलती जीवनशैली का रिफलेक्शन मात्र है। यह भी सच है कि सिनेमा एक उद्योग है और कोई भी उद्योग पहले अपना नफा देखता है और फिर बाजार में उतरता है। हमें हिन्दी सिनेमा का इस बात का शुक्रिया किया जाना चाहिए कि उसने भाषा के मामले में कोई समझौता नहीं किया। अनेकता में एकता हमारे हिन्दुस्तान की पहचान है और इस पहचान को बनाये रखने की जवाबदारी संचार माध्यमों की है। हिन्दी सिनेमा अपनी जवाबदारी पूरी शिद्दत के साथ निभा रहा है। शुक्रिया हिन्दी सिनेमा, शुक्रिया।
शुक्रवार, 31 अगस्त 2012
गांधी और अण्णा की चुनौतियां अलग अलग
मनोज कुमार
भारत देष में भ्रष्टाचार हमेषा से एक मुद्दा रहा है। समय समय पर इसके खिलाफ आवाज उठायी जाती रही है किन्तु यह आवाज व्यक्ति तक सीमित रहा है और यही कारण है कि इसका उतना प्रभाव देखने में नहीं मिला है। भ्रष्टाचार को भारतीय समाज में षिष्टाचार की संज्ञा दी गई है। इसके पीछे सोच यही थी कि भ्रष्टाचार नासूर बन गया है और इसका इलाज कोई नहीं कर सकता है। राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा बहुत पहले ही खत्म हो गयी थी। स्वाधीनता प्राप्त कर लेने के कुछ सालों तक सत्ताधारी दलों से उम्मीद की जाती थी कि उनके मंत्री या सदस्यों पर लगाये गये आरोपों की जांच के बाद उनके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी और यह उम्मीद बनी रही। राज्यों के विधानसभाओं में और लोकसभा में ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएंगे किन्तु आपातकाल के बाद सत्ता ने ऐसी करवट ली कि यह उम्मीद खत्म सी हो गयी है। सत्ताधारी दल अपने नेता और मंत्री के बचाव में सामने आने लगे हैं लोक मर्यादा की सारी सीमाओं को लांघ दिया गया। षायद यहीं-कहीं से भ्रष्टाचार को नाम मिला षिष्टाचार।
पराधीनता से स्वाधीनता और स्वाधीन भारत के एक सदी की यात्रा के कुछ साल गुजर जाने के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिये वयोवृद्ध अण्णा हजारे सामने आये। हजारे जी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो हल्ला बोला तो देष के घर घर से लोग साथ निकल पड़े। भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक उम्मीद की लौ जागी। लगा कि अब भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई बात बनेगी लेकिन यह कोरा सपना था। गांधीजी और अण्णा की चुनौतियां एकदम अलग अलग हैं। अण्णा की तुलना गांधीजी से की जाने लगी। उनकी सादगी में लोग गांधीजी का अक्स देख रहे थे और उनके मुद्दे को भी लोग गांधीजी से जोड़ कर देख रहे थे।
भ्रष्टाचार के खिलाफ अण्णा का कदम मौजू था। गांधीजी से उनकी तुलना बेमानी थी। उन्हें अण्णा ही रहने देना था। गांधीजी की लड़ाई अपनों से नहीं थी। वे अंग्रेजों से अपनों के लिये जूझते रहे और अण्णा को अपनों के लिये अपनों से ही लड़ना था। यह संकट अण्णा के लिये हजारों संकट से बड़ा था। के खिलाफ अण्णा का एजेंडा अपना था। वे सरकार और संसद से ऊपर की बात करने लगे थे। हम चाहे अपनी सरकारों के खिलाफ जितना मोर्चा खोलें, हल्ला बोलें लेकिन हम संविधान से ऊपर नहीं हो सकते हैं। अण्णा के साथ भ्रष्टाचार की लड़ाई में खड़े दूसरे सहयोगियों ने सभी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया था। बेलाग और असंसदीय षब्दों का उपयोग करने लगे थे। हद तो तब हो गयी जब एक युवा ने गुस्से में मंत्री पवार को चांटा जड़ दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बेहतरी का संकल्प तार तार होने लगा था। भ्रष्टाचार का मुद्दा एक तरफ होने लगा। यह बात आहिस्ता आहिस्ता अण्णा हजारे को समझ में आने लगी थी। दूसरी दफा जब वे फिर अनषन पर बैठे तो आंदोलन में जुटे लोग मीडिया से दो दो हाथ करने पर उतारू हो गये। मीडिया की ताकत को अण्णा समझते हैं और षायद यही कारण था कि उन्होंने कह दिया कि मीडिया के साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा तो वे आंदोलन खत्म कर देंगे। अण्णा सहयोगी इस बात को लेकर नाराज थे कि मीडिया उन्हें सरकार के निर्देष पर कव्हरेज नहीं दे रहा है। सच तो यह है कि इस आंदोलन से लोग खुद को किनारे कर रहे थे। आंदोलन में जिस भीड़ की उम्मीद ये लोग लगाये बैठे थे, वह नदारद थी।
अण्णा को समझ आ गया कि मामला अब नहीं सुलझने वाला। सरकार उनकी अनदेखी कर रही है। अण्णा को यह भी पता होगा कि सत्ता सम्हालने वाले डरपोक होते हैं और वे इतने ही चालाक भी कि जल्द ही भांप जाते हैं कि उनके खिलाफ हल्ला बोलने वाले में कितना दम है। पहली दफा अण्णा ने हुंकार भरी तो सरकार के पसीने छूट गये थे लेकिन अगली दफा उन्हें अण्णा से डर नहीं रहा। लगभग मैदान छोड़ देने की स्थिति में राजनीति दल बनाने के ऐलान के साथ अण्णा ने आंदोलन खत्म कर दिया। अक्टूबर जिसे आने में अभी पूरे एक माह से भी कुछ अधिक दिन का समय बाकि है, में पार्टी के बारे में बताने का ऐलान किया गया था। अचानक अण्णा के एक प्रमुख सहयोगी अरविंद केजरीवाल कोयला घोटाले को लेकर फिर धरना-प्रदर्षन के लिये पहुंच गये। इस बार अण्णा तो साथ थे ही नहीं, उनकी कोई खोज-खबर भी इसमें नहीं दिखी। उल्टे केजरीवाल ने किरण बेदी पर भारतीय
जनता पार्टी के प्रति नरम होने का आरोप जड़ दिया। स्वाभाविक है नाराज बेदी नहीं आयी। यही नहीं, आंदोलन के बिखराव का संकेत तब मिला जब लोग मैं अण्णा हूं कि जगह मैं केजरीवाल हूं की टोपी पहने दिखे। इस तरह एक उम्मीद टूट गयी। हालांकि इसका आभास पहले ही था लेकिन यह सब कुछ सच में इतनी जल्दी बदल जाएगा, इसकी अपेक्षा नहीं थी।
सही मायने में अण्णा अभी भी फेल नहीं हुए हैं, उनका भ्रष्टाचार विरोधी अभियान अभी भी कामयाब हो सकता है। जो तंत्र सड़-गल गया है, उसे ठीक करने में समय गंवाने के बजाय वे प्राथमिक षालााओं में जाएं। बच्चों को बतायें कि उन्हें क्या करना है। बचपन का मन कच्चे घड़े के समान होता है। उन्हें ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाएगा तो वे पूरे जीवन ईमानदार रहेंगे। वे आम आदमी को बतायें कि रेल में आरक्षण पाने के लिये रिष्वत न दें, गैस न मिले तो घासलेट के स्टोव से काम चलायें लेकिन रिष्वत की गैस से खाना न पकायें, वे महिलाओं को समझायें कि पति से रिष्वत के पैसों से सुख-सुविधा की मांग न करें, छोटी छोटी सुविधाओं का मोह त्यागकर रिष्वत देने और लेने के पाप से बचें। खेतों में बराबर पानी कैसे मिले, यह काम अण्णा बरसों से करते रहे हैं, उन्हें अपनी यह तकनीक देषभर के किसानों में बांटना पड़ेगी। अन्नदाता स्वयं के बूते पर मजबूत होगा तो भ्रष्टाचार होगा कैसे? सरकारों के सस्ते कर्जे से उन्हें उबारना होगा। आज कर्जे पाने के लिये किसान बेताब है और कर्ज देने के नाम पर भ्रष्टाचार की एक नई लकीर खींची जा रही है, इससे भला कौन नावाकिफ है। नतीजा किसानों द्वारा आत्महत्या।
अण्णा को पता ही होगा कि 2जी स्पेक्ट्रम, खेल घोटाला और कोयला में हाथ काले करने का खेल कुछ बार ही होता है लेकिन सौ दौ रूपयों की दलाली और रिष्वतखोरी से हिन्दुस्तान में रोज करोड़ों का भ्रष्टाचार होता है, इसे रोकना पहले जरूरी है। उसे खुद होकर दलाली और रिष्वत से बाहर आने के लिये प्रेरणा देना होगी। आम आदमी के भीतर विष्वास जगाना होगा। यह काम अण्णा हजारे जैसे लोगों को अकेले अकेले करना होगा। इस एकला चलो की यात्रा भी वातानुकूलित कार, रेल या हवाई यात्रा से नहीं होगी। सामान्य श्रेणी की रेल यात्रा करना होगी, बस में चलना होगा और कभी तो पैदल चल कर ही अलख जगाने का काम करना होगा। बात इससे भी पूरी तरह बन जाएगी, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है किन्तु जब हम गांधीवादी रास्ते पर चलने की बात करते हैं तो हमें उनके रास्ते पर चलना होगा। अण्णा को भी और उन सभी लोगों को जो भारत को एक बार सोने की चिड़िया के रूप में देखना चाहते हैं।
लेखक वरिष्ठ मीडिया विष्लेषक हैं
मंगलवार, 14 अगस्त 2012
करोड़पतिया गुमान
मनोज कुमार
ये लड़की गुमान से भरी हुई है। उसका गुमान हल्का नहीं है। करोड़ भर का गुमान है। करोड़पति बनाये जाने वाले अमिताभ बच्चन के कार्यक्रम में उसने एक करोड़ की राषि जीत ली है। कभी पिता की उपेक्षा से आहत आज की करोड़पतिया बेटी अपने पिता को उपेक्षा की नजर से देखती है। हिकारत भरी नजर से कहती है आपके घर लड़की हुई है। ये नजारा है उस टेलीविजन सीरियल का जिसे लोग अमिताभ बच्चन के कारण देखते हैं। अमिताभ की एक नयी सूरत इस सीरियल से बनी है। वह हर घर के सयाने बन गये हैं। लिहाजा उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे चरित्र निर्माण की ओर प्रतिभागियों और दर्षकों के बीच नींव खींचेंगे जिससे एक नई दुनिया की रचना हो सके। ताजा तरीन बल्कि अभी गर्भ में पल रहे प्रोग्राम के इस एपिसोड का उपरोक्त विज्ञापन सामाजिक मर्यादा को तार तार कर देता है।
आज की करोड़पतिया बेटीके जन्म लेने पर उसके पिता को बेटी हो जाने का अफसोस रहा होगा। जब उसने आंखें खोली होगी तो उसे इस बात का इल्म तो नहीं हुआ होगा। होष सम्हालने के बाद पिता के अफसोस से वह वाकिफ हुई होगी, यह जरूर है। पिता के अफसोस का उसे भी अफसोस रहा होगा। यह स्वाभाविक है। बेटे और बेटी के बीच के इस फकत अंतर को वह समझ नहीं सकी है। यहां भी कोई गलत नहीं है। समाज में बदलाव की बयार चल पड़ी है। पूरा बदलाव की यह बयार ही है कि कल जिस लड़की ने उपेक्षा झेली, आज वह कौन बनेगा करोड़पति प्रोग्राम में हिस्सेदारी कर रही है। पिता ने कभी बेटी के रूप में उसका तिरस्कार किया होगा। दोमुंहेपन से ही सही, पाला तो होगा। आज की यह करोड़पतिया बेटी किस तरह पली और इस मुकाम तक किस तरह पहुंची, मुझे नहीं मालूम लेकिन इतना समझ में आता है कि पिता की वह लाड़ली न सही, बेटी तो थी ही। पाला भी होगा, पढ़ाया भी होगा और इसी कारण आज वह इस प्रोग्राम का हिस्सा बन सकी है।
पिता के प्रति रोष स्वभाविक है किन्तु सार्वजनिक रूप से पिता को प्रताड़ित करने की इजाजत समाज नहीं देता है। दरअसल हमारे पिता ने जो गलती की है, उसे हम सुधार नहीं सकते किन्तु हम अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं करें, यह सीख ही बदलाव का संकेत है। इस करोड़पतिया बेटी को एक करोड़ जीत जाने का गुमान दिखता है, जबकि यह जीत उसमंे विनम्रता का भाव ला सकती थी। वह और लोगों के लिये उदाहरण बन सकती थी कि पिता की बेरूखी के बाद भी उसने कामयाबी पायी है। भारतीय समाज हमेषा से बेटियों के साथ होने वाले सौतेले व्यवहार से आहत रहा है। पुरातन परम्पराओं और रूढ़ियों पर चोट करते हुए नयी परम्परा षिक्षा के साथ लिखी जा रही है। यह उम्मीद, यह आस समाज में जागी है कि अब बेटियां अपने पैरों पर खड़ा हो सकेंगी। बेटे और बेटियों का अंतर मिट जाएगा। समाज के माथे पर लगा कलंक मिटाना जरूरी है।
मैं स्वयं भी एक बेटी का पिता हूं। उसे लाड़ली कहता हूं और उसी स्नेह के साथ उसका पालन-पोषण कर रहा हूं तो यह मेरी जवाबदारी है। मेरे बड़े और छोटे भाई की भी एक एक बेटी है। हमारा पूरा परिवार इन पर गर्व करता है। हमारी कोषिष है कि हम जो स्नेह अपनी बेटियों को दे रहे हैं, वह दायित्व नहीं बल्कि परम्परा बने। पिता अपना दायित्व निभाये और बेटियां विनम्रता के साथ अपना रिष्ता। आज करोड़पतिया बेटी के गुमान ने जाने कितनों को आहत किया होगा। यकिन करना होगा कि बदलाव की बयार के लिये गुस्सा नहीं विनम्रता चाहिए क्योंकि विनम्रता भारतीय समाज की परम्परा है।
शुक्रवार, 3 अगस्त 2012
हाय रे, हॉकी, यही है तेरी किस्मत
मनोज कुमार
बापू और हॉकी का हाल एक जैसा हो गया है। सूचना के अधिकार के तहत कुछ महीने पहले जानकारी मांगी गयी थी कि किस कानून के तहत महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की पदवी दी गयी है तो भारत सरकार ने खुलासा किया था कि महात्मा गांधी को इस तरह की कोई पदवी नहीं दी गई है। अब हॉकी को लेकर भारत सरकार के मंत्रालय ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से मना कर दिया है। यह खुलासा भी सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी में हुआ है। हॉकी को भारत में किसी खेल की तरह नहीं लिया जाता है बल्कि इस खेल के साथ हमारी अस्मिता को जोड़ कर देखा जाता है। बिलकुल उसी तरह जिस तरह कोई कानून महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता माने या न माने भारत और पूरा संसार उन्हें राष्ट्रपिता कहने में स्वयं गर्व की अनुभूति करता है। स्वाधीनता के छह दषक गुजर जाने के बाद आज जब हमंे यह पता चलता है कि हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा ही नहीं है तो यह हम सबके लिये षर्मनाक है। दुर्भाग्यजनक है कि छह दषक गुजर जाने के बाद भी हम हॉकी को कानूनन राष्ट्रीय खेल घोषित नहीं कर पाये।
खेलों के विकास के लिये राष्ट्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक लगातार कोषिषें हो रही हैं। हर साल करोड़ों रुपये स्वाहा किये जा रहे हैं लेकिन हमारा खेल का स्तर सुधर नहीं सका है तो ऐसी जानकारियां इसके बुनियाद में हैं। स्मरण रखा जाना चाहिए कि जिन खेलों को हाषिये पर रखा गया है उनमें एक हॉकी भी है। हॉकी पैसों के लिये नहीं देष के लिये खेला जाता है। यह अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि हॉकी को सम्मान दिलाने के लिये और हॉकी खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने के लिये केन्द्र सरकार क्या कर रही है अथवा नहीं कर रही है। फिलवक्त तो हॉकी का राष्ट्रीय खेल नहीं होने का यक्ष प्रष्न हमारे सामने है। हॉकी खिलाड़ियों को पर्याप्त खाना नहीं देना, वेतन भत्ते के लाले, खिलाड़ियों के नाम पर अफसरों का जेब गर्म होने की खबरें यदा-कदा आती रही हैं। खेल और खिलाड़ी की चिंता किसी को नहीं रही है। यदि ऐसा होता तो आज हॉकी को राष्ट्रीय खेल होने का गर्व हासिल होता और हम भारतीय गर्व से कहते कि हॉकी हमारी षान है। बदकिस्मती से हमारा सिर षर्म से झुक गया है।
मध्यप्रदेष इस बात के लिये षाबासी का हकदार है कि उसने हॉकी को उसका सम्मान दिलाने और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिये हरसंभव प्रयास किया है। अभी हो रहे ओलंपिक खेलों में हॉकी में मध्यप्रदेष का षिवेन्द्र इस बात का उदाहरण है। मध्यप्रदेष सरकार हॉकी के बेहतरी के लिये जो उपक्रम कर रही है, उसकी न केवल देषव्यापी सराहना हुई है बल्कि हॉकी खिलाड़ियों को इस बात का संतोष है कि कोई सरकार तो है जो हॉकी को बचाने में जुटी हुई है। भोपाल कभी हॉकी की नर्सरी कहलाता था। विष्वमंच पर भोपाल से जितने बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी मध्यप्रदेष ने दिये, वह हॉकी के इतिहास का स्वर्णिम पन्ना है। एक बार फिर हॉॅकी के मैदान में मध्यप्रदेष की दुदुंभी बजे, इस बात का प्रयास राज्य सरकार कर रही है। एस्टो टर्फ का बिछना और हरसंभव मदद के लिये आगे आना, इस बात का संकेत है।
बहरहाल, भारत सरकार ने हॉकी को राष्ट्रीय खेल मानने से इंकार किया है, उसे महज एक सवाल का जवाब मानकर नहीं टाला जा सकता बल्कि इसके लिये उन तथ्यांे और तर्कों की खोज करना होगी कि आखिर हॉकी को अब तक राष्ट्रीय खेल का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सका है। हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिलाने के लिये देषव्यापी अभियान चलाने की जरूरत होगी और भारत सरकार पर दबाव बनाना होगा। हॉकी अब तक काननून भले ही राष्ट्रीय खेल नहीं बन सका हो किन्तु हॉकी हर भारतीय के लिये राष्ट्रीय खेल का ही महत्व रखता है।
बुधवार, 1 अगस्त 2012
बिटिया अब नहीं जाती है पीहर
मनोज कुमार
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिंग हुई है. बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए. पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी. क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है. कोसों का फासला खत्म सा हो गया है. जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू. न आने जाने की परेशानी और न साज समान की. अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं. उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है. कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं. पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं.
मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है. किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था. पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था. रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था. परिवार में ताजगी का अहसास होता था. इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा. एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है. जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था. उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी. कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी. बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती. उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है.
रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है. पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती. पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते. पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता. जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है. पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है. अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था. बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है.
रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर. महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है. रोज मां से खबर मिल जाती है. क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है. ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है. जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी. कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया. मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया. बिटिया अब नहीं जाती है पीहर.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता
लिव-इन रिलेशनशिप : स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता प्रो. मनोज कुमार लिव-इन रिलेशनशिप क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इस...
-
-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
-
समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
-
मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...
