बुधवार, 29 मई 2013

ऐसे भी थे पत्रकार


 manoj kumar
साथियों, हिन्दी पत्रकारिता दिवस के इस महान अवसर को स्मरण करते हुये आप सभी प्रतिबद्ध साथियों को मेरा नमस्कार, बधाई.  हिन्दी पत्रकारिता दिवस के ठीक दो दिन पहले मुझे एक अनुभव से गुजरने अवसर मिला. इस अनुभव को आपके साथ बांटने में मुझे आनंद का अनुभव होगा.

भोपाल में अपने जमाने की तेवर वाली पत्रकार श्रीमती प्रभा वेताल से लगभग सभी लोग परिचित होंगे. उनके समकालीन लोगों को तो वे स्मरण में होंगी ही. मैं जब रायपुर से भोपाल पत्रकारिता करने आया तो उनका नाम कई कई बार सुना. उनके बारे में जो सुना तो कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि उनके बारे में बतायी गयी सारी बातें नकरात्मक थीं. मेरी आदत है कि जब तक मैं स्वयं अनुभव नहीं कर लूं, किसी के कहे पर यकिन नहीं करता. आज शायद यह आदत मेरे लिये लाभकारी रही. एक पुराने पत्रकार, जिनका प्रभाजी के साथ थोड़ा-बहुत उठना-बैठना था. बात ही बात में उनके बारे में कहने लगे-एक प्रभा भाभी थीं. कभी कोई गलत काम नहीं किया और न ही किसी प्रकार का कोई गलत लाभ लिया. इस संदर्भ में उन्होंने एक वाकया सुनाया. 

प्रभाजी की एक आंख में कोई बड़ी समस्या थी. मामला आंख के रिप्लेसमेंट तक का था. उन दिनों इसका खर्च भारी था. उन्होंने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह के समक्ष अपनी समस्या रखी. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे पैसों की चिंता न करें, वे उनकी मदद करेंगे. इस पर प्रभाजी का जवाब था- मदद आपसे नहीं, जनसम्पर्क में पत्रकार निधि है, उससे दिलवा दीजिये. मुख्यमंत्री ने हामी भरी और मदद मंजूर हो गयी. इस बीच किसी महिला ने नेत्रदान करने की घोषणा की थी और उसकी मृत्यु हो गई. उसकी एक आंख प्रभाजी को मिल गयी. आंख बदलवाने से लेकर अन्य खर्च को मिलाकर कुल जमा दस हजार का खर्च आया. प्रभाजी ने बचे दस हजार रूपये उस महिला के परिवार वालों को दे दिये. कुछ उनके शुभचिंतकों ने ऐसा करने पर ऐतराज जताया तो प्रभाजी ने कहा कि मैं उस महिला की आंख से देख रही हूं तो उस परिवार को देखने की मेरी नैतिक जवाबदारी है. इसलिये बचे दस हजार पर तो उनका ही हक बनता है.

यह संस्मरण मुझे भीतर तक कंपकंपा गया. इतनी नैतिकता? यकिन नहीं होता लेकिन वाकया सुनाने वाला कोई हल्का आदमी नहीं था. उन्होंने बेहद निरपेक्ष भाव से उनके बारे में जब बताया तो मेरा मन प्रभाजी को लेकर श्रद्धा से भर गया. शायद तभी कहते हैं कि पहले की पत्रकारिता असरदार होती थी. संयोग है कि आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है और इस अवसर पर प्रभाजी के बारे में यह संस्मरण आप लोगों के साथ बांटकर मैं खुद को बेहद आनंदित महसूस कर रहा हूं. मेरे नये साथियों को मुफ्त की सलाह यह है कि बिना परखे किसी के बारे में कोई राय न बनायें. सुनें और गुनें, तब उस पर कोई बात करें. 

प्रभाजी को मेरा सादर नमस्कार.

शनिवार, 25 मई 2013

अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 भोपाल में

           तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 का उद्घाटन जनजातीय संग्रहालय भोपाल में आयोजित होगा। 10 जून से 13 जून तक आयोजित फिल्म समारोह में भारत सहित 33 देश हिस्सेदारी कर रहे हैं। इस फिल्म समारोह में 70 से अधिक फिल्मों का प्रदर्षन किया जाएगा। आदिम जाति कल्याण विभाग का प्रतिष्ठान वन्या का प्रतिष्ठा आयोजन तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 में फिल्मों का प्रदर्शन जनजातीय संग्रहालय एवं राज्य संग्रहालय में किया जाएगा।

          उल्लेखनीय है कि वन्या द्वारा तीसरी दफा फिल्म समारोह का आयोजन किया जा रहा है। 10 जून को तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह-2013 का उद्घाटन होगा और इसके बाद 13 जून 2013 तक फिल्मों का प्रदर्षन किया जाएगा। प्रबंध संचालक श्री तिवारी के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह के आयोजन का उद्देश्य संसार भर के जनजातीय समाज की जीवन शली, परम्परा, संस्कृति एवं संस्कार से लोगों का परिचय कराना है। वन्या ने प्रथम अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन इंदौर में किया था। इसके पष्चात द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन भोपाल में किया गया था। वन्या का गरिमामय तृतीय अंतर्राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म समारोह का आयोजन किया जा रहा है।

रविवार, 19 मई 2013

कलम की विनम्रता



मनोज कुमार

   तीस मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं। ये दिवस बेहद अर्थवान हैं, खासकर पत्रकारिता के लिये। यहां मैं मीडिया शब्द से परहेज करने की कोशिश करूंगा क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया का अर्थ पत्रकारिता से एकदम जुदा है। बहरहाल, हम पत्रकारिता के संदर्भ में बात करेंगे।  दादा माखनलाल की विष्व प्रसिद्व रचना है पुषप  की अभिलाषा । इस कविता में उन्होंने फूल की विन्रमता का बखान किया है और इससे जुड़ी बात कलम की मैं कहता हूं। कलम भी आपको विनम्रता सिखाती है। आप देखेंगे कि आमतौर पर कलम नीचे की तरफ होती है अर्थात वह विनम्र है। पत्रकारिता भी विनम्रता सिखाती है और विनम्र पत्रकारिता ही दुनिया बदलने की ताकत रखती है। तलवार नीचे की तरफ होगी तो वह भीरूपन का परिचायक होगी किन्तु कलम ऊपर की तरफ होगी तो उसकी अकड़ दिखेगी। क्या कलम अकड़ दिखा सकती है? नहीं, कभी नहीं। कलम की प्रकृति रचने की है, सिखाने की है और रचियता हमेषा विनम्र होता है। जो लोग आस्तिक नहीं हैं वे भी इस बात को मानेंगे कि ईष्वर, अल्लाह, ईषु, गुरूनानक किसी ने भी, कहीं भी विनयशील व्यवहार के अलावा कोई सीख नहीं दी है। 

जब हम यह मानते हैं कि कलम विन्रम है तो भला हममें विनम्रता क्यों नहीं आना चाहिए। पत्रकारिता का दायित्व समाज के किसी भी दायित्व से बड़ा है। दूसरे दायित्व कम नहीं हो सकते हैं किन्तु उनमें कहीं न कहीं, लाभ की लालसा बनी होती है किन्तु पत्रकारिता में लाभ का कोई लोभ नहीं होता है। पत्रकारिता सहज रूप् से एक सुंदर, विचारवान और विकसित समाज की रचना करने की कोषिष है। कुछ लोग इस बात को हजम नहीं कर पाएंगे कि आज जब चौतरफा पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात चल रही है, कदाचित प्रमाणित भी हो चुकी है तब मेरा यह कहना केवल काल्पनिक बातें हो सकती हैं। मेरा उन सभी लोगों से आग्रह है कि वे इसे दूसरी नजर से देखें। पत्रकारिता तो आज भी नफा-नुकसान से परे है। आप एक पत्रकार हैं तो आप खबर लिखते हैं समाज के लिये किन्तु जिस कागज पर खबर छपती है वह वस्तु है और वस्तु का सौदा होता है। आपकी लिखी खबर षब्द सत्ता है और इसकी कोई कीमत नहीं होती है। पत्रकार का लाभ इतना ही होता है कि उसे जीवनयापन के लिये वेतन के रूप् में कुछ हजार रुपये मिल जाते हैं। यदि आप और हम पत्रकार नहीं भी होते तो किसी और व्यवसाय में भी यही करते। संभवतः इसलिये ही हमें श्रमजीवि कहा जाता है क्योंकि श्रम ही हमारे जीवन का आधार है। हम सरस्वती के उपासक हैं और हमारी उपासना का माध्यम हमारी कलम है। इस कलम की विन्रमता देखिये कि यदि इसे आप सीधा कर देते हैं तो यह लिखने का उपक्रम रोक देती है किन्तु जैसे ही यह झुकती है, वह नदी के पानी की तरह बहने लगती है। हमारे विचार और कलम की स्याही एक सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। 

मेरा यह विचार महज एक लेख नहीं है बल्कि एक आग्रह है उस युवा पत्रकार पीढ़ी से जो इस महायज्ञ में षामिल तो हो गये हैं किन्तु उन्हंे अपनी ताकत का अहसास नहीं है। वे हर समय भ्रम की स्थिति में रहते हैं। अच्छा लिखना जानते हैं, अच्छा सोचते हैं और अच्छा करने का जज्बा भी उनमें है किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं है  िकवे फकीरी के पेषे में आये हैं। वे लिखेंगे तो समाज और देष में षुचिता का निर्माण होगा और उनके इस लिखे से अखबार का मालिक कदाचित मालामाल बनेगा। षुचिता और माल के बीच हमारी नयी पीढी को तय करना होगा कि वे आखिर उनका रास्ता क्या हो? वे माल की तरफ भागें या समाज में षुचिता के लिये जो जवाबदारी उनके कंधों पर है, उसे पूरा करें। इस बात को लिखने में मुझे परहेज नहीं है कि हममे से अनेक दिग्गज पत्रकार भावी पीढ़ी में कलम का संस्कार उत्पन्न करने के बजाय कमाने की संस्कृति पैदा कर रहे हैं। भावी पत्रकारों को इस गफलत में नहीं पड़ना चाहिए। हमें महान पत्रकार दादा माखनलाल की पत्रकारिता को, गांधीजी की पत्रकारिता को स्मरण में रखकर कलम के संस्कार को आगे बढ़ाना है। झुकने का अर्थ समझौता नहीं है बल्कि यह विनम्रता है और पत्रकारिता विनम्रता की पहली सीढ़ी है। पत्रकारिता के अवधूतों के प्रसंग में जो बातें लिखी हैं, वह मेरी भावना है और मेरा विष्वास है कि कलम के संस्कार की पत्रकारिता हमेषा अपनी आभा बिखरेते रहेगी।

रविवार, 5 मई 2013

ना डरना लाडो इस देस मे



-मनोज कुमार

मेरे घर की दो नन्हीं परी स्कूल में गर्मी की छुट्टी लगने के बाद से बहुत ज्यादा व्यस्त हो गई हैं. आने वाली 13 तारीख को अक्षय तृतीया है और इन दोनों को अपनी बेटियों के ब्याह की चिंता लगी हुई. उनके कपड़े कैसे सिये जाएंगे, गहने कौन से पहनाया जाये, खाने में क्या बनेगा और मेहमानों में किस किस को बुलाया जाय आदि-आदि की चिंता में दुबली होती जा रही हैं. इन दोनों की चिंता देखकर बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं. अम्मां और अम्मां के बाद बड़ी भाभी पूरे उत्साह के साथ घर पर पूजन की व्यवस्था करतीं. मिट्टी से तैयार किये गये गुड्डे और गुडिय़ा का ब्याह किया जाता. इसी में मंगल कामना की जाती कि घर में जवान होती बिटिया का ब्याह अगले बरस इसी मंडप में कर दिया जाये. बड़ा मजा आता था. सत्तू खाने को मिलता और शायद थोड़ा-बहुत नजराना भी.  आज अपनी परियों को चिंता में रहकर तैयारी करते देख मन खुश हो रहा है. कुछ चिंता भी है तो इस दिन की उस रूढि़वादी परम्परा का जो हमें हर बरस शर्मसार करती हैं. 

अक्षय तृतीया का यह पर्व शहरी इलाकों के लिये तो शायद एक पर्व होता है किन्तु देहाती इलाकों में बसे मासूमों के लिये किसी दुर्भायजनक दिन. अनजाने में, अनजाने रिश्तों से गांठ बांधने की रस्म इस विश्वास के साथ की जाती है कि इससे रिश्ते मजबूत होते हैं. जिनका देह कच्चा हो और मन समझने लायक भी न हो, उस रिश्ते के पक्केपन की बात एक दिमागी बीमारी ही हो सकती है. भारतीय समाज कई जगहों पर पिछड़ा है तो अनेक स्थानों पर समाज सुधारकों ने गलतियों को सुधारने के लिये पूरा इंतजाम कर रखा है. शारदा एक्ट इसी का उदाहरण मात्र है. यह ठीक है कि कानून का पालन हमें ही कराना है लेकिन मुश्किल तब खड़ी हो जाती है जब कानून पालन करने वाले ही इस पाप के भागीदार बनने के लिये आगे आ जाते हैं. पहले का अनुभव रहा है कि वोटपकाऊ नेता बालविवाह में शरीर होते रहे हैं और शायद इस बार भी वे मोह न छोड़ पायें. 

अक्षय तृतीया भारतीय समाज और संस्कृति का एक पावनपर्व है और इसकी मीमांसा अलग से समझी जा सकती है लेकिन इसकी आड़ में नादान बच्चों के ब्याह का जो खेल खेला जाता है, उसे समझने और सुधारने की दरकार हम सभी को है. बीते समय में भारतीय समाज जिस दंश से गुजर रहा है, वह पीड़ादायक है. प्रति दिन अनाचार की दिल दहला देने वाली खबरें आ रही हैं. सभी सहम गये हैं. डर सता रहा है. लगता है कि जाने अब क्या घट जाये. डर लगना अस्वाभाविक नहीं है लेकिन डर अकेला इस बीमारी का इलाज नहीं है. जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों, खासकर बेटियों को जितना ज्यादा शिक्षित करेंगे, उनके भीतर आत्मविश्वास भरेंगे, उतनी ही तेजी से हम अनाचारियों से निपट सकेंंगे. ना आना लाडो इस देस में लिखने, बोलने और बताने के बजाय ना डरना लाडो इस देस में प्रचारित करेंगे तभी हमारा कल महफूज रह पायेगा. नकरात्मक विचार हमेशा डर को बढ़ाता है और डरना हम भारतीयों को नहीं आता है. रानी लक्ष्मीबाई इस बात का हमारे सामने उदाहरण है कि कैसे वो अपने दुश्मनों से अकेले निपट सकती है. जिस देश में लक्ष्मीबाई की विरदावली गायी जाती हो, उस देश में लाडो को आने से कौन रोक सकता है..? बस, इस बार अक्षय तृतीया पर किसी लाडो को न भेजना पराया घर रे..

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

श्रमिक आंदोलन की धुंधली होती चमक



-मनोज कुमार
हम मेहनतकश जब भी अपना हिस्सा मांगेंगे, एक खेत नहीं, एक गांव नहीं, पूरी की पूरी दुनिया मांगेंगे... जैसे गीत अब नेपथ्य में चले गये हैं. हममें से बहुतों को तो याद भी नहीं होगा कि 1 मई का महत्व क्या है? हमें तो यह भी स्मरण करना पड़ेगा कि आखिरी श्रमिक आंदोलन कहां और कौन सा था? समय परिवर्तन के साथ जैसे पूरा समाज कॉर्पोरेट के चंगुल में फंसता चला गया वैसे ही श्रमिक आंदोलन की चमक भी धुंधली पड़ती जा रही है. एक समय था जब उद्योगपतियों को कद्दावर श्रमिक नेताओं के नाम से ही पसीना छूट जाता था लेकिन अब सरकारें जिस गति से उद्योग लगाने पर जुटी हुई हैं तो इसका एक कारण श्रमिक आंदोलन की चमक का खो जाना भी है. एक समय था जब छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी की आवाज की गूंज पूरे देश में सुनायी देती थी और तब उद्योगपति एवं श्रमिकों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी. नियोगी की मौत के बाद तो जैसे श्रमिक आंदोलन को सांप सूंघ गया हो. ऐसा भी नहीं है कि श्रमिक अपने हक के लिये लड़ नहीं रहे हैं लेकिन उनकी आवाज को बुलंद करने वाला कोई नायक अब दिखाई नहीं देता है. यह हकीकत है और इसे मंजूर करना चाहिये.  जो संगठन या राजनीतिक दल श्रमिक आंदोलन की आवाज उठाने का दम भरते हैं, उनकी सचाई भी किसी से छिपी नहीं है. मुझे याद पड़ता है कि लगभग दो दशक पहले मेरी मुलाकात ताराचंद वियोगी जी से हुई थी. श्रमिकों को लेकर उनसे अनेक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई थी. अब वियोगीजी भी सक्रिय नहीं जान पड़ते हैं. 

श्रमिक आंदोलन को मीडिया भी समर्थन देता रहा है लेकिन अब मीडिया का रूख भी श्रमिक आंदोलन को लेकर बहुत सक्रिय नहीं है. ऐसा नहीं है कि मीडिया में श्रमिक आंदोलन खबर नहीं बनती है. सच तो यह है कि मीडिया में श्रमिक आंदोलन केवल खबरों तक है. इसके बाद की भूमिका से मीडिया नदारद है. श्रमिक आंदोलन की सफलता और विस्तार में मीडिया की भूमिका हमेशा से रही है किन्तु वही कॉर्पोरेट सेक्टर ने मीडिया को भी श्रमिक आंदोलन से परे कर दिया है. अब मीडिया का फोकस श्रमिक आंदोलन पर नहीं रहा क्योंकि मैनजमेंट को लगता है कि इससे उनके व्यवयास पर आंच आयेगी. आज की स्थिति में हर मीडिया ग्रुप विभिन्न व्यवसाय कर रहा है और श्रमिक आंदोलन में मीडिया का समर्थन का सीधा अर्थ होगा अपने ही गु्रप के बिजनेस को नुकसान पहुंचाना. ऐसी स्थिति में कोई भी मीडिया गु्रप नहीं चाहेगा कि उसके हित जख्मी हों.
श्रमिक आंदोलन की मरणासन्न स्थिति से सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता है. श्रमिक आंदोलन के कारण ही उद्योगपतियों को मजबूरी में ही सही, सामाजिक कल्याण के कार्यों में सहयोग करना पड़ता था. मजदूरों को उनका वाजिब हक मिलता था और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर बढ़ते थे. पूरे देश की राज्य सरकारें अधिकाधिक औद्योगिकरण पर जोर दे रही हैं. उद्योगों के लिये पलक-पांवड़े बिछा दिये गये हैं. रियायतों को पिटारा खोल दिया गया है. एक तरह से राज्य सरकारें उद्योगपतियों के समक्ष शरणम गच्छामी की स्थिति में हैं तो दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को रोजगार देने की तरफ कोई पक्का रास्ता नहीं तलाशा जा रहा है. श्रमिक आंदोलनों की कमजोर होती स्थिति ने बेरोजगारी को बढ़ाया है और उद्योगपति अपनी सुविधा से लोगों को काम दे रहे हैं. कम मजदूरी पर ज्यादा काम लेेने की दृष्टि से दूसरे प्रदेशों के बेरोजगारों को काम मिल रहा है और स्थानीय मजदूर आज भी खाली हाथ बैठा है.

1 मई को एक बार फिर मजदूर दिवस की औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी. कुछ श्रमिक संगठन और कुछ राजनीतिक दल मगरमच्छी आंसू बहाकर श्रमिकों की दशा सुधारने की बात कहेंगे. इस दिन के गुजरने के साथ ही साथ वे भूल जाएंगे कि मजदूरों के हक के लिये उन्हें लडऩा है. मजदूर की नियती है कि वह लड़ते लड़ते अपना जीवन त्याग देगा लेकिन दो जून की रोटी उसे नसीब नहीं होगी. वह गीत गाता रहेगा जब भी मांगेंगे.. एक खेत नहीं.. एक गांव नहीं.. पूरी की पूरी दुनिया मांगेंगे.. मजदूर को यह सच भी पता है कि न तो उसे मांगने का अवसर मिलेगा और न ही दुनिया.. दो जून की रोटी और तन ढक़ने के लिये कपड़ा ही मिल जाये तो मजदूर दिवस सार्थक हो जाएगा. फिलहाल श्रमिक आंदोलन की गुम होती रोशनी में मजदूर के लिये कोई सुबह नजर नहीं आती है.

रविवार, 14 अप्रैल 2013

यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर पर शोध पत्रिका समागम का नया अंक





भोपाल.  हिन्दी पत्रकारिता के यशस्वी सम्पादक राजेन्द्र माथुर का स्मरण करते हुये शोध पत्रिका समागम का नया अंक जारी कर दिया गया है. 9 अप्रेल को राजेन्द्र माथुर की पुण्यतिथि पर शोध पत्रिका समागम का यह अंक  मुकम्मल अंक जारी किया गया. राजेन्द्र माथुर मध्यप्रदेश के हैं और उन्होंने अपनी लेखनी से हिन्दी पत्रकारिता को नया मुकाम दिया था. राजेन्द्र माथुर के उल्लेख के बिना हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास अधूरा ही रह जाता है. इन दिनों जब हिन्दी पत्रकारिता सवालों से घिरी है तब राजेन्द्र माथुर का स्मरण करना स्वाभाविक सा है. राजेन्द्र माथुर की हिन्दी पत्रकारिता को यशस्वी बनाने के लिये किये गये  प्रयासों में वर्तमान समय में उठ रहे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश शोध पत्रिका समागम ने की है. 


शोध पत्रिका समागम के इस नये अंक में राजेन्द्र माथुर के साथ लम्बे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपना अनुभव साझा किया है. श्री बादल ने विस्तार से राजेन्द्र माथुर की कार्यशैली एवं उनकी दूरदृष्टि पर चर्चा की है. एक अन्य आलेख में वरिष्ठ पत्रकार पुण्यप्रसून वाजपेयी ने वर्तमान हालात पर चिंता करते हुये लिखा है कि आज के समय में राजेन्द्र माथुर के लिये गुंजाईश ही कहां शेष है. कुछ अन्य आलेखों के साथ राजेन्द्र माथुर की राजनीतिक दृष्टि पर एक शोध पत्र भी है.  एक अन्य आलेख में आधुनिक टेक्रॉलाजी का जिक्र करते हुये लिखा है कि राजेन्द्र माथुर सरीखे पत्रकार की मुश्किल से एक तस्वीर हाथ लगेगी लेकिन उनका लिखा पढऩे के लिये एक उम्र की जरूरत होगी. राजेन्द्र माथुर पर केन्द्रित यह अंक पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये विशेष उपयोग का है. 

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

ननिहाल की यादे


मनोज कुमार
          यदि आपकी उम्र चालीस के पार है तो आपके पास अपने ननिहाल की मीठी यादें आपके जेहन में इठला रही होगी लेकिन आपकी उम्र 30 के पहले की है तो आपके पास ननिहाल के मौज की कोई खुश्नुमा यादें साथ नहीं होगी क्योंकि आपकी डायरी में 30 अप्रेल दर्ज होगा नहीं होगा. 30 अप्रेल का दिन हमारे लिये तब खास दिन हुआ करता था. महीना और डेढ़ महीना इंतजार करने के बाद इस तारीख पर परीक्षा परिणाम आना तय होता था. चिंता और इंतजार परीक्षा परिणाम का नहीं होता था बल्कि चिंता थी कि जैसे ही छुट्टियों का ऐलान हो और हम भाग लें ननिहाल की तरफ. ननिहाल मतलब बेखौफ मस्ती के दिन. अमराइ जाकर गदर करने का दिन. रात में सब भाई-बहन मिलकर कभी लडऩे और रूठने मनाने का दिन. अब ये बातें बस किताबों में उसी तरह रह गई हैं जैसे कभी कोई शायर अपनी मोहब्बत बयां करता था. 

        अब 30 अप्रेल की तारीख  कैलेण्डर में तो जरूर मौजूद है लेकिन जीवन से गायब हो गया है. अब 30 अप्रेल की जगह 30 मार्च आती है. एक डरावनी तारीख की तरह. इस दिन भी परीक्षा परिणाम की घोषणा होती है लेकिन भय पैदा करने वाली. नम्बरों की दौड़ इस दिन हर स्कूल में आप साफ साफ देख सकते हैं. दो-पांच नम्बरों से पीछे रह जाने का गम भी आज के बच्चों के लिये इतना बड़ा होता है कि वे अपना जीवन गंवाने से भी पीछे नहीं हटते हैं. नम्बरों की दौड़ में जीवन की हार का यह सिलसिला बढ़ चला है. 30 मार्च से ही शुरू हो जाता है बच्चों के मन में तनाव और इनसे कहीं ज्यादा शिकार होते हैं मां-बाप. दुकानों में लगी लम्बी कतारों में खड़े होकर घंटों बाद मिलने वाली कापी-किताबें और फीस की मोटी सी किताब. सब कुछ निचुड़ सा जाता है. इसके बाद बच्चों की पेशानी पर होती है चिंता की लकीरें. एक अप्रेल से फिर स्कूल जाने का तनाव. अप्रेल में सूरज की तपन बढ़ती जाती है और इसी के साथ बच्चों की परेशानी. जैसे तैसे महीना गुजरता है और सवा-डेढ़ महीने के लिये स्कूलों में छुट्टी हो जाती है. छुट्टी के पहले ही प्रोजेक्ट के नाम पर इतना काम दे दिया जाता है कि छुट्टी की खबर पाकर वे खुश होने के पहले ही उदास हो जाते हैं. बच्चों के साथ यह हालत मां-बाप की भी होती है क्योंकि प्रोजेक्ट बच्चों के लिये होता है किन्तु वर्क मां-बाप को करना पड़ता है. 

       आज बच्चों की हालत को देखकर समझ में नहीं आता है कि इनका बचपन कहां गुम हो गया है? हम तो बच्चे से होकर बड़े हुये हैं और ये बच्चे सीधे बड़े हो रहे हैं. इनके पास न तो दादा-दादी और नाना-नानी की मीठी यादें हैं और न साथ में बचपन की वो शरारतें जो इन्हें क्रियेटिव बनाये. कम्प्यूटर के सहारे, वीडियो गेम केे सहारे बड़े होते इन बच्चों के पास अपनी पीढ़ी को देने के लिये कुछ नहीं है. यदि है तो यह बताने के लिये कि कभी किसी से पिछडऩा नहीं है, रेस लगी है दौड़ जाओ और जितनी तेजी से भाग सकते हो, भाग लो. बचपन को मत जियो और शायद किशोरवय भी नहीं. किसी लडक़ी को बसा कर, किताबों को दिल से लगाकर याद करने का समय नहीं है. दिल ही तो है और यह दिल किसी पर आ गया तो ई-मेल कर दो या एसएमएस ठोंक दो. जवाब मिला तो ठीक नहीं तो दूसरी गाड़ी पकड़ लो. दुनिया मुठ्ठी में कर लो तो बच्चों ने सीख लिया है लेकिन 30 मार्च के बच्चों के पास 30 अप्रेल की खुशी मिनट भर के लिये नहीं है. मन करता है कि काश! मैं अपने बच्चों को 30 अप्रेल की अपनी खुशी दे सकता लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है क्योंकि हम इक्कसवीं सदी में जी रहे हैं, कैसे लौटें पीछे और पीछे...


अहा! सच में अहा

  अहा! सच में अहा देश की सुपरिचित पत्रिका ",अहा! ज़िंदगी" में छपना हमेशा से उत्साहित करता रहा है। कोई चालीस साल पहले "धर्मयु...