रविवार, 8 नवंबर 2009

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अपनों को याद करें
हिन्दी पत्रकारिता में मध्यप्रदेश का योगदान शायद सबसे ज्यादा है। राजेन्द्र माथुर मील के पत्थर साबित हुए हैं। हाल ही में दिवंगत प्रभाष जोशी के साथ ही वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रताप वैदिक, इंडिया टुडे के सम्पादक जगदीश उपासने, विष्णु खरे एवं अनेक नाम हैं जिन्हें मध्यप्रदेश ने कभी याद नहीं किया। राज्य शासन ने पिछले दिनों सक्रिय पहल कर इस दिशा में कुछ काम किया है किन्तु वह भी सम्मान और पुरस्कार बांटने तक। हम युवा पत्रकार साथियों ने राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान की स्थापना की है और इसी के बैनर तले प्रयास आरंभ किया गया है कि देश भर में फैले मध्यप्रदेश के पत्रकारों की जीवनी एकत्र कर उसका दस्तावेजीकरण किया जा सके। मध्यप्रदेश से जुड़े पत्रकारों से अनुरोध है िकवे जिन्हें जानते हैं और जिनके उनसे सम्पर्क हैं, उनकी अधिकतम जानकारी हमें भिजवाने का कष्ट करें। साथ में उनकी तस्वीर भी। आपके इस सहयोग से हमारे प्रयासों को सार्थकता मिल सकेगी।htpp://mpreporete।blogspot.com मनोज कुमारसंयोजकराजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान, भोपाल


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पत्रकारिता के स्कूल थे प्रभाषजी
एक पत्रकार का पहला और अंतिम धर्म होता है लिखना लेकिन जब उसकी कलम थम जाए तो मान लीजिये कि उस पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रभाषजी के जाने के बाद शायद मेरे साथ ऐसा हुआ है। पहली दफा मुझमें कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हो रही है। आज मन उदासी से उबर पाया है तो कुछेक यादें आपके साथ शेयर करने के लिये लिख रहा हूं। प्रभाषजी के साथ मेरा काम करने का कोई अनुभव नहीं रहा है। लगभग दो वर्ष पहले भोपाल में एक आयोजन में उनका आना हुआ। पहले तो उनका कहा सुना और बाद में उनसे मुलाकात हुई। लगभग 73वर्ष के पत्रकारिता के महामना जोशीजी के सामने मैं बौना सा पत्रकार किन्तु उनके सहज स्वभाव ने जैसे मेरा मन जीत लिया। कदाचित मैं यह भी उनसे सीखा कि अपने से जूनियर साथियों के साथ भी हमें भी वैसा ही बर्ताव करना चाहिए।
प्रभाषजी को लोग बार बार मालवा का गिन रहे हैं किन्तु मुझे लगता है कि यह ऐतिहासिक भूल है। जिस तरह पत्रकारिता की कोई सीमा नहीं होती वैसे ही प्रभाषजी किसी एक गांव या शहर अथवा प्रदेश के नहीं थे। वे समूची पत्रकारिता के थे और वे अपने आप में पत्रकारिता की पाठशाला थे। उनसे सीखा जा सकता है कि पत्रकार एक विषय ही नहीं अनेक विषयों का ज्ञाता होता है और उसे अपनी रूचि के अनुरूप् लिखना चाहिए। वे खेल और खासतौर पर क्रिकेट पर लिखने के लिये प्रतिबद्व थे तो समसामयिक विषयों पर भी वे लिखते रहे हैं। राजनीति और राजनेता भले ही चुप्पी साधे रहें लेकिन सच तो यह है कि उनके लिखे को पढ़कर वे तिलमिला जाते रहे हैं। आज प्रभाषजी हमारे बीच नहीं है लेकिन पत्रकारिता में उन्हांेने जो दृष्टि गढ़ी, जो रास्ता दिखाया, वह हम सबके लिये हमेशा पथ प्रदर्शक का काम करेगा।
मनोज कुमारसंयोजकराजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिता संस्थान, भोपाल

सोमवार, 2 नवंबर 2009

मीडिया और गर्ल

मैं नहीं जानता कि बहस किस बात पर चल रही है किन्तु जिन मुद्दों पर बात चल रही है वह एतराज करने वाली है। मैं एक बेहद पारम्परिक परिवार से हूं जहां छोटी छोटी बातों पर गौर किया जाता है किन्तु मैं और मेरा परिवार लड़कियों के भविष्य के खिलाफ कतई नहीं रहा है। मेरा आग्रह हमेशा रहा है कि मर्यादित व्यवहार कर लड़की हो या लड़का, अपने काम की तरफ पहले ध्यान दे। बहरहाल, पहली बात तो यह कि लड़कियों के काम करने पर जो लोग आपत्ति दर्ज करा रहे हैं, वे डरे हुए लोग हैं। मैं एक बेटी का पिता हूं और उसकी उम्र अभी महज दस वर्ष है लेकिन उसके भविष्य के लिये मेरे पास अगले दस साल की प्लानिंग है। वह भी पायल और पायल जैसी लड़कियों की कतार में लगेगी और अपना कैरियर बनाने की कोशिश करेगी। मेरे लिये आज की पायल और कल की अपूर्वा में कोई फर्क नहीं दिखता।दूसरा एक मुद्दा कपड़े पहने जाने को लेकर है। यह भी समझ से परे है कि एक लड़की के जींस पहने जाने पर हंगामा क्यों? मेरा तो मानना है कि शरीर के बनावट और काम की जरूरत के हिसाब से कपड़े पहने जाने चाहिए। रिपोर्टिेग करते जाते समय किसी भी लड़की से अपेक्षा की जाये िकवह लहंगा-चुन्नी पहन कर काम करे तो यह बेवकूफी से कम की बात नहीं है।मैं विगत तीस वषों से प्त्रकारिता कर रहा हूं। मीडिया के स्टूडेंट को पढ़ाने जाता हूं। यंग व स्मार्ट बच्चियां जब मौजूदा स्थितियों पर सवाल करती हैं तो मन को संतोष होता है कि चलो भावी पीढ़ी कुछ नया कर दिखायेगी। ऐसे में मेरा कहना है कि जो लोग भी इस तरह की बात कर रहे हैं उन सभी, खासतौर से मीडिया में जुड़े लोगों से मेरा आग्रह है कि मानसिकता ऐसी है तो कृप्या मीडिया से दूर हो जाएं। लड़कियों को भी एक सलाह है कि वे अपने शिक्षक अथवा सीनियर्स के पैर न छुए बल्कि नमस्कार से काम चला लें। मीडिया खुलेपन के लिये है न कि मानसिक रूप् से बीमार लोगों के लिये।मनोज कुमारk.manojnews@gmail.com

बहस

यह कैसा राज्योत्सव?
मनोज कुमार
साल 1956 के एक नवम्बर को जन्मे मध्यप्रदेश की सर्जरी सन् 2000 में उसी तारीख को हुई थी। इस सर्जरी से मध्यप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अलग हो गया जिसे स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य के नाम से पुकारा गया। विकास के नाम पर छत्तीसगढ़ को पृथक राज्य का दर्जा तो दे दिया गया किन्तु विकास कितना हुआ, यह बहस का विषय है। फिलहाल तो बात कर रहे हैं उस ऐतिहासिक भूल की जिसे मध्यप्रदेश पिछले 9 वर्षों से कर रहा है। एक नवम्बर को छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने पर राज्योत्सव मनाया जाना तो ठीक है किन्तु मध्यप्रदेश अपने विखंडित स्वरूप् में अपनी स्थापना दिवस का जश्न मनाये, यह मामला थोड़ा अनुचित लगता है। इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए कि मध्यप्रदेश का राज्योत्सव मनाया जाना कितना उचित है।
साथियों, यदि आप मध्यप्रदेश से वास्ता रखते हैं तो और नहीं रखते हैं तो भी, इस विषय पर अपनी राय जरूर भेजें। @जीमेल.com

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

आमंत्रण

पहली खबर

पत्रकारिता की दुनिया से आपका पुराना रिश्ता रहा है. मेरा आग्रह है कि आप पत्रकारिता के आरंभिक दिनों को याद करें और उस पहली खबर को जरूर याद करें जिसे आपने किसी अखबार अथवा पत्रिका के लिये लिखा था. उस खबर को लिखने का उत्साह, जद्दोजहद और छप जाने के बाद पढ़ने का सुख आदि आदि बातों को एक बार फिर पहली खबर की तरह शब्दों में बांधने का प्रयास करें. खबर कौन सी थी उस पर भी विस्तार से बात की जाए तो मजेदारी होगी. आपके इन संस्मरणों को हम मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम में प्रकाशित करना चाहेंगे। पहली खबर के साथ अपनी एक तस्वीर हमें जरूर भेजें. डाक से भेजना चाहें तो पता है संपादक समागम ३, जू. एमआईजी, द्वितीय तल, अंकुर कॉलोनी, शिवाजीनगर, भोपाल-462016 मो. 09300469918 E-mail: k.manojnews@gmail.com

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

मीडिया

मीडिया और पत्रकारिता के फर्क को समझिये
मनोज कुमार

पत्रकारिता और मीडिया के फर्क को भुला दिया गया है। इधर जितनी आलोचना हो रही है और भद पीट रही है वह मीडिया की है न कि पत्रकारिता की। इस आलोचना का पात्र आंषिक रूप् से पत्रकारिता हो सकती है लेकिन पूरी तरह से नहीं। जैसे एक समाचार पत्र में काम करने वाले गैर पत्रकार को भी आम आदमी पत्रकार समझ कर व्यवहार करता है ठीक उसी प्रकार मीडिया को भी पत्रकारिता मान लिया गया है जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। मीडिया पत्रकारिता का एक समग्र रूप् है जबकि पत्रकारिता अपने आप में वटवृक्ष की तरह है। पत्रकारिता से आषय खबर और उससे जुड़े विष्लेशण, चिंतन आदि इत्यादि किन्तु पत्रकारिता में मनोरंजन का कोई स्थान नहीं है वहीं मीडिया में खबर और उससे जुड़े पक्ष एक हिस्सा है तो उसका नब्बे फीसदी हिस्सा मनोरंजन और दूसरे पक्षों से संबद्व है। मीडिया और पत्रकारिता का ऐसा घालमेल किया गया है और किया जा रहा है कि दोनों का बुनियादी अंतर ही समाप्त हो गया है। पाठक और दर्षक तो पत्रकारिता अर्थात मीडिया को मानते हैं जबकि ऐसा है नहीं। यह वृत्ति अकेले पाठकोें और दर्षकों तक नहीं सिमटी है बल्कि पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी को भी नहीं मालूम की पत्रकारिता और मीडिया में फर्क क्या है। अभी हाल ही में पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर चुके मेरे एक नौजवान साथी से इस बारे में पूछा तो उसका कहना था सर, कहां आप इन चक्करों में पड़े हैं। मीडिया को ही पत्रकारिता मान लीजिये। हमें तो यही पढ़ाया और बताया गया है। अब पत्रकारिता और मीडिया के फर्क की मीमांसा कर अपना समय मत गंवाइए। मुझे उस युवा साथी की षिक्षा पर तरस आया। जो युवा पत्रकार स्वयं होकर मीडिया और पत्रकारिता के फर्क को नहीं समझना चाहता वह भला पाठकों और दर्षकों को खबर और मनोरंजन के बीच का अंतर कैसे समझा पायेगा। पत्रकारिता अब ऐसे ही साथियों के कंधे पर हैं जिनके लिये मीडिया ही पत्रकारिता है।इस पूरे कथानक में युवा साथी की गलती कम मानता हूं बल्कि इसका आरोप अपने सहित तमाम बुर्जुग पत्रकार साथियों के सिर मढ़ता हूं कि हम सबने मिलकर मीडिया षब्द की उपज की और पत्रकारिता कहना ही भूल गये। इसका परिणाम यह हुआ कि डंडा चले मीडिया के कारनामों पर और बदनाम हो पत्रकारिता। पत्रकारिता चारों दिषाआंे से वास्ता रखता है किन्तु उसका धर्म और नैतिक दायित्व यह है कि वह हर हाल में समाज में, देष में षुचिता के लिये कार्य करे न िकवह कमाई का जरिया बनाये।जो लोग पत्रकारिता के व्यवसायिक हो जाने की बात कहते हैं उनसे एक बार फिर मैं कहता हूं कि व्यवसायिक चरित्र पत्रकारिता का नहीं है बल्कि मीडिया का है। पत्रकारिता का इलेक्ट्राॅनिक चेहरा नहीं हो सकता है और न ही उसे कभी इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता कहा जा सकता है जबकि मीडिया की उपज ही 440 वोल्ट से होती है और वह इसी तरह का झटका भी देती है और इसलिये ही उसे इलेक्ट्रानिक मीडिया कहा गया है। मीडिया का चेहरा प्रिंट का भी है इसलिये वह प्रिंट मीडिया कहलाता है जिसके दायरे में जनसम्पर्क आता है किन्तु प्रिंट पत्रकारिता नहीं कहा जाता है क्योंकि वह तब भी पत्रकारिता ही होता है। मीडिया षुद्ध रूप् से आय की बात करता है किन्तु पत्रकारिता के पास आमदनी की कोई बात ही नहीं है। पत्रकारिता को समझना है तो माधवराव सप्रे के छत्तीसगढ़ मित्र के उस अंक को पढ़ना होगा जिसमें उन्होंने एक पत्रकार और सम्पादक की योग्यता और जरूरत का उल्लेख किया है। मोटी तनख्वाह की मांग मीडिया करती आ रही है। मैंने अपने पहले लेख में लिखा भी है कि पत्रकारिता का व्यवसायिकरण हो नहीं सकता क्योंकि किसी भी हालत में आप खबर की कीमत तय नहीं कर सकते लेकिन मीडिया खबर नहीं प्रोजेक्ट करता है और किसी को प्रोजेक्ट करने की कीमत तय होती है। मीडिया हमेषा व्यवसायिक बना रहेगा। अभी भी समय है कि हम पत्रकारिता और मीडिया के फर्क को समझने का प्रयास करें और पाठक व दर्षक में यह जागरूकता पैदा करने की कोषिष करें कि पत्रकारिता व मीडिया दो अलग अलग चीजें हैं।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

अपना राज्य

राज्यगीत एक अच्छी पहल
लगभग एक सप्ताह बाद मध्यप्रदेश अपनी एक और वर्षगांठ मनायेगा। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार को एक तरफ जहां लगातार पांच बार राज्योत्सव मनाने का अवसर मिला है वहीं भाजपा सरकार इस राज्योत्सव को एक नयी पहचान देने जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान की पहल पर फैसला लिया है कि राज्यगीत बनाया जाएगा। संभवतः मध्यप्रदेश पहला राज्य होगा जहां इस तरह की पहल हो रही है। अभी तक किसी राज्य का कोई राज्यगीत जैसी परम्परा रही है। भाषाई विवाद से परे इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। राज्यगीत बने, इसका सभी स्वागत करेंगे किन्तु अपेक्षा होगी कि यह गीत किसी विचारधारा अथवा पार्टी प्रेरित न होकर राज्य को प्रतिबिम्बित करने वाला हो तो सुखकर होगा। यहां स्मरण दिलाना होगा कि भोपाल के लेखक एवं प्रोफेसर पुरूषोत्तम चक्रवर्ती ने काफी पहले एक ऐसा गीत तैयार किया है जिसमें सम्पूर्ण मध्यप्रदेश की झलक देखने को मिलती है। इस गीत का प्रकाशन संभवतः राज्य शिक्षा केन्द्र ने अपने किसी प्रकाशन में किया है। राज्यगीत बनना ऐतिहासिक कदम है और इसे इसी सोच के साथ बनाया जाना चाहिए। अपेक्षा होगी कि मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश से बाहर रह रहे बुद्विजीवी भी इस दिशा में सरकार को अपनी सलाह भेजें ताकि राज्यगीत मुकम्मल चेहरा पा सके।

गिरमिटया महात्मा गांधी

  आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...