जनमाष्टमी ओर शिक्षक दिवस पर विशेष
श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा
प्रो. मनोज कुमार
श्रीकृष्ण का उदात्त चरित्र को लेकर हम हमेशा से ऊर्जावान रहे हैं। जिस सहजता और सरलता से उन्होंने जीवन जीने की सीख दी है, वह अपने आप में विशिष्ट है। सतयुग से लेकर वर्तमान समय में श्रीकृष्ण हमेशा से सामयिक रहे हैं। जब हम श्रीकृष्ण के जीवन का विवेचन करते हैं तो सहज ही शिक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि का संबंध हमें भारतीय ज्ञान परंपरा से अवगत कराता है। भारतीय ज्ञान-परंपरा में शिक्षा केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं रही है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को ज्ञानवान बनाने के साथ-साथ विवेकशील, अनुशासित, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना भी रहा है। वर्तमान समय में हम श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए जेन अल्फा तक आ गए हैं। इस समय भी भारतीय ज्ञान परंपरा हमें इस बात का स्मरण कराती है कि श्रीकृष्ण भी अपने समय में जेन अल्फा रहे हैं लेकिन उन्हें किशोर वय संबोधन दिया गया। आधुनिक टेक्रालॉजी के दौर में यह समझना रोचक होगा कि श्रीकृष्ण, सांदीपनी और जेन अल्फा का रिश्ता कैसे सामयिक हो सकता है। और यह भी कि इस संदर्भ में हम गुरु-शिष्य परंपरा को किस तरह देखते हैं। यह संयोग है कि पहले दिन हम श्रीकृष्ण के उदात्त चरित्र का स्मरण कर रहे हैं और अगले दिन ही हम शिक्षक दिवस मनाएंगे और दोनों दिनों में श्रीकृष्ण की उपस्थिति अपरिहार्य है।
आज शिक्षा के सामने चुनौती केवल ज्ञान उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ज्ञान के असीमित प्रवाह में सही ज्ञान का चयन करने की है। श्रीकृष्ण के समय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु के पास जाना पड़ता था; आज के जेन अल्फज्ञ के समय में ज्ञान स्वयं बच्चे की स्क्रीन तक पहुँच रहा है। तब गुरु ज्ञान का प्रमुख स्रोत था, आज इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी ज्ञान के स्रोत बन चुके हैं। किंतु ज्ञान के स्रोत बदल जाने से ज्ञान की आवश्यकता, विवेक की आवश्यकता और मार्गदर्शन की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है। इसी दृष्टि में श्रीकृष्ण और उनके गुरु सांदीपनि के संबंध को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के स्वरूप में देखते हैं तो दूसरी ओर, आज की पीढ़ी है जिसका जन्म डिजिटल तकनीक, इंटरनेट, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के वातावरण में हुआ है।
भारतीय परंपरा में सांदीपनि आश्रम का उल्लेख केवल इस कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वहाँ श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा प्राप्त की, बल्कि इसलिए भी कि यह आश्रम उस शिक्षा-दृष्टि का प्रतीक है जिसमें विद्यार्थी का निर्माण बहुआयामी रूप से किया जाता था। गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी केवल विषयगत ज्ञान अर्जित नहीं करता था, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन, कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मसंयम भी सीखता था। प्रश्न यह है कि क्या हजारों वर्ष पुरानी सांदीपनि-परंपरा और आज की डिजिटल पीढ़ी के बीच कोई सार्थक संवाद संभव है? यदि संभव है तो वह संवाद किस प्रकार का होगा?
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इस शिक्षा-दृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। वे एक साथ दार्शनिक, कूटनीतिज्ञ, योद्धा, प्रशासक, मित्र और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान और कर्म का जो समन्वय दिखाई देता है, वह इस बात की ओर संकेत करता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य परीक्षा में सफलता प्राप्त करना मात्र नहीं, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों का विवेकपूर्ण सामना करने की क्षमता विकसित करना है। वहीं जेन अल्फा अनेक प्रकार की सूचनाओं और विकल्पों से घिरा हुआ है। उसे केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि क्या जानना है; उसे यह भी सिखाना आवश्यक है कि क्या स्वीकार करना है, क्या अस्वीकार करना है और क्यों स्वीकार या अस्वीकार करना है। चुनौती यह है कि यह पीढ़ी अपने जिज्ञासा का समाधान करने या किसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए पुस्तकालय तक जाने के बजाय कुछ सेकंड में डिजिटल माध्यमों में तलाश करने लगता है। हम मानते हंै कि सूचना का विस्फोट हो रहा है और यह लाजिमी भी है लेकिन हम यह भी मानते हैं कि परंपरा और अनुभव का कोई विकल्प नहीं। सूचना की अधिकता भी ज्ञान की गारंटी नहीं है। श्रीकृष्ण की शिक्षा और जेन अल्फा की शिक्षा के मध्य यह बड़ा अंतर दिखता है।
श्रीकृष्ण का समकालीन महत्त्व इसी बिंदु पर दिखाई देता है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व हमें यह समझने में सहायता करता है कि ज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विवेक और परिस्थिति-बोध का समावेश न हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने केवल सूचनाओं का ढेर नहीं रखा। उन्होंने उसे कर्तव्य, कर्म, आत्मबोध और निर्णय के प्रश्नों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। सांदीपनि की परंपरा हमें गुरु की एक ऐसी भूमिका की याद दिलाती है जिसमें गुरु विद्यार्थी के व्यक्तित्व को समझता है। वह केवल विषय नहीं पढ़ाता, बल्कि विद्यार्थी के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानता है। डिजिटल युग ने शिक्षक की भूमिका को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और मूल्य-निर्माता के रूप में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकती है। शिक्षक को बच्चे को यह सिखाना होगा कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, लेकिन उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाए। यह भी सत्य है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता विद्यार्थी के लिए उत्तर लिख सकती है, लेकिन शिक्षक उसे यह सिखा सकता है कि उस उत्तर की सत्यता की जाँच कैसे की जाए। इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन शिक्षक यह समझा सकता है कि जानकारी को ज्ञान और ज्ञान को विवेक में कैसे बदला जाता है। गुरु-शिष्य संबंध को नए संदर्भों में पुनर्परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है।
आने वाला समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था का है। ऐसे में अनेक पारंपरिक रोजगार बदलेंगे और नई प्रकार की क्षमताओं की आवश्यकता होगी। लेकिन तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय गुणों का महत्त्व कम नहीं होगा। सहानुभूति, सहयोग, धैर्य, नेतृत्व, नैतिक निर्णय, रचनात्मकता और सामाजिक उत्तरदायित्व ऐसी क्षमताएँ हैं जिन्हें मशीनें पूर्ण नहीं कर सकती हैं अपितु अनुभव ही यहाँ कारगर भूमिका निभाएगा।
डिजिटल गुरुकुल की आवश्यकता
सांदीपनि आश्रम को आधुनिक संदर्भ में देखा जाए तो आज के विद्यालय और विश्वविद्यालय एक प्रकार के डिजिटल गुरुकुल में परिवर्तित हो सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक शिक्षा को पुराने गुरुकुल की नकल करने के स्थान पर उसके मूल तत्वों—अनुशासन, संवाद, आत्मीयता, अनुभवात्मक शिक्षा, प्रकृति से जुड़ाव और चरित्र-निर्माण—को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाना चाहिए। ऐसी शिक्षा वास्तव में आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान-दृष्टि का समन्वय होगी।
जड़ों की और लौटता मध्यप्रदेश
कहते हैं कि नाम का प्रभाव अधिक होता है और उसी के अनुरूप भाव बनते बिगड़ते हैं। सांदीपनि संबोधन सुनते ही भला-भला सा लगता है और मोहन सरकार ने अंग्रेजी दासता से मुक्त करते हुए सीएमराइज स्कूल के स्थान पर सांदीपनि संबोधन दिया है। सीएमराइज स्कूल का संबोधन से भाव अंग्रेजियत का हो जाता है वहीं सांदीपनि हमारी परंपरा की ओर लौटने का संकेत देता है। यह नहीं, मध्यप्रदेश में श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की थी, सो सांदीपनि अपने आपमें सुंदर और सम्मानजनक भी है।
यह भी समझना होगा कि सांदीपनि की परंपरा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता है अपितु उसे जीवन के लिए तैयार करता है। सांदीपनि-परंपरा का आधुनिक पुनर्पाठ हमें याद दिलाता है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य अच्छे अंक नहीं, अच्छा मनुष्य बनाना है। वर्तमान समय में मन के अनुकूल परीक्षा परिणाम नहीं आने पर अनेक आत्महंता के उदाहरण देखने को मिलते हैं। यह दुर्भाग्यजनक है। शिक्षा हमें ज्ञान, विवेक और कर्म के समन्वय की प्रेरणा देते हैं और जेन अल्फा हमें यह चुनौती देती है कि इन मूल्यों को नई तकनीकी दुनिया में किस प्रकार जीवित रखा जाए। शिक्षा को तकनीक-विरोधी नहीं, बल्कि तकनीक-सचेत और मूल्य-संपन्न बनाना होगा। सांदीपनि जैसी मार्गदर्शक शिक्षा, श्रीकृष्ण जैसा विवेक और जेन अल्फा जैसी तकनीकी जिज्ञासा। हम मानते हैं कि संतुलित समन्वय संभव हो सका, तो डिजिटल युग की शिक्षा केवल स्मार्ट नहीं होगी, बल्कि सार्थक, संवेदनशील और मानवीय भी होगी। आइए श्रीकृष्ण के साथ शिक्षकों का भी स्मरण कर लें क्योंकि एक सुशिक्षित समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित शिक्षक की आवश्यकता हमेशा रहेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबंद्ध हैं)
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