लिव-इन रिलेशनशिप :
स्वंतत्रता नहीं, स्वच्छंदता
प्रो. मनोज कुमार
लिव-इन रिलेशनशिप क्या भारतीय समाज और उसकी व्यवस्था के अनुरूप है? क्या इससे सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न नहीं हो रहा है? बिलकुल इस नए किस्म के रिश्ते से कई तरह की समस्या उत्पन्न हो रही है। आए दिन अपराध के जो नए-नए मामले आ रहे हैं, वह कानूनी दृष्टि से एक बड़ी समस्या बन चुकी है तो समाज में अविश्वास का भाव उत्पन्न हो रहा है। जिस सनातनी समाज की हम कल्पना करते हैं, वहाँ वसुधैव कुंटुंबकम की बात करते हैं, वहाँ इस तरह के नए रिश्तों को कोई जगह नहीं है। अलग-अलग किस्म के सर्वे में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि अब लड़कियाँ जल्द शादी नहीं करना चाहती हैं या नहीं करना चाहती हैं। कई ऐसे सेलिब्रेटी हैं जिन्होंने पिछले दिनों भारतीय विवाह संस्था को बेकार और बेकाम साबित करने वाले बयान दिए हैं। भारतीय वैवाहिक संस्था किसी धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सुविचारित अनादिकाल से बनी हुई है। विवाह का अर्थ केवल संतान उत्पन्न करना नहीं है अपितु दो परिवार आपस में मिलते हैं और समग्र विकास, सहयोग और विश्वास का रिश्ता बनता है। यही भारतीयता का मूल आधार है लेकिन लिव-इन रिलेशनशिप ने जैसे इसे ताक पर रख दिया है।
जब हम कानून के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करते हैं तो कानून समाज में सभी के अधिकारों की बात करता है और इसे उसका दायित्व माना जा सकता है। जैसा कि लिव-इन रिलेशनशिप के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माना है। इस पर समाज में लंबे समय से विमर्श चल रहा है और बातें आगे भी होती रहेंगी। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार ने प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के अंतर्गत लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। यह कानून वर्तमान समय में सामाजिक और कानूनी दृष्टि से चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है। सरकार का उद्देश्य लिव-इन संबंधों को कानूनी मान्यता प्रदान करने के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। संभव है कि जल्द ही प्रस्तावित प्रावधान अमल में लाया जा सके। सरकार जो कर सकती है, वह कर रही है। प्रस्तावित नए कानून में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि लिव-इन संबंध में रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का पंजीकरण एक निर्धारित समय सीमा, अर्थात् एक महीने के भीतर कराना अनिवार्य होगा। सरकार का मानना है कि इससे संबंधों में पारदर्शिता आएगी तथा भविष्य में उत्पन्न होने वाले विवादों को कम किया जा सकेगा। प्रस्तावित कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति निर्धारित समय में अपने लिव-इन संबंध का पंजीकरण नहीं कराता है, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार नियमों के उल्लंघन पर दंड और कारावास का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को कानून का पालन करने के लिए प्रेरित करना है।
सरकार की चिंता इस बात से जाहिर होती है कि इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा है। कई बार लिव-इन संबंधों में महिलाओं को आर्थिक, सामाजिक और कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। संबंध टूटने की स्थिति में महिलाओं के लिए भरण-पोषण, संपत्ति और बच्चों की देखभाल से जुड़े प्रश्न उत्पन्न होते हैं। प्रस्तावित कानून इन समस्याओं के समाधान के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करने का प्रयास करता है। महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए इसके अतिरिक्त, लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को भी समान अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। सरकार का मानना है कि किसी बच्चे के अधिकार उसके माता-पिता की वैवाहिक स्थिति पर निर्भर नहीं होने चाहिए। इसलिए ऐसे बच्चों को उत्तराधिकार और अन्य कानूनी अधिकार प्रदान करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
उपरोक्त बिंदु से सरकार की मंशा साफ है कि वह हर स्थिति में ऐसे रिश्ते में रहने वाली स्त्री को सुरक्षा दिलाना चाहती है। अब इसके बाद समाज का दायित्व होता है कि कानूनन लिव-इन रिलेशनशिप भले ही नाजायज ना हो लेकिन समाज की दृष्टि में वह जायज नहीं है। भारतीय कानून ने ही विवाह के लिए लडक़े और लडक़ी की उम्र का निर्धारण कर उसे वयस्क अथवा अवस्यक बताया है। रूढि़वादी भारतीय समाज का मानस बदलने के लिए राजा राममोहन राय ने विधवा विवाह परंपरा की शुरूआत की। जो लोग अकेले हो गए हैं, उसे सनातनी संस्कृति में नवजीवन शुरू करने का प्रावधान है फिर यह लिव-इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों में उलझने की जरूरत ही क्या है। जब लोग लिव-इन रिलेशनशिप के खतरे को समझ जाएंगे या मानने लगेंगे तो सरकार और कानून पर पडऩे वाला अतिरिक्त दबाव स्वयमेव समाप्त हो जाएगा। कथित विकासवादी सोच के लोगों के लिए लिव-इन रिलेशनशिप जरूरी हो सकता है औवे राज्य शासन के प्रस्तावित प्रावधान के खिलाफ हैं। प्रावधान पर कुछ आलोचकों का कहना है कि लिव-इन संबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है और अनिवार्य पंजीकरण से निजता के अधिकार पर प्रभाव पड़ सकता है। उनका मानना है कि राज्य को व्यक्तिगत संबंधों में अत्यधिक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वहीं कुछ लोग इसे महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम मानते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि यदि इस कानून को संतुलित तरीके से लागू किया जाए, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए, जिन्हें लिव-इन संबंध टूटने के बाद कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं हो पाता, यह कानून सहायक सिद्ध हो सकता है। दूसरी ओर, कानून बनाते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान रखना आवश्यक है।
कुछ सामाजिक विचारकों और पारंपरिक दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के अनुसार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिलने से विवाह संस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विवाह भारतीय समाज की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है, जो केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का भी संबंध मानी जाती है। यदि बिना विवाह के साथ रहने को कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है, तो युवाओं में विवाह के प्रति प्रतिबद्धता और उसकी सामाजिक महत्ता कम हो सकती है। लिव-इन संबंध अपेक्षाकृत कम औपचारिक और आसानी से समाप्त किए जा सकने वाले संबंध माने जाते हैं। इससे दीर्घकालिक पारिवारिक स्थिरता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे विवाह, परिवार और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों के प्रति लोगों की आस्था कमजोर हो सकती है। इसके अतिरिक्त, पारिवारिक जिम्मेदारियों, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा बच्चों के पालन-पोषण से जुड़ी पारंपरिक धारणाओं में भी परिवर्तन आ सकता है। यह एक दृष्टिकोण मात्र है।
कई विशेषज्ञों का मत है कि किसी भी संबंध की मजबूती केवल कानूनी व्यवस्था पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, जिम्मेदारी और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इसलिए विवाह संस्था पर वास्तविक प्रभाव समय के साथ सामाजिक परिवर्तनों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा। कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश में लिव-इन रिलेशनशिप से संबंधित प्रस्तावित कानून भारतीय समाज और कानूनी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। यह कानून एक ओर महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार को लेकर नई बहस उत्पन्न हो गई है। समय-समय पर डॉक्टर भी सजग करते रहे हैं कि अधिक उम्र में विवाह अनेक शारीरिक समस्या का कारण बनता है, खासतौर पर माँ-बाप बनने में वहीं लिव-इन रिलेशनशिप में आप संतान उत्पत्ति के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन बच्चे के कानूनी अधिकार पर सब खामोश हैं और ऐसे में राज्य सरकार का प्रावधान अनुकूल है। भारतीय समाज में यह अंधानुकरण भविष्य के लिए खतरा साबित हो रहा है। रिश्तों में अविश्वास उत्पन्न हो गया और युवा वर्ग लिव-इन रिलेशनशिप में स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ बैठा है। (लेखक मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)
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