भोपाल। रिसर्च जर्नल ‘समागम’ ने अपने निरंतर प्रकाशन के 17 वर्ष पूर्ण कर लिया है. 17वें साल का आखिरी अंक जनवरी-2018 का महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज एवं विवेकानंदजी के शिकागो भाषण के सवा सौ साल पूर्ण होने पर केन्द्रित है. फरवरी 2018 में ‘समागम’ रेडियो पर केन्द्रित होगा और यह अंक 18वें वर्ष का प्रथम अंक होगा. इस आशय की जानकारी सम्पादक मनोज कुमार ने दी है. समाज, मीडिया एवं सिनेमा के अंतर्संबंध पर केन्द्रित मासिक रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने अपनी स्वीकृति प्रदान की है. रिसर्च जर्नल ‘समागम’ को यूजीसी ने मीडिया केेटेगिरी में शामिल किया है. ‘समागम’ का हर अंक विषय विशेष पर केन्द्रित होता है. ‘समागम’ के परामर्श मंडल में विद्वतजनों का सहयोग है तथा शोधार्थियों एवं शिक्षकों का निरंतर सहयोग मिलता रहा है. देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे, हंस एवं अन्य प्रमुख प्रकाशनों ने ‘समागम’ को सराहा है. हिन्दी सिनेमा के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर ‘समागम’ ने लगातार दो अंक का प्रकाशन किया जिसमें भाषायी सिनेमा पर शोध पत्रों का प्रकाशन किया गया. ‘समागम’ 18वें वर्ष में संचार के प्रमुख माध्यम रेडियो पर अपना पहला अंक केन्द्रित कर रहा है. ‘समागम’ की व्यक्तिगत आजीवन सदस्यता 1500/- रुपये में दी जा रही है. साथ ही मानक को पूर्ण करने वाले शोध पत्रों का प्रकाशन किया जाएगा.
सोमवार, 8 जनवरी 2018
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
एक अपराजित योद्धा : शिवराजसिंह चौहान
12 साल का कीर्तिमान बनाने वाले मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री
-मनोज कुमार
कैलेण्डर के पन्नों पर 29 नवम्बर की तारीख हर साल आती है लेकिन 2017 में यह तारीख मध्यप्रदेश के इतिहास की तारीख के रूप में दर्ज हो गई है. यह तारीख उस अपरोजय योद्धा के नाम दर्ज हो गई है जिसे हम शिवराजसिंह चौहान के नाम से जानते हैं. 61 साल के मध्यप्रदेश में लगातार 12 वर्षों तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने कीर्तिमान कायम किया है. यह सच है कि इन 61 सालों में ज्यादतर समय कांग्रेस सत्ता में रही लेकिन सिवाय दिग्विजयसिंह के कोई दूसरा कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हुआ जिसने लगातार 10 साल तक मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हाली हो. दिग्विजयसिंह के रिकार्ड को ध्वस्त कर शिवराजसिंह ने मध्यप्रदेश के इतिहास में अपना नाम लिख दिया है. इसमें सबसे अहम बात यह है कि 12 सालों में शिवराजसिंह चौहान, शिवराजसिंह बने रहे, मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान बहुत कम रही. यही कारण है कि वे प्रदेश के बच्चों के मामा कहलाए और देशभर में मध्यप्रदेश का नाम रोशन हुआ.
शिवराजसिंह चौहान की पहचान एक मुख्यमंत्री के रूप में है और इतिहास के पन्नों में भी उन्हें इसी पहचान के साथ दर्ज किया जाएगा लेकिन सच तो यह है कि अपना सा लगने वाला यह मुख्यमंत्री हमारे बीच का, आज भी अपना सा ही है. शिवराजसिंह के चेहरे पर तेज है तो कामयाबी का लेकिन मुख्यमंत्री होने का गरूर नहीं, चेहरे पर राजनेता की छाप नहीं. सत्ता के शीर्ष पर बैठने की उनकी कभी शर्त नहीं रही बल्कि उनका संकल्प था प्रदेश की बेहतरी का. वे राजनीति में आने से पहले भी आम आदमी की आवाज उठाने में कभी पीछे नहीं रहे. वे किसी विचारधारा के प्रवर्तक हो सकते हैं लेकिन वे संवेदनशील इंसान है. एक ऐसा इंसान जो अन्याय को लेकर तड़प उठता है और यह सोचे बिना कि परिणाम क्या होगा, अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने निकल पड़ता है. बहुतेरों को यह ज्ञात नहीं होगा कि शिवराजसिंह चौहान मजदूरों को कम मजदूरी मिलने के मुद्दे पर अपने ही परिवार के खिलाफ खड़े हो गए थे. शिवराजसिंह चौहान का यह तेवर परिवार को अंचभा में डालने वाला था. मामूली सजा भी मिली लेकिन उन्होंने आगाज कर दिया था कि वे आम आदमी के हक के लिए आवाज उठाते रहेंगे.
शिवराजसिंह चौहान उन बिरले मुख्यमंत्रियों में से एक होंगे जिनके कांधे पर हाथ रखकर सैकड़ों लोग मिल जाएंगे यह कहते हुए कि शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं. च्शिवराज हमारे साथ पढ़े हैं, इसमें अपनापन तो है लेकिन एक भाव यह भी कि देखो हमारे साथ पढ़ा विद्यार्थी, हमारा दोस्त शिवराजसिंह आज मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री है. थोड़े से लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि च्हम शिवराजसिंह के साथ पढ़े हैंं और थोड़े से लोग होंगे जो कहते मिल जाएंगे-शिवराजसिंह और हम साथ पढ़े हैं. शिवराजसिंह के साथ सहपाठी होने की यह गर्वानुभूति सालों गुजर जाने के बाद हो रही है तो इसलिए कि शिवराजसिंह चौहान जब भोपाल के अपने स्कूल च्मॉडल स्कूलज् में जाते हैं तो मुख्यमंत्री बनकर नहीं, स्कूल के एक पुराने विद्यार्थी की तरह. शिक्षकों का चरण स्पर्श करना नहीं भूले. सहपाठियों को नाम से याद रखना और उन्हें संबोधित करना उनकी सादगी की एक झलक है.
1956 में जब नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ और समय-समय पर मुख्यमंत्री बदलते रहे. हर मुख्यमंत्री की अपनी शैली थी. काम करने से लेकर जीवन जीने तक. लगभग सभी मुख्यमंत्री कुछ अलग दिखना चाहते थे या लोगों ने उन्हें वैसा प्रस्तुत करने की कोशिश की लेकिन 2005 में मुख्यमंत्री के इस परम्परागत चेहरे के विपरीत सादगी भरा एक चेहरा नुमाया हुआ शिवराजसिंह चौहान का. संसद से विधानसभा और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी उन्होंने अपने लिए कोई बनावट नहीं की. उनकी बुनावट इतनी मोहक थी कि कभी पांव पांव वाले भइया के नाम से मशहूर शिवराजसिंह मामा के नाम से मशहूर हो गए. ऐसा नहीं है कि शिवराजसिंह चौहान पहले मुख्यमंत्री हों जिन्हें विशेषण दिया गया बल्कि लगभग हर मुख्यमंत्री को उनकी कार्यशैली और उनके तेवर के अनुरूप विशेषण मिलता रहा है. कोई राजा-महाराजा कहलाए तो किसी को संवेदनशील होने का विशेषण दिया गया. संत और साध्वी के रूप में मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालने वाले भी थे लेकिन लगातार 12 वर्षांे से सत्ता के शिखर पर बैठे शिवराजसिंह चौहान की सादगी चर्चा में रही.
शिवराजसिंह चौहान की सादगी भारतीय राजनीति में उन्हें अलग तरह से रखती है. आमतौर पर मुख्यमंत्री बनते ही सलाहकारों की भीड़ उमड़-घुमड़ पड़ती है. ये सलाहकार उन्हें आम से खास बनाने में जुट जाते हैं और उनके इर्द-गिर्द एक ऐसा घेरा बना दिया जाता है कि आम आदमी के लिए वे सत्ता पुरुष बनकर रह जाते हैं. शिवराजसिंह चौहान ने ऐसे सलाहकारों से खुद को दूर रखा. आम से खास बनने में उनकी कोई रूचि नहीं रही सो वे जैसा थे, वैसा ही बना रहना चाहते हैं. लगभग हर जगह वे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ पायजामा-कुरता में मिलेंगे. तामझाम और शोशेबाजी के इस आधुनिक दौर में शिवराजसिंह की यह सादगी उन्हें औरों से अलग, बिलकुल अलग बनाती है.
शिवराजसिंह की सादगी का आलम यह है कि वे गांव-देहात के दौरे के समय धूल भरी सडक़ में अपने लोगों के साथ बैठने में कोई हिचक नहीं करते हैं. आलम तो यह है कि जब वे सडक़ निर्माण का औचक निरीक्षण के लिए पहुंचते हैं और बताते हैं कि वे मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं तो मजदूर उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैंं. इस वाकये से शिवराजसिंह के चेहरे पर गुस्से का भाव नहीं आता है बल्कि वे हंसी में लेते हैं. साथ चल रहे अफसरों को कहते हैं चलो, भई यहां शिवराज को कोई पहचानता नहीं. क्या यह संभव है कि एक मुख्यमंत्री को उसकी जनता पहचानने से इंकार करे और वह निर्विकार भाव से लौट आए? यह सादगी शिवराजसिंह में मिल सकती है. उनके इन्हीं अनुभवों ने उन्हें आम आदमी से जोडऩे के लिए कई तरह के जतन करने का उपाय भी बताया. इन्हीं में से एक मुख्यमंत्री आवास पर होने वाली विभिन्न वर्गों की पंचायत रही है. कभी मुख्यमंत्री आवास आम आदमी के लिए तिलस्म सा था. बाहर से लोग अंदाज लगाया करते थे कि अंदर क्या क्या होगा लेकिन जब आम आदमी को मुख्यमंत्री आवास से बुलावा आया तो यह तिलस्म टूट गया. मध्यप्रदेश की राजनीति में यह शायद पहला अवसर होगा जब कोई मुख्यमंत्री अपने आवास में हर पर्व और हर उत्सव सेलिब्रेट कर रहा है.
शिवराजसिंह की सादगी के यह उद्धरण वह हैं जिसकी गवाही पूरा मध्यप्रदेश दे रहा है. हां, यह बात भी तय है कि जब आप शिवराजसिंह चौहान को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जांचते हैं, परखते हैं तो एक राजनेता के रूप में कुछ कमियां आप को दिख सकती हैं. कुछ फैसले सबके मन के नहीं होते हैं और इस बिना पर आप उन्हें घेरे में ले सकते हैं लेकिन एक आदमी से जब आप सवाल करेंगे तो उनका जवाब होगा कि अपना अपना सा लगने वाला यह शिवराज हमारा मुख्यमंत्री है और हमें ऐसा ही मुख्यमंत्री चाहिए. एक मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने 12 वर्षों का इतिहास बना दिया है लेकिन शिवराजसिंह चौहान ने जो जगह लोगों के दिलों में अपनेपन से बनायी है, वह तो मिसाल है. यह मिसाल शायद स्वयं शिवराजसिंह चौहान भी नहीं तोड़ पाएंगे.
शनिवार, 18 नवंबर 2017
कवि मुक्तिबोध की जन्मशती
-मनोज कुमार
साहित्य समाज में किसी कवि की जन्मशती मनाया जाना अपने आपमें महत्वपूर्ण है और जब बात मुक्तिबोध की हो तो वह और भी जरूरी हो जाता है। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनीतिक चेतना से समृद्ध स्वातंत्रोत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में स्थापित मुक्तिबोध अपने समय के एक ऐसे कवि हुए हैं जिनकी उम्र बहुत छोटी रही लेकिन उनकी कविता सदियों के लिए अमर हो गई। मध्यप्रदेश में जन्मे और छत्तीसगढ़ के होकर रह जाने वाले मुक्तिबोध की पहचान राजनांदगांव से है। हालांकि मुक्तिबोध किसी एक शहर या प्रदेश के नहीं बल्कि समूची दुनिया के कवि हैं और उनकी समय से बात करती कविताओं का यह शताब्दि वर्ष है।
गजानन माधव ‘‘मुक्तिबोध’’ (13 नवंबर 1917 -11 सितंबर 1964) हिन्दी साहित्य की स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील काव्यधारा के शीर्ष व्यक्तित्व थे। वर्ष 2017 हिन्दी के अपने समय के जुझारू कवि मुक्तिबोध का जन्मषती वर्ष है। हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। मुक्तिबोध का सम्पूर्ण जीवन संघर्षॉं तथा विरोधो से भरा रहा। उन्होंने माक्र्सवादी विचारधारा का अध्ययन किया, जिसका असर उनकी कवितायों में दिखाई देती है। पहली बार उनकी कवियाएँ सन् 1943 में अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसपक्त’ में छपी। कविता के अलावा उन्होंने कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि पर भी लिखा है। मुक्तिबोध एक समर्थ पत्रकार भी थे। उनकी विशेषताएँ अगली पढ़ी को रचनात्मक देती रही है। मुक्तिबोध नई कविता के मुख्या कवि हैं। उनकी संवेदना तथा ज्ञान का दायरा व्यापक है। गहन विचारशीलता और विशिष्ट भाषा-शिल्प की वजह से उनकी सहित्य की एक अलग पहचान है। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्ती की जिंदगी की विडंबनाओ तथा विद्रूपताओ का चित्रण उनके सहित्य में है और साथ ही एक बेहतर मानवीय समाज-व्यवस्था के निर्माण की आकांक्षा भी। मुक्तिबोध के सहित्य की एक बड़ी विशेषता आत्मालोचन की प्रवृत्ति है।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार ‘‘तार सप्तक’’ के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया। मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ‘‘एक साहित्यिक की डायरी’’ प्रकाशित की थी, जिसका दूसरा संस्करण भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। ज्ञानपीठ ने ही ‘‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’’ प्रकाशित किया था। इसी वर्ष नवंबर 1964 में नागपुर के विश्वभारती प्रकाशन ने मुक्तिबोध द्वारा 1963 में ही तैयार कर दिये गये निबंधों के संकलन नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध को प्रकाशित किया था। परवर्ती वर्षो में भारतीय ज्ञानपीठ से मुक्तिबोध के अन्य संकलन काठ का सपना, तथा विपात्र (लघु उपन्यास) प्रकाशित हुए। पहले कविता संकलन के 15 वर्ष बाद, 1980 में उनकी कविताओं का दूसरा संकलन भूरी भूर खाक धूल प्रकाशित हुआ और 1985 में राजकमल से पेपरबैक में छह खंडों में ‘मुक्तिबोध रचनावली’ प्रकाशित हुई, वह हिंदी के इधर के लेखकों की सबसे तेजी से बिकने वाली रचनावली मानी जाती है। इसके बाद मुक्तिबोध पर शोध और किताबों की भी झड़ी लग गयी। 1975 में प्रकाशित अशोक चक्रधर का शोध ग्रंथ ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया’ इन पुस्तकों में प्रमुख था। कविता के साथ-साथ, कविता विषयक चिंतन और आलोचना पद्धति को विकसित और समृद्ध करने में भी मुक्तिबोध का योगदान अन्यतम है।
वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी बताते हैं कि वह सत्रह साल की उम्र में मुक्तिबोध से मिले थे। जब वह 24 वर्ष के हुए, तब मुक्तिबोध की मृत्यु हो गई। परिचय के ये सात साल न पर्याप्त हैं और न उल्लेखनीय। मुक्तिबोध ने गढ़े गए लालित्य के स्थापत्य को ध्वस्त किया। जब व्यवस्थाएं नृशंसता पर उतर आई थीं, तब उन्होंने अंत:करण का प्रश्न उठाया। पिछले 50 वर्ष की कविता ने मुक्तिबोध से बहुत कम सीखा है। कवि लालित्य में ही उलझे रहे हैं। मुक्तिबोध के बीज शब्द हैं, आत्मसंघर्ष, अंत:करण और आत्माभियोग। मुक्तिबोध अपनी जिम्मेदारी को केंद्रीय मानते हैं। वे सबसे बड़े आत्माभियोगी कवि हैं। उन्होंने 1964 में जिस फैंटेसी को प्रस्तुत किया था, वह 2014-15 में साकार हो गई। ऐसा दुनिया के साहित्य में बहुत कम हुआ है कि फैंटेसी साकार हो जाए। ‘अंधेरे में’ कुल चार चरित्र हैं- टालस्टाय, तिलक, गांधी और अनाम पागल। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गांधी का चरित्र है। उनमें गांधी वाला तत्व कभी समाप्त न हुआ। अभी हमने युवाओं का एक सम्मेलन किया था। 56 युवा आए थे। किसी ने न मुक्तिबोध का जिक्र किया और न राजनीतिक परिस्थिति का। मुक्तिबोध की इतिहास वाली किताब के विरोध में जो मार्च निकला था, उसने मुक्तिबोध को तोड़ दिया। वह कभी उस आघात से उबर न सके।
वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव का मानना है कि जिस खतरनाक आगत से मुक्तिबोध रूबरू थे, वह आज हमारे सामने है। इतिहास पर मुक्तिबोध की पुस्तक प्रतिबंधित की गई। नेहरू और नेहरूवियन मॉडल की कई चीजों की आलोचना करने वाले मुक्तिबोध ने नेहरू की मृत्यु पर कहा था कि अब खतरा बढ़ गया है। मुक्तिबोध ने वर्ग की बात करते-करते जाति-वर्ण के प्रश्नों को पीछे कर देने की पद्धति की आलोचना की। उनके भक्तिकाल पर लिखे निबंध को याद किया जा सकता है, जहां कबीर और तुलसी आमने-सामने हैं। मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन पर उनकी टिप्पणी को याद कीजिए और आज स्वच्छता, पर्यावरण आदि पर कार्यक्रम कराने वाली साहित्य अकादमी से उसकी तुलना कीजिए, मुक्तिबोध की दूरदर्शिता स्पष्ट हो जाएगी। मुक्तिबोध के वैचारिक पक्ष को नजरअंदाज करके हम उनके साथ अन्याय करेंगे।
बुधवार, 1 नवंबर 2017
सालगिरह का उल्लास
1 नवम्बर मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस विशेष
मनोज कुमार
एक और साल जश्र का, उत्साह का, विकास का और सद्भाव का. यह बहुत कम दफे ही होता है कि एक ही तारीख पर दो लोग सेलिब्रेशन कर रहे हों लेकिन ऐसा होता आ रहा है और एक-दो नहीं बल्कि 17 सालों से जो अनवरत चलता रहेगा. 17 साल पहले एक नवम्बर को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना हुई थी. 61 साल पहले यह वही तारीख है जिस दिन नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ था. छत्तीसगढ़ अलग हो जाने से मध्यप्रदेश एक बार फिर से नए मध्यप्रदेश बन चुका है क्योंकि भौगोलिक रूप से मध्यप्रदेश का पुर्नसंयोजन किया गया. जो प्रदेश कभी एक हुआ करते थे, आज भौगोलिक रूप से अलग होकर भी एक हैं दिल से. 17 सालों में दोनों राज्यों के मध्य सौहाद्र्रता बनी हुई है और आपस में कभी कोई गर्माहट की नौबत नहीं आयी. शायद यही कारण है कि मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमनसिंह की सरकार डेढ़ दशक के स्थायित्व वाली सरकार बन गई है. सीमित संसाधन, चुनौतियां अपार और संभावनाओं का द्वार खोलते मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़.
मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश कहलाता है. अपने निर्माण के साथ ही समूचे भारत वर्ष के भाषा-भाषायी, संस्कृति और विभिन्न धर्मों के लोग यहां रहने आए. लघु भारत के रूप में मध्यप्रदेश ने सद्भाव के रूप में अपनी अलग छाप छोड़ी. कई बार विपरीत स्थितियां निर्मित हुई लेकिन मध्यप्रदेश ने संयम नहीं खोया और हर मुश्किल की घड़ी में अपने आपको साबित कर दिखाया. 2003 में मध्यप्रदेश में सबसे बड़ा राजनीतिक फेरबदल होता है. इस बार भारतीय जनता पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में आती है. हालांकि इसके पहले भी गैर-कांग्रेसी दल सत्ता में आते रहे हैं लेकिन उनका कार्यकाल यादगार नहीं रहा. भाजपा की सरकार पूर्ण बहुमत से आयी तो एक बार फिर आशंका थी कि यह सरकार प्रदेश को स्थायित्व नहीं दे पाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शुरू के दो साल में दो मुख्यमंत्री क्रमश: उमा भारती और बाबूलाल गौर बनें लेकिन तीसरे साल मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता की कमान सम्हाल तो वे इतिहास लिख गए. एक दो नहीं बल्कि लगातार 12 वर्षों से मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में भाजपा की सरकार को स्थायी बनाया है बल्कि मध्यप्रदेश को विकास की ऊंचाईयों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं.
इन 17 सालों में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. रमनसिंह भाजपा के भीतर सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हुए हैं तो छत्तीसगढ़ ने विकास की जो इबारत लिखी है, वह बार बार कहने के लिए विवश करता है सबले बढिय़ा, छत्तीसगढिय़ा. सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण होता है और तीन साल बाद पहला विधानसभा चुनाव छत्तीसगढ़ में होता है. इस चुनाव में मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता है. छत्तीसगढ़ में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है और सरल, सहज और ठेठ छत्तीसगढिय़ा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर दी जाती है. दूरदृष्टि, पक्का इरादा लेकर राज्य को संवारने में डॉ. रमनसिंह जुट जाते हैं. वे राजनीति में आने के पहले आयुर्वेद के डॉक्टर थे और तब के कवर्धा (आज का कबीरधाम) के लोगों का मुफ्त में इलाज किया करते थे. उनके मन में लोगों के प्रति सहानुभूति एवं दया का भाव आरंभ से था. सो इसी भाव से वे राज्य की तकदीर संवारने में जुट गए और आज छत्तीसगढ़ देश ही नहीं, विदेशों में अलग से चिंहित है. डॉ. रमनसिंह और शिवराजसिंह चौहान के नेतृत्व में दोनों राज्यों में 2003, 2008 और 2013 का चुनाव पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा जीत लेती है. 2018 में भी दोनों के नेतृत्व में चुनाव लड़े जाने की पूर्ण संभावना है और इस बात के आसार बड़े हैं कि एक बार फिर सत्ता में भाजपा की वापसी हो सकती है. भाजपा की वापसी एक राजनीतिक दल के रूप में तो होगी ही, अपितु उनके मुख्यमंत्रियों के अथक परिश्रम से प्रदेश की बदलती तस्वीर इस जीत का एक बड़ा कारण होगी.
आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ राज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां की नक्सल समस्या है. इसके साथ ही अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ापन छत्तीसगढ़ को आगे बढऩे नहीं दे रहा था. अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले छत्तीसगढ़ के विकास के लिए कोई ऐसा रोडमेप तैयार नहीं किया गया था जिससे यहां का विकास हो सके. राज्य का दर्जा मिलने के बाद सत्तासीन पहली कांग्रेस सरकार का फोकस भी शहरों की तरफ था और इस एजेंडे से आम आदमी निराश हो चला था. इस निराशा का ही परिणाम था जनमत ने भाजपा को अपने नेतृत्व के लिए चुना. और भाजपा ने डाक्टर साहब कहे जाने वाले सादगी पसंद, दूरदृष्टा डॉ. रमनसिंह को राज्य की बागडोर सौंप दी. आरंभिक दिन कुछ उथल-पुथल के थे लेकिन जिस तरह जहाज उडऩे से पहले कुछ दूर तक रेंगता है और फिर आसमान छूने लगता है, ठीक वैसा ही रमनसिंह ने अपने कार्यक्रमों को, एजेंडे को आगे बढ़ाया. आज छत्तीसगढ़ राज्य के चारों तरफ खुशियां हैं, विकास है और उम्मीदें ठाठें मार रही हैं. छत्तीसगढ़ का यह विकास किसी और के लिए तकलीफ का कारण हो सकता है कि तमाम किस्म की चुनौतियों से निपटते हुए विकास के रास्ते पर सबसे आगे और सबसे अलग छत्तीसगढ़ दिख रहा है.
छत्तीसगढ़ के विकास को मापना हो तो उन तथ्यों और आंकड़ों का मिलान करना होगा जो सच की तस्वीर पेश करते हैं जैसे कि 2003 में राज्य का बजट लगभग 7 हजार करोड़ था जो अब 78 हजार करोड़ से अधिक है तो राज्य में प्रति व्यक्ति आय 10 हजार से बढक़र 82 हजार हो गई है. बिजली उत्पादन में छत्तीसगढ़ कभी पीछे नहीं रहा लेकिन सुनियोजित प्रयासों ने राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 4,732 मेगावॉट से बढ़ाकर 22,764 मेगावाट करने में सफलता पायी है। रमनसिंह सरकार राज्य के लोगों के सेहत के लिए भी फ्रिकमंद है. यही कारण है कि शिशु मृत्युदर 63 से घटकर 46 प्रति एक हजार दर्ज की गई है तो मातृ मृत्यु दर प्रति लाख 365 से घटकर 221 पर ठहर गई है. कुपोषण 52 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो गई है जिसमें और कमी के प्रयास निरंतर जारी है. महिलाओं और बच्चों के लिए अनेक किस्म की विशेष योजनाएं बनायी गई है जिसमें प्रधानमंत्री उज्जवला योजना का सक्रियता से पालन किया जा रहा है. कल तक धुंये वाले चूल्हे में रसोई का काम करने वाली महिलाओं में कुछ बीमारियां होती थी, आज उन्हें गैस चूल्हा मिल जाने से राहत मिली है. इसी तरह बाल ह्दयरोग से बच्चों को मुक्ति दिलाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास किया जा रहा है। राज्य के पीडीएस सिस्टम की देश भर में प्रशंसा हुई है और लोगों को सहज रूप से खाद्यान्न मिलना संभव हुआ है. एक रुपये किलो चावल और दूसरी रोजमर्रा जरूरतों की चीजें मिल जाने से छत्तीसगढ़ राज्य पलायन से मुक्त हुआ है.
छत्तीसगढ़ के विकास मेें सबसे अहम योगदान रमन सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किया गया कार्य है. शहरों से लेकर अंतिम पंक्ति पर बैठे परिवार का बच्चा-बच्चा स्कूल जाए, इसके लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं. खासतौर पर बालिका शिक्षा के लिए जो कार्य छत्तीसगढ़ में हुए हैं, वह दूसरे राज्यों के लिए आदर्श के रूप में उपस्थित हैं. गणवेश, किताबें, फीस और स्कूल आने-जाने के लिए नि:शुल्क सायकल आदि ने बच्चों को स्कूल जाने के लिए आकर्षित किया है क्योंकि असुविधाओं और आर्थिक परेशानियों के चलते प्राथमिक स्कूल से आगे पढ़ नहीं पाते थे. सबसे बड़ा काम नक्सली क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों के बच्चों के लिए सरकार ने किया है. छू लो आसमां जैसी योजनाओं के तहत उनके लिए पृथक से स्कूल आश्रम शालाएं, कोचिंग और अन्य व्यवस्था की गई जिसका परिणाम यह निकला कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे साल-दर-साल हैरत में डाल देने वाली कामयाबी प्राप्त कर रहे हैं. पीईटी, पीएमटी, ट्रीपल टीआई के अलावा स्वरोजगार में भी इनकी कामयाबी छत्तीसगढ़ को उपलब्धियों से भर देती है. प्रतिभाओं को निखारने और उन्हें मंच देने का काम सरकार ने किया और सरकार के प्रयासों को छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं ने किया.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश के हितार्थ ऐसी योजनाएं आरंभ की जिससे न केवल आम आदमी का भला हुआ बल्कि पूरे देश में मध्यप्रदेश का डंका बजा. मध्यप्रदेश की अनेक योजनाओं को देश के भाजपा और गैर-भाजपाशासित प्रदेशों ने लागू किया. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह की चिंता आरंभ से बेटियों के प्रति रही है. उनके जन्म से लेकर ब्याह तक की व्यवस्था उन्होंने सरकार के जिम्मे ले ली. लाडली लक्ष्मी योजना से लेकर कन्यादान योजना ने जैसे महिला सशक्तिकरण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है. राजनीति में भी महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का प्रावधान करने वाला मध्यप्रदेश देश का पहला प्रदेश है. रोजगार के लिए भी उनके लिए व्यापक इंतजाम किया गया है. जो कसर रह गई थी उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आरंभ की गई योजना यथा उज्जवला योजना को लागू कर महिलाओं को धुंआ-धुंआ होती जिंदगी से निजात दिलाने का सार्थक प्रयास हुआ है. शिवराजसिंह की योजनाओं से स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रभावित हैं. इसलिए बेटी बचाओ योजना में, बेटी पढ़ाओ जोडक़र उसे देशव्यापी बना कर शिवराजसिंह का समर्थन करते हैं. किसानों को लेकर मुख्यमंत्री चौहान की चिंता सबसे आगे रही है. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का शुभारंभ करने स्वयं नरेन्द्र मोदी मध्यप्रदेश के शेरपुर पहुंचते हैं. यह शिवराजसिंह की चिंता का ही सबब है कि मध्यप्रदेश लगातार पांच वर्षों तक कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त करता रहा है. बुर्जुर्गों के लिए मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना तो पूरे भारतीय समाज के लिए आदर्श योजना साबित हुई है. सरकार की योजना और कार्यक्रम समयबद्ध परिणाममूलक बने, इसके लिए दुनिया में पहली बार लोक सेवा गारंटी कानून लाया गया. यह पहली बार हो रहा है कि आम आदमी को समयबद्ध सेवा नहीं मिलने पर लोकसेवकों को दंड देने का प्रावधान किया गया है.
इस तरह 17 सालों में मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ ने विकास के नित नए आयाम छुए हैं. मुख्यमंत्री रमनसिंह को चाउर वाले बाबा कहा गया तो शिवराजसिंह चौहान बच्चों के मामा कहलाए. दोनों ही कामयाब मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. ऐसा भी नहीं है कि सबकुछ बेहतर हुआ, कुछ कमियां भी रह गई. इसके भी कई कारण हैं. छत्तीसगढ़ राज्य के समक्ष नक्सलियों की चुनौती है तो मध्यप्रदेश में सिमी का खौफ. चुनौतियों और संभावनाओं के बीच इन 17 सालों ने दोनों राज्यों को बेहतर से बेहतर बनते देखा है. उम्मीद की जाना चाहिए कि सालगिरह के यह उल्लास सालों-साल बना रहे.
सोमवार, 25 सितंबर 2017
बुद्ध चुनें या युद्ध?
-मनोज कुमार
एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. बुराईयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं सोचता था कि कभी कोई साल ऐसा भी आएगा जब हम अच्छाईयों का पर्व मनाएंगे. विजय का पर्व होगा. किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है. इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं. हताश भी नहीं हूंं क्योंकि मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे. इस अवसर का दीप जला रहे होंगे. सवाल यह है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है. बस, थोड़ा सा दृष्टि और थोड़ी सी सोच बदलने की जरूरत है. अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं. क्यों ना हम किसी को पराजित करने के बजाय हम उस बुराई की जड़ को ढूंढऩे की कोशिश करें जिसकी वजह से हर बार वह पराजित तो होता है लेकिन अपनी बेलें कहीं छोड़ जाता है जो साल बीतते बीतते फिर एक बड़े आकार में हमारे सामने खड़ी हो जाती है. सवाल यह है कि हमें बार बार युद्व को चुनना है या बुद्ध को? हां, यह जरूर है कि बुद्ध को चुनने से पहले युद्ध के कारणों को तलाश करना पड़ेगा.
महात्मा कहते थे कि पाप से नफरत करो, पापी से नहीं लेकिन हमारी नजर में पाप दूजे स्थान पर है और पापी पहले. यही एक गलती बार बार हमें बुद्ध से दूर और युद्ध के करीब ले आती है. बुराई क्या है? क्या रावण बुराई है या बुराई का प्रतीक है? हम हर वर्ष प्रतीकों को मारते हैं. भारतीय उत्सवी समाज है. वह हर अवसर को उत्सव के अनुरूप बना लेता है. दशहरा का पर्व भी इसी बात का द्योतक है. वर्तमान समाज में हमें रावण जैसा ज्ञानी तो नहीं मिल रहा है लेकिन बुराई का प्रतीक रावण हरेक कदम पर बिठा दिया गया है. एक चपरासी के घर से अवैध कमाई का लाखों रुपया, जमीन-जायदाद और जाने क्या-क्या मिलता है तो हम उसकी कमाई की ओर देखते हैं. विधिसम्मत उसे सजा दिलाने की कार्यवाही करते हैं लेकिन कभी हमने इस बात की कोशिश नहीं की कि आखिर उसने इस बुराई के रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? आर्थिक कमजोरी उसके भीतर के बुद्ध को हरा देती है और वह युद्ध के भाव से गलत रास्ते पर चल पड़ता है. जब हम इस बुराई की जड़ की तरफ जाने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि पहले पहल जब उसने 10 या 5 हजार रुपये गलत ढंग से हासिल किए होंगे तो उसके हाथ भले ही ना कांपें हों, मन जरूर कांपा होगा. भयभीत हुआ होगा. उसे एक बार तो लगा होगा कि वह गलत कर रहा है. लेकिन जब यह प्रक्रिया एक से अधिक बार होने लगी तो वह निश्चित हो गया कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. चंचल लक्ष्मी उस बिगड़ते व्यक्ति के चेहरे पर चमक ला देता है. उसके ऊपर के अफसरान को भी इस बात की खबर होगी लेकिन उन्होंने भी रोकने और टोकने की हिम्मत नहीं की. करते भी कैसे? उन्हीं को देखकर उसके भीतर लोभ जागा. उसके भीतर का बुद्ध विलुप्त होता गया और वह युद्ध के भाव से जीवन को जीने लगा. यह वही जगह है जहां से हम बुराई की जड़ को ढूंढ सकते हैं. उस बिगड़ते गरीब आदमी को समझने की कोशिश कर सकते हैं कि आखिर उसने गांधी का रास्ता क्यों छोड़ा? वह रावणरूपी बुराई का प्रतीक क्यों बन गया? वह लंकेश की तरह ज्ञानी तो हो नहीं सकता था.
जिस दिन हम इस बुराई की जड़ पर चोट करेंगे, यकीन रखिए कि हमें हर साल रावण के वध के लिए हथियार नहीं उठाना पड़ेगा. और वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम अच्छाई का पर्व मनाएंगे. एक ऐसा पर्व जिसमें किसी की पराजय नहीं होगी बल्कि चौतरफा जय और जय होगी. इसे करने के लिए अपने भीतर गांधी और बुद्ध को जिंदा करना होगा. कबीर और तुलसी को समझ कर अपने जीवन में उतारना होगा. भौतिक सुविधाओं के फेर में अ से लेकर ज्ञ तक सभी बौरा गए हैं. कनक और कनक में भेद करना भूल गए हैं. एक कनक जो देह की सुंदरता को बढ़ाता है तो दूसरा कनक जीवन की सांस को रोक देता है. सही मायने में दोनों कनक एक से हो गए हैं जिसमें शारीरिक तौर पर व्यक्ति भले ही जीवित हो लेकिन उसकी आत्मा को यह कनक मार देता है. हमें इस बार तय करना होगा कि हम युद्ध के रास्ते पर चलेंगे या बुद्ध के रास्ते पर? हमें रावण बनना है या ज्ञानी लंकेश से कुछ सीखना चाहेंगे? हम गांधी और कबीर बनकर एक नए समाज का निर्माण करेंगे या जीवन भर युद्ध के रास्ते पर चलते रहेंगे?
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
तब सम्पादक की जरूरत ही क्यों है
मनोज कुमार
इस समय की पत्रकारिता को सम्पादक की कतई जरूरत नहीं है। यह सवाल कठिन है लेकिन मुश्किल नहीं। कठिन इसलिए कि बिना सम्पादक के प्रकाशनों का महत्व क्या और मुश्किल इसलिए नहीं क्योंकि आज जवाबदार सम्पादक की जरूरत ही नहीं बची है। सबकुछ लेखक पर टाल दो और खुद को बचा ले जाओ। इक्का-दुक्का अखबार और पत्रिकाओं को छोड़ दें तो लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में ‘‘टेग लाइन‘‘ होती है- ‘‘यह लेखक के निजी विचार हैं। सम्पादक की सहमति अनिवार्य नहीं।‘‘इस टेग लाइन से यह बात तो साफ हो जाती है कि जो कुछ भी छप रहा है, वह सम्पादक की सहमति के बिना है। लेकिन छप रहा है तो सहमति किसकी है लेखक अपने लिखे की जवाबदारी से बच नहीं सकता लेकिन प्रकाषन की जवाबदारी किसकी है? सम्पादक ने तो किनारा कर लिया और लेखक पर जवाबदारी डाल दी। ऐसे में यह प्रश्न उलझन भरा है और घूम-फिर कर बात का लब्बोलुआब इस बात पर है कि प्रकाशनों को अब सम्पादक की जरूरत ही नहीं है और जो परिस्थितियां हैं, वह इस बात की हामी भी है। इस ‘‘टेग लाइन‘‘ वाली पत्रकारिता से हम टेलीविजन की पत्रकारिता को सौफीसदी बरी करते हैं क्योंकि यहां सम्पादक नाम की कोई संस्था होती है या जरूरत होगी, इस पर चर्चा अलग से की जा सकेगी। यहां पर हम पत्रकारिता अर्थात मुद्रित माध्यमों के बारे में बात कर रहे हैं। अस्तु।
भारतीय पत्रकारिता की आज की स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। जवबादारी से बचती पत्रकारिता भला किस तरह से अपनी सामाजिक जवाबदारी का निर्वहन कर पाएगी, सवाल यह भी है कि क्या समय अब गैर-जवाबदार पत्रकारिता का आ गया है। यह सवाल गैर-वाजिब नहीं है क्योंकि भारतीय पत्रकारिता ने पत्रकारिता का वह स्वर्णयुग भी देखा है जहां सम्पादक न केवल जवाबदार होता था बल्कि सम्पादक की सहमति के बिना एक पंक्ति का प्रकाशन असंभव सा था। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि व्यवस्था के खिलाफ लिखने के कारण एक नहीं कई पत्रकारों को जेल तक जाना पड़ा लेकिन उन्होंने कभी भी जवाबदारी से खुद को मुक्त नहीं किया। उल्टे सम्पादक उपत कर सामने आता और कहता कि हां, इस लेख की मेरी जवाबदारी है और आज के सम्पादक का जवाब ही उल्टा है। मैं कुछ नहीं जानता, मेरा कोई वास्ता नहीं है।
आज की पत्रकारिता में सम्पादक की गौण होती या खत्म हो चुकी भूमिका पर चर्चा करते हैं तो भारतीय पत्रकारिता के उस गौरवशाली कालखंड की सहज ही स्मरण हो आता है जब सम्पादक के इर्द-गिर्द पत्रकारिता की आभा होती थी। हालांकि सम्पादक संस्था के लोप हो जाने को लेकर अर्से से चिंता की जा रही है। यह चिंता वाजिब है। एक समय होता था जब कोई अखबार या पत्रिका, अपने नाम से कम और सम्पादक के नाम पर जानी जाती थी। बेहतर होने पर सम्पादक की प्रतिभा पर चर्चा होती थी और गलतियां होने पर प्रताड़ना का अधिकारी भी सम्पादक ही होता था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नहीं अनेक सम्पादक हुए हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकारिता को उजाला दिया। समय गुजरता रहा और आहिस्ता आहिस्ता सम्पादक संस्था का लोप होने लगा। प्रकाशन संस्थाओं ने मान लिया कि सम्पादक की जरूरत नहीं है। प्रकाशन संस्था का स्वामी स्वयं सम्पादक हो सकता है और अपने अधीनस्थों से कार्य करा सकता है। उन्हें यह भी लगने लगा था कि सम्पादक करता-वरता तो कुछ है नहीं, बस उसे ढोना होता है। ये लोग उस समय ज्यादा कष्ट महसूस करते थे जब सम्पादक उनके हस्तक्षेप को दरकिनार कर दिया करते थे। एक तरह से यह अहम का मामला था।
स्वामी या सम्पादक के इस टकराव का परिणाम यह निकला कि सम्पादक किनारे कर दिए गये। प्रकाषन संस्था के स्वामी के भीतर पहले सम्पादक को लेकर सम्मान का भाव होता था, वह आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने लगा। कई घटनाएं हैं जो इस बात का प्रमाण है जो यह बात साबित करती हैं कि सम्पादक के समक्ष स्वामी बौना हुआ करता था। स्वामी इस बात को जानता था कि सम्पादक ज्ञानी है और प्रकाशन एक सामाजिक जवाबदारी। इस नाते वह स्वयं के अहम पर न केवल नियंत्रण रखता था बल्कि अपने प्रकाशन के माध्यम से लोकप्रिय हो जाने का कोई लालच उसने नहीं पाला था। कहने के लिए तो लोग सन् 75 के आपातकाल के उन काले दिनों का स्मरण जरूर कर लेते हैं जब पत्रकारिता अपने कड़क मिजाज को भूल गई थी। सवाल यह है कि 40 साल गुजर जाने के बाद भी हम पत्रकारिता के आपातकालीन दिनों का स्मरण करेंगे या और गिरावट की तरफ जाएंगे. जहां तक मेरा अनुभव है और मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो मुझे लगता है कि सम्पादक संस्था को विलोपित करने का काम आपातकाल ने नहीं बल्कि प्रकाषन संस्था के स्वामी के निजी लालच ने किया है। उन्हें लगने लगा कि कागज को कोटा-सोटा तो खत्म हो गया है। सो आर्थिक लाभ तो घटा ही है बल्कि उसके भीतर ‘स्टेटस का सपना पलने लगा। वह अपने सम्पादक से ज्यादा पूछ-परख चाहता है और चाहता है कि शासन-प्रशासन में उसका दखल बना रहे।
स्वामी के इस लालच के चलते सम्पादक संस्था को किनारे कर दिया गया और सम्पादक के स्थान पर प्रबंध सम्पादक ने पूरे प्रकाशन पर कब्जा कर लिया। एक प्रकाशन संस्था से शुरू हुई लालच की यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी पत्रकारिता को अपने कब्जे में कर लिया। पत्र स्वामियों के इस लालच के कारण उन्होंने कम होशियार और उनकी हां में हां मिलाने वाले सम्पादक रखे जाने लगे। गंभीर और जवाबदार सम्पादकों ने इस परम्परा का विरोध किया लेकिन संख्याबल उन सम्पादकों की होती गई जो हां में हां मिलाने वालों में आगे रहे। सम्पादक संस्था की गुपचुप मौत के बाद पत्रकारिता का तेवर ही बदल गया। प्रबंध सम्पादक की कुर्सी पर बैठने वाले सम्पादक के सामने लक्ष्य पत्रकारिता नहीं बल्कि अर्थोपार्जन होता है सो वह पत्र स्वामी को बताता है कि फलां स्टोरी के प्रकाशन से कितना लाभ हो सकता है। स्वामी का एक ही लक्ष्य होता है अधिकाधिक लाभ कमाना। सम्पादक संस्था के खत्म होने और प्रबंध सम्पादक के इस नए चलन ने पेडन्यूज जैसी बीमारी को महामारी का रूप दे दिया।
कुछ भी कहिए, यह ‘‘टेग लाइन' वाली पत्रकारिता है मजेदार। जिस अखबार में लेख छापा जा रहा है, उसका सम्पादक-स्वामी कहता है कि यह विचार लेखक के निजी हैं। इसका सीधा अर्थ होता है कि बड़ी ही गैर-जवाबादारी के साथ पत्र-पत्रिकाओं ने लेख को प्रकाशित कर दिया है। न तो प्रकाशन के पूर्व और न ही प्रकाशन के बाद लेख को पढ़ा गया। जब सम्पादक इस तरह की भूमिका में है तो सचमुच में उसकी कोई जरूरत नहीं है। जब एक सम्पादक किसी लेख अथवा प्रकाशन सामग्री को बिना पढ़े प्रकाषन की अनुमति दे सकता है और साथ में इसकी जवाबदारी लेखक के मत्थे चढ़ा देता है तो क्यों चाहिए हमें कोई सम्पादक, जब लेखक को अपने लिखे की जवाबदारी स्वयं ही कबूल करनी है तो सम्पादक क्या करेगा, इन सम्पादकों को कानून का ज्ञान नहीं होगा, यह बात उचित नहीं है लेकिन प्रबंध सम्पादक की हैसियत से वह इससे बचने का उपाय ढूंढ़ते हैं और इसी का तरीका ये ‘‘टेग लाइन वाली पत्रकारिता है। गैर-जवाबदारी के इस दौर में भारतीय पत्रकारिता जिम्मेदार सम्पादक की प्रतीक्षा में खड़ी है जो कहेगी कि छपे हुए एक आलेख नहीं अपितु एक-एक शब्द में सम्पादक की सहमति है और वह इसके प्रकाशन के लिए जवाबदार है।
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