गुरुवार, 28 सितंबर 2023
नागरिक बोध और प्रशासनिक दक्षता से सिरमौर स्वच्छ मध्यप्रदेश
सोमवार, 28 अगस्त 2023
'मन में देश का दिल मध्यप्रदेश
मनोज कुमार
देश का दिल है मध्यप्रदेश और मध्यप्रदेश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दिल में भी बसता है. प्रधानमंत्री अपने लोकप्रिय कार्यक्रम 'मन की बातÓ में निरंतर मध्यप्रदेश की उपलब्धियों का उल्लेख करते रहे हैं. वे अपने संबोधन में मध्यप्रदेश की उपलब्धियों और विशेषताओं से अन्य राज्यों को अवगत कराते रहे हैं. वे मानते हैं कि मध्यप्रदेश देश का ह्दयप्रदेश ही नहीं है बल्कि वह देश के लिए एक आदर्श प्रदेश है. एक रोल मॉडल राज्य के रूप में मध्यप्रदेश ने अपनी पहचान स्थापित की है. यह जानना रोचक होगा कि इस विशाल देश के कोने-कोने से हुनरमंद लोगों की तलाश कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. मध्यप्रदेश के संदर्भ में यह तो और भी रोचक है.
यूं तो मन की बात कार्यक्रम के करीब 105 एपिसोड होने जा रहे हैं. इनमें से कुछ ऐसे एपिसोड हैं जिसमें मध्यप्रदेश का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है. मन की बात का 103वां एपिसोड मध्यप्रदेश के लिए खास था। पीएम मोदी ने इस कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के शहडोल का उल्लेख करते हुए कहा कि 'कुछ समय पहले, मैं, एम.पी. के शहडोल गया था। वहां मेरी मुलाकात पकरिया गांव के आदिवासी भाई-बहनों से हुई थी। वहीं पर मेरी उनसे प्रकृति और पानी को बचाने के लिए भी चर्चा हुई थी। अभी मुझे पता चला है कि पकरिया गांव के आदिवासी भाई-बहनों ने इसे लेकर काम भी शुरू कर दिया है। यहां, प्रशासन की मदद से, लोगों ने, करीब सौ कुओं को वॉटर रिजार्च सिस्टम में बदल दिया है। बारिश का पानी, अब इन कुओं में जाता है, और कुओं से ये पानी, जमीन के अंदर चला जाता है। इससे इलाके में भू-जल स्तर भी धीरे-धीरे सुधरेगा। अब सभी गांव वालों ने पूरे क्षेत्र के करीब-करीब 800 कुएं को रिचार्ज के लिए उपयोग में लाने का लक्ष्य बनाया है।Ó उन्होंने शहडोल के ही विचारपुर गांव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसे मिनी ब्राजील कहा जाता है। पीएम मोदी ने कहा कि 'ये गांव आज उभरते सितारों का गढ़ बन गया है। यहां मेरी मुलाकात इन खिलाडिय़ों से हुई। विचारपुर गांव के मिनी ब्राजील बनने की यात्रा 2 दशक पहले शुरू हुई। यह गांव कभी अवैध शराब के लिए बदनाम था। इसका सबसे बड़ा नुकसान यहां के युवाओं को हो रहा था। एक पूर्व नेशनल प्लेयर और कोच रईस एहमद ने इन युवाओं की प्रतिभा को पहचाना। रईस जी ने युवाओं को फुटबॉल सिखाना शुरू किया। कुछ साल के भीतर ही यहां फुटबॉल इतनी प्रसिद्ध हो गई कि विचारपुर गांव की पहचान ही इससे होने लगी। अब यहां फुटबॉल क्रांति नाम से एक प्रोग्राम भी चल रहा है।Ó
मन की बात में जिन दो प्रसंग का मोदीजी ने उल्लेख किया है, वह मध्यप्रदेश में हो रहे नवाचार की झलकी तो दिखाते ही हंै बल्कि दूसरों को प्रेरणा भी देते हैं. उज्जैन में अलग-अलग शैलियों में बन रही पुराणों पर आधारित पेंटिंग के बारे में बताया। अमेरिका द्वारा भारत को लौटाई गई मूर्तियों में एक मूर्ति का नाता मध्य प्रदेश से है यह भी प्रधानमंत्री ने बताया। वहीं फिर एक बार शहडोल जिले के विचारपुर गांव जिसे मिनी ब्राजील के नाम से जाना जाता है उसका जिक्र करते हुए बताया कि कैसे यह गांव नशे से मुक्त होकर फुटबाल से प्रेम करने लगा।
मन की बात में उज्जैन में बन अलग-अलग शैली के चित्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक प्रयास इन दिनों उज्जैन में चल रहा है। यहां देशभर के 18 चित्रकार, पुराणों पर आधारित आकर्षक चित्रकथाएं बना रहे हैं। ये चित्र, बूंदी शैली, नाथद्वारा शैली, पहाड़ी शैली और अपभ्रंश शैली जैसी कई विशिष्ट शैलियों में बनेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि, इन्हें उज्जैन के त्रिवेणी संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाएगा, यानि कुछ समय बाद, जब आप उज्जैन जाएंगे, तो, महाकाल महालोक के साथ-साथ एक और दिव्य स्थान के आप दर्शन कर सकेंगे। अपना अनुभव शेयर करते हुए उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले इंटरनेट मीडिया पर एक अद्भुत क्रेज दिखा। अमेरिका ने हमें 100 से ज्यादा दुर्लभ और प्राचीन कलाकृतियां वापस लौटाई हैं। इनमें से कुछ तो ऐसी हैं, जो आपको, आश्चर्य से भर देंगी। आप इन्हें देखेंगे, तो देखते ही रह जाएंगे। इनमें 11वीं शताब्दी का एक खुबसूरत सेंड स्टोन स्कल्पचर भी आपको देखने को मिलेगा। ये नृत्य करती हुई एक 'अप्सराÓ की कलाकृति है, जिसका नाता मध्यप्रदेश से है। युवाओं में अपनी विरासत के प्रति गर्व का भाव दिखा। भारत लौटीं ये कलाकृतियां 2500 साल से लेकर 250 साल तक पुरानी हैं।
मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के तीन ऐसे उदाहरण बताए जिन्होंनेे देश में अनोखा काम किया है. इनमें इंदौर की ह्यूमन चेन, मंडला में अमृत सरोवर और दतिया के मेरा बच्चा अभियान है. प्रधानमंत्री मोदी ने दतिया जिले के मेरा बच्चा अभियान की सराहना करते हुए कहा कि आप कल्पना कर सकते हैं कि कुपोषण दूर करने में गीत-संगीत और भजन का भी इस्तेमाल हो सकता है? मध्यप्रदेश के दतिया जिले में मेरा बच्चा अभियान में इसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। बीते 15 अगस्त को इंदौर में 5000 से अधिक स्कूली छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और अन्य लोग सबसे बड़ी मानव श्रृंखला के जरिए भारत का भौगोलिक नक्शा बनाने का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था. पीएम नरेंद्र मोदी ने मण्डला के मोचा ग्राम पंचायत में बने अमृत सरोवर को अनूठा बताया.
सामाजिक जागरूकता के लिए उम्र और साधन सम्पन्न होने की जरूरत नहीं. केवल मन में इच्छा भी लोगों को जागरूक कर सकती है. कटनी जिले की नन्हीं मीनाक्षी और बश्वर ने ऐसा कर दिखाया. मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आज मन की बात में प्रदेश की प्रतिभाओं का उल्लेख कर उनका मनोबल बढ़ाने का कार्य किया है। मन की बात में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने बच्चों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि 'हम सब जानते हैं कि बच्चों को गुल्लक से कितना प्यार होता है। लेकिन मध्यप्रदेश के कटनी जिले की 13 वर्ष की मीनाक्षी और पश्चिमी बंगाल के डायमंड हार्बर के 11 वर्ष के बश्वर मुखर्जी कुछ अलग हैं। इन दोनों बच्चों ने अपनी गुल्लक के पैसे टी.बी. मुक्त भारत के लिए लगा दिए। उनका यह उदाहरण भावुकता से भरे होने के साथ प्रेरक करने वाला भी है। कम आयु में बड़ी सोच रखने वाले इन सभी बच्चों की मैं प्रशंसा करता हूँ।Ó कटनी जिले की हमारी बेटी मीनाक्षी सहित अनेक बच्चों के टी.बी.मुक्त भारत के लिए दिये गये योगदान की प्रशंसा कर प्रधानमंत्री ने अन्य बच्चों का मनोबल बढ़ाया है। इ
मन की बात में ग्वालियर निवासी कु. निधि पवैया जिन्होंने उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम में शॉट-पुट प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था, का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय की छात्रा कु. निधि पवैया ने घुटने में गंभीर चोट के बावजूद शॉट-पुट में गोल्ड मेडल जीतने में कामयाबी हासिल की। कु. निधि ग्वालियर जिले के चिनौर गाँव की निवासी है और उनके पिता छोटे सिंह पवैया किसान हैं.
प्रधानमंत्री मन की बात में मध्यप्रदेश के जिन लोगों का उल्लेख कर चुके हैं, उनमें मुख्य रूप से ममता शर्मा, आसाराम चौधरी, मास्टर तुषार, उषा दुबे, रजनीश, बबीता राजपूत, अर्जुन सिंह , रोहित सिसोदिया , फील्ड डायरेक्टर पेंच टाइगर रिजर्व, सुभाष सिसोदिया अतुल पाटीदार, अनुराग असाटी और पद्म पुरस्कार विजेता डॉक्टर जनक पलटा, शांति परमार और भूरी बाई हैं. इनके अलावा भी जिन लोगों का जिक्र मन की बात में हुआ उनमें ग्राम पंचायत के कमलेश और कविता चंदवानी, भावना, राम लोटन कुशवाह ,किशोरी लाल धुर्वे , मीना राहंगडाले, भज्जू श्याम , शिवा चौबे, आशीष पारे, स्वाति श्रीवास्तव, अवनि चतुर्वेदी समेत कई लोग शामिल हैं. इन अद्भुत लोगों का मन की बात के सौ एपिसोड पूरे होने पर राजभवन भोपाल में सम्मान किया गया. यह सारे प्रसंग बताते हैं कि मध्यप्रदेश में प्रतिभावान, सामाजिक सरोकार और पर-हितैषी लोगों की संख्या बेशुमार हैं. कला, खेल और रोजगार के अवसर उत्पन्न करने में इनका कोई सानी नहीं है. इनकी प्रतिभा, इनका समर्पण दबा-छिपा रहता लेकिन मन की बात में उल्लेख होते ही ये लोग पूरे देश और दुनिया के लिए बेमिसाल उदाहरण बन गए हैं. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
रविवार, 2 जुलाई 2023
‘सिकल सेल’ के खिलाफ शंखनाद
बुधवार, 21 जून 2023
टेक्नो फ्रेंडली संवाद से स्वच्छत
मनोज कुमार
शुक्रवार, 2 जून 2023
वो अढाई साल और भोपाल का गौरव दिवस
मनोज कुमार
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजाद हवा में सांस ले रहा था तब भोपाल की धडक़न थरथरा रही थी. भोपाल के वाशिंदों को एक-दो दिन नहीं, पूरे अढाई साल आजाद हवा में सांस लेने के लिए इंतजार करना पड़ा था. आखिर एक लम्बे इंतजार के बाद हौले से आजादी ने भोपाल के दरवाजे पर दस्तक दी. ये अढाई साल भोपालियों के लिए संघर्ष के उन दिनों से ज्यादा भारी थे जो उन्होंने फिरंगियों से लिये थे. इस बार लड़ाई घर में थी. वह तो भला हो उस लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जिन्होंने उन नापाक मंसूबों को धराशायी कर दिया. वे ऐसा नहीं करते तो आज भोपाल, भोपाल नजर नहीं आता और गौरव दिवस तो छोडिय़े, मेरा भोपाल कहने लायक भी नहीं रहते . आज भोपाल का गौरव दिवस मनाते समय उस घाव का दर्द महसूस करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमारी नयी पीढ़ी जान सके कि गौरव ऐसे ही नहीं पाया जाता है. 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से देश को भले ही आजादी मिली हो, लेकिन, भोपाल के लोगों ढाई साल तक गुलाम ही महसूस करते रहे। 15 अगस्त 1947 के बाद भी यहां नबावों का शासन था। इसके लिए ढाई साल तक संघर्ष हुआ। खास बात यह भी है कि तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की सख्ती के बाद 1 जून 1949 को भोपाल रियासत का विलय भारत में हो गया।
15 अगस्त, 1947 को तब भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्लाह थे। अंग्रेजों के खास नवाब हमीदुल्लाह भारत में विलय के पक्ष में नहीं थे क्योंकि वे भोपाल पर शासन करना चाहते थे। जब भारत को आजाद करने का फैसला किया गया उस समय यह निर्णय भी लिया गया कि पूरे देश में से राजकीय शासन हटा लिया जाएगा। मौजूदा तथ्य बताते हैं कि जब पाकिस्तान बनाने पर निर्णय हुआ और जिन्ना ने हिन्दुस्तान के सभी मुस्लिम शासकों को भी पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव दिया। जिन्ना के करीबी होने के कारण भोपाल नवाब को पाकिस्तान में सेक्र्रेटरी जनरल का पद सौंपने की बात की गई। ऐसे में हमीदुल्लाह ने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल का शासन बनाकर रियासत संभालने को कहा, लेकिन इंकार कर दिया गया। अंतत: हमीदुल्लाह भोपाल में ही रहे और भोपाल को अपने अधीन बनाए रखने के लिए भारत सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। देश आजाद हो चुका था, हर मोर्चों पर भारतीय ध्वज लहराया जाता था लेकिन, भोपाल में इसकी आजादी किसी को नहीं थी। दो साल तक ऐसी स्थिति रही। तब भोपाल के नवाब भारत सरकार के किसी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते थे और आजादी के जश्न में भी नहीं जाते थे।
सरदार पटेल जैसे कडक़ मिजाज वाले होम मिनिस्टर नहीं होते तब शायद संभव था कि भोपाल पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका होता. इधर मार्च 1948 में भोपाल नवाब हमीदुल्लाह ने रियासत को स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए थे। इसी दौर में भोपाल रियासत में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो चुका था। भोपाल में चल रहे बवाल पर आजाद भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सख्त रवैया अपना लिया। पटेल ने नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता है। भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा। 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सभी अधिकार अपने हाथ में ले लिए। इसके बाद भोपाल के अंदर ही विलीनीकरण के लिए विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया। तीन माह तक जमकर आंदोलन हुआ।
होम मिनिस्ट पटेल के कड़े रूख के आगे नवाब हमीदुल्ला को अपनी जिद छोडक़र 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद भोपाल रियासत 1 जून 1949 को भारत का हिस्सा बन गई। केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने भोपाल का कार्यभार संभाला और नवाब को 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स तय कर सत्ता के सभी अधिकार उनसे ले लिए। उल्लेखनीय है कि भारत सन् 1947 को स्वाधीन हो गया था किन्तु मध्यप्रदेश के 2 जिले रायसेन एवं सीहोर भोपाल नवाब हमीदुल्ला के गुलाम थे। इसी गुलामी को समाप्त करने हेतु तत्कालीन रियासत भोपाल के नागरिकों ने जो आंदोलन चलाया था उसे इतिहास में भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन भी इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है. हमीदुल्लाह ने भारत सरकार के साथ बातचीत करते हुए भोपाल को अलग स्वतंत्र राज्य घोषित करने पैरवी की थी. असल में, भोपाल एक मुस्लिम नवाबी स्टेट था लेकिन वहां आबादी हिंदू बहुल थी. नवाब के अलग रहने की इच्छा बने रहने की खबर के बाद दिसंबर 1948 में भोपाल में जनआंदोलन शुरू हुआ, जब नवाब हज के लिए गए हुए थे. शंकरदयाल शर्मा, भाई रतन कुमार गुप्ता जैसे नेताओं के नेतृत्व में भोपाल के भारत में विलय के लिए ‘विलीनीकरण आंदोलन’ शुरू हुआ. आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा तो नवाबी व्यवस्था ने इसे कुचलने की कोशिश भी की. कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए तो शर्मा जैसे कुछ नेताओं को कई महीनों के लिए जेल में रहना पड़ा. आंदोलन जनक्रांति का रूप धारण कर उग्र हो गया। नबाबी कार्यालयों पर तिरंगा फहराना एवं वंदे मातरम् गान पर गिरफ्तारी, लाठी चार्ज किया जाता था।
भोपाल विलीनीकरण आंदोलन 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति मेले में क्षेत्र के नवयुवकों का उत्साह चरम पर था। नर्मदा किनारे बोरास घाट पर मेला भरा हुआ था कि बीच मेले में भोपाल नवाव के खिलाफ विलीनीकरण आंदोलन के नवयुवकों द्वारा झंडा वंदन एवं सभा का आयोजन किया गया। झंडा वंदन होने के बाद स्व. बैजनाथ गुप्ता बिजली बाबा ने झंडा वंदन गीत गाया। जाफर अली ने सभास्थल पहुंचकर झंडा उतारने एवं सभा बंद करने चेतावनी दी। इस चेतावनी से बेपरवाह 16 साल के छोटेलाल आगे आए और बोला गोली का क्या डर बताता है? तभी थानेदार ने गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस गोली से छोटेलाल शहीद हो गए। सुल्तानगंज निवासी 25 वर्षीय वीर धनसिंह राजपूत ने थाम लिया, किन्तु अगली गोली धनसिंह के सीने में समा गई। तीसरे शहीद हुए 30 वर्षीय मंगल सिंह, 3 नवयुवकों के शहीद होने के बाबजूद झंडे नीचे नहीं गिरे। चौथे नवयुवक ग्राम भुआरा निवासी विशाल सिंह ने थाम लिया परन्तु गोली चलना जारी था। विशाल सिंह के सीने में 2 गोलियां लगी परन्तु उसने भी झंडा नहीं छोड़ा। पुलिस कू्ररता पर उतर आई संगीन उसके पेट में उमेठ दी गई किन्तु विशाल सिंह ने झंडा झुकने नहीं दिया. झंडे की शान को कायम रखते हुए विशाल नर्मदा के जल तक ले गए और गड़ा दिया और हर नर्मदे कह कर अंतिम सांस ली। भोपाल की आजादी में जिन नायकों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया प्रो. अक्षय कुमार जैन, रामचरण राय, शंकरदयाल शर्मा, उद्धवदास मेहता, रतन दास गुप्ता, प्रेमनारायण श्रीवास्तव, बाल कृष्ण गुप्ता, ठाकुर लाल सिंह, शांति देवी, मोहिनी देवी, मथुरा बाबू आदि शामिल थे। दमन की कार्यवाही के बाद भी विलीनीकरण आंदोलन तेज होता गया। उस दौर में 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता सेनानियों ने जुमेराती उप डाकघर पर तिरंगा फहराया था।
भोपाल गौरव दिवस अपने होने को सार्थक कर रहा है. यह बताने का माकूल वक्त है कि आजादी के परवानों ने कैसी-कैसी आहूति दी है तब जाकर हम आजाद हैं. अंग्रेजों की कू्ररता के सामने सिर ना झुकाने वाले नायकों ने कू्रर और बेरहम नवाब को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया. ऐसा है मेरा भोपाल और हम हैं भोपाली.
रविवार, 14 मई 2023
यह शिवराजसिंह का मध्यप्रदेश है साहेब
कुमार
जीत हमेशा सकुन देती है. यह जीत व्यक्ति की हो या संस्था की और बात जब राजनीति की हो तो यह और भी अर्थपूर्ण हो जाता है. कांग्रेस की कर्नाटक में बम्पर जीत से कांग्रेसजनों का उल्लासित होना लाजिमी है. यह इसलिए भी कि लगातार पराजय के कारण कांग्रेस पार्टी के भीतर निराशा पनपने लगी थी और यह माहौल बनाया जा रहा था कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पराभव के दौर से गुजर रही है. राजनीति में यह सब होना कोई अनोखा नहीं है. कल हम शीर्ष पर थे तो आज वो हैं और कल कोई होगा. ये पब्लिक है सब जानती है कि बात यहीं चरितार्थ होती है. कांग्रेस के खुश होने के अपने कारण हैं तो भाजपा को स्वयं की समीक्षा करने के लिए एक अवसर है. आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इन राज्यों में भाजपा की परीक्षा होगी तो कांग्रेस को भी इम्तहान से गुजरना होगा. एक जीत के बाद जश्र में डूब जाना कांग्रेस के लिए कतई हितकारी नहीं होगा. कांग्रेस के लिए कर्नाटक एक अवसर बनकर आया है और इस अवसर को आगे उसे भुनाने के लिए स्वयं को तैयार करना होगा. कांग्रेस की कर्नाटक में बड़ी जीत के बाद यह माहौल बनाया जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत मिल सकती है और भाजपा पीछे रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो पाएगा, या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है. इस बात को भी समझना होगा कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी प्रदेश कर्नाटक नहीं हैं। इन राज्यों की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग है इसलिए यह मानकर चलना कि कर्नाटक जैसा परिणाम इन राज्यों में कांग्रेस के लिए होगा, अभी जल्दबाजी होगी.
जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव निकट भविष्य में होना है, वहां भाजपा समीक्षा करेगी और लगभग शेष छह माह की अवधि में स्वयं को तैयार कर इन राज्यों में अपनी सरकार बनाने या बचाने का प्रयास पुरजोर ढंग से करेगी. कांग्रेसशासित राजस्थान एवं छत्तीगसगढ़ में जिस तरह की गुटबाजी कांग्रेस में है, वह जगजाहिर है. मुख्यमंत्री गहलोत के लिए सचिन पायलट रोज एक मुसीबत लेकर सामने आ रहे हैं तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वर्सेस सिंहदेव की खटास भी किसी से छिपा हुआ नहीं है. मध्यप्रदेश में सरकार तो कांग्रेस की बन गई थी लेकिन आपसी रार के चलते एक बड़ा गुट भाजपा के साथ होकर सरकार गिराने में कामयाब रही. यही नहीं, कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामने वाले बागी नेताओं में अधिकांश ने उपचुनाव में वापस जीत दर्ज की. इस तरह से कांगे्रस को अभी आत्ममंथन की जरूरत है कि कैसे इन राज्यों में सत्ता में वापसी हो. हालांकि भाजपा में सब ठीक है, यह कहना भी गलत है। यहां भी असंतोष उभार पर है। वैसे भी राजनीति में महत्वकांक्षा पालना गलत नहीं है लेकिन योग्यता और भाग्य ही साथ देते हैं और इस पैमाने पर फिलवक्त शिवराज सिंह का कोई विकल्प नहीं है।
मध्यप्रदेश में भी विधानसभा चुनाव इस साल के आखिर में होना है और यह राज्य कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है. चुनौती कांग्रेस के लिए स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हैं. चौहान उन बिरले नेताओं में हैं जिनकी पकड़ जमीनी तौर पर पक्की है. आम आदमी के साथ उनका अपनापन का रिश्ता उस जमीन को मजबूत करता है जिसकी आम आदमी को चाहत होती है. थोड़ा अंतराल छोड़ दें तो करीब-करीब 20 वर्षों से सत्ता पर काबिज शिवराजसिंह चौहान बहनों के लिए भाई, बेटा-बेटियों के लिए मामा तो बुर्जुर्गों के लिए श्रवण कुमार बने हुए हैं. आम आदमी के बीच शिवराजसिंह चौहान ने अपनी जो छवि बनायी है, उसका तोड़ भाजपा के भीतर भी नहीं है, कांग्रेस तो दूर है ही. आपदा को अवसर में बदलने का मंत्र शिवराजसिंह को बखूबी आता है. वे किसी भी अवसर पर चूकते नहीं हैं. यही कारण है कि बार-बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के कयास लगाये जाते रहे और अब राजनीतिक गलियारों में इस कयास पर भी पूर्ण विराम लग गया है. यह अकारण नहीं है क्योंकि लोकप्रियता की दृष्टि से देखें तो शिवराजसिंह के बराबर इस समय प्रदेश में किसी भी दल में कोई लीडर नहीं दिखता है.
शिवराजसिंह इतने लोकप्रिय क्यों हैं, यह जानने की कोशिश करेंगे तो एक पंक्ति में जवाब मिलेगा कि गैरों को भी अपना बनाने की अदा. पिछले बीस वर्षों में उन्होंने जनकल्याण की इतनी जमीनी योजनाएं लागू की कि उनका कोई तोड़ किसी के पास नहीं है. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने बेटियों को सक्षम बनाने के लिए लाडली लक्ष्मी योजना का श्रीगणेश किया. बच्चियों की शिक्षा पर पूरा ध्यान आकर्षित किया और किताबों से लेकर स्कूल जाने तक के लिए सायकल का इंतजाम कर उनकी शिक्षा की गारंटी ली. अब शहरी बच्चों को स्कूटी दिला रहे हैं. यह योजना इतना पापुलर हुई कि वे सहज रूप से घर-घर के मामा बन गए. कोई उन्हें मुख्यमंत्री या राजनेता के रूप में नहीं देखता है बल्कि वे परिवार के मुखिया के रूप में चिहिंत किये गए.
ओला-पाला के बीच रोते-बिसूरते किसानों के साथ खेतों में बैठकर उनका दुख बांटते रहे. दिलासा देते रहे और उनकी जिम्मेदारी अपने हिस्से लेकर उन्हें राहत दिलाने का पूरा प्रयास किया. यहां तक कि ऐसे किसानों की बेटियों के ब्याह का जिम्मा भी सरकार ने लिया. प्रदेश के उन हजारों-हजार परिवारों के लिए वे एक नेमत की तरह मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना लेकर आए. आर्थिक और शारीरिक रूप से अशक्त वृद्धजनों को तीर्थ यात्रा पर लेकर निकल पड़े. सबसे बड़ी बात यह कि इस तीर्थदर्शन में सभी वर्ग के लोग शामिल किये गए. सर्वधर्म, समभाव की उनका यह दर्शन लोगों के दिलों तक पहुंच गया. वृद्धावस्था पेंशन का मामला हो या बच्चों के इलाज के लिए इंतजाम करना, कोई कटौती नहीं की गई. कोविड-19 के दौरान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने जो सक्रियता दिखाकर लोगों की जिंदगी बचाने में जुटे रहे. गरीब और असमर्थ लोगों को आयुष्मान योजना के तहत पूरा लाभ दिलाया और निजी अस्पतालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने से भी नहीं चूके. मंडला से झाबुआ तक, कब और कहां शिवराजसिंह पहुंच जाएं, किसी को खबर नहीं होती है. लोगों से चर्चा करना, संवाद करना और उनकी जरूरतों को जानकर उनकी जरूरत के अनुरूप योजना को मूर्तरूप देने की जो उनकी कोशिश होती है, उन्हें एक अलग रूप में खड़ा करती है.
हालिया लाड़ली बहना स्कीम ने तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को एक अलग किस्म की ऊंचाई दी है. प्रत्येक महिला को प्रत्येक माह एक हजार रुपये दिए जाएंगे जिससे वे आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन सकें. पेंशन पाने वाली माताओं को अलग करने के बजाय इसमें जोडक़र उनका भी आशीष पा रहे हैं. उनके विरोधियों केे लिए लाडली बहना स्कीम पॉलिटिकल गिमिक हो सकता है लेकिन जो लाभ लेने की स्थिति में हैं, वे इसे अपने भाई शिवराजसिंह से मिलने वाली सुरक्षा मान रही हैं. अगले महीने जब बहनों के खाते में रकम जमा होने लगेगी, तब यह अब तक कि शिवराजसिंह सरकार की सबसे बड़ी लोकप्रिय योजना साबित होगी. शिवराजसिंह जब जनसभा में बड़े मजे में बोलते हैं कि ‘बहनों को जब एक हजार रुपया मिलेगा तो सास घी चुपड़ी रोटी खिलाएगी’. उनकी इस बात पर हरेक के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान कभी किसी चाय के टपरे पर जाकर खड़े हो जाते हैं तो कभी किसी के कांधे पर हाथ रख देते हैं तो वह भाव-विभोर हो जाता है. उनके ही क्षेत्र में कुछ मजदूरों ने शिवराजसिंह को पहचानने से इंकार कर दिया था. तब भी शिवराजसिंह चौहान इसे हंसी हंसी में लेते हुए रवाना हो गए-चलो, भाई यहां शिवराज को नहीं पहचानते हैं. यही मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की विनम्रता है. यही उनकी पूंजी है जो राजनीतिक फलक से बाहर है. कल्पना कीजिए, यहीं पर उनके स्थान पर कोई और राजनेता होता तो शायद इन मजदूरों पर कहर टूट पड़ता. सौम्य, मृदुभाषी और संयत भाषा के साथ विरोधियों का सम्मान करने वाले शिवराजसिंह चौहान अजेय हैं.
निकट भविष्य के चुनाव में जीत हासिल करने के लिए एक विनम्र और मिलनसार शिवराजसिंह चाहिए. मतदाता भाजपा को अपना वोट दे या ना दे लेकिन शिवराजसिंह के नाम पर वोट ना मिले, इस पर सहसा भरोसा नहीं किया जा सकता है. मध्यप्रदेश की आर्थिक हालात, भ्रष्टाचार और ऐसे जनमुद्दों पर राज्य सरकार को घेरा जा सकता है लेकिन स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव में किसी भी दल के लिए शिवराजसिंह के स्तर पर मुकाबला आसान नहीं है. यह मध्यप्रदेश का दिल है और राज्य की जनता के दिलों में शिवराजसिंह राज करते हैं, मध्यप्रदेश की सत्ता पर नहीं.
कर्नाटक में विजय के पहले हिमाचल में जीत और नेता राहुल गांधी की अथक मेहनत के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास लौटा है और एक मजबूत लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है. किन्तु इस बात का भी खास खयाल रखना होगा कि मध्यप्रदेश हो, छत्तीसगढ़ हो या राजस्थान, सबकी आबो-हवा एक सी नहीं है. इसलिए जीत का सेहरा पहनने के लिए उत्सव नहीं, आत्ममंथन की जरूरत इस समय अधिक है. भाजपा को भी सतर्क रहने की जरूरत है क्योंकि छत्तीसगढ़ में साय और मध्यप्रदेश में दीपक जोशी का कांग्रेस में जाना चिंता में तो डालता है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो समय के गर्भ में है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
गुरुवार, 30 मार्च 2023
आह! इंदौर, वाह...इंदौरी
गिरमिटया महात्मा गांधी
आप हम जिन्हें गिरमिटिया कहते हैं, वे सब हमारे भारतीय हैं. आज भारतीय गिरमिटियों का व्यापक संसार है. साहित्य, संस्कृति एवं कला की उनकी दुन...
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-अनामिका कोई यकीन ही नहीं कर सकता कि यह वही छत्तीसगढ़ है जहां के लोग कभी विकास के लिये तरसते थे। किसी को इस बात का यकिन दिलाना भी आस...
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समागम का नया अंक आदिवासी और मीडिया पर केन्द्रीत भोपाल से प्रकाशित मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम का नवम्बर २०१० का अंक आदिवासी और मीड...
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मनोज कुमार कोविड की तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। कल क्या होगा, किसी को खबर नहीं है लेकिन डर का साया दिन ब दिन अपना आकार बढ़ा रहा है। कोरो...