मंगलवार, 13 मई 2025

क्यों जरूरी है हर विषयों पर लिखना... ##

मनोज कुमार

एक दौर था जब जवानी इश्क में डूबी होती थी लेकिन एक यह दौर है जहाँ जवानी लेखन में डूबी हुई है. विषय की समझ हो या ना हो, लिखने का सऊर हो या ना हो लेकिन लिखना है, वह भी बिना तथ्य और तर्क के. ऐसे लेखकों की बड़ी फौज तैयार हो गई है जिसे हर विषय पर लिखना शगल हो गया है. जिन्हेंं अपने शहर के बारे में नहीं मालूम, जिन्होंने कभी इतिहास के पन्ने नहीं पलटे, वे सारे के सारे विषय विशेषज्ञ हो गए हैं. उन्हें शायद बात का भी भान नहीं है कि वे ऐसा करके अपना और अपने देश भारत वर्ष का कितना नुकसान कर रहे हैं. हालिया भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय कलमवीरों ने सारी हदें पार कर लिखना शुरू कर दिया. अखबारों के सम्पादकों की समझ बड़ी है तो उन्हें पता था कि अखबारों में जगह नहीं मिलेगी सो सोशल मीडिया पर टूट पड़े. आधी-अधूरी और अधकचरी जानकारी लेकर सौ-पचास शब्दों की टिप्पणी करने लगे. ऐसा लिखने वाले कुपढ़ लोगों को इस बात का भी भान नहीं था कि इससे देश और समाज को कितना नुकसान होगा लेकिन विशेषज्ञता झाडऩे के चक्कर में और सोशल मीडिया की स्वच्छंदता ने इन्हें बेलाग बना दिया था.

हैरानी ही नहीं, खतरनाक बात है कि जिन विषयों, खासकर रक्षा जैसे विषयों पर क्या जरूरत है लिखने की? क्यों हम बेताब हो रहे हैं लिखने के लिए. जबकि इन्हें यह भी नहीं मालूम की दो देशों के मध्य युद्ध की स्थिति कब बनती है? सेना की रणनीति कभी उजागर नहीं होती है और ना ही सरकार किस नीति पर कार्य योजना तैयार कर रही है, यह आम आदमी को पता ही नहीं होता है. इधर और उधर के खेल में मनचाहे ढंग से लिखा जा रहा है, बोला जा रहा है. यह सब बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है. बार बार यह चेताये जाने के बाद कि केन्द्र सरकार द्वारा जारी अधिकृत जानकारी पर ही भरोसा करें लेकिन ये हैं कि मानते ही नहीं. अच्छा होता कि ये सारे लोग स्वयं पर नियंत्रण रखते और सेना और सरकार को उनका कार्य करने देते लेकिन ऐसा नहीं किया गया. युद्ध भूमि में ही जाना देशभक्ति नहीं है बल्कि समाज में शांति और शुचिता बनाये रखने में भी अपना योगदान देकर देशभक्ति की जा सकती है. इन लोगोंंं के कारण सरकार पर अतिरिक्त दबाव है. समाज की शांति ना बिगड़े इसके लिए एक बड़ा अमला सोशल मीडिया की निगरानी के लिए तैनात करना पड़ा है. सोशल मीडिया पर नजर रखी जा रही है कि कोई भी ऐसी पोस्ट करने वालों के खिलाफ कार्यवाही की जाए. यदि ये लोग स्वयं को नियंत्रित कर लेते तो सरकार पर अनावश्यक ना दबाव होता और ना ही इस निगरानी पर अतिरिक्त बजट खर्च करना पड़ता. यह गैर जिम्मेदारी लेखन भी एक तरह का अपराध है.

अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन ऐसे मुद्दों पर खामोश रहना ही बेहतर होता. बल्कि यह भी होना चाहिए था कि ऐसा कोई कर रहा है, सोच रहा है तो उसे रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए. जब सत्ता पक्ष और विपक्ष देश की सुरक्षा के लिए, सम्मान के लिए साथ हैं तो आपको क्या चूल मची है कि लिखते जाओ. मीडिया की भूमिका के बारे में कुछ कहना बेकार ही अपना ऊर्जा खर्च करना होगा. जिस तरह से मनगढंत खबरें दिखायी जा रही थीं, उससे आम आदमी के मन में धारणा गलत बन रही थी. आखिरकार सेना और सरकार की चेतावनी के बाद कुछ सम्हले लेकिन कब सम्हले रहेंगे, यह कहना मुश्किल है. टीआरपी की होड़ ने इन्हें भी बेलगाम कर दिया था. 

बिना समझे-बूझे और विषय की जानकारी के बिना गैर-जिम्मेदारी से लिखने की यह बीमारी समाज ने कोविड के दरम्यान भी देखा है. चंूकि उस समय हर व्यक्ति इस बात से भयभीत था कि जाने कब कोविड उन्हें घेर ले तो वह कभी कभी चुप्पी साध लेता था लेकिन तब भी वह गैरजिम्मेदारी लेखन से बाज नहीं आया. डॉक्टर और पुलिस के साथ जिम्मेदार मीडिया हर पल की खबर दे रहा था लेकिन कोविड के इंजेक्शन और दवाईयों को लेकर बेखौफ लिखा जा रहा था. कोविड ने कितनों को मौत की नींद सुला दिया और कितनों को श्माशान में जगह मयस्सर नहीं हुई, इस पर घर बैठे खबर लिखने वालों की कमी नहीं थी. यह गैर जिम्मेदाराना लेखन हर बार देखा जाता है. चूंकि सोशल मीडिया पर किसी का नियंत्रण नहीं है तो ऐसे कृत्य करने वालों की भरमार हो जाती है. एक किसी साहब ने सोशल मीडिया पर लिखा कि युद्ध में जाने के लिए कौन-कौन तैयार हैं लेकिन इन साहब ने यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि वे अब तक घर पर क्यों हैं? क्यों उन्होंने रणभूमि में जाना स्वीकार नहीं किया. मध्यप्रदेश के ट्रक संचालकों ने सरकार से अनुरोध किया कि ऐसे वक्त में उनकी जरूरत है तो वे तैयार हैं. इस पर एक बुद्धिजीवि ने लिखा कि हम हैं तैयार. यह समझना मुश्किल था कि वे ट्रक संचालकों का हौसला बढ़ा रहे हैं या स्वयं ट्रक लेकर सेना की मदद के लिए जाने की बात कर रहे हैं. अफसोस कि ऐसे लोगों की संख्या बेशुमार है.

अभिव्यक्ति की आजादी है तो आप सम-सामयिक मुद्दों पर लिखिए. स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, किसान, महिलाएं, अपराध जैसे हजारों विषय है, इस पर लिखिए. कुछ गलत भी लिख दिया तो बहुत कुछ बिगड़ेगा नहीं लेकिन आपकी बुद्धि का खुलासा हो जाएगा. दरअसल ये जो तथाकथित लेखक हैं वे तर्क के साथ, तथ्यों के साथ नहीं लिख रहे हैं बल्कि उनका हथियार कुर्तक है. इनमें से ज्यादत को तो यह भी नहीं मालूम होगा कि 2025 के पहले युद्ध कब हुआ था? क्यों हुआ था और उसका परिणाम क्या निकला? इस बात पर भी बहस चल पड़ी है कि कौन सा शासक वजनदार था. इस सवाल को उठाने के पहले वे यह भूल जाते हैं कि समय और स्थिति के अनुरूप निर्णय लेना होता है. हाँ, इस बात से इंकार नहीं कि उस दौर का फैसला आज के लिए मिसाल है तो इस दौर के फैसले के परिणाम की प्रतीक्षा तो कीजिए. लेकिन हमारे पास संयम नहीं है. हम बेताब होकर जल्दबाजी में हर फैसला सुना देना चाहते हैं. ऐसा सवाल करने वाले और मिसाल देने वाले तथा गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी करने वालों में कोई फर्क नहीं. बेहतर होगा कि हम सब एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका का निर्वाह करें. देश और समाज को मजबूत बनायें और सरकार को बेवजह मुसीबत में ना डालें. हम सब यह कर लेते हैं तो यह भी देशभक्ति की जीवंत मिसाल होगी.

गुरुवार, 1 मई 2025

## 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

 26 साल का इंतजार और मेहनतकशों के हक में मोहन सरकार

मनोज कुमार

कैलेंडर में दर्ज तारीख के हिसाब से हर साल एक मई को दुनिया के साथ हम लोग भी मई दिवस मनाते हैं. मजदूरों के हक-हूकुक की बातें करते हैं और इस दिन के साथ बिसरा देते हैं लेकिन मध्यप्रदेश मई दिवस के लिए 1 मई का इंतजार नहीं करेगा बल्कि हर साल सेलिबे्रट करेगा 25 दिसम्बर को. मोहन सरकार के एक फैसले ने ना केवल मई दिवस की तारीख का अर्थ ही बदल दिया बल्कि हजारों मजदूरों की आँखों से आँसू पोंछ लिए. हजारों मजदूर, 224 करोड़ रुपये और 26 सालों का लम्बा इंतजार. इन सालों में 26 बार मई दिवस आता-जाता रहा लेकिन आने-जाने वाली सरकारों के लिए यह एक आम मुद्दा था. न्याय के लिए बरसों से इंतजार करते करते अनेक मजदूरों की जीवनलीला खत्म हो गई. परिवार तंगहाली और बदहाली में जीता रहा. यहां-वहां से लेकर अदालत के दरवाजे तक इन मजदूरों ने गुहार लगायी लेकिन मामला सिफर रहा. सब कुछ हो रहा था लेकिन नहीं हुआ तो मजदूरों के हक में फैसला. करीब-करीब डेढ़ वर्ष पहले मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री का परिवर्तन होता है और शिवराजसिंह चौहान के स्थान पर डॉ. मोहन यादव नए मुख्यमंत्री बनते हैं. कभी शिवराजसिंह चौहान मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री का प्रभार सम्हालने वाले डॉ. यादव से भी कोई बड़ी उम्मीद सालों से अपनी मजदूरी पाने के लिए लड़ते मजदूरों को नहीं थी. लेकिन समय का लेखा कौन जानता है. मुुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अचानक से फैसला लिया और 26 सालों से अटकी उनकी मजदूरी का फैसला चंद मिनटों में कर दिया. डॉ. यादव के इस फैसले ने मोहन सरकार के प्रति लोगों में विश्वास का भाग जगा दिया. इसी के साथ 25 दिसम्बर, 2023 एक अमिट तारीख के रूप में मध्यप्रदेश के कैलेंडर में दर्ज हो गया है. मामला मालवा की कभी शान और इंदौर की पहचान रही हुकमचंद कपड़ा मिल के बंद हो जाने के बाद बेकार और बेबस हुए मजदूरों का है. साल-दर-साल गुजरता रहा और सब कुछ स्याह अंधेरे में कैद रहा. अदालत ने आदेश दिया कि हुकमचंद कपड़ा मिल के मालिकाना हक की जमीन को बेच कर मजदूरों की मजदूरी का भुगतान किया जाए. अनेक कोशिशों के बाद भी जमीन कौड़ी के मोल पड़ी रही. कोई खरीददार सामने नहीं आया और ना ही पूर्ववर्ती सरकारों ने कोई ठोस फैसला लिया. निराशा में डूबते-उतरते हजारों मजदूरों को लग रहा था कि अब उन्हें न्याय नहीं मिलने वाला लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मोहन सरकार ने फैसला लिया और चंद मिनटों में सभी मजदूरों को उनका बकाया मजदूरी, ग्रेज्युटी और दीगर भुगतान देेने का रास्ता साफ कर दिया.

मोहन सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला था लेकिन था जनहित का फैसला. मालवा की तासीर ही कुछ अलग किस्म की है और उज्जैन से आने वाले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तासीर भी मालवा की तरह ही है. वे स्वयं एक ऐसे परिवार से आते हैैं जिन्होंने मजदूरों का दर्द देखा है सो मुख्यमंत्री की नजर से नहीं बल्कि मनुष्य की नजर से उन्होंने इस मामले को देखा. देखा और समझा तो उन्होंने पहले भी था लेकिन मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था, सो खामोश रहे लेकिन सत्ता की बागडोर सम्हालते ही किसी और के अप्रोच किए बिना ही स्वयं संज्ञान लेकर मजदूरों की झोली में खुशी का फैसला डाल दिया. मोहन सरकार के इस फैसले से जैसे मालवा और खासतौर पर इंदौर झूूम उठा. इंदौर का मस्तिष्क शान से और गर्व से भर उठा. 

26 साल पहले हुकमचंद मिल बंद हुई थी। इसके बाद से मिल के पांच हजार से ज्यादा मजदूर वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य लेनदारियों के लिए भटक रहे हैं। कोर्ट ने मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान करने का आदेश दिया था। कई बार नीलामी निकालने के बावजूद जमीन नहीं बिकी। हुकमचंद कपड़ा मिल के मामले में मोहन सरकार का यह फैसला दूरदर्शी था. अदालत के आदेश के बाद भी हुकमचंद कपड़ा मिल की जमीन ना बिक पाने पर उन्होंने सरकार के हक में लेकर नगर निगम इंदौर को सौंप दिया. अब इस जमीन पर आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू हो रही है. मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल को यह जमीन सौंप कर जिम्मेदारी दी गई है कि आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियां शुरू की जाए.  सरकार ने मिल की जमीन का लैंड यूज औद्योगिक से बदलकर वाणिज्यिक और आवासीय कर दिया है। मिल की कुल जमीन में से 10.768 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज वाणिज्यिक और 6.752 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज आवासीय किया गया है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने निर्देश दिए कि मध्यप्रदेश में जिन अन्य मिलों की देनदारियां शेष हैं, उन मिलों के प्रकरणों का निराकरण भी हुकुमचंद मिल के मॉडल के आधार पर कर मजदूरों को राहत दी जाए. यह एक सत्ताधीश का फैसला नहीं है औ ना ही इसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाना चाहिए। यह एक मनुष्य का मनुष्य के लिए लिया गया फैसला है जिसे मानव कल्याण के रूप में देखा और समझा जाना चाहिए. जैसा कि डॉ. मोहन यादव के निर्देश हैं कि अन्य मिलों की देनदारियों को इसे ही मॉडल मानकर निपटारा किया जाए तो यह फैसले मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक फैसला माना जाएगा.

एक समय था जब बड़े मजदूर संगठन हुआ करते थे. मजदूरों के हक के लिए वे सडक़ों पर उतर आते थे. कई बार उनकी मांगों को मान लिया जाता था तो कई बार ठुकरा दिया जाता था. धीरे-धीरे श्रमिक संगठन विलुप्त होते गए. मजदूर खुद के हक की लड़ाई खुद ही लड़ते रहे. मई दिवस का ताप समाप्त होता रहा और शायद यही कारण है कि 26 सालों से हुकुमचंद मिल के मजदूरों को उनका हक नहीं मिल पाया था. अभी और भी ऐसे मिल शेष हैं जिनके मामले निपटाया जाना है. अब श्रमिक संगठन कागज पर हैं और वे जमीन पर होते तो शायद हुकुमचंद मिल के श्रमिकों को 26 साल का इंतजार नहीं करना होता. खैर, अब मध्यप्रदेश के मेहनतकशों को श्रमिक संगठनों की जरूरत नहीं पड़ेगी जब सरकार ही उनके हक में फैसला ले रही है. शायद 1956 में मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद मेहनतकशों के हक में ऐसा फैसला पहली बार किसी ने लिया है तो इसके लिए मोहन सरकार के हक में जाता है. मध्यप्रदेश अब गर्व से मई दिवस सेलिबे्रट करेगा.

बुधवार, 30 अप्रैल 2025

‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ#

 ‘अक्षय’ संकल्प लें बाल विवाह के खिलाफ

मनोज कुमार

समय बदल रहा है लेकिन हमारी सोच आज भी वही पुरातन है. आधुनिक बनने का भले ही ढोंग करें लेकिन भीतर से हम रूढि़वादी हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीय समाज से बाल विवाह जैसी कुप्रथा कब की खत्म हो चुकी होती लेकिन ऐसा नहीं हुआ है. अनेक प्रयासों के बाद भी हर वर्ष बड़ी संख्या में बाल विवाह की खबरें हमें डराती हैं. सरकारों के प्रयासों से बाल विवाह में कुछ कमी आयी है लेकिन जरूरी है कि इस बार हम अक्षय तृतीया पर ‘अक्षय संकल्प’ लेेें कि हर स्तर पर बाल विवाह को हत्सोसाहित करेंगे.

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है. अक्षय का अर्थ होता है जिसका कभी क्षय ना हो और इस दिन किए गए हर कार्य शुभ माने जाते हैं. वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाये जाने के कारण इसे अक्षय तृतीया का संबोधन मिला. अक्षय तृतीया का महत्व कई कारणों से है जिसमें परशुराम का जन्म, वेदव्यास का महाभारत लेखन का आरंभ होने के साथ ही माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन मनाया जाता है. इसी शुभ दिन स्वर्ग से पृथ्वी पर माता गंगा अवतरित हुई थी. माता गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए राजा भागीरथ में हजारों वर्ष तक तपस्या की थी. मान्यता के अनुसार अक्षय तृतीया पर गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं.

अक्षय तृतीया के दिन बिना किसी मुर्हूत के विवाह का मंगल कार्य पूरा किया जा सकता है इसलिए इस अवसर पर भारतीय समाज में विवाह को शुभ माना गया है. कुछ रूढि़वादी सोच ने व्यस्क के स्थान पर इस दिन बाल विवाह को शुभ मानकर उन्हें विवाह के पवित्र बंधन में बांध देते हैं. यह अनुचित है. कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता है और यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह खतरनाक है. विवाह की कानूनी आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लडक़ों के लिए 21 वर्ष है, उन लोगों की एक बड़ी संख्या के लिए अप्रासंगिक और महत्वहीन हो जाता है जो सदियों पुरानी परंपराओं और हठधर्मिता के कारण अंधे और भटके हुए हैं, जिन्हें वे अनुष्ठान कहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर टिप्पणी की थी. उनका कहना था कि देश में हजारों नाबालिग लड़कियों की शादी कर दी जाती है और उनके स्वास्थ्य, गर्भ धारण करने की क्षमता तथा इसके प्रतिकूल, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रभावों की परवाह नहीं करते हुए उनसे शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं. निश्चित रूप से यह भारत जैसे विकसित देश के लिए एक धब्बा था जिसे केन्द्र और राज्य सरकार के प्रयासों से दूर किया जा सका है.

समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आने लगा है. बाल विवाह पर नियंत्रण पाने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार ने ना केवल कानून सख्त किया बल्कि बच्चों, खासतौर पर बेटियों के हक में अनेक योजनाएं आरंभ की है. इसका परिणाम यह हुआ है कि समाज में बाल विवाह की कुप्रथा पर ना केवल रोक  लगी है बल्कि समाज का मन भी बदलने लगा है. सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

तकरीबन डेढ बरस पहले मध्यप्रदेश में लिंगानुपात की जो हालत थी, उसमें सुधार आने लगा है. एक दशक पहले एक हजार की तादात पर 932 का रेसियो था लेकिन गिरते गिरते स्थिति बिगड़ गई थी. हाल ही में जारी आंकड़े इस बात की आश्वस्ति देते हैं कि हालात सुधरे भले ना हो लेकिन सुधार के रास्ते पर है. आज की तारीख में 1000 पर 930 का आंकड़ा बताया गया है. एक तरह से झुलसा देने वाली स्थितियों में कतिपय पानी के ठंडे छींटे पड़ रहे हैं. लगातार प्रयासों का सुपरिणाम है कि उनकी बेटियां मुस्कराती रहें और कामयाबी के आसमां को छुये लेकिन इसके लिए जरूरी होता है समाज का साथ और जो स्थितियां बदल रही है, वह समाज का मन भी बदल रही है.

यह कहना भी फिजूल की बात होगी कि पूर्ववर्ती सराकरों ने बिटिया बचाने पर ध्यान नहीं दिया लेकिन यह कहना भी अनुचित होगा कि सारी कामयाब कोशिशें इसी दौर में हो रही है. इन दोनों के बीच फकत अंतर यह है कि पूर्ववर्ती सरकारों की योजनाओं की जमीन कहीं कच्ची रह गयी थी तो वर्तमान सरकार ने इसे ठोस बना दिया. जिनके लिए योजनायें गढ़ी गई, लाभ उन तक पहुंचता रहा और योजनाओंं का प्रतिफल दिखने लगा. महिला एवं बाल विकास विभाग का गठन बच्चों और महिलाओं के हक के लिए बनाया गया था. इस विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नयी योजनओं का निर्माण करें और महिलाओं को विसंगति से बचा कर उन्हें विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ाये. योजनाएं बनी और बजट भी भारी-भरकम मिलता रहा लेकिन नीति और नियत साफ नहीं होने से कारगर परिणाम हासिल नहीं हो पाया. मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडोर सम्हालने के बाद डॉ. मोहन यादव ने बेटियों की ना केवल चिंता की बल्कि समय-समय पर उनकी खोज-खबर लेते रहे. जब मुखिया सक्रिय और सजग हो जाए तो विभाग का चौंकन्ना होना लाजिमी था. मुख्यमंत्री की निगहबानी में परिणामदायी योजनाओं का निर्माण हुआ और परिणाम के रूप में दस वर्ष में गिरते लिंगानुपात को रोकने में मदद मिली. एक मानस पहले से तैयार था कि बिटिया बोझ होती है और कतिपय सामाजिक रूढिय़ों के चलते उनका बचपन में ब्याह कर दिया जाता था. लेकिन पीछे कुछ वर्षों के आंकड़ें इस बात के लिए आश्वस्त कराते हैं कि समाज का मन बदलने लगा है.

बेटियों को रूढिय़ों से मुक्त कराने की दिशा में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के साथ ही अनेक योजनाओं का श्रीगणेश किया गया था जिसका प्रतिफल मिला कि बाल विवाह जैसी कुरीतियों पर कुठाराघात होने लगा. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा से बीते वर्ष 2024 को ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ का शुभारंभ किया गया था. बाल विवाह मुक्त भारत अभियान देश को बाल विवाह मुक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करेगा. यह अभियान बाल विवाह को खत्म करने और देश भर में युवा लड़कियों को सशक्त बनाने के लिए सरकार के चल रहे प्रयासों का एक प्रमाण है, जो एक प्रगतिशील और समतापूर्ण समाज सुनिश्चित करता है जहां हर बच्चे की क्षमता को पूरी तरह से साकार किया जा सके। जो विकसित भारत के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए लड़कियों और महिलाओं के बीच शिक्षा, कौशल, उद्यम और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। उल्लेखनीय है कि बाल विवाह मुक्त भारत प्रधानमंत्री के वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने से प्रेरित है। इस सपने को तब तक हासिल करना संभव नहीं है जब तक महिलाओं और लड़कियों को जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्ण, समान और सार्थक भागीदारी न मिले।

सनातन धर्म बहुमुखी है और वह समय के साथ अपनी सोच एवं दृष्टि में परिवर्तन करता है. अक्षय तृतीया पर अक्षय सोच के साथ समाज के सभी वर्ग मिलकर बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित है. कानून अपना कार्य करेगा लेकिन समाज का हर वर्ग ‘अक्षय संकल्प’ ले ले कि वह इस कुप्रथा के खिलाफ खड़े हो जाएंगे

रविवार, 27 अप्रैल 2025

#प्रो मनोज कुमार की किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म"

 "डायबिटीज का इलाज गुलाब जामुन से संभव है" इस चेतावनी से सजग 

करती प्रो मनोज  कुमार की किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म"

        नैतिक आचरण पर आधारित परिवार की अगली पीढ़ी अगर मूल्यविहीन हो जाये, तो जो पीड़ा घर के सबसे बड़े बुजुर्ग की होती हैं, उसी दर्द को महसूस करने का नाम है,  प्रो मनोज कुमार की नई किताब "टारगेटेड जर्नलिज्म" ।

        यह किताब कल ही मेरे हाथ में आई है। लेखक एवं प्रोफेसर भाई मनोज कुमार से मेरा तीन दशक पुराना संबंध है। मैंने पत्रकारिता का ककहरा पहले दिन से इनके सानिध्य में बैठकर शुरू किया है। जब मैंने 1991 में पत्रकारिता में पहला कदम रखा था, तब यह विधा अपनी नैतिकता के चर्मोत्कर्ष को छूकर उतार पर चल पड़ी थी।

        देश को साहित्यकार एवं संपादक देने वाला नई दुनिया विभाजन के बाद बिकने पर आ गया था। कलरफुल फिल्मी कलाकारों के पोस्टर छाप कर दैनिक भास्कर अपनी ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा था। पाठकों की संख्या में नवभारत एवं दैनिक भास्कर रोज पूरे पेज के विज्ञापन छाप कर अपने पाठक संख्या की लड़ाई लड़ रहे थे। सामाजिक मूल्यों की पैरवी  करने वाला देशबंधु, स्वदेश, नवजीवन, अस्तित्व बचाने पर लगे हुए थे।     

        90 के दशक के बाद बदलाव आते चले गए और लिखने पढ़ने वालों से निकाल कर पत्रकारिता शब्दों के साहूकारों के हाथ में यात्रा पर निकल पड़ी। विचारों को समाज से रूबरू कराने के लिए शुरू किए गए अखबार दम तोड़ने लगे तथा कारोबार से जुड़े लोगों का इसमें प्रवेश शुरू हो गया। 

        कारोबार का उद्देश्य सिर्फ लाभ कमाना था, वही अखबारों का उद्देश्य होता चला गया। विचारवान लोग संपादक तक सीमित होते - होते बाद में कारोबार के दरबारी हो गए। जो कारोबारी धंधे में बिंदी लगाने का काम करते थे, वह संपादकीय की बिंदी चेक करने लगे। जब उन्हें बिंदी समझ में नहीं आई, तो संपादकीय छापना  ही बंद करवा दिया। खबर की  जिस बिंदी में धंधा कम दिखा, उसकी बिंदी हटा दी और जहां फायदा ज्यादा दिखा वहाँ बिंदी लगा दी। 

    मूल्य आधारित पत्रकारिता में जब पत्रकारिता के मूल्य लगने लगे तो हर खबर की कीमत तय होने लगी। इसी बात को निचोड़ कर रख दिया है प्रो मनोज कुमार ने अपनी पुस्तक "टारगेटेड जर्नलिज्म"  में।

         वैसे भी पत्रकारिता समाज का आईना है, आईने में वही दिखेगा जो समाज में हो रहा है। शिक्षक पढ़ाने से ज्यादा ट्यूशन पर ध्यान दे रहे हैं। डॉक्टर इलाज से ज्यादा जांच रिपोर्ट करवाने पर ध्यान दे रहे हैं। ऐसे में पत्रकारिता के चरित्र में वही अक्स दिख रहा है, जो समाज में चल रहा है। मशहूर व्यंगकार डॉ संपत सरल कहते हैं कि "पहले अखबार के पाठक हुआ करते थे, अब अखबार के ग्राहक होते हैं। जहां ग्राहक की बात होती है, वहां हर चीज धंधा बन जाती है।"

         प्रो मनोज कुमार की यह कृति पत्रकारिता की व्यावसायिक मानसिकता से सबको परिचित कराती है। पुस्तक का हर आलेख स्पष्ट करता है, कि जो दिख रहा है वह आपके स्वास्थ्य के लिए चाहे हानिकारक हो,  पर टेस्ट के हिसाब से लाजवाब है।   

        समाज में आप जिस तरह का आचरण चाहते है, उसी को परोस कर आपके जायके के अनुरूप पत्रकारिता को बना दिया है। नैतिक मूल्यों पर आधारित पत्रकारिता सदैव बाजारवाद के खिलाफ थी, अब पत्रकारिता में खुद बाजारवाद आ गया है। 

        किताब के बारे में कहा जा सकता है कि इस किताब के माध्यम से पत्रकारिता करने वाली नई पीढ़ी को यह बताया जा सकता है, हम कहां से चले थे और अब किस मुकाम पर पहुंच चुके हैं। नैतिकता को बाजारवाद की चपेट में आने और व्यवसाय में बदलने की पीड़ा को इस पुस्तक के माध्यम से समझा जा सकता है।

        कुल मिलाकर प्रो मनोज कुमार की यह किताब पढ़ने के बाद जब भी आप कोई खबर पड़ेंगे, तो आपको खबर पढ़ने के बाद उसमें छुपा हुआ टारगेट सामने दिखने लगेगा। आपको हर खबर पढ़ते समय एहसास कराएगी की हकीकत कुछ और है, खबर में कुछ और टारगेट छुपा हुआ है। जो भी आप पढ़ रहे हैं वह व्यवसायिकता के टारगेट को पूरा कर रहा है और आपके जायके  के अनुसार खबरों की रेसिपी को प्रस्तुत कर रहा है। 

    हो सकता है किसी दिन डायबिटीज का मरीज  घर वालों से कह , देखो खबर आई है शुगर का इलाज, गुलाब जामुन खाने में छुपा हुआ है। बाद में पता चले इस खबर को टारगेट शहर के हलवाई ने करवाया था।

    यह किताब पाठकों के साथ पत्रकारिता से जुड़े हुए लोगों के लिए बेहतर अध्ययन सामग्री है।


लेखक प्रो. मनोज कुमार 

प्रकाशक लोक प्रकाशन, भोपाल

मूल्य 300,/

पृष्ठ 148

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

#पंचायतों में आत्मनिर्भर होती महिलाएं


 







राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर 24 अप्रैल पर विशेष

पंचायतों में आत्मनिर्भर होती महिलाएं

मनोज कुमार

 73वें संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था में जो कमियां-खामियां थी, उसे दूर करने का प्रयास किया गया है और इस प्रयास के जरिए गाँधी के ग्राम स्वराज का स्वप्र मध्यप्रदेश की धरती पर सच होता नजर आ रहा है. इस संशोधन को लागू करने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्य था. आहिस्ता-आहिस्ता पंचायत की सत्ता में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ायी गई. यही वजह है कि मध्यप्रदेश की स्त्री अब अधिकार सम्पन्न और आत्मनिर्भर हो चली हैं. स्वयं सहायता समूह ने पंचायतों की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया है. अब गाँव की स्त्रियां आर्थिक रूप से मजबूत ही नहीं हैं बल्कि वे जागरूक भी हैं और समाज को जगा भी रही हैं. मध्यप्रदेश के गाँव-गाँव में स्व सहायता समूह अलख जगा रही हैं. स्त्रियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार के प्रयासों ने सार्थक भूमिका निभायी है. हालांकि यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि स्त्रियों  की सत्ता में स्वतंत्र भूमिका है. आज भी सरपंच पति जैसी घटनाएं आम है. पंचायत सत्ता की इस कमी को समझते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरपंच पति की व्यवस्था को जड़ से खत्म करने का आह्वान किया है. 

उल्लेखनीय है कि पंचायती राज व्यवस्था अनादिकाल से भारतीय समाज में लागू रहा है लेकिन अंग्रेजी शासन ने हमारी इस व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया. सबसे पहले पंचायतों को आर्थिक रूप से सुनियोजित ढंग से कमजोर किया गया और उसे आत्मनिर्भर बनने से रोका गया. देश के आजाद होने के बाद पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ और परिणामदायी बनाने के लिए अनेक स्तर पर कोशिश की गई. 1992 में पंचायती राज व्यवस्था में 73वां संशोधन कर अनेक स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने का प्रावधान किया गया. मध्यप्रदेश ने सर्वप्रथम इस संशोधन को लागू कर देश का पहला प्रदेश बना. यही नहीं पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई. गाँधी जी का कहना है कि प्रत्येक गाँव को एक आत्मनिर्भर स्वायत्त इकाई के रूप में स्थापित करना ही ग्राम स्वराज की अवधारणा का मुख्य लक्ष्य है. गांधी जी के अनुसार ग्राम स्वराज का वास्तविक अर्थ आत्मबल से परिपूर्ण होना है. स्वयं के उपयोग के लिए स्वयं का उत्पादन, शिक्षा और आर्थिक संपन्नता से है.

गाँधीजी ग्रामवासियों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे, शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे, समाज से जातपात मिटा कर हर तबके के लोगों को मुख्यधारा में लाना चाहते थे. वे ग्रामीणों में स्व-चेतना के विकास के लिए नाटकशाला एवं सभाशाला भी खोलते हैं और मनुष्यों में स्व की चेतना जागृत करते हैं. ‘हिंदे-स्वराज’ की कल्पना ‘ग्राम-स्वराज’ का पर्याय बन जाता है. वे लिखते हैं- ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर निर्भर नहीं करेगा. वह परस्पर सहयोग से काम लेगा. हर गाँव में अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभाभवन रहेगा. बुनियादी तालीम के आखिरी दर्जे तक शिक्षा सबके लिए लाजमी होगी. जातपात और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाए जाते हैं वैसे इस ग्राम समाज में बिल्कुल नहीं होंगे. गाँधीजी की दृष्टि से ग्राम स्वराज में आर्थिक व्यवस्था ही आदर्श नहीं, अपितु सामाजिक व्यवस्था का भी महत्व है. इसलिए वे सभी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं. वे बताते हैं कि जब तक मनुष्य की सोच, चरित्र एवं कर्म शुद्ध नहीं हो जाए तब तक उसका सर्वांगीण विकास संभव नहीं है. वह मद्यपान निषेध पर जोर देते हैं तथा समाज से जातिवाद, छुआछूत आदि को खत्म करना चाहते हैं.  गाँधीवादी आदर्श सिर्फ कोरे आदर्श पर नहीं बल्कि यथार्थ और व्यावहारिक है और 73वें संशोधन में ग्राम स्वराज के स्वप्र को सच होते हुए दिख रहा है.

मोदी सरकार भी गाँधीजी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने के लिए संकल्पित है. सच तो यह है कि पूरा समाज मिलकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में चल पड़े और इसका एक ही विकल्प है गाँवों को आत्मनिर्भर बनाना. गाँधीजी स्वयं मानते थे कि औद्योगिकरण बुरा नहीं है लेकिन सब कुछ उस पर ही निर्भर हो जाना बुरा है. केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाएँ हैं जिसमें कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है. निश्चित रूप से यह गाँधी विचार को विस्तार देने का ही प्रयास है. हम मानकर चलते हैं कि गाँधी का रास्ता ही अंतिम रास्ता है जिस पर चलकर हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं. हालाँकि व्यवहार रूप में कई समस्या देखने में आयी. महिला तो निर्वाचित हो गईं लेकिन पंचायत की बागडोर घर के पुरुष के हाथों में रही. आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों द्वारा पंचायतों पर कब्जा जमाने की खबरें भी आती रही हैं. बावजूद इसके स्थितियाँ बदल रही है. 

पंचायत की सत्ता में महिलाओं की भागीदारी महज स्वप्र था. घूंघट में चेहरा छिपाये महिलाओं के बारे में कभी यह सोचा भी नहीं गया कि वे घर की देहरी पार कर पंचायत की सत्ता सम्हालेंगी. लेकिन अब यह स्वप्र नहीं, सच है और महिलाएं ना केवल गाँव की सत्ता सम्हाल रही हैं बल्कि गाँव की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को मजबूत बना रही हैं. मोहन सरकार और पंचायत मंत्री ने महिलाओं की सत्ता में रोड़े डालने वाले लोगों पर नकेल डालकर महिलाओं की सत्ता को आसान कर दिया है. यही नहीं, स्व सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को विभिन्न टे्रड में ट्रेंड किया जा रहा है. बैंकिंग जैसे दुरूह कार्य को इतना आसान बना दिया गया है कि महिलाओं के हाथों में लेपटॉप है और वे खाता खुलवाने से लेकर पैसा निकासी तक का सारा काम चुटकियों में कर रही हैं. कुछ तकनीकी कार्य बिजली मीटर रीडिंग हो या छिटपुट इलेक्ट्रिक मरम्मत का काम भी वे करने लगी हैं. सरकार ने नियम बना दिए हैं कि स्कूल गणवेश का पूरा काम अब स्व सहायता समूह को दिया जाएगा. सरकार के इस फैसले से उन्हें पर्याप्त काम मिल रहा है और गुणवत्ता पूर्ण बेहद रियायती दरों में कार्य पूर्ण हो रहा है. खान-पान की दुनिया में स्व सहायता समूह की धमक है. अचार, पापड़ के साथ ही जैविक पदार्थों में उनका पूरा हस्तक्षेप है. 

स्व सहायता समूह आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के कारण अपनी जरूरतों के अब किसी साहूकार के पास हाथ महिलाओं को हाथ नहीं पसारना पड़ता है. वे आपस में ही अपनी जरूरत के अनुरूप राशि का आहरण कर लेती हैं और सुविधानुसार समय पर राशि वापस भी कर देती हैं. स्व सहायता समूह की महिलाओं ने इतिहास रच दिया है. बच्चों को अपने मन मुताबिक पढ़ाई करा रही हैं. एक दाग सरपंच पति का था, अब वह भी आहिस्ता आहिस्ता दूर हो रहा है. सरकारी डंडे और महिलाओं के जागरूक हो जाने के कारण पति खुद ही सत्ता से दूर हो रहे हैं. इक्का-दुक्का घटनाएं सामने आ रही हैं लेकिन कानूनी कार्रवाई के चलते दूसरी पंचायतों में स्थितियां सुधर रही हैं. स्व सहायता समूह की महिलाओं के प्रयासों से बाल विवाह के साथ ही अन्य सामाजिक कुरीतियों पर नियंत्रण लगा है. पंचायती राज व्यवस्था का चेहरा बदल रहा है और खासतौर पर महात्मा गाँधी के सपनों के अनुरूप लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है. गाँधीजी चाहते थे कि महिलाएं आत्मनिर्भर हों और आर्थिक रूप से, शैक्षिक रूप से सशक्त बनें तो आज मध्यप्रदेश में उनका सपना सच हो रहा है. Photo by Google

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